ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय ३
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
पूर्व अध्याय का उत्तर अध्याय से संबंध—
द्वितीय अध्याय में मोहित अर्जुन के पलायनवादी विचारों के खण्डन में ‘कुतस्त्वा कश्मलमिदम्’ २/२ कहकर ‘अहं इदं’ की पहेलियों के बीच खड़ा करते हुए अर्जुन के पूर्व विचारों को म्लेच्छादि द्वारा अनुष्ठेय बताया और नपुंसक कहकर अर्जुन जैसे महावीर को एक सामान्य कमजोर, कुछ भी कर पाने में असमर्थ, अपयश और नरक का अधिकारी बताकर पूर्वोक्त विचारों की हृदय की दुर्बलता का परिणाम क्षुद्र अर्थात नीच यानी सारहीन विचार बताया । इस पर भी अर्जुन ने विभिन्न तर्कों को प्रस्तुत करते हुए भिक्षान्न (सन्न्यास) को श्रेष्ठ और त्रैलोक्य प्राप्ति से भी वैराग्य दर्शाकर उचित और श्रेय अर्थात मोक्षमार्ग दर्शन हेतु शिष्यता स्वीकार करते हुए किसी भी स्थिति में युद्ध न करने की बात भी कह दी ।
फिर भगवान श्रीकृष्ण ने २/११ से २/३० तक जीव का स्वरूप और उसकी स्वाभाविक स्थिति का वर्णन किया और इसी को मोक्ष का साधन माना “सोऽमृतत्वाय कल्पते” २/१५, किन्तु यह मार्ग किसी पलायनवादी गृहस्थ का नहीं आत्मनिष्ठ संन्यासी का है, अतः स्वधर्म से प्रकंपित न होकर उसे स्वधर्म का पलन रूप युद्ध (२/३१ से २/३८ तक) करने का आदेश देते हैं, तथापि अर्जुन शंका कर सकता था कि हमने मोक्षमार्ग पूछा था और मुझे बीभत्स कर्म में लगा रहे हैं, इस पर भी समाधान दिया कि यह साङ्ख्ययोगियों अर्थात ज्ञानयोगियों के विचार कहे हैं, अब कर्मयोग के विषय में सुनो “एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु” २/३९ जिससे कर्मबन्धन के पाश से मुक्त हो जाओगे, इस प्रकार २/५३ तक कर्मयोग और उसकी स्थिति का वर्णन करते हुए कर्मयोगी की निश्चल और अचल स्थिति का वर्णन किया । अर्जुन के पूछने पर सिद्ध के लक्षण, बोलने, बैठने और चलने का वर्णन २/५५ से २/७० तक करते हुए कर्मयोगी का परम शान्ति अर्थात मोक्ष प्राप्त होना विदेह कैवल्य बताया “स शान्तिमधिगच्छति" २/७१ और कर्मयोगी मृत्युशैय्या पर भी तादात्म्य जोड़ दे तो “ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति” २/७२ कहा ।
अर्जुन को समस्या ये हुई कि जब दोनो ही मार्ग मोक्षदायक हैं तो मुझे बीभत्स (हिंसामय) कर्म में ही क्यों लगा रहे हैं ? दोनो ही मार्गों की उत्कृष्ट प्रशंसा कर रहे हैं । मैं किस मार्ग का चयन करूँ ? मेरी बुद्धि तो भ्रमित अर्थात मोहित सी हो रही है और विचार भी कहता है “बुद्धौशरणमन्विच्छ कृपणः फलहेतवः” २/४९ अर्थात स्वयं ज्ञान का अनुष्ठान करने को कहते हैं और स्वयं कर्मों को “कृपणः फलहेतवः” २/४९ कहते हैं, फिर भी कर्म करने की बात कहते हैं । ये भगवान हैं, गलत तो कह नहीं सकते, मेरे समझने में ही कुछ गलती हो रही है…..
दूसरे पक्ष में विचार करने पर— अर्जुन ने अपने कल्याण का मार्ग पूछा था जिसके उत्तर में भगवान ने पहले जीव के स्वरूप का प्रतिपादन किया फिर क्षत्रिय धर्म के अनुसार स्वधर्म से विचलित न होने और विचलित होने पर पाप लगने २/३३ का भय दिखाते हुए जीवन और मृत्यु दोनो ही स्थिति में क्षत्रिय के लिए युद्ध सुख दुःख में समान भाव रखकर करने से कल्याणकारी बताया । ज्ञान और योग दो प्रकार की बुद्धि का वर्णन करते हुए आत्मा में एक निष्ठ बुद्धि की प्रशंसा और विषयी बुद्धि की निंदा करते हुए तीनो गुणों से ऊपर उठकर आत्मभाव में स्थित होने को कहते हुए सर्वकर्मसंन्यास में अर्जुन का अनधिकार बताते हुए कर्म में ही अधिकार बताते हुए ज्ञानयोग की स्तुति करते हैं । अर्जुन के पूछने पर स्थित प्रज्ञ का लक्षण बताते हुए सभी कामनाओं से रहित सर्वकर्मसंन्यासी की प्रशंसा एवं उसी को ब्रह्म की प्राप्ति बताते हैं । अतः अर्जुन को समझ में नहीं आया कि पहले कर्मयोग से कर्मबन्धन काटने की २/३९ बात कहते हैं, फिर मोक्ष सर्वकर्मसंन्यासी का ही बताते हैं इसलिए अर्जुन उस भ्रम के निवारण के लिए पूछता है……
अतः अर्जुन पूछता है……
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि मां नियोजयसि केशव ॥३/१॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले केशव ! यदि आप कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ मानते हैं तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगा रहे हैं ?॥१॥
तात्पर्यार्थ— भगवान ने स्वकर्म न करने पर पाप लगने की बात कही थी ‘पापमवाप्स्यसि’ २/३२ इसलिये यह जबरन् युद्ध रूप घोर कर्म करने के लिए अर्जुन लगाया जाना समझता है, जबकि कल्याण तो ज्ञानयोग यानी सर्वकर्मसंन्यास में है यही समझ कर अर्जुन भ्रमित होकर अधिकार पर ध्यान नहीं देता है कि भगवान ने कर्मण्येवाधिकारस्ते २/४५ कहा है बल्कि वह सर्वकर्मसंन्यास सन्न्यास की प्रशंसा से प्रभावित है अतः वह संन्यास का इच्छुक है इसलिये पूछ बैठा कि ये हिंसक कर्म किये बिना ही जब सर्वकर्मसंन्यास से कल्याण हो सकता है वही स्वीकर करें । इस घोर कर्म में तो आप बलात् लगा रहे हैं ।
संबंध— आप मुझे बलात् कर्म में न लगागकर एक मात्र मेरे श्रेय का ही मार्ग बताएं, क्योंकि—
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽमाप्नुयाम् ॥३/२॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले― मिले हुए से वाक्य कहकर मेरी बुद्धि को मोहित सी कर रहे हैं । मैं जिससे श्रेय अर्थात मोक्ष प्राप्त करूँ वही कहिए ।
तात्पर्यार्थ— अर्जुन कहता है कि हमने आपसे श्रेय का मार्ग जो निश्चित हो वही कहने के लिए कहा “यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे” २/७ तथापि आपने तो और भ्रमित कर दिया ज्ञान की प्रशंसा करके “सोऽमृतत्वाय कल्पते” २/१५ कहकर ज्ञानी के जीवन मुक्ति को स्पष्ट करते हो और “स शान्तिमधिगच्छति” २/७२ से विदेह मुक्ति की स्तुति एवं “कृपणः फलहेतवः” २/४९ से कर्म की निंदा भी करते हो तो अगर कर्म से ज्ञान ही श्रेष्ठ है तो आप मुझे ऐसे बीभत्स कर्म में क्यों लगा रहे हो ? अर्थात फिर मरने के बाद विदेह मुक्ति की अपेक्षा ज्ञान से, सर्वकर्मसंन्यास पूर्वक जीवन मुक्ति का आनन्द क्यों न लिया जाये ? इससे इस बीभत्स कृत्य से भी बचत हो जायेगी अर्थात इनकी प्राण रक्षा भी हो जायेगी और मुझे जीवन मुक्ति का आनंद भी मिल जायेगा ।
अतः ऐसे मिले हुए से वाक्य क्यों कह रहे हो कि कर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त करो ? इससे तो मैं भ्रम्रित हो रहा हूँ । इसलिये वह एक ही निश्चय कहिये जिससे मैं श्रेय अर्थात मोक्ष को प्राप्त करूँ ।
भावार्थ— जब बुद्धि मोहित हो जाती है तब वह अनधिकार को अधिकार और अधिकार को अनधिकार समझ लेती है ‘अधर्मं धर्ममिति मन्यते तमसावृताः’ १८/३२ यही स्थिति अर्जुन की है अतः निश्चित किया हुआ एक ही कल्याणकारी मार्ग जानना चाहता है ॥२॥
संबंध— इस पर भगवान कहते हैं कि अर्जुन हमने जो कहा वह ठीक ही कहा है लेकिन तुम मोह के कारण समझ नहीं सके हमने “एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु” २/३९ में पहले ही कहा था कि यह अभी तक जो विचार कहे विचार साङ्ख्योगी अर्थात वीतरागी, निवृत्ति मार्गी संन्यासी के लिए हैं तेरे लिए नहीं, अतः अब तू कर्मयोग को सुन, क्योंकि “बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि” २/३९ । बुद्धि जब कर्म को योग बनाकर कार्य करेगी तभी तू कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा, क्योंकि संसार में दो ही प्रकार के पुरुष होते हैं……
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥३/३॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― संसार में दो ही प्रकार की निष्ठाएं होती हैं ज्ञानयोग वीतरागी संन्यासियों के लिए और कर्मयोग कर्माधिकारी गृहस्थ के लिए (इन्हीं दोनो निष्ठा का वर्णन अध्याय २ में किया है) ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान का तात्पर्य है साङ्ख्ययोग से जिनका चित्तशुद्ध हो चुका है जिनकी स्थिति स्वभाव से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ में प्रतिष्ठित है, यह ज्ञान उन वितरागी संन्यासियों के लिए है, क्योंकि लक्ष्य भले एक हो किन्तु साधन अधिकार भेद से भिन्न-भिन्न होता है । क्या तुम संन्यासियों की तरह शुद्धचित्त, कामना रहित हो गये ? अगर अकाम थे तो इस युद्धक्षेत्र में क्यों आ गये ? अब जो यहाँ आकर पलायन रूप मोह का कल्मष है, उसके मार्जन के लिए कर्म करना ही चाहिए । ‘कामैश्वर्य प्रसक्तानाम्’ अर्थात काम की निंदा करके अनासक्त होकर कर्म करने के लिए कहा है, जिससे चित्तशुद्धि होकर तुम भी उसी पद में प्रतिष्ठित हो जाओगे । जिस पद में अकल्मष वीतरागी संन्यासी प्रतिष्ठित होते हैं, क्योंकि मार्ग भिन्न भिन्न दिखने पर भी लक्ष्य प्राप्ति दोनों की एक ही है । दोनों मार्गों को भिन्न देखना अविवेकियों का काम है । अतः युद्ध करो ।
अथवा यहाँ सांख्य से आत्मा अनात्मा का विवेक द्वारा निश्चय कर चुके सर्वकर्मसंन्यासी के लिए ज्ञानयोग कहा गया है । किन्तु जो आत्मा अनात्मा का निश्चय करके गृहस्थ प्रवृत्तिमार्गी हैं उनके लिए मुझ शाश्वत परमेश्वर द्वारा कर्मयोग कहा गया है । यहाँ पर यह स्पष्ट भगवान कह रहे हैं कि कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग दोनो एक साथ नहीं चल सकते । दूसरी बात ज्ञानमार्ग के लिए विवेक और वैराग्य की अपेक्षा है जबकि ये सब गृहस्थ में संभव नहीं है, इसलिये पहले कर्म करके चित्तशुद्धि करे । चित्तशुद्धि होने पर ही ज्ञानमार्ग का अधिकारी होगा । यही बात आगे भी बता रहे हैं ॥३॥
संबंध— अर्जुन के मन में शंका हो सकती है कि कर्मफल की अनित्यता से उसका फल मोक्ष भी अनित्य होगा । ऐसी आशंका यदि अर्जुन करें तो......
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥३/४॥
शब्दार्थ— कोई भी पुरुष कर्मों का आरंभ किये बिना न तो नैष्कर्म्य को प्राप्त कर सकता है और न ही संन्यास अर्थात शिखा-सूत्र त्यागकर सिद्धि को प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ— जिस प्रकार अर्जुन के मन में मोहित होकर कर्मों के प्रति उदासीनता बन रही है वह उचित नहीं है । अतः अर्जुन को भगवान दो बाते बताना चाहते हैं— पहला यह कि अभी चित्तशुद्धि रूप नैष्कर्म्य को प्राप्त नहीं हुए हो इसलिए तुम भिक्षावृत्ति के आश्रित संन्यास अधिकृत सांख्ययोग के अधिकारी नहीं हो, दूसरी बात यदि कर्मों के फलस्वरूप मोक्ष को भी अनित्य मानोगे तो यह तुमहारे योग्य नहीं है इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम या तो मेरी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हो या उपेक्षा कर रहे हो, क्योंकि मैं पहले ही कह चुका हूँ “नेहाऽभिक्रमनाशोऽस्ति” २/४० अर्थात कोई भी किये गये निष्कामकर्म का फल नाश नहीं होता ऐसा जो अपने स्वधर्मानुष्ठान का अंश मात्र भी पालन करता है वह बड़े से बड़े भय का नाश कर देता है २/४० सबसे बड़ा भय जन्ममृत्यु रूप संसार का है जिसके कारण तुम्हारे सामने उपस्थित संकट या भय का सामना करना पड़ता है । ऐसे स्वधर्म का त्यागकर संन्यास रूप परधर्म क्यों अपनाना चाहते हो ? अगर निष्कामता को प्राप्त होना है तो भी बिना कर्म के निष्कामता को प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि वासना मन में रहने से कर्मासक्ति तो गई नहीं तो नैष्कर्म्य की प्राप्ति कैसे होगी ? दूसरी बात ये कि अगर सोचते हो कि शिखा-सूत्र त्यागकर हम कर्मों का त्याग क्यों न करें ? तो तुम्हीं बताओ ऐसा करने से नैष्कर्म्य रूप सिद्धि प्राप्त हो जायेगी ? अर्थात कभी नहीं । यज्ञादि स्वधर्म प्रेरित वैदिक कर्मों का अनुष्ठान कर और वह क्षत्रिय होने के नाते उपस्थित स्वधर्म रूप युद्ध ही है ।
भावार्थ— शास्त्रीय कर्म के अनुष्ठान के बिना निष्कामता की सिद्धि नहीं होती, कर्मों के त्याग से आत्मरूप सिद्धि नही होती । इसमें वाक्य भेद से अर्थ भेद एक जैसा दिखने पर भी पूर्वार्ध में कर्मी गृहस्थ के लिए कहा गया है क्योंकि जब तक चित्तशुद्धि नहीं होगी तब तक निष्कामता हो नहीं सकती और बिना निष्कामता के स्वरूप से अन्तर्बाह्य कर्मों का त्याग होगा नहीं तो बाहर से संन्यास ग्रहण करके बाह्य कर्मों के त्याग मात्र कर देने से आत्म प्रतिष्ठा नहीं हो सकती । इसका कारण आगे बता रहे हैं ॥४॥
संबंध— यज्ञादि वैदिक कर्मों के संन्यास यानी त्याग से नैष्कर्म्य सिद्धि क्यों नहीं होगी इस पर कहते हैं.......
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥३/५॥
शब्दार्थ— कोई भी ऐसा क्षण नहीं जाता जब कोई बिना कर्म किये शान्ति से बैठ सके क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण अर्थात उनमें रमणीय बुद्धि सभी शास्त्रीय अशास्त्रीय कर्म करवा ही लेते हैं ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने यहाँ कहा कि अगर तुम सोचते हो कि मैं बिना कर्म किये रह सकता हूँ, तो यह संभव इसलिये नहीं है कि प्रकृति कभी निष्क्रिय होती नहीं तो उससे उत्पन्न गुण जाग्रत, जाग्रत के कार्य, स्वप्न, स्वप्न के कार्य, निद्रा निद्रा के कार्य आलस्य प्रमाद आदि मन बुद्धि आदि और उनके कार्य सभी तो प्रकृति ही हैं वह प्रकृति सदैव सक्रिय ही है, उस प्रकृति का आश्रय लेने वाले तुम निष्क्रिय कैसे हो सकते हो ? अगर कहो ज्ञानी का शरीर-मन-बुद्धि आदि भी तो प्रकृति है फिर वह कैसे निष्क्रिय अर्थात कर्म त्यागी कैसे हो सकता है ? तो इसे हम छठे अध्याय में बताएंगे कि ज्ञानी कैसे बड़े से बड़े दुःखों में भी विचलित नहीं होता ६/२२ यहाँ भी आगे प्रकृति अर्थात गुण ही गुणों में कैसे क्रिया कर रहे हैं ? बताऊंगा । पहले यह समझ लो कि ज्ञानी की स्थिरता से विपरीत तुम्हारे सामने थोड़ा सा युद्ध का संकट खड़ा हो गया तो मुंह सूख गया, शरीर मन बुद्धि सभी कांप गये, ऐसे अशुद्ध चित्तवाले तुम्हारा संन्यास में अधिकार कैसे हो सकता है ? अतः प्रकृति के गुणों का स्मरण करके उपस्थित स्वकर्म करो, अन्यथा अगर प्रकृति के आधीन होकर कर्म करना पड़ा, तो पता नहीं क्या करना पड़े और क्या गति होगी ?
