ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय १६
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथ षोडषोऽध्यायः
संबंध— यद्यपि अध्याय पन्द्रह से गीता का मानव जीवन के लक्ष्य आत्म प्रतिष्ठा विषयक उपदेश पूर्ण हुआ, तथापि उसकी प्राप्ति भी करना है वह कैसे हो ? इस पर भी विचार करना आवश्यक है । यद्यपि भगवान की प्रतिज्ञा जो ज्ञान-विज्ञान की अध्याय सात में की थी और वह वहीं पूरा होना चाहिए था तथापि उसकी प्राप्ति कौन कर सकता है ? और कौन नहीं ? इसका वर्णन इसके लिए बताया कि जो तीनों गुणों से मोहित है वह मुझे नहीं जानता ७/१३ क्योंकि वह कितनी दुर्लंघ्य है इसका ही विस्तार करने के लिए चौदहवें अध्याय का वर्णन किया गया है । इसका कारण यह था कि पहले प्रधान विषय का वर्णन और फिर गौड़ विषय का वर्णन किया जाता है, इसलिये पहले ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ का विज्ञान कहने के लिए उद्यत हुए । साथ ही ‘न मां दुष्कृतिनो मूढाः’ ७/१५ अर्थात जो शास्त्रीय कर्म नहीं करते मनमानी करते हैं परमात्मा की शरण नहीं ग्रहण करते क्योंकि वे ‘आसुरं भावमाश्रिताः’ ७/१५ अर्थात आसुरी भाव का आश्रय लेने वाले हैं, यह भी बताया । अब इसके पश्चात सातवें और आठवें अध्याय में क्रमशः तीनों गुणों और आसुरी संपदा का विस्तार होना चाहिए था, किन्तु अन्तिम श्लोक को सुनकर अर्जुन बीच में ही बोल पड़े और सात प्रश्न कर दिये, जिसके उत्तर में आठवां अध्याय पूरा हो गया और अर्जुन के प्रश्न से विषयान्तर हुए विषय ज्ञान-विज्ञान का फिर से वर्णन प्रारम्भ किया । प्रसंगानुसार यह बताया कि राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ९/१२ अर्थात राक्षसी और आसुरी स्वभाव वाले मोहित करने वाली माया के द्वारा खींच लिए जाते अतः वे मेरा भजन नहीं कर सकते जबकि ‘दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः’ ९/१३ अर्थात दैवी प्रकृति के द्वारा खींचे गये स्वभाव वाले मेरा अनन्य भाव से मेरा भजन करते हैं । यह दैवी और आसुरी संपत्ति और तीनी गुणों की व्याख्या ‘ददामि बुद्धियोगं तम्’ १०/१० एवं “…..अज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता” १०/११ के बाद करना चाहिए था । किन्तु भगवान ने जो अध्याय सात और नौ में अपनी विभूतियां बताया और ‘महर्षयः सप्त पूर्वे’ १०/६ आदि से विभूतियों का प्रभाव बताया उसके कारण अर्जुन को बीच में ही विभूतियों कोजानने की जिज्ञासा ने पुनः विषयांतर कर दिया । विभूति विस्तार के बाद अन्त में संपूर्ण जगत को अपने एक अंश में बताने पर अर्जुन को फिर यह जिज्ञासा हुई कि हम उस एकांश भाव को देखें, इस कारण अध्याय ग्यारह में विराट दर्शन के पश्चात अनन्यभक्त अर्थात पराभक्ति करने वाले ज्ञानी के द्वारा ही परमतत्त्व में प्रवेश ११/५४ करने की बात कहते हुए अर्जुन को यह आदेश देते हैं कि मेरे परायण होकर, असंग होकर मेरा भजन करने वाला मुझको प्राप्त होता है ११/५५ ।
यह सुनकर अर्जुन को यह भ्रम हो गया कि पहले ज्ञानयोग के द्वारा तत्त्व में प्रवेश करने की बात कहते हैं और फिर सविशेष भक्ति और कर्म करने की बात कहते हैं इसमें सबसे श्रेष्ठ क्या है ? इस पर अर्जुन ज्ञानी और भक्त की श्रेष्ठता जानने के लिए पुनः प्रश्न करते और अध्याय १२ उसी में निकल जाता है । आत्मपद की प्राप्त का सर्वाधिक बाधक देहाभिमान १२/५ को नष्ट करने के लिए और ११/५४ का विस्तार करने के लिए तेरहवें अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का वर्णन करके, त्रिगुणमयी माया का वर्णन चौदवें अध्याय में करते हैं । इस प्रकार अध्याय तेरह से अध्याय चौदह के श्लोक बीस तक ज्ञानयोग पर ही प्रकाश डालते हुए अध्याय सात में छूटा हुआ तीनो गुणों का विस्तार इस चौदवें अध्याया में पूरा हो जाता है । फिर श्लोक बाइस से पच्चीस तक त्रिगुणातीत सिद्ध का लक्षण कहकर सहज ही त्रिगुणातीत होने का उपाय सविशेष ब्रह्म की अव्यभिचारी भक्ति योग द्वारा बताते हैं और कोई सविशेष और निर्विशेष में भेद करके भ्रमित न हो इसके लिए सत्ताइसवें श्लोक में संपूर्ण जगत की प्रतिष्ठा एकमात्र परमात्मा में ही है करके एकता का प्रतिपादन करते हैं । अब अव्यभिचारी भक्तियोग का स्वरूप क्या है यही समझाने के लिए अध्याय पन्द्रह का वर्णन करके उपाय बताया की संसार वृक्ष का दृढतापूर्वक बिना कुछ सोचे समझे छेदन कर दे अर्थात काट डाल, ‘असंग शस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ १५/३ असंग रूपी शस्त्र से दृढतापूर्वक काट डाल और ‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’ १५/४ एक मात्र जो सबका आदि है किन्तु जिसका कोई आदि नहीं है उसकी शरण ग्रहण कर । सब कुछ अनात्म पदार्थ का त्याग करके, जो सर्वात्मा की शरण ग्रहण करता है वस्तुतः वही सर्वज्ञ होता है स सर्ववित् १५/१९ वही सब प्रकार से मुझे जानता या भजता है । इस प्रकार ज्ञानोत्तर पराभक्ति के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया । अब जो विषय अध्याय सात में आसुरी स्वभाव और दैवी स्वभाव की बात आयी थी जिसका वर्णन अध्याय आठ में होना ही चाहिए था, अर्जुन के कारण विषयांतर को प्राप्त छूटे हुए विषय का वर्णन इस अध्याय में दैवी और आसुरी संपत्ति के नाम से होगा क्योंकि अध्याय सात में दुष्कृती अर्थात मनमानी अर्थात स्वेच्छाचारी के द्वारा भगवद्भजन न करने और मोहित होने की बात कही और सुकृती अर्थात जो स्वेच्छाचारी नहीं है जो आचार्य और शास्त्र के आश्रित होकर ही जो कर्म करते हैं वे भगवद्भक्त उस परमेश्वर की शरण ग्रहण करते हैं ।
अथवा पूर्वाध्याय में यद्यपि भगवान ने अपने उपदेश को ‘इति’कहकर विश्राम दे दिया तो भी साधनों की दृष्टि अभी उन तथ्यों की पहचान शेष रह गयी है जिनके कारण साधक अपने निर्धारित लक्ष्य से भटक जाता है । तुलसीदास जी कहते हैं― संग्रह त्याग न बिनु पहचाने । अर्थात यद्यपि संपूर्ण सृष्टि ब्रह्ममय है तो भी सिद्ध तो स्वरूप स्थित है, अतः उसकी तो कोई बात ही नहीं किन्तु साधक जो अभी स्वरूपस्थ नहीं हुआ है उसे संसार में दुःख भी देखना चाहिए और दोष भी ‘दुःखदोषानुदर्शनम्’ १३/८ इसलिये हमारे लिए सुखदायी का संग्रह और दुःखदायी का त्याग आवश्यक है । साधक में प्रत्येक वह वृत्ति सुखदायी है जो सिद्ध का स्वभाव है । उसकी साधना करना चाहिए, उसी का संग्रह करना चाहिए । उससे भिन्न का त्याग करना चाहिए । इसी दृष्टिकोण को लेकर अध्याय सात में कहा था कि ‘दैवी ह्येषागुणमयी’ ७/१४ मेरी माया दैवी गुणों से संपन्न है इसका आश्रय लेकर जो मेरी शरण लेते हैं वे माया अर्थात प्रकृति को पार कर जाते हैं । दूसरी बात कहा― ‘मम माया दुरत्यया’ ७/१४ अर्थात मेरी दुर्लंघ्य है । यह किसके लिए है ? इसके लिए कहते हैं― ‘न मां दुष्कृतिनो मूढः प्रपद्यन्ते नराधमाः’ ७/१५ अर्थात जो दुष्कृती हैं अर्थात मेरी दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर जिन्होंने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त न करते हुए मेरी शरण ग्रहण नहीं की है उनके लिए मेरी माया दुर्लंघ्य है ।
हम यहाँ यह बताना चाहते हैं कि यद्यपि माया और प्रकृति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तथापि पहलू दो हैं एक तो नहीं है न…? यहाँ जिस प्रकृति को दैवी और गुणवाली कहा, है तो यह प्रकृति ही परमेश्वर का या सिद्ध का स्वभाव है जो परमेश्वर/आत्मस्वरूप की ओर स्वतः अग्रसर करता है, जबकि माया भ्रमित करती है और जितना उसका बल चलता है उतने प्रयत्न से मुमुक्षु को भ्रष्ट करने में लगी रहती है । यह दोनो प्रकृति और माया में थोड़ा अन्तर है । चूंकि सिक्का एक ही है और कोई न कोई एक पहलू ही सामने होगा दोनो ही हो नहीं सकते । इसलिये दैवी गुणों की बड़ी महिमा शास्त्रों में कही गई है जिसका वर्णन अध्याय दो में स्थित प्रज्ञ के लक्षण, अध्याय दश में ‘बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः’ १०/४-५ आदि से विभूति रूप से, अध्याय बारह में ज्ञानीभक्त के लक्षण, अध्याय तेरह में ज्ञान नाम से और अध्याय चौदह में त्रिगुणातीत के लक्षणों के रूप में विस्तार से कहा गया है ।
