ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय २

॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
     ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
    अथ द्वितीयोऽध्यायः
           प्रथम अध्याय से दूसरे अध्याय की संगति—
          प्रथम अध्याय के 'दृष्ट्वेमं स्वजनम्' से लेकर 'क्षेमतरं भवेत्' तक १८½ श्लोकों में विभिन्न तर्कों के माध्यम से मोह की चरम सीमा का वर्णन करते हुए सामान्य जीव की स्थिति का वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि किस प्रकार मनुष्य मोहाविष्ट होकर कर्तव्य-अकर्तव्य अर्थात सत् असत् के विवेक से शून्य होकर अपने उपस्थित कर्तव्य कर्म से पलायन कर जाता है...' कर्तव्य-अकर्तव्य से विमूढ़ मनुष्य को ही जड़ता से चैतन्य की ओर ले जाने के निमित्त से ही दूसरे अध्याय का प्रारंभ किया जाता है ।
           🙏निवेदन— जैसे कि मैं पहले बता चुका हूं कि गीता जो जिस स्थान पर खड़ा है उसी स्थान पर उसके मार्ग को प्रशस्त करती है, क्योंकि मैं एक यति हूं और निवृत्तिमार्ग ही मेरे श्रेय का हेतु है । अतः मेरे प्रत्येक विचार निवृत्तिपरक होना स्वाभाविक  है । इसी लक्ष्य को सामने रखकर हमारी परंपरा के आद्याचार्य भगवान शंकर को साक्षी मानकर अपना विचार प्रारंभ कर रहा हूं, यद्यपि यह कार्य एक अशिक्षित के लिए सरल नहीं हैं तथापि गुरुदेव का स्मरण करते हुए गीता नायक भगवान श्री कृष्ण का आवाहन करता हूं कि वे ही अपनी अहैतुकी कृपा से मार्गदर्शन करें  ।

सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं  वाक्यमुवाच मधुसूदन  ॥२/१॥
                शब्दार्थ—इस प्रकार उस अर्जुन से जिसके नेत्र करुणा के जल से भीगे हुए हैं और कुल की इच्छा रखने अर्थात कुल नाश के भय से अत्यंत व्याकुल एवं विषाद अर्थात शोक करने वाले से भगवान मधुसून ने मुस्कुराते हुए से कहा….॥१॥

श्रीभगवानुवाच        
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन          ॥२/२॥
क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं   हृदयदौर्बल्यं   त्यक्तोत्तिष्ठ परन्तप ॥२/३॥
            श्रीभगवान बोले― अर्जुन ! तुझे यह विकार (कायरता) इस विषम समय मे कहाँ से प्राप्त हुआ है ? यह तो अनार्यों द्वारा ही आचरणीय है, नरक को देनेवाला एवं अपकीर्ति करने वाला है ॥२॥
            पार्थ ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, हे परन्तप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए उठ खड़ा हो ॥३॥
           तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान बोले— जब अर्जुन की तरह मोहाच्छन्न होकर विषम समय अर्थात जब अत्यन्त आवश्यक हो उस समय कर्तव्य विमुख होकर समाज को नजरअंदाज करके कर्तव्य पलायन कर जाता है, तभी कोई दैवयोग से जो जिस स्थानीय है उस स्थानीय गुरु मिल जाता है । जो कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराते हुए इस प्रकार के पलायन को निकृष्ट, नारकी, अपकीर्तिकारक बताकर क्लैब्य अर्थात पुरुषार्थ रहित हीन भाव से ऊपर उठाता है और कहता है कि इस प्रकार का हीनभाव एक कर्तव्यपरायण शिष्ट व्यक्ति के लिए कदापि उचित नहीं अर्थात अशोभनीय है, ये हृदय की दुर्बलता और क्षुद्र विचार हैं । इनका त्याग करके कर्तव्य कर्म करने के लिए उठकर खड़ा हो जाने का आदेश देता है ।
           अथवा विषम समय यानी जिस समय युद्ध के लिए आमने सामने सेनाओं के उपस्थित होकर युद्ध का ढोल भी बज गया है तब, जब सभी शस्त्र छोड़ने ही वाले हैं ऐसे उस प्राणघातक समय में—
            अनार्य, नपुंसक आदि दो श्लोकों में कहकर परुष बचन यानी कठोर शब्द बोल रहे हैं या और पार्थ कहकर कुन्ती के आजीवन संकट और तप का स्मरण दिलाकर उनके आने वाले सुख पर युद्ध से पलायन रूप कुठाराघात से सावधान करते हुए अर्जुन के तपस्वी जीवन का भी स्मरण दिला रहे हैं, जिसमें उन्होंने तप के माध्यम से भगवान शंकर को भी संतुष्ट किया एवं युद्ध में संतुष्ट करके पाशुपतास्त्र को प्राप्त किया था । नीति भी यही है कि कर्तव्य से कारणवश च्युत होने वाले की प्रशंसा पूर्वक असहमति जताते हुए मार्गदर्शन करना चाहिए ॥२-३॥
          निजी भाव— मुमुक्षु का जब मन जब संसार से अर्थात भोगों से तृप्त हो जाता है, तब गुरु की शरण संसार की उपरामता हेतु ग्रहण करता है तब गुरु संसार और स्वयं के बीच के यथार्थ संबन्धों का वास्तविक परिचय ‘कोऽहम्' अर्थात मैं कौन हूँ ? ‘कस्त्वं' (तू कौन है ?), कुत आयातः इत्यादि का विचार पूर्वक परिचय कराते हैं । अतः अर्जुन यहाँ मुमुक्षु है उसी मुमुक्षा की दृष्टि से श्रीभगवान कहते हैं— ‘कुतस्त्वा' अर्थात कहाँ तो तू और 'कश्मलमिदम्'― कहाँ तो ये.....। अर्थात पहले तो यह विचार करते हैं कि मैं कौन हूँ ? और यह कौन हैं ? 'अहं' 'इदं' का अन्तर समझे बिना ही पलायन रूप निकृष्ट, नारकी, अपकीर्तिकारक, हृदय की दुर्बलता के कारण ही इस क्लैब्य अर्थात पुरुषार्थ रहित हीन भाव को प्राप्त हुआ है । अतः पहले इस हीन भावना का त्याग करके कर्तव्यपरायणता के लिए उठकर खड़ा हो जा ।
               
               संबंध— गुरुजन कम शब्दों में सार बात कह देते हैं,किन्तु विषयी जीव को समझ में आता नहीं है, अतः वह पुनः अपने तर्क उपस्थित करता ही है, जैसा कि….
अर्जुन उवाच   
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति  योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥२/४॥
           शब्दार्थ— अर्जुन बोले— हे मधुसून ! भीष्म, द्रोण के साथ किस प्रकार युद्ध करूँ ? हे शुत्रसंहारक ! वे मेरे पूज्य हैं, (जिनकी वाणी से भी हिंसा नहीं कर सकता उनको) बाणों से कैसे मारूं ?
          तात्पर्यार्थ— मोहाच्छन्न व्यक्ति ऐसा प्रश्न सामने रखता है कि सामने वाला निरुत्तर हो जाये जैसा कि अर्जुन कहता है कि आप ही बताएं— पुष्पों से जिनकी पूजा करता हूँ, उन्हें बाणों से कैसे मारूं ? अर्थात श्रीभगवान की बात सुनकर अपने पूज्यजनों के भावी वियोग को अर्जुन सहन नहीं कर सका ॥४॥

           संबंध— आप जिन्हें मारने को कहते हैं वे सामान्यजन नहीं हैं, वे महानुभाव हैं……
गुरूनहत्वा  हि महानुभावाञ्छ्रेयो भोक्तुं   भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान ॥२/५॥
          शब्दार्थ— ये गुरुजन महान अनुभवी हैं, बहुत विशाल धर्म तत्त्व के मर्मज्ञ और उपदेष्टा हैं । इनको मारने से मात्र पृथ्वी ही तो कामनापूर्ति हेतु मिलेगी ? मैं इनको न मारकर इस लोक में भिक्षाभोजी अर्थात संन्यासी होना श्रेष्ठ समझता हूँ ॥५॥

न चैतद्विमः कतरन्नो  गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥२/६॥
            शब्दार्थ— एतत् शब्द से जो अभी हमने कहा कि मैं यह भी नहीं जानता भिक्षावृत्ति श्रेष्ठ है या न अथवा सामने खड़ा युद्ध करना श्रेष्ठ है ? हम यह यह भी नहीं जानते कि हमारी विजय होगी या नहीं । अरे ! जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते विशेष रूप से धृतराष्ट्र के पुत्र....., वही युद्ध में अर्थात मरने मारने के लिए हमारे सामने खड़े हैं ॥६॥

              संबंध— ऐसा अनिश्चय अर्जुन ने क्यों कहा ? इसपर कहते हैं…. 
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः     पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥२/७॥
             शब्दार्थ— अविद्या अर्थात अज्ञान जनित सदसद् विवेक से रहित धर्म अर्थात कर्तव्य क्या है ? इस पर मैं अत्यंत मूढ़ता के दोष से आवृत्त हुआ आप से पूछता हूँ कि जो मार्ग मेरे लिए श्रेय अर्थात मुक्ति देने वाला हो वही सुनिश्चित करके कहो क्योंकि मैं आपकी शरण आया हूँ, आपका शिष्य हूँ ।
            तात्पर्यार्थ— साधक की अविद्या जनित दोष के कारण सदसद् विवेक की बुद्धि नष्ट हो जाती है, अतः वह आत्मतत्व को नहीं जानता और जन्म-मरण रूप अविद्या से अविद्या की ओर चला जाता है, तथापि पूर्व सुकृत कर्मों के उदय होने पर सद्विद्या अर्थात ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा होती है । उस ब्रह्मविद्या के दो ही अधिकारी होते हैं— एक तो पुत्र जो स्वयं का अपना आत्मा कहा जाता है, वह ब्रह्मवेत्ता पिता के साथ नित्य रहने के कारण ब्रह्मविद्या के महत्व को समझता है । दूसरा शिष्य ब्रह्मविद्या का अधिकारी जो पूर्णतः गुरु के शरणापन्न होता है । अर्जुन पुत्र शिष्य दोनो नहीं है किन्तु वह भी श्रेयमार्गानुगामी होना चाहता है । यच्छ्रेयः स्यात् २/७, अतः श्रेय प्राप्ति के लिए ब्रह्मविद्या श्रवण की आवश्यकता है ही, उस ब्रह्मविद्या प्राप्ति हेतु भगवान श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करते हुए शिष्यता स्वीकार कर लेते हैं । साथ ही परम्परा के महत्व का भी प्रतिपादन करते हैं । इस परम्परा का वर्णन चौथे और तेरहवें अध्याय में भी श्रीभगवान करेंगे ।
          भावार्थ— ब्रह्मविद्या की प्राप्ति गुरुमुख से परम्परागत ही होती है ॥७॥

            संबंध— अविद्या ग्रस्त मनुष्य की इन्द्रियाँ जब सूख अर्थात उपराम हो जायें, जब पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक तक के भोगों का मन त्याग कर दे तब ही गुरु की शरण में जाना चाहिए, यही भाव आगे प्रदर्शित करते हैं….
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य  भूमावसपत्नमृद्धं  राज्यं सुराणामपि   चाधिपत्यम् ॥२/८॥
           शब्दार्थ— सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य मिल जाये अथवा देवताओं का स्वामित्व अर्थात इन्द्र पद या ब्रह्म पद भी मिल जाये तो भी मेरी इन्द्रियों को जो शोक प्राप्त हुआ है, सन्ताप प्राप्त हुआ है, उसे कोई भी उपरोक्त वैभव दूर कर सकें ऐसा तो मैं नहीं देखता ।
           तात्पर्यार्थ— इस प्रकार जब लोक परलोक के भोगों के सहित पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा इन तीनों ऐषणाओं का त्याग कर दे, जब जागतिक भोगों के नाम से मन-इन्द्रियाँ व्याकुल हो जायें तब ही ब्रह्मत्त्व के मर्मज्ञ श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाकर उनकी शरण ग्रहण कर ले । इस कथन की पुष्टि चतुर्थ अध्याय में करेंगे ।
            भावार्थ— ब्रह्मविद्या हेतु अशेष रूप से ऐषणात्रय का त्याग अत्यन्तावश्यक है ॥८॥
           समीक्षा— श्लोक पांच से यहां तक अर्जुन ने कई पक्ष रखे । पहला पक्ष यह कि जिनकी हम पूजा करते हैं उन्हें मारने की अपेक्षा भिक्षा यानी संन्यास धर्म ही श्रेष्ठ है । फिर जय पराजय संबंधित बात से यह कहा कि किसी भी कार्य का परिणाम क्या होगा इस पर बारंबार विचार करना आवश्यक है अन्यथा बिना विचारे जो करे सो पाछे पछिताय । काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय ॥ स्वयं समझ में न आने पर अपने किसी विशिष्ट मंत्री यानी जो स्वार्थ रहित शिक्षा दे सके ऐसे मित्रों से विचार-विमर्श कर लेना चाहिए । 
             शरण और शिष्य का अर्थ यह है कि यहां पर पहले अर्जुन सन्न्यास ग्रहण करने की बात करता है और फिर संन्यास और युद्ध दोनो के विषय में क्या कल्याणकारी है यह निर्णय न कर पाने के कारण श्रेष्ठ मार्ग को जानना चाहता है । इस संशय का उत्तर आगे ‘छित्त्वैनं संशयं योगमात्तिष्ठोत्तिष्ठ भारत’ ४/४२ भगवान कहेंगे कि संशय का नाश करके युद्ध के लिए उठकर खड़ा हो जा । वस्तुतः संन्यास क्या है ? जिसे वीतरागी संपूर्ण कर्मों के झंझट को त्याग कर गिरि कन्दराओं में निवास करते हैं और कर्म का स्वरूप क्या है ? जो ऐसे हिंसक घोर कर्म को भी उचित माना जाता है कि अपने ही कुटुम्बियों का नाश करने में भी दोष दिखाई नहीं देता और यदि आप कहो कि सन्न्यास का स्वरूप मात्र पुत्र या शिष्य को ही समझाया जा सकता है तो इसके लिए मैं पहले ही आपकी शिष्यता स्वीकार करता हूँ, अतः संन्यास का उपदेश करो । कर्म का अनुशासन यानी कर्म की शिक्षा भी गुरु या मित्र की भांति दो मैं दोनो तरफ से यानी गुरु और मित्र दोनो रूपों में दी गई शिक्षा का अनुशरण करूंगा यही शरणापन्न होने का भाव है ।
              यहाँ शंका हो सकती है कि जब शिष्यता स्वीकार कर ली तो फिर मित्र वाली बात कहां से आ गई । तो इसका समाधान यह है कि भगवान स्वयं कहते हैं भक्तोऽसि मे सखा चेति ४/३ भक्त शब्द गुरु के लिए और सखा शब्द मित्र के लिए भगवान ने भी ये दोनो शब्द एक साथ स्वीकार किये और कहे है, साथ ही अर्जुन भी सखेति मत्वा ११/ ४१ कहता है अतः यहाँ अर्जुन दोनो ही दृष्टिकोण से वस्तु स्थिति समझना चाहता चाहे वह शिष्य के रूप में या फिर मित्र के रूप में समझ सके ।
              अब प्रश्न यह उठता है कि संन्यास और कर्म दोनो में पूर्व और पश्चिम जैसी स्थिति है निवृत्त और प्रवृत्ति एक साथ कभी नहीं चल सकते । अतः संन्यास के लिए मनोगत प्रत्येक श्रुत-अश्रुत विषयों से वैराग्य आवश्यक है यदि कृष्ण ऐसा प्रश्न करें तो ? अर्जुन इसके लिए पूर्णतः तैयार है और पहले ही कह देता है ये अभावों से भरी शत्रु वाली पृथ्वी ही नहीं बल्कि धनधान्य संपन्न शत्रु रहित पृथ्वी सहित देवलोक का इन्द्रपद भी मेरी इन्द्रियों के शोक को दूर नहीं कर सकता है अर्थात सभी श्रुत और अश्रुत भोगों के प्रति मेरे अन्दर पूर्ण वैराग्य हो चुका है । ये वही अर्जुन हैं जो इन्द्रलोक जाकर इन्द्र के आधे सिंहासन पर इन्द्र के साथ बैठकर कर वहां से शस्त्र विद्या सीख कर आये थे । अतः स्वर्गीय सुख उनसे अधिक और कौन जान सकता है ? यहाँ महात्माओं को तो कोई कामना ब्रह्मलोक तक होती नहीं है और भंडारे दिन में मात्र दक्षिणा के लिए कितने खायेंगे इसका भी कोई पता नहीं । एक रसगुल्ले का रस छूटता नहीं और वैराग्य ब्रह्मलोक तक का । इससे अधिक और हास्यास्पद क्या होगा ? लोकैषणा, पुत्रैषणा, वित्तैषणा के त्याग का संकल्प करने वाले आज के आधुनिक संन्यासियों को लोक की कामना कितनी हो सकती है इसका अनुमान उनके दिखावे के दंभ से ही देख लेना चाहिए सारे के सारे शास्त्र और संन्यास पद्धति मात्र भक्तों के बीच मैं विद्वान और सिद्ध हूँ यही दिखाने में ही धरे के धरे रह जाते हैं, शिष्य और शिष्या रूप पुत्र-पुत्रियों को थोक के भाव पैदा करने वाले, धन की कामना आज के संन्यासियों में कितनी है इसका अनुमान तो मैं संन्यासी होने के नाते लगा सकता हूँ, कुछ अपवाद छोड़कर संन्यास आज वेश्यावृत्ति की तरह हो गया है । 
           अर्जुन कहता है कि आप का शरणापन्न हूँ मुझ पर विश्वास करें कि मुझे अब मन में भी कोई कामना किसी भी भोग के प्रति नहीं है । यहाँ पर दो बातें सामने आती हैं संन्यास का स्वरूप क्या है ? और कर्म का स्वरूप क्या है ? चूंकि यहां पर पहला प्रश्न संन्यास से संबंधित है और दूसरा प्रश्न कर्म से संबंधित है अतः आगे उत्तर भी इसी क्रम से पहले ज्ञान और फिर कर्म के क्रम से मिलेगा । यहां पर यह भी सुनिश्चित हो जाता है कि ज्ञानमार्ग में कर्म का कोई दूर दूर तक संबंध नहीं है यह अर्जुन भी मानता है इसलिए सन्न्यास की बात करता है तथापि वह यह भी जानता है कि मैं इस समय शोकातुर हूँ इसलिये मेरा निर्णय गलत न हो जाये कि वास्तव में श्रेष्ठ मार्ग कौन सा है वही श्रेष्ठ मार्ग जानने के लिए अर्जुन कृष्ण के शरणापन्न होकर पूछ रहा है ॥५-८॥

          संबंध— अर्थात अधिकारी भाव देखकर श्री भगवान ब्रह्मविद्या का उपदेश कैसे करते हैं ? यह बताने के लिए…..
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा    हृषीकेशं गुडाकेशः    परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥२/९॥
तमुवाच     हृषीकेशः   प्रहसन्निव   भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये     विषीदन्तमिदं वचः ॥२/१०॥
             सञ्जय बोले― हे शत्रुओं को तपाने वाले राजन् ! इस (उपरोक्त?) प्रकार निद्राविजयी अर्जुन भगवान अन्तर्यामी हृषिकेश के प्रति कहकर युद्ध नहीं करूंगा इस प्रकार का निश्चय भगवान गोविंद से कहकर चुपचाप बैठ गया ॥९॥
           दोनों सेनाओं के मध्य शोक संतप्त अर्जुन से श्रीभगवान हृषिकेश अर्जुन के द्वारा दिये गए अनवसर विरुद्ध कुतर्कों का मानो उपहास करते हुए मुस्कुराते अर्थात कटाक्ष करते हुए से बोले— ॥१०॥
           तात्पर्यार्थ— इसप्रकार का अर्थ अ.१ दृष्ट्वेमं स्वजनम् से लेकर क्षेमतरं भवेत् १/४६ तक एवं अध्याय २/४ से लेकर २/८ अपनी सम्पूर्ण मानसिक विकृत या दलीलें लेकर चुप होकर गये ।
             विवेचन— अब यहाँ से भगवान का उपदेश प्रारंभ होता है संन्यास अर्थात साङ्ख्य का जो श्लोक तीस तक वर्णन चलेगा, यहाँ यह पहले से ही समझ लेना आवश्यक है कि जो कर्म का वर्णन गीता में किया गया है उसका विनियोग मात्र चित्तशुद्धि के लिए ही है, क्योंकि बिना चित्तशुद्धि के किये- ज्ञान दूर दूर तक नहीं टिकता है । कर्म सविशेष ब्रह्म की उपासना संबंधित है जिसका विनियोग ज्ञान यानी स्वरूप स्थिति में होता है । शुद्ध ज्ञान स्व-स्वरूप होता है उसके लिए किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कर्म से प्राप्त जो भी होगा वह नाशवान होगा, जबकि ज्ञान स्वसंवेद्य आत्मस्वरूप है और वह स्वरूप अविनाशी है । कर्म चित्तशुद्धि का साधन है । कर्म रूप साधन से चित्तशुद्धि रूप साध्य है, सविशेष ब्रह्म साधन और निर्विशेष ब्रह्म साध्य है । निर्विशेष ब्रह्म अस्ति मात्र सत्ता है और तत् एवं त्वम् की एकता से ही अस्ति प्राप्ति का लक्ष्य ही गीता का सिद्धांत है । अर्थात ‘तत् और त्वम्’ का शोधन ही साधन है और ‘अस्ति’ साध्य ।
               यहाँ कुछ शब्द भी समझ कर रखना आवश्यक है जैसे साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु २/३९ यहाँ पर बुद्धि का अर्थ विवेक है जो ज्ञान का विवेक के साथ ही योग यानी कर्मयोग के विवेक में भी वर्णन किया गया है । योग का अर्थ होता है आत्म ज्ञान की उत्पत्ति के जो साधन हैं उनकी चेष्टा करना, उनको क्रियात्मक रूप देना यह योग है और उस योग से युक्त जो बुद्धि है उसे बुद्धियोग अर्थात कर्मयोग कहते हैं । इसी प्रकार ‘बुद्धौ शरणमन्विच्छ’ २/३९ यहां बुद्धि का अर्थात ज्ञान है और उसी के अभिन्न भाव में क्रियान्वित करना योग है ‘तस्माद्योगाय युज्यस्व’ २/५०, इसी प्रकार बुद्धियोगमुपाश्रित्य १८/५७ यहाँ भी ज्ञानयोग की ही उपासना कही गयी है । इसी प्रकार योग का अर्थ समत्व कहा गया है ‘समत्वं योग उच्यते’ २/५० यह समत्व सभी मुमुक्षुओं के उपासना के लिए भाववृत्ति है जबकि इस समता का कथन निर्दोषं हि समं ब्रह्म ५/१९ अर्थात जो सभी कल्मषों अर्थात विकारों से रहित है ऐसा निर्विकार ही ब्रह्म ही सम है अर्थात समत्व में प्रतिष्ठा ब्राह्मी स्थिति है । एवं योग का अर्थ जीव-ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करता है और योग का अर्थ पाणिनीय अष्टांग योग भी है । इसी प्रकार कूटस्थ का अर्थ जीव, ब्रह्म एवं छल प्रपंच से युक्ता माया है । इसी प्रकार ब्रह्म का अर्थ निर्विकार सबकी सत्ता मात्र जो ब्रह्म नाम से कही गई है, प्रत्यागात्मा, माया या प्रकृति, वेद, वेदवेत्ता, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्म जिज्ञासु अर्थात मुमुक्षु, एवं अन्य शब्दों में भजन, मन्मना इत्यादि सभी पारिभाषिक शब्द कहाँ क्या निश्चय करना है उसको प्रसंगानुसार स्वयं ही समझना चाहिए । जो अर्थ उपक्रम और उपसंहार का अतिक्रमण करे वह अर्थ कभी नहीं हो सकता है । यह विशेष विचारणीय तथ्य है ।
             अध्याय एक का अर्जुन के पक्ष का भगवान उत्तर नरक देने वाला, अनार्य अर्थात वैदिक व्यवस्था से भिन्न, नरक देने वाला और तुच्छ बुद्धि वाला कहकर सावाधान करते हुए कर्तव्य कर्म करने के लिए कमर कसकर खड़े होने अर्थात तैयार होने के लिए कहते हैं । इस पर भी अर्जुन ने नाना प्रकार प्रकार के तर्क उपस्थित करते हुए युद्ध में विजय की अनिश्चतता बताते हुए, किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ कृष्ण की शरण ग्रहण करते हुए शिष्यता स्वीकार कर लेता है और शिक्षा देने की बात कहता है ।
           प्रत्येक मनुष्य की यही स्थिति है कि वह शरण तो किसी की भी ग्रहण कर लेता है और कहता भी है कि जो आप कहेंगे वही मैं करूंगा फिर करता अपने मन की ही है । यही बात आज के गुरुओं और शिष्यों की है । गुरु जो कहे वह तो बिल्कुल नहीं करना है‚ करना अपने मन की ही है क्योंकि गुरु ने कहा “वह ब्रह्म तू ही है” तत्त्वमसि और हमने कहा हां वह ब्रह्म मैं ही हूं— “अहं ब्रह्मास्मि” किन्तु दूर होते ही (मैं) जीव ब्रह्म कैसे हो सकता है ? इसी पर ही उधेड़बुन करते रहते हैं, और किसी जड़ प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना प्रारंभ की कि आप ही हमारे माई-बाप हो । उसके अनुसार उसका भी हृदय पत्थर का बन जाता है और आत्मभाव को भूलकर दंद-फंद में लग जाता है । मैं महात्मा हूं का मिथ्या दंभ पालकर ।
             अर्जुन भी यह कहता है— “यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे” जो मेरे लिए श्रेष्ठ अर्थात इस भयानक कर्म से निवृत्त हो जाऊं वह कहो । क्यों ? क्योंकि— “श्रेयो भोक्तुमपीह लोके” २/५ मैं भिक्षावृत्ति अर्थात सर्वकर्म संन्यास को ही श्रेष्ठ समझता हूं ‌। और संजय के अनुसार अर्जुन ‘मैं युद्ध नहीं करूंगा’ कहकर रथ के पिछले भाग में बैठ जाता है । यहां विचारणीय तथ्य है कि अर्जुन कहते हैं कि शिक्षा दो मैं आपका शिष्य हूं, आपका शरणागत हूं, शरणागत होकर भी ‘मैं युद्ध नहीं करूंगा’ यह अपना निश्चय भी कह देता है । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन एकमात्र संन्यास के उपदेश की बात कर रहे हैं न कि युद्ध के विषय में परामर्श मांग रहे हैं ।
             यहां पर बड़ा गंभीर विचार यह है कि आज के लोगों के झगड़े के अनुसार यदि ब्राह्मण का ही संन्यास में अधिकार है तो अर्जुन संन्यास की बात क्यों करता है ? स्वयं वार्तिककार सुरेश्वराचार्य जी भी इस बात को मानते हैं कि संन्यास त्रैवर्णिक है । फिर भी झगड़ा यह कि केवल ब्राह्मण का ही संन्यास में अधिकार है । एक बार हमने नैमिषारण्य में एक दंड़ी स्वामी से प्रश्न किया कि आप जब ब्राह्मणेतर को संन्यास नहीं दे सकते हैं तो शिष्य क्यों बनाते हो ? इस पर दंडी स्वामी ने कहा कि “हम लोग ब्राह्मणेतर को शिष्य बनाते ही नहीं हैं । मात्र शिष्य के नाम पर भ्रमित करता हूं, ताकि मेरा सामान ढो सके क्योंकि ब्राह्मण बालक तो ढोयेगा नहीं ।” यह है हमारे समाज में जातीय समाज के पतन का बीज हठधर्मिता ।
               शास्त्र का अवलोकन करने पर जो विदित होता है वह यह है कि ब्राह्मण के लिए आयु के चतुर्थ भाग में संन्यास और क्षत्रिय को वानप्रस्थ अनिवार्य है । अन्य के लिए महाभारत में विदुर के धृतराष्ट्र के साथ वन में जाने के प्रसंग के अन्तर्गत आता है कि वैश्य को जब वैराग्य हो जाये और शूद्र स्वामी की सेवा से तृप्त हो जाये तब स्वामी की आज्ञा से देश-काल का विचार करते हुए वानप्रस्थ गृहण कर लेना चाहिए । अर्थात उन दो के लिए वे दो कर्म अनिवार्य हैं और इन दो के लिए वैराग्य प्रधान होने पर वन जाना चाहिए यह स्पष्ट है । इसका अर्थ यह हुआ कि जो भी ब्राह्मणेतर के संन्यास का वर्जन करते हैं उन्होंने एक मात्र सामाजिक वैमनस्यता के अतिरिक्त कोई शास्त्र पढ़ा ही नहीं है । इनकी बातें एक अबोध बच्चे की तरह उपेक्षणीय हैं ।
              साथ ही स्त्री-शूद्र के संन्यास की बात आती है तो विधि की दृष्टि से जिनका जनेउ और चोटी नहीं है उनका संन्यास में अधिकार नहीं है, किन्तु वे भी अवधूत वृत्ति का अवलंबन लेकर परिब्रजन और भिक्षा के अधिकारी हैं । संन्यास का अर्थ होता है सर्व त्याग, लोक से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत संपूर्ण स्पृहा का त्याग । यह स्त्री-शूद्र आदि कहीं भी संभव है । अतः वे अवधूत संज्ञक संन्यास वृत्ति के अधिकारी हैं न कि मुख्य विधि संन्यास का । संन्यास के समय में शिष्य को निर्वस्त्र किया जाता है । अगर स्त्री संन्यास ग्रहण करती है तो विधि के अनुसार उसे भी नंगी होना पड़ेगा, जबकि शास्त्र कहता है कि नग्न परस्त्री पर धोखे से भी दृष्टि पड़ जाये तो तीन बार सरसों का तेल आंख में लगाने से शुद्धि होती है, इसके अनुसार किसी भी परिस्थिति में स्त्री को नग्न देखना वर्जित है, तो संन्यास के समय जानबूझकर किसी स्त्री को नग्न कैसे देखा जा सकता है ? 
             संन्यास क्यों ग्रहण किया जाता है ? इसलिए कि हमारा कल्याण हो ? तो फिर शास्त्रीय आचरण के बिना कल्याण कैसे संभव है ? कल्याण चाहिए तो शास्त्र विधि का पालन अनिवार्य है । जितनी भी स्त्रियां संन्यास के नाम पर घूम रही हैं वे सभी अवधूतिनी हैं न कि संन्सासिनी । यदि कोई संन्यासिनी है तो गुरु और शिष्या दोनो ही नरक के अधिकारी हैं और उन्हें कोई भी बचा नहीं सकता है ।
            प्रसंगवश विषयांतर हो गया । तो अर्जुन की यह दयनीय दशा है कि एक ओर कहता है कि मैं आपका शिष्य हूं, कर्मसंन्यास का मेरे लिए उपदेश करो, दूसरी तरफ कहता है मुझे अनुशासित करो मैं आपकी शरण में हूं, तीसरी तरफ निर्णय स्वयं ही कर लेता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा । इस पर भगवान को हंसी आ गई कि कितना पांडित्य झाड़ रहा है बात कोई भी एक निश्चय वाली नहीं करता, अतः मुस्कुराते हुए से अर्थात अर्जुन की बात का उपहास करते हुए बोले— 

