ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय ९

    ॥ॐश्रीपरमात्मने नमः॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथ नवमोऽध्यायः
              संबंध— अध्याय ५ के अन्तिम तीन श्लोक योग विषयक थे, जिसका विस्तृत विवेचन छठे अध्याय में करके सप्तम अध्याय में उसी योग विषयक तत्त्व का विस्तार से संपादन किया । अन्तिम दो श्लोक में जिस निर्गुण-निराकर, निर्गुण-साकार एवं सगुण-साकार संबंधित जिस उपासना की बात कही, वही अर्जुन के आठवें अध्याय के सात प्रश्न― १-ब्रह्म क्या है ? २-अध्यात्म क्या है ? ३-कर्म क्या है ? ४-अधिभूत क्या है ? ५-अधिदैव क्या है ? ६-इस शरीर में अधियज्ञ कौन और कैसा है ? ७-मृत्युकाल के उपस्थित होने पर समाहित चित्त होकर किसे जानना चाहिए अर्थात किसका स्मरण या चिन्तन करना चाहिए, उपस्थित किया । उत्तर में श्रीभगवान ने परब्रह्म ही ब्रह्म और उसका स्वभाव अध्यात्म, स्थूल जगत (शरीर) अर्थात क्षरण को प्राप्त होने वाले पदार्थ ही अधिभूत, इनमें रहने वाला सूक्ष्म पुरुष अर्थात इन्द्रियों सहित जीव ही अधिदैवत, अधियज्ञ जो परमात्मा का स्वभाव है, वह स्वसंवेद्य आत्मा स्वयं मैं हूँ इस प्रकार छः प्रश्नों के उत्तर देकर सातवें प्रश्न का उत्तर सुषुम्णा नाड़ी पर संयम करके योगमार्ग से एवं स्वरूपगत चिन्तन मार्ग से बताते हुए अन्त में अर्चिमार्ग से यात्रा करने वाले ओंकार आदि प्रतीकोपासना करनेवाले की क्रममुक्ति का वर्णन करते हुए कर्मयोगी के धूम्रमार्ग से गमन और पुनः संसार चक्र के आवागमन में पड़ना बताकर “तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन” ८/२७ सर्वकालिक समाहित चित्त अर्थात सावधान रहते हुए योग में स्थित योगी की अन्त में स्तुति करते हैं ।
                अन्त में योगी की स्तुति करने से स्पष्ट होता है कि जिस विषय को सप्तम अध्याय में ज्ञान विज्ञान सहित कहने की प्रतिज्ञा करते हैं “ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते” ७/२, यह ज्ञान विज्ञान अशेष रूप से कहना है और ऐसा कहना है कि कुछ भी जानना शेष न रहे— एक विज्ञान से सर्विज्ञान हो जाये । यह वह तत्त्व है जिसे करोड़ों में कोई एक जानता है “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः” ७/३ । वह ज्ञान गुह्य ही नहीं है, गुह्यतर ही नहीं है बल्कि गुह्यतम है । गुह्य का अर्थ है कोई बहुत अच्छी मन पसंद वस्तु है जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं किन्तु वे वस्तुएं सौ-दो सौ हों उन में से एक छांटना हो तो वह वस्तु होगी प्रियतर (गुह्यतर) । उन छांटी हुई वस्तुएं अगर हजार-दो हजार हों तो वह होगी प्रियतम (गुह्यतम) । ऐसे गुह्यतम को जानने या छांटने वाले को ही “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः” कहा है ।