अथवा इसी को आगे ‘प्रकृतिं त्वां नियोक्ष्यति’ १८/५ कहेंगे । तात्पर्य यह है कि संसार प्रकृति का कार्य है, उसे जब जो करवाना होता है वह आपके पूर्व कर्मों से उत्पन्न फलस्वरूप वैसा कर्म करवा ही लेती है व्यर्थ में मनुष्य यह समझता है कि मैं कर्ता हूँ, मैं अकर्ता हूँ ‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ ३/२७ इसी मूढता को दूर करने के लिए ही ‘मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि’ २/४७ यानी तू न तो कर्ता बन और न ही अकर्ता होने की आसक्ति रख । इसी बात की पुष्टि के लिए यहाँ बताया कि तू अगर सोचता है कि बिना कर्म के निष्कामता प्राप्त हो जायेगी तो यह भी गलत है, और यदि सोचता है निष्कामता से आत्मलाभ हो जायेगा यह भी गलत है क्योंकि बिना काम के निष्काम कैसे हो सकता है ? बिना निष्काम हुए स्वरूप में प्रतिष्ठा रूप सिद्धि भी कैसे हो सकती है । प्रकृति तो कार्य करवा ही लेगी किन्तु पता नहीं कहां ले जाकर डालेगी, किन्तु तुझे स्वतंत्रता है कि तू अहं बुद्धि का त्याग करके अपने अनुसार कर्म कर ले ताकि कल्याण को प्राप्त कर सके ।
भावार्थ— तुम प्रकृति के आधीन कार्य करने को भले बाध्य हो लेकिन आसक्त होना, निरासक्त होने के लिए स्वतंत्र हो, अतः अनासक्त होकर कर्म करो ॥५॥
संबंध— अगर फिर भी कर्म का त्याग कर दे तो……
कर्मेन्द्रियिणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मित्थ्याचारः स उच्यते ॥३/६॥
शब्दार्थ— सदसद् का विवेक न कर पाने वाला मूढ़ हृदय कर्मेन्द्रियों का नियमन तो कर लेता है किन्तु मन के द्वारा उन उन इन्द्रियों के रस का पान करता रहता है ऐसा मूढ़ात्मा कर्मत्यागी अर्थात संन्यासी नहीं बल्कि उसको मित्थ्याचारी कहते हैं ।
तात्पर्यार्थ— अगर मुमुक्षु कर्मों के सौम्य, बीभत्स रूप देखकर आसक्त और निरासक्त होता है तो वह मन को प्रिय लगने वाला कार्य ही पतन का हेतु है इसीलिये भगवान ने कर्म न करने की भी आसक्ति २/४७ का भी त्याग करने को कहा है क्योंकि कर्मों की आसक्ति चित्त की निर्मलता पर प्रश्नचिह्न है । ऐसा अशुद्ध चित्त कि मन में बहुत सारी कामनाओं के कारण मानस क्रियाओं का त्याग न करके बाह्य क्रियाओं का त्याग करता है । ऐसे पुरुष की ही प्रमथनशील इन्द्रियां मन को को भली भांति मथकर अर्थात विचलित करके हरण कर लेती हैं २/६० और जल में नाव की तरह २/६७ डुबो देती हैं । ऐसे मूढ़हृदय को जो कर्तव्याकर्तव्य भी नहीं जानता उसे मूढ़ कहा गया है वह स्वयं तो डूबता है साथ ही उस पर आस्था रखने वाले अर्थात समाज को भी डुबो देता है । भगवान यही कहना चाह रहे हैं, क्योंकि समाज का उत्थान चाहने वालों के लिए आगे जनकादि का भी उदाहरण देंगे ।
भावार्थ— बाहरी इन्द्रियों को उनके कार्यों से बलात् रोक देने पर भी भी आन्तरिक रस बना रहता है जो पतन का हेतु है । जबकि आन्तर विषय रस नियंत्रित होने पर बाह्य कर्मेन्द्रियों को नियमन की आवश्यकता ही नहीं होती है । अतः ज्ञानेन्द्रियों बल्कि उनके भी नियंता मन को ही वश में करके स्व-कर्म करना चाहिए ॥६॥
संबंध— ऐसा दंभाचार न करके जो मन से इन्द्रियों का नियंत्रण करके कर्म करता है उसकी प्रशंसा करते है......
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥३/७॥
संबंध— हे अर्जुन ! जो मन के द्वारा अपनी संपूर्ण इन्द्रियों को वश में करके अपने स्वस्थानीय प्राप्त स्वधर्म का अनासक्त होकर स्वकर्म अर्थात शास्त्रीय नित्य नैमित्तिक कर्म करता है वही उस पू्र्व में कहे गये दंभाचारी से श्रेष्ठ है ।
तात्पर्यार्थ— पूर्व में कहे गये दंभाचारी कर्मयोगी या संन्यासी ३/४ की अपेक्षा ३/६ की तरह आचरण करनेवाले की भी अपेक्षा से जो मन के द्वारा संपूर्ण इंद्रियों को वश में करने वाला है वह अर्थात ज्ञानेन्द्रियों सहित कर्मेन्द्रियों को वश में करके केवल कर्मेन्द्रियों से कर्म करता है वही पूर्वोक्त ज्ञान और कर्मयोग की अपेक्षा श्रेष्ठ है । यहाँ पर विशेष बात यह है कि जब कर्मेन्द्रियों को वश में करने की बात आती है तब बिना किसी विभाग के सभी इन्द्रियों को वश में करने की बात आती है और जब विभाग करके कर्मेन्द्रियों ३/६-७ मन के द्वारा कर्मेन्द्रियों को वश में करने की बात आती है, ज्ञानेन्द्रियों की नहीं, तब कर्म तो कर्मेन्द्रियाँ ही करती हैं, बात तो ठीक है किन्तु गीता में ‘शरीरवाङ्मनोभार्यत्कर्म प्रारभते नरः’ १८/१५ कहकर त्रिविध कर्म माने गए हैं इसका अर्थ है ज्ञानेन्द्रियों को ही कर्म करने का बोध होता है कर्मेन्द्रियों को नहीं अर्थात जिसने ज्ञानेन्द्रियों के रस का त्याग कर दिया वही श्रेष्ठ है न कि केवल कर्मेन्द्रियों के त्याग करने से वाला ।
यहाँ कर्मयोग की स्तुति की गई है । आसक्ति रहित यानी निष्काम कर्मयोग की प्राप्ति । यही नैष्कर्म्य सिद्धि कही गई है ॥७॥
संबंध— इस प्रकार कर्म के स्वरूप को समझ कर अपने लक्ष्यार्थ कर्म का निश्चय करो……
नियतं कुरु कर्मत्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥३/८॥
शब्दार्थ— कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है अतः तुम अपना कर्म निश्चित करो और ऐसी प्रसिद्धि भी है कि कर्म न करने से शारीर यात्रा भी नहीं हो सकती ।
तात्पर्यार्थ— तुम्हारी जो भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह की जो इच्छा है वह भी कर्म ही है, क्योंकि बिना कर्म के जीवन निर्वाह भी नहीं हो सकता, इसलिये भी कर्म करो । पूर्वोक्त कर्मयोग का आचरण न करने वाले दंभाचारी की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है अतः अपना शास्त्रीय याज्ञिक कर्म सुनिश्चित करो ।
भावार्थ— भगवान का भाव यह है कि जब बिना कर्म के शरीर यात्रा भी नहीं हो सकती, तो श्रेय (मोक्ष या परमात्मा) की प्राप्ति कैसे हो सकती है, अतः ज्ञानी होने का दंभ और प्रमाद त्याग कर स्वभावानुसार सुनिश्चित शास्त्रीय कर्तव्य का पालन करो ॥८॥
संबंध— अतः कर्म को नैष्कर्म्य प्राप्ति हेतु यज्ञ बना दो……
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्त सङ्गः समाचर ॥३/९॥
शब्दार्थ— हे कौन्तेय ! कर्म वे जन्ममृत्यु रूप बन्धन बनते हैं, जो यज्ञ के लिए नहीं किये जाते हैं । अतः केवल यज्ञ के लिए कर्म करते हुए उन कर्मों के संग से मुक्त हो कर समभाव से विचरण करो ।
तात्पर्यार्थ— यहां पर यज्ञ को तीन भागों में विभक्त करते हैं… १- लोकप्रसिद्ध काम्यकर्म, २-परमेश्वर, क्योंकि परमेश्वर की यज्ञ में नित्य प्रतिष्ठा है इस बात को ३/१५ में कहेंगे, ३- कर्तव्य पालन अर्थात मेरा कर्तव्य था इसलिये ऐसा कर दिया बाकी हमसे क्या लेना देना है अथवा मेरी अमुक कार्य में योग्यता है, इसलिए करूँ एवं यज्ञ के लक्ष्यार्थ परमेश्वर के निमत्त वह भी उन्हीं के लिए कर्म करना, ये कार्य जन्ममृत्यु के बन्धन से मुक्त करते हैं, अथवा अगर ऐसा भी भाव आया कि भगवान इस कार्य से प्रसन्न हों तो वह कार्य भगवान विष्णु लिए नहीं अपने लिए है, यह भाव भी बन्धन कारक हो सकता है । इसलिये कहा “मुक्त सङ्गः” अर्थात भगवान प्रसन्न हों चाहे न प्रसन्न हों मेरा कर्तव्य था इसलिये किया बाकी प्रसन्नता-अप्रसन्नता वे जानें । ऐसा जो सिद्धि-असिद्धि, प्रसन्नता-अप्रसन्नता रूप दोनो में सम भाव रखकर यज्ञ अर्थात परमेश्वर के लिए यज्ञ करता हुआ मुक्त भाव से विचरण कर क्योंकि यदि निषिद्ध कर्म अर्थात अशास्त्रीय कर्म करेगा अथवा यज्ञोऽन्यत्र से यज्ञ यानी शास्त्रीय कर्म उससे भिन्न अशास्त्रीय निषिद्ध कर्म लेने से शास्त्रीय काम्यकर्म जन्ममृत्यु का हेतु बनेंगे ।
यह उनके लिए कहा गया है जिनकी अभी प्रवृत्ति संन्यास में न होकर कर्म में ही लगी है किन्तु किसी कारण वश कर्म का त्याग करने को उद्यत हैं । जो यहाँ नियत कर्म कहे गये हैं वे यहाँ स्वाभाविक गुणों के आधार पर कहे गये बलात् कर्म क्षणिक अन्य के विहित कर्म में आकर्षण देखकर नहीं, इसी को आगे ‘सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्’ १८/४८ कहेंगे । सहज स्वाभाविक और शास्त्रीय कर्मों का निष्काम कर्तव्यत्वेन अनुष्ठान करना श्रेष्ठ है क्योंकि सकाम कर्मों की अध्याय दो में निंदा की जा चुकी है । फिर कर्म तो वैसे भी प्रकृति का नियम है अन्यथा शरीर का तक निर्वाह बिना कर्म के नहीं हो सकता ।
यज्ञ के लिए कर्म क्यों करना ? इसको श्लोक ३/१५ में बताएंगे । यहाँ पर इतना समझना चाहिए ‛यज्ञो वै विष्णुः’ यज्ञ ही परमात्मा है अतः प्रत्येक कर्म यज्ञ अर्थात परमात्मा के लिए ही करना चाहिए ।
भावार्थ— जो नियत यानी शास्त्रीय यज्ञ, दान, व्रतादि सकाम कर्म ऊंच योनियों में जन्ममृत्यु रूप बन्धन का हेतु बनते हैं, वही कर्तव्यत्वेन ईश्वरार्थ किया जाने वाला कर्म मोक्ष का हेतु हैं ॥९॥
संबंध— यज्ञ साक्षात परमेश्वर है यह बताते हैं……
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥३/१०॥
शब्दार्थ— सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा जी ने यज्ञ के सहित प्रणियों की रचना की फिर उनमें प्रधान मनुष्यों से कहा— तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा सबकी वृद्धि करो और यह यज्ञ तुम लोगों की वृद्धि करे ।
तात्पर्यार्थ— प्रजापति ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम यज्ञ को ही उत्पन्न किया फिर मनुष्यादि अन्य प्राणियों की । उन प्राणियों में मनुष्यों को ही कर्म का अधिकार प्राप्त है, इसलिये मनुष्यों को ही कर्म करने का अधिकार दिया । शंका होती है कि क्या मनुष्य मात्र को यज्ञ का अधिकार प्राप्त नहीं है, मात्र त्रैवर्णिकों को ही यज्ञ का अधिकार प्राप्त है ? तो क्या मात्र त्रैवर्णिकों को ही ब्रह्मा जी ने उपदेश किया ? इससे तो पितामह ब्रह्मा जी का मनुष्यों के प्रति भेदभाव दिखता है ? चतुर्थ वर्ण भी कर्माधिकारी है तो उसे उपदेश क्यों नहीं दिया ? इस बात पर विचार करने से निष्कर्ष यह निकलता है कि “यज्ञो वै विष्णुः” अर्थात परमेश्वर ही यज्ञ है यह अर्थ बाद में किन्तु यज्ञ कर्तव्य है यह अर्थ पहले निकलता है और कर्तव्य पालन का मनुष्य मात्र को अधिकार है ।
यह तो पशु-पक्षियों में भी देखा जाता है, इस बात का इतिहास भी साक्षी है । सबकी वृद्धि करो कहा है, अतः वृद्धि अर्थात उन्नतिभाव, प्रजा उत्पन्न करना और अपने अपने समुदाय की रक्षा करना तो मनुष्य सहित संपूर्ण प्राणियों में भी देखा जाता है, किन्तु उनमें मोह की प्रधानता और राग द्वेष भी है इससे इनकी वृद्धि तो क्या पतन ही होता है, आसक्ति ही इसका मूल है, यही प्रकृति है जो स्वयं अपने गुणों द्वारा गुणों में ही नाटक कर रही है “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” ३/२८ इसलिये भगवान ने संपूर्ण इन्द्रियों वश में करके निरासक्त भाव से ३/७ कर्म करने की बात कही है, क्योंकि कार्य तो प्रकृति कर ही रही है लेकिन यह अधिकार मात्र मनुष्य को ही प्राप्त हुआ है कि वह राग द्वेष के बिना भी कर्तव्यत्वेन कर्म करके उन्नति स्वयं की और चाहने वाले की भी कर सकता है । जब परस्पर एक दूसरे की उन्नति का भाव होगा तो सब तरफ खुशहाली और स्वर्ग ही स्वर्ग होगा और सबकी कामनाएं पूर्ण होंगी, कोई दुःखी नहीं होगा । यही है उस यज्ञ अर्थात कर्तव्य पालन से सबकी वृद्धि, उन्नति या आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने वाली कामधेनु ।
यहां पर यज्ञ का विवरण चल रहा है जो श्लोक ३ से श्लोक १५ तक चलेगा । अतः आज के समय में हठधर्मिता को आगे करके किसी अग्नि विशेष में ही आहुति देने को यज्ञ मानकर केवल पूर्व के भाष्यकारों, टीकाकारों के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही करते रहेंगे तो मुझे सबका कल्याण करने वाली गीता की सार्थकता कदापि सिद्ध होती नहीं दिख रही है । क्योंकि गीता संपूर्ण मानव के कल्याण के लिए युद्धक्षेत्र में कही गई है । जो मनुष्य की अत्यन्त विषम परिस्थिति में भी उद्धार करने का दावा करती है । फिर यज्ञ नाम से यहाँ पर कहा गया अग्नि विशेष की आहुति ही कैसे हो सकती है ? हुत का अर्थ त्याग होता है । अर्थात जो कर्तव्य कर्म भलीभाँति फलाकांक्षा का त्याग करके किया जाये वही यज्ञ कहा गया है । ‘यज्ञो वै विष्णुः’ अर्थात यज्ञ ही परमेश्वर है तो और सब क्या है ? इसलिये जहाँ कहीं भी गीता में यज्ञ की बात आती है उसे अपने स्वभाव और योग्यता के अनुसार बिना किसी सम्मान, फल या बदले में उपकार की भावना रखे जो कर्म करता हुआ भी उससे किसी प्रकार की वैसे ही किसी फल की कामना नहीं करता जैसे अग्नि में जली हुई वस्तु से कोई कामना नहीं की जा सकती । यही कर्तव्य कर्म है ऐसा समझना चाहिए ।
इस प्रकार किये गये यज्ञ अर्थात कर्तव्व कर्म के द्वारा संपूर्ण प्राणियों की उन्नति करो और ये यज्ञ (कर्तव्य) कर्म तुम्हें कामधेनु जैसे इच्छित आवश्यक सामग्री देती है उसी के समान तुम्हें यथा समय यज्ञ यानी परमात्मा कर्तव्य कर्म के लिए आवश्यक सामग्री देने वाले हों ।
भावार्थ— यहाँ यह सिद्ध हुआ कि कर्तव्य का पालन राग द्वेष या आसक्ति से रहित होकर करने से ही प्राणियों की उन्नति संभव है ॥१०॥
संबंध— कर्तव्य पालन मात्र से सबकी उन्नति कैसे संभव है ? इस पर कहते हैं.......