श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भासषे ।
गतासूनगतासूंश्च  नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२/११॥
             शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले— जो शोक के योग्य नहीं हैं उनका शोक करता है, ऐसा मूढ़ होकर भी पण्डितों के समान बातें करता है । बुद्धिमान लोग न उनका ही शोक करते हैं जिनके प्राण चले गये हैं और न उनका ही जिनके प्राण नहीं गये हैं ।
              तात्पर्यार्थ— अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि पूज्यजनों को लेकर अधिक व्यथित है । इस पर श्रीभगवान कहते हैं भीष्मादि पूज्यों ने अक्षय कीर्ति प्राप्त की है, अतः वे मरकर भी अमर हैं और जीवित में तो हैं ही । अतः दोनो स्थिति में वे शोचनीय नहीं हैं । अर्थात जो सदसद् विवेक द्वारा जो अहं प्रत्यय है वह शरीर और शरीर के पश्चात भी अमर हैं, अतः वे शोक के योग्य नहीं हैं ।
          शंका― मरने में शोक तो ठीक है किन्तु जीवित का शोक कहना युक्तिसंगत कैसे हो सकता है ? इसका समाधान― यह है कि जैसे मुमुक्षु के लिए सभी कर्मफल त्याग कहने मात्र से पापमय और पुण्यमय फलों का त्याग स्वतः सिद्ध होता है क्योंकि जो आज पुण्य है कल वह नष्ट होने पर जन्म-मृत्यु का हेतु अवश्य बनेगा जो पुनः पुनः इसी क्रम की अनुवृत्ति करके दुःख रूप पाप ही सिद्ध होता है, उसी प्रकार जो आज जीवित हैं, वे आज नहीं तो कल तो मरेंगे ही तो शोक होगा ही इस लिए अभी की प्रसन्न भविष्य का शोक ही है इसी न्याय से मरने वालों के साथ जीवित के भी शोक की बात भगवान ने कहा है । जीवित रहने वालों के साथ ही जिनका अभी अभी जन्म हुआ है उसकी प्रसन्नता को भी शोक रूप में अध्याहार कर लेना चाहिए ।
           भावार्थ— स्थिति और विनाश दोनो काल्पनिक हैं, आत्मा अमर अजर है, अतः वे किसी भी परिस्थिति में शोचनीय नहीं हैं ॥११॥

          संबंध— आत्मा के अमरत्व, नित्यत्व आदि का साङ्केतिक बोध कराने पर भी अर्जुन, समझ नहीं सका अतः पुनः अखण्ड एवंं नित्य आत्मा के लिए कहते हैं….
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न  चैव न  भविष्यामः  सर्वे वयमतः परम् ॥२/१२॥
              शब्दार्थ— ऐसा नहीं है कि तुम, मैं और ये राजा लोग पहले नहीं थे अर्थात हम सभी लोग पहले भी थे आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे ।
              तात्पर्यार्थ— त्वं, इमे, वयम् इन तीनों शब्दों में अहं प्रत्यय है, यहाँ केवल अहं कहने मात्र से आत्मा की त्रिकाल सिद्धि हो जाती है । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवंं कौमार, युवा एवं वृद्ध इन तीनो अवस्थाओं में इतनी भिन्नताओं के बाद भी जो अहं है वह बदलता नहीं है, वरन् सदैव वही अहं एक मात्र एकरस रहता है । इसी प्रकार इस शरीर के पहले और बाद में भी अहं प्रत्यय नित्य है, क्योंकि वह निरवयव, अव्यय और अखण्ड है । इस अपनी व्यापक अखण्डता को जाने बिना ही शोक करते हो और मूढ़ होकर भी पण्डितों की तरह बातें भी करते हो यह तुम्हारे योग्य कदापि नहीं है ।
          भावार्थ— यहां पर आत्मा को त्रिकाल में होने और मैं, तू और यह करके जो त्रिपुटी है वह सब ‘मैं’ अर्थात आत्मा के ही अर्थ में है अर्थात भगवान कहते हैं कि जिन्हें तू मरने वाला कहता है वह आत्मा तो तीनो काल में निश्चित रूप एकरस ही है (अतः ये शोक के योग्य नहीं हैं) ।
             सारांश— शरीर एक अवस्था है वह स्थिर होने वाली नहीं, और आत्मा नित्य होने से मरने वाली नहीं; अतः दोनो ही स्थिति में शोक बनता नहीं है ॥१२॥
         
              संबंध— अवस्था (शरीर) की अनित्यता और आत्मा की नित्यता पुनः इस प्रकार दर्शाते हैं…..
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा  देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र  न मुह्यति ॥२/१३॥
           शब्दार्थ— जैसे इस शरीर की कौमार्य, यौवन तथा वृद्ध अवस्थाएं होती हैं वैसे ही शरीराभिमानी आत्मा के शरीर बदलने की एक अवस्था मात्र है । ऐसा समझकर धैर्यवान कभी मोह को प्राप्त नहीं होता ।
            तात्पर्यार्थ— शरीर की अवस्था त्रय में अविद्या जनित दोष के कारण सदसद् विवेक से रहित आत्मा स्वयं को मैं बालक हूँ, मैं पहले बालक था अब जवान हो गया हूँ, अब मैं वृद्ध हो गया का आरोप स्वयं पर करता रहता है, किन्तु तीनों अवस्थाओं में रहने वाला 'मैं' एक ही रहा । वह कभी बच्चा, जवान, वृद्ध नहीं होता तथापि बच्चा बूढ़ा जवान का आरोप कर लेता है । उसी प्रकार तीनो अवस्थाओं में एकरस रहने वाला आत्मा ही अविद्या दोष से शरीर के परिवर्तन को ‘हाय मैं मर गया’ इत्यादि आरोपित करके शोक करता है, किन्तु इस रहस्य को जानने वाले आत्मा के नित्य एक रस भाव में स्थिति होकर कभी मोहित नहीं होते अर्थात शोक नहीं करते ॥१३॥

               संबंध— इस प्रकार आत्मा नित्य एकरसानन्दस्वरूप प्रत्यक्ष सिद्ध होने से शोक तो कदापि बनता ही नहीं, किन्तु अविद्या जनित पूर्व प्रारब्धानुसार आगमापयी अर्थात प्रकट और नष्ट होने वाला शरीर तो मिल ही गया है, आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक ताप भी स्वाभाविक प्राप्त ही होंगे । अतः उन्हें सहन करने के लिए श्रीभगवान आदेश देते हैं…. 
मात्रा स्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यांस्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२/१४॥
              शब्दार्थ— हे भारत ! पञ्चमहाभूत निर्मित शरीर में उनकी पञ्तन्मात्राएं शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि देने वाले ही हैं, किन्तु ये आने जाने वाले हैं अतः इन्हें सहन करो ।
          तात्पर्यार्थ— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इनसे ही अनुकूल प्रतिकूल होने के कारण शीत-उष्ण, मान-अपमान, जीवन-मरण, स्वस्थ-अस्वस्थ आदि सुख-दुःख देने वाले हैं, किन्तु ये आज हैं कल नहीं हैं, अतः तू उसे सहन कर क्योंकि इन सभी आने जाने वाली अवस्थाओं का एकमात्र नित्य, अखण्ड, सुख-दुःखादि को सत्ता देने वाला तू ही है ।
             अथवा मात्रा यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस गंध, और स्पर्श यानी अनुकूल प्रतिकूल की अनुभूति एवं अनुभूति के फलस्वरूप उत्पन्न सुख दुःख ये सभी आने जाने वाले हैं जबकि आत्मा एकरस अपरिवर्तनीय है । अतः आत्मा के निमित्त शोक व्यर्थ है यह भाव है ।
             भावार्थ— जो नित्य है उसका कभी कुछ बिगड़ता नहीं, अनित्य कभी स्थिर रहता नहीं, अतः 'आगतं स्वागतं कुर्यात गतं न निवारयेत' ॥१४॥

           संबंध— इसप्रकार जो पूर्व की मात्राओं और उनके विकारों को सहन कर लेता है उसकी प्रशंसा और गति का वर्णन करते हैं…..
यं  हि न  व्यथयन्त्येते  पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२/१५॥
              शब्दार्थ— जो पूर्वोक्त मात्राओं से उत्पन्न शीत-उष्ण, स्थिति-विनाश से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वन्दों से व्यथित अर्थात चलायमान या प्रकंपित नहीं होता वही पुरुषों में श्रेष्ठ और धैर्यवान है, वही ब्रह्मप्राप्ति का संकल्प करता है अर्थात आत्मैक्य भाव को प्राप्त करने में समर्थ होता है ।
           तात्पर्यार्थ— अर्थात जो प्रत्येक परिवर्तन में एक मात्र अविनाशिनी आत्मा को ही नित्य, अचल अपरिवर्तनीय सभी विकारों से रहित देखता है वही मोक्ष का अधिकारी है । अर्जुन को श्रेयमार्ग यानी निवृत्ति मार्ग का यह अधिकार बताते हुए मानो यह कह रहे हैं कि ये भिक्षु धर्म के लक्षण देखो और अपनी व्यथित स्थिति देखो कि तुम भिक्षुक अर्थात सन्न्यासी बनने के योग्य हो या नहीं ? क्योंकि तुम तो पुरुषों में श्रेष्ठ कहे जाते हो तो श्रेष्ठ विचार भी तुम्हें ही करना होगा ।
           सारांश—यथा प्राप्तं सहेत्सर्वं स तपस्योत्मोत्मः ॥१५॥
            
            संबंध— उपरोक्त प्रकार से सहन करते हुए ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प लेकर वह किस प्रकार आत्मदर्शन (ब्रह्मदर्शन) करता है ? यह बताते हैं….
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२/१६॥
             शब्दार्थ— असत की सत्ता नहीं, सत का अभाव नहीं इस प्रकार तत्त्वदर्शियों के द्वारा देखा अर्थात जाना गया है ।
              तात्पर्यार्थ— सत वह है तो नित्य, निर्विकार एकरस, विज्ञानघन, देशकाल अबाधित, सर्वकाल, सर्वगत और शाश्वत हो उसे सत कहते हैं । सत से जो विलक्षण हो उसे असत कहते हैं । कोई भी कुछ भी दिख रहा है उसका कोई तो कारण होगा ? जैसे आकाश निर्विकार, नित्य, सर्वगत है तथापि उसमें नीलिमा रूप विकार दिखता है । इसमें आकाश तो सत्तावन है, कभी इसका अभाव नहीं हो सकता स्वरूप से भिन्न नीलिमा दिखने पर भी असत है, और अभाव ही है । इसी प्रकार जिस काल में सत्स्वरूप निर्विकार, सर्वगत, सबका साक्षी जो आत्मा है उसके आश्रित शरीर आदि विकार हैं, वह वास्तव में है नहीं पर दिखता है और अगर होता तो जो शरीर जैसा बचपन में था वैसा ही जवानी, बुढ़ापा में भी दिखना चाहिए, किन्तु यह एककाल में दिखता है और दूसरे काल में नहीं दिखता, अतः इस अनात्मा शरीर का सदैव अभाव और आत्मा नित्य, निर्विकार, आत्मरूप सदा एक रस, रहता है । इस प्रकार जो जानता है वही तत्त्वदर्शी आत्मैक्य भाव में नित्य, निरन्तर, निर्विकार अद्वय आत्मा में सर्वात्मा रूप से शोक रहित स्थित है । ऐसा तत्त्वदर्शियों का निश्चय है ।
              अथवा असत यानी जो है नहीं पर अनुभव में आ रहा है और विचार करने पर गायब हो जाये जैसे रस्सी में सांप, सांप दिख रहा था बड़ा भय हुआ लेकिन जब विचारपूर्वक उसके पास जाकर देखा तो रस्सी थी सांप था ही नहीं, यदि सांप होता तो पास जाने पर भी दिखता, किन्तु वह था ही नहीं, मिथ्या असत भासित हुआ, भासित वस्तु की अपनी सत्ता होती ही नहीं है, वैसे ही सर्दी-गर्मी, कौमार्य, जवानी बुढापा एवं जन्म और मृत्यु का विचार करने पर यह कुछ सिद्ध ही नहीं होता है जबकि इन सभी परिस्थितियों में भी आत्मा सदा सर्वदा एकरस है, यही तत्त्वदर्शियों द्वारा देखा अर्थात अनुभव किया गया है का अन्तर्भाव है । इसमे शरीरादि की सत्ता कभी भी विद्यमान नहीं हुई और आत्मा कभी अविद्यमान नहीं हुआ यही आत्मदर्शन है और आत्मदर्शी कभी शोक को प्राप्त नहीं होता, यह भाव है ॥१६॥
           भावार्थ—जो सत् असत् को विवेक पूर्वक जानता है वही शोक रहित सर्वान्तरात्मा में एक रस स्थित है ॥१६॥

            संबंध— पूर्व में सत् का कभी अभाव नहीं होता अर्थात सत्स्वरूप आत्मा नित्य होने से अविनाशी बताया गया है । अतः अविनाशी किसे कहा गया है यह बताते हैं…..
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥२/१७॥
               शब्दार्थ— जिससे सम्पूर्ण जगत व्याप्त है उसे अविनाशी जान । चूंकि वह अव्यय है इसलिये उसका नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है ।
           तात्पर्यार्थ— यहाँ आया हुआ ‘येन सर्वमिदं ततम्' ‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्' ७/५, ‘जीवनं सर्वभूतेषु' ७/९, ‘बीजं मां सर्वभूतानाम्' ७/१०, के साथ एकात्मकता को प्राप्त है । इसी येन सर्वमिदं की पुष्टि ‘अहमात्मा' १०/२०, ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' १३/२ में स्पष्ट होता है ऐसा होने पर ‘येन सर्वमिदं ततम्' ८/२२ एवंं ‘येन सर्वमिदं ततम्' १८/४६ इत्यादि में जिसका वर्णन है वही यहाँ पर ततम् करके जिसे कहा गया है, वही अविनाशी, नित्य, शाश्वत, अखण्डानन्दैकरस जो सबका सर्वात्मा है, वह अव्यय अर्थात कभी भी, किसी भी काल में जिसका व्यय हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं, उसका कोई नाश कर सकता भी नहीं । ऐसा जो सर्वात्मा है जिसे अहं करके जाना जाता है वह अविनाशी ब्रह्म ही है जिसे ‌श्रुतियां ‘अहं’ ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म इत्यादि करके कहती हैं ।
             अथवा इस आत्मा की विशेषता यह है कि आत्मा अव्यय है अव्यय का विनाश त्रिकाल में भी संभव नहीं है । क्योंकि विनाश के लिए कोई न कोई स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर चाहिए जबकि वह अशरीरी है, अशरीरी का नाश संभव नहीं है, इसलिये वह अविनाशी है शेष लक्षण आगे बताये जायेंगे ।
             यहां एक बात और स्पष्ट समझ लेना चाहिए येन सर्वमिदं ततम् यह वाक्य यहां ‘त्वं’ का लक्ष्यार्थ आत्मा है जबकि अध्याय ८/२ में विराट और १८/४६ में निर्विशेष ब्रह्म कहा गया है । सबके एक ही लक्षण यहां उपस्थित हैं तो यहां यह समझना है कि आत्मा, ईश्वर और ब्रह्म भिन्न भिन्न है या एक ही हैं ? दूसरी बात यहां जीव ही संपूर्ण जगत में व्याप्त बताया गया है और इसकी पुष्टि ‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ ७/५ परा प्रकृति रूप से करते हैं, जबकि इसी जीव को अध्याय १३/१ में क्षेत्रज्ञ कहते हुए वह क्षेत्रज्ञ १३/२ ‘मैं’ हूँ कहते हैं । चलो यहाँ भी १३/२ पर कोई विवाद कर सकता है अतः आगे बढते हुए देखते हैं ‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’ १५/१३ एवं ‘यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः’ १५/१७ ये सभी लक्षण इकट्ठे करने पर जीव ही ईश्वर है या ईश्वर ही जीव है ? क्या कहेंगे ? क्योंकि या तो जीव ही संपूर्ण जगत को धारण करेगा या फिर ईश्वर, क्योंकि एक ही जगत के दो धारक— नियंता हो नहीं सकते यानी दो सत्ताएं नहीं हो सकती हैं । यहाँ सिर्फ इतना कहूंगा कि यही प्रमाण गीता के हैं जो आत्मा से भिन्न किसी ईश्वर या ईश्वर से भिन्न किसी आत्मा के त्रिकाल में भी न होने का दावा करते हैं । यही केवलाद्वैत है । शेष विचार अध्याय ७/५ में ।
          भावार्थ— उपरोक्त के अनुसार जब तत् अर्थात वह करके जिस परमात्मा को जाना जाता है, वही क्षेत्रज्ञ अर्थात अहं प्रत्यय है, तो फिर अविनाशी ब्रह्मत्त्व जो है वही मैं हूँ । मेरा विनाश कभी हो सकता नहीं, ऐसी स्थिति में निरन्तरता शोक मोह से रहित अखण्डानन्दैकरस का पान करती है ।
              यहां यह बात कभी नहीं भूलना चाहिए कि जीव ब्रह्म नहीं बल्कि ब्रह्म ही जीव है, जैसे घड़ा मिट्टी नहीं है, और मिट्टी भी घड़ा नहीं है तथापि मिट्टी ही घड़ा की उपाधि धारण करके स्थित है । इसी प्रकार जीव ब्रह्म नहीं है और ब्रह्म जीव नहीं है बल्कि जीव माया के आश्रित ब्रह्म की एक उपाधि है । अध्याय १३/२२देखें ॥१७॥

                संबंध—  माना कि जीव ब्रह्म की उपाधि है किन्तु जो इस भाव का अधिकारी नहीं है वह तो शोक करेगा ही ?....
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य  तस्माद्युध्यस्व भारत ॥२/१८॥
               शब्दार्थ— हे भारत ! ये सभी शरीर नाशवान हैं और इसमें रहने वाला जीवात्मा अविनाशी एवं अप्रमेय है, इसलिये भी युद्ध अर्थात उपस्थित कर्तव्य का पालन कर ।
            तात्पर्यार्थ— कहते हैं कि ‘इमे’ करके जितने शरीर हैं उसमें जो आत्मा है उसका किसी भी प्रकार विनाश संभव नहीं है । विनाश उसका होता है जो सावयव हो, निरवयव का विनाश होता नहीं । सावयव न होने से उसका उसके अतिरिक्त दूसरा कोई प्रमाण भी नहीं,  तो विनाश का प्रश्न भी कैसे उपस्थित हो सकता है ? अतः वह आत्मा नित्य है यह तो मानना ही पड़ेगा ।
           क्योंकि नाश तो मृगमरीचिका के जल का होता है, रस्सी के सर्प का होता वस्तुतः जो चीज है ही नहीं तो नाश भी कैसे बन सकता है ? किन्तु जिस भ्रम से यह सब भासित हो रहा उसी भ्रम से स्वप्न की तरह नाश भी हो जाता है, वैसे ही जिनके नाश के विषय में विचार कर रहे हो वे नित्य एवं अविनाशी हैं, वे अप्रयेय हैं अर्थात वे मात्र आत्मा हैं जिसे किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं नहीं किया जा सकता है बल्कि वे स्वयं सिद्ध हैं और जिन शरीरों को लेकर तुम शोक कर रहे हो वे नाशवान हैं ही, जो नाशवान है वह नष्ट होगा ही, अतः शोक का त्याग करके युद्ध करो ।
            इसलिये यहाँ युद्ध करो से यह कहा गया है कि हमने जीव के नित्यत्व और शरीरों के अनित्यत्व के विषय में युक्ति से समझाया है, आपको समझ में आ गया हो तो युद्ध में लग जाओ । यह आज्ञा नहीं बल्कि समझाने की यह एक युक्ति की पूर्णता है । इस माध्यम से जीव की निर्विकारता का वर्णन किया गया है 
         भावार्थ— मुमुक्षु यदि रोगादि शत्रुओं से आक्रांत हो तो भी आत्मभाव से विचलित न हो कर आत्मभाव में स्थित होकर अपने आश्रम धर्म के अनुसार भिक्षादि कृत्य करते हुए स्वयं से स्वयं में स्थित रहने का अभ्यास रूप युद्ध करता रहे ॥२/१८॥

                 संबंध— यदि मुमुक्षु अनात्म दोष से भयभीत होकर स्वयं को जन्मने मरने वाला मानता है तो….
य  एनं  वेत्ति  हन्तारं यश्चैनं  मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥२/१९॥
            शब्दार्थ— जो इस आत्मा को मरने मारने वाला मानते हैं वे दोनो ही नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा न तो मरता है‚ न मारता है ।
           तात्पर्यार्थ— यहाँ श्रीभगवान ने ‘वेत्ति’ का अर्थ जो मरने मारने वाला जानने के लिए कहा है, इसे अविद्या ग्रस्त अज्ञान की चरमसीमा कहते हैं कि वे दोनो अज्ञानी हैं इसी अज्ञानमय मृत्यु के कारण ही पाप-पुण्य की कल्पना हो जाती है । जैसा कि अर्जुन ने ‘पापमेवाश्रयेदस्मान्' १/३६-४५ तक कहा है । यही कल्पना भय का हेतु है आत्मा का नाश होने के लिए कोई न कोई अवयव अर्थात शरीर चाहिए, जबकि वह निरवयव है, शरीर है तो क्रिया है, कर्म रूप विकार है, जबकि वह निर्विकार है । शरीर होने से अन्तवाला होगा जबकि आत्मा अनन्त है इत्यादि । अतः वह ‘साक्षी चेतो केवलो निर्गुणश्च' श्रुति प्रमाणित है । अगर श्रुति का श्रवणादि प्रमाण उपेक्षित करके आत्मा को मरने मारने वाला मानता है तो जैसे कोई स्त्री मृतपुत्र को जन्म देकर मात्र पीड़ा सहती है लाभ कुछ नहीं, वैसे ही ब्रह्मचर्य, संन्यास, वेदाध्ययन आदि सब परिश्रम मात्र कष्ट उठाने के लिए ही है । कोई लाभ नहीं । अर्थात जो आत्मा को मरने मारने वाला मानते हैं उनके लिए श्रुति-शास्त्र का अध्यायन बन्ध्यापुत्रवत् व्यर्थ है ।
             भावार्थ— श्रुति वचनों को प्रमाण मानकर कि आत्मा नित्य, शाश्वत, निर्विकार आदि है, ऐसा समझकर आत्मा की क्रिया और कर्म से कोई संबंध रहित एवं निर्विकार रूढ़ता में स्थिर होकर शोक नहीं करना चाहिए ॥१९॥

              संबंध— अब आत्मा के निर्विकार स्वरूप का वर्णन करते हैं…..

