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प्रासंगिक विषय

प्रासंगिक विषय— श्रीमद्भगवद्गीता का सूक्ष्म सारांश―                 मनुष्य जीवन की एक सच्चाई है कि जब वह किसी गहरे संकट में पड़ता है तभी वह एक ऐसे मार्ग की ओर चल पड़ता है जिसका स्वयं उसको भी पता नहीं होता है । जीवमात्र का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्जुन की भी यही स्थिति युद्धक्षेत्र में हुई । जिसपर वह किंकर्तव्यविमूढ़ है अब उसे कोई  मार्ग नहीं दिख रहा कि वह क्या क्या करे ? इस पर उसने परम हितैषी अपने सखा, सारथी और स्वामी कृष्ण की शरण ग्रहण की ।                   वास्तव में आर्य की क्या परिभाषा है २/२ और मनुष्य किसे कहते हैं यह गीता भलीभाँति प्रतिपादित करती है । जब भी किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति बने और गीता की तटस्थ होकर शरण ग्रहण की जाये तो हमें हमारे कर्तव्य का बोध हो जायेगा । मनुष्य कौन है और कौन मनुष्येतर ? यही गीता का सूक्ष्म विषय है । वास्वत में मनुष्य वही है जो आध्यात्म को समझ ले । यह और मैं का अन्तर समझ ले, तदनुसार ...

ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय १८

॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥      ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥       अथाष्टादशोऽयायः                  पूर्वाध्यायों से इस अध्याय का संबंध— दूसरे अध्याय में श्लोक १२ से ३० तक आत्मतत्त्व का उपदेश करके श्रीभगवान कहते हैं– “एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धर्योगे त्विमां श्रृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मभबन्धं प्रहास्यसि ॥” २/३९ यहां से कर्मयोग की भूमिका प्रारंभ होती है । भगवान ने यहां कर्म को योग बनाकर कर्मबन्धन काटने की बात कही । इस प्रकार पहले आत्मतत्त्व की प्रशंसा १९ श्लोकों में करके फिर कर्मबन्धन को काटने का उपाय भी कर्म से बताते हुए संपूर्ण गीता का पूरा दूसरा अध्याय उपक्रम रूप से तैयार हुआ । इसी अध्याय का सबसे अहं उपक्रम “त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भावार्जुन । निद्वन्दो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्” ॥२/४५ अर्थात वेद तीनो गुणों का विषय है लेकिन कब और कहाँ ? इसका यद्यपि २/४४ में पहले ही स्पष्टीकरण कर दिया है तथापि अध्याय १५ में संक्षिप्त और...