इन दैवी गुणों का यदि परमेश्वर की शरण लिये बिना ही आश्रय लिया जाये तो ये भी सुख और ज्ञान में आसक्ति उत्पन्न कराकर उसमें ही बांध देती हैं । जिससे उच्चयोनियों को बारंबार प्राप्त होकर उसी में लगे रहो और कहीं थोड़ा भी प्रमादवश धोखा हुआ तो सातों पाताल के नीचे चले गये । इसलिये देव के स्वभाव यानी प्रकृति का आश्रय देव की शरण लिये बिना लिया तो देव प्रसन्न नहीं हो सकते और पतन निश्चित है । जैसे किसी का किसी पुरुष से कोई मतलब नहीं और उसकी पत्नी से चोली-दामन की तरह दोस्ती हो तो क्या होगा ? मारकाट….! यही यहाँ समझना चाहिए । अतः प्रकार दैवी संपत्ति का आश्रय लेने वाला भी परमेश्वर की शरणागति के बिना अजितेन्द्रिय जैसा ही दुष्कृति होता है । अतः वह निस्त्रैगुण्य २/४५ नहीं हो सकता है ।
यदि हम ऐसा नहीं करेंगे इन्द्रियों पर विजय नहीं प्राप्त करेंगे तो हम दुष्कृती अर्थात अजितेन्द्रिय होंगे और अजितेन्द्रिय होने पर उसी देव से अभिन्न माया जो सबको अपनी ओर आकर्षित करके संसार चक्र चला रही उसके द्वारा मेरा हरण कर लिया जायेगा और हम एक मात्र प्राण पोषक आसुर भाव को प्राप्त हो जायेंगे― ‘माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः’ ७/१५, तो आसुरी भाव से प्राप्त होने से क्या होगा ? इससे यह होगा कि हमारी प्रत्येक आशा, प्रत्येक कर्म, और व्यर्थ के ज्ञान वाला हो जायेगा अर्थात सब स्वार्थपरता वाला हो जायेगा जिससे हमारी बुद्धि माया द्वारा मोहित होने के कारण नष्ट हो जायेगी, फिर हम वह कहेंगे जो नहीं कहना चाहिए और वह करेंगे जो नहीं करना चाहिए अर्थात वही आसुरी भाव ही हमें राक्षस बना देगा । फिर हम वही करेंगे जो राक्षस परंपरा है― मानहिं मातु पिता नहिं देवा । साधुन ते करवावहिं सेवा ॥ जिन्हके अस आचरन भवानी । तेइ निसिचर जानेहु सब प्रानी ॥ ऐसी स्थिति आ जायेगी जिसका फल क्या होगा ? जो भी होगा इसी अध्याय के उन्नीसवें और बीसवें श्लोक में बता दिया जायेगा ।
अतः इसी पहचान के लिए पीछे सांकेतिक रूप से कहे गये प्रसंग को यहाँ पहचान के लिए कहा जाता है जिससे साधक अपने जीवन को जो त्याज्य है उसे त्याग कर और जो ग्राह्य से उसे ग्रहण करके अपना जीवन सार्थक कर सके । दैवी संपत्ति का कोई लक्षण शेष छूट न जाये इसलिये पीछे विस्तार से कहने के बाद भी पहले तीन श्लोकों में दैवी संपत्ति को आगे करके उत्पन्न होने वाले के लक्षण कहते हैं―
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायतप आर्जवम् ॥१६/१॥
शब्दार्थ— निर्भय, सत्वसंशुद्धि, ज्ञान और योग व्यवस्थित, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता ।
तात्पर्यार्थ—ज्ञानयोगी हो या भक्तियोगी अध्यात्म मार्ग का सबसे पहला लक्षण है निर्भयता । जब तक हमारे अन्दर किसी भी प्रकार का भय शत्रु, सर्प, व्याघ्र, रोग, मृत्यु आदि का होगा तब तक चित्तशुद्धि नहीं हो सकती अतः निर्भय होना । फिर अन्तःकरण की शुद्धि आवश्यक है जो साधन चतुष्टय द्वारा होगी । दूसरी बात, राजस, तामस भाव के कारण क्रमशः विक्षेप और विपरीत बुद्वि अर्थात अनात्म पदार्थ को अपना मानना यही विपरीत बुद्धि है अतः इन दोनो से रहित एक भगवान ही मेरे हैं और मैं भगवान का हूँ इस प्रकार की अनवरत अर्थात निरंतर विक्षेप रहित वृत्ति का होना सत्त्वसंशुद्वि है । ज्ञान अर्थात आत्मा अनात्मा का विवेक ही ज्ञान है एवं इस ज्ञान से निर्णय करके अनात्म पदार्थ का त्याग और आत्मपदार्थ में स्थित होना ही व्यवस्थित होना है । यही व्यवस्थित ज्ञान है । योग यानी ‘समत्त्वं योग उच्यते’ २/४८ मतलब सुख हो, दुःख हो, अथवा अन्य द्वन्द्व हों सभी आगन्तुक हैं, हमारा इनसे कोई संबंध नहीं है इस भाव से द्वन्द्वों में समभाव रहना एवं एक ही परमात्मा को सभी प्राणियों में देखना भी समभाव है इसी का नाम योग है और इसमें दृढतापूर्वक स्थित रहना ही व्यवस्थित योग है । दान का वर्णन आगे आयेगा । यहाँ पर इतना समझना चाहिए कि निरपेक्ष भाव से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से आवश्यकता के अनुसार किसी का सहयोग करना दान है । इन्द्रियों को उनके विषयों में अनुशासन पूर्वक उनका उपभोग करने देना ‘आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति’ २/६३ यही दमन है अर्थात इन्द्रियों को स्वेच्छाचार से रोकना । यज्ञ का वर्णन अध्याय चार में भी भगवान ने किया और तीन में भी । यज्ञ यानी आहुति देना । आहुति वाले आज के समय में सोमादि यज्ञ दुर्लभ हैं अग्निहोत्रादि भी कदाचित ही देखे जाते हैं । आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जिस यज्ञ की आवश्यकता प्राणियों की परस्पर उन्नति के लिए जिस सद्भाव की है, उसका वर्णन अध्याय ३/१० में पंचमहायज्ञ के रूप में कर दिया है वहीं देखना चाहिए । स्वाध्याय का मतलब आत्मा अनात्मा का विवेक कराने वाले श्रुति-शास्त्र का आचार्य परंपरा से पढ़ना । त्रिविध तप का वर्णन आगे आयेगा । कृच्छ्र चान्द्रायण आदि तप तो आज दुर्लभ हैं अतः आगतं स्वागतं कुर्यात गतं न निवारयेत् । यथा प्राप्तं सहेत्सर्वं स तपस्योत्तमोत्तमः ॥ अर्थात सुख हो दुःख हो, रोग हो, स्वास्थ्य हो इत्यादि जितने भी द्वन्द्व आ जायें उन्हें प्रसन्नतापूर्वक जैसे प्राप्त हैं वैसे ही सह लेना उत्तम तप है । क्योंकि आ गये हैं तो सहना तो पड़ेगा ही, स्वागत तो करना ही पड़ेगा, तो फिर रोकर क्यों सहना ? हंसकर सह लेना ही उत्तम तप है अर्थात सहनशीलता ही तप है । आर्जव यानी सरलता, कोई कपट, छल, प्रंपच नहीं । बिल्कुल सहज भाव ।
अथवा इस श्लोक के पूर्वार्ध में सर्वप्रथम जो साध्य होना चाहिए वह बताया है, इस निवृत्ति मार्ग की सबसे पहली साधना है निर्भयता इसीलिये संन्यास में सबसे पहली प्रतिज्ञा करायी जाती है― ‘अभयं सर्वभूतेभ्यः ददाम्येतद्व्रतं मम’ अर्थात मेरा यह व्रत है कि संपूर्ण प्राणियों को निर्भय करता हूँ यह दान ही नहीं महादान है निर्भयता । जब तक हमसे दूसरा निर्भय नहीं हो जाता है तब तक मुझे भी भय रहेगा ही । अतः पहला साध्य है निर्भयता । दूसरा साध्य है बुद्धि का भलीभांति शुद्ध होना, क्योंकि शुद्धबुद्धि ही सत्, असत्, आत्मा अनात्मा का विवेक कर सकेगी तभी वैराग्य प्रबल होगा और जब प्रबल वैराग्य होगा तभी आत्मनिषठा बनेगी । अतः तीसरा साध्य होगा ज्ञानयोग अर्थात आत्मा में भली प्रकार स्थित होना, अपने व्यापक स्वरूप में स्थित होना । ये क्रमशः मुमुक्षु के तीन साध्य हैं ।
इन साध्य के साधनों का इस श्लोक के उत्तरार्ध से लेकर तीसरे श्लोक के पूर्वार्द्ध तक साधन बताये जा रहे हैं जिससे साध्य की प्राप्ति होगी― दम का अर्थ है इन्द्रिय दमन, यज्ञ की व्याख्या अध्याय तीन-चार में कर चुका हूँ, स्वाध्याय का अर्थ श्रुति और आचार्य के उपदेशों का निरंतर मनन करना और तप की व्याख्या अध्याय सत्रह में आयेगी । आर्जवम् का सहजभाव का होना, छोटे अबोध बच्चे की तरह सरलता ॥१॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीचापलम् ॥१६/२॥
शब्दार्थ— अहिंसा, सत्य, क्रोध रहित, त्याग, शान्ति, चुगुली न करना, प्राणियों पर दया, अलोलुपता, कोमलता, लज्जा, चंचलता रहित ।
तात्पर्यार्थ— अहिंसा— शरीर वाणी और मन से कुछ ऐसा न करना जिससे किसी को अनावश्यक दुःख या कष्ट हो ।
सत्य— ‘सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’ संसार मिथ्या है सत्य एक मात्र परमात्मा है । अतः तन मन और वाणी से उसी का चिन्तन करना, उसी के लिए बोलना और यात्रा भी स्वाध्याय तीर्थ के रूप में उसी की करना ।