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः  शाश्वतोऽयं पुराणो न  हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२/२०॥
            शब्दार्थ— यह आत्मा न कभी जन्मता है, न मरता है, न कभी उत्पन्न हुआ था, न होगा और और न ही उत्पन्न हो सकता है । यह आत्मा अज, नित्य शाश्वत एवं पुराण है । अतः शरीर नष्ट होने पर भी न तो मरता है और न ही किसी को मारता है ।
        तात्पर्यार्थ— यहाँ आत्मा के निर्विकारित्व का वर्णन किया गया है कि जब जन्म ही नहीं हुआ तो मृत्यु भी कैसे हो सकती है ? यहाँ जन्म मृत्यु रूप विकार के बीच में चार विकार और समझ लेना चाहिए, जन्म न होने से आत्मा शरीर वाला है ऐसा जो अस्ति भाव है वह भी नहीं होगा । जैसे देवदत्त का पुत्र है यह कहने में पुत्र तो दिख नहीं रहा है किन्तु ‘है’ कहने से उसके होने का ज्ञान हो रहा है कि यहाँ नहीं है तो कहीं और होगा लेकिन है, यहाँ जो है नाम की सत्ता है वह आत्मा के अशरीरी होने के कारण अस्ति यानी है भाव को प्राप्त नहीं होता है, और जब जन्म नहीं है नहीं तो वृद्धि नाम का तीसरा विकार भी नहीं हो सकता है, जिस वृक्ष का बीज ही नहीं, अंकुर भी नहीं तो बढ़ेगा कैसे ? इन तीनो विकारों के न होने से परिणाम दाढी, मूछ, रोग आदि भी संभव नहीं है और जब परिणाम ही जिसका नहीं तो उसका अपक्षय अर्थात जीर्णशीर्ण हो जाना वृद्ध हो जाना भी नहीं बनता है तो फिर छठा विकार मृत्यु भी कैसे हो सकती है । इस प्रकार जो षड्विकारों से रहित है वह न तो तीनो कालों में मर सकता है और न ही मारा जा सकता है यह भाव है ।
            भावार्थ — जिसके जान लेने मात्र से जन्मादि विकारों से रहित हो जाता है अथवा जो स्वयं अज है ऐसा वह आत्मा ही मैं के रूप में प्रतिभासित हो रहा है । अर्थात जिसे यह आत्मा कहा जाता है वह आत्मा और कुछ नहीं ब्रह्म ही है ॥२०॥

          संबंध— जिसे तुम मरने मारने वाला मानते हो वह उस अविनाशी में संभव ही नहीं है यह बताते है……
वेदाविनाशिनं  नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२/२१॥
           शब्दार्थ— इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अज, और अव्यय करके जो जानता है, हे पार्थ ! उस पुरुष को कैसे और किस प्रकार कोई मार सकता है ? अथवा वह किसको मार सकता है ?
               तात्पर्यार्थ— यहाँ आत्मा को हर प्रकार से नित्यानन्दैकरस, अव्यय इत्यादि बताया गया है, जिसकी इस अव्यय भाव में स्थिति हो चुकी है, कब किससे और कैसे मारे, मरे ? अर्थात वह षड्विकारों का त्याग करके स्वयं से स्वयं में स्थित सर्वत्यागी संन्यासी है, जन्मादि विकारों का त्याग अर्थात इनसे ऊपर वही हो सकता है ।
           अथवा उपरोक्त जन्म मृत्यु रूप विकार से रहित कहा गया उसी का स्पष्टीकरण करते हैं, अज यानी जो जन्म रूप विकार से रहित है, नित्य यानी जो एक रस है जिसमें न तो वृद्धि होती है और न ही कोई दाढी मूछ आदि परिणाम होते हैं, अव्यय यानी उसमें अपक्षय रूप में शरीर का निर्बल होना वृद्धि होना आदि न होना, अविनाशी यानी मृत्यु रहित । इस प्रकार आत्मा षड्विकारों से रहित है, अतः वह न तो कर्ता हो सकता है और न ही उसका किसी क्रिया या कर्म से संबंध ही हो सकता है तो फिर वह किस प्रकार किसी को मारे या मरवायेगा ? अर्थात आत्मा में यह सब संभव ही नहीं है । यह भाव है ।
           भावार्थ— ‘अहं’ भाव में प्रतिष्ठा अर्थात मैं ब्रह्म हूँ यही भाव तत्त्ववेत्ता का है अर्थात आत्मा का कर्ता कर्म क्रिया से कोई संबंध न होना ही सर्वकर्मसंन्यास सिद्ध होता है ॥२१॥

            संबंध— निर्विकार आत्मा किसी भी प्रकार विकारी नहीं हो सकता है उसका उदाहरण देते हैैं……
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय  जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥१/२२॥
              शब्दार्थ— जैसे मनुष्य के वस्त्र बदलने पर मनुष्यत्व में कमी नहीं आती, प्रत्येक बदले वस्त्र में एक वही होता है, वैसे ही यह आत्मा अनेकों शरीरों में भ्रमण करता हुआ भी एक वही रहता है । उसके अजत्व, निर्विकारत्व आदि में कोई कमी नहीं होती, क्योंकि वह षड्विकारों से रहित है ।     
         तात्पर्यार्थ— यहाँ मूल में जीर्णानि शब्द आया है, इसलिये जीर्ण शरीर का अर्थ पुराना शरीर नहीं कहा जा सकता है क्योंकि पुराना तो तब होगा जब वृद्धावस्था आयेगी । आज के समय में वृद्धावस्था आयेगी ही इसकी क्या गारंटी ? महाभारत आदि में भी कितने ही किशोरों को मार दिया गया । आज के समय में भी पता मिला कोई बच्चा ही दिल का दौरा पड़ने से मर गया, कोई नौजवान मर गया ये शरीर पुराने या वृद्ध नहीं कहे जा सकते । मेरी माँ ने मुझे जब सन्न्यास के लिए अपने जीवन भर के लिए रोकना चाहा, तो मैने कहा कि ठीक है मां ! आप हमें इस बात का विश्वास दिला दो कि जब तक तुम जीवित रहोगी तब तक मैं नहीं मरूंगा, मां का उत्तर था इतनी गारंटी मैं नहीं ले सकती । अतः यहां जीर्ण का अर्थ है जिस काल में जीवात्मा के रहने के अनुकूल शरीर की स्थिति रोग के कारण या शरीर के शस्त्रादि से क्षतविक्षत हो जाने के कारण, या और भी बहुत से कारणों से शरीर का अपक्षय हो जाने पर उसके अनुकूल न होने की दशा में शरीर बदल देना यह भाव बनता है ।
          भावार्थ— यह भाव ही अनासक्त कर्मयोगी का लक्षण है और इस भाव में स्थित संन्यासी का लक्षण है ॥२२॥

            संबंध— वस्त्र की तरह शरीर बदलने से आत्मा में परिवर्तन नहीं होता, लेकिन शास्त्र, अग्नि, वायु, पानी आदि तो बड़े भयंकर होते हैं ये तो कुछ भी कर सकते हैं ? इस पर कहते हैं…..

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न  शोषयति मारुतः ॥२/२३॥
                शब्दार्थ— इस आत्मा का शस्त्र छेदन नहीं कर सकते, आत्मा को अग्निजला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकता ।
           तात्पर्यार्थ— उपरोक्त शस्त्रादि चारों पदार्थ पृथ्वी सहित चारों भूत हैं । ये स्थूल हैं और स्थूल के द्वारा ही स्थूल का नाश होता है, सूक्ष्म का नहीं । नाश होने के लिए अवयव अर्थात शरीर चाहिए जबकि वह निरवयवी है, इसीलिये आत्मा का कोई स्पर्श भी नहीं कर सकता, छेदन आदि की तो बात ही क्या ? आकाश निरवयव है वही आकाश आदि चारों भूतों को सत्ता देता है, लेकिन क्या ये चारों भूत आकाश का स्पर्श भी कर सकते हैं ? नहीं न ? तो फिर आत्मा तो आकाश को भी सत्ता देने वाला महाकाश है फिर उसको कोई क्षति कैसे पहुंचा सकता है ?
            अथवा ये शस्त्र, अग्नि, पानी और वायु सावयव हैं अतः अवयव यानी शरीर तक ही इनकी गति है, स्वसंवेद्य आत्मा तक नहीं क्योंकि वह निरवय है । अगर ये निरवयव के साथ अपने इस प्रभाव में सफल होते तो आकाश काट दिया गया होता, अग्नि आकाश को अब तक जला चुका होता, पानी ने आकाश को डुबा दिया होता और वायु ने सुखा दिया होता किन्तु ऐसा हुआ नहीं और न हो रहा है एवं हो सकता भी नहीं । जब स्थूल आकाश का ये कुछ बिगाड़ नहीं सके तो आकाश का भी आकाश आत्मा के साथ इनकी गति या कोई क्रिया हो भी कैसे सकती है ? यह अशरीरी होना ही आत्मा के निर्विकारता का रहस्य है ।
         भावार्थ— इसप्रकार आत्मा को जानकर मुमुक्षु को आत्मभाव अर्थात मैं ब्रह्म हूँ के भाव में स्थित हो जाना चाहिए ॥२३॥
              
                संबंध— ऐसा शस्त्रादि क्यों नहीं कर सकते ? इस पर कहते हैं……
अच्छेद्योऽमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः  सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं  सनातनः ॥२/२४॥
            शब्दार्थ— यह आत्मा अछेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य एवं अशोष्य है, यह आत्मा नित्य, सर्वगत, स्थाणुवत् स्थिर और सनातन है ।
           तात्पर्यार्थ— यहाँ पर पूर्वार्ध में आत्मा के अकाट्य आदि का कारण बताया गया है और उत्तरार्ध में  न जायते म्रियते २/२० का अनुवाद । शंका हो सकती है कि यह तो पुनरावृत्ति दोष होता है फिर पुनरावृत्ति क्यों की ? तो इसका उत्तर आगे आश्चर्यवत्पश्यति २/२९ में देंगे, अभी यहाँ इतना समझना चाहिए कि आत्मा अत्यंत कठिनता से समझ में आती है इसलिए प्रकारान्तर शैली का आश्रय लेकर पुनः पुनः समझाना दोष नहीं है, क्योंकि किसी विधि से समझ में आये पर समझ में आना चाहिए । यहाँ पर शस्त्र आदि का प्रभाव आत्मा में क्यों नहीं होता ? इसके लिए बताया कि पहली बात वह नित्य है जबकि शस्त्र, अग्नि आदि अनित्य हैं दूसरी बात यह कि आत्मा सर्वगत है, सर्वगत होने के कारण आकाश रूप भी वही है और स्थूल शस्त्र आदि भी वही और उन उन की क्रिया भी वही है क्योंकि सर्वगत है अतः वह आत्मा ही इन सबकी सत्ता है, अतः आत्मा स्वयं से स्वयं का नाश कैसे कर सकती है ? तीसरी बात वह ठूंस की तरह अचल है क्योंकि वह सर्वगत देशकाल अपरिच्छिन्न है और हिलने के लिए उससे भिन्न स्थान चाहिए जो है ही नहीं‚ तो हिलेगा कैसे ? इसलिये भी शस्त्र आदि अन्य क्रिया उसमें संभव नहीं है । चौथी बात वह सनातन यानी अनादि है । नाश उसका होता है जिसका आदि हो, उत्पत्ति हो किन्तु आत्मा का कोई आदि नहीं है, क्योंकि वह स्वयं सबका आदि है तो अन्त कैसे होगा ? इस प्रकार दुर्विज्ञेय आत्मतत्त्व को निर्विकार कहा गया है ।
            विशेष बात यह है कि यहाँ पर आत्मा को शरीरी या देही नहीं कहा गया बल्कि सर्वगत कहा गया है । मतलब स्वसंवेद्य आत्मतत्त्व का अपने सर्वगत भाव में शरीर भाव त्यागकर स्थित होना ही मोक्ष है ।
          संक्षेप में उपरोक्त संसाधन भी इस आत्मा को कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते इसलिये वह नित्य है, नित्य होने के कारण सर्वगत अर्थात व्यापक है, व्यापक होने के कारण ही पर्वत के समान स्थिर है, स्थिर होने के कारण ही सनातन अर्थात अनादि है ।
        भावार्थ— न जायते म्रियते वा कदाचिन् २/२० में जिस छः विकारों से रहित आत्मा का वर्णन किया गया था उसका स्पष्टीकरण यहाँ कर दिया गया ॥२४॥

          संबंध—  ठीक है, मान लिया कि आत्मा उपरोक्त स्थूल भूतों का विषय नहीं बन सकता लेकिन मन बुद्धि तो सूक्ष्म हैं इनका विषय तो बन ही सकता है ? इस पर कहते हैं…..
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं     विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२/२५॥
             शब्दार्थ— इस आत्मा को अव्यक्त, अचिन्त्य, एवं अविकारी कहा गया है, इसलिए इस आत्मा को जैसा ऊपर कहा गया है वैसा जानकर तू शोक करने योग्य नहीं है । अर्थात शोक को त्याग दे ।
              तात्पर्यार्थ— यह आत्मा बुद्धि द्वारा निश्चित की गई वाणी द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता इसीलिये अव्यक्त है, अव्यक्त होने के कारण मन द्वारा चिन्तन भी नहीं किया जा सकता अतः अचिन्त्य है ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' । आत्मा जन्मादि छः विकारों से रहित है, अतः अविकारी अर्थात निर्विकारी है । इस प्रकार आत्मा को जानकर आत्मभाव अर्थात मैं जन्मने मरने वाला नहीं, बल्कि मैं अज, नित्य, शाश्वत, नित्यानन्दैकरस 'तत्' पद से कहा जाने वाला 'त्वं' पद का लक्ष्यार्थ जिसकी ‘असि’ मात्र सत्ता है वही ब्रह्म मैं हूँ । ऐसा जानकर संपूर्ण शोक का त्याग कर दे ।
            भावार्थ— वासांसि जीर्णानि २/२२ में जो आत्मा के जन्मादि विकारों निषेध किया गया था, किन्तु सूक्ष्म शरीर रूप में विकार का भ्रम हो सकता था अतः उसका यहाँ निराकरण किया गया ॥२५॥

          संबंध— अशोच्यानन्वशोचस्त्वं २/११ प्राण शब्द से संबोधित करके जिस आत्मा का संकेत किया था उसी का विस्तार वेदाऽविनाशिनं नित्यं २/२१ तक विस्तार पूर्वक वर्णन किया, किन्तु अधिकारत्व की दृष्टि से अर्जुन को समझ में नहीं आया, अतः वासांसि जीर्णानि २/२२ का वर्णन करके सूक्ष्म शरीर भाव उत्पन्न न हो जाये, अतः अव्यक्तोऽयम् २/२५ के रूपक से समझाया । प्रत्येक आचार्य चाहता कि हमारा शिष्य शीघ्र लक्ष्य की चरमसीमा को प्राप्त कर ले, अतः पहले चरमतत्त्व का उपदेश करता है और जब समझ में नहीं आता तब निम्न स्तर पर आ जाता है । जैसे माँ बच्चे को शुद्ध दूध न पचने पर पानी मिलाकर देती है यही श्रीभगवान ने किया । अर्जुन को यह परम तत्त्व समझ में नहीं आया जानकर लोकदृष्टि से उपदेश करते हैं……
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि  त्वं महाबाहो  नैवं शोचितुमर्हसि ॥२/२६॥
                शब्दार्थ— हे महाबाहो ! यदि इस आत्मा को जन्मने मरने वाला भी मानते हो तो भी इस आत्मा को लेकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ।
          तात्पर्यार्थ— ‘अथ’ शब्द से पूर्वोक्त प्रकार से यदि आत्मा को नित्य शाश्वत निर्विकार अजन्मा आदि लक्षणों वाला नहीं मानता है ‘तो भी’ का कथन है अर्थात उन उन लक्षणों के विरुद्ध भी नित्य जन्मने मरने वाला मानने पर भी शोक का कोई प्रसंग ही उपस्थित नहीं होता है ॥२६॥

            संबंध—  उपरोक्त लौकिक दृष्टान्त देकर उसकी पुष्टि करते हैं…..
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्ममृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे  न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२/२७॥
          शब्दार्थ— जन्मने वाले की मृत्यु और मरने वाले का जन्म निश्चित और अपरिहार्य है इसलिये भी शोक नहीं करना चाहिए ।
           तात्पर्यार्थ— जो जन्म मृत्यु अटल है उसे टाला तो जा नहीं सकता और उसके विषय में देवत्त मर गया, यज्ञदत्त मर गया आदि का शोक क्यों करना ? अतः इस अटल होनी के कारण भी शोक नहीं करना चाहिए ॥२७॥

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव   तत्र का परिदेवना ॥२/२८॥
            शब्दार्थ— क्योंकि यह आत्मा जन्म से पहले अव्यक्त था अब यह प्रकट है और मरने के पश्चात फिर अव्यक्त में लीन हो जायेगा । अतः इसके विषय में क्या शोक करना ?
              तात्पर्यार्थ— जो आदि में अव्यक्त यानी नहीं था और अन्त में भी अव्यक्त अर्थात नहीं होगा ऐसा आंखों को धोखा देने वाला ही मध्य में प्रकट हुआ सा दिखता है, ऐसे मायामय शरीरों के प्रकट नाश में क्या हर्ष और क्या शोक ? अर्थात ये दोनो ही अनुचित हैं । अर्जुन ने पिता, पितामह, पुत्र पौत्रादि संबन्धियों भीष्म, द्रोण को अलग से भी शोक का हेतु बताया था, यहाँ पर ये नाम रूप लेकर प्रकट हुए हैं वे पहले कहाँ थे और बाद में कहाँ रहेंगे ? इसप्रकार विचार पूर्वक शरीरों का अनित्यत्व समझकर आत्मनिष्ठ मोक्षाकांक्षी को शोक करना उचित नहीं है ॥२८॥

            संबंध— श्रीभगवान ने जो पहले आत्मा का स्वरूप बताया और अब उसको मध्य में प्रकट बताकर अव्यक्त बता रहे हैं, किन्तु यहाँ तो आत्मा कुछ और समझा जाता है । यह भी आश्चचर्यमय है कि आत्मा को कोई विरला ही जानता है , इस पर कहते हैं….
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति  तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद चैव कश्चित् ॥२/२९॥
               शब्दार्थ— इस आत्मा को कोई ही आश्चर्य के समान देखता है, आश्चर्य के समान कोई ही कहता है आश्चर्य के समान कोई ही सुनता है और आश्चर्य तो यह भी है कि कोई तो सुनकर भी नहीं जान पाते ।
         तात्पर्यार्थ— यहाँ आत्मा का दुर्विज्ञेयत्व बताया गया है । आश्चर्य इस बात का कि हम जिस स्वरूप को आत्मा शरीर इन्द्रिय सहित कार्यकरण संघात के सहित जानते थे विचार करने पर तो वह कुछ और ही निकला, इसी को आगे ‘यततामपि सिद्धानां कश्चित् वेत्ति तत्त्वतः’ ७/३, ‘पश्यन्ति ज्ञान चक्षुषा’ १५/१० कहेंगे । यहाँ पर मानो भगवान यह कह रहे हैं कि आत्मा के स्वरूप को जानने वाले और वक्ता दुर्लभ होने पर भी मैं दोनो रूप से तेरे सामने ही उपस्थित हूँ और श्रोता दुर्लभ होने पर भी तू श्रोता तो है लेकिन कुछ समझ में भी आ रहा है या नहीं ? 
         भावार्थ—यहाँ आत्मा के अत्यंत दुर्बोधत्व का बोध कराया गया है जिसके विषय में ७/३ में पुनः बताएंगे ॥३॥

            संबंध— उपरोक्तानुसार दुर्विज्ञेय आत्मा का नाश किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता है यह बताते हैं…..
देही  नित्यमवध्योऽयं   देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२/३०॥
             शब्दार्थ— देही अर्थात देहाभिमानी जीव उपाधि धारण करने वाला आत्मा सभी शरीरों में रहता है वह नित्य और अवध्य है, इसलिये सामने खड़े शरीरों का तुम शोक करने योग्य नहीं हो ।
              तात्पर्यार्थ— इस प्रकार दुर्विज्ञेय आत्मा के लिए कि मैं मारने वाला हूँ और भीष्म आदि मरने वाले हैं, ऐसा सोचकर शोक मत कर । क्योंकि ये मरना-मारना भी  प्रकृति का यही गुण है । अतः गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं यह आगे भी ३/२८ बताऊंगा, अभी तो इतना समझ ले कि आत्मा अकर्ता है, अतः अशोचनीय है ।
               सभी शरीरों का मतलब ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त चेतन एवं जड़ शरीरों में स्थित होकर भी वह सबसे निर्लिप्त होने से नित्य और नित्य होने से अवध्य है ॥३०॥

               समीक्षा— श्लोक ग्यारह से लेकर यहाँ तक ‘त्वं’ पदार्थ के लक्ष्य आत्मतत्त्व का वर्णन किया गया है । श्लोक ग्यारह में अशोच्यानन्वशोचस्त्वं से बताया गया है कि संसारासक्त जीव कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो जाये, कितना भी बड़ा शास्त्री, आचार्य और पण्डित क्यों न हो जाये अन्त में उसका हर विश्लेषण होगा तो अपने स्वार्थ के आधार पर ही । संसारी भाव की रक्षा करते हुए ही जैसे कि अर्जुन ने अध्याय १/३० से लेकर अध्याय २/८ तक विश्लेषण करके और स्वयं निर्णय भी ‘युद्ध नहीं करूंगा’ २/९ का निर्णय भी दे दिया । इसके बाद संपूर्ण प्राणियों में मैं तू और यह का जो व्यवहार होता है वह एक मात्र आत्मा को लेकर होता है इसलिए मैं तू और यह मैं के अर्थ में ही त्रिपुटी को बाधित करके आगे आत्म स्वरूप की नित्यता और निर्विकारता पर विचार करते हुए हुए नित्य ही आत्मा सर्वगत मोक्षस्वरूप और उसकी दुर्विज्ञेता का वर्णन करते हुए उसके जानने वालों को भी दुर्लभ जैसा बताया । यह सर्वकर्मसंन्यास की दृष्टि से भी कहा और जो जन्मने और मरने वाला भी आत्मा को मानते हैं उस दृष्टि से भी आत्मा के नित्यत्व पर विचार प्रकट करते हुए शोक रहित हो जाने की बात कही जिसमें सुख दुःखादि आने जाने वाले सभी अस्थाई विकारों को सहन करने के लिए कहते हैं यही सहन शक्ति यानी तितिक्षा ही आत्मतत्त्व को समझने और उसमें स्थिर होने का साधन भी बताया । इन साधनों के माध्यम से परिवर्तनशील अनात्मा के परित्याग पूर्वक आत्मसाक्षात्कार करके शोक रहित होना ही इन बीस श्लोकों का लक्ष्य है ॥११-३०॥

              संबंध— पूर्वोक्त परमार्थ दृष्टि से भी शोक नहीं करना चाहिए ऐसा भी नहीं है, अपितु लोक दृष्टि से भी…...
स्वधर्मपि   चावेक्ष्य न    विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२/३१॥
               शब्दार्थ— अपने धर्म को देखकर भी प्रकंपित होने के योग्य नहीं है, क्योंकि क्षत्रिय के लिए युद्ध के अतिरिक्त और कोई दूसरा श्रेष्ठ धर्म ही नहीं है ।
              तात्पर्यार्थ—  कर्म से चित्त शुद्धि होती है, अतः पूर्वोक्त जो ब्रह्मत्त्व में प्रतिष्ठित नहीं हैं उन्हें स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, ब्राह्मणादि वर्ण, ब्रह्मचर्यादि आश्रम आदि में जिसका जो स्वधर्म है उसका पालन करने से ही चित्तशुद्धि और चित्तशुद्धि से ही ब्रह्मत्त्व में प्रतिष्ठा होती है ऐसा श्रीभगवान  भी आगे १८/४६ कहेंगे । अतः स्वधर्म कितना भी बीभत्स या सौम्य हो, भय या हर्ष न करते हुए कर्तव्यत्वेन स्वधर्म है, इसलिए बिना प्रकंपित हुए स्वधर्म श्रेष्ठ युद्ध करना ही चाहिए ।
         यहाँ क्षत्रिय धर्म की स्पष्ट बात लोकदृष्टि से कही गई क्योंकि धर्म को आगे करके प्राप्त युद्ध और प्रजापालन ही क्षत्रिय का पहला धर्म है, यज्ञादि गौड़ हैं । यहाँ क्षत्रिय से जो जिस क्षेत्र में जिस स्थान और कर्तव्य कर्म में स्थित है उसका निःस्वार्थ रूप से विधिवत पालन करना ही धर्म है, जैसे सन्न्यासी को प्रेसमंत्र लक्षित निष्ठा ही उसका कर्तव्य है इससे बढकर कोई भी अन्य उपासना, साधना कल्याणकारी नहीं हो सकता है यह भाव है ।
         भावार्थ— प्रत्येक को अपना स्वाभाविक प्राप्त कर्म कर्तव्य है ऐसा समझकर प्रत्येक दशा में करना युद्ध ही है, यह भाव है ॥३१॥
                   
                संबंध— प्रत्येक दशा में युद्ध क्यों करना चाहिए ?…..
यदृच्छया    चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । 
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२/३२॥
                 शब्दार्थ— हे पार्थ ! इस प्रकार का बिना प्रयत्न किये अपने आप खुले हुए स्वर्गद्वार वाला युद्ध प्राप्त करके तो क्षत्रिय सुखी होते हैं ।
               तात्पर्यार्थ— स्वतः प्राप्त प्रजा रक्षार्थ-कल्याणार्थ कर्म यदि बीभत्स भी हो तो भी जनहित के लिए किये जाने वाला कर्तव्य कर्म स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला होता है । मुमुक्षु को स्वाभाविक नैष्कर्म्य पर अधिकार है । उसे हर परिस्थिति में स्वधर्म पालन करना ही चाहिए ॥३२॥

