गीता माहात्म्यानुसंधान
समत्त्वं योग उच्यते २/४८, निर्दोषं हि समंब्रह्म ५/१९ अर्थात जीवब्रह्मैक्य प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ का नाम योगशास्त्र है । अद्वैत का प्रमाण गीता में इससे बढकर नहीं हो सकता है । ―स्वामी शिवाश्रम
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
निवेदन—
गीता के विचार से हमने अनुभव किया कि वस्तुतः पूर्वापर का विचार ही शास्त्र के दृष्टिकोण को समझने का प्रधान साधन है । इसके विचार से पूर्व की समझ और अब में बहुत अन्तर हो गया है । हमारे संपूर्ण पूर्व के विचार इस क्रम विचार में ध्वस्त हो गये हैं । हमारा विचार ‘तत्त्वमसि’ को केन्द्रित करके है । यह विचार इतना गंभीर है कि बड़े बड़े पण्डित मोहित हो जाते हैं, तो फिर मुझ जैसे अशिक्षित और अनपढ़ की क्या बिसात ? अतः मेरी ऐसी ही प्रकृति है और दोष तो लोग आचार्य शङ्कर, व्यास जी और ईश्वर में भी निकालते हैं । अतः हमारे द्वारा यहाँ विचारों में उत्पन्न दोषों पर दृष्टिपात न करते हुए विद्वत्वृन्द लक्ष्य पर विचार करके अपनी अहैतुकी कृपा से संतुष्ट हो जायें । फिर भी यदि संतोष नहीं होता है तो नियम है कि जिस पुस्तक का अभाव हो वह पुस्तक अवश्य लिखना चाहिए इस न्याय आप भी ऐसी टीका लिखें जो सार्वभौमिक मान्य हो तो मैं आपकी चरण वंदना करूंगा
हमने जिन आदरणीय आचार्यों का आश्रय लेकर विचार किया है वे निम्न हैं―
१- रामानुज भाष्य, २-सारार्थवर्षिणी ―विश्वनाथ चक्रवर्ती– गौड़ीय मठ, ३-साधक संजीवनी ―स्वामी रामसुखदासजी, ४-शांकर भाष्य, ५-तात्पर्यबोधिनी ―शंकरानन्द सरस्वती, ६-गीतार्थ ― अभिनवगुप्त, ७-गूढ़ार्थ दीपिका ―मधुसूदनान्द सरस्वती, ८-आनन्दगिरी जी, ९-गीता रस रहस्य एवं कहीं कहीं गीतादर्शन―अखंडानंद सरस्वती जी एवं १०-कहीं कहीं गीतातत्वावलोक ―उडिया बाबा जी एवं अन्य ।
हमने तीन क्रम में अलग-अलग विचार करने के पश्चात संग्रह किया है अतः संभव है संपादन करने में विचारों की भिन्नता दूर न कर सका होऊं, अतः जहां सभी विचारों का मिलन किया गया है वहां ये त्रुटियां संभव हैं और जहां विचार विलय करने में कारणवश सफल नहीं हुआ वहां दृष्ट अथवा करके समन्यव किया गया है, क्योंकि दृष्टि और समय भेद से वे विचार हमें उचित लगे अतः अथवा करके कहीं-कहीं ज्यों का त्यों रख दिया है । “जहां कहीं व्याख्या आवश्यकता से अधिक विस्तृत है और पढ़ने में रुचि न हो वहां भावार्थ, विशेष, एवं सारांश का” विज्ञजन वहां सावधानी पूर्वक चिन्तन करते हुए जो अपने स्वभाव के अनुरूप हो उसे ग्रहण करते हुए, अन्य का विचार अपनी दृष्टि के अनुसार कर लें ।
यद्यपि इसमें हमारे निजी विचार नहीं हैं जो भी लिखा है उसमें उपरोक्त महापुरुषों के विचारों की ही समालोचना मात्र है (तो भी प्रकरण के अनुसार यदि आवश्यक दिखा तो वहां हमने स्पष्ट लिख दिया है कि ये मेरे विचार हैं) । चूंकि जो भी विषय हमने चयन किया है, वह व्यक्तिगत प्रकृति के ही अनुरूप चयन किया ताकि इतने सारे विचारों के स्थान पर एक ही स्थान पर मेरी प्रकृति के अनुसार साधन सामग्री प्राप्त हो सके, इसलिए लिखने की शैली के अनुसार आपको मेरे निजी विचार लग सकते तथापि मेरा पूरा विश्वास है कि इसमें सब कुछ विचार तो अन्य महापुरुषों के ही हैं अतः विचारशील निष्ठावान साधक को गीता समझने के लिए विपुल सामग्री प्राप्त होगी ।
मैंने अनुभव किया कि मैं रजोगुण की अधिक वृद्धि के कारण अपने जो भाव व्यक्त होना चाहिए था वो व्यक्त कर पाने में समर्थ नहीं हो सका तथापि अन्तःकरण की शान्ति के लिए यथा संभव लिख कर अपने भावों को प्रकट कर रहा हूँ । यद्यपि हमने उपरोक्त आचार्यों में भी आचार्य शंकर को ही विशेष रूप से आगे रखा है तथापि आवश्यक नहीं है कि हमारे किसी भी लेख या विचार या शैली से कोई सहमत हो क्योंकि मैं स्वयं जब दूसरे के विचारों से सहमत नहीं हो पाता हूँ तो और किसी से सहमति की अपेक्षा भी कैसे कर सकता हूँ ? बस जिस किसी भी प्रकार मन को गीता में लगाने का प्रयत्न कर रहा हूँ तथापि जैसे लगाये गये किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत पेड़ के नीचे आकर कोई छाया का आनन्द लेने लगे और उसके गिरे फल उठाकर खाने का भी आनन्द लेने लगे तो उसमें उस पेड़ लगाने वाले का सौभाग्य ही होता है कि कोई उसके लगाये वृक्ष की छाया या फल से संतुष्ट हुआ वैसे ही यदि किसी को इस विचार से कोई लाभ प्राप्त हो तो मेरा सौभाग्य होगा । लक्ष्य केवल गीता का चिन्तन ही है ।
हमने जहाँ भी विरोधाभास विरोधाभास देखा है वहाँ पर असहमति भी कारण और प्रमाण सहित प्रकट किया है इसके लिए सभी सज्जनवृन्द क्षमा करेंगे ।
दो शब्द— गीता मानव मात्र के कल्याण का सबसे उत्कृष्ट मार्ग है । मैने जो अनुभव किया वह इतना ही है कि गीता कोई ज्ञान नहीं बल्कि स्वरूप की अनुभूति है । कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि सभी कुछ इसमें अधिकारानुसार प्राप्त है ।
गीता मनुष्य जीवन का उत्कर्ष है । जैसे आज के यान्त्रिकी (Machinery) युग में आप मशीनों (Computer) में दुनिया की प्रत्येक जानकारी है तथापि उसमें मस्तिष्क न होने से वह विचार नहीं कर, कोई निर्णय नहीं कर सकता है और न ही आचारण करके अपना कल्याण कर सकता है । जैसा उसमें भर दिया गया है वैसा का वैसा ही सम्मुख प्रस्तुत कर देता है । इसी प्रकार मनुष्य परंपरागत भाष्य, टीका आदि को वैसा का वैसा ही रट लेने वाला विद्वान नहीं बल्कि एक Computer (कम्प्यूटर) से अधिक कुछ नहीं हो सकता है ।
परंपरागत हमें सिद्धांत की प्राप्ति होती है, मार्गदर्शन मिलता है, किन्तु चलना स्वयं ही पड़ेगा । उसके लिए अपना विवेक चाहिए । हम देख रहे हैं कि हठधर्मिता ने मानव समाज को मनुष्य से असुर बना दिया है । जिसका परिणाम आज समाज भुगत रहा है । समाज के पतन का एकमात्र कारण है धर्माचार्यों का हठपू्र्वक अपनी बात मानने को बाध्य करना । वेदों में वर्ण व्यवस्था तो मिलती है लेकिन वहां जाति और वर्ण को लेकर झगड़ा नहीं है । जैसा कि महाराज अश्वपति के पास जब ऋषिगण ज्ञान प्राप्ति के निमित्त जाते हैं तो राजा के द्वारा दिये गये अर्घ्य, पाद्य को वे स्वीकार नहीं करते हैं, इस पर राजा कहता है—
न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो ।
नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥
अर्थात— न मेरे जनपद अर्थात् राज्य में कोई चोर है, न कंजूस स्वामी और वैश्य है, न कोई शराब पीने वाला है न कोई अग्निहोत्र से रहित है, न कोई अविद्वान् है । न कोई मर्यादा का उल्लंघन करके स्वेच्छाचारी है, स्वेच्छाचारिणी तो हो ही कैसे सकती है ।
विचारणीय तथ्य यह है कि क्या राजा अश्वपति के राज्य में शूद्र नहीं थे ? क्योंकि कोई भी अग्नि रहित अर्थात अग्निहोत्र से रहित न होना यह इसी बात की ओर संकेत करता है कि या उस राज्य में शूद्र थे ही नहीं, या फिर शूद्र को भी वैदिक अग्निहोत्र पर अधिकार था और वे करते थे । इसके बाद कहते हैं कि कोई अविद्वान अर्थात मूर्ख या अनपढ़ अशिक्षित नहीं है । इसका अर्थ हुआ कि वे सभी वेदाध्ययन करके वेदों के तात्पर्य को जानने वाले थे ।
इसके अतिरिक्त राज दशरथ के राज्य में प्रजा में चारों वर्णों की व्यावस्था तो मिलती है साथ ही वहां भी यह कहा गया है ऐसा कोई नहीं था जो अग्निहोत्री न हो, यह वाल्मीकीय रामायण में स्पष्ट वर्णन मिलता है । इस प्रसंग को देखने से स्पष्ट होता है कि शम्बूक नामक शूद्र की कथा में शम्बूक के तप के कारण ब्राह्मण बालक का मरना, राम जी को उकसाना और शम्बूक वध काल्पनिक है और बाद के कुछ असामाजिक आतंकियों द्वारा उसमें प्रक्षेपण करके समाज में विद्रोह करने का कुटिल खेल खेला गया है । जिसका परिणाम आज सामने दिखाई दे रहा है ।
यद्यपि गीता से भिन्न हमारा यह लक्ष्य नहीं है कि ब्राह्मणादि पर हम आक्षेप कर रहे हैं तथापि हम यह बताना चाहते हैं कि समाज को साजिशों से सावधान होकर अपना कर्म करना चाहिए । वेदों के अनुसार गीता में भी वर्ण व्यवस्था है, किन्तु हठधर्मी भाष्यकारों एवं टीकाकारो ने इतना जातिवाद घुसा दिया है कि गीता का मूल उद्देश्य ही जातिवाद परक बना दिया है । श्रुति विरुद्ध वैश्य को पापयोनि कहकर उनका भी वेदों से अनधिकार घोषित कर दिया गया है । तो फिर शूद्र किस खेत की मूली हैं ?