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥३/११॥
शब्दार्थ— इस प्रकार तुम (मनुष्य) देवताओं की उन्नति करो और देवता भी तुम्हारी उन्नति करें, इस प्रकार अपने अपने कर्तव्य द्वारा एक दूसरे की उन्नति करके श्रेय अर्थात वृद्धि को प्राप्त करो ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ पर कहा गया है कि इस प्रकार यज्ञ द्वारा मनुष्य देवताओं की और देवता मनुष्यों की उन्नति करें । प्रश्न यह है कि देवताओं को तो यज्ञ करने का अधिकार नहीं है, सिर्फ ग्रहण सकते हैं तो मनुष्यों की यज्ञ से उन्नति कैसे करेंगे ? यही शंका इस बात का समाधान करती है कि यज्ञ का अर्थ कर्तव्य पालन ही है । जिसके पास जो सामग्री है वह दूसरे के पास नहीं है किन्तु उसे उसकी आवश्यकता है, उससे उसका जीवन, मन प्रसन्न होगा, उसे देना ही चाहिए । बिना किसी बदले की इच्छा के और जिससे आपकी आवश्यक सामग्री प्राप्त होगी वह आपकी आवश्यकता की पूर्ति करे, क्योंकि जगत का एक अटल नियम है कि यहाँ कोई न कोई कमी बनी ही रहती है तथापि वह कमी दूसरा समर्थ पूरी कर सकता है । अगर राग द्वेष नहीं होगा तो निश्चित ही कोई किसी बात से दुःखी नहीं होगा । शास्त्रों द्वारा राग द्वेष रहित होना हर मनुष्य का कर्तव्य इसीलिये कहा गया है । परस्पर देव-मानव ही नहीं सृष्टि का प्रत्येक जड़-चेतन प्राणी उन्नत होगा ।
इस प्रकार निष्काम कर्तव्य कर्म द्वारा एक दूसरे की उन्नति करके श्रेय को प्राप्त होना यानी चित्तशुद्धि पूर्वक आत्म अनात्मा का विवेक प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करना । यहां मनुष्य देवताओं की निष्काम सेवा के फलस्वरूप स्वर्ग की बात हमें इस लिए नहीं ठीक लगती है कि प्रसंग है निष्कामता का और निष्कामता का फल चित्तशुद्धि एवं चित्तशुद्धि का फल है ज्ञान पूर्वक मोक्ष की प्राप्ति है । वैसे भी दूसरे अध्याय में और आगे भी सकाम कर्म की निंदा की गई है और की जायेगी, इसलिये यहां श्रेय का अर्थ चित्तशुद्धि पूर्वक क्रममुक्ति ही समझना चाहिए ।
भावार्थ— हमारी सबसे बड़ी समस्या ये है कि जो हमसे ऊपर उठ गया तो द्वेष और नीचे वाले से घृणा करते हैं, यही हमारे पतन का एक मात्र कारण है । हम जिससे घृणा करेंगे वह हमारी जड़ें काटेगा और जिससे द्वेष करेंगे वह तो सत्यानाश कर ही देगा । अतः हमें हर परिस्थिति में राग द्वेष से ऊपर उठकर कर्तव्य का पालन करने का आदेश दिया गया है । यही हमारी समृद्धि, श्रेय अर्थात नैष्कर्म्य की प्राप्ति का साधन है । हमें हमारी आवश्यकता की पूर्ति करने वाले के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए ॥११॥
संबंध— शंका होती है कि हम किसी का हित करें और वह न करे तो ? इस पर कहते हैं……
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥३/१२॥
शब्दार्थ— यज्ञ से सन्तुष्ट वे देवता इच्छित भोग्य पदार्थ देंगे, उन देवताओं द्वारा दी गई सामग्री जो उन्हें नहीं देता वो चोर है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ इच्छित भोग्य पदार्थ आया है इसका यह अर्थ नहीं कि हम जो चाहेंगे वह, इच्छित का अर्थ है कर्तव्य पालन में बाधा न हो ऐसी वस्तु हमें प्राप्त होगी । हमें चाहिए क्या ? पहले यह समझना होगा, पूर्व श्लोक में कहा गया है “श्रेयः परमवाप्स्यथ” अर्थात यहाँ प्रसंग श्रेय अर्थात निवृत्ति का चल रहा है, अर्जुन ने श्रेय का ही मार्ग पूछा था “यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे” २/७, “तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽमानुयाम्” ३/२ श्रेय का सुनिश्चित मार्ग पूछा है किसी कामना की पूर्ति के उद्देश्य से नहीं, अतः तुम यज्ञ करो । यज्ञ क्या है ? यज्ञ ५ प्रकार के होते हैं १- देवयज्ञ, २-पितृयज्ञ, ३- ऋषियज्ञ, ४- भूतयज्ञ, ५- अतिथि अर्थात नरयज्ञ । विभिन्न यज्ञ करके देवताओं को संतुष्ट किया, श्राद्ध आदि के माध्यम से पितरों को संतुष्ट किया, वेदाध्ययन और उसकी शिक्षा से ऋषियों को संतुष्ट किया, विभिन्न प्राणियों की रक्षा सेवादि से मानवेतर अन्य प्राणियों को अर्थात पशु पक्षी को संतुष्ट करके भूतयज्ञ परिपूर्ण किया, अब मनुष्य यज्ञ बचा वही तो तुम्हारा कर्तव्य है । कितने लोग तुम्हारी शरण में आकर धर्म रक्षा की कामना कर रहे हैं, उनकी रक्षा करना भी तो तुम्हारा ही धर्म अर्थात कर्तव्य है ।
अतः इस नरमेध को भी करो, नरमेध का अर्थ मनुष्य की खोपड़ी का हवन मत समझिएगा, मेधा का अर्थ प्रज्ञा भी होता है अर्थात् भूतयज्ञ से मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी प्राणी आते हैं, नरमेध में केवल मनुष्य को आत्मभाव से संतुष्ट करना ही नरमेध यानी यज्ञ है । आप संस्कृत में कोई अर्थ कर सकते हैं, किन्तु यह हिन्दी है और यहाँ भाव की प्रधानता ही ग्राह्य है । इस प्रकार जब कर्तव्यत्वेन यज्ञ करोगे तो देवता भी तुम्हारी मदद करेंगे । आज जो कुछ भी तुम्हें प्राप्त है वह देवताओं की ही कृपा से प्राप्त हुआ है । महादेव सहित इन्द्रादि देवताओं ने तुमसे संतुष्ट होकर तुम्हें बल संपन्न किया है । वह आज उपस्थित आवश्यकता को देखकर, यदि तुम उन्हीं के द्वारा दिये गये बल का धर्म ही जिनके प्राण हैं, उन देवताओं की धर्म के माध्यम से रक्षा नहीं करोगे तो यह समझो कि ऐसा करने वाला निश्चित चोर है अर्थात उन्हीं की वस्तु उन्हें नहीं दोगे तो चोर कहलाओगे ।
यज्ञ का विश्लेषण— आज समाज में चारों ओर से हाहाकार मचा है, उसका एक मात्र कारण पञ्महायज्ञों का न होना……
१— देवयज्ञ, २— पितृयज्ञ, ३— ऋषियज्ञ, ४— भूतयज्ञ, ५—अतिथि यज्ञ ।
१-देवयज्ञ— देवताओं अर्थात अपने से श्रेष्ठ जनों का आज सम्मान न करना हमारा दायित्व बन गया है, जिसका परिणाम यह हुआ कि हम स्वयं आज चारों ओर से अपमानित हो रहे हैं ।
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते ।
त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम् ॥
अर्थात जहाँ भी अपूज्यों अर्थात सदाचार विहीनों दम्भियों की पूजा होती है और पूज्यजनों का अपमान या उपेक्षा होती है वहाँ दरिद्रता, मृत्यु और भय ये तीनो ही सदैव उपस्थित रहते हैं । जो आज देखने को मिल रहा है ।
२- पितृयज्ञ— आज कोई भी अपने माता-पिता का सम्मान करना नहीं चाहता, चारों ओर माता-पिता का अपमान हो रहा है, जिसका परिणाम यह है कि हमारी संतान भी हमें श्रेय न देकर अपमान कर रही है और वृद्धजनों की सेवा न होने के कारण वृद्धाश्रमों की दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है ‘मातृ देवो भव’ ‘पितृ देवो भव’ का संस्कार आज संभवतः कहीं दिखाई नहीं दे रहा है ।
३- ऋषियज्ञ— ऋषियों के बताए मार्ग के त्याग का फल यह है कि आज कोई भी अपनी संस्कृति को न पढ़ रहा है, न पढ़ा रहा है, न समझ रहा है । ऐसे ऋषियों के घोर अपमान का फल यह हुआ कि हमारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कब कहां किस प्रकार गायब हो गया पता नहीं, “अहिंसा परमो धर्मः” जैसा भारतीय सनातन संस्कार ही कहाँ विलीन हो गया पता नहीं, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ के संस्कार जाते रहे ‘आचार्य देवो भव’ का पता ही नहीं क्या होता है ? परिणाम यह है कि चारों ओर से हिंसा, चोरी, कपट आदि, बलात्कार, व्यभिचार आदि का बोलबाला बढ़ा और चारों ओर से हाहाकार मचा हुआ है ।
४- भूतयज्ञ— हमारे यहां जीवो पर दया करो यह तो प्रथम सूत्र रहा है, इसमें गाय, कुत्ता, कौवा, आज भी पंच महायज्ञ में प्रधान माने जाते हैं, गाय जहां संकट पड़ने पर भी पलट कर हमला करना नहीं जानती उल्टे दुग्धामृत आदि देकर पुष्ट करते हुए दयालुता का साक्षात प्रमाण है, वहीं कुत्ता स्वामी भक्ति का कि जिसका खाया है, उसका संरक्षण करना ही हमारा कर्तव्य है, तो वहीं कौवा दुष्टता का जीता जागता प्रमाण जिसे कितना भी खिलाओ लेकिन वह दुष्टता करेगा ही और आपकी अन्य वस्तुओं को भी कहीं न कहीं विकृत करेगा ही, यह सब ना करने के कारण ही मानव मात्र में आज दया कर्तव्य परायणता का भाव विलुप्त सा होकर हाहाकार कर रहा है । इसी दृष्टिकोण के संरक्षण के लिए श्री भगवान आगे कहेंगे ‘शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः’ ५/१८ ।
५- नर यज्ञ या अतिथि यज्ञ— हमारे यहां अतिथि देवो भव की एक मिसाल रही है । बड़े-बड़े रजवाड़े केवल अतिथि अर्थात शरणागत की रक्षा में भले ही उजड़ गए हो किंतु उनकी रक्षा की । प्राण पर्यंत क्षत्रियों के लिए तो अतिथि रक्षा का एक प्रकार का युद्ध नरमेध यज्ञ की तरह धर्म और प्रजा रक्षा के लिए होता था । बड़े-बड़े शूरवीर इस नरमेध यज्ञ में अपनी बलि दे देते थे । जल, भोजन, छाया, आदि के माध्यम से अतिथि के सत्कार में स्वयं को इन वस्तुओं से वञ्चित कर के भी इतना संतुष्ट होते थे मानो त्रिलोकी का राज्य मिल गया हो ऐसी महान भारतीय सनातन संस्कृति में कौन सा ग्रह, असुर, राक्षस हावी हो गया ? किसकी नजर लग गई ? अतिथि देवो भव' कहां गया ?
सब के सब आज स्वार्थपरता में चोर, लुटेरे, डाकू हो गए हैं । यही कारण है सभी आज अपनी रक्षा का उपाय खोज रहे हैं, लेकिन कुछ भी उपाय नहीं दिख रहा, भला जिस वृक्ष की जड़ सूख गई हो, उसके पत्ते हरे हरे रहने की आशा किसी भी उपाय से की जा सकती है ? अतः हे अर्जुन (मानव) तुम जिस स्थान पर खड़े हो, जैसे भी, जिस परिस्थिति में हो वहां उसी परिस्थिति को यज्ञ बना दो और केवल कर्तव्य पालनरूप यज्ञ को करके नैष्कर्म्य प्राप्त करना एकमात्र तुम्हारा लक्ष्य है यदि ऐसा नहीं करते तो तुम या तुम्हारे जैसा हर प्राणी चोर है ॥१२॥
संबंध— जबकि कर्तव्य का पालन करने से जो बचता है वह……
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥३/१३॥
शब्दार्थ— यज्ञ से बचे हुए अन्न को यज्ञशिष्ट कहते हैं, अन्न का अर्थ वह हर भोग्य वस्तु जो जीवन के लिए उपयोगी हो, उस यज्ञशिष्ट को खाने यानी ग्रहण या उपभोग करने वाला संपूर्ण पापों का नाश कर देता है और जो स्वयं के लिए पकाते अर्थात हर कर्म अपने लिए करते हैं वे पाप ही खाते/करते हैं ।
तात्पर्यार्थ— पूर्व में वर्णित पञ्चमहायज्ञ नित्यकर्म के अन्तर्गत हैं, उन यज्ञों से बचा शेष उपयोग करने से संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं । चूंकि प्रसंग नैष्कर्म्य का है अतः पाप का उपलक्षण पुण्य भी नष्ट हो जाते हैं । ऐसा भी मनना चाहिए, ऐसा ही भगवान आगे कहेंगे कि जो कर्मों की आसक्ति त्यागकर चित्त ज्ञान में स्थित होकर यज्ञ के लिए ही मात्र कर्म करता है, उसके संपूर्ण अर्थ अर्थात शुभ अशुभ कर्म, जिसका फल पाप और पुण्य है दोनो ही नष्ट हो जाते हैं ४/२३, वही यहाँ सर्वकिल्बिषैः है, बुद्धि यानी ज्ञान से युक्त होकर जो सुकृत यानी पुण्य, दुष्कृत यानी पापों को नष्ट कर देता है २/४०, अर्थात यहाँ भी यज्ञ कर्तव्य परायणता का प्रतीक है, जिससे नैष्कर्म्य सिद्धि प्राप्त होती है । ऐसा कैसे संभव है तो इसे पूर्व में कहा चुके हैं कि देवता ही आवश्यक वस्तुएं कर्तव्य पालन के लिए देते हैं ३/१२, तो देवता का अर्थ है देने वाला और हमें जो भी कुछ प्राप्त है वह समाज ने ही तो दिया है । अतः समाज का समाज को ही अर्पित कर देने में क्या हानि है ? तेरा तुझको सौंपते क्या लागे मेरा यही भाव नैष्कर्म्य की सिद्धि कराता है ।
अगर कोई यह समझता है कि हमने परिश्रम करके कमाया है तो वह सरकारी कर भी नहीं देते, फिर भी सरकार उसे चोर ही मानती है शाहूकार नहीं । इसी प्रकार शरीर से लेकर प्रत्येक वस्तु समाज की ही दी हुई है और उसी की सेवा में न लगाना चोरी ही है । ऐसा व्यक्ति अपने स्वार्थ को देखकर ही प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति और उपयोग करता है । अतः वह पाप ही खाता और पाप ही कमाता है । गृहस्थ पांच पाप हमेशा करता है, कूटने से, पीसने से, चूल्हे से, पानी रखने के स्थान से और झाड़ू से । इन पांचों पापों का परिमार्जन पञ्महायज्ञों से ही होगा । इसलिये हे अर्जुन (मुमुक्षु) ! यज्ञशिष्ट ही ग्रहण करो इससे सभी पापों से मुक्त हो जाओगे । इतना ही नहीं आगे बताऊँगा “यज्ञशिष्टामृत भुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्” ४/३१ अर्थात जन्ममृत्यु से रहित सनातन पद को प्राप्त करोगे ।
अर्थात सब कुछ परमात्मा का दिया हुआ है इसमें मेरा क्या है ? सब परमात्म रूप ही है, परमात्मा से भिन्न कुछ है नहीं अतः परमात्मा के लिए पंचमहायज्ञों के माध्मय से अर्पित करने के बाद जो कुछ भी शेष बचता है उसे परमात्मा का प्रसाद समझकर खाने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते है । यहाँ किल्बिष न कहकर सर्वकिल्बिष कहा है, अतः पुण्य और पाप दोनो मिलकर किल्बिष समझना चाहिए । अर्थात भगवत्प्रसाद ग्रहण करने से चित्तशुद्धि हो जाती है । एवं जो भगवत् अर्पण किये बिना ही खाता है वह कृतघ्न एवं पाप को खाने वाला पाप रूप ही है ।
भावार्थ— श्लोक ३/११-१२ समाज से प्राप्त समाज में बिना प्रतिउपकार की इच्छा से लगाकर उपरामता ही नैष्कर्म्य है, इसके विरुद्ध चोरी या पाप जो कर्मबंधन का हेतु है ॥१३॥
संबंध— उपरोक्त कर्म केवल ब्रह्म की ही प्राप्ति कराते हैं ऐसी बात नहीं है संसार चक्र की भी रक्षा करते हैंं……
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥३/१४॥
शब्दार्थ— अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ वैदिक कर्म से होते हैं ।
तात्पर्यार्थ— जिस अन्न को तुम खाते हो वही अन्न जितने स्त्री पुरूष संज्ञक प्राणी हैं उनमें अन्न को खाने से रज-वीर्य बनता है, जिससे प्राणियों की उत्पत्ति होती है । जीवन धारण करने में जो जो सामग्री लगती है वह अन्न ही है, उसका जहाँ विलय होता है वह भी अन्न ही है, हमारे द्वारा खाया गया अन्न से विष्ठा, विष्ठा किसी अन्य का और अन्य किसी अन्य का अन्न बनता है, वस्त्र भी अन्न ही है, हमारे उपयोग के बाद सड़ गलकर किसी और दीमक आदि का अन्न अर्थात सृष्टि का हर पदार्थ अन्न है और वह अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है क्योंकि धान्य, वृक्ष, वस्त्र यानी कपास पृथ्वी का ही रूपान्तरण है, अतः पृथ्वी की उत्पत्ति का हेतु जल है और जल यानी वर्षा यज्ञ से होती है । यज्ञ वैदिक मंत्रों द्वारा अग्निहोत्र, अवश्वमेधादि यज्ञ, दान, व्रत, तप, ब्रह्मचर्य, विद्यादान, कर्तव्यपरायणता आदि सभी यज्ञों से जलवायु संतुलित होकर समय पर वर्षा करते हैं । जिससे अन्न से उत्पत्ति, रक्षा और विलय होता है । ऐसा यज्ञ जो है वह वैदिक-शास्त्रीय कर्म से उत्पन्न होते हैं ।॥१४॥
संबंध— अन्न खाने के परिणामस्वरूप रज वीर्य से प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन करके कर्म की उत्पत्ति सहित सृष्टि चक्र का अगले वर्णन दो श्लोकों में किया जा रहा है ……
कर्मब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षर समुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥३/१५॥
शब्दार्थ— कर्म वेद से, वेद अक्षर अर्थात परमात्मा से उत्पन्न हुये, अतः वेद व्यापक होने पर भी नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित हैं ।
तात्पर्यार्थ— कर्म वेद से ही उत्पन्न हुआ जानो, क्योंकि कर्म क्या है क्या नहीं इसका प्रतिपादन वेद ही करते हैं । वेद ही कर्म का प्रतिपादन करते हैं अन्य नहीं यह कैसे माना जाये ? इस पर कहा कि वेद उस अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न हुआ उसकी श्वास है । इसलिये वेद अपौरुषेय है, चूंकि वेद उस सर्वज्ञ अनन्त व्यापक से उत्पन्न हैं, अतः उन्हीं गुणों से वेद भी संपन्न होने के कारण कर्म का प्रमाण वेद ही हैं । इसलिये वेद सर्वत्र एवं सर्वव्यापी होकर भी प्रधानता से यज्ञ में ही प्रतिष्ठित हैं ।
३/१४-१५ द्वारा संपूर्ण सृष्टिचक्र का वर्णन करके अन्त में अन्त में सबके मूल में अक्षर ब्रह्म को बताया । भाव यह है कि संपूर्ण कर्म यज्ञ से उत्पन्न हुए हैं, उस यज्ञ में मेरी श्वास वेद रहते हैं, श्वास, श्वास लेने वाले से भिन्न स्थान पर होता नहीं, इस प्रकार भगवान ने अपनी प्रतिष्ठा नित्य यज्ञ में बताया । नित्य यज्ञ तो पञ्महायज्ञ से ही संभव है अतः उन पञ्चमहायज्ञों का मनुष्य को विधिवत संपन्न करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य सभी यज्ञ, दान, तप आदि सुकृत कर्मों के फलस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति ही है । अतः यज्ञ अर्थात निष्काम कर्तव्यकर्म रूप यज्ञ करके परमात्मा को प्राप्त करना चाहिए । जिन शरीरादि वस्तुओं को अपना मान रहे हो उसके मूल में भी परमात्मा ही है । अतः परमात्मा की चीज परमात्मा को सौंपकर निर्द्वन्द्व हो जाओ ।
अर्थात यहाँ पर जिन वैदिक कर्मों की बात कही जा रही है वे निष्काम कर्म संबधित ही कर्म समझाना चाहिए क्योंकि अध्याय दो में और आगे भी सकाम वैदिक कर्मों की भी निंदा की गई है, यहाँ तक पूर्वमीमांसक स्वर्ग आदि भोगों के अतिरिक्त ईश्वर को ही नहीं मानते हैं, जबकि यहाँ अक्षर परमात्मा से वेदों की उत्पत्ति बताई गई है । अक्षर परमात्मा से उत्पन्न होने के कारण वेद भी अक्षर, व्यापक और अपौरुषेय है । इसलिये अक्षर परमात्मा की प्राप्ति के लिए अक्षर वेदों का आश्रय लेकर ही निष्काम ईश्वरार्पण बुद्धि से ही कर्तव्य करना यज्ञ कहा गया है । यह भाव है ॥१५॥
संबंध— इस चक्र का जो अनुसरण नहीं करता है उसकी निंदा.......