अक्रोध— मुमुक्षु का जीवन ही तितिक्षा के लिए है अतः कोई कुछ क्षति पहुंचाने के लिए विरुद्धाचरण करता है तो उसके विरुद्ध जो वृत्ति बनती है वह क्रोध है और उस वृत्ति का उदय न होना अक्रोध है ।
त्याग— संसार में त्यागने योग्य एक अनात्म पदार्थ ही है उसी का त्याग वास्तविक त्याग है ।
शान्ति— विषयों के प्रति मन का पूर्णतः उपराम हो जाना आन्तरिक शान्ति है ।
अपैशुन— दूसरों के दोष न देखना और न कहना ।
प्राणियों पर दया— दूसरों का क्लेश को देखकर निरपेक्षभाव से जो सहयोग करने की वृत्ति है वह और और सहयोग करना ये प्राणियों पर दया है । प्राणी मतलब वृक्ष, चीटी, पक्षी, पशु सहित । उन पर दया करना ।
लोलुपता— लबरापन, यह भी हो जाय व अन्य भी हो जाये, यह भी मिल जाये वह भी मिल जाये । इस प्रकार मन का विषयों के प्रति आकर्षित होना ।
कोमलता अर्थात विनम्रता— अपने गुण ज्ञान के कारण अहंकार का न होना विद्या विनय सम्पन्ने ५/१८ ।
लज्जा— कर्तव्य कर्म सामर्थ्य होने पर भी न कर पाने में होने वाला संकोच । अथवा अशास्त्रीय एवं लोकमर्यादा के विरुद्ध आरचण में संकोच ।
चंचलता रहित— बिना प्रयोजन व्यर्थ प्रलापों में समय नष्ट न करना ॥२॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानितः ।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥१६/३॥
शब्दार्थ— तेज, क्षमा, धृति, शौच, द्रोह न करना, अपने प्रति अधिक सम्मान की इच्छा न रखना, हे भारत ! ये सभी लक्षण दैवीसम्पत्ति में उत्पन्न होते हैं ।
तात्पर्यार्थ— तेज— किसी ऐसे व्यक्ति जिसके सामने पड़ जाने मात्र से किसी गलत कार्य के करने से रुक जाये वह प्रभाव । अथवा बुद्धि का अत्यंत सूक्ष्म और तात्विक विचार तेज है ।
क्षमा— अपना अपराक्ष करने वाले को प्रतिकार करने की सामर्थ्य होने पर भी क्षमा कर देना ।
धृति— त्रिविध धृति का वर्णन अध्याय १८ में आयेगा उसमें से श्लोक तैंतीस वाली । किसी भी परिस्थिति में धैर्य बनाये रखना ही धृति है ।
शौच— बाहर से मिट्टी आदि पवित्रता और अंंदर से कपट रहित होना ही पवित्रता का होना।
द्रोह न करना— किसी ने गलत किया तो वह भुगतेगा हम क्यों दण्डित करें या करायें अथवा जिसे जो करना है करे हमें क्या करना इस प्रकार विरोध न करना ।
अतिमानी न होना— मान यानी प्रतिष्ठा का अधिक न होना । इसका मतलब जो हमारा सामान्य अधिकार है उसी दायरे में रहना ।
हे भारत ! ये सभी दैवीसम्पत्ति में उत्पन्न होने वाले लक्षण हैं । यहाँ दैवी का मतलब है जो देव अर्थात परमात्मा को प्राप्त करायें वे दैवी लक्षण । ये साधक के लिए अनुष्ठान करने के लिए हैं, इनका मुमुक्षु को अनुष्ठान करना चाहिए । जबकि परमतत्त्व को प्राप्त सिद्ध में ये स्वाभाविक होते हैं । ऐसा तात्पर्य है ।
शंका— पहले अक्रोध दिया और फिर क्षमा दिया तो बात एक ही हो गई । क्रोध नहीं आया तो क्षमा स्वतः हो गई, क्षमा कर दिया तो क्रोध स्वतः नहीं होगा तो फिर अलग अलग देने की क्या आवश्यकता थी ?
समाधान— क्रोध में मात्र अपनी ओर दृष्टि रहती है सावधानी रहती है कि कहीं क्रोध न आ जाये और क्षमा में अपराधी पर दृष्टि रहती है कि कहीं मेरे कारण उसे कोई दंडित न कर दे या दंड न मिल जाये यही दोनो में अन्तर है ।
अथवा अतिमानितः का अर्थ यह है कि इस प्रकार रहे कि जो कार्य करे उसमें कोई मेरी प्रशंसा करे यह भाव नहीं होना चाहिए, यदि कोई प्रशंसा करता है तो उसमें संकोच होना चाहिए । इसलिये कहा कि अधिक सम्मान की इच्छा न करे क्योंकि व्यक्ति का यदि निरंतर अपमान होता रहे तो व जी भी नहीं सकेगा, शीघ्र चिन्ता से ही मर जायेगा अथवा आत्महत्या कर लेगा, इसलिये अतिमानी नहीं होना चाहिए यह साधक को विशेष ध्यान रखना चाहिए । ये सभी लक्षण जिनको मोक्ष प्राप्त होना होता है उनमें जन्म से होते हैं शेष मोक्षार्थियों को उनका अनुष्ठान करना चाहिए यह भाव है ॥३॥
संबंध— दैवी संपत्ति के बाद अब संक्षेप से आसुरी संपत्ति का वर्णन—
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥१६/४॥
शब्दार्थ— दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, और कठोरता एवं अज्ञान हे पृथानन्दन ! ये आसुरी संपत्ति वाले में उत्पन्न होते हैं ।
तात्पर्यार्थ— दम्भ यानी दिखावा करना, लोक में सम्मान की प्राप्ति के अनुकूल न हो पर भी मान बड़ाई के लिए करना, एवं पारमार्थ में भी धार्मिक न होने पर भी धर्मध्वजी बनना । दर्प धन बल आदि का घमंड, अपने सामने सबको तुच्छ समझना । अभिमान यानी जनबल, धनबल द्वारा स्वयं को सबका स्वामी समझने और दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति । क्रोध यानी अन्दर से दूसरों के प्रति जलन की प्रवृत्ति । पारूष्य यानी कठोरता— पारूष्य का अर्थ यद्यपि कठोरता है तो भी पहले क्रोध का वर्णन किया गया है अतः उस क्रोध के कारण जो दूसरो को ठेस पहुचा सकें ऐसी कड़वी और अमर्यादित वाणी बोलना जो शिष्टजनों का अपमान करे ऐसा । अज्ञान अर्थात वस्तु सत्य का विवेक न होना, कुछ भी करने के लिए बिना परिणाम देखे उद्यत हो जाना बल्कि च शब्द का समुच्चय करने पर बिना परिणाम पर विचार किये वह सब कर ही डालना ।
इन सभी लक्षणों का विस्तार इसी अध्याय में आगे होगा मात्र यहां सामान्य रूप से छः लक्षण दिये गये हैं देवी संपत्ति के ठीक विरुद्ध जो हों वे सभी आसुरी संपत्ति के लक्षण हैं । ऐसा समझना चाहिए ॥४॥
संबंध–– दोनो संपत्तियों का कार्य और अर्जुन को आश्वासन……
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥१६/५॥
शब्दार्थ— दैवीसम्पत्ति संसार बंधन से मोक्ष एवं आसुरी संपत्ति बन्धन के लिए मानी गई है । हे पाण्डव ! तुम दैवीसम्पत्ति को लेकर उत्पन्न हुए हो अतः शोक मत करो ।
तात्पर्यार्थ— दैवीसम्पत्ति संपत्ति से ज्ञान को प्राप्त जन्म मृत्यु से छूटने के लिए है और आसुरी संपत्ति से जन्म मरण रूप बंधन । अध्याय दो और नौ एवं अन्यत्र जहाँ कही भी कामनाओं को लेकर, एवं भेद दृष्टि से उपासना कही गई है वह भी रजोगुण और तमोगुण प्रधान होने के कारण ही राक्षसी और आसुरी संपत्ति समझना चाहिए ।
अर्जुन को अपने श्रेय प्राप्ति अर्थात मोक्ष की अधिक चिन्ता है । इसीलिए वह अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहता है वह दैवीसम्पत्ति से सम्पन्न है तभी प्रमाद से भी यदि कोई अशास्त्रीय और कर्तव्य विमुख कर्म की संभावना भी लगती है तो वह विचलित हो जाता है और कहता है ‘अहो बत महत्पापं’ १/४५ और श्रेय प्राप्ति के लिए कहता है “यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे २/७, तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ३/२, यच्छ्रेयः एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्” ५/१ इतनी चिन्ता अर्जुन को है । जब दैवीसम्पत्ति को मोक्ष और आसुरी संपत्ति को बंधन का हेतु बताया तो संभवतः अर्जुन विचलित हो गये कि मैं दैवीसम्पत्ति वाला हूँ या नहीं, उसी के लिए कहा मा शुचः तुम शोक मत करो तुम दैवीसम्पत्ति को लेकर ही उत्पन्न हुए हो ।
अथवा जो संसार बंधन से मुक्त करे वह दैवी संपत्ति ग्राह्य है और जो बंधन करे वह आसुरी माया त्याज्य है । अर्जुन के बहाने कृष्ण मुमुक्षुओं को संदेश देते हैं कि जिनका संबंध मुझ सर्वात्मा से हो गया है वे दैवी संपत्ति वाले ही हैं, अतः उन्हें शोक बिल्कुल नहीं करना चाहिए । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए ही १८/६६ में शोक न करने की बात कहते हैं । यह इसका भाव है ॥५॥
संबंध— आसुरी संपत्ति का विस्तार से वर्णन……
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु ॥१६/६॥
शब्दार्थ— हे पार्थ ! संसार में दैव और आसुर नाम की दो संपत्तियां हैं उनमें दैवीसम्पत्ति का विस्तार कह चुका हूं और आसुरी संपत्ति को सुनो ।