               कुञ्जिका स्तोत्र में माता पार्वती को गोपनीयता का महत्त्व बताते हुए कहते हैं-- “गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिः इव पार्वती” अर्थात यह वह विद्या है जिसे उसी प्रकार प्रयत्न पूर्वक गोपनीय रखना चाहिए जैसे स्त्री अपनी योनि को अनेक आवरण से प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखती है । फिर भी स्त्री, अपनी योनि को किसी आत्यंतिक आत्मीय पुरुष को समर्पित कर सकती है इसलिए कहा प्रयत्नतः अर्थात कोई भी कितना ही आत्मीय क्यों न हो अनधिकारी को यह विद्या नहीं देना चाहिए । स्त्री अपनी योनि पति को ही समर्पित करती है इसका अर्थ यह है कि जो आत्मभाव को प्राप्त हो चुका अर्थात उस विद्या के प्रति पूर्णतः समर्पित हो चुका है ऐसे को यह विद्या दे देनी चाहिए । अतः यह गुह्यतम ९/१ है । यह आत्मविद्या है यह विद्या गुह्यतम ही नहीं बल्कि सर्वगुह्यतम १८/६४ है, क्योंकि आत्मा तो किसी अधिकारी के सामने भी नहीं रख सकते या दिखा सकते हैं इसीलिए श्रुति “नेति नेति” कहती है । अभी तो मात्र जो “अनसूयवे” अर्थात दोषदृष्टि से रहित है उसी के प्रति इस विद्या के उत्कृष्ट रूप से उपदेश की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं……
 श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्यामनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥९/१॥
               शब्दार्थ— यह गोपनीय से भी अत्यंत गोपनीय ज्ञान विज्ञान के सहित तुझ दोष दृष्टि से रहित के लिए उत्कृष्ट रूप से कहूंगा जिसको जानकर तू अशुभ अर्थात जन्म मृत्यु रूप अशुभ संसार से मुक्त हो जायेगा ।
               तात्पर्यार्थ— साधन उत्तम, मध्यम एवं कनिष्ठ तीन प्रकार के होते हैं, जिनमें दो का विवरण पिछले अध्याय में दिया जा चुका है तथापि “इदं” अर्थात जो पूर्व में कहे गए साधन विषयक शेष भाग को पुनः साधन भेद की दृष्टि से अब जो कहेंगे वह गोपनीय से भी गोपनीय है, फिर भी मैं तुमसे कहूंगा क्योंकि तुम्हारे अन्दर दोष दृष्टि नहीं है । यही बात “योऽभ्यसूयति” १८/६७ में भी कहते हैं । तात्पर्य यह है कि इस विद्या को समझने के लिए प्रभु वाणी में दोषदृष्टि न हो तभी समझा जा सकता है “तु” शब्द यहाँ पर “अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः ८/२१, पुरुषः स परः पार्थ” ८/२२ से भिन्नता या उत्कृष्टता दिखाने के लिए है । जहाँ भी “तु” आयेगा वहां पूर्व प्रसंग से जुड़े विषय से हटकर दिखाने के लिए होता है । उदाहरण— तु का अर्थात क्योंकि या किन्तु में प्रयुक्ता होता है जैसे आपने वह बात ठीक कहा किन्तु…, क्योंकि वहां ऐसा कहा  गया इसलिए…। आदि । “तु” शब्द का अवलोकन करने पर पता चलता है कि सप्तम अध्याय में अर्जुन के लिए जिस ज्ञान विज्ञान की प्रतिज्ञा करते हैं वह अर्जुन के प्रश्न के फलस्वरूप अष्टम अध्याय में विषयान्तर हो गया था उसे अब पुनः कहने की प्रतिज्ञा करते हैं । ध्यान देने की बात यह है कि जिस साधन से ब्रह्म का परोक्ष ज्ञान हो जाये वही ज्ञान कहलाता है और प्रत्यक्ष अनुभूति विज्ञान कहलाता है । वहां ज्ञान की भूमिका में जिस प्रकार पहले अपरा और परा प्रकृति का ज्ञान कराकर फिर तत्त्वबोध वासुदेवः सर्वम् का ज्ञान कराते हैं ठीक वही रीति यहां भी अपनाकर विधि निषेध मुख “मत्स्थानि सर्वभूतानि” ९/४, “न च मत्स्थानि सर्वभूतानि” ९/५ इत्यादि से विज्ञान की अनुभूति कराते हुए सगुण सकार का विज्ञान कहेंगे । यह सब दोषदृष्टि वाले की समझ में आने वाला नहीं है इसलिए गुह्यतम है । यह विज्ञान ऐसा है कि जिसे जान लेने मात्र अशुभ अर्थात संसार के बीज रूप अशुभ अविद्या से मुक्ति मिल जाती जायेगी ।