            संबंध— यदि पूर्वोक्त कर्तव्यकर्म नहीं करता है तो…..
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं  न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥२/३३॥
                शब्दार्थ— ऐसा जानकर भी इस धर्ममय युद्ध को नहीं करोगे तो स्वधर्म और यश का नाश करके पाप को प्राप्त करेगा ।
             तात्पर्यार्थ— मुमुक्षु को स्वधर्म प्राप्त कल्याणमय कर्तव्य में प्रमाद बिल्कुल नहीं करना चाहिए । यही मुमुक्षु का युद्ध है । क्योंकि आज हम नहीं करेंगे तो कल कोई और, परसों कोई और....., इस प्रकार अनर्थ परंपरा ही चल पड़ेगी जैसा कि आज दिख रहा है । हमने विरजा होम पूर्वक पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा नामक वासनाओं का ‘अभयं सर्वभूतेभ्यः ददाम्येतत् व्रतं मम'  का वेद मंत्रों से वेदों और साक्षात नारायण को साक्षी करके व्रत लिया है । अगर वह नहीं करेंगे तो संन्यास रूप स्वधर्म का नाश करके हम पाप के भागी अवश्य बनेंगे । सर्वत्याग रूप जो स्वधर्म की प्राप्ति हुई है वह भी नष्ट हो जायेगा ॥३३॥

                  संबंध— इतना ही नहीं….
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्यायम् ।
संभावितस्य            चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥२/३४॥
              शब्दार्थ— इस अपकीर्ति की सभी प्राणी(मनुष्य) अव्यय गाथा को बारंबार गायेंगे कि तेरी या उसकी ऐसी ऐसी पलायनमय गाथा है । यह अपकीर्ति तो किसी भी शिष्टजन के लिए मृत्यु से बढ़कर है ।
             तात्पर्यार्थ— जो स्व-स्थानीय स्वधर्म अर्थात स्व-कर्तव्य का पालन अर्थात स्वधर्म का पालन नहीं करता वह मृत्यु पर्यंत निंदा का पात्र होता, शिष्टजनों के लिए यह क्लेश मृत्यु से भी बढ़कर है ।
                 भावार्थ— कर्तव्य का पालन न करनेवाले का लोक परलोक सब नष्ट हो जाता है ॥३४॥

                  संबंध— इतना ही नहीं……
भयाद्रणादुपरतं   मंस्यन्ते त्वां   महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२/३५॥
             शब्दार्थ— प्रतिपक्षी लोग यही कहेंगे कि भय के कारण पलायन कर गया, जो तुम्हें कर्तव्य पालन में अत्यन्त दृढ़ समझते थे उनके बीच तू लघुता को प्राप्त करेगा अर्थात ये लोग अपमानित करेंगे ।
              भावार्थ— कोई नहीं देखता कि आप कितने दयालु और उदार हैं वे यह भी नहीं सोचेंगे कि आपने उनके हित में अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया, बल्कि भयभीत और पलायनवादी मानकर सदैव अपमान करेंगे ॥३५॥

                   संबंध— इतना ही नहीं……
अवाच्यवादांश्च  बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥२/३६॥
             शब्दार्थ— तेरा अहित करने में तत्पर रहने वाले बहुत प्रकार के न कहने योग्य भी कहेंगे, तुमहारे सामर्थ्य की निंदा करेंगे और अकथनीय शब्द कहेंगे । ऐसा असहनीय दुःख कैसे सहन करोगे ?
               तात्पर्यार्थ— कर्तव्य का पलन न करने वाले की दयनीय दशा का ‘यदृच्छया चोपपन्नं' २/३२ से 'ततो दुःखतरं नु किम् २/३६ तक वर्णन किया । आज संपूर्ण समाज कर्तव्य पलायन और परधर्म आश्रित है । समाज को निर्भय करने वाले धर्माचार्य जेल में सड़ रहे हैं, नैष्कर्म्य के आचार्य गोशाला आदि के साथ क्या क्या कर रहे हैं किसी से छिपा नहीं है, अतः उसका परिणाम भी सबके सामने है अतः कहने की आवश्यकता नहीं है ॥३६॥

             संबंध— श्रीभगवान कहते हैं ऐसे जीने से तो मर जाना ही अच्छा है, लेकिन जब मरना ही है तो कर्तव्य का पालन करते हुए ही मरो जो कल्याणकारी होगा…..
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ    कौन्तेय युद्धाय    कृत निश्चयः ॥२/३७॥
             शब्दार्थ— मरोगे तो स्वर्ग मिलेगा, जीत गये तो पृथ्वी का राज्य मिलेगा । इसलिये हे कौन्तेय युद्ध का निश्चय करके खड़ा हो जा ।
               तात्पर्यार्थ— ऐसी निंदा सुनने से तो मर जाना ही अच्छा है, जब मरना ही है तो अपने कर्तव्य का पालन करके ही मरो तो स्वर्ग मिले, और जीवित में पृथ्वी के सभी यश, भोग आदि सुख । दोनो प्रकार से कर्तव्य पालन में लाभ ही है एवं कर्तव्य पालन न करने वाला दोनो ओर से नष्ट हो जाता है ।
           भावार्थ— व्यक्ति का स्व-स्थानीय प्राप्त शास्त्रीय कर्म निष्ठापूर्वक करने में सफल हुआ तो लोक और कर्तव्य पालन में मर गया तो परलोक, दोनो प्रकार से कल्याणकारी है ॥३७॥

                  संबंध— २/३१ से २/३७ तक लौकिक कर्तव्य पालन न करने से हानि और करने से लाभ बताया, किन्तु २/११ से २/३० तक का जो पारमार्थिक विषय छूट गया था उसका पुनः वर्णन करते हैैं……
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाययौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व  नैवं पाममवाप्स्यसि ॥२/३८॥
               शब्दार्थ— सुख दुःख, लाभ हानि, जय पराजय सबको समान समझकर फिर युद्ध कर इससे तुझे पाप नहीं लगेगा ।
             तात्पर्यार्थ— अर्जुन ने कहा था ‘यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' २/७ तो श्रेय का मार्ग २/११ से २/३० तक बता दिया था अर्जुन को समझ नहीं आया अतः २/३१ से २/३७ तक लौकिक दृष्टि से भी शास्त्रीय स्वप्राप्त कर्तव्य का पालन करने पृथ्वी और स्वर्ग दोनों के लिए ही कल्याणकारी बताया । इस पर अर्जुन शंका कर सकता है कि हमने श्रेय का अर्थात निवृत्ति या मोक्ष का मार्ग पूछा था आप बीच में पृथ्वी और स्वर्ग क्यों ले आये ?  हमने पहले ही कहा था ‘अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्' २/८ यह कुछ नहीं चाहिए मुझे श्रेय का मार्ग बताओ । इस पर भगवान कहते हैं कि मैने पहले ही कहा था, पर तुम्हें समझ में नहीं आया तो मैं क्या करूँ ? पृथ्वी स्वर्ग की बात भी मैने इसीलिये की कि कैसे भी किसी भी दृष्टि से स्वभाव से अनिच्छित प्राप्त युद्ध रूप स्वधर्म का पालन कर । श्रेय का मार्ग चाहिए तो ‘पापमेवाश्रयेत्' १/३६ में जो तूने कहा था तो यह भय भी सकाम कर्म हानि लाभ आदि की दृष्टि से ही होता है और इस भय की निवृत्ति के लिए सुख दुःख, हानि लाभ, जय पराजय को भी प्राप्त हो जाये तो भी हर्ष विषाद से रहित २/११-३० तक का विचार कर, उसमें स्थित हो जा तो पाप नहीं लगेगा ।
           भावार्थ— सुख दुःखादि आने जाने वाले हैं आज सुख है तो भी कल दुःख होना ही है, आज दुःख है तो कल सुख होना ही है । इसी प्रकार हानि लाभ जय पराजय भी हैं । अतः प्राप्त समय के अनुसार या क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने से पाप नहीं लगेगा ।
            सारांश— श्रेय की प्राप्ति में सकाम कर्म ही बाधक हैं, निष्काम नहीं, क्योंकि चित्तशुद्धि ही श्रेय का साधन है ॥३८॥

               संबंध— पूर्वोक्त प्रकार से पहले समभाव में स्थित हो जा क्योंकि…..
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्या  युक्तो यया  पार्थ कर्मबन्धं  प्रहास्यसि ॥२/३९॥
              शब्दार्थ—  अभी तक साङ्ख्य विचार सुना और अब योग का विचार सुनो जिससे जिससे कर्म बन्धन नष्ट कर दोगे ।
               तात्पर्यार्थ— तेरे लिए अभी तक जो पहले कहा वह साङ्ख्ययोग अर्थात ज्ञानयोग का विचार था, किन्तु हर्ष विषाद वाले अनधिकारी के लिए नहीं है । मेरे कहने पर भी तुम्हारा शोक नष्ट नहीं हुआ, अतः तुम ज्ञान के अधिकारी नहीं हो । अतः अब योग अर्थात श्रुति-शास्त्र प्रतिपादित कर्मयोग को सुनो इस पर अर्जुन कह सकता है कि एक विज्ञान से सर्व विज्ञान हो जाता है, उसके दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं तो कर्मों की क्या आवश्यकता ? कोई कर्म करके भी कर्म के बन्धन से कैसे मुक्त हो सकता है ? इस पर भगवान कहते हैं कि— कहते तो तुम ठीक हो पण्डितों की तरह लेकिन यह उनके लिए है जो हर्ष विषाद आदि द्वन्दों को पार करके उस परम तत्त्व में आरूढ़ हो चुके हैं, तेरे लिए अर्थात जो आरूढ़ नहीं हुए हैं किन्तु आरूढ़ होने की इच्छा रखते हैं उनके लिए ही कर्मयोग है । अतः तुम अभी कर्मयोग के ही अधिकारी हो । जो तुमने कहा कर्म करके भी कोई कर्मबन्धन से कैसे छूट सकता है, तो यह कहना भी अविवेक अर्थात अविचार है क्योंकि कपड़ो पर लगी मिट्टी (गंदगी) छुटाने के लिए ऊसर मिट्टी (आजकल वाशिंगपावडर/साबुन) लगाते हैं कि नहीं ? और दोनो ही कपड़ों को उज्वल करके नष्ट हो जाते हैं कि नहीं ? इसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि जब योग से युक्त होगी तब तुम समस्त कर्म बन्धनों को पार करके श्रेय को प्राप्त कर लोगे । इसके लिए पूर्व में कहे गए हर परिस्थिति में समभाव को अपनाना होगा क्योंकि यह समत्व ही योग (परमात्मा) है 'समत्वं योग उच्यते' २/४८ ऐसा भी आगे कहूँगा ॥३९॥

                 संबंध— कर्मयोग की महिमा बता रहे हैैं……
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥२/४०॥
            शब्दार्थ— यह जो निष्काम कर्मयोग है, इसका आरंभ करने का फल कभी नष्ट नहीं होता, प्रत्यवाय अर्थात पाप भी नहीं लगता । थोड़ा सा भी स्वधर्म का पालन करने से महान भय की निवृत्त हो जाती है ।
             तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान कहते हैं कि निष्काम कर्म भी फलदायी होता है । जैसे सकाम कर्म पाप पुण्य के भागीदार बनाकर उन उन सुख दुःख, उत्थान पतन आदि के कारण होते हैं, वैसे ही निष्काम कर्म खेती के समान नष्ट होने वाला नहीं होता । खेती में होने वाली फसल संदिग्ध होती है कि वह कितनी घर आयेगी ? आयेगी भी या नहीं ? सकाम यज्ञादि का फल भी यदि सफल हुआ तो लोक परलोक का फल सुख देकर और असफल हुआ तो नाना प्रकार के पापमय परिणाम देकर एक अवधि के बाद नष्ट हो ही जाते हैं । अतः सकाम कर्म की तरह समभाव में स्थित निष्काम कर्म नहीं होते । निष्काम कर्म चित्तशुद्धि रूप अक्षय फल देने वाले होते हैं, साथ ही ये कर्म स्वार्थपरता से रहित होने के कारण निष्पाप भी होते हैं । अतः ‘पापमेवाश्रयेत्’ १/३६ जो तुमने कहा था वह कदापि संभव नहीं है । पाप नहीं लगेगा इसलिये स्वधर्म का अंशमात्र भी पालन बड़े बड़े भय का नाश कर देता है ॥४०॥

             समीक्षा― श्लोक ३१ से यहाँ तक स्वधर्म पालन और स्वाभाविक कर्म पर बल दिया गया है, जो कर्तव्यत्वेन प्राप्त कर्म हैं यदि उन्हें नहीं किया जाता है किसी मोह या स्वार्थवश तो जीवन भर का किया गया यशमय कार्य मिट्टी में मिल जाता है । लोग न कहने योग्य कहते अर्थात बहुत प्रकार के आरोप प्रत्यारोप करके गालियाँ देते हैं जिन्हें सुनना कठिन है । इसलिये अपने कर्तव्य कर्म को व्यक्तिगत हानि लाभ, सुख दुःख से ऊपर उठकर करना ही चाहिए । इसमें लोक दृष्टि से भी दोष न होने से स्तुतिमय कल्याण ही है और मरने के बाद भी यश रूप में विद्यमान स्वर्ग ही है, क्योंकि जो समभाव रखकर धर्म यानी कर्तव्य का पालन थोड़ा भी किया जाता है उसका विपरीत फल हो ही नहीं सकता । यही इन दश श्लोकों का भाव है । यही लोकदृष्टि है ।
              वस्तुतः यहाँ से कर्मयोग का वर्णन आगे श्लोक ५३ तक किया जायेगा । इस पर शंका हो सकती है कि जो श्लोक ३१ से ४० तक कहा गया वह कर्मयोग नहीं है ? क्योंकि यहाँ भी सम भाव रखकर कर्म करने के लिए कहा गया और यह ‘समत्वं योग उच्यते’ २/४८ के अनुसार योग ही है । इसका समाधान यह है कि एक कर्तव्य कर्म जो स्वर्गादि देने वाले होते हैं वही कर्तव्य कर्म यहाँ पर इससे पहले कहा गया है क्योंकि वह कर्म भी राग द्वेष प्रेरित होने पर स्वर्गादि भी नहीं देता है इसलिए समभाव में स्थित होकर कर्म करने की बात कहा है । अब जो आगे कहने की प्रस्तावना है वह कर्मयोग समभाव में समाधियोग के लिए है जिससे जीव अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा चित्तशुद्धि पूर्व समभाव को प्राप्त करके स्वसंवेद्य अद्वितीय आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है । जिसका सकाम और निष्काम विभाग पूर्वक वर्णन किया जायेगा 
               भावार्थ— निष्काम कर्म संशय रहित, पुण्य पाप के भय से रहित अक्षय फल देने वाले होते हैं ॥३१-४०॥

               संबंध— योगमय निष्काम कर्म करने के लिए आवश्यक है कि सकाम कर्मों का फल और उसकी स्थिति समझ ली जाये, अतः यहाँ बुद्धि के दो भेद कहकर समझाते हैं……
व्यवसायात्मिका   बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥४१॥
         शब्दार्थ— हे कुरुनन्दन ! निश्चयात्मिका बुद्धि एक और अनिश्चयात्मिका बुद्धि शाखा प्रशाखा अनन्त होती है ।
               तात्पर्यार्थ— शास्त्रों में ‘मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाऽशुद्धमेव च' कहा गया है । शुद्ध मन वह जिसका निश्चय एक और अटल होता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक है, अद्वैत है आदि, वही हमारी गति, मति एवं सर्वस्व है उससे भिन्न मेरी कोई सत्ता नहीं है अथवा एक मात्र आत्मा ने संपूर्ण जगत को व्याप्त करके रखा है और वह व्यापक आत्मा मैं हूँ, ऐसा जिसका दृढ़ निश्चय है कि “सर्वभूतेषु येनैक” १८/२० व्याख्या उसी स्थान पर की जायेगी वह निश्चय बुद्धि वाला है, एवं जो एक के बाद एक कामनाओं को जन्म देनेवाली संकल्प-विकल्प से युक्त अस्थिर बुद्धि है वही अनिश्चयात्मिका बुद्धि है जो फलाकांक्षा के कारण बकरी की तरह भटकती रहती है ।
              अथवा मूल में आये इह पद से एक बुद्धि कहने का तात्पर्य यह है कि पहले जो साङ्ख्य बुद्धि कही गई है वह एक हो गई और अब जो योग विषयक बुद्धि कही जा रही है यह एक हो गई । दोनो में जिस किसी में भी बुद्धि संकल्प विकल्प रहित होकर स्थिर हो जाये वह निश्चयात्मिका बुद्धि है । अथवा एकमात्र आत्मस्वरूप का व्यावसाय अर्थात चिन्तन करने वाली बुद्धि जिसमें कोई व्यभिचार यानी अन्य चिंतन न हो वह व्यवसायात्मिका बुद्धि है ।  दूसरी बात श्लोक २/३८ में समभाव कहा और आगे भी समत्वं योग उच्यते २/४८ कहेंगे अतः योग यानी समभाव अर्थात परमात्म भाव वाली बुद्धि एक ही होती है और विषम भाव यानी सकाम कर्मी बुद्धि की अनेक और अनन्त शाखाएं होती हैं यही यहाँ ‘इह’ पद से कहा गया है ।
         भावार्थ— आज संन्यासियों को इस खाते से मिलान अवश्य करना चाहिए ॥४१॥

           संबंध— निश्चय रहित चञ्चल बुद्धि का वर्णन…..
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ  नान्यदस्तीति वादिनः ॥२/४२॥
            शब्दार्थ— इनकी बुद्धि दिखाऊ फूल की तरह अविवेकपूर्ण वेद के सकाम कर्मकांड का वर्णन करती हैं । हे पार्थ ! ये वेदवादी लोग इसके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं ऐसा कहते हैं ।
             तात्पर्यार्थ— कदाचित् शंका हो कि कभी तो अनिश्चित बुद्धि वाले निश्चित बुद्धि वाले होते होंगे ? इसपर कहते हैं— उनका मन कर्मकांड और उसके फल का ही दिखाऊ फूल की तरह अर्थात जैसे फूल तो सुन्दर हो लेकिन सुगन्ध या बिना फल वाले हों ऐसे वर्णन करते हैं । ऐसे वेद के तात्पर्य को न जानने वाले वेदावादी अर्थात झगड़ालु लोग इसके (कामपूर्ति के) अतिरिक्त ‘ईश्वर है’ यह मानते ही नहीं । वे कहते हैं अमुक यज्ञ करो तमुक यज्ञ करो यह तंत्र वह मंत्र करो इससे तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी वह कामना पूर्ण होगी स्वर्ग प्राप्त होगा इत्यादि, इसके अतिरिक्त और कोई ईश्वर नहीं है ।
            भावार्थ— जैसे सुगन्ध रहित दिखाऊ फूल मन को आकर्षित करता है वैसे ही जिनकी वाणी सुनने में बहुत सुन्दर मनमोहक लगती है ऐसे कर्मकांड में आसक्त लो पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक के भोगों से भिन्न ईश्वर को मानते ही नहीं हैं जिनके विषय में आगे कहा जा रहा है, ये वेदवादी यानी वेदों के नाम पर झगड़ा करने वाले हैं ॥४२॥

              संबंध— इतना ही नहीं इनका स्वभाव बहुत ही विकृत होता है……
कामात्मना स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां    भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥२/४३॥
               शब्दार्थ— इस प्रकार जन्म-कर्म, कर्म-जन्म, जन्मकर्म रूप फलप्रदान करने वाला स्वर्ग से परे अन्य कोई ईश्वर है ही नहीं, ऐसा कामनाओं से ओतप्रोत नानाप्रकार की अग्निष्टोमादि क्रियाओं का ही वर्णन करते हैं, जो भोग ऐश्वर्य और जन्म-मृत्यु, जरा आदि रोगों की गति देने वाले हैं ।
               तात्पर्यार्थ—  जो स्वर्गादि के अतिरिक्त ईश्वर को मानेगा ही नहीं तो उसकी बुद्धि स्थिर होगी नहीं तो योगबुद्धि का प्रश्न ही नहीं बैठता है इन विषयी कामी लोगों का वर्णन १६वें अध्याय में 'असौ मया हतः' इत्यादि से आसुरी संपत्ति में करेंगे ।
          भावार्थ—  पुष्पितां वाचं से इन्हीं जन्मादि फल को देने वाली फल श्रुति का वर्णन ही है ॥४३॥

           संबंध— उपरोक्त बुद्धि स्थिर हो ही नहीं सकती है अब यह बता रहे हैं…..
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां          तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥२/४४॥
              शब्दार्थ— उस पुष्पित वाणी अर्थात कर्मकांड विषयक जन्म मृत्यु देने वाले भोगों की स्तुति करने वाले वेदवादियों के द्वारा जिनका चित्त हरण कर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में ही आसक्त रहने वाले हैं ऐसी अस्थिर बुद्धि कभी भी समाधि अर्थात स्व-स्वरूप को प्राप्त नहीं होती ।
              तात्पर्यार्थ— उपरोक्त विषयों द्वारा हरणचित्त जिनकी कामनाओं के कारण एक निश्चय को प्राप्त न होकर सैकड़ों हजारों अनन्त शाखाओं में विभक्त हो गई हैं २/४१, सैकड़ों आशाओं के पाशों से बंधा है १६/१२, जिनकी बुद्धि दिखाऊ आकर्षक पुष्प के समान है २/४२, दम्भाचार १६/१० से युक्त है, जिनकी बुद्धि कामासक्त २/४३ स्वर्गादि के अतिरिक्त कुछ नहीं मानती, जिनका कामोपभोग ही परम प्राप्तव्य है १६/११, भोगैश्वर्य अर्थात नानाप्रकार की काम और स्त्री पुत्र मित्र धनादि को अपना मानकर स्वामीपने में आसक्त चित्त वाले जिन्हें मैं ही ईश्वर अर्थात स्त्री पुत्रादि का स्वामी, भोगी, सिद्ध बलवान, सुखी १६/१४ आदि हूँ, ऐसा विषयी अनिश्चित अर्थात चञ्चल बुद्धि वाले कभी भी एकीभाव अर्थात आत्मैक्य रूप योगारूढ़ता को प्राप्त ही नहीं हो सकते ।
           भावार्थ— आज यह काम्यकर्म, कल वह, आज इस कामना के लिए इसकी आरधना, तो कल उस कामना के लिए उसकी आराधना, बस इसी में लगे रहना क्योंकि इससे भिन्न कोई और ईश्वर है यह मानते ही नहीं हैं ॥४४॥

