ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय १
ध्यानम्
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-
र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः ।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥
वंशीविभूशितकरान्नवनीरदाभा-
त्पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् ।
पूर्णेन्दु सुन्दरमुखादरविन्दनेत्रा-
त्कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
शङ्करं शंकराचार्यं केशवं बादरायणं ।
सूत्रभाष्य कृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ॥
ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेद विभागाने ।
व्योमवद्व्याप्यदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
॥ॐश्रीपरमात्मने नमः॥
अथ प्रथमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्वाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१/१॥
भावार्थ― धृतराष्ट्र बोले― हे सञ्जय ! धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र में युद्ध की समान रूप से जानकारी रखने वाले मेरे और पाण्डुपुत्रों ने क्या किया ? ॥१॥
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥१/२॥
भावार्थ–– संजय बोले– जब दोनो सेनाएं आमने सामने हो गईं तब दुर्योधन पाण्ड़वों की व्यूहाकार खड़ी सेना को देखकर इस प्रकार बोला….।
विशेष― पूर्वार्ध में मात्र दुर्योधन कहा और उत्तरार्ध में राजा कहा । दोनो अलग कहने का अपना स्थान है । पूर्वार्ध में धृतराष्ट्र के के पुत्र रूप में कहा गया है और उत्तरार्ध में राजपद के अधिकारी रूप में ॥२॥
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥१/३॥
हे आचार्य ! पाण्डुपुत्रों की विशाल सेना को देखिये जिसे आपके शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने व्यूहाकार खड़ा किया है ।
विशेष― कूटनीतिक चाल– शिष्य के प्रति गुरु के अन्दर नफरत का बीज बोना ॥३॥
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥१/४॥
इस पाण्डव सेना में जिनके पास बड़े बड़े धनुष हैं वे युद्ध में भीम, अर्जुन की समानता करने वाले हैं । जिनमें युयुधान अर्थात सात्यकि, विराट और द्रुपद महारथी हैं ॥४॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥१/५॥
धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज, नरश्रेष्ठ शैव्य ॥५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥१/६॥
पराक्रमी युधामन्यु और बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु, एवं द्रौपदी के पांचों पुत्र ये सभी महारथी हैं ॥
६॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ १/७॥
हमारे विशिष्टजनों को हे द्विजश्रेष्ठ ! उनको भलीभाँति जानो । मेरी सेना के सेनानियों के आपके संज्ञान के लिए आप से कहता हूँ ॥७॥
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ १/८॥
पहले तो आप ही हो, भीष्म, कर्ण और संग्राम को भलीभाँति जीतने में समर्थ कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा भी हैं ।
सभी जानते हैं कि पहले प्रधान सेनापति भीष्म थे फिर भी आचार्य द्रोण का नाम पहले लेने का अर्थ यही है कि उन्हें प्रसन्न करना और पाण्डवों और विरुद्ध शिष्यों के प्रति नफरत पैदा करना ॥८॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १/९॥
इसके अलावा भी हमारी सेना में बहुत शूरवीर मेरे लिए जीवन का त्याग करने वाले हैं जो नाना प्रकार के शस्त्रों के प्रहार एवं सभी युद्ध कौशल में निपुण हैं ॥९॥
समीक्षा― पहले पाण्डव सेनानियों को गिनाकर अन्य भी हैं ऐसा नहीं कहा मानो कि पाण्डु सेना में और योद्धा हैं ही नहीं, जबकि अपने सेनापतियों के नाम गिनाकर और भी अन्यों का दावा करता हुआ अपने को सैन्य रूप में पाण्डवों से मजबूत बताना है । इसीलिये आगे कहता है….. ॥९॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१/१०॥
उनका बल भीम द्वारा रक्षित होने के कारण पर्याप्त नहीं है जबकि मेरा बल भीष्म द्वारा रक्षित होने से पर्याप्त है ।