तात्पर्यार्थ— दैवीसम्पत्ति का विस्तार अध्याय दो में स्थित प्रज्ञ के लक्षण, अध्याय छः में श्लोक सात से नौ तक समत्व भाव में स्थित समता सिद्ध अर्थात स्थितप्रज्ञ के लक्षण, अध्याय बारह में ज्ञानीभक्त के लक्षण, अध्याय तेरह में ज्ञान नाम से, अध्याय चौदह में त्रिगुणातीत के लक्षण, और यहाँ ढाई श्लोकों में किया । ये दैवी संपत्ति भगवान की विभूतियां हैं देखिए अध्याय १०/४-५ अब आसुरी संपत्ति का विस्तार करने को उद्यत हुए हैं । अतः अर्जुन को सावधान करने के लिए कहते हैं सुनो अर्थात ध्यान से सुनो मन की वृत्ति को एकाग्र करके । क्योंकि जो ध्यान से सुना जायेगा उसी पर उचित अनुचित विचार करके संग्रह या त्याग किया जायेगा तदनुसार आचरण किया जायेगा । ऐसा तात्पर्य है ॥६॥
संबंध— यहाँ से लेकर उन्नीसवें श्लोक तक आसुरी संपत्ति का वर्णन……
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥१५/७॥
शब्दार्थ— असुर लोग प्रवृत्ति, निवृत्ति, भी नहीं जानते । पवित्रता, आचार, और सत्य उनमें नहीं होता
तात्पर्यार्थ— प्रवृत्ति अर्थात कर्तव्य क्या होता है यह भी नहीं जानते अर्थात क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए यह भी नहीं जानते । निवृत्ति अर्थात किस कर्म को त्यागना चाहिए किसे नहीं यह भी नहीं जानते । अवथा शास्त्रीय कर्म क्या होता है ? उसमें कैसे प्रवृत्त होना यह भी नहीं जानते और संसार से कैसे निवृत्त अर्थात मोक्ष का मार्ग क्या है यह भी नहीं जानते । उनमें बाहर की भी पवित्रता नहीं होती बिना स्नान, बिना हाथ पांव धोये, किसी के भी साथ एक ही थाली में खा लेना इत्यादि बाहर की भी पवित्रता नहीं होती और अन्दर में राग, द्वेष काम क्रोध आदि के कारण मन यानी आन्तरिक पवित्रता भी नहीं होती । शिश्नोदर पोषण ही जिनका लक्ष्य है वे न तो इन्द्रिय निग्रह जानते हैं और न ही बड़े बुजुर्गों, साधु संत माता पिता का सम्मान ही करते हैं अर्थात सदाचार क्या होता यह भी नहीं जानते, मिथ्या भाषण ही उनका एक मात्र लक्ष्य होता है अर्थात पवित्रता, सदाचार एवं सत्य तो उनमें दूर दूर तक नहीं दिखता । वस्तुतः एक मात्र जगत का अधिष्ठान ही सत्य बाकी सब असत्य । यह ज्ञान मुमुक्षु के अतिरिक्त किसी को भी नहीं होता । ऐसा भाव है ॥७॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥१६/८॥
शब्दार्थ— वे असुर कहते हैं कि जगत असत्य है, इसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है, परस्पर स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है, इसका भी निमित्त काम है इसके अतिरिक्त और कोई कारण क्या हो सकता है ?
तात्पर्यार्थ— असुरों का कथन है कि जगत को असत्य कहने का मतलब है कि इसका कोई वास्तविक सत्य आधार नहीं है अर्थात क्षणिक है । प्रतिष्ठा का मतलब कोई यज्ञ, दान तप आदि वैदिक मर्यादा नहीं है, यह सब झूठ है, लोगों को बहकाना या भ्रमित करना है । वे कर्म फलदाता भी ईश्वर को नहीं मानते, वे कहते हैं ईश्वर नाम की कोई चीज होती ही नहीं है । वे वेदादि को भी प्रमाण नहीं मानते, और इस जगत की उत्पत्ति स्त्री-पुरुष के संसर्ग से हुई है । उसमें भी निमित्त काम ही है । यहाँ नास्तिकों का कहना है कि स्त्री-पुरुष ने संसर्ग जगत की उत्पत्ति के लिए किया बात ऐसी नहीं है बल्कि उन्होंने अपनी काम तृप्ति के लिए परस्पर संसर्ग किया और संसार उत्पन्न हो गया । एक प्रत्यक्ष घटना है कि एक बार एक बाप-बेटे परस्पर झगड़ा कर रहे थे । बाप ने क्रुद्ध होकर कहा कि तुमको इसी दिन के लिए पैदा किया था ? बेटे ने उत्तर दिया– तुमने हमको कब पैदा किया, तुम तो मजे मारते थे तुम्हारे मजा मारने में हम पैदा हो गये, तुमने पैदा नहीं किया । कहने का अर्थ है स्त्री-पुरुष का अपनी काम तृप्ति के लिए किया गया संसर्ग ही जगत का हेतु है अन्य कारण क्या हो सकता है ? अर्थात कोई भी नहीं । ऐसा तात्पर्य है ॥८॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥१६/९॥
शब्दार्थ— इस प्रकार की दृष्टि का आश्रय लेने के कारण जिनका विवेक नष्ट हो गया है वे अल्पबुद्धि जगत का अहित करने वाले अपने उग्र कर्मों द्वारा संसार का नाश करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं ।
तात्पर्यार्थ— इस प्रकार अर्थात पूर्व श्लोक में कहे गये अनीश्वरवादी वैदिक प्रमाणों की अनदेखी करने वालों की आत्मा अर्थात विवेक नष्ट हो गया है, वे यह भी नहीं जानते कि शरीर से भिन्न भी कोई चैतन्य सत्ता है ऐसा जिनका विवेक है वे नष्टात्मा और अल्पबुद्धि हैं । मतलब सांसारिक कार्यों में तो उनकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म है, किन्तु परमार्थ विषयक कर्तव्य अकर्तव्य आदि का ज्ञान न होना ही कम या मंदबुद्धि है । ऐसे मनुष्यों के सभी कर्म चोरी, डकैती, हिंसा यानी हत्या मांस, मदिरा सहित जिससे समाज और शिष्टजन पीडित हों वैसे ही उग्र अर्थात भय देने वाले और शास्त्र विरुद्ध कर्म करने वाले होते हैं, वे केवल संसार अर्थात वैदिक मर्यादा, शिष्टजनों का अपमान या नाश जिस किसी भी प्रकार से हो सके ऐसे अहितकर कर्म करने और संसार का नाश करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं ॥९॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्ग्रहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१६/१०॥
शब्दार्थ– कभी पूरे न होने वाले काम का आश्रय लेकर दम्भ, अहंकार, घमंड में भरकर मोह के कारण अपवित्र व्रत करने वाले असत् का व्रत लेकर दुराग्रह पूर्वक विचरण करते हैं ।
तात्पर्यार्थ– कभी पूरे न होने वाले काम–– महाशनो ३/३७ अर्थात बहुत खाने वाले हैं । दुष्पूरेणानलेन च ३/३९ जैसे अग्नि को काष्ठ पूरा नहीं किया जा सकता है वैसे काम की पूर्ति नहीं की जा सकती है वही यहां कहा दुष्पूरं । चूंंकि इनकी पूर्ति कभी होती नहीं है इसलिये महापाप्मा ३/३७ इनकी पूर्ति के लिए पाप भी करना पड़ता है, गौशालाएं जला देना, हत्या कर देना, लूटपाट करना, ब्राह्मणों और संतो को परेशान करना आदि जितने नरक को ले जाने वाले मार्ग हैं उनका आचरण करना यही अपवित्र व्रत है इन असुरों का । कामनाओं की पूर्ति के लिए सत्स्वरूप आत्मानुसंधान न करके जिनकी अपनी कोई सत्ता नहीं है ऐसे असत् रूप भूत, फिशाच आदि की उपासना करके दंभ, अहंकार, और घमंड में भरकर विचरण करते रहते हैं ॥१०॥
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥१६/११॥
शब्दार्थ– मृत्युपर्यन्त अनन्त चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले और शिश्नोदर ही जिनका परम उद्देश्य है यह बस इतना ही इस प्रकार का निश्चय वाले होते हैं ।
तात्पर्यार्थ– जब तक अन्तिम श्वास भी टूट न जाये ऐसा मृत्यु पर्यन्त यही चिंता रहती है मेरा बेटा निकम्मा है ? मेरे मरने के बाद इसका क्या होगा ? अभी ये, अभी वो इत्यादि करना है, पोते के पोते का मुंह देख लूं इत्यादि मृत्यु पर्यन्त इतनी चिन्ताएं होती हैं जिनकी कोई गणना नहीं हो सकती है । वे मूढ यह भी नहीं जानते कि मरना तो निश्चित है तो अब मरते समय तो मोह छोड़कर मर तो निश्चिन्त लें । इतना ही नहीं वे वेद शास्त्र को प्रमाण न मानना वाले नास्तिक आसुरी स्वभाव वाले तो बस शिश्नोदर के आधीन होकर उनके विषयों का संग्रह और कूकर सूकर की तरह भोग को ही परम पुरुषार्थ मानते हैं । करीब बीस २० साल पहले की घटना है एक ६५ साल के बुजुर्ग पुरुष और ६० साल की महिला ने, पुत्र-बहू से छिपकर भागकर कोर्ट मैरिज यानी न्यायालय प्रमाण से विवाह किया, ये हैं शिश्न परायण असुर शिश्न की तृप्ति को ही सर्वोपरि मानने वाले । पेट जिससे भर जाये वही उनका धर्म होता है मात पिता बालकन्हिं बोलाहिं । उदर भरैं सोइ धर्म सिखावहिं ॥ एक मात्र धर्म पेट भरना । शिश्नोदर पर जमपुर त्रास न । लिंग और पेट के निमित्त कर्म करने में यमराज का भी भय नहीं होता । अरे संसार में इससे बढ़कर और कोई पुरुषार्थ है ही नहीं, ऐसा कहते हैं और ऐसा ही इन असुरों का निश्चय भी होता है ।