              संबंध— काममय अविवेकी पुरुष के लक्षण गिनाकर अर्जुन को कहते हैं कि तू तो विवेक वाला है और जो श्रेय अर्थात मोक्षमार्ग ही पूछता है तो……
त्रैगुण्यविषया    वेदा निस्त्रैगुण्यो    भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२/४५॥
                     शब्दार्थ— वेद तीनों गुणों का विषय हैं इसलिए हे अर्जुन ! तू तीनो गुणों से ऊपर उठ जा । द्वन्द्वों से रहित, नित्यसत्त्वस्थ, योगक्षेम की चिन्ता से रहित होकर आत्मवान् हो जा । 
           तात्पर्यार्थ—  कुछ विचार अत्यंत गंभीर होते हैं जिनका विचार अत्यंत आवश्यक है । यहाँ वेदों को तीन गुणों का विषय बताया, किन्तु अर्जुन को वेदों से रहित होने की बात न कहकर तीनो गुणों से रहित यानी ऊपर उठने की बात कर रहे हैं और जब तीनो गुणों से रहित होने की बात कह ही दी तो फिर नित्यसत्वस्थ अर्थात नित्य निरंतर ही सत्वगुण में रहने का आदेश देकर अपनी बात का ही विरोध क्यों कर रहे हैं ? अतः इसप्रकार समझते हैं—
                त्रैगुण्यविषया वेदा— इसी प्रसंग का २/४१ से २/४४ तक के वर्णन में ‘यामिमां पुष्पितां वाचम् एवं वेदवादरताः’ आया है, जिनके अन्तर्गत काम्यकर्मों का वर्णन है । काम्यकर्म बिना राग द्वेष लोभ मोह के हो नहीं सकते । वादरताः अर्थात लोग वाद के साथ विवाद का भी अध्याहार करके विवाद तो करते हैं, किन्तु वेद का अन्तिम लक्ष्य क्या है ? वेद के इस तात्पर्य को नहीं जानते और हमेशा उन्हीं काम्यकर्मों का वर्णन करके राग-द्वेषमय संसार की वृद्धि करते हैं । अतः इन राग-द्वेष, लोभ-मोह, जन्म-मृत्यु रूप संसार की वृद्धि के हेतुभूत सकाम कर्मों की फलश्रुतियों का त्याग कर दे, क्योंकि वहाँ स्वर्गादि के साधनभूत यज्ञादि कर्म भले सात्विक दिख रहे हों किन्तु वहाँ सात्विक दिखने पर भी राग-द्वेष रूप तमोगुण और लोभ-मोह रूप रजोगुण ही हैं, सत्वगुण बिल्कुल नहीं है क्योंकि इन कर्मों में नानात्व द्वैत त्रैत स्पष्ट रूप से है जिसे १८/२१ में रजोगुण कहा गया है ऐसे कर्म सारहीन हैं इनमें कोई तत्त्व नहीं है । केवल जिस जिस कार्य का कोई उचित हेतु न हो और उसको कहा जाये कि बस यही पूर्ण है वह तामस ही है १८/२२ । अतः त्रिगुण दिखने पर भी राजसी तामसी गुण से ओतप्रोत कार्य उनका फल और उन फलों का वर्णन करने वाली श्रुति अर्थात वेद की पूर्वमीमांसा को त्यागकर तुम निस्त्रैगुण्य हो जाओ कारण कि श्रेय अर्थात मोक्षार्थी को इन संसार की वृद्धि करने वाली फलश्रुतियों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए ।
                निस्त्रैगुण्यो भव— सत्व रज तम इन तीन गुणों से संसार की वृद्धि करने वाली श्रुतियाँ अर्थात वेद हैं उनका मुमुक्षु को त्याग करना ही चाहिए, क्योंकि पहले कहा गया वेदवादी अर्थात वेद के तात्पर्य को सकामी जानने वाले नहीं हैं, वे कामासक्ति के द्वारा हरणचित्त अर्थात बंधक बनाये जा चुके हैं, किन्तु तुम विवेकशील हो और वेदों के तात्पर्य को जानने वाले हो और वेद कामतृप्त को अपना तात्पर्य अन्त में बताते हैं जो उनका अन्तिम भाग वेदान्त है । उस वेदान्त के आत्मैक्य बोधपरक वाक्यों तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, प्रज्ञानं ब्रह्म आदि का श्रवण मनन निदिध्यासन करके निर्वेद आत्मा को अर्थात त्रिगुणों पर शासन करने वाली आत्मा को जानकर अर्थात ‘यह’ करके जाना जाने वाला स्वर्गादि त्रिगुणात्मक जगत का त्यागकर आत्मैक्य भाव में स्थित हो जा । यही निस्त्रैगुण्यो भव का तात्पर्य है ।
              निद्वन्द्वः — संसार अथवा काम्यकर्मों में प्रवृत्ति, राग-द्वेष, लोभ-मोह रूप द्वन्दों के बिना नहीं होती, अतः इनका त्याग करके द्वन्द रहित हो जाना चाहिए । अथवा हानि-लाभ, जय-पराजय, वेद प्रतिपादित काम्यकर्मों एवं उनके फल रूप द्वन्दों का परित्याग कर देना चाहिए, क्योंकि जब तक कोई भी कैसी भी मन में कामना है, जब तक काम क्रोध लोभ मोह आदि संसार का हेतु भय मन में है, तब तक श्रुति प्रतिपादित श्रवण मनन निदिध्यासन हो नहीं सकता । अतः इन द्वन्द्वों का त्याग करके निर्द्वन्द हो जा ।
              नित्यसत्त्वस्थः — इस प्रकार उपरोक्त तीनों गुण दिखने पर भी इन्द्रिय संयम नहीं है और इन्द्रिय संयम के लिए पूर्ण सत्वगुण चाहिए, सत्वगुण के बिना विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति (अर्थात शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा एवं समाधान), एवं मुमुक्षा हो नहीं सकती । अतः षट्संपत्ति से युक्त इन्द्रिय संयम रूप सत्वगुण में निरंतर स्थित रहो, श्रवण, मनन, निदिध्यासन का निरंतर अभ्यास करो और आत्मैक्य रूप सत्वगुण में निरंतर स्थित हो जाओ, क्योंकि वेदवाणी अर्थात जिस नानात्व को लोग सत्वगुण मान लेते हैं वह नानात्व सत्वगुण हो ही नहीं सकता । सत्वगुण तो एकात्मैक्यता में ही है जो श्रुति प्रतिपादित है । गीता में भी भी 'सर्वभूतेषु येनैकं' १८/२० करके ही सत्वगुण कहा है । अतः आत्मैक्य रूप नित्य सत्वस्थ हो जा । साथ ही यह भी ध्यान रहे कि आत्मैक्य में जीव-ब्रह्म आदि नाम रूप का भी द्वन्द नहीं होता । अतः नाम रूप द्वन्द्वों का भी त्याग करके निरंतर सत्व में प्रतिष्ठित हो जा यह भाव है ।
               निर्योगक्षेम— योगक्षेम की सबसे बड़ी समस्या शरीर और उसके संसाधन हैं, हमारा शरीर कैसे चलेगा ? इसकी रक्षा कैसे होगी ? आदि के लिए अप्राप्त की प्राप्ति की इच्छा और प्राप्त की रक्षा करने की चिन्ता छोड़कर निश्चिंत होना, शरीर को सांप बिच्छू काटेगा, कोई जानवर खा जायेगा, इनका निवारण कैसे होगा ? इत्यादि चिन्ताएं हमारे श्रवण, मनन, निदिध्यासन रूप अनुष्ठान की बाधक हैं । शरीर सहित जगत ब्रह्मलोक पर्यंत नाशवान है, यह समझकर ये सभी द्वन्द छोड़कर इनकी रक्षा का होना न होना यह सब प्रारब्ध पर छोड़कर योगक्षेम से रहित हो जा । हमें सिद्धि प्राप्त होगी, या नहीं ? हानि होगी या लाभ ? जय होगी या पराजय ? इत्यादि सारी चिन्ताएं छोड़कर श्रवण, मनन, निदिध्यासन में तत्पर हो कर आत्मैक्य का अनुष्ठान कर ।
             आत्मवान्— यदि मन विषयी होगा तो स्थिर नहीं होगा तो आत्मवान् अर्थात स्वयं से स्वयं में स्थिर नहीं होगा । अतः मन को बाह्य विषयों से हटाकर, श्रवण मनन निदिध्यासन इत्यादि में लगाकर अन्तर्वृत्तिवाला होकर आत्मवान् हो जा । बहिर्वृत्ति से पूर्व में जो आत्मा के ब्रह्माकार के लक्षण कहे, वह ब्रह्माकार वृत्ति भी नहीं बनती । अतः बाह्यविषयों से मन को हटा लेना और व्यापक ‘अहं’ में स्थिर होना अर्थात ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस भाव में स्थिति ही आत्मवान् है, इसका ऐसा तात्पर्य है ।
         संक्षेप में- त्रैगुण्यविषया वेदा— जन्ममृत्यु रूप संसार का प्रतिपान ।
          निस्त्रैगुण्यो भव— जन्ममृत्यु रूप संसार से ऊपर उठना ।
          निर्द्वन्द्वो— रागद्वेष आदि से रहित होना ।
          नित्यसत्वस्थः — शम-दमादि पूर्वक सर्वत्र एक आत्मा या परमात्मा को देखना ।
          निर्योगक्षेम— शरीर एवं उसके संसाधनों तक से भी निर्लिप्तता ।
          आत्मवान्— उपरोक्त सभी वाह्यवृत्तियों से ऊपर उठकर आत्मैक्य भाव में स्थित होना ॥४५॥
        सिद्धांत पक्ष— यहाँ पहले यह समझ कर रखना चाहिए कि वेद के दो भाग हैं पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा । पूर्वभाग जैमिनीय मत है जो यज्ञ याग आदि कर्मकाण्ड द्वारा देवाराधन द्वारा लौकिक धन, स्वास्थ्य, ऐश्वर्य एवं पारलौकिक स्वर्गादि की प्राप्ति का वर्णन करते हैं । उनमें अलग से कोई ईश्वर है यह बात बिल्कुल नहीं मानते हैं, उसी भाग का यहाँ संक्षेप में श्लोक ४१ से लेकर श्लोक ४४ तक वर्णन करके इस श्लोक के प्रथम चरण में पूर्वमीमांसा का त्याग और द्वितीय चरण में वेदव्यास कृत उत्तरमीमांसा यानी उपनिषद भाग के ग्रहण की बात कही गई है तथा तृतीय एवं चतुर्थ चरण में उत्तरमीमांसा का अधिकारी बताते हुए अन्तिम लक्ष्य आत्मनिष्ठ हो जाना निर्धारित किया गया है । अब यहाँ से आगे मात्र औपनिषदीय तत्त्व का निराकरण किया जायेगा और जहाँ कहीं भी सकाम पूर्वमीमांसा संबंधित वर्णन आयेगा उन्हें राजसी, तामसी, आसुरी, राक्षसी, प्रकृति, प्रकृति के गुणों में आसक्त और दैवीमाया आदि के नाम से सकाम कर्मासक्ति की निंदा करके उत्तरमीमांसा के लक्ष्यभूत आत्मनिष्ठा का ही वर्णन किया जायेगा । जहाँ कहीं भी माम्, मयि, मत् कृष्ण द्वारा सविशेष सूचक कहा भी जायेगा उसका भी विनियोग अन्त में आत्मपद अर्थात निर्विशेष ब्रह्म में ही होगा ।
            हमें पूर्वपक्ष को भलीभांति समझना चाहिए, क्योंकि हम अनेक बार पूर्वपक्ष को ही उत्तर पक्ष समझ बैठते हैं यही हमारे अर्थ का अनर्थ हो जाता है, शास्त्र का मूलभाव छिप जाता है और दुराग्रह हमारे हृदय में घर बना लेता है जो किसी भी मुमुक्षु के पतन का हेतु बन जाता है । पतन यही है कि न तो वह आत्मा के ही स्वरूप को समझ पाता है और न ही परमात्मा के स्वरूप को । यदि दो में से एक को भी स्वरूपतः समझ लिया जाये तो दोनो समझ में आ जाता है और बिना प्रयत्न के ही एकमेद्वितीयम् में आज नहीं तो कल स्थिति हो ही जायेगी । यह समझ में आ जाता है कि आत्मा और ईश्वर भिन्न नहीं एक ही है ‘सर्वभूतेषु येनैकं’ १८/२० आत्मा और ईश्वर का एकत्व कृष्ण किस प्रकार करते हैं देखिए― पहले कहते हैं ‘तमेव शरणं गच्छ’ १८/६२ और फिर कहते हैं ‘मामेकं शरणं ब्रज’ १८/६६ पहले उस ईश्वर की शरण में जाने की और फिर मेरी शरण में आने की बात करते हैं जो परस्पर विरुद्ध प्रतीत होता है तथापि संपूर्ण गीता का जब विधिवत निरीक्षण करेंगे तो पायेंगे कि दोनो भिन्न नहीं एक ही तत्त्व हैं । यहां ‘तम्’ यानी ईश्वर ‘तत्’ पदार्थ का और ‘माम्’ यानी मेरा का अर्थ कृष्ण ‘त्वम्’ पदार्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं । जब ‘तत्’ और ‘त्वम्’ एकत्व को प्राप्त हो जाते हैं तब न ‘तत्’ रहता है, न ‘त्वम्’ मात्र ‘असि’ पद रहता है यही ‘तत्त्वमसि’ गीता का प्रधान लक्ष्य है । यही शोध उत्तरमीमांसा का अन्तिम लक्ष्य है जो गीता रूपी उपनिषद सार के द्वारा यहाँ से आगे शोध प्रारंभ किया जाता है । निस्त्रैगुण्य द्वारा उपनिषद ब्रह्मसूत्र के लक्ष्यार्थ आत्मवान् के द्वारा जो आत्मस्वरूप है जो स्वसंवेद्य है उसकी खोज करते हैं यह उपक्रम है । यह समझकर रखना चाहिए ।
              शंका— इतनी दूर गीता में प्रवेश करके फिर आत्मवान् का उपक्रम किस आधार पर किया गया है ? उपक्रम तो प्रारंभ में दिया जाता है । क्या श्रीकृष्ण भूल गये या विषयांतर हो गया ?
           समाधान— यहाँ पर श्रीकृष्ण द्वारा पूर्वमीमांसा में आसक्त सकाम पुरुषों की निंदा और उत्तर मीमांसा द्वारा प्रतिपादित लक्ष्य आत्मनिष्ठा यानी आत्मवान् एकाएक नहीं कहा है । प्रथम अध्याय में जिस कारण से अर्जुन को भय और शोक प्राप्त हुआ एवं अध्याय दो में भी ‘गुरूनहत्वा’ २/५ आदि पूर्वमीमांसा से ही संबद्ध है । उसी के निराकरण के लिए श्लोक ११ से लेकर  श्लोक ३० तक जिस आत्मतत्त्व का “येन सर्वमिदं ततम् २/१७, न जायते म्रियते वा कदाचिन्” २/२० इत्यादि से प्रतिपादन किया, उसी षड्विकार रहित नित्य, विभु, सर्वगत आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठा ही जिसका लक्ष्य है‚ वह मुमुक्षु उसमें कैसे प्रतिष्ठित हो ? उसके साधन एवं उसमें प्रतिष्ठा का विस्तार करने के निमित्त ही यह उत्तरमीमांसा का लक्ष्य आत्मवान् कहकर उपक्रम को यहां पर स्पष्ट मात्र किया गया है । जबकि उपक्रम तो श्लोक ११ में ही कर दिया गया था और शेष श्लोक ३० तक उसके स्वरूप का निर्धारण किया गया है, इसमें भूल या विषयांतर का प्रश्न ही नहीं उठता ।
  सिद्धांत पक्ष की पुनर्समीक्षा— जब तक सिद्धांत पक्ष समझ में न आ जाये तब तक विचार करना ही चाहिए । त्रैगुण्यविषया वेदा २/४५ जो दिया गया है उससे पहले भोगवादी एवं निरीश्वरवादी का वर्णन है उसी को लेकर त्रैगुण्यविषया वेदा कहा गया उनका विस्तृत वर्णन अध्याय १६ में किया जायेगा । इसके बाद आता है निस्त्रैगुण्य २/४५ तो इसका वर्णन अध्याय १३ और १४ में होगा । कुछ लोग इसे ही गीता का सिद्धांत मानते हैं और शेष आगे के चार साधन हैं यानी साध्य निस्त्रैगुण्य ही है ऐसा कुछ लोगों का मानना है । निर्द्वन्द्व होने के लिए ही सविशेष ब्रह्म की अध्याय ७ से ११ तक वर्णन किया गया नित्यसत्त्वस्थ के लिए ही अध्याय १७ का वर्णन किया गया है क्योंकि जब तक सात्विक भाव एवं श्रद्धा की स्थिरता नहीं होगी, तब तक निस्त्रैगुण्य या आत्मवान नहीं हुआ जा सकता है । निर्योगक्षेम के लिए अध्याय ९ ‘योगक्षेमं’ वहाम्यहम् और अध्याय १२ में भक्तियोग कहा गया है । आत्मवान् के लिए अध्याय छः तक एवं अध्याय १५ का वर्णन किया गया है  जहाँ पर आत्मा को सर्वभाव से जानने की बात कही गई है । इस प्रकार उपक्रम के इस श्लोक को संपूर्ण गीता में भलीभाँति देखा जा सकता है ।
              यहाँ पर सैद्धांतिक विचार यह करना होगा कि यदि यहाँ पर यह माना जाये कि निस्त्रैगुण्य होना ही गीता का सिद्धांत है और शेष चार साधन कहे गये हैं जिसमें चौथा साधन आत्मवान् है, तो भी जब हम विचार करते हैं तो पाते हैं ‘गुणानेतानतीत्य त्रीन्’ १४/२० में जब तीनो गुणों को पार कर जाता है तब सभी दुःखों से मुक्त होकर अमृतत्व को प्राप्त करना कहा गया है, इसके अनुसार आत्मपद ही लक्ष्य है ‘मां योव्यभिचारेण’ १४/२६ में सविशेष ब्रह्म की उपासना करके तब तीनो गुणों से अतीत होकर ब्रह्मरूपता का संकल्प करता है । अतः यहाँ भी लक्ष्य आत्मपद ही है । जबकि इसी अध्याय दो में ‘परं दृष्ट्वा निवर्तते’ २/५९ अर्थात जो आत्मसाक्षर करने वाला है वही सभी अनात्मपदार्थ के रसों से मुक्त होता है एवं ‘नैनां प्राप्य विमुह्यति’ २/७२ अर्थात ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करके यानी आत्मपद में प्रतिष्ठित होने के बाद मोहित नहीं होता इन दोनो वाक्यों से ‘निस्त्रैगुण्य’ का लक्ष्य यानी सिद्धांत समझ में आ रहा है । तथापि यह अनिर्वचनीय है कि पहले आत्मा की प्राप्ति से निस्त्रैगुण्य का सिद्धांत कहा गया है या निस्त्रैगुण्य से आत्मपद की प्राप्ति सिद्धांत कहा गया है । जब हम उपसंहार में देखते हैं तो ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज’ १८/६६ यहाँ पर ‘त्रैगुण्यविषया वेदा’ २/४५ में कहे गये वेदों के कार्य सात्विक राजस तामस तीनो गुणों के कार्य का त्याग पहले बताया गया है और उनका त्याग ही निस्त्रैगुण्य होना है जैसा कि अध्याय १४ में तीनो गुणों को बंधन का हेतु माना गया है । अतः सर्वधर्मान्परित्यज्य से ’त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन’ तक एक ही साधन रूप में लेने से निस्त्रैगुण्य सिद्धांत नहीं बनता है बल्कि आत्मस्वरूप की प्राप्ति का साधन बनता है’ जबकि ‘निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्’ का जब समन्वय ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु’ १८/६५ के साथ करते हैं तब ‘निर्द्वन्द्वः’ के साथ ‘नमस्कुरु’ एवं ‘मद्याजी’ की संगति ठीक बैठती है, क्योंकि सगुण साकार के उपासक सविशेष की उपासना से ही स्वयं को रजोगुण तमोगुण से सुरक्षित और निर्द्वन्द्व महसूस करते हैं और कर्मकाण्ड पर ही भरोसा करते हैं, ऐसा करेंगे तो ऐसा फल होगा, वैसा करेंगे तो वैसा फल होगा— यह विचार मन में रहता है, किन्तु ‘मद्भक्तः’ से सगुण निराकार की उपसना करके परमेश्वर की व्यापकता पर ही निर्भर होकर संसार के हर विषय अनुकूल और प्रतिकूल प्रत्येक दशा में निर्द्वन्द्व हो जाता है जो नित्यसत्त्वस्थो के साथ ही ऐक्य करता है । इतनी उपसना करके तब मन्मना यानी आत्मप्रत्यय में ऐकान्तिक चिंतन द्वारा ‘मामेकं शरणम् ब्रज अर्थात एकमात्र आत्मस्वरूप में चला जाता अर्थात स्थित हो जाता है ।
          इस न्याय से सर्वाधर्मान्परित्यज्य से वेदों के तीनो गुणों के कार्य पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत सभी प्रकार की कामना का त्याग करने का आदेश देकर ‘मामेकं शरणं ब्रज’ यानी एक मात्र सर्वात्मा आत्मस्वरूप की शरण ले यानी आत्मस्वरूप में स्थित हो जा । इस कथन से—
          गीता का सिद्धांत “आत्मवान्” होना ही मेरे दृष्टिकोण में सिद्ध होता है । अतः इसी सिद्धांत पर आगे का चिन्तन किया जायेगा ॥४५॥ 

                 संबंध— शास्त्रानुसार ब्रह्मज्ञानी के लिए ‘तस्य कार्यं न विद्यते' ३/१७ अर्थात उसके लिए कोई कार्य नहीं होता कहा गया है तो उपरोक्त साधन साध्य कैसे बन सकता है ? इस पर कहते हैैं……
यावानर्थ  उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥२/४६॥
             शब्दार्थ— जब तक चारों ओर से परिपूर्ण महान जलाशय के प्राप्त होने पर छोटे गड्ढे, कुएं से जितना प्रयोजन होता है, तत्त्ववेत्ता यानी ब्रह्मतत्त्व को जानने वाले ब्रह्मज्ञानी का भी संपूर्ण वेदों से उतना ही प्रयोजन होता है ।
              तात्पर्यार्थ— जैसे चारों ओर से परिपूर्ण समुद्र के न मिलने पर जो छोटे जलाशयों का कुआं, तालाब, नदी आदि का जो महत्व होता है अर्थात छोटे जलाशयों कुआं, तलाब, नदी आदि में जो स्नान दान आदि का फल प्राप्त होता है वही फल एकमात्र समुद्र के स्नान करने पर मिलता है, ठीक उसी प्रकार जो ब्रह्म को जानने वाला अर्थात ब्रह्मात्मैक्य को प्राप्त ज्ञानी का महत्व संपूर्ण वेदों में कहे गए काम्यकर्मों की फलश्रुतियों से है अर्थात जो स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो गया है वह स्वयं श्रुतिफल अर्थात यज्ञादि फल देने वाला है एवं लोगों द्वारा किये गये वैदिक कर्मों का फल भी उसी को प्राप्त होता है छान्दयोग्योपनिषद में भी राजा जानश्रुति और रैक्व के प्रसंग में राजा और प्रजा द्वारा किया गया संपूर्ण सत्कर्म का फल रैक्व गड़ीवाले को मिलता है ऐसा कहा गया है । अतः ऐसा ब्रह्मज्ञ को किस फल श्रुति की आवश्यकता होगी ? अर्थात फलश्रुति तो स्वयं उसका स्वरूप है, अभिन्न है, उसे उनकी आवश्यकता नहीं है ।
               यहां “विशेष ध्यान” देने योग्य है कि वेद की निंदा यहाँ पर कदापि नहीं की गई बल्कि अज्ञानी मनुष्य की स्थिति का वर्णन किया गया है, जैसे छोटे जलाशय गड्ढे, कुएँ आदि शीघ्र सूख कर नष्ट हो जाते हैं और थोड़े से जल से भर भी जाते हैं किन्तु समुद्र न तो कभी सूखता ही है और न ही घटता या बढ़ता है, वह सदैव सम रहता है, इसी प्रकार वेद से संबद्ध सकाम तुच्छ भोगों का प्रतिपादन करने वाले मात्र उतने ही अंश से है जो जन्म मृत्यु का हेतु हैं, उनकी अपेक्षा जब तत्त्वदर्शी शास्त्रों के अन्तिम लक्ष्यार्थ को जान लेता तब सब कुछ छोड़कर उसी की प्राप्ति में लग जाता है और वेद के तुच्छ भोगपरक अंश से उसका कोई संबंध नहीं रह जाता है । यहाँ ब्राह्मण यानी ब्रह्मज्ञानी मुमुक्षु सर्वकर्मसंन्यासी कहा गया है जो  भविष्य में होने वाली ब्रह्मरूपता का सूचक है ।
               भावार्थ— श्रीभगवान कह रहे हैं कि जो ब्रह्मत्त्व को प्राप्त कर आत्मैक्य भाव में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रूप में स्थित है उसके लिए कोई कर्म शेष नहीं रहता ‘तस्य कार्यं न विद्यते’ ३/१७, ऐसा आगे भी कहेंगे, किन्तु जो आत्मा को नहीं जानना चहता है उसके लिए सकाम कर्म त्यागकर चित्तशुद्धि के लिए निष्कामकर्म अवश्य करना चाहिए ॥४६॥
              
           संबंध— उपरोक्त ज्ञानी का लक्षण बताकर अब जिज्ञासु के लिए निष्कामकर्म का आदेश देते हैं…..
कर्मण्येवाधिकारस्ते  मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२/४७॥
               शब्दार्थ— तेरा कर्म करने का अधिकार है फल में कभी नहीं, अतः तू कर्मफल का हेतु मत बन, निष्कामता की आसक्ति का त्याग करके कर्म कर अर्थात अपनी निष्कामता की अहं वृत्ति को भी त्याग दे ।
              तात्पर्यार्थ— ऊपर ज्ञानी का सर्वकर्म संन्यास बताया गया है, किन्तु जिज्ञासु को श्रुतिस्मृति के फलश्रुति का त्याग बताकर नित्य नैमित्तिक कर्म को निष्काम करने का आदेश देते हैं, फल के लिए कभी भी नहीं । ‘यज्ञोदानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्’ १८/५ का भी भाव नहीं होना चाहिए अर्थात इनसे होने वाले पुण्य की भी कामना नहीं होनी चाहिए, धर्म पालन से पाप नाश की भी कामना नहीं होनी चाहिए अर्थात कर्म करने का तो अधिकार है लेकिन फल पर कभी भी कहीं भी कैसे भी अधिकार नहीं है, अतः तू कर्म और उसके फल का भी हेतु मत बन अर्थात मुझे अमुक कर्म निष्काम करना ही चाहिए ऐसा भाव भी मत रख, किये गये कर्म से यश आदि फल की भी अपेक्षा मत रख । सकाम भाव से उत्पन्न कर्म का त्याग भी कर्म ही है, इससे विरुद्ध जो कर्म का त्याग अर्थात निष्काम कर्म है उसके त्याग में भी आसक्ति मत कर, क्योंकि मैं निष्काम कर्म करता हूँ का भाव भी वासना है । वह कर्म में प्रवृत्त कराकर जन्ममृत्यु का हेतु बन जायेगी, एवं मैं ज्ञानी हूँ मुझे कर्म नहीं करना चाहिए यह भाव प्रमादी बना देगा “प्रमादं वै मृत्युः” अर्थात प्रमाद ही सभी अनर्थों का अनर्थ है और यह जन्ममृत्यु रूप संसार चक्र के अनर्थ में बलात् डाल देगी । यह तात्पर्य है ।
                अथवा यूं कहें जो भी सांसारिक मोहासक्त प्राणी हैं उनका उपरोक्त ज्ञान में अधिकार नहीं है, अतः ज्ञान के अनधिकारी को केवल कर्म ही करना चाहिए उसके फल पर अधिकार बिल्कुल न रखे क्योंकि कर्मफल ही जन्म मृत्यु का हेतु है । किन्तु फल की चाह न रखने पर भी कर्म कर्ता का ‘अहं’ भाव अर्थात निष्काम वृत्ति भी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह अहं वृत्ति कर्ता के अभिमान से युक्त होने से जन्म मृत्यु दायक फल में आसक्त कर ही देगी । फिर शंका हो कि ऐसा है तो कर्म करना ही क्यों ? इसके लिए कहते यह भी तो कर्म न करने की आसक्ति है, इस निष्कर्मणता यानी निष्कामता की आसक्ति का भी त्याग कर दो ।
            भावार्थ— जन्ममृत्यु की हेतु वासना ही है, अतः कर्म करने और न करने, श्रुति-स्मृति शास्त्र प्रमाणित कर्मफल की इच्छा करना, फल की इच्छा न करना रूप वासना का त्याग कर देना चाहिए । मैं कर्ता हूँ यह भाव कदापि नहीं होना चाहिए । यही बात “यस्य नाहङ्कृतोभावो"  १८/१७ में भी कहेंगे ॥४७॥