समीक्षा― अपर्याप्तं तत् उसके बाद अस्माकं बलम् कहता है । इसी से अर्थ का स्पष्टीकरण हो जाता है व्याख्या की आवश्यकता नहीं है । भीष्म द्वारा रक्षित सेना प्रर्याप्त होने के दो कारण हैं, पहली बात पांडवों की सात अक्षौहिणी सेना थी जबकि कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी थी, अतः वैसे भी सैन्य दृष्टि से हमारी सेना अधिक और पर्याप्त है । यदि किसी कारण है ऐसा न भी हो तो भी भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान है इसलिए भी मेरी सेना पर्याप्त है यही भाव है ॥१०॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥१/११॥
सभी मोर्चों पर अपनी सेना का विभाग करके दृढतापूर्वक स्थित होकर सभी महारथी भीष्म की भलीभाँति रक्षा करें ।
प्रधान सेनापति की रक्षा के लिए सचेत रहना राजा का कर्तव्य है ॥११॥
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥१/१२॥
उसकी (दुर्योधन) की प्रसन्नता के लिए कुरुवंश के सबसे अधिक प्रतापी वयोवृद्ध पितामह भीष्म ने सिंहनाद गरजते हुए उच्च स्वर में शंख बजाया ॥१२॥
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१/१३॥
उसके पश्चात शंख, भेरी, ढोल, मृदंग, और गोमुख सहसा बज उठे । उन वाद्यों का वह शब्द बड़ा भय देने वाला था ॥१३॥
इस प्रकार धृतराष्ट्र के प्रश्नों का उत्तर— कि पहले युद्ध किसने किया का उत्तर दे दिया कि पहले तुम्हारे पुत्रों ने ही युद्ध की घोषणा की उसके बाद…..
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१/१४॥
उसके बाद श्वेत घोड़ों वाले विशाल रथ पर स्थित माधव एवं पाण्डवों ने दिव्य शंख बजाया ।
स्थितौ द्विवचन है अतः कृष्ण के साथ ही अर्जुन भी कह दिये गए क्योंकि वे दोनो एक ही रथ पर थे । शेष पाण्डव अलग से कहे गये । दिव्य शंख कहने का मतलब है कि जिस पक्ष में साक्षात नारायण कृष्ण और नर अर्जुन एवं धर्मात्मा पाण्डव हों वहाँ तो देवत्व की स्वतः दिव्यता होगी ॥१४॥
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१/१५॥
भगवान हृषिकेश ने पाञ्चजन्य, धनञ्जय ने देवदत्त, भयंकर कर्म करने वाले बड़े पेट भीम ने पौण्ड्र नामक विशाल शंख बजाया ॥१५॥
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१/१६॥
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नामक शंख, नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख बजाया ॥१/१६॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथाः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१/१७॥
विशाल धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट और कभी पराजित न होने वाले सात्यकि ॥१७॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥१/१८॥
हे पृथ्वीपते ! द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पांचों पुत्र बड़ी भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु ने अलग अलग शंख बजाये ॥१८॥
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१/१९॥
वह घोष (शंखध्वनि एवं पणवादि की ध्वनि) धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय को चीरता हुआ आकाश एवं पृथ्वी के बीच भयंकर प्रतिध्वनित होने लगा ।
इस श्लोक में शंका की जा सकती है कि यदि दुर्योधन अपनी विशाल सेना और भीष्म पर आश्वस्त था तो उसे यहाँ भयभीत क्यों कहा गया है । इसका उत्तर है कि अधर्म का पक्ष हमेशा भयकारी होता है । रामचरितमानस में आता है कि जिस रावण से तीनो लोक कांपते थे वही रावण जब सीता का हरण करके भागता है तो वह अत्यंत भयभीत होकर इधर उधर देखता हुआ ऐसे भागता है जैसे कुत्ता चोरी करके भागता है । ‘सो दससीस स्वान की नाईं । इत उत चितइ चला भड़ियाई ॥ इमि कुपंथ पग देता खगेसा । रहइ न तेज बुद्धि लवलेसा ॥
ऐसा ही यहां भी दुर्योधन का भय समझना चाहिए ॥१९॥
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥१/२०॥
इस प्रकार जिनकी ध्वजा में बंदर (हनुमानजी) का चिह्न है उन अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए व्यवस्थित यानी तैयार देखकर जिस समय शस्त्र चलाने की तैयारी हो रही थी (उस समय) पाण्डुपुत्र अर्जुन ने धनुष उठाते हुए ॥२०॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥१/२१॥
हे प्रजा का पालन करने वाले राजन् ! उस समय भगवान हृषिकेश (कृष्ण) से इस प्रकार कहा…..