एक उदाहरण है— ‘सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्’ १८/४८ अब यदि श्लोक में सहज का अर्थ यज्ञोपवीत आदि संस्कार किये जाने के बाद ब्राह्मण आदि होता है, तब उसका जो सहज कर्म है वह सहज कर्म यहां कहा गया है, तो जन्म से व्याध आदि का हिंसित कर्म भी सहज नहीं है और उसका भी कोई संस्कार होता होगा जिसके बाद उसका कोई सहज कर्म होता होगा ? और यदि नहीं तो फिर सहज का अर्थ ब्राह्मण का सहज स्वाभाविक ब्राह्मणत्व कर्म और व्याध का व्याधत्व कर्म इसी प्रकार जो जिस जगह खड़ा है उसके अनुसार उसका स्वाभाविक सहज कर्म श्वास से लेकर खान-पान और कर्म तक ही होगा तभी तो गीता मनुष्य मात्र का कल्याण करने वाली होगी ? क्योंकि ठीक इससे पहले कहा है कि— ‘स्वाभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषं’ १८/४७ अर्थात जो स्वभावाकि प्रकृति द्वारा निश्चित कर्म है उसको करने से पाप नहीं लगता । तभी तो सदन कसाई, धर्मव्याध, जैसे हिंसा युक्त और तुलाधार वैश्य जैसे लोभी प्रवृत्ति वाले लोग भी कल्याण को प्राप्त हुए । यही स्वाभाविक और सहज कर्म हैं जिन्हें करने से मनुष्य आत्मसिद्धि को प्राप्त करता है— ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्विं विन्दति मानवः’ १८/४६ इसका कारण बताया कि आत्मसिद्धि में कारण कर्म नहीं है बल्कि—
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥१८/४९॥
अर्थात सभी चौदह इन्द्रियों की एक इन्द्रिय हो जाने के कारण उसकी स्पहा समाज हो गई है इसलिए संपूर्ण अनात्पदार्थों से हटकर निक्रिय आत्मा में विवेक-विचार द्वारा क्रियमाण प्रकृति का त्याग करके परम पुरुषार्थ के साधन के दृढ़ निश्चय को प्राप्त हो जाता है । अर्थात कर्म में कर्तापन का अहं और फल की स्पृहा जिसमें नहीं है ऐसा अपने स्थानीय हिंसित या अहिंसित कर्मों को करने वाला भी आत्मभाव को प्राप्त कर लेता है, तभी तो— ‘हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते’ १८/१७ सिद्ध होगा ।
इस प्रकार यह सिद्ध होता सामाजिक वैमनस्यता और हठधर्मिता टीकाओं और भाष्यों में कूट कूट कर भरी गई है जिसका विवेकपूर्वक निवारण करके अपना कल्याण मनुष्य मात्र को करना चाहिए । यही गीता का परम लक्ष्य है ।
—स्वामी शिवाश्रम
प्रस्तावना— आज का समाज कहीं भी शान्ति प्राप्त नहीं कर पा रहा है । वह बाह्य जगत में ठीक धृतराष्ट्र की तरह ही अपने अनधिकार में अधिकार मानकर यह जानते हुए भी कि यह जगत आज तक किसी का न हुआ है और न ही होगा तो भी संपूर्ण शक्ति जगत और जागतिक सुख के संचय में लगा देता है । गीता ऐसी परिस्थितियों में भी स्थाई सुख की खोज करती हुई मानव जीवन को सुखमय बनाने का भरपूर प्रयत्न करती है । हम यह नहीं कहते हैं कि आप ईश्वर को मानो, कोई ईश्वर है भी या नहीं इस पर मतभेद हो सकते हैं, किन्तु ‘मैं’ हूँ इसमें दूर दूर तक कोई मतभेद नजर नहीं आता । कीट से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी जीव स्थाई सुख चाहते हैं इसमें भी कोई मतभेद नहीं हो सकता है । गीता ऐसे ही स्थाई सुख को प्राप्त करने के लिए मानव जीवन का पथ प्रदर्शन करती है ।
‘सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्मतीन्द्रियम्’ ६/२१ अर्थात जो आत्यंतिक सुख है वह बुद्धि पूर्वक प्राप्त होता है, किन्तु वह अतीन्द्रिय सुख है । आत्यंतिक सुख इन्द्रियों का विषय नहीं हो सकता । जो इन्द्रियों द्वारा सुख पाने का प्रयत्न करता है उसकी बुद्धि नष्ट हो गई है, वह परम सुख कभी प्राप्त नहीं कर सकता है ‘न हिनस्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्’ १३/२८ बुद्धि का नाश मतलब आत्महत्या करना । अपना सर्वस्व नाश कर लेना । उपनिषदों में ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ एवं स्मृतियों/ गीता आदि में ‘वासुदेवः सर्वम्’ का उद्घोष इसलिये नहीं किया गया है कि आप से भिन्न कोई ब्रह्म या ईश्वर है, बल्कि इसलिए यह उद्घोष किया गया है कि आप जहाँ हो जिस जगह पर हो वहीं से अपने मार्ग का चयन कर लो । इसीलिये ‘अयमात्मा ब्रह्म’ भी श्रुति यही कहती है आत्मा अर्थात स्व से भिन्न कोई ब्रह्म नहीं है ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ यानी यह सब आत्मा ही है इत्यादि श्रुति सम्मत आत्मा को जो मैं का अर्थ है उसे स्वीकार कर लो । यही सुख की चरम सीमा होगी । यदि आप ईश्वर या ब्रह्मवादी हो तो उन्हें स्वीकार करो और यदि आप ईश्वरादि को नहीं मानते हो तो स्वयं को तो मानोगे ? तो स्वयं पर विचार करो कि ‘मैं कौन हूँ’ ? इसी बात का सबसे पहले अध्याय २/१२ से लेकर श्लोक २/३० तक विस्तृत वर्णन किया गया है और अन्त में कह दिया कि ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते’ २/५५ यह आत्यंतिक सुख है स्वयं की स्वयं में स्थिरता । जहाँ हमारी ब्रह्म में अभिन्न प्रतिष्ठा है वहीं आपके मैं का लक्ष्यार्थ आत्मा का स्वरूप है । इसीलिए कृष्ण ने पहले ही कह दिया आत्मवान् २/४५ अर्थात कुछ मत कर मात्र आत्मा में स्थित हो जा और जो कुछ भी आत्मा से भिन्न हो उसका त्याग कर दे । इस आत्मा का ही उपक्रम अध्याय २ से आगे विस्तार किया गया है । आत्मप्रतिष्ठा ही जिन विवेकशील का लक्ष्य हो उन्हें भगवती गीता से भिन्न अन्य कोई और प्रयोजन हो भी क्या सकता है ?
हमारे जीवन में एक बहुत बड़ी विडंबना है, उसको भी समझकर रखना चाहिए कि हम किस लक्ष्य को लेकर कौन सा उपदेश कर रहे हैं और किस लक्ष्य को लेकर सुन रहे हैं ? उपदेश का प्रभाव उसी अंश को प्रभावित करता है अन्य को नहीं । हमारे परमाराध्य कहते थे कि उत्तरकाशी में एक बड़े विद्वान कथावाचक एक महात्मा से मिलने पर पूछा कि महाराज जी ! आपको देखने से ऐसा लगता है कि आप कुछ अधिक पढ़े लिखे नहीं हो तो भी आपके ललाट पर उत्कृष्ट ब्रह्म तेज और शान्ति झलक रही है और मैं इतना बड़ा विद्वान होकर भी अशान्त हूँ, आपने ऐसा क्या पढ़ा है ? महात्मा ने कहा कि जब आप पढ़ते थे तो लक्ष्य क्या था ? यही कि मैं बड़ा विद्वान बनूँ ? अतः शास्त्र ने आपको वह दिया और मैंने अमुक (किसी चौपतिया जैसी छोटी) पुस्तिका पढ़ी है किन्तु मेरा लक्ष्य ब्रह्म था अतः हमें वह मिला है । अतः लक्ष्य के अनुसार ही सबको समझ और क्रिया प्राप्त होती है । गीता में भी प्रथम अध्याय को देखने से अर्जुन की दयनीय दशा युद्ध से पलायन मात्र मोह के कारण बनी थी । यदि लक्ष्य सन्न्यास होता तो लाक्ष्यागृह के बाद का वनवास, द्यूतक्रीड़ा के बाद का वनवास जब मिला तभी वह संसार की असारता को देखते हुए निर्णय संन्यास का ले सकते थे किन्तु ऐसा नहीं किया । जब अपने ही दोनो ओर से मरने वाले दिखे तब मोह उत्पन्न हो गया और युद्ध से पलायन करने के लिए शास्त्र को ही ढाल बना कर भिक्षावृत्ति यानी संन्यास जीवन स्वीकार करना पसंद किया ।
यही है अपने कर्तव्य से पलायन । किसी भी कर्मठ व्यक्ति को कर्तव्य पलायन करने की शास्त्र कभी अनुमति नहीं देता है अतः वह कर्मनिष्ठा में स्थित रहते हुए भी आत्मानुसंधान करके भी परमसुख को प्राप्त करने का लक्ष्य गीता ही सिखाती है । यही कर्तव्य पालन की निष्ठा अर्जुन में अन्त में जाग्रत हुई । जिसका विवरण आगे अध्याय १८/७३ में दिया जायेगा ।
हम धृतराष्ट्र के आभारी हैं कि यदि उन्हें इतना उत्कृष्ट मोह न हुआ होता तो आज यह गीतामृत अद्वैतवर्षिणी हमारे बीच में न होती । फिर बिचार तो करना ही चाहिए कि हम बारंबार गीता पर विचार तो करते हैं किन्तु उसका हमारे ऊपर प्रभाव कितना है ? भगवान सनत्कुमार जी ने उस समय ब्रह्मतत्त्व का धृतराष्ट्र को उपदेश किया जब उद्योग पर्व में दोनो पक्षों से बहुत ही जोरदार सैन्य संगठन और युद्ध की तैयारी चल रही थी । वह उपदेश सनत्सुजातीय दर्शन के नाम से प्रसिद्ध है । स्वयं नारायण ने ही सनत्सुजात के रूप में वह उपदेश सुनाया, किन्तु मोहाच्छन्न धृतराष्ट्र पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा सका । अतः युद्ध में दस दिन तक कोई वृत्तांत धृतराष्ट्र तक दैवीमाया के प्रभाव नहीं पहुंचा । दसवें दिन जब सञ्जय पितामह भीष्म के शरशैय्या विश्रान्ति के उपरान्त धृतराष्ट्र के पास पहुंचे तो धृतराष्ट्र का पहला प्रश्न होता है कि संजय युद्ध का वृत्तांत सुनाओ और यह सुनाओ कि युद्ध का प्रारंभ कैसे हुआ और पहला शस्त्र किसने चलाया ? इससे युद्ध होने की सूचना धृतराष्ट्र को होना स्पष्ट सूचित होती है किन्तु मुख्य विवरण गीता के माध्यम से पता होता है । धृतराष्ट्र ने इसी बात को लेकर किमकुर्वत १/१ कहा था ।
संजय बड़ी ही बुद्धि कुशलता से कौरव सेनापति भीष्म द्वारा प्रथम शंखध्वनि करने की बात कहते हुए कौरव पक्ष ही प्रथम युद्ध की घोषड़ा करता है यह बताकर अन्त में ‘यत्र योगेश्वरः कृष्णः….’ १८/७८ कहते हुए पाण्डव पक्ष की विजय भी सुनिश्चित करते हैं, ताकि बची हुई संपत्ति और पुत्रों की संधि करके अभी भी रक्षा की जा सके लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका इसी को कहा ‘दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया’ ७/१४ । हमारा कहने का तात्पर्य इतना है कि गीता दो बातें स्पष्ट कहती है कि पहली बात कर्मिनष्ठा और दूसरी बात अपने अधिकार के अनुसार ही कर्म का चयन करना । गीता एक साथ चारों वर्ण एवं आश्रम आदि का सिद्धांत बताती है उसे अपने अपने अधिकारानुसार ग्रहण करना चाहिए । मात्र संन्यासी के लिए ही गीता है, गीता मात्र संन्यास का ही उपदेश करती है मैं यह कभी नहीं मान सकता हूँ । मात्र संन्यास का उपदेश उद्धवगीता श्रीमद्भागवत में ही दिया गया है यहाँ नहीं । अतः पहले अपना लक्ष्य निश्चित करो और फिर गीता का अध्ययन करो । ओ३म् !