               संबंध— तो फिर कर्म कैसे करें….
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२/४८॥
                  शब्दार्थ— हे धनञ्जय ! योग में स्थित होकर कर्मफल की आसक्ति का त्याग करके सिद्धि असिद्धि में समभावी होकर कर्म कर, क्योंकि समत्व को ही योग कहते हैं ।
              तात्पर्यार्थ— २/३९ मे अर्जुन से कहा कि जिस योग से युक्त बुद्धि से कर्मबन्धन का नाश कर देगा, उसी योग को यहाँ पुनः सुन— बुद्धि को योग में स्थित करके आसक्ति और उसके कर्मफल का त्याग करके किये जाने वाले कर्मों की सफलता रूप सिद्धि और असफलता रूप असिद्धि या यूं कहिए अनुकूलता रूप सिद्धि और प्रतिकूलता रूप असिद्धि अर्थात २/४५ के अनुसार निर्द्वन्द एवं समभाव में स्थित होकर शास्त्रीय कर्म कर । यह जो समभाव है यही योग कहा जाता है । यह समभाव क्या है ? इसपर आगे कहेंगे “निर्दोषं हि समं ब्रह्म” ५/१९, ब्रह्म— “न जायते म्रियते वा कदाचित्” २/२० अर्थात वह जन्मादि छः विकार यानी दोष से रहित अज, नित्य, शाश्वत, चिन्मय, अद्वय, नित्यानन्दैकरस आत्म रूप है । “तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता” ५/१९ । इसलिए तू ब्रह्मात्मैक्य भाव में स्थित होकर अर्थात मैं ब्रह्म हूँ ऐसी भावना में स्थित होकर शास्त्रीय कर्मों का निष्काम अनुष्ठान कर । यही योग अर्थात समत्व है ।
             अथवा सुखदुःखे समे कृत्वा २/३८ को ही यहाँ पुनः अनुवाद किया गया है, शैली भेद से समत्व और योग का महत्व स्पष्ट करना है । क्योंकि ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ ५/१९ अर्थात समत्व का अर्थ सभी विकारों से रहित ब्रह्म है ‘तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः’ ५/१९ अर्थात ज्ञानयोगी उसी समत्व रूप ब्रह्म में स्थित होते हैं । यह योग है । अतः समत्वं एवं योग दोनो का अन्वय व्यतिरेक अर्थ करने पर समत्व को योग और योग को ही समत्व कहते हैं । अर्थात ब्रह्म में स्थित हुए बिना समत्व और समत्व के बिना ब्रह्म में स्थिति कभी नहीं हो सकती है तथापि यहाँ साधन प्रकरण है इसलिए यहाँ सीधे कह दिया जाये कि तू ब्रह्म ही है ऐसा चिंतन कर, तो कठिन पड़ता है किन्तु समभावस्थ होकर कर्म कर यह बात तो व्यक्ति को ठीक जंचती है क्योंकि कर्म संसारासक्त का स्वभाव है, अकर्म अर्थात सर्वकर्मसंन्यास बड़ा कठिन है । 
           अतः यहाँ साधन के रूप में योग यानी ब्रह्म की स्थिति प्राप्त करने के लिए समत्व को ही योग यानी ब्रह्म कहा गया, जिसे बिना ज्ञान के प्राप्त किये प्राप्त नहीं किया जा सकता है, इसलिए पहले समत्व को स्वीकार करके “समः सर्वेषु भूतेषु १३/२७, समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्” १३/२८ फिर उसकी प्राप्ति का उपाय करेगा वह उपाय अद्वेष्टा सर्वभूतानां आदि १२/१३ से १२/१९ तक एवं अमानित्वादि १३/७ से १३/११ तक के साधनों को जो सिद्धों के लक्षण एवं ज्ञान के नाम से नाम से प्रकाशं च १४/२२ से १४/२६ तक एवं जो त्रिगुणातीत के लक्षण और यहाँ भी प्रजहाति यदा कामान् २/५५  से विहाय कामन्यः २/७१ तक जो सिद्ध के लक्षण हैं उनकी शरण में जायेगा और सभी कर्मों को दूर से ही त्याग कर ज्ञानयोग की शरण में चला जायेगा जैसा कि आगे कहा गया है । यही समत्व द्वारा कर्म निर्धारण चित्तशुद्धि होने पर सर्वकर्मसंन्यास और ब्राह्मी स्थिति के लिए ज्ञान का हेतु है ।
       विशेष― यह समत्व अर्थात परमात्म भाव में कर्म अर्थात निष्काम कर्म वृत्ति का भली-भांति स्थित होना ही सर्वकर्मसंन्यास अर्थात ज्ञानोत्पत्ति का साधन है, जिसके पश्चात तत्क्षण ब्रह्मी भाव प्राप्त होगा यही यहां पर विशेष रूप से कहा गया है ॥४८॥

            संबंध— सकाम कर्मों की अपेक्षा बुद्धियोग अर्थात ज्ञानयोग की श्रेष्ठता बताते हैं…..
दूरेण  ह्यवरं कर्म  बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणः फलहेतवः ॥२/४९॥
                शब्दार्थ— हे धनञ्जय ! सकाम कर्मों को बुद्धियोग अर्थात ज्ञानयोग के द्वारा दूर से ही त्यागकर ज्ञानयोग का अनुष्ठान करते हुए उसी का आश्रय ले, क्योंकि सकाम कर्मों से उत्पन्न कर्मफल दीनता के हेतु हैं ।
               तात्पर्यार्थ— कर्म शास्त्रों में जहाँ आया है वहाँ शास्त्रीय कर्म ही आया है, अतः यहाँ शास्त्रीय कर्म का त्याग कदापि नहीं समझना चाहिए, क्योंकि “कृपणः फलहेतवः” भी साथ में ही कहा गया है जिसका अर्थ है स्वर्गादि कामनाओं की पूर्ति के निमित्त किये जाने वाले सकाम कर्म का बुद्धियोग अर्थात ज्ञानयोग की शरण अर्थात आश्रय लेकर त्याग कर देना चाहिए और ज्ञानयोग का अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि कर्मफल जन्ममृत्यु रूप दीनता को प्राप्त कराते हैं ।
            भाव पक्ष यह है कि कर्मों को उनके फलस्वरूप जन्म मृत्यु रूप दुःख का हेतु कहा गया है क्योंकि कर्मों की आसक्ति ही होने पर उसकी वासना के फलस्वरूप जन्म का हेतु बनता है और जन्म होने पर संपूर्ण दीनता, परवशता स्वतः सिद्ध हो जाती है । कत विधि सृजी नारि जगमाहीं । पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ॥ यही पराधीन विषयासक्त जीव की स्थिति है सदैव माथा पीटता रहता है । अतः सर्वकर्मसंन्यास ही मोक्षार्थी का परम लक्ष्य है । यही अर्थ यहाँ उचित है ।
          भावार्थ— श्रीभगवान यहाँ कहना चाहते हैं कि जन्ममृत्यु रूप संसार का बीज कर्म के फलस्वरूप जन्म मृत्यु का हेतु हैं अतः कर्मों को स्वरूप से त्यागकर आत्मभाव में ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा जानो और ऐसा यदि नहीं जाना, ऐसे ही बिना जाने मर गये तो जन्ममृत्यु रूप महान अनर्थ हो जायेगा ।
               सारांश― आत्मतत्त्व के रहस्य को न जानने वाला ही दीन है ॥४९॥

           संबंध— अतः जो कहा उसपर ध्यान दे और…..
बुद्धियुक्तो    जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥२/५०॥
             शब्दार्थ— इसीलिये ज्ञानयोग के द्वारा पुण्य और पाप दोनों को नष्ट करके ज्ञानयोग का अनुष्ठान कर, क्योंकि संपूर्ण कर्मों की कुशलता अर्थात चतुराई या बुद्धिमानी योग की प्राप्ति ही है ।
         तात्पर्यार्थ— बुद्धियोग अर्थात ज्ञानयोग के द्वारा पाप पुण्य रूप संपूर्ण किये गए अच्छे बुरे, शास्त्रीय-अशास्त्रीय कर्मों का नाश कर दे । प्रश्न उठता है कि पाप नाश के लिए कृच्छ्र चान्द्रायण आदि अनेकों प्रायश्चित कर्म हैं उनसे निवृत्ति हो ही जाती है तो ज्ञान की क्या आवश्यकता है ? इस पर कहते हैं कि प्रायश्चित कर्म नैमित्तिक है, उनसे सभी पापों की निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस-जिस पाप की निवृत्ति हेतु प्रायश्चित कर्म किया जायेगा उसी-उसी पाप की निवृत्ति होगी, सबकी नहीं । दूसरी बात संसार का बीज पुण्य तो फिर भी रह ही जायेगा जबकि “ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते” ४/३७, पाप-पुण्य, दृष्ट-अदृष्ट सभी कर्मों का नाश कर देती है । इसीलिये ज्ञान के समान संसार में पवित्र करने वाला और कोई नहीं है “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” ३/३८ जो भी साधुओं अर्थात जो अन्तःकरण चतुष्टय से संपन्न होकर चित्त की शुद्धि रूप पवित्रता को प्राप्त हो चुके हैं, उनको पवित्र अर्थात संसार चक्र से मुक्त करने के लिए और पापकर्म करनेवाले हैं उनके विनाश के लिए अर्थात साधु भक्तों का उद्धार और पापों का नाश जिनका लक्ष्य है, जबकि यही कार्य ज्ञानाग्नि करती है पाप-पुण्य का नाश करके कैवल्य अर्थात जन्ममृत्यु के पाश से मुक्त करके मोक्ष प्रदान करती है “ज्ञानादेव तु कैवल्यम्” ज्ञान से ही कैवल्य की प्राप्ति होती है ।
             “सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसामप्यते ४/३३, ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा” ४/३७ इन आगे कहे जाने वाले प्रमाणों से ज्ञानयोग ही एकमात्र साधन है जिसके आश्रित होकर निर्विकार हुआ जा सकता है और निर्विकारता ही सम रूप ब्रह्म का लक्षण है ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ ५/१९ सर्वकर्मसंन्यास पूर्वक ज्ञानयोग का आश्रय लेना चाहिए ।
              भावार्थ— यहाँ श्रीभगवान  ज्ञान से अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए कहना चाहते हैं कि मैं ही साक्षात ज्ञानस्वरूप हूँ, अतः तू मुझ ज्ञानस्वरूप का ही अनुष्ठान कर क्योंकि यज्ञ, दान, तपादि जितने भी शास्त्रीय कर्म हैं उन सभी कर्मों का चातुर्य मेरी प्राप्ति ही है अर्थात ज्ञान के द्वारा मुझसे अभिन्नता को प्राप्त कर लेना ही संपूर्ण कर्मों की कुशलता है ॥५०॥

                 संबंध— कर्मफल के त्याग का फल बता रहे हैं…..
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः  पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥२/५१॥
              शब्दार्थ— मनीषीगण कर्म से उत्पन्न पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत जो कुछ भी प्राप्त होने वाला है उसको त्याग करके बुद्धि को युक्त अर्थात परमात्मा के साथ एकीभूत होकर जन्मादि बन्धनों से भलीभाँति मुक्त होकर निर्मल पद अर्थात मोक्ष को प्राप्त करते हैं ।
               तात्पर्यार्थ— कर्मफल के त्याग और ज्ञान की महिमा का वर्णन चल रहा है । कहते हैं कि बुद्धि को योग से युक्त करके अर्थात ज्ञानयोग में में स्थित होकर कर्म से उत्पन्न होने वाले स्वर्गादि फलों को मनीषी अर्थात ज्ञानयोगी त्याग देते हैं क्योंकि ये सभी फल शरीर के हेतु जन्म मृत्यु के कारण होते हैं, अतः उन्हें त्याग देते हैं । यह ज्ञानयोग द्वारा ही संभव है तभी २/३९ में ज्ञानयोग द्वारा कर्मबन्धन का नाश, ज्ञानयोग द्वारा सुकृत-दुष्कृत का नाश २/५१, ज्ञानयोग द्वारा सभी कर्मों का नाश ४/३७, ज्ञान पवित्र है इसकी समता कहीं नहीं है ४/३८, मैं ज्ञानयोग देता हूँ १०/१०, ज्ञानदीप के द्वारा १०/११, आदि आगे भी कहेंगे । बिना ब्राह्मी स्थिति के कर्म से उत्पन्न विभिन्न शरीरों, लोकों का नाश संभव नहीं है । अतः ज्ञानयोग के द्वारा जन्म मृत्यु के बन्धन से पूर्णतः मुक्त होकर षड्विकारों से रहित निर्मल पद अर्थात मोक्ष को प्राप्त करते हैं ।
             अथवा यहाँ इस श्लोक को दो भावों से समझना चाहिए एक तो साधक भाव और दूसरा सिद्धभाव । साधक भाव में “सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाययौ २/३८, सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा” २/४८ का भाव यहां कर्म से उत्पन्न फल में सन्निहित है । साधक यह बिल्कुल यह न विचार करे कि हमें हमारे ज्ञान के अनुष्ठान या कर्म के अनुष्ठान की सिद्धि मिले ही क्योंकि सिद्धि मिलना भी कर्मों के फलस्वरूप शरीर दृष्टि से ही है और सिद्धि मिल भी गई तो प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सिद्धि का मिलना और उसमें प्रसन्न होना ये लक्षण परिच्छिनता के हैं । परिच्छिन्नता है तो शरीर है, और शरीर हैं तो वह भले मानस शरीर ही क्यों न हो, क्लेश सुनिश्चित है । मोक्ष की चाह भी परिच्छिन्नता में ही होती है और परिच्छिन्नता कभी मोक्ष हो नहीं सकती क्योंकि वह स्व-स्वरूप से अभिन्न ही है । अतः अपरिच्छिन्न ब्रह्म में ये सिद्धि असिद्धि मोक्ष और बंध होता ही नहीं है इन सबका परित्याग करके साधक गड्ढे या कुएं के समान वाली बुद्धि का त्याग करके सर्वत्र परिपूर्ण समुद्र बुद्धिवाला हो जाता है यही बुद्धि भाव अनामय पद अर्थात मोक्ष की प्राप्ति का हेतु होने से अनामय पद की प्राप्ति बताया गया है । दूसरे पक्ष में जो कर्मों के फलस्वरूप शरीर भाव का भी त्याग कर चुका है वह जीते जी तो मुक्त है ही तथापि शरीर त्याग के पश्चात षड्विकार रहित अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है यही ज्ञानयोग से जन्म के बंधन को भली-भांति मुक्त होना अर्थात मोक्ष नाम से कहा गया है ॥५१॥

            संबंध— यह ज्ञानयोग बिना वैराग्य के संभव नहीं है, ऐसा कहते हैं…..
यदा ते मोह  कलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥२/५२॥
           शब्दार्थ— जिस समय तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जायेगी उसी समय सुने गये और सुने जाने वाले सभी फलश्रुति का त्याग कर देगा अर्थात लोक परलोक से वैराग्य हो जायेगा ।
          तात्पर्यार्थ— संसार का बीज मोह ही है । उससे पार पाना या निकल पाना अत्यंत दुष्कर है । तुम जो भी पिता, पितामह, द्रोण आदि की बात कर रहे हो यह मोह ही है । इस मोहरूपी कल्मष के कारण ही मनुष्य क्या करना और क्या नहीं करना ? आदि का विवेक नहीं कर पाता है । । राग, द्वेष, काम, क्रोध आदि मोह के कारण ही प्रवृत्त होते हैं । इस मोह के कारण जमा हुआ इस आत्मा(चित्त) पर कीचड़ असिद्धि ‘अहं इदं’ का भेद करने में समर्थ नहीं होने देता और शरीरादि को ही मैं मेरा मानकर सुखी-दुःखी होता है । अधिक क्या कहा जाये मोह की महिमा बड़ी बलवान है । उसको तू जब पार कर जायेगा तब जिन फलश्रुतियों को तूने सुना है और आगे सुनेगा, देखा है, देखेगा इत्यादि की संवेदनाओं से रहित अर्थात वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा । बिना वैराग्य के चित्तशुद्धि और बिना चित्तशुद्धि के आत्मा-अनात्मा का विवेक नहीं हो सकता । अतः पहले वैराग्य को प्राप्त कर ।
               अथवा पूर्व श्लोक में अनामय पद की प्राप्ति में जो साधन बताया गया है उसी को यहां स्पष्ट करते हुए कहते हैं वस्तुतः जैसे स्वर्ण कीचड़ में लिपट गया जिसके कारण यह नहीं दिख रहा है इस कीचड़ के अन्दर सोना भी है, किन्तु जब कीचड़ को हटाकर साफ कर दिया तो साफ दिखने लगा कि यह सोना है । जब कीचड़ में था तब भी सोना और कीचड़ साफ होने पर भी सोना, किन्तु कीचड़ के कारण हम यह सोना है ऐसा करके जान नहीं सके,  ऐसे ही यह आत्मा जिसे संपूर्ण जगत में परमात्मा के नाम से जाना जाता है वह मोह रूपी कीचड़ के दलदल में फंस हुआ सा स्वयं को मानने लग गया । बहुत प्रकार के भोगैश्वर्य का श्रवण करके वह मोहाच्छन्न होकर उन्हीं की प्राप्ति में लगा रहता है, किन्तु जिस समय तेरी बुद्धि इस दलदल को जो सुनी गई फल श्रुति है और जो भविष्य में फलश्रुति सुनी जायेगी उससे जब वैराग्य हो जायेगा तब उसी समय वह अनामय निर्वेद पद प्राप्त हो जायेगा । यानी स्वसंवेद्य मन वाणी, बुद्धि से न जाना जा सकने वाला होने के कारण निर्वेद नाम से कहा जाता है उस निर्वेद यानी स्वसंवेद्य यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह अर्थात मन वाणी, बुद्धि से न जाना जा सकने वाला होने के कारण निर्वेद नाम से कहा जाता है उस निर्वेद पद को प्राप्त कर लेगा । ऊपर का अनामय पद और यहां का निर्वेद पद समझना चाहिए भिन्न नहीं । वस्तुतः स्वरूप तो अक्रिय पद है किन्तु प्राप्त करना गत्यर्थक कहने का तात्पर्य यह है जिस मिथ्या भ्रम में स्वयं को सुखी दुःखी होने वाला अपने को जीव मान रहा था उसी मिथ्या भ्रम के मिथ्या निवारण से उसे प्राप्त होना कहा गया है जबकि जिस समय वह सुखी दुःखी जीवत्व का अनुभव करता है उस समय भी ब्रह्म है और जिस समय ब्राह्मी रूप का अनुभव करता है उस समय भी वह ब्रह्म है । जैसे खा पीकर सोया हुआ पुरुष भूखा न होने पर भी स्वप्न में भूख का अनुभव करता है और स्वप्न के ही भोजन से वह तृप्ति का भी अनुभव करता है जबकि वह जिस समय भूख का अनुभव करता है उस समय भी भूखा नहीं है और जिस समय तृप्ति का अनुभव करता है उस समय भी तृप्त ही था । दोनो दशा में न उसने खाया, न भूखा हुआ, क्योंकि वह तो खा पीकर निश्चिंत सोया हुआ है फिर भी खाना और तृप्त होना कहा जाता है । वैसे ही यहाँ बन्ध और मोक्ष का कथन है वस्तुतः स्वरूपगत यह कुछ भी नहीं है, वह ज्यों त्यों था, है और रहेगा । इसमें किसी प्रकार की क्रिया या विकार न था, न है न होगा और हो सकता भी नहीं है । यही निर्वेद पद प्राप्त करना है । 
              स्पष्टीकरण― यहाँ हम स्पष्ट कर देते हैं कि अधिकांश लोग अर्थ करते कि जिस समय मोहरूपी दलदल को पार कर जायेगा उस समय निर्वेद यानी वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा । निर्वेद का अर्थ यहां वैराग्य किया जाता है और है भी, हम इसका विरोध कदापि नहीं करते, क्योंकि व्याकरण में इसका अर्थ वैराग्य ही है तथापि विचार पूर्वक निर्वेद नामक वैराग्य के स्वरूप पर विचार करने पर कि जब मोह रूपी दलदल को पार कर जायेग― यह जो पार करना है यह बिना वैराग्य के कैसे पार हुआ ? जैसे कोई कहे कि जब देवदत्त नदी पार कर जायेगा तब नाव को छोड़ देगा, इसमें भी कहने की क्या बात है ? वह तो आप नहीं कहोगे तो भी छोड़ना ही है । लेकिन नई बात अगर होगी तो यह कि देवदत्त नदी पार करके फिर बिना किसी अन्य विघ्न के अपने गतव्य को पहुंच जायेगा । यही यहां पर समझना चाहिए कि मोहरूपी दलदल पार करने का मतलब जिन काम्यकर्मों का वर्णन श्लोक ४१ के उत्तरार्ध से श्लोक ४४ तक जिन श्रुति प्रतिपादित काम्यकर्मों का वर्णन किया गया है और जिनका वर्णन ‘त्रैगुण्यविषया वेदा’ २/४५ कहकर किया गया है, उन सभी का जिस क्षण में उल्लंघन कर जायेगा तत्क्षण बिना किसी काल के एक छोटे से छोटे अंश का बिलंब किये उसी काल में निर्वेद को प्राप्त हो जायेगा अर्थात जिन त्रिगुणात्मक विषयों का वर्णन अध्याय १४ में किया जायेगा और जिनका वर्णन अध्याय तीन में भी ‘गुणकर्मविभागयोः’ ३/२८ इत्यादि से किया जायेगा और अध्याय तेरह में जिसे प्रकृति नाम से वर्णन किया जायेगा उन सभी से अशेष वैराग्य अर्थात अनात्म पदार्थ से शून्य हो जायेगा इसी के लिए ‘निस्त्रैगुण्यो भव’ २/४५ आदेश दिया गया था । जिसके पश्चात तत्क्षण आत्मपद में स्थित हो जाता है । यही वह निस्त्रैगुण्य एवं निर्वेद पद पाना है । इसे ही ‘गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तऽमृतश्नुते’ १४/२० कहा गया है । इसकी व्याख्या उसी स्थान पर की जायेगी । यहां तो मात्र इतना बताना है कि बिना पूर्वापर का विचार किये, बिना उपरोक्त व्याख्या में अनामय पद कैसे हो गया ? या आत्मपद कैसे हो गया ? यह सोच समझकर ही दोषारोपण करें । दूसरी बात जब भी कोई युक्ति  प्रकरण पूरा होता है तब उस प्रकरण का फल कहा जाता है और यहाँ का आखिरी फल है निर्वेद को प्राप्त होना ही है, इस आधार पर भी निर्वेद का अर्थ निर्विकार निर्लेप आत्मपद ही होगा । सभी विकारों और उपाधियों की संगति का त्याग करके जो भी बचता है वह भी ‘पुरुषः परः’ १३/२२ ही बचता है । अतः इस आधार पर भी एकमेवाद्वितीयम् नामक आत्मपद स्वसंवेद्य अहं ब्रह्मास्मि की अनुभूति ‘अस्ति’ पद ही शेष बचता है । अतः मेरे अनुकूल मुझे तृप्ति प्रदान करने वाला अर्थ मेरे लिए यही अभीष्ट है ।
               सारांश― प्रकृति और उसके विकारों से सर्वथा निर्लिप्त होने पर ही देशकाल की बाधा से रहित अपरिच्छिन्न आत्मपद प्राप्त होता है ॥५२॥

                 संबंध—  इस प्रकार वैराग्य को प्राप्त होने पर……

श्रुति विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला  बुद्धिस्तदा  योगमवाप्स्यसि ॥२/५३॥
              शब्दार्थ— श्रुतियों के परस्पर कथन से सन्देह को प्राप्त तेरी बुद्धि जब निश्चल हो जायेगी तब अचल समाधि रूप योग को प्राप्त करेगा ।
        तात्पर्यार्थ— साधक श्रुति-शास्त्र द्वारा कहे गए ब्रह्म प्राप्ति के विभिन्न परस्पर विरोधी साधन, साध्य के श्रवण से मन संदेह के कटघरे में खड़ा हो जाता है और वह निश्चय नहीं कर पाता कि कौन सा साधन करे जिससे कल्याण की प्राप्ति हो । श्रुति सगुण की भी महिमा का उत्कृष्ट गान करती है और निर्गुण का भी । इस प्रकार के भ्रम का निवारण गुरु परंपरा से जब वेदान्त शास्त्र श्रवण करके यह सुनिश्चित हो जायेगा कि सभी शास्त्रों का एक ही तात्पर्य है ब्रह्मतत्त्व की प्राप्ति, तब वह चित्त की विकृति को नष्ट करके समाधान रूप समाधि को प्राप्त करके योग अर्थात ज्ञान को प्राप्त करके अचल अर्थात स्थिर हो जायेगी ।
             अथवा मूल में श्रुति शब्द है अतः यहाँ श्रुति यानी वेदों की पूर्वमीमांसा संबंधित सकाम कर्मफल का कथन करने वाली श्रुतियों के द्वारा कामनाओं से भ्रमित हुई बुद्धि और भिन्न भिन्न आचार्यों और शास्त्रों में कही गई उपासना संबंधित भिन्न भिन्न साधनाएं एवं उनके साध्य के परस्पर विरोधाभास से भ्रमित हुई बुद्धि का निश्चय न कर पाना कि कौन सी उपासना करूँ या लक्ष्य प्राप्ति के लिए कौन सी साधना श्रेष्ठ जिसे मैं करूँ ? यही है श्रुतिविप्रतिपन्ना, क्योंकि सभी अर्जुन की तरह श्रेष्ठ ही साधना करना चाहते हैं कनिष्ठ नहीं । इस प्रकार की जब बुद्धि उत्तरमीमांसा अर्थात आचार्य के प्रसाद से तद्विद्धि प्रणिपातेन ४/३४ अर्थात वेदांत के श्रवण, मनन, निदिध्यासन से जिस समय स्थिर हो जायेगी अर्थात एक ही आत्मस्वरूप में समाहित हो जायेगी तदा यानी उसी समय अविलंब योग अर्थात आत्मसाक्षात्कार यानी ब्रह्म की प्राप्ति हो जायेगी । यहाँ पर स्वरूप में समाहित होने पर ब्रह्म की प्राप्ति का मतलब परिच्छिन्नता का समाप्त होना कहा गया है ।
            विशेष भाव:— अब तक के विचार में तथ्य जो सामने आया है उसका सारांश यह है कि पहली बात उत्तम कोटि के साधक के लिए किसी भी प्रकार अन्य कोई भी कर्म है ही नहीं एक मात्र उसका कर्म है कर्म का स्वरूप से त्याग करके आत्मा-अनात्मा के विवेक पूर्वक अनात्मा का त्याग करके निष्क्रिय आत्मभाव में स्थित होना, इसी को आगे कहेंगे—
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१३/११॥
            अर्थात आत्मा का साक्षात्कार कराने वाले साधनों में नित्य-निरंतर अभ्यासरत रहना, उस साधनों के फलस्वरूप उत्पन्न आत्मा के ज्ञान के अर्थभूत तात्त्विक स्वरूप का दर्शन करना अर्थात जीव-ब्रह्म की एकता का अनुभव करना यही वास्तविक ज्ञान है, इससे भिन्न जो कुछ भी है वह अज्ञान है । यह स्वरूप से कर्मत्याग करने वाले उत्तम अधिकारी की साधना है, किन्तु जो स्वरूप से कर्मत्याग नहीं कर सकते हैं वे ज्ञानयोग का आश्रय लेकर कर्म के तात्त्विक स्वारूप को समझकर कर्म करें जैसा कि अध्याय तीन और चार में कहा जायेगा । इसमें पहला सांख्ययोगी अर्थात ज्ञानयोगी दूसरा बुद्धियोग से युक्त अर्थात आत्मा-अनात्मा के विवेक पूर्वक उसे सार-आसार भाव को समझकर कर्म करने वाला कर्योगी कहा गया है । संपूर्ण गीता में पहले वाले की स्तुति और दूसरे वाले को स्वधर्मानुसार विविदिषु संन्यासी को उसकी परंपरानुसार कर्म करने पर बल दिया गया है ॥५३॥
             