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥३/१६॥
शब्दार्थ— इस प्रकार इस सृष्टिचक्र का जो अनुसरण नहीं करता वह पापायु, इन्द्रियाराम और व्यर्थ ही जीवन धारण करने वाला है ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने “न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं” ३/४ में बिना कर्म नैष्कर्म्य सिद्धि नहीं मिलती कहा था, ३/१०-१५ तक यह बताया कि किस किस प्रकार सृष्टि की परंपरा चलती है और वेदों के द्वारा कर्म, यज्ञ (कर्तव्य), वर्षा, अन्न और फिर प्रणियों की उत्पत्ति होती है और वेद भी जिनसे उत्पन्न हुए हैं, वे स्वयं साक्षात वेदों से अतीत अविनाशी ब्रह्म हैं । अतः संपूर्ण कर्म वेदों को साक्षी मानकर उस परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति अर्थात आत्मैक्य की प्राप्ति करना चाहिए, इसी आशय को आगे स्पष्ट करेंगे ‛स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवः’ १८/४६ । फिर भी जो उन्हीं के द्वारा लिये गये शरीरादि के द्वारा उन्हीं से प्राप्त स्वस्थानीय कर्तव्यकर्मों के द्वारा उन्हीं की आराधना नहीं करते उनकी कठोर भर्त्सना करते हुए कहते हैं कि जो हमारे(वेद) के बताए इस मार्ग का अनुसरण नहीं करता वह स्वयं पापमय है उसकी संपूर्ण आयु ही पाप है वह इन्द्रियाराम अर्थात अध्याय १६ में बताये गये आसुरी संपत्ति वाला है उसका फल भी क्या मिलेगा वहीं बतायेंगे और वह तो व्यर्थ ही जीता है ।
अर्थात ‛एवं’ से श्लोक १० से लेकर श्लोक १५ तक कहे गये जो नियम हैं यह सृष्टि संरक्षण संबंधित एवं मानव के कल्याण के सर्वोपरि साधन हैं । इस प्रकार भगवान यह कहना चाहते हैं उसी का जीना इस पृथ्वी पर श्रेष्ठ है वही पुण्यात्मा है जो अपने कर्तव्य का पालन जो जिस स्थान पर है वहीं से बिना किसी राग द्वेष के करता है, वह पुण्यात्मा है और उसी की जीवन धारण करना ही सार्थक है और जो ऐसा नहीं करते तो उनकी आयु ही पापमय है अर्थात उनके रूप में साक्षात पाप ही शरीर धारण किये हुए है, ऐसे लोग व्यर्थ ही जीते हैं तात्पर्य यह कि ऐसे लोगों को मर ही जाना चाहिए जो कर्तव्य का पालन नहीं कर सकते हैं वे धरती पर बोझ ही हैं ।
भावार्थ— भगवान की दी गई शरीर सहित वस्तुएं भगवान की ही हैं, उन्हें ही अर्पण करके उन्हें ही प्राप्त कर लेना चाहिए अर्थात प्रकृति के हर कण से तादाम्य खींचकर प्रकृति सहित प्रकृति का सारा गुणधर्म प्रकृति पर छोड़कर निष्काम कर्म करते हुए आत्मैक्य की प्राप्ति करके आत्माराम हो जाना चाहिए । यहाँ जो परमात्मा है वह अपना आत्मा ही समझना चाहिए भिन्न नहीं, क्योंकि श्रीभगवान आगे कहेंगें अहमात्मा १०/२०, नियमानुसार पूर्व और उत्तर अध्याय से विरोधाभास उत्पन्न नहीं होना चाहिए तभी शास्त्र की सार्थकता है ॥१६॥
समीक्षा― अध्याय दो में ‘एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु’ २/३९ अर्थात ज्ञानयोग सुनाकर प्रतिज्ञा की थी कर्मयोग की । सकाम कर्मों की निंदा करके अर्जुन को ज्ञानयोग का अधिकारी न बताकर कर्माधिकारी बताते हुए निष्काम कर्म का निर्देश करके पुनः सर्वकर्मसंन्यास का वर्णन किया । इससे अर्जुन यह निर्णय करने में भ्रमित हो गये कि उन्हें क्या करना चाहिए ? इस पर अपने भ्रम को प्रकट करते हुए एक मात्र कल्याणकारी मार्ग कहने के लिए कहते हैं जिसके उत्तर में भगवान ने ज्ञानयोग और कर्मयोग नामक दो निष्ठाओं का पूर्वकाल में दिये गये उपदेश का वर्णन करते हुए बिना कर्म के नैष्कर्म्य और सर्वकर्मसंन्यास के फलस्वरूप आत्मसिद्धि का न होना बताया । कारण कि कोई भी क्षण भर भी कर्म किये बिना रह नहीं सकता और बलात् सर्वकर्मसंन्यास में भी अन्दर विषयों के प्रति महत्व बुद्धि का होना दंभ है अतः निरासक्त होकर कर्म करने को ही श्रेष्ठ कहते हुए कर्म के बिना जीवन यात्रा भी नहीं होती है अतः अपने शास्त्रीय स्वाभाविक नियत कर्म करने को कहते हुए परमात्मा के निमित्त कर्म करने की प्रेरणा करते हुए सृष्टि में कर्म की महत्ता, वेदों की नित्यता, वेदों का अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न होने से उनकी अपौरुषेयता का प्रतिपादन करते हुए वेदों में ही यज्ञ अर्थात कर्तव्य कर्म की स्थिति बताते हैं । भाव यह है कि संपूर्ण कर्म वेद में और वेद मुझमें प्रतिष्ठित हैं, अतः वैदिक कर्म करने वाला ही मुझ सर्वात्मा ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है । जो इस वैदिक कर्म का अनुसरण नहीं करता है वह साक्षात पाप रूप ही है उसका जीने का कोई अधिकार ही नहीं है । अतः जिस किसी भी प्रकार से हो सके कर्माधिकारी को कर्तव्य कर्म करना ही चाहिए ।
यह बात ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ पर वर्णित यज्ञ अग्नि, साकल्य और समिधा वाली नहीं है, क्योंकि उपदेश युद्धक्षेत्र में हो रहा है यहाँ तो युद्ध को भी नरमेध यज्ञ कहा जाता है । साथ ही यज्ञ के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन अगले अध्याय में भी आयेगा वही यज्ञ यहाँ भी समझना चाहिए उससे भिन्न नहीं ॥१-१६॥
संबंध— अब प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा ही कर्म का महत्व है तो फिर संन्यासियों को भी कर्म करना ही चाहिए फिर वे कर्म का स्वरूप से ही त्याग क्यों कर देते हैं ? इसका तो उन्हें पाप लगना ही चाहिेए, इसके लिए अर्जुन को आशंका हो सकती है कि तो फिर कर्म अज्ञानी को ही क्यों, ज्ञानी को भी करना चाहिए, इस पर कहते हैं……
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥३/१७॥
शब्दार्थ— जो मुमुक्षु आत्मरति वाला है एवं आत्मतृप्त भी है, आत्मा में संतुष्ट रहता है उसके लिए कोई कर्तव्यकर्म होता ही नहीं ।
तात्पर्यार्थ— ज्ञानी कर्म करेगा तो किसके लिए ? चित्तशुद्धि बनता नहीं क्योंकि बिना चित्तशुद्धि के ब्राह्मीभाव में पहुंचता नहीं, लोक संग्रह भी वह कैसे करेगा, क्योंकि जब शरीर सहित लोकादि हैं ही नहीं, कल्पित हैं, तो ऐसी मित्थ्या कल्पना के पीछे कैसे दौड़ सकता है ? भला जिसे पता है कि यह रस्सी है सर्प नहीं तो कैसे उसे भयभीत होकर मारने की कल्पना करेगा ? अथवा जब पता है कि सामने दिखने वाला रेगिस्तान है पानी नहीं, तो वहाँ कैसे कोई पानी की आशा लेकर जायेगा ? इसी प्रकार जो आत्माराम, आत्मरति, आत्मक्रीड़ा वाला है वह ऐसे मिथ्या प्रलापों में क्यों पड़ेगा ? आत्मरति अर्थात उस व्यापक आत्मा के साथ तादाम्य को प्राप्त अहं भाव में स्थित के लिए क्या कर्तव्य हो सकता है ? जो आत्मतृप्त हो चुका है वह किसके लिए कर्म करेगा ? जो भोजन करके क्षुधा से तृप्त हो गया है वह भोजन कैसे कर सकता है ? कार्य तो तब बनता है जब किसी चीज का अभाव हो, उस आत्मज्ञानी के लिए किस चीज का अभाव है ? वह तो नित्य आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित है, अतः उसके साथ किस चीज का अभाव है ‘नासतो विद्यते भावो’ २/१६ तभी वह आत्मतृप्त है, वह स्वयं से स्वयं में संतुष्ट है ‘आत्मन्येवात्मनातुष्टः’ २/५५, अतः उसके लिए कोई कर्म ही नहीं बनता, क्योंकि कर्म जिस प्रयोजन के लिए बनता है उस प्रयोजन के सिद्ध होने के बाद उस प्रयोजन से क्या संबंध ? नदी पार होकर नाव से क्या संबंध ? अथवा नदियों की गति समुद्र में प्रतिष्ठित होने के बाद गति कैसे बन सकती है, ‘यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके’ २/४८, आगे भी आयेगा ‘आत्मसंस्थं मन कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ ६/२५ । अब कर्म करना तो दूर उनका चिंतन भी नहीं कर सकता । वह पूर्णकाम है, स्वयं पूर्ण है वह मुक्तस्वभाव है । अब वैसे ही किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है जैसे नदियों के समुद्र में मिल जाने पर बहने की आवश्यकता नहीं होती । जैसे समुद्र स्वयं जल से परिपूर्ण है उसे नदियों की क्या कामना हो सकती है ? चरों ओर से कामना रहित परिपूर्ण होने से ‘आपूर्यमाण है आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं’ २/७०, अतः ऐसे ज्ञानी के लिए कोई कर्तव्य कर्म नहीं है ।
अथवा ‘तु’ कर्माधिकारी से ज्ञानयोगी की विलक्षणता दिखाने के लिए है । जो आत्मा से ही रति यानी प्रेम करता है, मतलब उसको आत्मा के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसा है ही नहीं जिससे स्थाई नित्य प्रेम किया जा सके । अतः वह नित्य स्वरूप में ही ऐकान्तिक रमण करता है । उसकी दृष्टि में आत्मा के अतिरिक्त संसार का कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है जो उसे तृप्त कर सके, अतः उसकी तृप्ति स्व-स्वरूप में ही होती है इसलिए जो आत्म तृप्त है । संसार में प्रत्येक वस्तु अभाव ग्रस्त है, कोई भी वस्तु नित्य है नहीं जिसकी वह कामना करे, अतः जो बाह्य अनित्य पदार्थ में कभी सन्तुष्ट न होकर स्व-स्वरूप में ही सन्तुष्ट रहता है । इस प्रकार जो अनात्म पदार्थ से संबंध विच्छेद कर चुका है एक मात्र आत्मा ही जिसकी गति मति है वह शरीर निर्वाह प्रारब्धानुसार करता हुआ भी उनमें महत्व बुद्धि न होने के कारण आत्माराम है इस लिए उसके लिए संसार में अन्य कोई कार्य भी करने योग्य विद्यमान नहीं है ।
यही ‘मामेकं शरणं ब्रज’ १८/६६ यानी एक मात्र आत्मा अर्थात सर्वात्मा की शरण ग्रहण करना है क्योंकि यहीं सभी कर्मों की समाप्ति हो जाती है ‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते’ ४/३३ ॥१७॥
संबंध— माना कि ज्ञानी का कोई कर्तव्यकर्म नहीं होता किन्तु शरीर संचालन के लिए तो किसी न किसी की शरण लेगा ही ? नहीं ......
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चदर्थ व्यापाश्रयः ॥३/१८ ॥
शब्दार्थ— ज्ञानी का किसी भी निमित्त से कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं होता और न ही कोई कर्म न करने से और न ही संपूर्ण प्राणियों में किसी स्वार्थ से संबंध ही रखता है ।
तात्पर्यार्थ— ज्ञानी को किसी भी अर्थ के लिए कोई भी कर्म करने से कोई प्रयोजन ही नहीं होता क्योंकि किसी कर्म का बिना प्रयोजन के आरंभ होता नहीं, कर्म के लिए ज्ञानी का प्रयोजन बनता नहीं, वह आत्मरति वाला है, आत्मतृप्त है, कोई कामना है नहीं तो फिर उसे किस अर्थ की आवश्यकता है जो वह कर्म करे ? किन्तु उसे कार्य न करने से भी कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि कार्य प्रकृति का है वह स्वतः हो ही रहा है । वह ब्रह्मज्ञानी है अतः शरीर से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत सभी वाह्य संसाधनों की उपेक्षा करके सर्व कर्म संन्यास पूर्वक मैं ब्रह्म हूँ के भाव में स्थित है । आत्मा का जो जैसा और जितना स्वरूप है, वह वैसा ही, उतना ही नित्य है और रहेगा भी । कोई भी शास्त्रीय कर्म करने से आत्मा की न तो वृद्धि ही होगी और न ही न करने से क्षय ही होगी, तो फिर कर्म करे ही क्यों ? कर्म का विधान ज्ञानी के लिए है ही नहीं वह तो सबका आत्मा हो गया है ‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’ ७/१८ ज्ञानी तो भगवान की भी आत्मा है, भगवान को किसी त्रैतापीय उपद्रव हो नहीं सकते, वह नाशवान शरीर नहीं साक्षात् अमृतात्मा है, आत्मा को किसी के आश्रय की आवश्यकता नहीं होती । वह स्वयं द्वारा रक्षित होती है । अतः आत्मवेत्ता को किसी भी दशा में कर्म का विधान नहीं है, यदि कोई भी कर्म शेष है तो आत्मवेत्ता नहीं है ।
अथवा यहां पर कुछ करना और न करना इन दोनो प्रयोजनों से कोई उसका संबन्ध नहीं बताया गया है । पहले कहा था—“न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽनुते ३/४ एवं कर्मेन्द्रियाणि संयम्य” ३/६ । अर्थात बिना कर्म के नैष्कर्म्य की सिद्धि होती नहीं है, क्योंकि बाहर की कर्मेन्द्रियों के नियमन से आन्तरिक रस के कारण दंभाचार ही सिद्ध होता इसलिये ‛यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुन’ इसलिये मन के द्वारा जिसने ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को अनुशासित करके निष्कामकर्म संपादित लिया है तो वह बाहर भीतर से पूर्णतः तृप्त हो चुका है । वह ही कर्म से नैष्कर्म्य को प्राप्त जो आत्मरति, आत्मतृप्त, आप्तकाम होने के कारण अब उसके लिए कुछ करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है और करने से भी कोई प्रयोजन नहीं होता इसी को “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि” ॥२/४७॥ अर्थात कर्म करने का तो अधिकार है लेकिन कर्मफल पर नहीं । इसलिये कर्मफल की इच्छा मत रख और निष्कामता की भी आसक्ति मत रख यही दृष्टि रखकर यहाँ कर्म न करने से कोई प्रयोजन नहीं होता कहा गया है । ऐसा आत्मतृप्त किसी का किसी भी प्रयोजन से आश्रय भी नहीं लेता, स्वयं ईश्वर का भी आश्रय नहीं लेता क्योंकि उसकी दृष्टि में आत्मा से भिन्न कोई अन्य ईश्वर की सत्ता है ही नहीं । जो मैं हूँ वही ईश्वर है और जो ईश्वर है वही मैं हूँ । इसलिये वह स्व से भिन्न किसका आश्रय ले ? जब अन्य कोई है ही नहीं । शंका हो सकती है कि फिर जीवन निर्वाह कैसे होगा जब वह किसी का आश्रय नहीं लेगा तो, इस पर कहते हैं कि उसे कुछ करने से भी प्रयोजन नहीं और न करने से भी, अतः वह शरीर निर्वाह के निमित्त भी प्रमाद नहीं करता और नियत कर्म के अनुसार वह सर्वकर्मसंन्यासी भिक्षाचरण करता हुआ प्रारब्धानुसार मिलने और न मिलने की भी आशा का परित्याग करके दोनो ही परिस्थितियों में संतुष्ट रहता है । यह इसका भाव है
सारांश— आत्मतृप्त के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता ॥१८॥
संबंध— पूर्व दो श्लोक से ब्रह्मज्ञानी के लिए किञ्चित् मात्र भी कर्म नहीं है, यह बतलाकर अब यह बताते हैं कि ब्रह्मज्ञानी की स्थिति प्राप्त कैसे करें.......
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥३/१९॥
शब्दार्थ— इसलिए फलासक्ति का त्याग करके कर्तव्यकर्म का भलीभांति पलन करो । क्योंकि अनासक्त भाव से कर्म करके पुरुष परम पद को प्राप्त कर लेता है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ तस्मात् से उपदेश प्रारंभ होता है जिसका अर्थ जिस लिए उपरोक्त सिद्ध के लक्षण, कर्म में अनधिकार की बात कही वह एक सिद्ध और आत्मनिष्ठ ब्रह्मज्ञानी का लक्षण है जो जीवन्मुक्त हो चुका है । जीवनमुक्त सर्वत्यागी निर्द्वन्द्व संन्यासी ही होता है और तुम अर्थात मुमुक्षु जो तो हैं, किन्तु अभी आत्मारूढ़ नहीं हुए हैं, वे लोग उस पद को कैसे प्राप्त करें यह बात बताने के लिए ही तस्मात् कहा है । उस तत्त्व की प्राप्ति के लिए आसक्ति का त्यागकर अर्थात पूर्व में कहे हानि-लाभ, जय-पराजय, सिद्धि-असिद्धि आदि की फलाभिसंधि का त्याग करके निरंतर अपने कर्तव्यकर्म का अर्थात स्वधर्म का जैसा शास्त्र कहता है वैसा आचरण करो ।
यहाँ दो भाव स्पष्ट हैं— पहला भाव यह कि मोक्ष की कामना वाला जिसमें ब्रह्मलोक पर्यंत कामनाओं का अभाव है उसका कर्म मात्र में ही अधिकार नहीं है ।
दूसरी बात यह कि “समाचर” अर्थात शास्त्र ने जिस कर्म को जैसी विधि के साथ कहा है नैष्कर्म्य चाहने वाला निष्कामकर्मकर्ता भी विधि का उल्लंघन निष्कामता के अहं में न करके वहाँ वैसा ही करना चाहिए “कार्यम्” कर्म से कर्तव्य कर्म कह रहे हैं, व्यक्ति जहाँ खड़ा होता है वहीं का कर्म उसका कर्तव्य होता है, जबकि अर्जुन युद्धक्षेत्र में खड़ा है अतः उसका कर्तव्य कर्म युद्ध ही है यह बात भी याद दिला रहे हैं । अर्थात परिस्थिति कोई भी हो, मुमुक्षु को कर्तव्य कर्म से मुख नहीं मोड़ना चाहिए, श्रवण, मनन, निदिध्यासन रूप स्वकर्म में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए । अप्रमादी द्वारा फलाभिसंधि से रहित भलीभाँति किया गया कर्तव्यकर्म ही पुरुष को परम पद अर्थात मोक्ष प्राप्त करा देता है । जो उपरोक्त की गति कही गई है वही कर्मयोगी की गति विदेह मुक्ति में है ।
पक्षान्तर में यहाँ कर्मयोगी की स्तुति करते हुए नित्यकर्म को निरंतर करते रहने का आदेश दिया गया है एवं यह भी ध्यान रखना चाहिए कि क्षत्रिय होने के कारण अर्जुन का नियत कर्म प्रजा रक्षा का है अर्थात प्रजा रक्षा के निमित्त किया जाने वाला युद्ध भी नित्यकर्म है, अतः यह आदेश देते हैं कि तू आसक्ति रहित होकर अपना नियत कर्म अर्थात युद्ध कर । आसक्ति रहित कर्म का भलीभांति आचरण करने से से परम पुरुष– यानी आत्मा की प्राप्ति हो जाती है पुरुषः स परः ८/२२, पुरुषः परः १३/२२ ।
यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कर्म द्वारा सीधे मुक्ति का वर्णन कहीं नहीं कहा गया है, कर्म द्वारा चित्तशुद्धि पूर्वक क्रम मुक्ति समझना चाहिए ॥१९॥
संबंध— अर्जुन शंका कर सकता है कि सर्वकर्मसंन्यास पूर्वक जीवन मुक्ति का ही आनन्द क्यों न लूं कर्म पूर्वक विदेह मुक्ति का ही क्यों ? इस पर कहते हैं......