यहां दूसरा भाव यह भी होगा कि काम और उसका उपभोग ही सब कुछ है ऐसा जो कहतें वे और असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले अन्त मे प्रलय होने पर यानी प्रलय को प्राप्त होकर पुनः सृष्टि संरचना काल में वृक्ष, पशु, पक्षी, सर्प आदि मूढ योनि को प्राप्त होते हैं इतना आगे कहा जाने वाला १६/१९-२० संकेत है । यहां पर चिन्ता का अर्थ परमार्थ चिंतन कदापि नहीं हो सकता है क्योंकि यह दैवीसम्पत्ति है, जबकि प्रस्तुत प्रसंग आसुरी संपत्ति का है ॥११॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थान्मन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१६/१२॥
शब्दार्थ– आशा के सैकड़ों फंदों में बंधे हुए काम क्रोध के आधीन कामनाओं की पूर्ति के लिए अन्याय मार्ग से भी धन संग्रह करने का प्रयत्न करते हैं ।
तात्पर्यार्थ– शिश्नोदर ही जिनका लक्ष्य है ऐसे लोग अपनी कामना पूर्ति में बाधा आने पर क्रोध में भी तत्पर रहते हैं और क्रोध में आकर धन से लेकर जीवन तक कोई भी क्षति पहुंचा देते हैं । ये अन्याय मार्ग से भी काम और उदर पूर्ति के लिए प्रयत्न करते हैं । जैसे बलात्कार ये काम संबंधित शिश्न के सुख के ही अन्याय करते हैं और भय वश अपनी वासना पूर्ति के पश्चात हत्या भी कर देते हैं । इसी प्रकार धन आये चाहे सरकारी घोटाले से या चाहे किसी का गला काटने से मिले, वे राक्षस सभी प्रयत्न करते हैं ॥१२॥
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१६/१३॥
संबंध— इस मनोरथ को तो आज मैने प्राप्त कर लिया पुत्र-पौत्रादि सहित और यह मनोरथ भविष्य में प्राप्त कर लूंगा । यह धन आज मेरे पास है और इतना धन भविष्य में और भी प्राप्त कर लूँगा ।
तात्पर्यार्थ– यहाँ लोभ की चरमसीमा बतायी गई है एवं ये असुर नास्तिक अनीश्वर वादी होते हैं अतः ये प्रारब्ध को भी नहीं मानते कि फलदाता कोई प्रारब्ध भी होता है, अतः स्वयं पर ही सब अध्यारोप करके अहंकार करते हैं कि यह सब मेरे पुरुषार्थ से ही प्राप्त हुआ है ॥१३॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१६/१४॥
शब्दार्थ– वह मेरा शत्रु था सो तो मेरे द्वारा मारा गया और वह जो बचा है उसको भी मार डालूंगा । क्योंकि मैं समर्थ हूँ, इसलिये भोगो या धन पर मेरा ही अधिकार है । मैं ही सिद्ध हूँ, मैं ही बलवान होने के कारण सुखी हूँ ।
तात्पर्यार्थ– श्लोक १२ में अन्यायेन आया था । मतलब धन संचय में अन्याय को दोष नहीं मानते क्यों नहीं मानते ? यह बताते हैं कि मैं ईश्वर अर्थात नियन्ता हूँ । पहले तो मैं कहता हूँ समझाता हूँ तुम अपनी अमुक संपत्ति हमें दे दो अगर नहीं दिया तो फिर मैं सिद्ध हूँ । मतलब मैं जनबल और धनबल से भी चतुर्दिक् संपन्न हूँ । बदले में कुछ देकर मनाता हूँ । फिर भी नहीं माने तो मैं बलवान हूँ । देखो वह देवदत्त नहीं माना तो उसको मार डाला और वह यज्ञदत्त नहीं मान रहा है उसे मार डालूंगा । क्योंकि सब प्रकार संपन्न, बलावान होने के कारण मैं ही भोगी अर्थात प्रत्येक सुन्दर वस्तु– वह चाहे स्त्री हो, रत्नादि हों, पशु आदि हों जो कुछ भी कीमती और सुन्दर वस्तु है उसे भोगने का एक मात्र मेरा अधिकार है ऐसा आसुरी बल्कि यहाँ हिंसा प्रधान होने से राक्षसी भाव है ॥१४॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१६/१५॥
शब्दार्थ– मैं धनवान एवं कुलीन हूँ । मेरे समान और दूसरा कौन है ? यज्ञ करूँगा, दान दूंगा, प्रसन्न रहूंगा इस प्रकार अज्ञान से मोहित होते रहते हैं ।
तात्पर्यार्थ– पूर्व श्लोक में ईश्वर, सिद्ध और बलावान ये तीन शब्द आये थे जिसमें ईश्वर यानी नियन्ता और बलावान का विवरण पूर्व श्लोक में दिया जा चुका है और ईश्वर यानी सामर्थ्य और सिद्ध यानी चतुर्दिक् संपन्नता का यहाँ विवरण दिया जा रहा है–
यहाँ पर आढ्यः का अर्थ धन सर्वमान्य है किन्तु अभिजनवानः में नाम मात्र का मतभेद इस प्रकार है एक पक्ष बड़े परिवार यानी जनबल अर्थ करता है, दूसरा पक्ष कुलीन मानता है, तो तीसरा पक्ष अंगों सहित वेद का ज्ञान रखने वाला, जबकि चौथा पक्ष कुलीन और वेदज्ञाता दोनो मानता है । इसमें दूसरा पक्ष मानने से तीसरा और चौथा पक्ष अपने आप हो जाता है जाता है । श्लोक चार में आसुरी संपत्ति के छः लक्षण बताए गये थे जिनमें क्रोध, पारुष्य, और अज्ञान का अब तक कथन किया गया । चूंंकि यहां यज्ञ और दान का प्रसंग उपस्थित है इसलिये दंभ, दर्प, अभिमान इन तीनो के सहित वर्णन किया जा रहा है । अज्ञान यहाँ भी रहेगा । हालांकि सभी लक्षण सबमें ह़ै तथापि प्रधानता की दृष्टि से कहा । यहाँ पर यज्ञ का विवरण होने से पूर्व प्रसंग का बल सार्थक नहीं । और कुलीन होने से भी यज्ञादि का ज्ञान रखने वाला वेद ज्ञाता और वेद ज्ञाता होने से आज के परिप्रेक्ष में कुलीन भी सिद्ध नहीं होता । तथापि कुलीन मानने से लौकिन जो पैतृक संस्कार हैं उनके कारण वेदज्ञाता स्वतः सिद्ध मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
ऐसा चतुर्दिक् संपन्न व्यक्ति अहंकार, घमंड में भर कर जो यज्ञ और दान करता है वह दंभ यानी मात्र दिखावे के लिए और हमको लोग धर्मात्मा समझेंगे, प्रशंसा करेंगे इस लिए करता है । दान जरूतमंद को न देकर नट भाट आदि जो उसके प्रशंसक हैं उनको देता है । वह सोचता है ऐसा करते हुए मैं प्रसन्न रहूँगा । कोई ईश्वर आदि तो है नहीं लेकिन इस लोग मेरे प्रति धर्मात्मा समझेंगे, मेरी प्रतिष्ठा बढेगी और प्रशंसा होगी एवं जीवन आनन्द से कटेगा और जीवन में रखा ही क्या है ? इत्यादि ॥१५॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६/१६॥
शब्दार्थ– इस प्रकार मोह जाल में फंसा हुआ अनेक प्रकार से भलीभाँति भ्रमित चित्त वाला शिश्नोदर में संलिप्त होकर अपवित्र नरक में गिरता है ।
तात्पर्यार्थ– यहाँ मोह की महिमा का वर्णन है जिसके कारण मन स्थिर नहीं होता कामनाओं की पूर्ति में उपरोक्त कर्म कर बैठते हैं जिसके कारण अपवित्र नरक में जा गिरते हैं । नरक भी कोई पवित्र होता है क्या ? यद्यपि मल, मूत्र, रक्त, अस्थि, मज्जा, नाक, थूक आदि से भरे नरको का वर्णन आता है तथा इसी अध्याय में भगवान कहेंगे कि ऐसे मुझसे द्वेष करने वालों को मूढ योनि में डालता हूँ जैसे – विष्ठा का कीड़ा, गटर का कीड़ा, गोबर, मल मूत्र का कीड़ा । सर्प विच्छू आदि ये भी तो अपवित्र नरक ही हैं ॥१६॥
संबंध– यज्ञ करने वाला नरक क्यों जायेगा ? इस पर कारण विधि का न होना बताते हैैं……
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१६/१७॥
शब्दार्थ– अपने आप में मोहित, अकड़ रखने वाला, धन, गुण के अहंकार एवं मद से चूर, नाम के लिए, दंभ के लिए बिना किसी विधि के यज्ञ करते हैं ।
तात्पर्यार्थ– अपने आप में मोहित का मतलब, धन, गुण, बल आदि में अहंकार रखकर अपने को ही सर्वाधिक प्रतिष्ठित व्यक्ति मानना और इसी कारण से विनम्रता का अभाव यानी अकड़ू स्वभाव किसी साधु संत को भी प्रणाम न करने वाला, अधिक धन की संपन्नता के कार अहंकार एवं घमंड से भरपूर होकर नाम कमाने यानी अपनी प्रशंसा के निमित्त बिना किसी वैदिक विधि के ही दिखावे मात्र के लिए यज्ञ करते हैं । न मंत्र शुद्ध, न वस्तु, कोई चीज है, कोई है ही नहीं, चलो काम चलेगा इस प्रकार की क्रिया और भाव शास्त्र निषिद्ध है । इसीलिए आगे १६/२४ में शास्त्र प्रमाण की बात कहेंगे ।
विशेष– जहाँ कहीं भी दिखावा है वहां वहां दंभ है और यह दंभ ही पतन का हेतु है न कि यज्ञ ॥१७॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१६/१८॥