—स्वामी शिवाश्रम
गीता में वेदान्त—
गीता एक अत्यंत गोपनीय तत्त्व है जिसके विचार करने पर बड़े से बड़े शूरवीर धाराशायी हो जाते हैं, फिर मेरे जैसे कीड़े-मकोड़े कहाँ लगते हैं ? तथापि यही तो वह आकाश है जिसमें मनोवेग गति वाले गरुण भी उड़ान भरते हैं, किन्तु वे अन्त नहीं पाते, तो क्या गरुड़ ने आकाश का अन्त नहीं पाया यह सोचकर कर मच्छर उड़ना बन्द कर देगा ? नही....! गरुड़ की तरह उसे भी सत्ता आकाश ने ही दी है, अतः उसका भी पूर्ण अधिकार है कि वह भी आकाश के अन्त की इच्छा का त्याग करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार उड़े । इसी प्रकार मैं विद्वान तो नहीं हूँ, अशिक्षित भी हूँ तो क्या हुआ ? मैं भगवती गीता पर बड़े-बड़े विद्वान भाष्यकारों और टीकाकारों को देखकर विचार करना छोड़ दूं ? अगर यह छोड़ दूं तो करूंगा क्या ? मेरा समय कैसे पास होगा अतः समय पास के लिए मैं भगवती गीता का विचार करता हूँ ।
गीता साक्षात् वेदान्त शास्त्र का प्रतिपादन करती है । इसका प्रमाण भी कहीं और से नहीं स्वयं श्रीभगवान के द्वारा कहे गये शब्दों में समझने का प्रयत्न करते हैं….
श्रीभगवान गीता में अर्जुन को कहते हैं कि मैं उस पद को कहता हूँ जो मेरा गुणगान करते हैं….
ऋषिभिर्बहुधागीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्र पदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥१३/४॥
अर्थात ऋषियों के द्वारा वेदों में जो कहा है उसको कहूंगा । विशेष ध्यान देने की बात यह है कि जिसका वर्णन ब्रह्मसूत्र पदों द्वारा चार भागों में चार प्रकार से मेरे निमित्त अपना युक्तिपूर्ण निश्चय कहते हैं । यहां वि उपसर्ग के सहित निश्चित आया है जिसका अर्थ है जिस निश्चय के बाद कोई निश्चय करना शेष नहीं रहता । साथ ही आगे कहते हैं -👉 वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५/१५॥ यहाँ भी श्रीभगवान ने स्वयं के द्वारा वेदों और वेदवित् अर्थात वेद के तात्पर्य के द्वारा ही जानने योग्य स्वयं को बताने के साथ ही कहते हैं । 👉‘वेदान्तकृत्’ अर्थात वेदान्त वेदान्त परंपरा का निर्माता मैं स्वयं हूँ । अतः यह श्रीभगवान के शब्दों में ही गीता का कलेवर वेदान्त प्रतिपाद्य है यह सिद्ध हुआ तथापि हम श्रीभगवान के ही शब्दों में और विचार कर लेते हैं….
वाराह पुराण में पृथ्वी के पूछने पर भगवान विष्णु कहते हैं….
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः ।
अर्धमात्राक्षरा नित्या स्वानिर्वाच्यपदात्मिका ॥
अर्थात गीता मेरी परा विद्या है यह ब्रह्मस्वरूपा है इसमें किसी प्रकार का कोई संशय नहीं है । यह गीता अकार, उकार, माकार के साथ प्रणव में अर्धमात्रा है, नित्या है अर्थात यह त्रिकाल में एकस्वरूप रहती है जिसे सामन्य शब्दों में शाश्वत एवं अविनाशी कहना ही उचित है क्योंकि अविनाशी के मुख कमल की वाणी है, अतः स्वाभाविक अविनाशी अपने प्रियतम से अभिन्न है । ‘स्व’ नाम का जो अनिर्वाच्य पद है वह उसी पद स्वरूपा है अर्थात साक्षात स्वनिर्वाच्यपद वाली है । आगे कहते हैं— वेदत्रयी परानन्दा तत्वार्थज्ञानसंयुता ॥ अर्थात ये वेदत्रयी है (वेदत्रयी कहने मात्र से चारों वेद समझना चाहिए) । यह गीता तत्त्वज्ञान से युक्त है । अगला श्लोक संभतः स्कन्द पुराण का है तथापि न हो तो भी यह श्लोक वेदान्तियों और सिद्धान्तियों सबको मान्य है गीताप्रेस से गीता माहात्म्य में देखा जा सकता है……
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥
यहाँ तो गीता को वेदों का दूध अर्थात सार कह दिया गया है । इसके अतिरिक्त प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर “श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृणार्जुन संवादे” कहा गया है, अर्थात इस उपनिषद का नाम गीता है गीतासु+उपनिषत्सु अर्थात गीता नामक उपनिषद में, जैसे छांदोग्य, बृहदारण्यक, ऐतरेय, माण्डूक्य आदि नाम के उपनिषद हैं, वैसे ही यह गीता नामक उपनिषद है इसीलिये कहा गीतासु+उपनिषत्सु जो श्रीमत् का अर्थ दैवी संपत्ति से युक्त, भगवत् का अर्थ है जो स्वयं साक्षात् षडैश्वर्य के समान अर्थात जिसके अध्ययन/चिंतन से षडैश्वर्य की प्राप्ति हो जाये, ब्रह्मविद्यायां का अर्थ है ब्रह्मविद्या के वर्णन के अंतर्गत योगशास्त्रे योग अर्थात जीवब्रह्मात्मैक्य नामक शास्त्र में जो श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्थात श्रीकृष्णार्जुन संवाद हुआ वह अमुक नाम से अमुक अध्याय । अर्थात श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृणार्जुनसंवादे यानी जो दैवी संपत्ति और साक्षात् षडैश्वर्य को प्रदान करने वाली गीता नाम की ब्रह्मविद्या है उस ब्रह्मविद्या के अन्तगर्त जीवब्रह्मात्मैक्य नामक योगशास्त्र में से श्रीकृष्णार्जुन नामक जो संवाद है अमुक अध्याय के नाम से इति अर्थात इस प्रकार जो ॐ तत् और सत् अर्थात तत् यानी वह सत् अर्थात जो नित्य सत्स्वरूप है उसका वर्णन किया गया । ऐसा ही संवाद उपनिषदों में भी कहा गया है भिन्न नहीं ।
आप सभी सुधीजन ऐसा कोई प्रवचन न करे जिससे गीता, वेदान्त और उसके चिंतकों के प्रति अश्रद्धा का दोष उत्पन्न ही हो, क्योंकि अश्रद्धा हमारे जीवन का सबसे बड़ा अंधकार है । इसीलिये आपकी श्रद्धा गीता पर है तो इस पर भी विचार करें "श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्" लेकिन "तत्परः संयतेन्द्रियः" ।।४/३९।। गीता श्रद्धा का विषय है "श्रद्धवाननसूयश्च" १८/७१ तब जब श्रद्धापूर्वक……
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥१८/७०॥
अर्थात जो श्रीकृष्णार्जुन के इस गीता रूप संवाद को पढ़ेगा, इसे यह ज्ञानयज्ञ है ऐसा करके दूसरों को अर्थात गीता के अधिकारी को कहेगा वह मेरी ही आराधना करता हुआ मुझको ही प्राप्त होगा । अर्थात गीता में ज्ञानी को अपना आत्मा अर्थात स्वरूप बताया है "ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्" ७/१८ जो लोग यहाँ पर भेद दृष्टि रखते हैं उनको इस उपरोक्त प्रमाण सहित, और भी प्रमाण गीता में ही मिल जायेंगे जो आत्मैक्य का स्पष्ट वर्णन करते हैं । यहाँ मुझे प्राप्त होने का अर्थ है कि मुझ आत्मस्वरूप को जिसे तू उपाधि के कारण जीव मानता था और ज्ञान होने के बाद जीव-ब्रह्म की दीवार ढह जाने के बाद जो मैं का अर्थ होता है, वह अर्थ रूप मैं हूँ, उसी अर्थ रूप मुझ को प्राप्त होता है । यदि आप उस परमात्मा को अखण्ड मानते हैं और अपने को उससे अलग रखते हैं तो आपकी सीमा एक होगी और परमात्मा की सीमा एक होगी इससे शुद्धचैतन्यत्व को प्राप्त पूर्व में जीव संज्ञक आत्मा की असीमता बाधित होकर और जिस परमात्मा को आप अखण्ड मानते हो उसका अखण्डत्व बाधित होकर ससीम हो जायेगा और ससीम होने से निश्चल और अचल २/५३ की संज्ञा समाप्त होकर विनाश को प्राप्त होने वाला आपका परमात्मा और जीव दोनो ही होंगे । क्या आपके गीता चिंतन का यही फल होगा ? नहीं….! वह अभिन्न अखंड और असीम एवं अविनाशी ही है ऐसा विचार करो । साथ ही बीच में थोड़ा प्रसंग छूट गया वह यह है कि हमने ऊपर गीता के अधिकारी को ज्ञान देने की बात कही थी तो प्रश्न होगा कि गीता का अधिकारी कौन है ? इसका निर्णय भी गीता ही करती है……
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥१८/६७॥
अर्थात जो ब्रह्मचर्यादि से शरीर को तपाया हुआ नहीं है, जो मेरा भक्त नहीं है मेरा भक्त का अर्थ यह कदापि न करना कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि अलग अलग हैं क्योंकि कृष्ण साढ़े तीन हाथ का शरीर नहीं है वह व्यापक ब्रह्म है, अतः जो उस अखण्डित परमात्मा को खण्डित करता है संसार का सबसे बड़ा पापात्मा वही है, उसको यह ज्ञान कदापि नहीं देना चाहिए और किसी को भले दे ही दिया जाये कदाचन का यही अर्थ है, अखंड ज्ञान क्या है स्वयं श्रीभगवान ही बताते हैं “सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम्” ॥१८/२०॥ अर्थात भिन्न भिन्न प्रणियों में एक अखंड परमात्मा को देखना ही सात्विक ज्ञान है, एवं– “पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्” ॥१८/२१॥ अर्थात संपूर्ण प्रणियों में एक अखंड परमेश्वर को भिन्न भाव से देखने वाला राजस ज्ञान है इसके बाद तामस ज्ञान कहा गया है । इसीलिये इतना ही नहीं यह ज्ञान जो मेरी इस वाणी अर्थात गीता को सुनने की इच्छा न रखता हो उसके और जो मुझमें एवं मेरी इस गीतारूपी वाणी में दोष देखता उसको भी यह ज्ञान नहीं देना चाहिए । अतः श्रीभगवान को भिन्न देखना उनका और उनकी वाणी के अपमान का दोष कोई विचारशील कैसे ले सकता है ? इसलिये श्रीभगवान की वाणी गीता वेदप्रतिपाद्य एक अखंड आत्म सत्ता का वर्णन करती है इसमें संदेह को स्थान नहीं देना चाहिए क्योंकि ‘संशयात्मा विनश्यति’ ।