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥३/२०
शब्दार्थ— कर्म के द्वारा ही जनकादि राजा भी सिद्धि को प्राप्त हुये हैं, उनको भलीभांति समझो और फिर जनकल्याण के लिए भी कर्तव्य कर्म करो ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान कहते हैं देखो तुम्हें पूर्व के राजाओं का प्रमाण देता हूँ उस पर विचार करो । तुमसे पहले भी तुम्हारे (क्षत्रिय) पूर्वज जनक, अश्वपति, इक्ष्वाकु सहित बहुत से राजा हुए हैं जो स्वकर्म द्वारा ही परम सिद्धि अर्थात मोक्ष को प्राप्त हुए हैं । अब विचार करो कि अगर उनका चित्त शुद्ध नहीं था, इसीलिये कर्म किया, तो तुम्हें भी चित्तशुद्धि के लिए अपने उन्हीं पूर्वजों को आदर्श मानकर स्वकर्म निष्कामभाव से करना ही चाहिए, दूसरी बात अगर तुम उन्हें ज्ञानी मानते हो और स्वयं को भी, तो अपने उन्हीं पूर्वजों को आदर्श मानकर उन्हीं अपने पूर्वजों की भांति लोकसंग्रह को प्राप्त मनुष्यादि प्राणियों के संरक्षण और वेद मर्यादा को अतिक्रमण से बचाने के लिए भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए । तीसरी बात जनकादि तुम्हारे अपने पूर्वज ज्ञान परिपक्व मोक्ष को प्राप्त होकर भी अपना क्षत्रियोचित कर्म को त्याकर संन्यास तो नहीं ग्रहण किया फिर तुम क्षत्रिय होकर अपने स्वधर्म का त्यागकर भिक्षावृत्ति अर्थात संन्यास सोच भी कैसे सकते हो ?
क्योंकि कर्म से ही जनकादि भलीभाँति सिद्धि को प्राप्त हुए हैं अतः लोकसंग्रह को भलीभाँति देखते हुए भी तू कर्म कर ।
अथवा यहां ‘लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्’ कहा गया है, मतलब संसार की मर्यादा का ध्यान रखकर तू कर्म करने के योग्य है और उदाहरण दिया जनकादयः अर्थात जनक, अश्वपति आदि जो भी इस कोटि के हों समझ लेना चाहिए । जनकादि ने प्रजा संरक्षण किया, क्यों किया ? यदि वे ज्ञानी थे तो लोक मर्यादा को ध्यान में रखते हुए कर्म किया कारण कि जो राजा करता है वही प्रजा करती है । जो तू कहता था कि कुलनाश हो जायेगा तो यह समझ ले कि इस प्रकार तेरा पलायन दूसरों के लिए प्रेरणा बनेगा और सभी अपने अपने कर्म से पलायन करके वर्णसंकर तो उत्पन्न ही कर देंगे, अतः उससे संरक्षण के लिए भी जनकादि की तरह स्वधर्म का पालन करना ही चाहिए अर्थात युद्ध करने के योग्य है, अतः युद्ध करना ही चाहिए ।
भावार्थ— यहां तीन दृष्टिकोण हैं पहला यह कि जनकादि तुम्हारे पूर्वज हैं, पूर्वजों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए, ज्ञानी या अज्ञानी मानते हो तो भी लोकमर्यादा स्थापित करने के लिए अथवा अज्ञानी होने पर चित्तशुद्धि के लिए कर्म करना ही चाहिए ॥२०॥
संबंध— क्योंकि मैंने जो कहा वह ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ, उसका भी कारण है……
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं करुते लोकस्तदनुवर्तते ॥३/२१॥
शब्दार्थ— जो जो श्रेष्ठजन आचरण करते हैं, कनिष्ठ लोग उसी को प्रमाण मानकर वैसा ही अनुसरण करते हैं ।
तात्पर्यार्थ— पहले जनकादि का उदाहरण देकर, अब श्रेष्ठ के अनुसरण की बात करते हैं । संसार में दो ही अनुकरणीय हैं एक तो वीतरागी संन्यासी जिसने संसरासक्ति का त्याग कर परमपद प्राप्त किया या फिर राजा । अतः अर्जुन राजा ही है इसलिए जनकादि का उदाहरण दिया । जनकादि में क्या श्रेष्ठता थी ऐसी आशंका होने पर कहते हैं कि जनकादि लोक विख्यात हैं कि वे शास्त्र ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ थे तभी तो शुकदेव जी जैसे परमहंस भी उपदेश प्राप्त करते हैं । राजा अश्वपति की ऋषिगण शिष्यता स्वीकार करते हैं, शील भी अच्छा अर्थात विनम्रता भी थी, कुल भी श्रेष्ठ था । सदाचारी और कर्मनिष्ठ भी थे, दयालुता के तो श्रोत ही थे, तभी तो एक के घर सीता तो दूसरे के घर सावित्री जैसी पतिव्रता पुत्रियों की प्राप्ति हुई उनकी लोक मान्यता भी बढ़चढ़कर थी । अतः श्रेष्ठ का अर्थ हुआ जो लोगों (समाज) द्वारा सम्माननीय, सदाचारी, विनम्र, दयालु, कुलवान, वेद-शास्त्र का ज्ञाता उपदेश एवं ब्रह्मनिष्ठ को ही यहाँ श्रेष्ठ कहा गया है, जो अपने कर्तव्य पालन में कभी प्रमाद न करते हों, ऐसे श्रेष्ठजनों का अविद्याग्रस्त सामान्यजन मूढ़ या अज्ञानीजन आचरण करते हैं ।
अनुवर्तन का मतलब श्रेष्ठजनों द्वारा किया गया आचरण क्रमशः पीढी दर पीढ़ी परंपरा ही बन जाती है । उनका भले कुछ न हो लेकिन समाज में उसका जो प्रभाव पड़ता है वह प्रभाव सामाजिक मर्यादाओं की स्थापना या नाश करता है इसलिए ज्ञानी को भी आचरण सावधानी पूर्वक लोकमर्यादा को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए ॥२१॥
संबंध— इसलिये भी लोकसंग्रह अर्थात लोकमर्यादा को ध्यान में रखकर कर्म करो क्योंकि……
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषुलोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥३/२२॥
शब्दार्थ— हे पार्थ ! तीनो लोकों में मुझे न तो कुछ प्राप्त करना शेष है और न ही कुछ अप्राप्त है तो भी कर्तव्य पालन करता हूँ ।
तात्पर्यार्थ— अर्जुन भी आजकल की तरह कह सकता था कि ये बात तो पुरानी हो गई है, आज तो मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता कि ज्ञानी भी हो और कर्म भी करे, अर्जुन की इस आशंका के निवारणार्थ श्रीभगवान कहते हैं…, दूर क्यों मुझे ही देखो, मैं तो ईश्वरों का भी ईश्वर षडैश्वर्य संपन्न हूँ । मेरे पास कौन सी वस्तु अप्राप्त है जिसके लिए कर्म करूं ? मेरा कोई भी कर्तव्य कर्म शेष न होने पर भी कर्तव्यकर्म करता हूँ, मान-अपमान भी सहकर करता हूँ वैसे ही तुम भी करो ॥२२॥
संबंध— तो जब आपको कुछ भी प्राप्तव्य शेष नहीं है तो क्यों करते हो ? इसका उत्तर कुछ इसप्रकार देते हैं……
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥३/२३॥
तात्पर्यार्थ— कर्म इसलिये करता हूँ कि लोग मेरे प्रमाद को ही प्रमाण मानकर प्रमादी हो जायेंगे । यथा राजा तथा प्रजा अर्थात जब राजा अर्थात श्रेष्ठजन ही कर्तव्य से पलायन करने वाले होंगे तो भी उनका ही आचरण प्रजा करेगी अर्थात सभी पलायनवादी हो जायेगी । इसलिये मुझे भी देखकर कर्तव्य से पलायन मत करो ॥२३॥
उत्सीदेयुरिमेलोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता च स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥३/२४॥
शब्दार्थ— यदि मैं कर्म न करूँ तो लोक अर्थात प्राणियों को नष्ट भ्रष्ट करनेवाला होऊंगा इस प्रजा का वर्णसंकर करनेवाला भी होऊंगा ।
तात्पर्यार्थ— मेरे शास्त्रीय कर्म न करने से प्रमाद बढ़ेगा तो कर्म प्रकृति का स्वभाव है वह कुछ न कुछ तो करवायेगी ही सदाचार आदि शास्त्रीय कर्म न होकर अशास्त्रीय और अमर्यादित कर्म होंगे । इस प्रकार मेरे द्वारा लोकमर्यादा को ध्यान में न रखते हुए कर्तव्य से पलायन करने के कारण सारी मर्यादाएं छिन्न भिन्न करने वाला होऊंगा । उन मर्यादाओं के न करने से सभी स्त्री-पुरुष भी दुराचारी हो जायेंगे । जिससे अनाचार बढ़ेगा, अनाचार का फल होगा वर्णसंकर । अर्जुन तुमने प्रथम अध्याय में कहा था न… कि युद्ध के विनाश से स्त्रियां स्वच्छंद हो जायेंगी जिससे वर्णसंकर होगा, प्रजा का नाश करने वाला होऊंगा, कुल का नाश करने वाला होऊंगा इसलिये यह सब पाप मुझे ही लगेगा, तुम्हीं बताओ कि अगर धृतराष्ट्र ने कर्तव्य का पालन किया होता तो तुम्हारा राज्य पुत्रमोह में न पड़कर दे देते । दुर्योधन अगर प्रजा और लोक मर्यादा का पालन करता तो भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण न होता…, अब सोचो जिस राज्य का राजा ही इतना अमर्यादित होगा तो गुप्त रूप से प्रजा भी क्या कर सकती है और वह राजा प्रजा को कौन सा न्याय दे सकता है ? इस प्रकार कर्तव्य पालन न करने से ही प्रजा का वर्णसंकर और नाश होता युद्ध से नहीं, समझे पण्डित जी......?
अर्थात अर्जुन ने आशंका की थी कि युद्ध के विनाश से सभी स्वेच्छाचारी हो जायेंगे, स्त्रियां दूषित होकर वर्णसंकर संतान को उत्पन्न करने वाली होंगी इत्यादि उसी का उत्तर यहाँ भगवान दे रहे हैं कि तू युद्ध नहीं करेगा तो क्या वर्णसंकर उत्पन्न नहीं होंगे ? क्योंकि वर्णसंकर उत्पन्न होता है कर्तव्य का पालन न करने से, स्वेच्छाचार से । इसलिए यदि कर्तव्य पालन समर्थ होकर भी जो नहीं करता है तो समाज की मर्यादाओं का नाश करने वाला भी वही होता है इसलिये मैं स्वयं भलीभाँति बिना किसी प्रमाद के राग रहित होकर कर्म करता अतः तुझे भी करना ही चाहिए । यह भाव है ॥२४॥
संबंध— तो फिर अज्ञानी की तरह कार्य क्यों किया जाये, ज्ञानी की तरह क्यों नहीं ? इस पर कहते हैं.....
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥३/२५॥
शब्दार्थ— जैसे अज्ञानी आसक्त होकर कर्म करते हैं वैसे ही लोकसंग्रह की इच्छा रखनेवाले ज्ञानी को भी करना चाहिए ।
तात्पर्यार्थ— अगर हम ज्ञानी की तरह कार्य करेंगे तो ज्ञानी की दृष्टि में सारा दृश्य प्रपंच मिथ्या ही होता है तो कार्य भी मिथ्या ही होगा, फिर कर्म करेगा कैसे ? सामने दिखने वाला जल- जल न होकर सूर्य की किरणों का रेत में परावर्तन अर्थात मृगमरीचिका है, इस बात का जिसे ज्ञान होगा वह वहाँ जल के लिए व्यर्थ क्यों दौड़ेगा ? इसी प्रकार ज्ञानी की दृष्टि में आत्मा से भिन्न कुछ है ही नहीं तो किसे प्रणाम करे ? किसकी पूजा करे कौन सा यज्ञ, दान, तप, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य, वेदाध्यन आदि करे ? आत्मा तो निर्मल निर्विकार है, वह न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है तो रूप का विकार लज्जा कहाँ से लाये ? तो वस्त्रादि क्यों पहने ? वह तो जिस समय वस्त्र पहने है और जिस समय नहीं पहने है वह हर समय दिगंबर ही है । अतः ज्ञानी बनकर तो कार्य संभव ही नहीं है । अतः लोक हितार्थ अज्ञानी की तरह पूरे विधि विधान के सहित आसक्ति रहित होकर कर्म करे । इसी बात को पहले “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर” ३/१९ कहा था ताकि लोकसंग्रह अर्थात लोकमर्यादा का अतिक्रमण न हो ।
विश्लेषण— आजकल सबसे बड़ी यही समस्या है कि अपने अपने ज्ञान के अहंकार में कोई तो मूर्ति पूजा की निंदा में लगा हुआ है तो कोई ईश्वर जीव के भेद प्रतिपादन में ही सारी शक्ति लगा रहा है । चारों ओर मात्र श्रुतिविरोध में ही तत्पर हैं । वंध्यापुत्रवत् ज्ञान आज संसार की मर्यादाओं का नाश कर रहा है । हमे नहीं लगाता कि ये कोई ज्ञानी हो भी सकते हैं क्योंकि परमात्मा के सर्वांग भाव में उसे सगुण या निर्गुण दोनो से परे है वह न सत है और न असत है और वह सत भी है और असत भी है न सत्तन्नासदुच्चयते १३/१२, सदसच्चाहम् ९/१९ । परमात्मा का अनिर्वचनीय स्वरूप है । अतः यह ध्यान रखें ज्ञानी आप हैं समाज नहीं । आपको जब कर्म में आसक्ति नहीं है तो कर्म के त्याग में आसक्ति क्यों है ? जब वह साकार और निराकार दोनो ही है तो फिर निराकार का ऐसा प्रतिपादन किस लिए कि समाज ही प्रमादी हो जाये ? सच में यदि गीता को आप प्रभु का संदेश मानते हैं तो गीता कहती है कर्म के न करने में भी आसक्ति मत रखो ‘सङ्गोऽस्त्वकर्मणि’ २/४७ इस लिये अज्ञानी की शिक्षा के लिए लोकमर्यादा को बनाए रखने के लिए अज्ञानियों के समान नित्य नैमित्तिक यज्ञ, मूर्ति पूजा से लेकर सभी कर्मों का विधिवत पालन करो इससे तुम्हारे निराकार स्वरूप का कुछ बिगड़ेगा नहीं और समाज का कल्याण हो जायेगा ये अलग से । उन शास्त्रीय कर्मों में लगकर और आपके उपदेश से चित्तशुद्धि होकर उनका जीवन सुधर जायेगा । अतः जब तक रसना में रस लेने की इच्छा है, आंखों में रूप देखने की इच्छा है, जब तक कान आपके अनुकूल शब्द पसंद करते हैं । मान अपमान का स्पर्श अनुभव होता तब तक लोकमर्यादा के लिए कर्म करो ॥२५॥
संबंध— ऐसा इसलिए आवश्यक है कि……
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥३/२६॥
शब्दार्थ— कर्म में आसक्ति रखने वाले अज्ञानी के द्वारा किये जाने वाले शास्त्रीय कर्मों में भेदबुद्धि उत्पन्न न करे, बल्कि विद्वान स्वयं भलीभाँति सभी कर्मों को करता हुआ उन अज्ञानियों से भी करवाये ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान पूर्व श्लोक में कर्मासक्त होकर कर्म करने वाले अज्ञानी की तरह ज्ञानी को भी कर्म करने की आज्ञा देकर अब यहाँ कहते हैं कि जो यज्ञ, दान, तप, मूर्ति पूजा आदि में आसक्त होकर वह वह कर्म करते हैं उनकी बुद्धि में भेद पैदा न करे अर्थात इस मूर्ति पूजा, यज्ञादि में क्या रखा है ? सब ब्रह्म है का उपदेश न करे, क्योंकि कर्म न करने से करना ही अच्छा है । अतः आत्मनिष्ठा में दृढ़ होकर स्वयं भी अज्ञानी की भांति भली प्रकार से उन सभी कर्मों को करे और दूसरों से भी करावे, जिससे लोकमर्यादा का उच्छेद न हो ॥२६॥
संबंध— ज्ञानी-अज्ञानी में अन्तर.....
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारः विमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥३/२७॥
शब्दार्थ— संपूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं किन्तु अज्ञानी अहंकार के अधीन होकर मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है ।
तात्पर्यार्थ— ज्ञानी जानता है कि संपूर्ण दृश्यमान जगत प्रकृति अर्थात माया के आधीन है और सारे कार्य उसके गुणों द्वारा ही हो रहे हैं क्योंकि शरीर, इन्द्रियां, नदियाँ पहाड़ सभी तो उसका कार्य है अतः वे स्वाभाविक ही क्रियमाण हैं, मैं कुछ नहीं करता किन्तु अज्ञानी कर्मासक्त अहंकार के आधीन हुआ मैंने यह पुण्य किया, मैने यह पाप किया आदि । मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ अध्याय १६ के अनुसार ।
अर्थात मूल प्रकृति के सात्विक, राजस, तामस ये तीन गुण होते हैं । उनमें हलचल उत्पन्न होने पर गुणों में विषमता होकर वही गुण स्वयं ही तामस भाग से शरीर, राजस भाग से मन सहित इद्रियां और सात्विक अंश से बुद्धि बन जाती है । वही इन्द्रिय आदि के विषय भी बन जाती है । तो इस प्रकार अनेक रूपों में दिखने और अनुभव में आने वाली प्रकृति ही है । वही सब कर रही है, किन्तु प्रकृति संगति के कारण उसके गुणों से मोहित हुआ मनुष्य सीमित अहंता में बंध जाता है जिसके कारण स्वयं को ही कार्य करण संघात समझ लेता है और यही मैं हूँ, मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही सुख दुःख आदि का भोक्ता हूँ ‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य…’१३/२१ । यहां पर सीमित अहंता को ही अहंकार कहा गया है । अर्थात सभी अनर्थों की जड़ सीमित यानी परिच्छिन्न अहंता ही है ऐसा समझाया गया है ॥२७॥
संबंध— आगे कहते हैं……
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥३/२८॥
शब्दार्थ— तत्त्ववित् गुण कर्म के विभाग को भलीभांति जानकर गुण ही गुणों में अपना कार्य कर रहे हैं ऐसा जानता है ।
तात्पर्यार्थ— अध्याय दो में तत्त्वदर्शिभिः २/१६ आया है उसी की व्याख्या यहाँ समझना चाहिए क्योंकि वहाँ सत् का भाव और असत् का अभाव इस दो प्रकार से तत्त्वदर्शी जानता है उनको दो प्रकार से कैसे जानता है ? यहाँ पर बताया गया है । तत्त्व से आत्म अनात्मा का विवेक करने वाला देखता है कि यह शरीर प्रकृति का स्थूल कार्य है । इसमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध ये पञ्तन्मात्राएं ही प्रकृति के गुण हैं और जिनसे पञ्चतन्मात्राएं ग्रहण की जाती हैं वही ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । एवंं चलना, बोलना, सुनना, स्पर्श करना, मल-मूत्र त्याग करना ये पांच कर्म जिनसे ग्रहण किये जाते हैं उन्हें कर्मेन्द्रियाँ कहते हैं । इसी प्रकार शरीर रूप कार्य भी भी प्रकृति, गुण भी प्रकृति ये सभी गुण और कार्य मिलकर ही कार्य कर रहे हैं अर्थात प्रकृति के जो सुनना आदि गुण, क्रिया आदि गुण, कार्य रूप गुण, गुण ही गुणों में कार्य कर रहे हैं मैं कुछ नहीं करता हूँ । इस प्रकार विभाग पूर्वक अनात्मा का त्याग करके स्वयं को अकर्ता आत्मा जानता है ।
अर्थात ज्ञानी अज्ञानी में यही अन्तर है अज्ञानी कर्ताहमिति मन्यते अर्थात मैं ही कर्ता भोक्ता आदि हूँ और ज्ञानी उनमें आसक्त ही नहीं होता उसकी मान्यता है ‘नैव किञ्छित्करोमीति’ ५/८ अर्थात तत्त्ववेत्ता का यह निश्चय होता है कि मैं कुछ करता ही नहीं क्योंकि प्रकृतिजन्य गुण ही गुणों में व्यवहार करते हैं मैं नहीं ‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते’ ५/९ ऐसा आगे कहेंगे । गुण कर्म का विभाग भी विस्तृत रूप से अध्याय १४ में कहा जायेगा ।
विशेष— यहाँ यह समझना चाहिए कि शरीर से लेकर बुद्धि पर्यंत सभी प्रकृति के कार्य हैं वे सभी अनात्म पदार्थ हैं ज्ञानी अनात्म पदार्थ से संबंध विच्छेद करके एकमात्र आत्म पदार्थ में ही स्थित होता है । इसी कारण उसे कुछ भी करना और न करना, पाने योग्य और त्यागने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता ‘तस्य कार्यं न विद्यते’ ३/१७ ॥३/२८॥
संबंध— पूर्व के दो श्लोकों में पहले ज्ञानी और फिर अज्ञानी के लक्षण बताकर पुनः ज्ञानी के लिए अज्ञानी को उसकी निष्ठा से विचलित न करने का आदेश देते हैं……
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥३/२९॥
शब्दार्थ— अज्ञानी प्रकृति के गुणों से सम्मोहित हुआ गुण और कर्म में ही आसक्त रहता है, उन ठीक से न जानने वालों को ठीक से जानने वाला विचलित न करे ।
तात्पर्यार्थ— गुण कर्म के विभाग को ठीक से न जानने के कारण जो उससे भिन्न अकर्ता आत्मा को न जानने वाला अज्ञानी प्रकृति के गुणों में गुण दृष्टि के कारण भोग प्रधान होने से सदैव किस कर्म को करने से क्या फल मिलेगा का गुण देखकर ही मैंने यह किया, अभी यह कर रहा हूँ और आगे अभी और ऐसा करूंगा । इस प्रकार जिनका चित्त सदैव मोहित रक्षता है ऐसे अज्ञानीजनों को ज्ञानी जिसने प्रकृति के विभाग पूर्वक स्वयं को जान लिया है वह स्वयं को तो अन्दर से ऐसे कार्यों से अलग कर ले किन्तु बाहर से वह स्वयं करता हुआ दूसरों को उसकी फलश्रुति अर्थात उस कर्म की स्तुति करके उनकी श्रद्धा को और बढ़ाये, उन्हें विचलित न करे । जिससे लोकमर्यादा की स्थापना हो और जैसा कि पहले कहा कि कुलघात, लोकघात, वर्णसंकर भी नहीं होगा । ऐसा तात्पर्य है ।
भावार्थ— प्रकृतिजन्य त्रिगुणात्मक कर्म जिनसे पारलौकिक स्वर्गादि की प्राप्ति, लोक में सम्मान धन आदि की प्राप्ति में आसक्त रहने वाले मनुष्यों को तत्त्ववेत्ता विचलित न करे बल्कि पूर्व मे कहे के अनुसार स्वयं करे और कराते हुए उनका मार्ग दर्शन करे ॥२९॥
संबंध— इस प्रकार ज्ञान और अज्ञान दोनो दृष्टि से कर्म करना चाहिए । अज्ञानी में भोग दृष्टि होने से सब कुछ स्वयं और अपने लिए करता है और ज्ञानी ‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ ३/२८ के अनुसार कर्ता होकर भी अकर्ता ही होता है तथापि ज्ञानी भी जिसे परोक्ष ज्ञान तो है लेकिन अपरोक्ष नहीं है किन्तु अपरोक्ष करना चाहता है ऐसा मुमुक्षु अपने लिए तो कुछ करता नहीं, इसलिये कर्म तो करे लेकिन मुझे समर्पित कर दे.......