             अथवा यहां पर इदं से यह समझना चाहिए कि अब जो आगे ज्ञान कहा जायेगा और तु पूर्व अध्याय में कहे गए ज्ञान का पक्षान्तर है । अध्याय सात में की गई ज्ञान विज्ञान की प्रतिज्ञा का वर्णन अन्तिम दो श्लोकों में समग्र रूप से करना प्रारंभ किया ही था कि अर्जुन ने बीच में ही सात प्रश्न कर दिये जिसके उत्तर में अष्टम अध्याय में सहजभाव का अभ्यास करने वाले अति उत्तम अधिकारी का श्लोक ८-१० तक वर्णन किया और फिर उत्तम अधिकारी का वर्णन श्लोक १२-१४ तक अष्टांग योग द्वारा किया । ये सभी साधन साधन चतुष्टय संपन्न ज्ञानयोगी के लिए कहे गये हैं किन्तु अब जो साधन कहे जायेंगे ये साधन मंद, अतिमंद के लिए कहे जायेंगे । आत्मा में ही सर्वव्यापक परमेश्वर की उपासना करते हुए मन बुद्धि को उसी परमेश्वर में लगा देना, यह मंद बुद्धि के साधकों के कहा जाने वाले साधन हैं और जो ऐसी उपासना नहीं कर सकते वे मूर्ति आदि में ही परमेश्वर भाव से आराधना करते हुए जो भी क्रियामात्र है वह परमेश्वर को अर्पण करना अतिमंद साधना है किन्तु भगवान उस पर भी प्रसन्न होकर उसका कल्याण करते हैं । यही जितने गोपनीय रहस्य हैं उनमें सबसे अधिक गोपनीय रहस्य है । क्योंकि निर्णुण निराकार एक स्वयं में रहस्य है जो बड़े बड़े वेदवेत्ताओं के देखने, कहने, सुनने और समझने में नहीं आता २/२९, तथापि इतना तो सभी जानते ही हैं कि परेश्वर निराकार है । इससे भी गुह्यतर योग विद्या है जो अष्टांगयोग द्वारा साध्य है और थोड़ा भी असावधान होते ही सब कुछ उलटा हो जाये अतः यह विद्या तो और अधिक रहस्य है जिस किसी को नहीं दिया जा सकता है इसी विद्या के अन्तर्गत मंत्र, औषधि आदि की भी गोपनीयता छिपी होती है किन्तु इससे भी सर्वाधिक गोपनीय बात यह है कि भगवान कागज, मिट्टी, पत्थर आदि की भी प्रतिमा में हो सकता है ? साढे तीन हाथ का कृष्ण भी व्यापक परमात्मा हो सकता है ? यह बात तो गले नहीं उतरती । इसी परम गोपनी रहस्य को समझाने के लिए ही यह अध्याय प्रारंभ हो रहा है, इसमें ज्ञान का वर्णन तो इसी अध्याय में और विज्ञान का वर्णन दसवें अध्याय में एवं इसकी अनुभूति अर्जुन की इच्छानुसार ग्यारहवें अध्याय में कराया जायेगा । जिसको जान लेने से सबसे बड़े अशुभ जन्म-मृत्यु रूप संसार चक्र से छुटकारा मिल जायेगा ॥१॥

              संबंध— ज्ञान विज्ञान की स्तुति……
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥९/२॥
           शब्दार्थ— यह ब्रह्मविद्या राजमहिषी के समान गोपनीयों में भी गोपनीय, उत्तम पवित्र, प्रत्यक्षप्रमाण रूप अर्थात प्रत्यक्ष फल देने और अनुभव में आने वाली, ज्ञानस्वरूप, सुखकारी और करने में अव्यय फलदयी है ।