१८/६७ में गीता का अधिकारी बताया गया है । अब अर्जुन का अधिकार देखिए― श्रीभगवान अर्जुन को कहते हैं "भक्तोऽसि"४/३ । अर्जुन भक्त कैसे है देखिये— "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्" २/७ मैं आपका शिष्य हूँ लेकिन आजकल जैसा शिष्य नहीं कि कान फुंकाया और चलता बना । उपदेश गुरु का सुनने की बजाय गुरु को ही उपदेश करने लगा । अर्जुन शिष्य ही नहीं "त्वां शरणं प्रपद्ये" मैं आपकी शरण में हूँ । शरणात वही होता है जो सब प्रकार से अपने को शरणागत, रक्षक के हाथों में सौप कर आत्मसमर्पित हो जाये । शरणात रक्षक जैसा कहे वैसा करे उसको शरणात कहते हैं । अतः अर्जुन ने शरणागति के साथ ही शिष्यता स्वीकार की, इस प्रकार समर्पण के बाद कहता है "शाधि माम्" मुझ भ्रमित बुद्धि वाले को शिक्षा देकर अनर्थ से रोको । ऐसे शरणापन्न को भक्त कहते हैं इसलिए भगवान ने कहा भक्तोऽसि । भक्त का अर्थ आप क्या करेंगे ? राजभक्त-राजभक्ति, देशभक्त-देशभक्ति, स्वामिभक्त-स्वामिभक्ति इत्यादि में भक्त का अर्थ क्या हुआ ? अर्थ एक ही है उस उस के प्रति सब कुछ जो कुछ भी अपने पास है समपर्ण कर देना ही भक्त का लक्षण है, लेकिन स्वयं को भी समर्पण कर देना भक्ति है, कि उस उस के प्रति धन तो क्या प्राण भी दे देना ही भक्ति है । इसीलिये कर्मयोग हो या ज्ञानयोग भक्त और भक्ति के बिना दोनो ही पूर्ण नहीं होते ।
सब कुछ आराध्य को समर्पण कर दिया इसलिए आप भक्त अवश्य हैं, लेकिन आपने अभी स्वयं को भगवान से अलग रखा है गीता में अनेकों बार "अनन्यचेताः” कहा जिसका अर्थ है कि तू मुझसे भिन्न चित्तवाला न होकर एक मात्र मुझमें चित्त वाला हो जा । जैसे समुद्र में समायी पानी की बूंद ‘मैं’ समुद्र में हूँ का ज्ञान नहीं रखती वैसे ही ‘मैं ब्रह्म का हूँ’ का ज्ञान ब्रह्मस्थ होने पर जो कि भिन्नभाव है कैसे रह सकता है ? अगर ‘मैं ब्रह्म का हूँ’ जैसा भाव है तो इसका अर्थ है कि अभी ब्रह्मस्थ हुए ही नहीं । अतः जैसे पानी की बूंद समुद्र में प्रवेश करते ही बूंद और समुद्र में समाने का भाव समाप्त और ‘मैं’ समुद्र ही हूँ का अभिन्न भाव उत्पन्न हो जाता है वैसे ही लक्ष्य ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ कभी इस श्रुति वाक्य पर विपरीत भाव उदय नहीं होने देना चाहिए । अन्यथा बहुत बड़ा अपराध हो जायेगा ।
इस प्रकार अपने को आराध्य से भिन्न न देखना ही आराध्य को अपनी बलि देना अर्थात समर्पित कर देना ही भक्ति है । अलग से कोई भक्ति की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है, क्योंकि आज तक संसार के जितने भी धर्मग्रंथ हैं उनमें दो ही मार्गों का वर्णन है एक प्रवृत्ति यानी कर्ममार्ग और दूसरा निवृत्ति अर्थात ज्ञान मार्ग जिसका कोई भी खण्डन नहीं कर सकता है । इस प्रकार का अर्जुन का पूर्व वर्णित के अनुसार होने के कारण ही अर्जुन भक्त था और स्वयं श्रीभगवान ने भक्तोऽसि कहकर मुहर भी लगा दी । किन्तु यह ज्ञान सर्वसामान्य नहीं है, स्वयं श्रीभगवान गीताज्ञान को अनेक बार गुह्य, गुह्यतर, और गुह्यतम कहते है । गीता के अधिकारी के उपरोक्त लक्षणों के साथ अपनी दिनचर्या का बहीखाता मुमुक्षु साधक को अवश्य मिलान करते हुए अपने संशय रहित मार्ग पर आरूढ़ हो जाना चाहिए ।
अंग अंगी भाव—
गीता की एक विशेषता है कि वह किसी की निंदा नहीं करती । अधिकांश विद्वान अपने मत की प्रतिष्ठा करने में निंदा न्याय का आश्रय लेते हैं, पहले निंदा करना और फिर अपने पक्ष का प्रतिपादन करना, जबकि गीता निंदा करने के स्थान पर अंग अंगी भाव का आश्रय लेकर अपनी बात रखती है जैसे—
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥३/४॥
यहाँ पर बिना कर्म किये नैष्कर्म्य प्राप्त नहीं होता कहकर कर्म की ओर प्रोत्साहन करते हैं यह बताकर कि केवल कर्मसंन्यास से ही सिद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती है । यहाँ कर्म का भी प्रतिपान हुआ और संन्यास की निंदा भी नहीं हुई । दूसरी बात कर्म से ही नैष्कर्म्य अर्थात सर्वकर्मसंन्यास की सिद्धि होती है यह कहकर सर्वकर्म संन्यास को ही परम सिद्धि का अंगी और शास्त्रीय निष्कामकर्म को अंग माना है । इसकी पुष्टि अ.३/६ में उदाहरण पूर्वक की गई है ।
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥६/१॥
यहाँ पर भी कर्मफल का आश्रय न लेने वाले को संन्यासी और योगी कहा गया है केवल क्रियाओं और अग्नि का त्याग करने वाला ही संन्यासी योगी है ऐसा नहीं । इसका विवरण भी अ.३,६ आदि देखा जा सकता है । यहाँ पर भी निष्काम कर्मी की स्तुति करके यह बताया जा रहा है कि सर्वकर्म संन्यास का फल जो है कि अग्नि आदि क्रियाओं का त्याग करके संपूर्ण कर्मों से निवृत होना और वह तुझे अग्नि आदि क्रियाओं के करने पर भी फलाकाङ्क्षी न होने पर मिलेगा ही । अर्थात यहाँ सर्वकर्म संन्यास को अंगी और निष्काम कर्म को अंग माना है क्योंकि जिसकी प्राप्ति लक्ष्य होता है वह अंगी हो होता है और जिसके माध्यम से प्राप्त किया जाये वह अंग होता है ।
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धियोगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्ययुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥२/३९॥
अर्थात अभी ज्ञानयोग कहा और अब बुद्धियोग अर्थात कर्मयोग सुना जिससे कर्म बंधन से भलीभांति छूट जायेगा का । यहाँ पर कर्मबन्धन यद्यपि ज्ञानयोग से ही छूटता है तथापि ज्ञानयोग का अनधिकारी कर्मयोग के द्वारा चित्तशुद्धि पूर्वक उसी लक्ष्य को प्राप्त करता है । अतः ज्ञानयोग अंगी और कर्मयोग अंग हुआ ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ॥ २/४५॥
यहां पर पहले सकाम शास्त्रीय/वैदिक कर्मों का दोष दिखाकर फिर निस्त्रैगुण्य होने की बात करते हैं । यहाँ पर कोई निंदा न्याय नहीं है क्योंकि लक्ष्य अंग नहीं अंगी की प्राप्ति है । इसीलिये---
कर्म ब्रह्मोद्भव विद्धि ब्रह्माक्षर समुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥३/१५॥
अर्थात कर्मों की उत्पत्ति वेद से और वेद की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है । अर्थात वेद अंग है और अक्षर परमात्मा अंगी है इसलिए ब्रह्म अर्थात वेद व्यापक हैं और वह नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित हैं । यहां ध्यान देने के बात यह है कि अर्जुन को “निस्त्रैगुण्य" २/४५ होने का आदेश दिया । और यहां वेदों का अंगी स्वयं को बता रहे हैं, वे स्वयं त्रिगुणातीत हैं अतः उनसे उत्पन्न त्रिगुण कैसे हो सकते हैं ? अतः यहाँ ध्यान देने की बात है कहते हैं कि वेद नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित और व्यापक हैं कैसे ? क्योंकि व्यापक परमात्मा से उत्पन्न होने और उसकी श्वास होने के कारण परमात्मा जहाँ होगा वहीं वेद होगा तो स्वतः ही वेद व्यापक हो गये । नित्य यज्ञ के अंतर्गत पंचमहायज्ञ अ.३/१० से लेकर अध्याय चार में यज्ञों का अवलोकन कर लेना चाहिए । उन यज्ञों का अनुसरण करने से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति होती है, अतः वेद भी इसी न्याय से निर्गुण सिद्ध होते हैं । जैसे ब्रह्म माया का आश्रय लेकर ईश्वरोपाधि धारण करके भी माया से निरपेक्ष होते हैं, वैसे ही जब औपाधिक ईश्वर की श्वास बनकर वेद भी त्रिगुणात्मक हो जाते हैं तथापि वे उन गुणों के आधीन न होकर निर्गुण होकर निर्गुण ब्रह्म का दर्शन कराते हैं । यही निर्गुण रूप ही वेदों का नेति नेति है । अतः त्रैगुण्यविषया विषया वेदा अंग और निस्त्रैगुण्य अंगी सिद्ध हुआ ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥३/१६॥
अर्थात इस अंग, अंगी भाव को जानकर जो इसका अनुसरण नहीं करता वह व्यर्थ ही जीता है, अर्थात ऐसे व्यक्ति का जीना पृथ्वी पर बोझ है उसे आत्महत्या कर लेना चाहिए, उसे जीने का अधिकार नहीं है । अर्थात एक मात्र सर्वात्मा ही निस्त्रैगुण्य है वेद अंग हैं उनके सकाम कर्म का प्रतिपान करने वाले त्रिगुणात्मक अंश का त्याग कर पहले सात्विक अंग का आश्रय लेकर उस निस्त्रैगुण्य में स्थित होना ही मानव मात्र का लक्ष्य है । यही यहाँ अंग अंगी भाव से समझाया गया है । न कि अविवेक प्रधान निंदा का आश्रय लेकर ।
जिस किसी को उत्कृष्ट दिखाना है तो दूसरे पक्ष की निंदा न करके स्वपक्ष की स्तुति कर दो, बस आपका लक्ष्य पूरा हो गया । यही कृष्ण ने पूरी गीता में किया है । गुण दोष । दिखाया, लेकिन यह दावा नहीं करते हैं कि हमने जो कहा वही करो, बल्कि वे कहते हैं कि हमने तो बता दिया है । मार्ग दर्शन करा दिया है भलीभांति विचार कर लो फिर जैसी इच्छा हो वैसा करो....