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निममो भूत्वा युद्ध्यस्व विगतज्वरः ॥३/३०॥
शब्दार्थ— अध्यात्म बुद्धि से सभी कर्मों को सम्यक् प्रकार से मुझमें त्यागकर आशा ममता रहित होकर हर प्रकार के शोक का त्याग करके युद्ध करो ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ भगवान ने अर्जुन को अध्यात्म बुद्धि से मुझमें सभी कर्मों का भलीभांति त्याग करने की बात कही है । इस अध्यात्म का विस्तार ८वें अध्याय में अर्जुन के पूछने पर उत्तर देंगे । अध्यात्म दृष्टि क्यों कहा ? इसलिये कहा कि पहले ज्ञानी का लक्षण, प्रकृति के गुण कर्म विभाग एवं गुण ही गुणों में क्रियमाण हैं और स्वयं आत्मा अकर्ता है ऐसा ३/२८ में बता चुके हैं । अध्यात्म क्या है यह भी ८वें अध्याय में ही बताऊंगा, किन्तु इस अध्यात्म का आश्रय लेकर सभी कर्म मुझमें भलीभांति त्यागकर, अर्थात पहले यह समझ ले कि मैं कौन हूँ ? “वासुदेवः सर्वम् ७/१९, ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम् ७/१८, अहमात्मा १०/२०, क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” १३/२ सहित और भी बहुत कुछ आगे बताऊंगा । इसलिये सभी कर्म मुझमें अर्पित करने का मतलब है कि तू अपने को मुझसे भिन्न मत देख, बल्कि ऐसे देख कि जो मैं वासुदेव ही अर्जुन के रूप में हूँ– ‘पाणडवानां धनञ्जयः’ १०/३७ और युद्ध को तत्पर हूँ और वासुदेव के रूप में मैं अर्जुन ही रथ चला रहा हूँ । इस प्रकार से अभिन्न भाव में स्थित होकर और स्वयं को अकर्ता मानकर युद्ध में विजय की आशा और पराजय की निराशा दोनो का परित्याग करके ममता का भी त्याग कर दे कि भीष्म मरेंगे या द्रोण, कृप आदि, क्योंकि जब तू अकर्ता है तब तू किसे और कैसे मारेगा ? जब प्रकृति ही अपने गुणों में क्रियमाण है तो कौन मरेगा ? यह मरने जीने का कार्य अकर्ता अविनाशी आत्मा का नहीं है । ऐसी अध्यात्म दृष्टि से शोक संताप से रहित होकर युद्ध कर ।
अथवा— यहां मूल में अध्यात्मचेतसा आया है अध्यात्म का अर्थ आत्मा और अनात्मा का जिन साधनों से विवेक हो जाये वे साधन, उस विवेक का आत्मभाव में स्थिर हो जाना यही अध्यात्मचेतसा है । जैसा कि श्लोक २८ में गुणकर्म विभाग पूर्वक वह आत्मभाव में स्थित होता । उसी को यहाँ अध्यात्मचेतसा से कहते हैं कि उसी आत्मभाव में स्थित विवेक के द्वारा सभी कर्मों को मुझ सच्चिदानंद में अर्पित करके― यहां आत्मभाव में स्थिरता और मुझ सच्चिदानन्द में ऐसा जो कहा गया है वह आत्मा और परमात्मा की एकता सूचित करने के लिए कहा गया है जैसा कि ‘युक्त आसीत मत्परः’ २/६१ कहा था । व्याख्या वहीं देखना चाहिए । यहां आत्मा परमात्मा में अभिन्नता का प्रतिपादन करते हुए यह कहा गया है कि सब कुछ सच्चिदानन्द स्वरूप है उससे भिन्न कुछ नहीं है । न तू मुझसे भिन्न न मैं तुझसे , जो तू है वह मैं हूँ और जो मैं हूँ वह तू है ऐसे दृढ भाव को स्थिर करके सभी अनात्म पदार्थों से होने वाले कर्म प्रकृति में हो रहे हैं और प्रकृति का अधिष्ठान अर्थात प्रकृति को भी सत्ता देने वाला मैं हूँ अतः सभी कर्म मेरी सत्ता में मुझसे ही हो रहे हैं ‘मत्तः सर्वं प्रवर्तते’ १०/८ ऐसा मानकर शोक संताप त्यागकर युद्ध कर ।
भावार्थ— अध्यात्म दृष्टि से मुझमें कहकर आत्मैक्य बोध कराया गया है अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ ऐसी स्थिति को स्थिर करके युद्ध का आदेश दे रहे हैं । २/३१ में जो स्वधर्म से विचलित न होने की बात कही थी उसी बात की यहाँ पुनः पुष्टि कर दी ॥३०॥
संबंध— इस प्रकार जो श्रीभगवान की आज्ञा का पालन करता है तो……
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥३/३१॥
शब्दार्थ— जो मुझमें दोष नहीं देखता वह मेरे इस उपरोक्त मत का नित्य अनुष्ठान करेगा तो वह भी कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने “ये मे मतमिदं” कहकर उस समय भी अनेक मतान्तरों की पुष्टि की है इसीलिये यह मेरा मत है कहा है इन मतान्तरों का वर्णन अध्याय ४, ८, १३, एवं १८ आदि जगहों पर भी आयेगा अतः ये चर्चा वहीं पर होगी यहाँ पर इतना ही कि भगवान की आज्ञा का दोष दृष्टि से रहित होकर पालन करने वाला भी कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा । इतना ही श्री भगवान का दावा है ।
यहां कर्मों से मुक्त होने का मतलब है वे नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त करके क्रम मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं । यही बात गीता के उपसंहार में भी कहेंगे― “इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति” १८/६७ इस प्रकार भगवान कहते हैं कि ये मेरा अपना मत है । अतः जो साधन चतुष्टय संपन्न नहीं हैं उन्हें इस प्रकार से कर्तव्य कर्म करना ही चाहिए ॥३१॥
संबंध— किन्तु जो जो दोष देखने वाला है वह……
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढ़ांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥३/३२॥
शब्दार्थ— जो मेरे मत का अनुष्ठान न करने और दोष देखने वाला है वह सभी प्रकार के ज्ञान से मोहित हुआ अज्ञानी है और उसे नष्ट हुआ ही समझो ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान के मत का अनुष्ठान का फल बताकर अब न करने वाले के लिए कहते हैं जो सभी प्रकार के ज्ञान से विमूढ़ अर्थात भोग्य की फलश्रुति के अज्ञान से मोहित होकर भी जो अपने को ज्ञानी मानकर आगे कहे जाने वाले ‘रागद्वेषौ परिपन्थिनौ’ ३/३४ अविवेकी राग द्वेष के कारण व्यर्थ की आशाओं से बंधे हुए हैं वे मिथ्याचारी हैं । ‘मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः’ ९/१२ एवं अ.१६ में दंड विधान व्याख्या वहीं पर की जायेगी । ऐसे लोग ३/३० का अनुसरण नहीं करते तो तुम उनको नष्ट हुआ ही समझो ।
अथवा प्रकृति और आत्मा जिसे अध्याय १३ में प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) कहा गया है उसको गुणकर्मविभाग सहित जानकर जो मनुष्य उसका अनुष्ठान नहीं करता वह सभी प्रकार के ज्ञान का मतलब भ्रामक काम्यकर्म संबंधित बहुत प्रकार के सांसारिक ज्ञान द्वारा भ्रमित होकर मूढता को प्राप्त होने के कारण जिनकी बुद्धि नष्ट हो गई है ऐसे बुद्धिहीनो को नष्ट हुआ जान ॥३२॥
संबंध— ये अज्ञानी अपकी बात क्यों नहीं मानते ? इस पर कहते हैं.....
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥३/३३॥
शब्दार्थ— सभी प्राणी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करते हैं ज्ञानी भी, उन पर निग्रह क्या करेगा ?
तात्पर्यार्थ— मनुष्यों के अब तक कितने जन्म हुए हैं ? उन उन जन्मों में क्या क्या किया ? कहना कठिन है तथापि यह सर्वमान्य तथ्य है कि मनुष्य का अपना कोई तो प्रारब्ध है जिससे एक जन्मते ही राजा और दूसरा भिखारी होता है । यह अन्तर किसने बनाया ? इस कारण से निश्चित ही पूर्व प्रारब्ध मानना पड़ेगा । वह जो जन्म है वही जन्मकर्म और स्वभाव का हेतु है । ६/४०-४१ में श्रीभगवान ने योगभ्रष्ट को स्वर्गादि लोकों में भ्रमण करते हुए पुनः किसी श्रीमान्, योगी के घर जन्म लेकर पूर्वकृत कर्मों के प्रभाव से परवश अर्थात बलात् योग की ओर खींच लिया जाता है “पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्मवशोऽपि सः” ६/४४ यही प्रकृति है इसी प्रकृति के अनुसार ही ज्ञानी बच्चों के साथ बच्चों जैसा और ज्ञानी के साथ ज्ञानी जैसा आचरण करता है उस पर मेरा भी कोई नियंत्रण नहीं होता ।
प्रत्यक्ष में युधिष्ठिर, भीष्म, द्रोण, कृप आदि ज्ञानियों अर्थात धर्म मर्मज्ञों को ही देख लो कैसे प्रकृति अर्थात माया अथवा प्रारब्धाधीन होकर कठपुतली की भांति नृत्य कर रहे हैं, मैं स्वयं भी चाहकर भी नियंत्रण नहीं कर सका । यह प्रकृति ही है जो तुम भी विचलित हो रहे हो । इसलिए हमने पहले ही कहा था “कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ३/५, गुणैः कर्माणि सर्वशः ३/२७, गुणा गुणेषु वर्तन्ते” ३/२८ और आगे भी बताऊंगा । जैसे ज्ञानी की भी कर्माधीन प्रकृति के अनुसार ही जन्म होता है और परवश योग की ओर खिंच जाता है, वैसे ही अज्ञानी कर्माधीन अनन्त जन्मों के परिणामस्वरूप जन्म होकर राग द्वेष के वशीभूत व्यवहार करता है, अतः उस पर मेरा क्षणिक उपदेश क्या करेगा ? अर्थात जैसे ज्ञानी पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं वैसे ही अज्ञानी पर भी मेरा कोई नियंत्रण नहीं है ।
अध्याय १८ में सभी प्राणियों का पूर्व जन्म के गुण कर्मों के आधार पर जन्म लेना बताया है, अतः उसी के अनुसार इस शरीर में स्थित ज्ञानी भी व्यवहार करता है । दुर्वसा जी क्रोधी हैं, संवर्तक जी धूलधूसरित रहते हैं, दत्तात्रेय जी छद्मवेशी हैं, बृहस्पति देवगुरु तो शुक्राचार्य जी असुर गुरु इत्यादि । ज्ञान में किसी में भी कोई कमी नहीं तथापि प्रकृति भिन्न है, इसी प्रकार सभी प्राणी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य करते हैं ऐसे प्रकृति के आधीन लोगों पर अनुशासन क्या करेगा ? अर्थात उनके लिए शम दमादि से भी कुछ होने वाला नहीं और न ही उसके लिए कोई उपदेश ही अनुशासित कर सकता है ॥३३॥
संबंध— पूर्व कथन को और अधिक स्पष्ट करते हुए ज्ञानी को सावधान करते हैैं……
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्नवशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥३/३४॥
शब्दार्थ— इन्द्रियां राग द्वेष के कारण ही अपने अपने विषयों में व्यवस्थित हैं इसलिए उन दोनो के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनो ही मुमुक्षु के मार्ग के विरोधी अर्थात शत्रु हैं ।
तात्पर्यार्थ— आशंका होती है कि जब गुण ही गुणों में सारा कार्य कर रहे हैं तो फिर प्रकृति को जो करवाना है करवा ही लेगी ! इस पर कहते हैं कि मैंने पहले ही कहा था कि संपूर्ण कामनाओं का त्याग करके निर्मम निरहङ्कार होकर विषयों में विचरण करे २/७१ और वही यहाँ कह रहा हूँ, क्योंकि प्रकृति का कार्य प्रकृति करेगी ही यह बात बिलकुल ठीक है लेकिन इनमें एक स्वतन्त्रता भी प्राप्त है, वह है उन उन विषयों के प्रति आकर्षित होकर आसक्त होना या उदासीन होकर अनासक्त होना । अतः प्रकृति के कार्य प्रकृति को करने दो, तुम तो बस ‘सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ २/३८ इस प्रकार उनके आधीन मत होवो, क्योंकि तुम श्रेय चाहने वाले हो, ये दोनो राग और द्वेष हमारे ज्ञानमार्ग के वैरी हैं, लुटेरे हैं । हमारी श्रवण, मनन, निदिध्यासन, इन्द्रिय निग्रह आदि संपत्ति को लूट लेंगे अतः २/३० कहे अनुसार मुझमें सभी कर्म समर्पित करके निश्चिंत होकर अपना कर्तव्य पालन करो ।
पूर्व श्लोक में बताया गया था कि ज्ञानी भी पूर्व प्रारब्ध से उत्पन्न स्वभाव के अनुसार ही आचरण करते हैं तो वैसे ही अज्ञानी आचरण करते हैं उन पर अनुशासन कुछ नहीं कर सकता है तो उस पर शंका हो जाती है कि यदि ऐसा है तो फिर आपका उपदेश तो व्यर्थ हो जायेगा क्योंकि सब प्रकृति के अनुसार ही करते हैं, इसका उत्तर यहां दिया जा रहा है– यद्यपि स्वभाव तो पूर्व कृत कर्मों के अनुसार होता ही है जैसे बीज का कार्य है अंकुरित होना, किन्तु जब तक उपजाऊ भूमि न मिले खाद, पानी न मिले तब तक अंकुरित नहीं हो सकता वह यूं ही बरसात आदि में नष्ट हो जायेगा, अथवा अंकुरित हो भी गया तो उसका संरक्षण न करने से भी पशुओं आदि के माध्यम से, खाद, पानी न देने से भी सूख कर नष्ट हो जायेगा । इसी प्रकार हमारी प्रत्येक चेष्टा राग द्वेष को ही लेकर होती है अगर हमारा किसी चीज से लगाव न हो तो उसके दूसरे के पास होने में द्वेष भी नहीं हो सकता है । इतनी तो हमारी स्वतंत्रता है ही, अतः राग द्वेष से व्यस्थित अर्थात चंचल इन्द्रियां उनके शब्दादि विषयों में स्थित हैं । उन दोनो के वश में मनुष्य को नहीं होना चाहिए क्योंकि यही राग द्वेष ही मनुष्य के पतन के मार्ग हैं ॥३४॥
संबंध— जब प्रकृति द्वारा ही सभी कृत्य परवश हो रहे हैं तो जिससे स्वाभाविक कर्म हो रहे हैं उन्हीं स्वाभाविक कर्मों का अनुष्ठान करना ही स्वधर्म है । अतः ......