अर्जुन बोले― हे अच्युत ! रथ को दोनो सेनाओं के बीच में स्थिर खड़ा करो ॥२१॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥१/२२॥
जब तक मैं निरीक्षण करूँ कि युद्ध की कामना वाले सामने खड़े हुए धृतराष्ट्र पुत्रों के सहित इस युद्ध में उपस्थित किस किस के साथ युद्ध करना है ॥२२॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥१/२३॥
दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्रों का प्रिय करने की इच्छा वाले युद्ध के लिए उतावले जो ये राजा लोग आये हुए हैं उन्हें मैं देखूंगा ॥२३॥
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥१/२४॥
संजय बोले― हे भरतवंशी ! इस प्रकार निद्राविजयी अर्जुन के भगवान हृषीकेश से कहे जाने पर (भगवान कृष्ण ने) दोनो सेनाओं के बीच उत्तम रथ को खड़ा करके— ॥२४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥१/२५॥
जिसमें भीष्म और द्रोण प्रमुख हैं उन सभी राजाओं के सामने पृथापुत्र अर्जुन से बोले— इन सभी इकठ्ठे हुए कुरुवंशियों को देखो ॥२५॥
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥१/२६॥
अर्जुन ने वहां युद्धक्षेत्र में चाचाओं, पितामहों (दादाओं), आचार्यों (गुरुओं), मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों तथा सखाओं‚ ॥२६॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥१/२७॥
श्वसुरों और सुहृदों (हित चिंतकों) को भी दोनो सेनाओं में सभी बन्धु बान्धवों के सहित उन्हें खड़ा देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन—॥२७॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥१/२८॥
करुणा से आविष्ट होकर विषाद करते हुए इस प्रकार बोले—
अर्जुन बोले― हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन स्वजनों यानी कुटुंबियों को देखकर... ।
[{यहाँ कृपया का अर्थ कुछ लोग कायरता करते हैं । उनके हिसाब से अवश्य ठीक होगा, किन्तु मेरे विचार से कायरता और कृपा या करुणा में बड़ा अन्तर होता है । कायर वह होता है जो अपने प्राणों की रक्षा के लिए युद्ध से पलायन कर जाता है, किन्तु अर्जुन देवताओं को भी पराजित करने वाले कालकेय और पौलोम नामक असुरों का अकेले ही नाश करने वाले तथा महादेव को भी युद्ध में संतुष्ट करने वाले हैं । विराट युद्ध में अकेले ही अर्जुन ने संपूर्ण कौरव सेना को पराजित करके गायों को छुड़ा लिया था अतः अर्जुन कायर नहीं हो सकते । वे कृपा भी नहीं कर रहे हैं क्योंकि कृपा तो दीनहीन पर की जाती है युद्ध में खड़े शत्रुओं पर नहीं किन्तु करुणा तब होती है जब किसी के सामने विषम परिस्थिति उपस्थित हो जाये और हम समर्थ होकर भी उसका निवारण न कर सकें । अतः यहां अर्जुन करुणा से परिपूर्ण है न कि कायर है ।}] ॥२८॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥१/२९॥
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख अधिक सूख रहा है । पूरा शरीर कांप रहा है मेरे शरीर में रोमांच उत्पन्न हो रहा है ।
शरीर में रोमांच दो प्रकार से होता है एक अधिक प्रसन्नता से, उसमें भी शरीर के रोयें खड़े हो जाते हैं और आंखों से आंसू आ जाते हैं और अधिक भय से भी यही हाल होता है । विचारणीय यह है कि किसी एक प्रिय पारिवारिक सदस्य के मरने पर क्या हाल होता है ? और यहाँ कितने मरेंगे ? यह गणना करना भी कठिन है । अतः ऐसा होना स्वाभाविक ही है ॥२९॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥१/३०॥
हाथ से गांडीव धनुष सरक यानी छूट रहा है और त्वाचा में भी बहुत अधिक जलन हो रही है एवं मैं खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ मेरा मन भ्रमित हो रहा है यानी चक्कर आ रहा है ॥३०॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥१/३१॥