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥१८/६३॥
हरिः ॐ
साम्प्रदायिकता
यह गीता का ज्ञान ब्रह्मविद्या है और ब्रह्मविद्या समझने के लिए कठोर तप की आवश्यकता है आइयास नहीं समझ सकते, वे अगर कुछ कर सकते हैं तो झगड़ा कर सकते हैं, ऐसा कैसे ? वैसा कैसे ? आदि । इतना ही नहीं हमारी परम्पराओं को साम्प्रदायिक कहकर लोग गाली देते हैं । लेकिन मैं पूछता हूँ कि आपने जो पढ़ाई की वह जिस विद्यालय से की क्या वह साम्प्रदायिक नहीं है ? भले वह भारतीय न होकर ईसाइयत शिक्षा से हो लेकिन वह सम्प्रदाय ही है । इसी प्रकार गीता को भी सम्प्रदाय परंपरा से ही समझा जा सकता है ।
👉 इसीलिए अर्जुन ने पहले शरण ग्रहण करते हुए शिष्यता स्वीकार की और फिर कहा मुझे शिक्षा दो । कौन सी शिक्षा ? ‘यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’ २/७ श्रेयमार्ग अर्थात मोक्ष का मार्ग पूछा । प्रेयमार्ग कहते हैं प्रवृत्ति मार्ग यानी कर्ममार्ग को और श्रेयमार्ग कहते हैं निवृत्तिमार्ग अर्थात मोक्षमार्ग को, तो यहाँ अर्जुन द्वारा स्पष्ट श्रेयमार्ग पूछना लिखा है, जिससे मोक्षमार्ग ही सिद्ध होता है । दूसरी बात अर्जुन शरणागति से पहले संन्यासियों द्वारा आचरणीय भिक्षावृत्ति २/५ से जीवन यापन करने की बात कर चुके हैं, युद्ध की नहीं । ‘येन श्रेयोऽमानुयाम्’ ३/२ अर्जुन फिर भी कर्ममार्ग का अनुसरण नहीं करना चाह रहा था तो पुनः पूछा जिससे मेरा कल्याण हो अर्थात मोक्ष प्राप्त हो वही एक बात कहने का आग्रह किया, किन्तु भगवान ने अर्जुन को समझाते हुए विद्या की की गंभीरता का भी वर्णन करते हुए बिना परंपरा के समझ में न आने की बात कही जिसमें अर्जुन की शरणागति २/७ के अतिरिक्त परंपरा का सूचक ३/२०, ४/१,२,१५,२५से३४, ८/११, १०/१०,११, ११/८, १३/४,७, १७/१४ इसके अतिरिक्त १८/२,३, और कृष्ण का मत १८/४,५ आदि स्थानों पर किया है । मेरा इतना ही चिन्तन है और भी हो तो कह नहीं सकता । अतः यह ब्रह्मविद्या है परंपरा से नहीं पढा तो अन्धकार से अन्धकार की ओर जाने से कोई नहीं रोक सकता । अतः परंपरा से पढ़ना ही चाहिए ।
अब प्रश्न उठ सकता है कि परंपराएं बहुत हैं तो हम किसे प्रमाण मानें ? इसका समाधान स्वयं श्रीभगवान ने ही किया है जब तेरी बुद्धि एक निश्चय वाली हो जायेगी२/४१,५३ यह एक निश्चय वाली बुद्धि परंपरा से ही होगी मनमुखी या स्वेच्छाचार से नहीं । आप जिस परंपरा से ज्ञान प्राप्त कर निश्चित बुद्धि वाले हो गये हैं वही परंपरा श्रेष्ठ है, फिर द्वैत अद्वैत आदि कोई भी परंपरा क्यों न हो । शास्त्र उस कल्प वृक्ष के सामन है कि जो भी कामना करो वही देता है, शास्त्र वृक्ष की छाया है चोर भी आनन्द लेता है और साधू भी । जैसी आपकी प्रकृति होगी वैसा ही विचार आपके मस्तिष्क को स्वीकार होगा । विभिन्न संप्रदायों के विभिन्न आचार्यों के द्वारा अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार भाष्य एवं टीकाएं लिखी गई हैं, मुसलमानों और ईसाइयों आदि की भी बहुत सी टीका टिप्पणियाँ हैं अर्थात आप जिस किसी भी जगह पर खड़े हैं वहीं से विचार करें, वहीं से आपके कल्याण का मार्ग सुनिश्चित होता है । गीता का यही स्वधर्म है । हम संन्यासी हैं हम लिखेंगे तो संन्यास अर्थात त्याग वैराग्य की ही बात लिखेंगे । सांसारिक और प्रवृत्ति की बात तो करेंगे नहीं । अतः जहाँ आपके अनुकूल न लगे वहां यह समझें कि कि मेरी और आपकी प्रकृति भिन्न है, अतः मतभिन्नता स्वाभाविक है । जिसका जितना अधिकार होता है उतना ही समझ में आता है अधिक नहीं । अतः आप अपने अधिकार के अनुसार विचारशील तो हैं ही, इसलिये जितना दोष निकालने में समय नष्ट करेंगे, उससे कम समय में अपने अधिकारानुसार विचार करके जीवन को सार्थक बना सकते हैं ।
—स्वामी शिवाश्रम
मड़्गलाचरण
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थजम्बूफल चारुभक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाश कारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम् ॥
शब्दार्थ― गजमुख संपूर्ण देव दानव आदि प्राणियों द्वारा सेवित कैथा और जामुन के फलों का प्रसन्नतापूर्वक भक्षण करने वाले, तपस्विनी उमा देवी के पुत्र, शोक का नाश करने, वाले समस्त विघ्नों का नाश करने वाले आपके चरणकमलों को नमस्कार करता हूं ।
तात्पर्यार्थ― गजमुख अर्थात विचारों की विशालता को प्राप्त राजस-तामस गुणरूप देव दानव आदि द्वारा सेवित अर्थात देवदानवादि यानी राजस-तामस गुण भी जिनके आधीन रहते हैं, किन्तु वे स्वयं किसी के आधीन नहीं होते कपित्थ कहिए लाग रंग का प्रतीक रजोगुण और जामुन कहिए तमोगुण को अर्थात जो रजोगुण तमोगुण का भक्षण करके नित्य सत्वगुण में स्थित रहते हैं या अपने शरणागत भक्तों के रजोगुण तमोगुण का भक्षण अर्थात नाश कर डालते हैं जो मना करने पर भी तपस्या करनेवाली उमा हैं उनके पुत्र अर्थात जो स्वभाव से ही इन्द्रिय निग्रह रूप तप में तत्पर रहने वाले हैं, जन्म-मृत्यु जैसा दुर्निवारक शोक का भी जो नाश करने वाले हैं हम उनके पदपङ्कज में नमस्कार करते हैं ।
भावार्थ― आप हमें हे गणेश जी ! विचारों की विशालता, इन्द्रिय आदि भूतों का स्वामित्व अर्थात जितेन्द्रिय, रजोगुण और तमोगुण से रहित, स्वभाव से ही समत्व रूप तप में प्रवृत्त रहने वाले जन्मादि सम्पूर्ण अनर्थों का नाश करने वाले ! वेदान्त के श्रवण मनन निदिध्यासन में प्रवृत्त बना दो, क्योंकि आप ही संपूर्ण विघ्नों पर शासन करनेवाले हो, हम आपको बारंबार नमस्कार करते हैं ।
ॐॐॐ
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
शब्दार्थ― जिसकी कृपा कटाक्ष गूंगे को वाचाल बना देती है, लंगड़ा पर्वत को लांघ जाता है, उस परमानंद स्वरुप लक्ष्मीपति की वन्दना करता हूं ।
तात्पर्यार्थ― ‘वाचालं' मूल शब्द है जिसको वाचा+अलम् दो शब्दों का योग प्राप्त है पंगु कहिए लंगड़े को― संसार में अभी तक दो ही मार्ग कहे गए है एक श्रेयमार्ग यानी ज्ञान मार्ग और दूसरा प्रेयमार्ग या कर्म या प्रवृत्ति मार्ग, अमृत मार्ग । मनुष्य मात्र अपना श्रेय चाहता है, किंतु यह मार्ग बड़ा दुस्तर है । अतः प्रेयमार्ग ही मानवमात्र के कल्याण का सर्वश्रेष्ठ साधन है । अतः श्रेय प्राप्ति के लिए ‘अहं' ‘इदं' आदि वेद प्रतिपादित का ज्ञान तो नहीं है, तथापि भक्ति है । भक्ति कहिए उस समर्पण को जिसके बाद अपनी स्वतंत्र सत्ता ही नहीं रहती, जैसे पतिव्रता स्त्री की अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती । पति ही जीवन, पति ही मरण, पति ही गति, पति ही मति अर्थात पति ही जिसका सर्वस्व है, पति परायणता में कोई किसी भी प्रकार का कोई विकल्प रूपी व्यभिचार नहीं होता, ठीक वैसे ही सर्व समर्पण रूप एक मात्र जिसका जीवन है, जीना भी प्रभु के लिए, मरना भी प्रभु के लिए ऐसा जो समर्पित विवेक मात्र जिसके पास है वह विषय रूपी, कामना रूपी, द्वन्द रूपी दुर्गम पर्वतों को भी पार करके वाणी के अलम् अर्थात चरम सीमा अर्थात जिस मौन के बाद कोई वाणी का मौन शेष नहीं रहता ऐसे मौन की सीमा रूप लक्ष्य को जिसकी कृपा से प्राप्त कर लिया जाता है उस परमानन्दस्वरूप लक्ष्मी के स्वामी की मैं वन्दना करता हूँ ।
भावार्थ― हे प्रभु ! हम आपकी कृपा से ज्ञान, विज्ञान से रहित होकर भी नाना प्रकार के विषय रूपी पर्वतों को पार करके मौन की सीमा आत्मैक्य रूप लक्ष्य को प्राप्त करने के निमित्त से हे लक्ष्मी के स्वामी अर्थात तपस्या एवं ब्रह्मतेज को धारण करने वाले मैं भी ब्रह्मतेज धारण कर सकूं इसके लिए आपकी वन्दना करता हूँ ।
ॐॐॐ
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
शब्दार्थ— अज्ञान रूपी तिमिर रोग से अन्धे हुए के लिए ज्ञान ही कजरौटा― ज्ञानरूपी काजल जिसमें रखा जाता है वह काजल जिनके द्वारा लगाकर तिमिरान्ध नष्ट कर दिया जाता है उन श्रीगुरुदेव के श्रीचरणों में नमस्कार है ।
तात्पर्यार्थ— सत, असत का विचार न होना ही अज्ञान रूप तिमर रोग है जिसके कारण जो नित्य सत्य वास्तु अर्थात परमतत्त्व दिखाई नहीं देता । ऐसी स्थिति में सहज ही करुणानिधि, दयालु और अपनी अहैतुकी कृपा के परवश होकर वेदान्त श्रवण कराकर, परमार्थ का निरूपण करके जो आत्मा-अनात्मा रूपी सदसद् का विवेक रूपी काजल लगाकर आत्मैक्य रूपी नेत्र खोलने वाले श्रीगुरुदेव जी आपके चरणों में सतत नमस्कार करता हूँ ।
भावार्थ— हे गुरुदेव ! मैं अज्ञानी मूढ़ हृदय विषयान्ध हुआ आपकी महिमा को नहीं जानता तथापि आप ही अपनी अहैतुकी कृपा से मुझपर कृपा करके मेरे अन्दर इन्द्रिय संयम और मुमुक्षुत्व का ज्ञान देकर कृतार्थ करो, मैं आपके चरणकमलों की बारंबार वन्दना करता हूँ ।
ॐॐॐ
गौरीशंकर वंदना करता शीश झुकाय ।
तत्त्वं का ही बोध हो काम सकल जरि जाय ॥
गीता की महिमा नहिं जानूं यदुराय ।
फिर भी हठ करता यही आकर देहु बताय ॥
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्-
पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् ।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्-
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥
शब्दार्थ— हे कृष्ण ! नवकमल खिलने पर जैसा उसके दलों का रङ्ग होता है वैसा ही आपके हाथों का रङ्ग है, जिन हाथों में आपकी प्रियतमा बांसुरी सुशोभित हो रही है, आप पीताम्बर ओढ़े हुए हैं, आपके ओठ पके हुए कुंदरू के समान लाल हैं अथवा पीले रङ्ग और लाल कुंदरू का सम मात्रा में मिलने पर जो रङ्ग होता है वैसे ही हैं । आपका मुखकमल पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान खिला हुआ है और नेत्र नवकमल जैसे लाल हैं । आप क्या हो आप ही जानो आपका तत्त्व अर्थात रहस्य मैं नहीं जानता ।
भावार्थ— आपको जैसा उपरोक्त कहा वैसा तो आप दिखते हो किन्तु विचार पूर्वक देखने से वैसे भी नहीं दिखते हो, तथापि आप जो हो, सो हो, वह तो आप ही जानो । आप जो भी हो, जैसे भी हो आपके तत्त्व प्राप्ति के लिए ही ये मेरा नमस्कार है । अपना तत्त्व आप जैसे हो उसकी प्राप्ति स्वयं ही करायें ।
मेरा लक्ष्य
मैं एक आत्यंतिक विषयी पामर कोटि का विषयी जीव यतिकुलकलंक हूँ तथापि कुछ पुण्य पुराकृत कर्मों की प्रेरणा, देवकृपा अवश्य है, जो कि शास्त्रों और व्यवहार का क ख ग न जानकर भी मुझ जैसा कामी, क्रोधी स्वभाव से ही पतन को प्राप्त हुआ व्यक्ति भी श्रीभगवती गीता जी के विचार में तत्पर हुआ । श्रीभगवती गीता ‘अपि चेत्सुदुराचारो' ‘स्त्रियोवैश्यास्तथा शूद्राः' का भी उद्धार करने वाली एक मात्र अम्मा हैं । अतः मैं भगवती गीता की शरण लेता हूँ ।
किसी अशिक्षित के लिए इन विचारों का क्रमशः संग्रह यद्यपि सरल नहीं है तो भी ये विचार मात्र अपने अन्तःकरण की संतुष्टि और नाना प्रकार के प्रपञ्चों से बचने हेतु संग्रहीत किया है । मैं एक भी श्लोक का अर्थ करने में यद्यपि असमर्थ हूँ तथापि उसका भावार्थ आचार्य आदि जगद्गुरु भगवान शंकर, सन्त ज्ञानेश्वर एवं अपनी परंपरा से प्राप्त परमाराध्य गुरुजनों को साक्षी करके लिखता हूँ । अनधिकारी होने के नाते मैं यह भी कामना नहीं करता कि मुझे ज्ञान, मोक्ष या भक्ति ही प्राप्त हो । न ही मेरा यह लक्ष्य है कि मैं द्वैत, अद्वैत, करण सापेक्ष या करण निरपेक्ष का ही प्रतिपान करूँ तथापि कोई न कोई केन्द्रविन्दु होना ही चाहिए इस दृष्टि से गीता का विचार ‘तत्त्वमसि’ को केन्द्रित करके ही किया जा रहा है । मेरा अधिकार है कि श्रीभगवती गीता जी से प्रार्थना करूँ कि वे मुझे अपने श्रीचरणों से कभी दूर न रखते हुए ‘तत्त्वम्’ का रहस्य प्रकाशित करें । अस्तु !