शब्दार्थ– अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध के आधीन रहने वाले वे लोग अपने और दूसरे शरीरों में स्थित मुझे आत्मस्वरूप से द्वेष करते हैं ।
तात्पर्यार्थ– मूल में आया है ‘माम् आत्म परदेहेषु’ । यहां पर माम् का अर्थ तो प्रत्यागात्मा ब्रह्म ही है, आत्म अर्थात वह ईश्वर को तो मानता नहीं क्योंकि अहंकार आदि से परिपूर्ण और वेदों को प्रमाण मानता नहीं है अब बचता है परदेषु यहां पर दूसरे के शरीर में स्थित मुझ सर्वात्मा में द्वेष करता है देखता है, अर्थात यहाँ पर माम् अर्थात मुझमें परदेषु अर्थात दूसरे शरीर में स्थित आत्मा अर्थात प्रत्यागात्मा से द्वेष करने वाले, इस प्रकार का अर्थ बनता है । मतलब यह कि मैं प्रत्यागात्मा ही सभी शरीरों में हूँ इसलिए जो दूसरे से द्वेष करता है वह स्वयं से भी द्वेष करता है । दूसरे के शरीर में जो उसे मैं जीवरूप में स्थित मुझसे द्वेष करता है, साथ ही दूसरों से द्वेष करने के कारण स्वयं उसका भी विनाश हो जाता है भेद दृष्टि के कारण यह न जानने के कारण वह स्वयं से ही द्वेष करने वाला है, क्योंकि– ‘अवजान्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजान्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥९/११॥’ ऐसे मूढ लोग संपूर्ण प्राणियों के ईश्वरों का भी ईश्वर मुझ परमभाव अर्थात व्यापक एक, अद्वय, सच्चिदानन्दघन सर्वात्मा को वे नहीं जानते । वे जानते हैं कि सभी शरीरों में आत्मरूप से स्थित साधारण जीव रूप मनुष्य आदि हूँ ।
इसी न्याय से यहाँ ईश्वर में अलग से दोष देखने का कोई प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि ईश्वर को मानने वाला ईश्वर में दोष क्यों देखेगा ? और द्वेष करके क्या मिलेगा ? लेकिन एक मात्र सच्चिदानन्दघन परमेश्वर व्यापक परमतत्त्व ही सभी शरीरों मे जीव (आत्मा) रूप से है, ऐसी जीव और ईश्वर की अभिन्नता का प्रतिपादन करके द्वैतवादियों के गाल पर मीठी चपत लगाकर सावधान भी कर रहे हैं । अतः वह ईश्वर से नहीं प्राणियों के रूप में द्वेष या द्रोह करता है । तुलसीदास जी कहते हैं– भूतद्रोह तिष्ठइ नहिं कोई । अर्थात प्राणियों में स्वयं परमात्मा है अतः उस रूप में परमात्मा से द्रोह करके कोई शान्ति नहीं पा सकता । ऐसे लोग ही ‘राक्षसीमासुरीं चैव मोहिनीं प्रकृतिं श्रिताः’ ९/१२ ये राक्षस और असुर हैं, ये दंड के अधिकारी हैं । दंड विधान अगले श्लोक में ।
भावार्थ— अहंकार का मतलब आता-जाता कुछ नहीं और बात बात में ‘मैं मैं’ करने की आदत, काम का मतलब स्त्री विषयक काम, सभी प्राणियों में ही आत्म रूप से रहता हूँ इस बात से अनभिज्ञ दूसरों को अनावश्यक पीड़ा देना और भगवान की गीता आदि उपदेश के विरुद्ध ही भगवान से द्वेष करना है, सद्मार्ग में प्रृवृत्ति साधु सन्तो में जो हैं ही नहीं, ऐसे दोषों को आरोपित करना ऐसे दोषों का अनुसंधान करने वाले मुझ प्रत्यगात्मा से ही द्वेष करते हैं ॥१८॥
संबंध– अध्याय ७/१५ में ‘आसुरं भावमाश्रिताः’ एवं अध्याय ९/१२ में ‘राक्षसीमासुरीं चैव’ से जो कहना चाहते थे उसी व्याख्या श्लोक ७ से श्लोक १८ तक पूर्ण हुई । अब दो श्लोकों में ऐसे लोगों के लिए दंड विधान करते हैं……
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥१६/१९॥
शब्दार्थ– उन मुझसे द्वेष करने वाले इस संसार के मनुष्यों में सबसे नीच और क्रूर– पीछे इनकी हिंसा और अन्याय आदि बता चुके हैं ऐसे स्वाभाव वालों के अशुभ यानी जिसे देखने से भी मन में ग्लानि उत्पन्न हो जाये ऐसी अशुभ आसुरी अर्थात कूकर शूकर आदि योनियों में निरंतर डालता रहता हूँ ।
तात्पर्यार्थ— आगे त्रिविध नरक का वर्णन आ रहा और यहाँ अशुभ योनियों में डालने की बात कहा है । इसका मतलब यह हुआ कि वे ऐसी पापकर्मा योनियों को प्राप्त होते हैं जहाँ जाकर जन्म से ही पाप करें और नरक जायें, वहां से निकलें फिर ऐसी ही योनि में जाकर नरक जायें और इस प्रकार यहाँ पर कहे गये अजस्र का तात्पर्य निरंतरता बनी ही रहती है कभी समाप्त न होने वाली इस अशुभ निरंतरता को प्राप्त होते हैं यही बात बातने के लिए ‘अजस्रमशुभान्’ पद दिया गया है । तात्पर्य यह है कि नरक प्राप्ति मार्ग रूप योनियों को प्राप्त होते रहते हैं ॥१९॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्रप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥१६/२०॥
शब्दार्थ– ऐसे मूढ जन्म जन्मांतर आसुरी योनि को प्राप्त करते हैं । वे पुनः वेदमार्ग को न पाकर उससे भी नीच गति को प्राप्त करते हैं ।
तात्पर्यार्थ– ‘न हिनस्यात्मनात्मानं’ १३/२८ अर्थात तो अपनी हत्या स्वयं नहीं करता । वही यहाँ पूर्व प्रसंग में दिया गया है कि संपूर्ण प्राणियों में एक मात्र प्रत्यागात्मा ब्रह्म ही जीव रूप में स्थित है अतः जो उस जीव से द्रोह करता है वह ईश्वर से द्रोह करता है और जो ईश्वर से द्रोह करता है वह स्वयं से द्रोह करता है । ऐसा स्वयं से स्वयं को नाश करने वाला आत्महत्यारा संसार का ऐसा कौन सा पाप है जो नहीं किया ? अर्थात वह सभी पाप कर चुका है, तो भोग भी उसी के अनुसार मिलेगा । उसी का यहाँ विश्लेषण किया जा रहा है–– ऐसे नराधम मूढ मुझ प्रत्यागात्मा ईश्वर से द्वेष करने वाले बारंबार आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं । चूंंकि वे न वेद प्रमाण मानते और न ही मुझ ईश्वर को, इसलिए उन अधम योनियों में मुझे तो पा ही नहीं सकते किन्तु ऐसे अधम योनि में महापुरुषों की प्राप्ति के अभाव में वैदिक मार्ग भी उनके उद्धार हेतु प्राप्त नहीं होता और वे पुनः उससे भी अधम से अधम योनि को निरन्तर प्राप्त होते हैं । अर्थात उनका कभी उद्धार नहीं हो सकता ।
उन अधम योनियों में, श्रुति, शास्त्र, आचार्य, साधन चतुष्टय का अभाव होने से भगवान की प्राप्ति हो नहीं सकती तो जिस पहले अधम योनि में थे वे उससे भी अधम योनि को प्राप्त होते हैं, जैसे पहले कोई हिंसक मनुष्य था तो उसमें भी क्रमशः निम्न से निम्न योनियों को, शेर गीदड़ आदि पशु, तो गिद्ध चील आदि पशु, सर्प बिच्छू, आदि योनियों के क्रम से निम्न से योनियों जाते रहते हैं । उनकी कभी मुक्ति नहीं होती ।
भावार्थ― परमात्मा ही सर्वात्मा है उसे आत्म रूप से न जानना ही आत्महत्या है इसी दृष्टिकोण को लेकर कहा था कि ‘न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्’ १३/२८ अर्थात जो अपनी आत्महत्या नहीं कर लेता है वह संपूर्ण प्राणियों में सर्वत्र समान रूप से स्थित मुझ परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से देखता है, इसके पश्चात वह परमगति को प्राप्त करता है । इसी बात को और अधिक यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मामप्राप्यैव अर्थात मुझे प्राप्त न करके ही नरक एवं अधमाधम गति को जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर को प्राप्त करना ही मनुष्य मात्र का लक्ष्य है । ऐसा न करने वाला समान रूप से संपूर्ण प्राणियों में स्थित मुझ परमेश्वर को इसलिये नहीं देख सकेगा कि वह स्वयं में भी आत्म रूप से स्थित मुझ परमेश्वर को नहीं देखता इसीलिये सर्वत्र उसके क्रूरकर्मा हो जाते हैं यही आत्महत्या जो संसार का सर्वाधिक बड़ा पाप कहा गया है और ऐसा आत्महत्यारा नरक को जायेगा ही । इसीलिए यहाँ वेद मार्ग का त्याग करने पर होने वाली गति का वर्णन किया गया है कि मुमुक्षु और बुद्धिमान मनुष्य उपरोक्त दंभ आदि का त्याग करके वैदिक मार्ग में आत्मोन्नति के लिए प्रवृत्त होकर अपना कल्याण कर सके । यही इसका भाव है ॥२०॥
संबंध— आसुरी संपत्ति का अलग अलग वर्णन करके अब पतन के मात्र तीन कारणों का वर्णन……
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथालोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥१६/२१॥