            समीक्षा― इस प्रकार श्लोक २/४६ में जो बताया गया था कि जिस प्रकार गड्ढे, कुएं के पानी की औपचारिकता भी समुद्र के प्राप्त होने पर समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार वेदों के कर्मकांड से भी ब्रह्मवेत्ता का संबंध समाप्त हो जाता है, कैसे ? इसके लिए साधन के रूप में फलासक्ति और कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व के अभिमान से रहित हो समत्व में स्थित होकर ब्रह्म प्राप्ति के निमित्त कर्म करते हुए ज्ञान का लक्ष्य सामने रखकर चित्तशुद्धि पूर्वक ज्ञानयोग का अन्वेषण यानी खोज करे । उसी ज्ञानयोग का आश्रय लेकर कर्म से उत्पन्न सभी शुभ और अशुभ फलाभिसन्धि का शरीर सहित त्याग दे अर्थात सर्वथा आसक्ति रहित हो जाने पर मोह रूपी दलदल एवं श्रवण किये हुए कामुक और भ्रामक भावों से मुक्त होकर निर्वेद पद अर्थात आत्मस्वरूप की मुमुक्षु को प्राप्ति तत्क्षण हो जाती है, उसमें ज्ञान होने के किसी अगले क्षण की आवश्यकता नहीं होती है । यही शरीर रहते सिद्धावस्था कहा जाता है और शरीर त्याग करने पर मोक्ष यानी जीवन्मुक्ति एवं विदेह मुक्ति दोनो ही अवस्था इस प्रकार के ज्ञानयोगी मुमुक्षु को प्राप्त हो जाती है । यह भाव इन आठ श्लोकों द्वारा व्यक्त किया गया है ॥४६-५३॥

                     संबंध— २/३९ से २/५३ तक ज्ञानयोग की महिमा का वर्णन करते हुए मुमुक्षु के लिए ज्ञानयोग की प्राप्ति के साधनों का वर्णन करते हुए ज्ञानयोग में आरूढ़ ज्ञानी का लक्षण कहा तथापि ज्ञानी का लक्षण ठीक ठीक समझ में नहीं आया, अतः अब अर्जुन ज्ञानी का लक्षण पूछते हैं……
    अर्जुन उवाच
स्थित प्रज्ञस्य का  भाषा समाधिस्तस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत ब्रजेत किम् ॥२/५४॥
           शब्दार्थ— हे केशव ! चित्त के समाधान रूप समाधि को प्राप्त होकर जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है उसका लक्षण क्या है ? वह कैसे बोलता, चलता और बैठता कैसे है ?
           तात्पर्यार्थ— यहां पर अर्जुन एक साथ दो प्रश्न सिद्ध और साधक की दृष्टि से पूछता है कि जो आत्मसिद्ध हैं और जो आत्मसिद्धि को प्राप्त होने वाले हैं उनका परिचय क्या है ? आत्मा में स्थित सिद्ध शरीर के रहने तक बोलता किस प्रकार है और साधक और साधक के बोलने का ढंग क्या होगा ? इसके अतिरिक्त उसके बैठने और चलने के लक्षण सिद्ध के क्या हैं और साधक में क्या होंगे ?  इस प्रकार सिद्ध और साधक दोनो एक दूसरे में ओतप्रोत हैं भगवान भी उसी प्रकार सिद्ध के लक्षण बताते हुए उन्हीं लक्षणों का साधक के द्वारा अनुकरणीय फल सहित अध्याय समाप्ति पर्यंत बताएंगे । यहां पर मुख्यतः दो ही प्रश्न समझना चाहिए, पहला साधक-सिद्ध का लक्षण और दूसरा व्यवहार ॥५४॥

              संबंध— सिद्ध के लक्षण साधक के लिए साध्य होते हैं, अतः अध्याय की समाप्ति पर्यंत विस्तृत उत्तर देते हैं…..
श्रीभगवानुवाच
प्रजाहित यदा कामान्सर्वान्पार्थ  मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते ॥२/५५॥
           शब्दार्थ― जिस समय मनोगत अशेष कामनाएं नष्ट होकर स्वयं से स्वयं में सन्तुष्ट होता है उस समय स्थित प्रज्ञ कहते हैं ।
               तात्पर्यार्थ— पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत अन्तर्बाह्य सुनी गई और सुनी जाने वाली मन में उत्पन्न होने वाली संपूर्ण संकल्प विकल्पात्मक कामनाओं का त्याग कर देता है, किसी भी प्रकार की लोक, परलोक, जीवन, मरण सिद्धि-असिद्धि यहाँ तक मोक्ष की भी कामना नहीं करता ऐसा मन ही आत्मा है । कामनाओं से रहित होने के कारण सदैव एकरस, चिद्रूप, कूटस्थ, आनन्दस्वरूप जब स्वयं से स्वयं में रमण करनेवाले नित्य एकरस स्थित होकर कुछ भी चिन्तन न करे “आत्मसंस्थं मन कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्" ६/२५, तब उस आत्मरूप समाधि में स्थित को स्थित प्रज्ञ कहते हैं ।
                 भावार्थ— आत्मा से आत्मा में सन्तुष्ट होना अर्थात आत्मैक्य को प्राप्त होना । यह सिद्ध का लक्षण कहा और साधक को इसका अभ्यास करना चाहिए यह भी बताया ॥५५॥

          संबंध— अब सिद्ध बोलता कैसे है यह बताकर साधक को भी अनुसरण करने के लिए अगले दो श्लोक में कहते हैं…..
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः  स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥२/५६॥
           शब्दार्थ— जिसका मन दुःख से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, सुख के स्पर्श से रहित होता है, राग, भय, क्रोध जिसके चले गए हैं ऐसे निरंतर मनन एवं मौन को प्राप्त स्थिर बुद्धि महात्मा को स्थितधी कहते हैं ।
          तात्पर्यार्थ— दुःख-सुख का स्पर्श कामनाओं के कारण होता है, किन्तु जीने मरने की भी इच्छा जिनकी समाप्त हो गई है ऐसे सर्वत्यागी संन्यासी, वर्षा, सर्दी, शत्रु, व्याघ्रादि शेष का अन्वय त्रिविध तापों में समझ लेना चाहिए अर्थात इनके अनुकूल होने से सुखी नहीं और प्रतिकूल होने से दुःखी नहीं नहीं होते । वेदान्त वाक्य तत्त्वमसि आदि के श्रवण, मनन, निदिध्यासन में निरंतर तत्पर मौन को प्राप्त होकर जो मौन हो चुका है वही मुनि है, वही स्थित प्रज्ञा वाला है 
            सारांश― यहां अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनो ही परिस्थितियों में निर्विकार होना ही स्थित प्रज्ञ कहा गया है ॥५६॥

            संबंध— आगे कहते हैं……
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा  प्रतिष्ठिता ॥२/५७॥
              शब्दार्थ— जो सर्वत्यागी संन्यासी आसक्ति रहित है फिर भी प्रारब्धानुसार जो भी शुभाशुभ प्राप्त हो जाये तो वह उनसे न तो प्रसन्न होता है और न ही द्वेष करता है, उस यति की प्रज्ञा ब्रह्म में प्रतिष्ठित है ।
                तात्पर्यार्थ— सर्वत्यागी संन्यासी की सर्वत्र आसक्ति रहित स्थिति है । वह जीवन अर्थात शरीर से भी निरासक्त हो चुका है । प्रारब्धानुसार शरीर के निमित्त लंगोटी, कंबल और जीवन के निमित्त भोजन अनुकूल मिल भी जाये तो प्रसन्न नहीं होता और न मिले तो शरीर अर्थात जीवन के निमित्त उन उन वस्तुओं को लेकर दुःखी नहीं होता । उसी परमभाग्यवान संन्यासी की बुद्धि ब्रह्म में प्रतिष्ठित है ।
             यहाँ आया है सर्वत्र आसक्ति का न होना और पहले कहा मनोगत कामना की निवृत्त अर्थात अशेष रूप से आसक्ति रहित होना लेश भी आसक्ति का शेष नहीं बचना चाहिए । जैसे किसी बर्तन में तेल भरने के बाद पलट दिया और उसमें पानी भर दिया तो उसमें लगा हुआ तेल पूरे पानी में फैल जाता है, वह पानी किसी काम का नहीं होता, उस पानी को पलट कर दूसरा भरा तो उसमें भी तेल किन्तु जब अधिक मात्रा में सूखी राख डालकर कसके साफ दो-तीन बार किया तो वह तेल उसमें नहीं रहता और फिर पानी भी शुद्ध रहता है, इसी प्रकार कामना का लेश भी शेष है तो उसकी साधना लक्ष्य की प्राप्ति कभी नहीं होने देगी । धन पुत्रादि में गृहस्थ में ये स्वाभाविक है ही, इसलिये यह सर्वकर्मसंन्यास का लक्षण यहाँ अर्जुन के पहले प्रश्न के उत्तर रूप में तीन श्लोकों में दिया गया ।
            भावार्थ— उपरोक्त अर्जुन के–  क्या अथवा कैसे बोतता है ? इस दूसरे प्रश्न का उत्तर दो श्लोक में हो चुका है । इससे मुमुक्षु साधक को इन परिस्थितियों में भी वाणी के संयम शिक्षा है ॥५७॥

               संबंध— अब सिद्ध के बैठने का लक्षण बताते हैं…….
यदा  संहरते  चायं कूर्मोऽङ्गानीव  सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२/५८॥
                 शब्दार्थ— जैसे कछुआ अपने अन्दर खींच लेता है वैसे ही चारो ओर से जिसने इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच लिया है, उसी सर्वत्यागी संन्यासी की प्रज्ञा प्रतिष्ठित है ।
                 तात्पर्यार्थ— कछुआ भय के कारण अपने शरीर को अन्दर खींच लेता है जिससे शत्रुओं से अपनी रक्षा कर लेता है वैसे ही मुमुक्षु जिस समय इन्द्रियों को उनके विषयों से सावधानी पूर्वक रोक लेता है क्योंकि ये विषय ही साधक के शत्रु हैं । ज्ञान में स्थित सर्वकर्मसंन्यासी इन्द्रियों पर नियमन करके अपनी रक्षा कर लेता है । यहां पर अर्जुन के दूसरे प्रश्न का उत्तर समझना चाहिए कि वह बोलता तो हैं लेकिन जितना अत्यावश्यक है उतने मात्र से शरीर निर्वाह की प्रक्रिया के निमित्त भिक्षा आदि के निमित्त ही बोलता है अन्य भाषण नहीं करता, अन्यथा चित्तवृत्ति के वाह्य विषयों में रमने का भय उत्पन्न हो सकता है । अतः इन्द्रियों अन्तर्वृत्ति में श्रवण मनन निध्यासन में निरंतर लगाये रखना चाहिए ॥५८॥

                संबंध— तो फिर इद्रियों को जीवन निर्वाह के निमित्त भिक्षादि के निमित्त छूट देने पर तो अनियंत्रित होती होंगी ? इस आशंका पर…..
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य  देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥२/५९॥
              शब्दार्थ— शरीराभिमानी पुरुष इन्द्रियों के विषय न देने से उनके विषय तो छूट जाते हैं लेकिन आसक्ति नहीं जाती, किन्तु परम द्रष्टा अर्थात तत्त्ववेत्ता अर्थात ब्राह्मी स्थिति वाले संन्यासी की आसक्ति भी चली जाती है ।
           तात्पर्यार्थ— साधक साधना काल में बहुत संयम उपवास आदि करता है किन्तु बाहरी विषयों को रोक देने पर भी अन्दर मन विषयों का रस लेता रहता है जिससे उसका वैराग्य पुष्ट न होकर कभी भी विषयों के कारण पतन को प्राप्त हो सकता है, किन्तु जिसकी स्वरूप में स्थिति हो गई है उसके सभी अन्तर्बाह्य विषय पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं इसी को कहा एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति २/७२ अर्थात उसका सांसारिक यानी लौकिक और पारलौकिक सभी भोगों की निवृत्त हो जाती है ।
           भावार्थ—मुमुक्षु संन्यासी इसलिये श्रवण, मनन, निदिध्यासन में लगे रहते हैं कि इन्द्रिय निग्रह करने पर भी आसक्ति नहीं गई है, अतः पतन के अवसर बहुत हैं, इसलिए यहाँ साधक को अन्दर से विषय रहित कहना अपेक्षित है ॥५९॥

               संबंध— अगर मुमुक्षु इन्द्रिय निग्रह के अहंकार में श्रवण, मनन, निदिध्यासन में प्रमाद करता है तो……
ययतो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥२/६०॥ 
        शब्दार्थ— विषयों के प्रति आसक्ति नष्ट न होने के कारण ब्रह्म निष्ठा में प्रयत्नशील पुरुष की प्रमथनशील इन्द्रियां अर्थात दही मथने के समान हे कौन्तेय ! मन का बलात् हरण कर लेती हैं ।
             तात्पर्यार्थ— विपश्चित अर्थात श्रवण, मनन, निदिध्यासन सर्वत्र ब्रह्म दृष्टि के अभ्यास में लगा हुआ बलात् इन्द्रियों पर शासन करनेवाला, उनके इन्द्रियों के वशीभूत अजितेन्द्रिय होने के कारण संपूर्ण इन्द्रियां उसके मन को बारंबार मथकर विषयों में बलात् डालदेती हैं । जिससे वह स्वरूप च्युत हो जाता है । अतः आसक्ति का त्याग ही मुमुक्षु का सर्वश्रेष्ठ साधन है ।
              अर्थात अपने अपने विषयों में मन को जबरन् खींच लेती हैं। अतः यहाँ मुमुक्षु और साधक को सावधान किया गया है ॥६०॥
                    संबंध— अब इन्द्रिय निग्रह पर बल देते हैं…
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त  आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२/६१॥
               शब्दार्थ— इसीलिये उन सभी इन्द्रियों का नियमन करके मुझ परमतत्त्व से युक्त अर्थात एकीभूत हो जा, क्योंकि जिसकी इन्द्रियां वश में हैं उसी की बुद्धि ब्रह्म में प्रतिष्ठित है ।
            तात्पर्यार्थ— सभी इन्द्रियां अनुशासित करके परमतत्त्व में एकीभूत होकर शान्त हो जाना ही बुद्धि का ब्रह्म में प्रतिष्ठित होना है, अर्थात जिज्ञासु का आत्मैक्य लक्ष्य हेतु से अतिरिक्त सर्वत्र से उपराम हो जाना ही बुद्धि की स्थिरता है ।
                  यहाँ पर विशेष ध्यान देने योग्य प्रसंग चल रहा है आत्मन्येवात्मना तुष्टः का लक्ष्य है आत्मवान् २/४५ का तो फिर कृष्ण ने मत्परः क्यों कहा ? यहाँ कृष्ण के मत्परः कहने का भाव साढे तीन हाथ का शरीर नहीं है बल्कि मत् प्रत्यय मैं का अर्थभूत सर्वात्मा ही है । इस प्रकार ‘त्वं’ पदार्थ का लक्ष्य आत्मा और मयि आत्मप्रत्यय द्वारा ‘तत्’ पदार्थ का लक्ष्य ईश्वर, दोनो में अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । यही ‘तमेव शरणं गच्छ’ १८/६२ एवं ‘मामेकं शरणं ब्रज’ १८/६६ में भी तम् द्वारा तत् पदार्थ और मामेकं द्वारा मैं का अर्थ आत्मा यानी तत् और त्वं पदार्थ का एकत्व प्रतिपादित किया गया है । ये बात उपक्रम और उपसंहार के साथ ठीक ठीक बैठ जाने पर ही गीता का लक्ष्य समझ में आयेगा । अर्थात जो एक मात्र आत्मस्वरूप की शरण ग्रहण किये है उसी की बुद्धि समाधिस्थ है । यह अर्जुन के तीसरे प्रश्न का उत्तर हो गया कि वह बैठता कैसे है ॥६१॥

             संबंध— इन्द्रियों के संयमित न होने से क्या होगा ? विषय चिंतन करेगा…..
ध्यायतो       विषयान्पुंसः   सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२/६२॥
                  शब्दार्थ— पुरुष बारंबार विषयों का चिन्तन करेगा जिससे आसक्ति होगी आसक्ति से काम और काम से क्रोध उत्पन्न होगा ।
             तात्पर्यार्थ— शब्दादि पांचों विषयों का चिन्तन उनके रस की संगति यानी उनमें रमणीयता देखने या उनके गुणों का चिंतन करता है जिससे काम अर्थात उन्हें प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है । उदाहरण के लिए मेरा सारा का सारा लेखन कार्य संपर्क यन्त्र(फोन) से चल रहा है तथापि ऋषिकेश आने के बाद कुछ महात्माओं की संगति से लैपटॉप की आवश्यकता का अनुभव हुआ । आर्थिक व्यवस्था को देखते हुए खरीद नहीं सकता और किसी से आग्रह भी नहीं कर सकता था । बड़ा विक्षेप कई दिन चला । अन्त में मानस विचार आया कि जब अभी तक संपर्क यन्त्र से काम चल रहा था तो अब क्यों नहीं चल सकता ? बस मन शान्त हो गया । अतः ये संगति का प्रभाव है काम को उत्पन्न करना । काम की पूर्ति न होने पर क्रोध होता है, इसके लिए श्लोक ५९ में कहा कि बलात् इन्द्रियों के रोके गये विषयों से उनका आन्तरिक रस नहीं जाता अतः इन्द्रियां मन को मथ डालती हैं २/६० ऐसी स्थिति में यदि कोई उस काम प्राप्ति में बाधक बनता है तो क्रोध उत्पन्न हो जाता है 
          भावार्थ—विषयों के रम्यत्व अर्थात उनके द्वारा प्राप्त होने वाले सुखों एवं गुणों का चिन्तन करने से आसक्ति होगी फिर उन्हें प्राप्त करने की कामना होगी, प्राप्ति में बाधा होने से क्रोध उत्पन्न होगा । भाव यह कि विषयों में साधक को दोष देखना आवश्यक है ॥६२॥

               संबंध— अब क्रोध से ही पतन होता है यह बता रहे हैं…..
क्रोधाद्भवति  सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२/६३॥
               शब्दार्थ— क्रोध से उत्कृष्ट मोह, मोह से स्मृतिनाश, स्मृतिनाश से बुद्धिनाश और बुद्धिनाश से साधक का विनाश हो जाता है ।
                तात्पर्यार्थ— क्रोध के कारण मनुष्य सम्मोह अर्थात मूढ़भाव को प्राप्त हो जाता है जिससे कर्तव्य, अकर्तव्य का विवेक नष्ट हो जाता है, जिससे कृत्याकृत्य का विवेक नष्ट हो जाता है । विवेक नष्ट होने से गुरु, शास्त्र का सम्मान नहीं करता वरन् अपमानित भी करता है, जिससे गुरु शास्त्र द्वारा प्राप्त संस्कार नष्ट हो जाने से सदसद् का विवेक नष्ट हो जाता जिससे उसके मनुष्यत्व का नाश हो जाता है, मनुष्यत्व का नाश ही पतन है, बाकी अन्य योनियां तो मनुष्यत्व से पतन के बाद स्वयं सिद्ध हैं ॥६३॥

             संबंध— अब तक श्रीभगवान अर्जुन के तीन प्रश्नों के लक्षण— बोलना और बैठना का उत्तर देकर अब कैसे चलता है का उत्तर अगले आठ श्लोकों में दे रहे हैं……
रागद्वेष  वियुक्तैस्तु   विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥२/६४॥
                शब्दार्थ— मन को अपने वश में करके भलीभाँति इन्द्रियों को राग-द्वेष से दूर रखते हुए इन्द्रियों के द्वारा विषयों का उपभोग करने वाले को प्रसन्नता प्राप्त होती है ।
                तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने प्रसन्नता की बात कही है अर्थात जब मन प्रसन्न होगा तभी लक्ष्यभूत कार्य में दृढ़ता होगी । प्रसन्नता के लिए मन का निर्विकार होना आवश्यक है इसलिये सर्वत्र अशेष रूप से राग-द्वेष का त्याग एवंं भोग बुद्धि का त्याग करके परमार्थ सिद्धि के लिए विचरण करे ।
              यहां दो बार आत्मा शब्द आया जिसमें एक तो अपने आधीन किया हुआ मन है और दूसरा निदिध्यासन में समाहित बुद्धि, यही उसकी प्रौढता यानी संशय विपर्यय रहित स्थिर बुद्धि है । प्रसन्नता का मतलब सभी वाह्य और अंतर विकारों से रहित होकर निर्लिप्त भाव से शरीर संबंधित कर्म करता हुआ आन्तरिक स्वास्थ्य को प्राप्त कर लेता है ।
           भावार्थ—कहीं किसी से लगाव नहीं,  कहीं किसी से द्वेष नहीं प्रारब्धवश जो कुछ मिल जाये भिक्षादि में उसी से संतुष्ट होकर इन्द्रियों को वश में रखने मात्र से मुमुक्षु प्रसन्नता अर्थात चित्त की निर्मलता को प्राप्त कर लेता है ॥६४॥
                  संबंध— चित्तशुद्धि से क्या होगा ?....
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशुः बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥२/६५॥
             शब्दार्थ— मुमुक्षु साधक के चित्त की प्रसन्नता होने से संपूर्ण दुःखों की निवृत्ति हो जाती है, चित्त की प्रसन्नता से बुद्धि शीघ्र ही परमतत्त्व स्वसंवेद्य आत्मा में स्थिर हो जाती है ।
               तात्पर्यार्थ— जब सभी प्रकार के राग-द्वेष, सुख-दुःख की निवृत्ति हो जाती है मन में किसी भी प्रकार का विक्षेप अर्थात आवश्यकता के प्रति आसक्ति, उसके न प्राप्त होने पर विक्षेप और विक्षेप से नानाप्रकार के संकट उत्पन्न हो जाते हैं । उन्हीं विक्षेप की निवृत्ति ही चित्त की प्रसन्नता है, जो बैठने के लक्षणों के अनुष्ठान से प्राप्त होती है अतः उन सभी विक्षेपों की निवृत्ति “यदृच्छा लाभसन्तुष्टः” ४/२२ से ही होगी । विक्षेप न होने से मुमुक्षु संन्यासी की “मैं ब्रह्म हूँ” की भावना शीघ्र स्थिर भाव को प्राप्त हो जाती है । ‘हि’ शब्द से मुमुक्षु की संशय रहित स्थिरता का सूचक है ।
               भावार्थ— यहां सभी दुःखों से आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक तीनो प्रकार के दुःखों का निवृत्ति होने पर ही मन का स्थिर बताया गया है ॥६५॥

                संबंध— क्योंकि अस्थिर बुद्धि में भावना और शान्ति नहीं होती…..
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य  न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥२/६६॥
             शब्दार्थ— शब्दार्थ जो पुरुष अयुक्त अर्थात ब्राह्मी भाव से युक्त नहीं है उसके पास न बुद्धि होती है और न भाव ही, बिना भाव के शान्ति कहाँ ?
             तात्पर्यार्थ— यहाँ पर पहले अयुक्त समझना चाहिए कर्म २/४७ का प्रसंग चल रहा था कि जब युक्त बुद्धि से सुकृत दुष्कृत कर्मफल आदि के त्याग की बात चल रही थी, अन्त में अचला एवं निश्चला २/५३ के द्वारा योग प्राप्ति की बात कही गई थी । तब अर्जुन ने सिद्ध का लक्षण पूछा था जिसके उत्तर में ‘ब्रजेत किम्’ का उत्तर दे रहे हैं । श्रीभगवान यहाँ पर बता रहे हैं कि जिसकी बुद्धि जिन साधनों से युक्त होकर राग आदि का नाश कर देती है उन्हीं संसाधनों का जब त्याग कर देती है अर्थात एक निश्चय २/४१ वाली नहीं होती है तो ऐसे संसाधनों अर्थात शमदमादि से रहित पुरुष के पास वेदान्त, शास्त्र, आचार्य आदि से श्रुत वाक्यों पर सत्, असत्, आत्मा, अनात्मा का विचार करने वाली बुद्धि नहीं होती और बिना आत्मा, अनात्मा विवेक बुद्धि के एक निश्चय वाली बुद्धि “वासुदेवः सर्वम्” ७/१९ अर्थात वासुदेव ही सब कुछ है, वह वासुदेव ‘मैं हूँ’ ऐसा अभिन्न आत्मैक्य भाव बनेगा नहीं और बिना आत्मैक्य भाव की भावना के शान्ति अर्थात स्थिरता नहीं बनती और बिना आत्मैक्य भाव में स्थित हुए सुख कहां ? अर्थात बाह्य और चंचल वृत्ति वाले मनुष्यों को कभी अखण्डानन्दैकरस की प्राप्ति नहीं हो सकती ।
               अथवा पूर्वोक्त श्लोक में बुद्धि का आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना बताया गया है उसी को स्पष्ट करते हैं कि जिसकी इन्द्रियां और मन जीता हुआ नहीं उसकी बद्धि स्वरूप का निश्चय नहीं कर पाती है यही अयुक्त बुद्धि है । ऐसी अयुक्त बुद्धि की आत्मस्वरूप में भावना अर्थात स्थिरता नहीं हो सकती है । जब तक आत्मस्वरूप में स्थिरता नहीं होती है तब तक शान्ति नहीं मिलती और जिसमें शान्ति नहीं है उसको सुख कैसे मिल सकता है ? अर्थात अशान्त मनुष्य जिसने मन और बुद्धि को नियंत्रित नहीं किया है उसे कभी सुख की अनुभूति नहीं हो सकती है, सदैव अशान्त ही रहेगा ।
             भावार्थ— निश्चय- स्थिरता ब्राह्मी भाव से, ब्राह्मी भाव आत्मा अनात्मा के विवेक से, आत्मा अनात्मा का विवेक श्रुत्याचार्य के द्वारा श्रवण और श्रवण से इन्द्रियों का दमन होता है । इन्द्रिय दमन के बिना समाहित चित्त नहीं हो सकता, अतः समाहित चित्त होना आवश्यक है तभी बुद्धि ब्राह्मी भाव में स्थित होगी ॥६६॥