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेेयः परधर्मो भयावहः ॥३/३५
शब्दार्थ— दूसरे के गुणवान धर्म की अपेक्षा अपना गुण रहित धर्म ही श्रेष्ठ है । स्वधर्म में मरना भी श्रेष्ठ है, दूसरे का धर्म भयकारी होता है ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने पीछे दो बातें बतायी एक तो यह कि ‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ और दूसरी बात ‘रागद्वेषौ व्यवस्थितौ’ अर्थात इन प्राकृतिक गुणों की व्यवस्था राग द्वेष में है अतः उनके आधीन मत होवो । उनके आधीन न होकर जो शेष कर्म बचता है वही स्वधर्म है, क्योंकि स्वधर्म स्वाभाविक है, तभी तो इस युद्धभूमि में खिंचकर चला आया है । अतः अपने स्वधर्म का भलीभांति पालन कर क्योंकि दूसरे का धर्म भय देने वाला होता है । आगे भगवान कहेंगे— स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवः १८/४६ हमें अधिक अन्दर तक नहीं जाना स्वयं ही वर्ण, आश्रम, जाति, धर्म, देश, काल इत्यादि जहाँ खड़े हैं उसके अनुसार विचार करें ।
मैं अत्याश्रमी अर्थात संन्यासी हूँ, वही मेरा स्वधर्म है, उसी पर विचार करना मेरा स्वधर्म है । स्वधर्म अर्थात जो स्वयं का जो स्वरूपभूत व्यापक आत्मा है उसी का चिन्तन करना उसी में रमण करना, उसी में आनन्दित होना, मुमुक्षु यति को प्रेसमंत्र, महावाक्यादि विरजा होम के बाद जो श्रुति वाक्य प्राप्त होता है और ब्रह्मचारी को जो महावाक्य एवं आराधना हेतु जो गुरु प्रदत्त मंत्र मिला है उसी में निरंतर रमण करना ही स्वधर्म है । शरीर के सहित संसार में आसक्त होना ही पर धर्म है । आज हमारे देश में तथाकथित संन्यासियों की ही दयनीय दशा है । इस विषय पर विचार करने का मेरा अधिकार नहीं है । विज्ञजन स्वतः स्वधर्म और परधर्म का निर्णय कर लें । जिसका स्वयं का पद अक्षुण्ण है, अच्युत है जिसके सामने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित संसार आकर चरणों में सिर डाल देते हैं वही तथाकथित संन्यास को कलंकित करने और भोग लिप्सा वाले राजनैतिक वेश्यावृत्ति का आश्रय लेकर मंत्री, प्रधानमंत्री कुछ नहीं तो गांव का सरपंच या उसका चमचा ही सही....बनने का सपना देख रहे हैं । मिला हुआ पद कब चला जायेगा, कब मिथ्या आरोपों में जेल चला जायेगा पता नहीं । कुछ नहीं तो गोशाला जो संन्यासी विरजा भी कर चुके हैं खोल लो और एक महात्मा की तो सेवा कर नहीं पाते, लेकिन गायों के लिए कटोरा लेकर भीख मांगने में लगे रहकर परेशान बने रहो । ये सब पर धर्म होने के कारण कारण ही भयभीत और अशान्ति का कारण है ।
अरे ! घर छोड़ा था भजन करने के लिए या गोशाला, राजनीति के लिए ? घर से निकली अतृप्ति आत्मा का प्रतीक है यह कार्य । पेट को दो रोटी, शरीर को दो वस्त्र अस्वस्थ हैं तो औषधि…, इसके अतिरिक्त जो आडंबर है वह मात्र इसीलिये न… कि लोग मुझे बड़ा महात्मा मानें ? संसार के लिए तो आडंबर करके बड़ा और सिद्ध महात्मा तो बन सकते हो, लेकिन अपनी आंखों में झांकर देखोगे तो अपनी ही नजर में अपने को ही गिरा हुआ पाओगे । राजनीति, गौशाला धर्म के ठेकेदारों, गृहस्थों का काम है, विरजा संपन्न संन्यासी का नहीं । यही पर धर्म आज सारी मर्यादाओं को तोड़कर कोई भी इन दंभाचारियों के कारण अच्छे महात्मा को भी उसी दृष्टि से देखने और अपमानित करने लगे हैं । आज स्वयं को धर्म का ठेकेदार मानने वाले केवल तथाकथित कथावाचक कथा मंच पर मात्र ठुमके लगाकर ही सिद्ध हो गये हैं स्वयं भी पतित और समाज को भी पतित कर रहे हैं । अगर ये गीता का एक मात्र स्वधर्म समझ पाते, फिर समझकर समझा पाते तो आज संसार और देश में हाहाकार न मचा होता । अगर ये स्वयं सदाचारी होते तो आज बलात्कार, व्यभिचार, लूट न मची होती और मेरा देश, मेरा समाज आनन्द और शांति की अनुभूति कर रहा होता । दूसरे को त्याग सिखाने वाले अगर खुद त्याग सीख पाये होते तो आज कोई भूखा, नंगा न होता, मंदिर आदि के नाम से ईंट पत्थरों का संग्रह तो भगवान हो सकता है, लेकिन जिसे परमात्मा ने स्वतः गढ़ा, वह मनुष्य मनुष्य भी नहीं बल्कि मात्र गाजर मूली बन कर रहा गया है ।
यह सब गीता का ज्ञान न होने या गीता ज्ञान की उपेक्षा का ही परिणाम है । इस सबके लिए संन्यास की क्या आवश्यकता थी ? यह सब तो घर में पैंट-शर्ट में सपत्नीक रहकर भी तो हो सकता था ? खैर हमें अधिक इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि “प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यसि” ३/२८ । हमारी इन्द्रिय लोलुपता ही हमें भयकारी बना रही है । इसीलिये श्रीभगवान ने कहा जो इन्द्रिय लोलुप न होकर आत्माराम है, आत्मतुष्ट है, आत्मरति वाला है, इसप्रकार पर धर्म से ऊपर उठकर स्वधर्म का पालन करने वाला सदा सर्वदा निर्भय पद को प्राप्त कर स्वतः निर्भय हो जाता है ।
संक्षेप में—अर्जुन को संन्यास धर्म श्रेष्ठ दिखाई दे रहा है इसीलिये वह उसे स्वीकार करना चाहता है किन्तु वह एक गृहस्थ के लिए पर यानी दूसरे का धर्म है क्योंकि अभी उसका अधिकार प्राप्त नहीं और अपने स्वधर्म से पलायन करना चाहता है । इसलिए पलायन करके दूसरे धर्म को स्वीकार करने वाला समय के अनुसार वहां के भी कर्तव्य का पालन ठीक से नहीं कर सकेगा अतः वहां भी भय उत्पन्न होगा । भले क्षत्र धर्म हिंसा जैसे दोष से ओतप्रोत हो लेकिन उसमें निपुण होने के कारण वही श्रेष्ठ है । यह समाज के प्रत्येक मनुष्य के लिए समझना चाहिए । इसका विस्तृत विवेचन अध्याय १८ में किया जायेगा ॥३५॥
समीक्षा— नैष्कर्म्य सिद्धि के लिए बताया कि वैदिक कर्म का अनुष्ठान आवश्यक है क्योंकि वैदिक कर्म जो पंचमहायज्ञ आदि के नाम से कहे गये हैं उन्हीं कर्तव्य कर्मों का वेद विधि से अनुष्ठान करने से ही अविनाशी ब्रह्म की प्राप्ति होती है । इस पर यह शंका हुई कि फिर तो ज्ञानी को भी कर्म करना ही चाहिए जिस पर कहा कि जिसकी गति एक मात्र आत्मा से भिन्न है ही नहीं ऐसे आत्माराम के लिए कोई कर्तव्य कर्म शेष ही नहीं रहता है । वह पूर्ण काम है । अतः तू भी अनासक्त होकर कर्तव्य कर्म द्वारा परम पुरुषार्थ को प्राप्त कर लेगा । जनकादि पूर्वजों के अनुसार ज्ञान और अज्ञान दोनो ही रूपों में तेरे लिए अनुकरणीय है । जनकादि से प्रत्येक को अपने कुलोत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष समझना चाहिए । अगर उसे ज्ञान की प्राप्ति होने पर कर्मों की आवश्यकता नहीं भी हो तो भी मेरी तरह कर्म करे अन्यथा प्रजा की मर्यादा का नाश करके दुराचार व्यभिचार उत्पन्न होकर वर्णसंकर उत्पन्न करने वाला वही होगा अर्थात समाज की मर्यादा भंग करने का दोष उसे ही लगेगा । अज्ञानी की भांति बाहर से आसक्त हुआ सा कर्म करे और कराए एवं अज्ञानियों की बुद्धि में भेद न पैदा करे कि वह दोनो ओर से नष्ट हो जाये सीमित अहंता को व्यापक अहंता से जोड़कर आत्मा अनात्मा के विवेक का आश्रय लेकर परमात्मा के साथ अभिन्न मानता हुआ उनके कर्म उन्हीं को अर्पित करके फिर जागतिक कार्यों का विधिवत प्रतिपादन करे । यदि वह ऐसा नहीं करता है तो जागतिक नाना प्रकार के भेदज्ञान के कारण वह बुद्धिहीन नष्ट हुआ जानना चाहिए यद्यपि सभी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करते हैं तो भी अपनी इन्द्रियों को अपने अनुशासन में करके राग द्वेष रूपी कल्याण पथ के शत्रुओं को जीतकर अपने गुणहीन धर्म का ही पालन करे । स्वधर्म में तो मर जाना भी श्रेष्ठ है ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्’ २/३७ क्योंकि दूसरे का धर्म भय देने वाला होता है ॥१७-३५॥
संबंध— श्लोक ३३ में कहा था कि व्यक्ति का स्वभाव जैसा होता वह वैसा ही करता है भले वह आत्मज्ञानी ही क्यों न हो, जैसे कोई बलवान बलपूर्वक कर्म करवा लेता है, ऐसा विचार आने पर ज्ञान और कर्म दोनो मार्गों से हटकर पूछते हैं कि वह कौन ऐसा करता है ?....
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥३/३६॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले― हे ज्ञान वृष्टि करके तृप्ति प्रदान करने वाले वार्ष्णेय ! किस बलवान के द्वारा इच्छा न होने पर भी बलपूर्वक लगाये जाने पर पुरुष पाप करता है ?
तात्पर्यार्थ— ज्ञानी-अज्ञानी, राजा-प्रजा किसके आधीन होकर न चाहकर भी पाप करता है ? वह कौन है ? यही समस्या दुर्योधन की भी थी……
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः ।
केनापि देवेन हृदि संस्थितेन यथा नियुक्तोऽसि तथा करोमि ॥
मतलब पाप तो कोई करना ही नहीं चाहता है तो भी पाप करता ही है ऐसा करने के लिए वह किसके द्वारा बाध्य किया जाता है । अर्जुन का मतलब है कि अगर जान लिया जाये कि वह कौन बाध्य करता है ? तो उससे बचने का भी उपाय कोई न कोई मिल ही सकता है । इसलिये उपरोक्त जिज्ञासा की ॥३६॥
संबंध— अर्जुन के प्रश्न से काम की महत्ता बताते हुए मुमुक्षु का शत्रु बताते हैं…...
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥३/३७॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― यह जो काम है, यह जो क्रोध है इसकी उत्पत्ति रजोगुण से होती है । ये बहुत खाने वाले महापापी हैं । इनको मुमुक्षु का शत्रु जानो ।
तात्पर्यार्थ— काम के विषय में अधिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है, जो जिस स्थान पर खड़ा है, वहाँ के अनुसार समझ ले काम ही क्रोध के रूप में परिणत होता है और फिर व्यक्ति का नाश हो जाता है, इसका उल्लेख अध्याया २/६२-६३ में हो चुका है । अधिक खाने वाला है- इसकी व्याख्या संपूर्ण ब्रह्माण्ड में है । यह भोगी के भोग और योगी के योग में है, हमारी कामना संसार की है या परमार्थ की यह वैसा ही रूप धारण कर लेता है । आश्रमी का आश्रम, गोपाल का गोशाला है । इसका इतना व्यापक दायरा है, इसका भोजन ही तृष्णा है । जिस जगह आपकी आसक्ति बढ़ी उसी जगह वह खड़ा, तृष्णा की पूर्ति न होने से जबर्दस्ती उन उन वस्तुओं की प्राप्ति हेतु यही काम क्रोध का रूप धारण कर लेता है फिर परिणाम अध्याय २/६३ का होता है । अतः मुमुक्षु को आश्रम, गोशाला आदि के भी झंझट से मन से भी दूर रहना चाहिए ।
अथवा सभी अर्थों का मूल काम ही है । यह काम भी रजोगुण की वृद्धि से उत्पन्न । इस काम से ही क्रोध उत्पन्न होता है कामात्क्रोधोभिजायते २/६२ सबके मूल में सबकी जड़ रजोगुण ही है । किन्तु यह पकड़ में आता नहीं है । इसका ज्येष्ठ पुत्र है काम अर्थात हमारे जीवन की प्रत्येक कामना ही हमारे जीवन की परम शत्रु है । यह आयी तो फिर इसके अन्य क्रोध लोभ, मोह, मत्सर ये इसके बन्धुजन, एवं तृष्णा, ईर्ष्या आदि इसकी बहने भी आयेंगी ही तो फिर अनर्थ होना ही है इसीलिये ‘प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्’ २/५५ अर्थात जब मन में संकल्प विकल्पात्मक सभी कामनाएं नष्ट हो जाती हैं तभी वह समाधि को प्राप्त होता है । अतः यहाँ पर काम को ही वश में करने का निर्देश दिया गया है जिसका स्पष्टीकरण अध्याय के विश्राम पर्यंत किया जायेगा ॥३७॥
संबंध— काम मुमुक्षु का वैरी है यह पुनः स्पष्ट करते हैं……
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥३/३८॥
शब्दार्थ— जैसे धुवाँ अग्नि को, धूल दर्पण को, जेर गर्भ को ढक लेते हैं वैसे ही काम क्रोध के द्वारा यह ज्ञान ढक लिया जाता है ।
तात्पर्यार्थ— यह काम ज्ञान का किस प्रकार शत्रु है यह तीन उदाहरण देकर बताते हैं अग्नि, दर्पण और जेरस्थ गर्भ अर्थात गर्भस्थ बच्चा । अग्नि धूंवे से ढकी होने पर भी दाहक क्षमता उपस्थित रहती है और दूर से भी समझ में आती है कि अमुक जगह धुंवा दिख रहा है अर्थात अग्नि है, इसी प्रकार उत्तम कोटि के साधक का जब भी कहीं राग होता है कामना और तृष्णा रूपी धुवां बढ़ता है, तब विचार रूपी अग्नि को शीघ्र प्रज्वलित करके वासना रूपी कचरे को शीघ्र जलाकर धुंवा रहित अर्थात स्वभाव में स्थित हो जाता है । मध्यम कोटि का अधिकारी काम रूप मैल आ जाने पर विवेक पूर्ण उपासना आदि के आश्रित होकर दर्पण के समान लिख तो रहा है । तीसरा उदाहरण गर्भस्तथा बच्चे का है उसका पता नहीं लड़का होगा या लड़की, वैसे ही निम्न श्रेणी का राग द्वेष के आधीन रहने वाले को यही पता नहीं होता कि वह कब, कैसे और कहां भटक गया ? इस प्रकार ये काम नाना रूपों में ज्ञान का आश्रय लेने वालों का स्वभाव से ही वैरी है ।
भावार्थ— यहाँ इतना समझना है कि आत्यन्तिक ज्ञान का अभाव होना जिससे उसे मैं ब्रह्म हूँ की अनुभूति की तो बात ही छोड़ो वह अपने को शरीर से भिन्न मैं कोई जीव भी हूँ यह भी नहीं जानता । वह तो कार्य करण संघात अर्थात इन्द्रियों सहित शरीर को ही मैं यही हूँ और इतना ही हूँ ऐसा मानता है । इसी सीमित अहंता के कारण उसके भरण पोषण में लगा रहता है जिसके कारण वह माता, पिता, गुरु तक की हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है फिर अन्य पापों की बात ही क्या कहा जाये ? यही ज्ञान का अत्यंत ढक जाना है । इसलिये ही ये धूमा आदि क्रमशः तीनो उदाहण दिये गये हैं ॥३८॥
संबंध— पुनः काम को ज्ञानी का शत्रु बताते हैं……
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणः ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥३/३९॥
शब्दार्थ— हे कौन्तेय ! जैसे अग्नि की पूर्ति कठिन है वैसे ही यह काम रूप अर्थात जब जहाँ जैसी आवश्यकता हुई उस इच्छानुसार रूप धारण करने वाला होने से काम का निवारण कठिन है । इसने ज्ञान को ढक लिया है, यह ज्ञानी का नित्य वैरी है ।
तात्पर्यार्थ— काम कभी कामी से शत्रुता नहीं करता क्योंकि काम उसके अनुकूल रहता है, भले ही वह कामोपभोग के परिणामस्वरूप दुःख से दुःखी होकर काम की निन्दा करे, किन्तु ज्ञानी अपने ज्ञान के विचार से जानता है कि काम हमारे श्रेयमार्ग का बाधक है इसलिये ज्ञानी से वैर करके कामरूप अर्थात नानाप्रकार के लुभावने रूप धारण करके कहीं न कहीं भ्रमित करने के लिए हमेशा पुष्पधनु पर पञ्चपुष्प बाण चढ़ाकर सदैव के लिए शत्रुता करके बैठा है । इसकी कभी कैसे भी पूर्ति होने वाली नहीं है । शत्रु को तो ले देकर मना भी सकते हैं लेकिन यह शत्रुओं का शत्रु कभी मानने, समझने और तृप्त होने वाला नहीं है, जैसे अग्नि को चाहे जितनी आहुति दो किन्तु कभी तृप्त नहीं होती ।
यहाँ ज्ञानी का अर्थ जो आत्मा, अनात्मा की विवेक करके आत्मा में आरूढ हो गये हैं उनके लिए नहीं कहा गया बल्कि वे मुमुक्षु हैं जिनके अन्दर विवेक है । वे विवेक द्वारा जानते हैं कि इस काल में भले ये कामनाएं अच्छी लग रही हैं, भोग अच्छे दिखते हैं, किन्तु ये हैं विष के समान ही दुःख देने वाले हैं ‘परिणामे विषमिव’ १८/३८ किन्तु वे उन से निवृत्त नहीं हो पा रहे हैं इसलिए दुःखी होते हैं । मूर्ख तो उन कामनाओं और विषयों को मित्रवत स्वागत करते हैं भले परिणाम कैसा भी दुःखद हो । अतः ज्ञानी का यहां अर्थ साधन परायण साधक यानी मुमुक्षु और ज्ञान का अर्थ विवेक समझना चाहिए । यहाँ इच्छाओं को कामरूप कहने का मतलब यह है कि साधक जब एक ओर से मुंह मोड़ लेता है तब वह दूसरा रूप धारण करता है फिर तीसरा चौथा पांचवा इत्यादि । जैसी जैसी साधक की वृत्ति बदलती जायेगी वैसा वैसा रूप धारण करती जायेंगी ।
अतः जैसे प्रचंड अग्नि में छोटे छोटे तिनके पूरे नहीं किये जा सकते किन्तु तिनका डालना बंद कर देने पर अग्नि स्वतः शान्त हो जाती है वैसे ही इन्द्रियों को वश में करके उनके आहार उनके अनुसार न देने पर वे स्वतः शान्त अर्थात निष्काम हो जायेंगी ॥३९॥
संबंध— अब काम का निवास बताते हैं……
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥३/४०॥
शब्दार्थ— पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि को ही इसका अधिष्ठान कहा गया है । यह ज्ञान को ढ़ककर देहाभिमानी आत्मा को अत्यन्त मोहित करता है ।
तात्पर्यार्थ— ‘इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे’ ३/३४ में राग द्वेष के रहने के स्थान बताकर उनके वश में न रहने की बात कही थी, उसी को यहाँ पर और स्पष्ट करते हैं कि काम की प्रवृत्ति राग द्वेष के बिना संभव नहीं है जहाँ राग द्वेष होंगे वहीं काम, क्रोध, लोभ, मोह और वासना रहेंगे अर्थात छः ज्ञानेन्द्रियों के साथ इन कामादि छः की बड़ी मित्रता है ये सभी इन्द्रियों में ही रहते हैं । इन्द्रियों में रहकर मन सहित छः ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि इन सातों के साथ मिलकर सत्-असत् का निर्णय करनेवाले ज्ञान को ढककर देहभिमानी जीव को कैद कर लेते हैं अर्थात मोहित कर लेते हैं ।
यहां पर जिस काम का निवास इन्द्रिय, मन और बुद्धि को बताया गया है उसको इस प्रकार समझना चाहिए कि विषयों की अधिष्ठान इन्द्रियां हैं किन्तु इन्द्रियां बिना मन से मिले जड़ हैं, कुछ नहीं कर सकतीं है इसलिये इन्द्रियां चूंकि मन में सन्निहित हैं इसलिये मन को अपने अनुकूल बना लेती हैं और मन भी बिना बुद्धि के बिना कुछ नहीं कर सकता है क्योंकि वह बुद्धि में रहता है इसलिए वह बुद्धि को अपने अनुकूल बना लेता है । यद्यपि बुद्धि अपंचीकृत महाभूतों का पंचीकृत सात्विक अंश है उसमें कोई भी विकार नहीं होता है तो भी वह मन की संगति करके मन और इन्द्रियों के अनुकूल अनुमति दे देती है जिससे बुद्धि ही नष्ट सी हो जाती है “इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि” २/६७ यह श्लोक प्रस्तुत श्लोक की संगति बनेगा, इस प्रकार कामनाएं यानी विषय, इन्द्रियां, मन और बुद्धि चारों मिलकर एक साथ रहने के कारण ही काम का वास इन चारों में कहा गया है ।
शरीर को धारण करने वाले जीव को इस प्रकार इन विषयों से मोहित करके ज्ञान को ढक लेती हैं । यहाँ पर विषयों के रहने के स्थान का वर्णन इस लिए किया गया कि यदि शत्रु से अधिक परेशान हो तो उसके निवास स्थान को जहां वह छुपता है नष्ट कर देना चाहिए ताकि उसके छुपने का स्थान नष्ट होते ही बाहर आ जाये और हम उस पर भलीभांति विजय पा सकें । इसलिये इन्द्रियों पर मन का अनुशासन और मन पर सदसद्विवेक द्वारा निश्चयात्मिका बुद्धि का अनुशासन होना चाहिए
भावार्थ— विवेक द्वारा सत् और असत् का निर्णय करके विवेक को सत् पदार्थ में असंग भाव से स्थिर कर देना ही काम पर विजय प्राप्ति का एकमात्र साधन है ॥४०॥
संबंध— इसलिये......