और हे केशव ! निमित्त भी विपरीत दिखाई देता है (इसका स्पष्टीकरण श्लोक ३३में होगा ) एवं अपने स्वजनों को मारकर मैं कल्याण नहीं देखता अथवा अपने कुटुंबियों को मारने में कोई पुरुषार्थ दिखाई नहीं देता ॥३१॥
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥१/३२॥
हे कृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूं और न ही राज्य सुख यानी आज की भाषा में सत्ता सुख भी नहीं चाहता हूँ । हे गोविंद ! हमें ऐसे राज्य भोग और जीवित रहने से भी क्या लाभ है ?॥३२॥
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥१/३३॥
क्योंकि जिनके लिए राज्य, भोग और सुख की इच्छा करता हूँ वे ही इस युद्ध में प्राणों और धन का मोह त्यागकर इस युद्ध में खड़े हैं ॥३३॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥१/३४॥
गुरुजनों और चाचाओं को तथा पुत्रों एवं दादाओं को, मामाओं, श्वसुरों, पौत्रों, साले, तथा अन्य संबंधीजन ॥३४॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥१/३५॥
हे मधुसुदन ! इनके द्वारा मारे जाने पर भी मैं तीनो लोकों के राज्य के लिए भी मारने की इच्छा नहीं करता फिर पृथ्वी के लिए ही क्यों ? अर्थात जब तीनो लोकों के लिए ऐसा क्रूर कर्म नहीं कर सकता तो तुच्छ पृथ्वी के लिए ऐसा करने का प्रश्न ही नहीं उठता ॥३५॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥१/३६॥
धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हे जनार्दन ! हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी ? इन आतताइयों को मारकर हमें पाप ही लगेगा ॥३६॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥१/३७॥
इसलिये हमारे द्वारा धृतराष्ट्र से संबधित कुटुंबियों को हमारे द्वारा मारे जाना योग्य नहीं है क्योंकि हे मधुसूदन ! स्वजनों को मारकर हम सुखी कैसे हो सकते हैं ? अर्थात सुखी न होकर उल्टे दुःख ही होगा ॥३७॥
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥१/३८॥
यद्यपि लोभ के द्वारा हरण की गई बुद्धि के कारण ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष एवं मित्रद्रोह से होने वाले पाप को नहीं देखते (तो भी…..) ॥३८॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥१/३९॥
हे जनार्दन ! कुलनाश करने से होने वाले दोष को भलीभांति देखने अर्थात जानने वाले हम लोग ही इस पाप से बचने का विचार क्यों न करें ? अर्थात हमें ही इस जघन्य पाप से बचना चाहिए ॥३९॥
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥/१/४०॥
कुल के नाश से सनातन धर्म का पतन हो जाता है । धर्म के नष्ट हो जाने से संपूर्ण कुल में अधर्म उत्पन्न हो जाता है ॥४०॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥१/४१॥
हे कृष्ण ! कुल में अधर्म के उत्पन्न होने से स्त्रियां अत्यन्त दूषित हो जायेंगी । हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दुष्ट होने से कुल में वर्णशंकर हो जायेगा ॥४१॥
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥१/४२॥
वर्णशंकर संतति कुल का नाश करने वाले को और कुल को नरक में ही ले जाने वाला होता है एवं इससे श्राद्ध क्रिया के नष्ट हो जाने से पितर पितॄलोक से नीचे गिर जाते हैं अर्थात स्वर्गीय पूर्वज भी नरकीय हो जाते हैं ॥४२॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥१/४३॥
इन वर्णशंकर दोषों के कारण कुलनाश करने वालों के शाश्वत जाति एवं कुलधर्म का नाश हो जाता है ॥४३॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥१/४४॥
हे जनार्दन ! मनुष्यों के कुलधर्म का नाश होने से ऐसा सुना जाता है कि अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है ॥४४॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥१/४५॥