               संबंध— अन्यथा……
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥२/६७॥
              शब्दार्थ— विषयों में विचरण करती हुई एक इन्द्रिय भी मन को अपने अनुकूल बनाकर जैसे वायु नौका का हरण कर लेती है वैसे अजितेन्द्रिय मुमुक्षुओं की प्रज्ञा हरण कर लेती है ।
                    तात्पर्यार्थ— सिद्ध पुरुष किस प्रकार (विषयों में) विचरण करता है और मुमुक्षु को कैसे रहना चाहिए ? इस पर प्रकाश डाला गया है । २/६० में असमाहित विवेकशील की इन्द्रियों के द्वारा बुद्धि का बलात् हरण करने की बात कही गई है, उसी बात को यहाँ पुष्ट करते हैं कि जैसे वायु जल में नाव का हरण कर लेती है अर्थात या तो नाव विपरीत दिशा में बह जायेगी या डुबो देगी, इसी प्रकार जब एक भी इन्द्रिय मन को अपने अनुकूल बना लेती है तो मन विषयों में विचरण करने लगता है तब उन विषय रूपी बयार के द्वारा मन रूपी जल में प्रज्ञा रूपी किस्ती डूब जाती है । अथवा अपने आत्म कल्याण का पथ त्याग करके पतित हो जाती है ।
             भावार्थ— यहां यह कहना है कि जब एक इन्द्रिय का विषय इतना अनर्थ कर सकता है तो सभी इन्द्रियां विषयों से मिलकर क्या कर सकती हैं यह साधक को स्वयं समझ लेना चाहिए ॥६७॥

             संबंध— एक भी इन्द्रिय भी यह सामर्थ्य रखती है तो सब मिलकर क्या कर सकती हैं ? यह अनुमान कर लो । इसलिए…..
तस्माद्यस्य  महाबाहो निगृहीतानि  सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२/६८॥
                शब्दार्थ— इसलिये हे महाबाहो ! जिस मुमुक्षु साधक की इन्द्रियां इन्द्रियों के विषयों से हटा ली गई हैं उसी की बुद्धि तत्त्व में प्रतिष्ठित है ।
             तात्पर्यार्थ— पूर्व में बताया गया कि किस प्रकार विषयासक्त मुमुक्षु अजितेन्द्रिय होने के कारण पतन को प्राप्त होता है, पतन को प्राप्त न हो इसलिये सब तरफ से राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, के जनक इन्द्रियों को उनके विषयों से निग्रह अर्थात शासन करते हुए जो समाहित चित्त अर्थात शमदमादि में तारतम्य रूप एकाग्रता करनी चाहिए अर्थात जो इन्द्रियों का निग्रह कर चुका है उसी की बुद्धि स्थित है ।
         भावार्थ— २/४४ में “भोगैश्वर्य प्रसक्तानां.......समाधौ न विधीयते” जो कहा था उसका उत्तर अब यहाँ पर देकर विषयों से उपराम और इन्द्रिय निग्रह में तत्पर जो श्रुत्याचार्य वाक्यों में “मैं ब्रह्म हूँ अथवा वासुदेवः सर्वम्” में दृढ़ निश्चय रूप समाधि कही गई है, उसे अवश्य करना चाहिए इस बात पर यहाँ बल दिया गया है ॥६८॥

                 संबंध— जब उपरोक्त प्रकार से मन चारों ओर से समाधिस्थ अर्थात एकीभाव को प्राप्त हो जाये तब…….
या निशा सर्वभूतानां  तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२/६९॥
               शब्दार्थ— जो संपूर्ण प्राणियों की रात्रि कही गई है वही संयमी के जागने का स्थान अर्थात दिन है जब संपूर्ण प्राणी जागते हैं तब वही मुनि की रात्रि होती है ।
            तात्पर्यार्थ—  ‘भोगैश्वर्य प्रसक्तानां’ २/४४ से लेकर यहाँ तक जो अजितेन्द्रिय पुरुष के लक्षण बताए गये हैं और आगे ‘ईश्वरोऽहमहं भोगी’ आदि से जो भी बताए जायेंगे वह सब अविद्या ग्रस्त अज्ञानी का दिन है, इसी में रात-दिन जागते रहते हैं रात्रि में सोकर भी स्वप्नादि में भी जागते अर्थात उसी का चिन्तन करते रहते हैं । उनके मन में जगत के वास्तविक प्रकाश को प्रकाशित करने वाली बुद्धि प्रकाश रूपा होने के कारण समझ में नहीं आती । संपूर्ण अविद्या ग्रस्त पशु-पक्षियों सहित मनुष्य आहार निद्रा भय मैथुन में ही जीवन व्यतीत कर देता है, ऐसा है अविद्या ग्रस्त जिन प्राणियों का दिन । उसमें मन और इन्द्रियों पर शासन करने वाला अर्थात श्रुत्याचार्य के प्रसाद से श्रवण, मनन, निदिध्यासन रूप समाधि से जिनके विवेक के द्वारा संसार की नश्वरता को जानकर आत्मा-अनात्मा का विवेक करने वाली प्रकाश रूपा बुद्धि अनात्मा जगत के सदैव सोते हुए पुरुष के समान सदैव औदासीन्य भाव में स्थित रहने के कारण रात्रि ही है जिसका विवेक स्वयं प्रकाश रूप होकर ब्रह्मविद्या रूप प्रकाशिका बुद्धि के साथ जिनका तादात्म्य होकर “मैं ब्रह्म ही हूँ” मुझसे न तो कुछ भिन्न है, न तो कुछ अभिन्न अर्थात भिन्न वस्तु के प्राप्ति के संकल्प-विकल्प से रहित, किन्तु सभी मुझसे अभिन्न हैं ऐसा व्यापक भाव रूप ही जिस संयमी का दिन है अर्थात इसी ब्रह्मी भाव में नित्य निरंतर रमण करने वाला स्वयं से स्वयं में संतुष्ट रहने वाला “आत्मन्येवात्मनातुष्टः” २/५५ स्वयं से स्वयं में रति अर्थात प्रेम अर्थात आत्ममिथुन, आत्मक्रीड़ा करने वाला आत्मतृप्त ३/१७, एक स्वयं से स्वयं में स्थित होकर कुछ भी चिन्तन न करने वाला ६/२५, ऐसे जितेन्द्रिय आत्मयोगी यति सर्वत्यागी, संन्यासी के लिए कुछ भी करणीय कृत्य शेष नहीं रहता “तस्य कार्यं न विद्यते" ३/१७, यही आश्चचर्यमय है दिन जिसका, जिसे अविद्याकाल में सोच भी नहीं सकता वही देखकर आश्चर्य होता है, “आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्" २/२९, ऐसा आश्चर्य जिसका मनन करते करते मौन ही हो गया, ऐसा मुनि यदि उस आत्मा के विषय में कहे भी तो भी जैसे सुषुप्तावस्था में बाहर क्या हुआ पता नहीं चलता वैसे ही अविद्या अर्थात अज्ञानरूपी रात्रि में सोने वाले को सुनाया, बताया भी जाये तो भी “श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्” २/२९, कोई भी उसे देख या समझ नहीं सकता ।
                भावार्थ— श्रुत्याचार्य के प्रसाद से “सर्वसङ्कल्प संन्यासी” ६/४ को ही ब्रह्मप्राप्ति का अधिकार है अन्य विषयी का नहीं, क्योंकि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों का रात्रि और दिन की तरह विरोध है । जैसे रात्रि और दिन एक साथ नहीं रह सकते वैसे प्रवृत्ति और निवृत्ति भी एक साथ नहीं रह सकते, अर्थात कर्ममार्ग एवं ज्ञानमार्ग एक साथ नहीं हो सकते । अतः मुमुक्षु को कर्ममार्ग की ओर से उदासीन होकर नित्य “मैं ब्रह्म हूँ” रूप समाधि का चिन्तन करना चाहिए । अर्थात सिद्ध सर्वत्र ब्राह्मीभाव में स्थित होकर विचरण करता है ।

              संबंध— प्रश्न उठता है कि कर्म करेगा नहीं तो जीवन यात्रा भी कैसे चलेगी ? इस पर कहते हैं……
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं    समुद्रमापः प्रविशन्ति     यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥२/७०॥
           शब्दार्थ— नदियाँ जिस प्रकार से चारों ओर जल से परिपूर्ण समुद्र में नाम रूप त्यागकर प्रवेश कर जाती है उसी प्रकार संपूर्ण कामनाएं जिसमें अपने नाम रूप और गुण का त्याग कर प्रवेश कर गई हैं अर्थात जो समाहित चित्त हो गया है वही शान्ति को प्राप्त करता है, कामनाओं की कामना करने वाला नहीं ।
               तात्पर्यार्थ— तुलसीदास जी ने भी कहा है…. जिमि सरिता सागर महुं जाहीं । जद्यपि ताहि कामना नाहीं ॥ तिमि सुख संपति बिनहिं बुलाए । धरमशील पर जाहिं सुभाए ॥ अर्थात समुद्र में कोई कामना नहीं कि नदियाँ उसमें जाकर उससे अभिन्न हो जायें, किन्तु वह मना भी नहीं करता । वर्षाकाल में नदियाँ कितनी भी उफान पर हों किन्तु समुद्र अचल अर्थात अपनी मर्यादा में सदैव स्थिर है, कभी बढ़ता अर्थात हर्षित नहीं होता नदियां ग्रीष्मकाल में सूखकर कम पानी से युक्त हो जायें तो भी समुद्र सूखता अर्थात दुःखी नहीं होता, क्योंकि नदियों को सत्ता तो समुद्र ही दे रहा है, वे उससे अभिन्न हैं वैसे ही समाधिनिष्ठ ज्ञानी में संपूर्ण कामनाएं प्रवेश करके तद्रूप हो जाती हैं, ज्ञान तो कामनाओं का बीज है । बीज को वृक्ष की कामना नहीं होती, किन्तु वह स्वयं वृक्ष को अपने अन्दर समेटे है, उसी प्रकार ज्ञानी तो स्वयं कामरूप है, उसे किसी अन्य कामना की क्या आवश्यकता ? वह तो समुद्र की तरह निश्चल मर्यादित है अथवा जो सर्वकर्म संन्यासी आत्मनिष्ठा मे स्थित है जिसने संपूर्ण जागतिक भोगों की उपेक्षा करके राग द्वेष से रहित होकर प्रारब्धानुसार प्राप्त भोग्य पदार्थों के आश्रित जीवन यापन करते हुए ब्राह्मी भाव में स्थित है, उसके पास भोग्य पदार्थ स्वतः चारों ओर से आकर ब्रह्मज्ञानी की कृपाकटाक्ष के पिपासु होते हैं और हाथ जोड़कर मुझे ग्रहण करो की भिक्षा की अभिलाषा रखते हैं तथापि वह समुद्र की तरह आत्मज्ञ अपनी मर्यादा में स्थित रहता है । कभी किसी से कोई किसी प्रकार का राग नहीं होता और जो पदार्थ प्राप्त नहीं हैं या विपरीत हैं उनके प्रति उनके  द्वेष नहीं होता ।
              राग द्वेष से रहित अपनी मर्यादा में स्थित समुद्र की भांति स्थित संन्यासी को ही शान्ति प्राप्त होती है । न कामकामी अर्थात विभिन्न कामनाओं से युक्त राग द्वेष वाले को कभी शान्ति नहीं मिलती क्योंकि वह हर पदार्थ अपने से भिन्न देखता है, इसी भिन्नभाव के कारण रम्यत्व दिखता है जिसके कारण उन भोग्य पदार्थों की प्राप्ति की दिखाऊ फूल की तरह २/४२ कभी सुगंध अर्थात सुख न देने वाली हैं अर्थात जहाँ भी द्वैतभाव है वहीं अशान्ति और अद्वैत भाव ही शान्ति का श्रोत है ।
                अथवा वर्षा ऋतु में नदियों में बहुत बाढ आ जाती है जिसमें नदियों का जल संपूर्ण मर्यादाएं तोड़ देता है, वह संपूर्ण जल समुद्र में चला जाने पर भी एवं गर्मियों में नदियों के सूख जाने या कम होने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में अचल रहता है । कभी बढ़ना रूप प्रसन्नता और घटना रूप शोक नहीं होता, उसी प्रकार जिस समाधिस्थ मुमुक्षु की संपूर्ण कामनाएं तद्रूप हो गई हैं अर्थात स्वरूप से अभिन्न हो गई हैं वे चाहे समाधि अवस्था में हों या समाधि से व्युत्थान की अवस्था में दोनो ही स्थित में वह अपने स्वरूपगत भाव में ही रहता है । उसे चाहे जितने भोग मिल जायें या न मिलें दोनो अवस्थाओं में वह एकरस अविचल रहने के कारण शान्ति को प्राप्त कर लेता है । जबकि कामनाओं की चाह वाला सदैव अशान्त और अस्थिर रहता है ।
            यहाँ न कामकामी को इस प्रकार भी अर्थ कर सकते हैं कि जब मुमुक्षु उपरोक्त प्रकार से समत्वभाव को प्राप्त कर लेता है तब वह न तो स्वयं कामी होता है और न काम ही अर्थात कर्ता और कर्म दोनो दोनो ही भाव उसमें होते हैं इसलिये वह शान्ति को प्राप्त कर लेता है ।
           अथवा जैसे चारों ओर से संपूर्ण उफनती हुई वर्षा की नदियां समुद्र में अपने अन्दर समेटे मिट्टी, लकड़ी आदि कचरा सहित समुद्र में समाहित हो जाती हैं किन्तु समुद्र अपनी अचल प्रतिष्ठा अर्थात मर्यादा में स्थित रहता है उसमें न तो बाढ़ ही आती है और न ही पानी में कोई परिवर्तन होता है उसी प्रकार जिस में संपूर्ण कामनाएं प्रवेश कर गई हैं अर्थात जहां से संकल्प विकल्प उठते हैं वहीं उसी चैतन्य सत्ता में संकल्प-विकल्प प्रवेश कर जाते हैं वही  वही शान्ति पद प्राप्त करता है अर्थात जिसके संकल्प-विकल्प पूर्णतः शान्त हो गये हैं वही परम शान्ति को प्राप्त करता है । जिसमें संकल्प-विकल्प हैं वह कभी शान्ति पद को प्राप्त नहीं कर सकता अर्थात सकाम कर्मी जो तीनों गुणों में से किसी भी एक गुण के आधीन रहने वाला शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता है यही है ‘त्रैगुण्यविषयावेदा’ जो सदैव अशान्त रहता है और संपूर्ण कामनाओं का त्याग करने वाला ‘निस्त्रैगुण्य’ हो जाता है जिससे परम शान्ति प्राप्त करता है ।
         भावार्थ— आत्मैक्य भाव की स्थिति ही संपूर्ण सुखों का साधन है न कि द्वैतभाव, अर्थात संन्यास ही मोक्ष का साधन है कर्म नहीं ॥७०॥
             
                 संबंध— स्थित प्रज्ञ के चलने संबंधित प्रश्न का उपसंहार और उसको शान्ति अर्थात मोक्ष की प्राप्ति…..
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥२/७१॥
              शब्दार्थ—  जो मनुष्य संपूर्ण कामनाओं का त्याग करके ममता एवं अहंकार रहित होकर किसी प्रकार की कामना न रखकर विचरण करता है वह शान्ति को प्राप्त कर लेता है ।
               तात्पर्यार्थ— जो पुरुष यानी मुमुक्षु अशेष अर्थात कुछ भी बची न रहने वाली कामनाओं “सर्वान्पार्थ मनोगतान्” २/५५ अर्थात जितनी भी मन में कामनाएं समाहित हो सकती हैं उन सभी कामनाओं का त्याग करके स्पृहा रहित अर्थात जो प्राप्त नहीं है उसकी इच्छा न करना और प्राप्त है उसके स्पर्श अर्थात रक्षा की परवाह भले ही वह शरीर अर्थात जीवन ही क्यों न हो— न करना स्पृहा से रहित होना है फिर ‘मैं मेरा’ जहाँ तक संबंध है वहाँ तक के संबंधों से ममता, लगाव, मोह न करना, अहंकार अर्थात शरीर आदि की दृष्टि से भी अहंकार रहित और अपने ज्ञानी होने के अहंकार से रहित होकर मुमुक्षु परमशान्ति अर्थात निर्वाण पद को प्राप्त करता है अर्थात ‘मैं ब्रह्म हूँ’ का भाव अनात्म पदार्थ के नष्ट होने पर शेष बचता है, क्योंकि अनात्म पदार्थ को धारण करने के कारण ही तो जीव है “ययेदं धार्यते जगत्” ७/५ अनात्म भाव नष्ट होने पर अहंभाव ही शेष रहता है अर्थात यही मैं ब्रह्म हूँ की अनुभूति है इसी कैवल्य पद को अकाम, निःस्पृह, निर्मम, निरहंकार मुमुक्षु प्राप्त कर लेता है ।
               यह श्लोक पूरे दूसरे अध्याय का अवलोकन करता है, पहले “सोऽमृतत्वाय कल्पते" २/१५, कहकर ज्ञानी की ब्राह्मी गति अर्थात मोक्ष प्राप्ति बताया तथापि आगे चलकर “एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये” २/३९ से कर्मयोग का वर्णन प्रारंभ किया क्योंकि ज्ञानमार्ग संन्यासी के लिए ही विहित है, गृहस्थ के लिए नहीं । अर्जुन गृहस्थ है अतः कर्ममार्ग का वर्णन करते हुए श्रेयमार्ग के बाधक होने के कारण “यामिमां पुष्पितां वाचम्” २/४२ “भौगैश्वर्यप्रसक्तानां” २/४४ से सकाम कर्म की निंदा करते हुए हर प्रकार की कामनाओं से रहित अर्थात अकाम, निःस्पृह, निर्मम, निरहङ्कार में सब कुछ वर्णन करके “स शान्तिमधिगच्छति” कहकर मोक्ष की प्राप्ति करा देते हैं अर्थात दोनो ही मार्ग अधिकार भेद से मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं ऐसा यहाँ कह रहे हैं और आगे तीसरे, पांचवें अध्याय में भी इसी की पुष्टि करेंगे ।
               अथवा—  सभी कामनाओं का त्याग करना यानी चाहे वे लोकदृष्टि से शुभ हों या अशुभ अर्थात अनुकूल प्रतिकूल परस्थिति में समभाव में रहना । शरीर संचालन संबंधित आवश्यकताओं की भी कामना न करना क्योंकि शारीर प्रारब्धाधीन है । किसी भी अनात्म पदार्थ में गुण बुद्धि से ममता यानी लगाव न होना, और सीमित अहंता से रहित अर्थात व्यापक अहंता में स्थित रहने वाला वह सर्वकर्मसंन्यासी शान्ति को प्राप्त करता है । यहाँ मूल पुमान् शब्द आया है जिसका अर्थ पुरुष होता है, मतलब पुरुष वही है जो अनात्म पदार्थ से ऊपर उठकर आत्मसाक्षात्कार कर ले । इसी पुरुष को आगे अध्याय १५ में पुरुष कहा जायेगा ।
              अर्जुन के चौथे प्रश्न का उत्तर हो गया कि सिद्ध कैसे चलता है ॥७१॥

                    संबंध— पूर्व कथित ज्ञान की स्तुति….
एषा ब्राह्मी स्थितः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥२/७२॥
                   शब्दार्थ— हे पार्थ ! यही ब्राह्मी स्थिति है, जिसे प्राप्त कर लेने पर मुमुक्षु पुनः मोहित नहीं होता, यदि अन्तिम काल में भी इसमें स्थिति हो जाये तो भी मोक्ष पा लेता है ।
               तात्पर्यार्थ— एषा ब्राह्मी स्थितिः अर्थात यह २/३९ से २/६८ तक जो कर्मयोग हमने कहा उसको सामान्य मत समझ, सभी शास्त्रीय कर्म के फल की प्राप्ति जो शान्ति कही गई है उसी स्थिति को प्राप्त करा देने वाला ज्ञान है, इसलिये यह ज्ञानमात्र नहीं ब्रह्मज्ञान है और इसमें आरूढ़ता ही ब्राह्मी स्थिति है । इसी ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करके मुमुक्षु संन्यासी फिर कभी मोहित नहीं होता अर्थात जब तक ब्राह्मीभाव प्राप्त न हो जाये तब तक संसाराकर्षण स्वाभाविक ही है । कभी भी हमें विवश कर सकता है, अतः सतत अभ्यास करके इस ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त ही कर लेना चाहिए यही मानव मात्र का कर्तव्य है । आवश्यक नहीं कि ब्रह्मचर्यादि आश्रमों का पालन करने वाले को ही यह स्थिति प्राप्त हो, अन्तकाल में अर्थात मृत्युशैय्या पर लेटा हुआ भी जब स्वतः सब कुछ छूट रहा हो उस समय भी अहंता का फैला हुआ तादात्म्य खींचकर मात्र अहं भाव अर्थात मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, जरा, मरण आदि से रहित हूँ के भाव में स्थित हो जाये तो भी ऐसा अन्तकाल में आपात्संन्यासी भी ब्रह्मरूप परम निर्वाण अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता है ।
               अर्थात अब तक श्लोक ५५ से ७१ तक आत्मस्वरूप में स्थित सिद्ध के लक्षण बताए जिन्हें मुमुक्षु को करना ही चाहिए । अब आत्मस्वरूप में स्थित सर्वकर्मसंन्यासी की स्तुति करते हैं । आत्मन्येवात्मना तुष्टः २/५५ अर्थात आत्मा से आत्मा में जो सभी प्रकार की कामनाओं का त्याग करके संतुष्ट रहता है जिसका विस्तार पूर्व श्लोक तक हुआ है उन सभी लक्षणों को एक साथ सभी कामनाओं के साथ समाहित कर लेना चाहिए । कुल मिलाकर जो अनात्मपदार्थ से उपराम होकर आत्म पदार्थ में अभिन्न भाव से अपने अपरिच्छिन्न स्वरूप में स्थित है वही परम शान्त है वही ब्रह्मनिर्वाण पद है जिसे प्राप्त करता है । यह पद जिस किसी को यदि अन्त समय अर्थात मृत्यु के समय भी प्राप्त हो जाये तो वह भी इस परम पद को प्राप्त करता है फिर जिसने आजीवन ब्रह्मचर्य से लेकर सीधे सन्न्यास तक जीवन इसी आत्मशोध में लगा दिया है उसे यदि यह पद मिलता है तो इसमें क्या आश्चर्य है ? अर्थात इसमें कोई आश्चर्य नहीं है 
         भावार्थ— कहने का भाव यह है कि जब अन्तकाल में भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है तो आजीवन ब्रह्मचर्यादि शास्त्रीय स्वधर्मानुष्ठान करने से मोक्ष की प्राप्ति हो इसमें क्या संदेह ? अर्थात मोक्ष निःसंदेह आत्मैक्य के साधक को मिलता ही है ॥७२॥

               समीक्षा― अर्जुन के स्थित प्रज्ञ के लक्षण पूछने पर भगवान ने कहा था आत्मन्येवात्मना तुष्टः २/५५ अतः यह तो स्पष्ट है कि पूर्व में श्लोक ११ से ३० तक कहे गये आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा ही यहाँ पर प्रधान है, तथापि आगे कहते हैं युक्त आसीत मत्परः २/६१ अब बीच में आत्मा से भिन्न कृष्ण 'मुझ परम' को क्यों जोड़ने लगे ? इतना ही नहीं अन्त में यहाँ पर एषा ब्राह्मी स्थितः कहते हैं कि यही ब्रह्मी स्थिति है और वह निर्वाण स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त करता है ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति यानी आत्मा, ईश्वर और ब्रह्म इन तीनो शब्दों का यहां पर प्रयोग हुआ । जिसमें फल ब्रह्म है । आत्मा और ईश्वर दोनो को अभिन्न दिखाया गया है । यदि ऐसा एकत्व का प्रतिपादन न हुआ होता तो या तो ईश्वर में स्थिति बताते या फिर आत्मा में स्थिति बताते और प्राप्तव्य फल भी वही होता किन्तु ऐसा नहीं किया । इससे आत्मा की जो ‘येन सर्वमिदं’ २/१७ से व्यापकता बताया था और आगे जिसे ‘येन सर्वमिदं’ ८/२२ से ईश्वर कहेंगे एवं ‘येन सर्वमिदं ततम्’ १८/४६ में जिसे निराकार ब्रह्म कहेंगे वे तीनो ही यहाँ पर एक साथ कह दिये गये हैं । आत्मा ‘त्वम्’ पदार्थ का लक्ष्यार्थ है, मत्परः ‘तत्’ पदार्थ का लक्ष्यार्थ है और ब्रह्म अस्ति यानी सबकी परम सत्ता है । इसी बात को आगे ‘तमेव शरणं गच्छ’ १८/६२ द्वारा तत् पदार्थ का और मामेकं शरणं ब्रज १८/६६ द्वारा त्वम् पदार्थ के एकत्व का प्रतिपादन करेंगे । अध्याय २ में कहते हैं मत्परः यानी ‘मुझ परम ईश्वर’ जबकि तमेव शरणं गच्छ द्वारा मत्परः के ईश्वर से यहाँ भिन्न ईश्वर कहते हुए मामेकं द्वारा त्वं पदार्थ यानी आत्मरूप से स्वीकार करते हैं । यहाँ पर यदि विवेक का प्रयोग न किया जाये तो कृष्ण एक बार स्वयं को ईश्वर कहते हैं और दूसरी बार ईश्वर से भिन्न आत्मा भी कहते हैं । एक बार उस ईश्वर की शरण जाने की बात करते हैं, दूसरी बार अपनी शरण में आने की बात करते हैं यह परस्पर विरोध ही सिद्ध होगा किन्तु विचार पूर्वक देखने पर जीव ईश्वर और ब्रह्म एक ही है इसमें किसी भी प्रकार के द्वैत का कोई स्थान ही नहीं है । यहां गीता का एकमेद्वितीयम् स्वयं सिद्ध है । इस प्रकार यहाँ पर स्थित प्रज्ञ के लक्षणों के बहाने पूर्णतः ‘तत्त्वमसि’ का संक्षेप में वर्णन कर दिया गया है । जिसका विस्तार आगे किया जायेगा । इतने पर भी यदि कोई किसी प्रकार के द्वैत की शंका करता है तो यह समझना चाहिए कि उस पर न तो ईश्वर की कृपा है और न ही भगवती गीता की । तभी समझ में नहीं आया ॥५५-७२॥

॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक दूसरा प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !!  हरिः ॐ तत्सत् !!!
श्रीकृष्णार्पमस्तु

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