ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय ३
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥ अथ तृतीयोऽध्यायः पूर्व अध्याय का उत्तर अध्याय से संबंध— द्वितीय अध्याय में मोहित अर्जुन के पलायनवादी विचारों के खण्डन में ‘कुतस्त्वा कश्मलमिदम्’ २/२ कहकर ‘अहं इदं’ की पहेलियों के बीच खड़ा करते हुए अर्जुन के पूर्व विचारों को म्लेच्छादि द्वारा अनुष्ठेय बताया और नपुंसक कहकर अर्जुन जैसे महावीर को एक सामान्य कमजोर, कुछ भी कर पाने में असमर्थ, अपयश और नरक का अधिकारी बताकर पूर्वोक्त विचारों की हृदय की दुर्बलता का परिणाम क्षुद्र अर्थात नीच यानी सारहीन विचार बताया । इस पर भी अर्जुन ने विभिन्न तर्कों को प्रस्तुत करते हुए भिक्षान्न (सन्न्यास) को श्रेष्ठ और त्रै...