—स्वामी शिवाश्रम
अड़्गन्यास
॥पाठ विधि॥
विनियोग—
ॐ अस्य श्रीमद्भगवद्गीतामालामन्त्रस्य भगवान्वेदव्यास ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीकृष्णः परमात्मादेवता । अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे इति बीजम् । सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज इति शक्तिः । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः इति कीलकं । श्रीकृष्णः प्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ॥
करन्यास—
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
न चैनं क्लेन्त्यापो न शोषयति मारुतः इति तर्जनीभ्यां नमः ।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च इति मध्यमाभ्यां नमः ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः इत्यनामिकाभ्यां नमः ।
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रः इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
एवं उक्त प्रकारेण हृदयादि न्यासः ।
॥ध्यानम्॥
ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेेन स्वयं
व्यासेन ग्रथितां पुराण मुनिना मध्येमहाभारतम् ।
अद्वैतामृतवर्षिणीं भगवतीमष्टादशाध्यायिनी-
मम्ब त्वामनुसन्दधामि भगवद्गीते भवद्वेषिणीम् ॥१॥
नमोऽस्तुते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र ।
येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ॥२॥
प्रपन्नपारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये ।
ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः ॥३॥
वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥४॥
भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजल गान्धारनीलोत्पला
शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला ।
अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी
सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥५॥
पाराशर्यवचःसरोजममलं गीतार्थगन्धोत्कटं-
नानाख्यानककेसरं हरिकथा सम्बोधनाबोधितम् ।
लोके सज्जनषट्पदैरहरह पेपीयमानं मुदा
भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमल प्रध्वंसि नः श्रेयसे ॥६॥
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥७॥
गीता माहात्म्यानुसंधानम्
गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतः पुमान् ।
विष्णोः पदमाप्नोऽति भयशोकादिवर्जितः ॥१॥
जो पुण्यात्मा मनुष्य इस गीता शास्त्र का प्रयत्नपूर्वक पाठ करता है वह भय शोक आदि से रहित होकर विष्णु पद (मोक्षस्वरूप अभिन्न सर्वात्मभाव) को प्राप्त करता है ॥१॥
गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च ।
नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ॥२॥
गीता के अनुसंधान में तत्पर तथा प्राणायाम के परायण हुए मनुष्य का निश्चय ही पूर्वजन्मकृत तथा इस जन्म में भी कोई पाप नहीं होता ।
प्राणायाम अर्थात श्वासों को अपने वश में करने वाला अर्थात प्रतिश्वास परमेश्वर को अर्पित कर देना यही इसका भाव है ॥२॥
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने ।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥३॥
जैसे प्रतिदिन जल स्नान से शरीर का मल छूट जाता है वैसे ही मनुष्य के लिए पुण्यमय गीता के अनुशीलन रूप जल में स्नान करके संसार रूप मल का नाश करने के लिए है अर्थात गीता का निरंतर अनुसंधान करने वाले का जन्म-मृत्यु रूप संसार का नाश हो जाता है, पुनः इस संसार रूप कीचड़ में लौटकर नहीं आता ॥३॥
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥४॥
बुद्धिमान को बहुत से अन्यान्य शास्त्र विस्तार का अनुशीलन करके अधिक परिश्रम की अपेक्षा एक मात्र गीता को ही सुगीता करना ही कर्तव्य है, जो कि स्वयं पद्मनाभ भगवान विष्णु के मुख से प्रसूत अर्थात प्रकट हुई हैं ॥४॥
भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम् ।
गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥५॥
महाभारत का सार रूप भगवान विष्णु के मुख से प्रवाहित गीता रूपी गंगाजल को पीकर मनुष्य पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता है अर्थात मुक्त हो जाता है ॥५॥
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥६॥
संपूर्ण उपनिषद गायें हैं, उनको दुहने वाले ग्वाला कृष्ण हैं, अर्जुन बछड़ा हैं महान् अमृत स्वरूप गीता दूध है, गीता के तात्पर्य रूप घृत का निरंतर अनुसंधान करने वाले साधुजन भोक्ता हैं ॥६॥
एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीत-
मेको देवो देवकीपुत्र एव ।
एको मन्त्रस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥७॥
देवकीनन्दन कृष्ण के द्वारा गायी गई एक मात्र गीता ही शास्त्र है । देवकीनन्दन ही एकमात्र देवता हैं । एकमात्र जिसका नाम ही मंत्र है, उस देव की सेवा ही एकमात्र कर्तव्यकर्म है ॥७॥
वाराह पुराणोक्त—
धरोवाच
भगवन् परमेशान भक्तिरव्यभिचारिणी ।
प्रारब्धं भुज्यमानस्य कथं भवति हे प्रभो ॥१॥
पृथ्वी बोली– हे भगवन् ! हे सर्वेश्वर ! प्रारब्ध का भोग करते हुए हे प्रभो ! आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति किस प्रकार होती है यानी की जा सकती है ?॥१॥
विष्णुरुवाच
प्रारब्धं भुज्यमानो हि गीताभ्यासरतः सदा ।
स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपलिप्यते ॥२॥
श्रीविष्णु बोले–– प्रारब्ध का भोग करते हुए जो सदैव गीता के अभ्यास में आसक्त होते हैं, निश्चित ही वही मुक्त हैं, सुखी हैं । उनके लिए संसार में कोई कर्म शेष नहीं रहता अर्थात वे आप्तकाम होते हैं ।
विशेष― यह श्लोक अध्याय ३/१७ का प्रतिनिधित्व करता है― तस्य कार्यं न विद्यते ॥२॥
महापापादिपापानि गीताध्यानं करोति चेत् ।
क्वचित् स्पर्शं न कुर्वन्ति नलिनीदलमम्बुवत् ॥३॥
महा पापी से भी बढ़कर भी पापी सावधानी पूर्वक यदि गीता का ध्यान अर्थात चिन्तन करे तो जैसे कमल के पत्ते का स्पर्श करके भी पानी उसे गीला नहीं करता है वैसे ही गीता का चिन्तन करने वाले को पाप स्पर्श नहीं कर सकता ।
विशेष― यह श्लोक ‘अपि चेत्सुदुराचारो’ ९/३० एवं ‘हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते’ १८/१७ का प्रतिनिधित्व करता है ॥३॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये ।
गोपाला गोपिका वाऽपि नारदोद्धव पार्षदैः ॥४॥
सभी देवता और ऋषिगण, योगी एवं सर्प जहाँ गीता का पाठ होता है वहाँ सभी शीघ्र सहायता करते हैं ।
विशेष― देवता से आधिदैविक, ऋषिगण एवं योगियों से आध्यात्मिक और सर्प से आधिभौतिक तापों का गीता पाठ से निवारण बताया गया है ॥५॥
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ।
यत्र गीता विचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम् ।
तत्राऽहं निश्चितं पृथ्वि निवसामि सदैव हि ॥५॥
क्योंकि जहाँ गीता का तात्विक विचार होता है, पढ़ा और पढ़ाया एवं श्रवण किया जाता है हे पृथ्वि ! निश्चित ही मैं वहाँ निवास करता हूँ ।
विशेष― पूर्वोक्त तीनो ताप बाधा क्यों नहीं पहुंचाते हैं उसका कारण बताया कि गीता के पठन, पाठन श्रवण और विचार स्थल यानी विचार करने वाले के हृदय में स्वयं भगवान का वास होता है इसलिये तीनो ताप ही नष्ट हो जाते हैं । यही गीता की विशेषता है ॥६॥
गीताश्रेयेऽहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तमं गृहम् ।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रींल्लोकान् पालयाम्यहम् ॥६॥
मैं गीता के आश्रित हूँ अर्थात जहाँ गीता होती है वहीं मैं होता हूँ क्योंकि गीता मेरा उत्तम घर है । मैं गीता के ज्ञान की उपासना करके यानी गीता के सिद्धांत का पालन करते हुए ही तीनो लोकों का पालन करता हूँ ॥७॥
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः ।
अर्धमात्राक्षरा नित्या स्वानिर्वाच्यपदात्मिका ॥७॥
गीता मेरी परा विद्या है अर्थात इससे श्रेष्ठ और कोई विद्या नहीं है, ये ब्रह्मरूपा यानी मद्रूपा है इसमें संशय नहीं है । ये ओंकार की अविनाशिनी अर्धमात्रा है, नित्या है स्वसंवेद्य ‘स्व’ नामक अनिर्वाच्य अर्थात जिसे इन्द्रियों सहित मन एवं बुद्धि द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता है उस पद स्वरूपा है ।
विशेष― स्व अनिर्वाच्य पद का मतलब आत्मरूपा, आत्मस्वरूपा ॥८॥