अरे आश्चर्य है ! बड़ा खेद है ! हम लोग महापाप करने का निश्चय कर लिये, इसीलिए राज्यसुख के लोभ से अपने स्वजनों को मारने के लिए तैयार हो गये हैं ॥४५॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥१/४६॥
यदि मुझ शस्त्र रहित को शस्त्र हाथ में लेकर ये धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मार डालें तो कल्याणकारी होगा ॥४६॥
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥१/४७॥
संजय बोले― इस प्रकार कहकर अर्जुन युद्धक्षेत्र में बाणों सहित धनुष का त्यागकर के शोकाकुल मन से रथ के पिछले भाग में बैठ गया ॥४७॥
विश्लेषण— धृतराष्ट्र भी शोकाकुल हैं लेकिन न तो प्रजा के लिए और न अपने कल्याण या धर्म के लिए । उसे तो सत्ता की प्राप्ति ही धर्म दिखाई दे रहा है । वह एक राजा होकर भी अपने को राजा नहीं बल्कि राजा का प्रतिनिधि मानता है, यही उसकी समस्या की जड़ है । ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेत्ता युयुत्सवः’ १/१ में धर्मक्षेत्र की दुहाई देने में भी यही कारण है । वह धर्म को अपने पक्ष में मानता है कि यदि मैं अन्धा न होता तो मैं ही ज्येष्ठ होने के कारण राजा होता किन्तु मेरा पुत्र तो अंगहीन नहीं है अतः अब वही राजा होने का अधिकारी है । इसी अधर्म को धर्म मानकर ही दुर्योधन युद्ध में गया है । उधर युधिष्ठिर तो धर्मराज कहे ही जाते हैं अर्थात दोनो ही धर्म क्षेत्र के समान ज्ञाता हैं । स्वयं दुर्योधन ने भी एक बार कृष्ण से कहा था― ‘जानामि धर्मं न चे में निवृत्तिः’ इस प्रकार दोनो ही धर्म के मर्मज्ञ हैं और युद्ध में भी दोनो ही पक्ष समानता करने वाले हैं । अतः यहां पर ‘अधर्मं धर्ममिति मन्यते’ १८/३२ इस प्रकार का सत्तासुख के धर्म का धृतराष्ट्र मेरा मेरा में शोकाकुल हो रहा है ।
ठीक इसके विरुद्ध अर्जुन का शोक मेरा से कोई संबंध नहीं रखता है वह तो मेरे मेरे के लिए शोकाकुल हो रहे हैं । अर्जुन को जो होने वाले युद्ध में मरने वाले हैं उनकी और उनकी कुछ की चीखें सुनाई पड़ रही हैं । अतः वह करुणार्द्र होकर इस दयनीय दशा को प्राप्त हुआ है, जिसका परिणाम आज गीता के रूप में हम सबके सामने है । इस पर अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है । ओ३म् !
यहां धृतराष्ट्र से हमारी मोह से पतित बुद्धि और संजय से विवेक समझना चाहिए जो सदैव मार्ग दर्शन देती रहती है । दुर्योधन से दुराग्रह और द्रोण आदि सब के सब न चाहकर विषयों के बंदी समझना चाहिए । अर्जुन साधक है । जिसमें युधिष्ठिर धर्म यानी कर्तव्य निष्ठा है, भीम कर्तव्य के प्रति आत्मबल है । नकुल और सहदेव देशकाल का निर्णय करने वाले तथा उसके अनुसार रक्षा करने वाले हैं । कृष्ण ही पथप्रदर्शक गुरु हैं ।
अर्जुन के द्वारा दिये गये पूर्वपक्ष के तर्क यानी पूर्वमीमांसा से संबंधित कर्मों और उनसे पतन की व्याख्या एवं आशंका ही इस बात को सिद्ध करती है कि अर्जुन ने पूर्वमीमांसा में कथित अग्निहोत्र आदि सभी कार्मोंं की भली-भांति जानता और कर चुका है । जब तक उन कर्मों को नहीं किया जाता है तब तक संसार की वास्तविकता सामने नहीं आती है । तब तक तितिक्षा अर्थात मोक्ष की इच्छा जाग्रत नहीं होती है, सहन शक्ति तो हो ही नहीं सकती है, अतः वह दुराचारिणी स्त्री की भांति-भांति पतित हो जाता है । जब कुरुक्षेत्र अर्थात कर्तव्य पालन के लिए उद्यत होता है तभी “हमारा संसार में वास्तव में क्या है” का बोध हो जाता है और वह किंकर्तव्यविमूढ़ होकर शिथिल होकर बैठ जाता है या गुरु की शरण में चला जाता है और संसार के प्रति अपनी मनःस्थिति को स्पष्ट कर देता है । यही प्रथम अध्याय का भाव समझना चाहिए ।
॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक पहला प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत् !!!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
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