शब्दार्थ– काम, क्रोध, लोभ इस प्रकार ये तीन नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले कहे गये हैं, इसलिये इन तीनों का त्याग करना चाहिए ।
तात्पर्यार्थ– वस्तुतः विषयों की प्राप्ति की कामना ही प्रधान कारण है । इसके उत्पन्न होते ही इसकी पांच संतानें और उत्पन्न हो जाती हैं– क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर । इस बात को अध्याय २/६२-६३ में भी बताया गया है । उससे पहले कहा– ‘प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्’ २/५५ अर्थात जिस काल में हमारा मन निःशेष रूप से कामना शून्य होकर स्वयं से स्वयं में सन्तुष्ट हो जाता है तभी ‘स्थित प्रज्ञस्तदोच्ये’ २/५५ स्थित प्रज्ञ अर्थात आत्मभाव को उसी समय प्राप्त हो जाता है । अतः भले ये तीनों पतन के मार्ग कहे गये हों लेकिन सबके मूल में काम ही है, अतः उस पर ही नियंत्रण पाना चाहिए मुमुक्षु को । यहाँ जो आत्मा का नाश होने की बात कही गई है वह सत्यासत्य विवेक करके तत्त्व में प्रतिष्ठित होने में सहयोगी बुद्धि के नाश की बात कही गई है क्योंकि बुद्धि के नाश से ही सारे अनर्थ प्राप्त होते हैं । अर्थात अनात्म पदार्थ की इच्छा कामना है अनात्म पदार्थ के प्राप्ति के उद्योग में उत्पन्न होने बाधा के फलस्वरूप होने वाली प्रतिक्रिया क्रोध है और आवश्यकता भर की प्राप्ति होने पर भी अनात्म पदार्थ की और अधिक कामना लोभ है । जबकि आत्म भाव नित्य प्राप्त है, अतः प्राप्त की प्राप्ति की कामना न हो नहीं सकता है, जो प्राप्त है उसकी प्राप्ति का उद्योग होगा नहीं तो बाधा होने और क्रोध होने का प्रश्न ही नहीं, क्रोध न होने से हमारी बुद्धि स्वतः स्थितप्रज्ञ अर्थात स्व-स्वरूप में स्थित है अतः लोभ का प्रश्न ही नहीं है । अतः यहां भाव यह निकलता कि अनात्म पदार्थ का त्याग और आत्मपदार्थ में स्थिति ही समस्त अनर्थों का नाश करने वाली है ।
अथवा अध्याय २/६२ में काम का हेतु विषयों का चिन्तन बाताया गया है अध्याय ३/३६ में काम क्रोध को ही प्रधान माना गया है और अन्त में काम नाश ३/४३ के लिए कहा गया है । वस्तुतः विषयों का चिन्तन यानी भोगों की कामना ही क्रोध और लोभ का जाननी है । अतः भोगलिप्सा का मन से त्याग कर देना ही काम का नाश कहा गया है इसी को ‘सङ्कल्पप्रभान्कान्’ ६/२४ संकल्प यानी मन में भोग की इच्छा के उत्पन्न होते ही काम की उत्पत्ति हो जाती है, इसलिए ‘त्यक्त्वा सर्वानशेषतः’ ६/२४ अर्थात उन सभी कामनाओं को अशेष रूप से त्याग दे अर्थात मन से उनका स्मरण करना ही बंद कर दे । ‘आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ ६/२५ यही उपाय एकमात्र है इन तीनो नरक के मार्ग के त्याग का । यह इसका भाव है ॥२१॥
संबंध— उपरोक्त त्याग का फल कहते हैैं……
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो यान्ति परां गतिम् ॥१६/२२॥
शब्दार्थ– इस प्रकार हे कौन्तेय ! नरक के द्वार अज्ञान रूप इन तीनो से मुक्त होकर मुमुक्षु अपने कल्याण के लिए आचरण करता हुआ परमगति को प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ– ‘तमस्त्वज्ञानजं विद्धि’ १४/८ इस आधार पर अज्ञान को ही यहां काम, क्रोध और लोभ कहा गया है । अतः यहां पतन के मार्ग अज्ञान मतलब अनात्म पदार्थ का त्यागकरके आरचण करते हुए अर्थात आत्मपदार्थ की प्राप्ति के साधन अमानित्वादि का आचरण करता हुआ इस लोक में ही अपना कल्याण कर लेता है और शरीर छूटने के पश्चात कैवल्य नामक परम पद को प्राप्त कर लेता है ।
अथवा तीनो नरक मार्ग का त्याग करने के बाद श्रेष्ठ आत्ममार्ग का आचारण करने का तात्पर्य यह है कि जिन साधनों के माध्यम से सभी प्राणियों में स्थित आत्मा को अपने में और उसके पश्चात उन प्राणियों के सहित स्वयं को भी मुझमे अर्थात मुझसे अभिन्न देखता है― ‘येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि’ ४/३५ अर्थात जिससे तू सभी अशेष यानी जड़ चेतन प्राणियों को मुझमें देखेगा, फिर स्वयं को मुझमें देखेगा, यही श्रेय प्राप्त का श्रेष्ठ मार्ग है । जब इस प्रकार सभी प्राणियों के अन्दर सन्निहित आत्मा को और मुझको अपने अभिन्न “एकमेवाद्वितीम्, पूर्णमदः पूर्ममिदं, वासुदेवः सर्वम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, आयमात्मा ब्रह्म, अहं ब्रह्मामि” का जीते जी ‘अस्मि’ रूप में अनुभव करता हुआ शरीर त्याग कर एक मात्र नाम, रूप आदि विकारों से रहित सर्वात्मा होकर ‘असि’ सत्ता मात्र में स्थित हो जायेगा, यही परम अर्थात सर्वश्रेष्ठ गति है । इससे बढ़कर मनुष्य की और कोई अन्य गति नहीं होती । जन्म मृत्यु के बन्धन सदा सर्वदा के लिए नष्ट है जाते हैं ।
भावार्थ― भावपक्ष इसका यह है प्रत्येक दशा में आत्मयोग को प्राप्त कर लेना ही मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य है अर्थात मनुष्य वही है जो अपने परमार्थ लक्ष्य को प्राप्त कर ले, यदि ऐसा न कर सका तो वह मनुष्य ही नहीं है, वह आत्महत्यारा है ॥२२॥
संबंध– उपरोक्त सभी अनर्थों की जड़ क्या है ? इस पर कहते हैं……
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥१६/२३॥
शब्दार्थ— जो शास्त्र विधि का त्याग करके कामना पूर्ति के लिए आचरण करता है वह न तो सिद्वि प्राप्त करता है, न सुख और न मोक्ष ही प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ— शास्त्र विधि यानी अनुशासन । शास्त्र के अन्तर्गत आत्मतत्त्व का विवेचन करने वाली और उससे संबंधित शास्त्र एवं आप्तवचन प्रमाण हैं जैसे “तद्विद्धि प्रणिपातेन…..। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ४/३४, आचार्योपासनं शौचम्” १३/७ इत्यादि स्थानों से प्राप्त उपदेश आप्तवचन हैं । यहाँ चूंकि निर्विकार ब्रह्म की प्राप्ति का प्रसंग चल रहा है अतः लौकिक पारलौकिक भोगों का वर्णन करने वाली फलश्रुति का यहां के शास्त्र से कोई लेना देना नहीं है । इसीलिए कहा कामकारतः अर्थात कामनाओं से अभिभूत हुआ । कोई अनात्म पदार्थ की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला आचरण मनमानी आचरण है, इससे वह सिद्वि प्राप्त नहीं करता मतलब मोक्ष प्राप्ति की योग्यता प्राप्त नहीं कर सकता । सुख भी नहीं मिलाता क्योंकि कामनाओं की कभी प्रचंड अग्नि में सूखे घास के तिनके पूरे नहीं किये जा सकते, अतः क्षणिक फल चाहने वाले कभी स्थिर नहीं हो सकते । बारंबार कामना रूपी पिशाच से चूसे जाने के कारण वे इस लोक में तो दुःखी रहते ही हैं और मोक्ष की योग्यता चित्तशुद्धि न होने से मोक्ष भी नहीं मिलता । ऐसा तात्पर्य है ।
अथवा यहाँ पर शास्त्र विधि क्या है इस बात का खुलासा किया गया है । शास्त्र विधि के विषय में कहा था― “येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधि पूर्वकम्” ॥९/२३॥ अर्थात अविधि यह है कि मैं ही संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूँ― ‘अहं हि सर्वज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’ ९/२४ इसलिये संपूर्ण यज्ञों और कर्मों की विधि एक मात्र मेरी उपासना ही है, किन्तु ऐसा न करके अन्य देवताओं का यजन करते, अन्य को पूजते हैं यही शास्त्र अर्थात श्रुति सिद्धांत के विरुद्ध अविधि है । इसका परिणाम यह होता कि― ‘तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते’ ९/२४ वे तत्त्वज्ञान से पतित हो जाते हैं । तत्त्वज्ञान से पतित होने के कारण ही ऐसे लोग न तो आत्म सिद्धि प्राप्त पाते, आत्म सिद्धि प्राप्त न होने के कारण वे नित्य सुख को भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं अर्थात देवताओं की उपासना से क्षणिक सुख की प्राप्ति के लिए जन्म-जन्मान्तर दुःखी रहते हैं, जब सुख ही नहीं मिल सका तो परम् गति अर्थात मोक्ष प्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है ॥२३॥