चिदानन्देन कृष्णेन प्रोक्ता स्वमुखतोऽर्जुन ।
वेदत्रयी परानन्दा तत्त्वार्थज्ञानसंयुता ॥८॥
अर्जुन के प्रति स्वयं अपने ही मुख से सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण के द्वारा कही गई तीनो वेदस्वरूपा, परम आनन्दस्वरूपा एवं तत्त्व के अर्थस्वरूप ज्ञान से युक्त है ॥९॥
योऽष्टादशजपो नित्यं नरः निश्चलमानसः ।
ज्ञानसिद्धिं स लभते ततो याति परं पदम् ॥९॥
जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन अठारहों अध्याय का पाठ करता है वह ज्ञान रूप सिद्धि को प्राप्त करता है एवं उसके पश्चात तत्क्षण पहले जीवनमुक्ति और फिर शरीर त्याग कर विदेह मुक्ति को प्राप्त करता है ॥१०॥
पाठेऽसमर्थः सम्पूर्णे ततोऽर्धं पाठमाचरेत् ।
तदा गोदानं पुण्यं लभते नाऽत्र संशयः ॥१०॥
संपूर्ण पाठ करने में असमर्थ होने पर आधा यानी नौ अध्याय का पाठ करने पर जो गोदान देने का पुण्य प्राप्त करता है इसमें कोई संशय नहीं है ॥११॥
त्रिभागं पठमानस्तु गङ्गा स्नान फलं लभेत् ।
षडंशं जपमानस्तु सोमयागफलं लभेत् ॥११॥
आधा न हो सकने पर एक तिहाई यानी छः अध्याय का पाठ करने से गंगा स्नान का फल मिलता है और तीन अध्याय के पाठ से सोमयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥१२॥
एकाध्यायं तु यो नित्यं पठते भक्ति संयुतः ।
रुद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसेच्चिरम् ॥१२॥
जो भक्तिपूर्वक प्रतिदिन एक अध्याय का पाठ करता है वह वह शीघ्र ही रुद्रगण होकर रुद्रलोक यानी शिवलोक को प्राप्त करता है ।।१३।।
अध्यायं श्लोकपादं वा नित्यं यः पठते नरः ।
स याति नरतां मन्वन्तरं यावद्वसुन्धरे ॥१३॥
अथवा एक अध्याय न होने पर जो श्लोक के पदों का नित्य विचार करता है व जब तक मन्वन्तर और पृथ्वी है तब तक मनुष्य योनि को ही प्राप्त करता है ॥१४॥
गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पञ्च चतुष्टयं ।
द्वौ त्रीनेकं तदर्थं वा श्लोकानां यः पठेन्नरः ॥१४॥
गीता के दश ,सात, पांच, चार, तीन, दो, एक श्लोको का भी उसके अर्थ सहित जो मनुष्य पाठ करता है ॥१५॥
चन्द्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतं ध्रुवम् ।
गीतापाठसमायुक्तो मृतो मानुषतां ब्रजेत् ॥१५॥
गीता के पाठ से भलीभाँति युक्त होकर मरने से वह हजार वर्षों तक चन्द्रलोक को प्राप्त करता है यह अटल है । फिर वह मनुष्य होता है ।
विशेष― आठवें अध्याय के दक्षिणायन मार्ग की गति प्राप्त होती है ॥१६॥
गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तम् ।
गीतेत्युच्चारसंयुक्तो म्रियमणो गतिं लभेत् ॥१६॥
मनुष्य होकर पुनः गीता का अभ्यास करके श्रेष्ठ मुक्ति को प्राप्त करता है । गीता का उच्चारण करता हुआ मृत्यु को प्राप्त होने पर भी सद्गति को प्राप्त करता है (इसका पूर्व श्लोक से संबंध है) ॥१७॥
गीतार्थश्रवणासक्तो महापापयुतोऽपि वा ।
वैकुण्ठं समवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥१७॥
बड़े से बड़े पाप करने वाला भी गीता के श्रवण में आसक्त रहने वाला विष्णु के समान रूप धारण करके वैकुण्ठं में आनन्दित होता है ॥१८॥
गीतार्थं ध्यायते नित्यं कृत्वा कर्माणि भूरिशः ।
जीवन्मुक्तः स विज्ञेयो देहान्ते परमं पदम् ॥१८॥
गीता के अर्थ का ध्यान अर्थात मनन करता हुआ प्रशंसनीय अर्थात वैदिक, शास्त्रीय कर्म करके वह जीवनमुक्ति के विज्ञान को जानकर मुमुक्षु मृत्यु के पश्चात परमपद अर्थात मोक्ष प्राप्त करता है ॥१९॥
गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत ।
वृथा पाठो भवेत्तस्य श्रम एव ह्युदाहृतः ॥१९॥
गीता का पाठ करके जो माहात्म्य का पाठ नहीं करता उसका पाठ निष्फल होता है, व्यर्थ ही परिश्रम कहा गया है ॥२१॥
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीताभ्यासं करोति यः ।
स तत्फलमवाप्नोति दुर्लभां गतिमाप्नुयात् ॥२०॥
इस प्रकार महात्म्य सहित जो गीता का अभ्यास करता है वह गीता के पाठ का फल प्राप्त करता है एवं दुर्लभ मोक्ष को भी प्राप्त करता है ॥२२॥
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शौनक उवाच
गीतायाश्चैव माहात्म्यं यथावत्सूत मे वद ।
पुराणमुनिना प्रोक्तं व्यासेन श्रुतिनोदितम् ॥१॥
शौनक ऋषि बोले— हे सूत जी ! अति पूर्वकाल के मुनि श्री व्यासजी के द्वारा कहा हुआ तथा श्रुतियों में वर्णित श्रीगीताजी का माहात्म्य मुझे भली प्रकार कहिए ॥१॥
सूत उवाच
पृष्टं वै भवता यत्तन्महद् गोप्यं पुरातनम् ।
न केन शक्यते वक्तुं गीतामाहात्म्यमुत्तमम्॥२॥
सूत जी बोले— आपने जो पुरातन और उत्तम गीतामाहात्म्य पूछा, वह अतिशय गुप्त है । अतः वह कहने के लिए कोई समर्थ नहीं है ॥२॥
कृष्णो जानाति वै सम्यक् क्वचित्कौन्तेय एव च ।
व्यासो वा व्यासपुत्रो वा याज्ञवल्क्योऽथ मैथिलः॥३॥
गीता माहात्म्य को श्रीकृष्ण ही भली प्रकार जानते हैं, कुछ अर्जुन भी जानते हैं तथा व्यास, शुकदेव, याज्ञवल्क्य और जनक आदि थोड़ा-बहुत जानते हैं ॥३॥
अन्ये श्रवणतः श्रुत्वा लोके संकीर्तयन्ति च ।
तस्मात्किंचिद्वदाम्यद्य व्यासस्यास्यान्मया श्रुतम्॥४॥
दूसरे लोग परस्पर सुनकर लोक में वर्णन करते हैं । अतः श्रीव्यासजी के मुख से मैंने जो कुछ सुना है वह आज कहता हूँ ॥४॥
यस्माद्धर्ममयी गीता सर्वज्ञानप्रयोजिका ।
सर्वशास्त्रमयी गीता तस्माद् गीता विशिष्यते ॥५॥
चूंकि गीता ज्ञान का प्रयोजन सिद्ध करने वाली ज्ञान स्वरूपिणी एवं सर्वशास्त्रमयी है, इसलिए गीता श्रेष्ठ है ।
यहां ज्ञान का प्रयोजन एक मात्र ब्रह्मात्मैक्य की प्राप्ति समझना चाहिए ॥५॥
संसारसागरं घोरं तर्तुमिच्छति यो जनः ।
गीतानावं समारूह्य पारं यातु सुखेन सः ॥६॥
जो मनुष्य घोर संसार-सागर को तैरना चाहता है उसे गीतारूपी नौका पर चढ़कर सुखपूर्वक पार होना चाहिए ॥६॥
गीताज्ञानं श्रुतं नैव सदैवाभ्यासयोगतः ।
मोक्षमिच्छति मूढात्मा याति बालकहास्यताम् ॥७॥
जिसने सदैव अभ्यासयोग से गीता का ज्ञान सुना नहीं है फिर भी जो मोक्ष की इच्छा करता है वह मूढात्मा, बालक की तरह हँसी का पात्र होता है ॥७॥
ये श्रृण्वन्ति पठन्त्येवगीताशास्त्रमहर्निशम् ।
न ते वै मानुषा ज्ञेया देवा एव न संशयः ॥८॥
जो रात-दिन गीताशास्त्र पढ़ते हैं अथवा इसका पाठ करते हैं या सुनते हैं उन्हें मनुष्य नहीं अपितु निःसन्देह देव ही जानें ॥८॥
गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम् ।
परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं न श्रद्धा न भावना ॥९॥
स एव मानुषे लोके पुरुषो विड्वराहकः ।
यस्माद् गीतां न जानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥१०॥
जो मनुष्य स्वयं गीता शास्त्र का पठन-पाठन नहीं जानता है, जिसने अन्य लोगों से वह नहीं सुना है, स्वयं को उसका ज्ञान नहीं है, जिसको उस पर श्रद्धा नहीं है, भावना भी नहीं है, चूंकि वह गीता नहीं जानता है इसलिए उससे अधिक नीच दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, वह मनुष्य लोक में भटकते हुए ग्राम शूकर जैसा ही है ॥९-१०॥
धिक् तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टां तपो यशः ।
गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जनः ॥११॥
जो गीता के अर्थ का पठन नहीं करता उसके ज्ञान को, आचार को, व्रत को, चेष्टा (क्रिया) को, तप को और यश को धिक्कार है, उससे अधम और कोई मनुष्य नहीं है ॥११॥
गीतागीतं न यज्ज्ञानं तद्विद्धयासुरसंज्ञकम् ।
तन्मोघं धर्मरहितं वेदवेदान्तगर्हितम् ॥१२॥
जो ज्ञान गीता में नहीं गाया गया है वह धर्मरहित वेद और वेदान्त में निन्दित होने के कारण उसे निष्फल, उसे आसुरी नाम वाला जानो ॥१२॥
योऽधीते सततं गीतां दिवारात्रौ यथार्थतः ।
स्वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात् ॥१३॥
जो मनुष्य रात-दिन, सोते, चलते, बोलते और खड़े रहते हुए गीता का यथार्थतः (तात्पर्यार्थ) सतत अध्ययन (चिंतन/मनन) करता है वह सनातन मोक्ष को प्राप्त होता है ॥१३॥
योगिस्थाने सिद्धपीठे शिष्टाग्रे सत्सभासु च ।
यज्ञे च विष्णुभक्ताग्रे पठन्याति परां गतिम्॥१४॥
योगियों के स्थान में, सिद्धों के स्थान में, श्रेष्ठ पुरुषों के आगे,और संतसभा में, यज्ञस्थान में तथा विष्णुभक्तों के आगे गीता का पाठ करने वाला मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है ॥१४॥
गीतापाठं च श्रवणं यः करोति दिने दिने ।