तस्मात्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥४१॥
शब्दार्थ— इसलिये हे भरतश्रेष्ठ ! तुम इन्द्रियां आदि को अपने वश में करके ज्ञान-विज्ञान का नाश करनेवाले इस महापापी को बलपूर्वक मार डालो ।
तात्पर्यार्थ— ये काम अपने आधीन करके इन्द्रियों को मोहित कर लेता है इससे क्या होता है ? इस पर कहते हैं कि ये पाप करनेवाले हैं, अतः पाप ही करेंगे, किस प्रकार ? जो गुरु से सुना और जो शास्त्र से पढ़ा वह ज्ञान और उस ज्ञान का जो इन्द्रिय दमन का आश्रय लेकर जो अनुभव प्राप्त किया वह विज्ञान इन दोनों का नाश कर देता है, यही पाप करता है क्योंकि ज्ञानविज्ञान के नाश से आत्मा अनात्मा के विवेक से रहित होकर पशुवत जीवन व्यतीत करते हुए पुनः जन्ममृत्यु के चक्कर में मुमुक्षु चला जाता है, इससे बड़ा और पाप क्या होगा ? इतने बड़े अनर्थ को रोकने के लिए हे भरत वंश में श्रेष्ठ ! मन बुद्धि सहित सभी इन्द्रियों को अपने आधीन करो ।
यहाँ पर पांचों कर्मेन्द्रियाँ बिना ज्ञानेंद्रियों के कुछ नहीं कर सकती हैं, अतः यहाँ पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ही लेनी चाहिए या यूं कहें कि बाह्य स्थूल विषय ग्रहण या त्याग से कोई अन्तर नहीं पड़ता यदि आन्तरिक विषय लेना बंद हो जाये, जैसा कि श्लोक छः में कहा गया है, तो इन्हें वश में करना सरल हो जाये । अतः ज्ञानेन्द्रियों से सूक्ष्म शब्दादि विषयों के रस के प्रति लोलुपता का त्याग ही पांचों ज्ञानेन्द्रियों को वश में करना है यह मन के द्वारा होगा और बुद्धि के द्वारा सदसद्विवेक के निश्चय से नियंत्रित होगा । ज्ञान वह है जो आचार्य और शास्त्र के माध्यम से आत्मा अनात्मा का विवेक का श्रवण द्वारा होता है और इसकी अनुभूति ही विज्ञान है । इनकी रक्षा काम के नाश से ही होगा ॥४१॥
संबंध— अब प्रश्न यह है कि इस काम के रहने के स्थान का पता चल गया लेकिन ये बड़े दुर्जय हैं इनके नाश का उपाय क्या ? इस पर अगले दो श्लोकों द्वारा उत्तर देते हुए अध्याय का उपसंहार करना……
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥३/४२॥
संबंध— शरीर से सूक्ष्म इन्द्रियां, इन्द्रियों से सूक्ष्म मन, मन से सूक्ष्म बुद्धि और जो बुद्धि से भी सूक्ष्म है वह आत्मा ।
तात्पर्यार्थ— इस श्लोक की व्याख्या को पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष से समझना आवश्यक है ।
पूर्व पक्ष ने ‘सः’ का अर्थ काम किया है । यद्यपि वे हमारे लिये सूर्य सदृश हैं तथापि सूर्य की अनुपस्थिति में रात्रि के अंधकार में तारे ही अंधकार को छिन्नभिन्न सा करते हैं । आपने काम किस आधार पर माना है ? क्या आपने पूर्व के प्रसंग पर ध्यान दिया ? जहाँ पर “ज्ञानिनो” ३/३९ और “देहिनम्” ३/४० पर स्पष्ट कहा गया है जिसका सीधा अर्थ है ज्ञानी के और शरीरभिमानी जीव अर्थात आत्मा, आगे ज्ञान-विज्ञान का नाश करने वाले काम को मार डालने के लिए इन्द्रयों को वश में करने के लिए “त्वम्” शब्द का स्पष्ट देहाभिमानी जीव अर्थात आत्मा के लिए ही कहा गया है इसमें कोई भी मतभेद कैसे हो सकता है ? इस पर अर्जुन की समझ में नहीं आया कि मैं शरीराभिमानी जिसकी इन्द्रियां काम के आधीन हों वह उस काम को कैसे मार सकता है ?
अतः यहाँ पर यह बताते हैं कि देखो जैसे शरीर स्थूल है और इन्द्रियां शरीर से सूक्ष्म हैंं इसलिये शरीर में व्यापक हैं किन्तु इन्द्रियों की अपेक्षा मन सूक्ष्म है अतः मन ने शरीर और इन्द्रियों को भी व्याप्त करके रखा है और बुद्धि मन की अपेक्षा से सूक्ष्म है अतः बुद्धि ने शरीर, इद्रियां, मन को भी व्याप्त करके रखा है क्योंकि यह नियम है जो जितना सूक्ष्म होगा वह उतना ही व्यापक होगा और काम की गति मन तक ही है ज्ञानी, देही या ‘त्वम्’ तक नहीं अतः जिसे ज्ञानिनो २/३९, देहिनो २/३० एवं त्वम् ३/४१ कहा वही यहाँ पर ‘सः’ से संबोधित किया गया है । अतः यह सुनिश्चित हुआ पूर्व प्रसंगानुसार यहाँ स्पष्ट बुद्धि के पश्चात जीव यानी आत्मा की स्वतंत्रता है क्योंकि अन्तःकरण चतुष्टय से भी सूक्ष्म आत्मा है, आत्मा से सूक्ष्म कुछ नहीं है, अतः यदि काम को बुद्धि से सूक्ष्म कहा जाये तो काम का तो कभी नाश ही नहीं होगा इससे अनवस्था दोष उपस्थित हो जायेगा, इसलिये भी अहं का स्फुटन जहाँ पर होता है और जो सत् और असत् विचार के द्वारा काम का भी नाश कर देती है वह प्रकाश जिस चैतन्य से मिल रहा है, वही शुद्ध आत्मा जो अविद्या दोष के कारण जीव संज्ञक कहा गया है उसी को यहाँ ‘सः’ कहा गया है, यह यहाँ सिद्ध होता है । इसीलिये ज्ञानविज्ञान का नाश करने वाले काम को मारने के लिए ‘त्वम्’ शब्द कहा गया और न समझ में आने पर आत्मा की सूक्ष्मता और स्वतंत्रता दिखाने के उद्देश्य से ‘सः’ संबोधित किया गया है यही अर्थ यहाँ उचित है ।
पक्षान्तर से विचार करने पर शरीर तो साढे तीन हाथ का ही होने से इसकी अपेक्षा सूक्ष्म इन्द्रियां व्यापक होने से शरीर से श्रेष्ठ हैं क्योंकि शरीर के न रहने पर भी इन्द्रियां होती हैं, इन्द्रियों की अपेक्षा संकल्प विकल्पात्मक व्यापक होने से मन श्रेष्ठ है, मन को भी निश्चय प्रदान करने वाली बुद्धि मन से भी सूक्ष्म और व्यापक है और इस बुद्धि को सत्ता देने वाली वह आत्मा ही है जो इन सबकी संगति से विषयी बना हुआ है ।
यहाँ पर सः का अर्थ कुछ विद्वानों द्वारा काम किया गया है जो उनके अनुसार ठीक भी है क्योंकि काम वास मन, बुद्धि में भी होता है इसलिए बुद्धि से भी सूक्ष्म ऐसा माना गया है । यह अर्थ आपके अनुसार अवश्य ठीक ही है तथापि मेरा विचार कहता है कि यदि काम बुद्धि से भी सूक्ष्म है इसका अर्थ यह हुआ कि काम ही बुद्धि को सत्ता दे रहा है, क्योंकि प्रत्येक सूक्ष्म अपने से स्थूल को सत्ता देता ही है इस प्रकार यदि काम ही बुद्धि को सत्ता दे रहा है तो काम कभी निवृत्त ही नहीं होगा क्योंकि स्वामी की आज्ञा का पालन सेवक-सेविका को करना ही पड़ता है, कोई स्वामी अपने सेवक द्वारा अपना नाश क्यों होने देगा ? किन्तु विचार करने पर काम की तो कोई सत्ता ही नहीं है सत्ता तो बुद्धि ने संग दोष से दे रखी है, इसीलिये जब आचार्य की कृपा से तत्त्वमस्यादि का श्रवण करता एवं उसका विचार करके जब आत्मा अनात्मा का विचार निश्चय हो जाता है तब काम तो नष्ट ही हो जाता है क्योंकि स्वसंवेद्य आत्मा का जिस वृत्ति से अनुभव होता है वह बुद्धि फिर भी होती है अतः यहाँ पर सः का अर्थ काम न होकर आत्मा ही होगा । व्यष्टि में सः का अर्थात आत्मा और समष्टि में परमात्मा एवं व्यष्टि में बुद्धि और समष्टि में महत् नाम धारण करने वाली प्रकृति ऐसा अर्थ होगा । यहां एक प्रकार से पंचीकरण प्रक्रिया का संक्षिप्त वर्णन किया गया है जिसके माध्यम से गुणकर्म विभाग का वर्णन किया गया है ‘गुणकर्मविभागयोः’ ३/२८ । क्योंकि यही एकमात्र साधन आत्मा-अनात्मा के विवेक का है जब यह विवेक दृढ हो जायेगा तो काम तो अपने आप मरे हुए के समान हो जायेगा क्योंकि उसका कवच टूट चुका होगा । यही यहाँ पर बताया गया है ।
भावार्थ— काम पर विजय का एकमात्र साधन आत्म स्थिति ही यहां अपेक्षित है ॥४२॥
संबंध— इसके बाद के प्रसंग में भी स्पष्ट आत्मा शब्द कहा गया है, अतः जो प्रसंग पूर्व में हो और उत्तर में भी हो उसके विरुद्ध अर्थ मध्य में कैसे हो सकता है ? अतः उपरोक्त सः को आत्मा रूप में यहां और स्पष्ट करते हैं……
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो काम रूपं दुरासदम् ॥३/४३॥
शब्दार्थ— इसप्रकार से अर्थात ३/४२ में कहे गये आत्मा की सूक्ष्मता को जानकर समझकर स्वयं ही स्वयं के द्वारा काम रूप शत्रु को मार डाल ।
तात्पर्यार्थ— पहले अपनी अर्थात शरीर से लेकर बुद्धि पर्यंत तो मैं हूँ नहीं, अतः मैं तो स्वतंत्र हूँ और जिस राग द्वेष के निवास स्थान ३/३४ इन्द्रियां हैं और कामादिके रहने का स्थान हैं जो ३/४० उन पर मेरी नियंत्रण करने की स्वतंत्रता है, ऐसा समझकर तू इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान-विज्ञान के नाशक पाप की वृद्धि करने वाले काम को ४/४१ इन्द्रियों आदि से अपनी अर्थात आत्म रूप ‘मैं’ की ४/४३ अर्थात इस प्रकार से सूक्ष्मता को समझकर हे महाबाहो ! स्वयं से स्वयं ही कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल ।
क्योंकि स्वयं की सूक्ष्मता को समझने के लिए ३/३० के अध्यात्म चेतसा एवं २/१२-३० तक विचार करके ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसी भावना में स्थित होकर आपूर्यमाण होकर स्वयं से भिन्न कुछ न देखना, सबको सत्ता देने वाला चिन्मय, आकाश रूप, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव का स्मरण करके इन कामों से हमें क्या लेना देना आदि का विचार करके “आत्मन्येवात्मनातुष्टः २/५५, किञ्चिदपि न चिन्तयेत् ६/२५, आत्मरतिः” ३/१७ में स्थित होकर ही काम को नष्ट किया जा सकता है यही भाव ‘एवं बुद्ध्वा परं बुद्ध्वा’ का है क्योंकि ४/४२ में ‘सः’ कहा उसी को यहाँ पर जानकर ऐसा कहकर आत्मा की ही पुष्टि होती है । इसी इसीलिये आत्मा से आत्मा में स्थित होने का सीधा अर्थ है अहं के मूल ब्रह्मभाव की स्थिति । ऐसा यहाँ तात्पर्यार्थ है ।
अथवा यहां पर पूर्वोक्त श्लोक में कहा गया जो आत्मा का स्वरूप उसको सत् असत् का निर्णय करने वाली निश्चयात्मिका बुद्धि द्वारा समझकर अर्थात अपने स्वसंवेद्य आत्मस्वरूप में स्थित होकर उसी निश्चयात्मिका बुद्धि द्वारा मन को वश में करके― क्योंकि मन वश में होने से संकल्प विकल्प ही समाप्त हो जायेंगे तो मन और इन्द्रियां करेंगी क्या ? इसी को आगे कहेंगे ‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ ६/२५ उसी को यहाँ पर विवेक बुद्धि द्वारा मन को वश में करना कहा गया है यही स्थित प्रज्ञ का लक्षण है ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते’ २/५५ । इस प्रकार जब मोक्षार्थी स्वरूपस्थ हो जायेगा तब काम तो बिना मारे अपने आप ही मर जायेगा वह भले ही दुर्जय हो क्योंकि काम का स्वरूप संकल्प है सङ्कल्पप्रभवान्कामान् ६/२४ अर्थात कामनाएं संकल्प ही उत्पन्न होती हैं और संकल्प ही समाप्त तो काम ही समाप्त हो जायेगा । तथापि साधन साध्य की दृष्टि से काम को मार डालने की बात कही गई है । यह स्वरूप स्थिति ही ब्राह्मी स्थिति है इसी को प्राप्त होने पर फिर कभी मोह नहीं होता २/७२ यही आत्मवान् २/४५ है । यहाँ काम हो ही नहीं सकता है । यही इसका भाव समझ में आता है ।
भावार्थ— यहाँ यह भाव प्रतीत होता है कि जब तक हम मूल स्वरूप की स्थिति में नहीं पहुंचते तब तक काम का नाश होने वाला नहीं है ।
उपसंहार— अर्जुन व्यामोह निवारणार्थ पहले ज्ञानयोग की महिमा बताकर, कर्मयोग का वर्णन करते हुए कर्म करने को कहा, तथापि अर्जुन की समझ में नहीं आया, अतः पूछने पर ‘न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यम्....’३/४ से कर्म की महिमा, त्याग, काम की व्यापकता और उसके निवारणार्थ उपाय सहित अन्त में आत्मा के स्वरूप का वर्णन करके आत्मा से आत्मा के द्वारा कहकर आत्मन्येवात्मनातुष्टः २/५५ को पुष्ट करते हुए कर्मयोग का विनियोग ज्ञानयोग में करते हुए बताया कि लक्ष्य तो ज्ञानयोग ही है कर्म तो गौड़ है । इसलिये जो योगारूढ़ नहीं हुआ है ऐसे मुमुक्षु को कर्म तो करना ही चाहिए ॥४३॥
समीक्षा— प्रकृति के द्वारा नियंत्रित किया जाता हुआ मनुष्य राग द्वेष में स्थित होता है और यही राग द्वेष मुमुक्षु के परम शत्रु हैं । इस पर अर्जुन प्रश्न करता है कि कोई भी पाप नहीं करना चाहता है किन्तु किस बलवान की प्रेरणा से यह सब बलपूर्वक कराया जाता है ? उस पर भगवान ने काम को ही सभी अनर्थों की जड़ बताया । ये इच्छाएं ही मनुष्य के विवेक का हरण करके स्वरूप ज्ञान को ढक देती हैं जिससे वह अपना स्वरूप भूलकर शरीर को ही मैं मान बैठता है । इसलिये सबसे पहली प्राथमिकता होती है इच्छाओं पर नियंत्रण करने की, जिस पर मन और मन पर बुद्धि का नियंत्रण होता है किन्तु जब बुद्धि संग दोष से आवृत हो जाती है तब स्वयं को परिच्छिन्न मानकर सुख दुःख का अनुभव करती है और जब अपने अपरिच्छिन्न रूप का विचार करके स्थिर होती है तब सारी वासनाएं स्वतः मिट जाती हैं । तथापि साधना काल में विषयों पर नियंत्रण, मन के संकल्प विकल्प पर अनुशासन, बुद्धि का सत् और असत् के विचारों की निरंतरता बनाये रखना एवं ऐकान्तिक समाधि निष्ठा का एक साथ अभ्यास करना आवश्यक है । यहाँ पर अर्जुन के माध्यम से यह भी बताया गया है कि बाह्य शत्रु कितना भी बलवान हो उन्हें जीता जा सकता है किन्तु आन्तरिक कामादि शत्रुओं का जीतना अत्यंत दुष्कर है अर्थात इन्हें तब तक जीता नहीं जा सकता है जब तक ऐकान्तिक स्वरूप निष्ठा न बन जाये । जिसकी स्वरूप निष्ठा बन गई है, जिसने काम को जीत लिया है वही महाबाहु अर्थात बड़ी भुजाओं वाला है । यही मानव मात्र का लक्ष्य है । ओ३म् ॥३६-४३॥
॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक तीसरा प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐतत्सत् ! हरिः ॐतत्सत् !! हरिः ॐतत्सत् !!!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
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