संबंध— चूंंकि शास्त्र विधि अर्थात शास्त्र का अनुशासन न मानना ही अनर्थों की जड़ है इसलिये……
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥१६/२४॥
शब्दार्थ– इसलिये तुम्हारे लिए क्या कार्य है ? क्या अकार्य है इसके लिए शास्त्र ही प्रमाण है । शास्त्र में कहे गये विधान के अनुसार तू कर्म करने योग्य है अर्थात शास्त्रानुसार कर्म कर ।
तात्पर्यार्थ– यहाँ भगवान कहते कि जिसलिए शास्त्र विधि का त्याग ही मनुष्य के पतन का कारण है इसलिये शास्त्र विधि प्रमाण ही कर्म अकर्म और विकर्म है । चतुर्थ अध्याय में विस्तृत व्याख्या इस विषय में भगवान ने की है, अतः मोक्षार्थी के लिए कर्म के निमित्त वही प्रमाण है । दूसरी बात श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः३/३५ में जाति वर्ण आश्रम धर्म के स्थान पर कौन किस स्थान पर खड़ा है यह महत्वपूर्ण है और उसी स्थान के अनुसार ही उसका स्वधर्म अर्थात कर्तव्य सुनिश्चित होता है । अतः उस प्राप्त स्थान और योग्यता का निरपेक्ष भाव से पालन करना ही स्वधर्म है । भगवान ने चारों वर्णों की व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर की है न कि गुण कर्म की व्यवस्था वर्ण के आधार पर ४/१३ इसकी विस्तृत व्याख्या अध्याय १८/४२ से लेकर १८/४४ तक देखना चाहिए । जिस किसी में भी वे वे लक्षण हैं तो ही वह उसी वर्ण का है अन्यथा नहीं । यह भी शास्त्र ही कहता है, हम अपनी तरफ से मनमानी नहीं कह रहे हैं ।
शास्त्र क्या है ? इस पर भगावन ने स्वयं कह दिया ‘इति गुह्यतमं शास्त्रम्’ १५/२० अर्थात मोक्षार्थी का एक मात्र शास्त्र है गीता का पन्द्रहवां अध्याय वहीं जो कहा गया है वही सर्वकर्मसन्न्यासी के लिए आचरणीय और आदरणीय है । चूंंकि पंद्रहवाँ अध्याय संपूर्ण गीता का सार भाग है और वह सार भाग गीता से ही लिया गया है और गीता भगवान की वाणी है इस प्रमाण से गीता अर्थात भगवान की वाणी ही प्रमाण है, वेद (निवृत्तिपरक उपनिषद) भगवान की श्वास है अतः वह भी प्रमाण है । जिस प्रकार गीता का सार पुरुषोत्तमयोग नामक पंद्रहवां अध्याय है इसी प्रकार उपनिषदों के तात्पर्य बताने के लिए उनका सार ब्रह्मसूत्र है अतः वह भी प्रमाण है । इस प्रकार गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र ही शास्त्र हैं और यही अन्तिम प्रमाण हैं । अतः मोक्षार्थी को इनकी ही शरण लेनी चाहिए । इसीलिए आचार्य शंकर ने इन्हीं तीनो पर भाष्य लिखा है । सनत्सुजातीय पर आचार्य जी का भाष्य इसलिए है कि वह सनत्कुमार के रूप भगवान की ही वाणी है, अतः वह भी प्रमाण है । आचार्यचरण ने भगवान की वाणी के अतिरिक्त और किसी को महत्त्व नहीं दिया है इसीलिए गीता के प्रथम अध्याय का भाष्य नहीं किया । संक्षेप में जो भगवान की वाणी रूपी सर्वशास्त्रमयी गीता को प्रमाण मानता है और उसके अनुसार ही कर्म करता है वही परम गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता है । चूंंकि पूर्व श्लोक में अशास्त्रीय की चित्तशुद्धि पूर्वक मोक्ष की योग्यता का न होना, सुख का न होना और मोक्ष न मिलना कहा गया है, अतः उसके विरुद्ध शास्त्र का आचरण करने वाले की चित्तशुद्धि रूप सिद्धि शास्त्राचरण करने वाले की होती है और संसार में जब तक जीवन है तब तक आनन्दित रहता है और शरीर त्याग के पश्चात विदेह कैवल्य की प्राप्ति भी करता है इतना अध्याहार कर लेना चाहिए ।
अथवा कार्य और अकार्य को ही ‘किं कर्म किमकर्मेति’ ४/१६ अर्थात शास्त्रीय कर्म क्या है ? और अकर्म अर्थात निष्कामकर्म क्या है ? यह प्रश्न स्वयं भगवान ने उठाकर समाधान किया है विस्तृत विवरण वहीं देखना चाहिए । फिर कर्म, अकर्म और विकर्म को जानकर अर्थात प्रवृत्ति मार्ग, निवृत्ति मार्ग और प्रमाद के विषय में शास्त्र से जानकारी करके करना चाहिए । यहाँ विकर्म का अर्थ प्रमाद किया है क्योंकि प्रमाद ही प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग से भ्रष्ट करके या तो निकम्मा बना देता है या कामनाओं के आधीन सकाम कर्मों मे ही प्रवृत्त हो जाते हैं । यह इसका भाव है ।
विशेष भाव– जब शास्त्र की बात आ ही गई है तो थोड़ा और समझ ही लेते हैं । अर्जुन ने अध्याय १२ में भक्तियोगी यानी सविशेष ब्रह्म उपासक को श्रेष्ठ कहा और आचरण करने के लिए ज्ञानी का कहते हैं ‘ये तु धर्म्यामृतमिदं’ १२/२० देख लेना चाहिए । अध्याय १४/२६ में सविशेष भक्ति की बात करके १४/२७ में निर्गुण ब्रह्म में विनियोग करते हैं । इन दोनो श्लोकों को स्मरण रखना आवश्यक है क्योंकि आगे ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ १८/६६ आयेगा । १४/२६-२७ की व्याख्या करते हुए अन्त में स सर्वविद्भजति अर्थात वह सर्वज्ञ होकर मेरा भजन करता है । अब जब वह सर्वज्ञ हो गया है जबकि सर्वज्ञ एक मात्र परमात्मा इसका मतलब अभिन्न हो गया और अब सर्वभावेन भजन अर्थात वह सर्वरूप में जो मुझे जानता है यही उसकी भक्ति है । यही ज्ञानोत्तर भक्ति कही जा सकती है क्योंकि वह अब किसी स्थान विशेष में नहीं अब, वह तो या तो सबमे स्वयं को या स्वयं को सबमें देखता है यही सर्ववित् भाव है यही परा भक्ति है ‘भक्तिं मयि परां कृत्वा’ १८/६८ । इसी प्रकार शास्त्र को प्रमाण मानने का मतलब यह है कि शास्त्र ने जैसा कह दिया वह समझ में आये यआ न आये जैसे का तैसा ही अक्षरशः स्वीकार कर लेना उसमें किसी भी प्रकार की मीनमेख नहीं करना यह जो शास्त्र निष्ठा है यही पराश्रद्धा है ‘श्रद्धया परया तप्तं’ १७/१७ । अर्थात पराभक्ति और पराश्रद्धा मानव जीवन में आ जाये यह हमारी तपस्या का फल है । बाकी सब स्वतः होता रहता है । यह विशेष भाव गीता का अब तक समझ पाया । शेष अन्त में उपसंहार में लिखूंगा ॥२४॥
समीक्षा― यद्यपि इस अध्याय का भाव अवतरणिका में प्रकट कर दिया है तो भी इसका संक्षेप यह है कि दैवी गुणों को ही यहाँ दैवी संपत्ति कहा गया है इससे भिन्न आसुरी वृत्ति से संबंध होने पर कहीं भी संपत्ति शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है वस्तुतः यही माया है । जो नरक का जाता जागता द्वार है । दैवीगुण वही है जो देव अर्थात गुण अपने स्वामी परमेश्वर से मिलाकर हमें अचिन्य नित्य सुख की प्राप्ति करा दें । इसीलिये पहले दैवीगुण का वर्णना करते हुए कहा गया है कि जिनमें में दैवीगुण हैं या उनका अनुष्ठान करते हैं उन्हें किसी शोक करने की आवश्यकता नहीं होती है ।
इसके बाद आसुरी संपत्ति का विस्तार से वर्णन करते हुए आसुरभाव के प्राप्त मनुष्य का दूसरे शरीरों में स्थित मुझ सर्वात्मा के तिरस्कार और उनके इस अपराध से परमात्मा को प्राप्त किये बिना ही नारकीय अधमाधम गति की प्राप्ति बताया । इन सब अनर्थों की जड़ नरक के मार्ग काम, क्रोध और लोभ को बताते हुए इनका त्याग करके परमगति के मार्ग का श्रेष्ठ आत्मागर्ग का आचरण करने की आज्ञा दी और उसके लिए बताया कि आत्ममार्ग पर प्रस्थान शास्त्र विधि का त्याग करके मनमानी आचरण से आत्मसिद्धि, सुख और परमगति तीनों की अप्राप्ति बताया । इसीलिये प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग की व्यावस्था कैसी होनी चाहिए, किस प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति मार्ग पर आरूढ होना चाहिए यह शास्त्र ही बताएगा अतः शास्त्र विधान में कहे के अनुसार ही आचरण करना श्रेष्ठ है इस बात का साधकों के प्रति कथन करते हुए अध्याय का उपसंहार किया ॥१-२४॥
॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पविभायोगो नाम षोडषोऽध्यायः ॥१६॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक सोलहवां प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत् !!!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
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