क्रतवो वाजिमेधाद्याः कृतास्तेन सदक्षिणाः ॥१५॥
जो गीता का पाठ और श्रवण हर रोज करता है उसने दक्षिणा के साथ अश्वमेध आदि यज्ञ किया है (ऐसा माना जाता है) ॥१५॥
गीताऽधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा ।
तेन वेदाश्च शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः ॥१६॥
जिसने भी भक्तिभाव से एकाग्र चित्त से गीता का अध्ययन किया है उसने सर्व वेदों, शास्त्रों तथा पुराणों का अभ्यास किया है (ऐसा माना जाता है) ॥१६॥
यः श्रृणोति च गीतार्थं कीर्तयेच्च स्वयं पुमान् ।
श्रावयेच्च परार्थं वै स प्रयाति परं पदम् ॥१७॥
जो मनुष्य स्वयं गीता का अर्थ सुनता है, तथा स्वयं चिन्तन करता है एवं परोपकार हेतु सुनाता है निश्चय ही वह परम पद को प्राप्त होता है ॥१७॥
नोपसर्पन्ति तत्रैव यत्र गीतार्चनं गृहे ।
तापत्रयोद्भवाः पीडा नैव व्याधिभयं तथा ॥१८॥
जिस घर में गीता का पूजन होता है वहाँ (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक) तीन ताप से उत्पन्न होने वाली पीड़ा तथा व्याधियों का भय नहीं आता है ॥१८॥
न शापो नैव पापं च दुर्गतिनं च किंचन ।
देहेऽरयः षडेते वै न बाधन्ते कदाचन ॥१९॥
उसको शाप या पाप नहीं लगता, जरा भी दुर्गति नहीं होती और छः शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) देह में कभी भी पीड़ा नहीं करते ॥१९॥
भगवन्परमेशाने भक्तिरव्यभिचारिणी ।
जायते सततं तत्र यत्र गीताभिनन्दनम् ॥२०॥
जहाँ निरन्तर गीता का अभिनंदन होता है वहाँ श्री भगवान परमेश्वर में एकनिष्ठ भक्ति उत्पन्न होती है ॥२०॥
स्नातो वा यदि वाऽस्नातः शुचिर्वा यदि वाऽशुचिः ।
विभूतिं विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः ॥२१॥
स्नान किया हो या न किया हो, पवित्र हो या अपवित्र हो फिर भी जो परमात्म-विभूति का और विश्वरूप का स्मरण करता है वह सदा पवित्र है ॥२१॥
सर्वत्र प्रतिभोक्ता च प्रतिग्राही च सर्वशः ।
गीतापाठं प्रकुर्वाणो न लिप्येत कदाचन ॥२२॥
सब जगह भोजन करने वाला और सर्व प्रकार का दान लेने वाला भी अगर गीता पाठ करता हो तो कभी लेपायमान नहीं होता ॥२२॥
यस्यान्तःकरणं नित्यं गीतायां रमते सदा ।
सर्वाग्निकः सदाजापी क्रियावान्स च पण्डितः ॥२३॥
जिसका चित्त सदा गीता में ही रमण करता है वह संपूर्ण अग्निहोत्री, सदा जप करनेवाला, क्रियावान तथा पण्डित है ॥२३॥
दर्शनीयः स धनवान्स योगी ज्ञानवानपि ।
स एव याज्ञिको ध्यानी सर्ववेदार्थदर्शकः ॥२४॥
वह दर्शन करने योग्य, धनवान, योगी, ज्ञानी, याज्ञिक, ध्यानी तथा सर्व वेद के अर्थ को जानने वाला है ॥२४॥
गीतायाः पुस्तकं यत्र नित्यं पाठे प्रवर्तते ।
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि भूतले ॥२५॥
जहाँ गीता की पुस्तक का नित्य पाठ होता रहता है वहाँ पृथ्वी पर के प्रयागादि सभी तीर्थ निवास करते हैं ॥२५॥
निवसन्ति सदा गेहे देहेदेशे सदैव हि ।
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये ॥२६॥
उस घर में और देहरूपी देश में सभी देवों, ऋषियों, योगियों और सर्पों का सदा निवास होता है ॥२६॥
गीता गंगा च गायत्री सीता सत्या सरस्वती ।
ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली त्रिसंध्या मुक्तगेहिनी ॥२७॥
अर्धमात्रा चिदानन्दा भवघ्नी भयनाशिनी ।
वेदत्रयी पराऽनन्ता तत्त्वार्थज्ञानमंजरी ॥२८॥
इत्येतानि जपेन्नित्यं नरो निश्चलमानसः ।
ज्ञानसिद्धिं लभेच्छीघ्रं तथान्ते परमं पदम् ॥२९॥
गीता, गंगा, गायत्री, सीता, सत्या, सरस्वती, ब्रह्मविद्या, ब्रह्मवल्ली, त्रिसंध्या, मुक्तगेहिनी, अर्धमात्रा, चिदानन्दा, भवघ्नी, भयनाशिनी, वेदत्रयी, परा, अनन्ता और तत्त्वार्थज्ञानमंजरी (तत्त्वरूपी अर्थ के ज्ञान का भंडार) इस प्रकार (गीता के अठारह नामों का) स्थिर मन से जो मनुष्य नित्य जप करता है वह शीघ्र ज्ञानसिद्धि और अंत में परम पद को प्राप्त होता है ॥२७,२८,२९॥
यद्यत्कर्म च सर्वत्र गीतापाठं करोति वै ।
तत्तत्कर्म च निर्दोषं कृत्वा पूर्णमवाप्नुयात् ॥३०॥
मनुष्य जो-जो कर्म करे उसमें अगर गीतापाठ चालू रखता है तो वह सब कर्म निर्दोषता से संपूर्ण करके उसका फल प्राप्त करता है ॥३०॥
पितॄनुद्दिश्य यः श्राद्धे गीतापाठं करोति वै ।
संतुष्टा पितरस्तस्य निरयाद्यान्ति सदगतिम् ॥३१॥
जो मनुष्य श्राद्ध में पितरों को लक्ष्य करके गीता का पाठ करता है उसके पितृ सन्तुष्ट होते हैं और नर्क से सदगति पाते हैं ॥३१॥
गीतापाठेन संतुष्टाः पितरः श्राद्धतर्पिताः ।
पितृलोकं प्रयान्त्येव पुत्राशीर्वादतत्पराः ॥३२॥
गीता पाठ से प्रसन्न बने हुए तथा श्राद्ध से तृप्त किये हुए पितृगण पुत्र को आशीर्वाद देने के लिए तत्पर होकर अर्थात आशीर्वाद देते हुए पितृलोक में जाते हैं ॥३२॥
लिखित्वा धारयेत्कण्ठे बाहुदण्डे च मस्तके ।
नश्यन्त्युपद्रवाः सर्वे विघ्नरूपाश्च दारूणाः ॥३३॥
जो मनुष्य गीता को लिखकर गले में, हाथ में या मस्तक पर धारण करता है उसके सर्व विघ्नरूप दारूण उपद्रवों का नाश होता है ॥३३॥
देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वर्ण्ये तु भारते ।
न श्रृणोति पठत्येव ताममृतस्वरूपिणीम् ॥३४॥
हस्तात्त्यक्त्वाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्क्ष्वेडं समश्नुते ।
पीत्वा गीतामृतं लोके लब्ध्वा मोक्षं सुखी भवेत् ॥३५॥
भारत (भरतखण्ड) में चार वर्णों में मनुष्य देह प्राप्त करके भी जो अमृतस्वरूप गीता नहीं पढ़ता है या नहीं सुनता है वह हाथ में आया हुआ अमृत छोड़कर कष्ट से विष खाता है, किन्तु जो मनुष्य गीता रूपी अमृत को पीता है अर्थात सुनता है, मनन करता है और तदनुसार आचरण करता है वह जीवन मुक्ति प्राप्त कर सुखी होता है ॥३४-३५॥
जनैः संसारदुःखार्तैर्गीताज्ञानं च यैः श्रुतम् ।
संप्राप्तममृतं तैश्च गतास्ते सदनं हरेः ॥३६॥
संसार के दुःखों से पीड़ित जिन मनुष्यों ने गीता का ज्ञान सुना है उन्होंने अमृत प्राप्त किया है और वे श्री हरि के धाम को प्राप्त हो चुके हैं ॥३७॥
गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः ।
निर्धूतकल्मषा लोके गतास्ते परमं पदम् ॥३७॥
पृथ्वी का भोग करने वाले जनक आदि राजा लोग गीता का आश्रय लेकर अपने सभी पुण्य-पाप रूप कल्मषों को धोकर यानी नष्ट करके परमपद को प्राप्त हुए हैं ऐसा लोक में गाया जाता है अर्थात प्रसिद्धि है ॥३७॥
गीतासु न विशेषोऽस्ति जनेषूच्चावचेषु च ।
ज्ञानेष्वेव समग्रेषु समा ब्रह्मस्वरूपिणी ॥३८॥
गीता में उच्च और नीच मनुष्य विषयक भेद ही नहीं हैं, क्योंकि गीता ब्रह्मस्वरूपिणी है, अतः उसका ज्ञान सबके लिए समान है ॥३९॥
यः श्रुत्वा नैव गीतार्थं मोदते परमादरात् ।
नैवाप्नोति फलं लोके प्रमादाच्च वृथा श्रमम् ॥३९॥
गीता के अर्थ को परम आदर से सुनकर जो आनन्दवान नहीं होता वह मनुष्य प्रमाद के कारण इस लोक में फल नहीं प्राप्त करता है किन्तु व्यर्थ श्रम ही प्राप्त करता है ॥४०॥
गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत् ।
वृथा पाठफलं तस्य श्रम एव हि केवलम् ॥४०॥
गीता का पाठ करके जो माहात्म्य का पाठ नहीं करता है उसके पाठ का फल व्यर्थ होता है और पाठ केवल श्रमरूप ही रह जाता है ॥४१॥
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीतापाठं करोति यः ।
श्रद्धया यः श्रृणोत्येव दुर्लभां गतिमाप्नुयात् ॥४१॥
इस माहात्म्य के साथ जो गीता पाठ करता है तथा जो श्रद्धा से सुनता है वह (मोक्षस्वरूप) दुर्लभ गति को प्राप्त होता है ॥४२॥
माहात्म्यमेतद् गीताया मया प्रोक्तं सनातनम् ।
गीतान्ते च पठेद्यस्तु यदुक्तं तत्फलं लभेत् ॥४२॥
सूत जी बोले― मेरे द्वारा यह सनातन गीता का माहात्म्य कहा गया है, जो भी गीता पाठ के बाद माहात्म्य का पाठ करता है वह ऊपर कहे गये उस उस फल को प्राप्त करता है ॥४६॥
सूचना— गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गीता माहात्म्य के सात में से प्रथम चार श्लोक वाराहपुराण के गीता माहात्म्यानुसंधान के हैं तथापि पुनरुक्ति न हो अतः वे श्लोक वहां के वहीं रहने दिया है, जबकि इधर से उन श्लोकों को निकाल दिया है, अतः श्लोक व्यतिक्रम स्वाभाविक है । शेष तीन श्लोक कहां के हैं यह मेरे लिए अभी भी अज्ञात है । ओ३म् !
॥इति श्रीवाराहपुराणोद्धृतं श्रीमदगीतामाहात्म्यानुसंधानं समाप्तम् ॥
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
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