            तात्पर्यार्थ— राजविद्या अर्थात जैसे किसी राजा की शरणागति प्राप्त कर लेने वाले को पूरे राज्य में किसी का भय नहीं होता उसी प्रकार इस ज्ञान विज्ञान रूप आत्मविद्या का आश्रय लेने से कर्मजन्य संसार का भय नहीं होता, इसलिये यह राजविद्या है, क्योंकि जितने भी भेदप्रदायी लौकिक वैदिक कर्म हैं वे संसार रूप जन्म मृत्यु का हेतु होने से बंधन का हेतु हैं और यह ज्ञान बंधन मुक्त करती है अतः राजविद्या है ।
              राजगुह्य— जितनी भी युक्तियां हैं योग, औषधि, मंत्र, तप, रत्न आदि वे सभी गोपनीय हैं― “योग युकुति तप मंत्र प्रभाऊ । फरइ तबहिं जब करिय दुराऊ ॥” तथापि यह विद्या उन सभी गोपनीयों में भी गोपनीय है अतः राजगुह्य है ।
             उत्तम पवित्र— पवित्र करने वाली बहुत विद्याएं होती हैं लौकिक वैदिक किन्तु वे सभी विद्याएं मात्र पापों का ही नाश करती हैं जन्म मृत्यु के हेतु पुण्य का नहीं । अतः वे पवित्र तो हैं लेकिन यह विद्या पाप और पुण्य दोनो का नाश करने वाली होने से पापी को धर्मात्मा बना देती है “क्षिप्रं भवति धर्मात्मा” ९/३१ अतः उत्तम पवित्र है । शीघ्र ही सारे पापों को छोटी छोटी सूखी लकड़ियां जैसे अत्यंत प्रचंड अग्नि क्षण भर में नष्ट कर देती है वैसे ही क्षण भर में ज्ञानाग्नि संपूर्ण पाप-पुण्यमय कर्मों अर्थात कर्मफलों को भस्म करती देती है “यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा” ४/३७ ज्ञान की पवित्रता की कोई समानता नहीं, कोई तुलना नहीं “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” ४/३८ ।
                यह प्रत्यक्ष अनुभवगम्य है— इसका प्रत्यक्ष फल अनुभव में आता है, यज्ञ, तप, दान आदि  जो भी पुण्य करो उसका फल लोक परलोक में जब मिलेगा तब मिलेगा, लेकिन ज्ञान तो जिस क्षण में उत्पन्न हो जाये उसी समय संसार का क्लेश नष्ट हो जाता है अविद्या जन्य सारे क्लेश कट जाते हैं अतः प्रत्यक्ष फलदयी है, यह प्रत्यक्ष प्रमाण है ।
             धर्ममय— यह ज्ञान वर्णधर्म, आश्रमधर्म का बाधक नहीं है । जो जहाँ है वहीं से परमार्थ तत्त्व का बोध कराने में समर्थ है अतः आश्रमादि धर्म का विरोधी नहीं बल्कि साक्षात ज्ञानस्वरूप है ।
                सहज ही सुखकारी है— योग, ध्यान, तप आदि में बड़े कष्ट हैं, किन्तु इस विद्या का आश्रय लेने से सहज ही आनन्द की प्राप्ति होती है । अतः यह विद्या सहज ही सुखकारी है ।
            इसका अनुष्ठान अव्यय है— इस विद्या के अनुष्ठान से अविनाशी फल प्राप्त होता है । ऐसा फल जिसका कभी भी नाश नहीं हो सकता । थोड़ा भी व्यय नहीं हो सकता है । अतः इसका अनुष्ठान अव्यय है ।
             अथवा जैसे राजमहलों में रानियां अत्यंत गुप्त रूप से निवास करती हैं उनसे मिलने की जिस किसी को भी अनुमति नहीं होती है कोई विश्वसनीय दासी ही मिल सकती है उसी प्रकार यह विद्या भी रहस्यमय है जिस किसी की समझ में आने वाली नहीं है । इसमें दोषदृष्टि न होने पर ही समझ में आयेगी  यह पवित्र विद्या है । अर्थात ये पवित्र जो यज्ञदान तप आदि से हुए हैं जिनकी चित्तशुद्धि हो चुकी है उनको पवित्र करने वाली श्रेष्ठ विद्या है ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ ४/३८ अर्थात ज्ञान से बढकर कुछ भी पवित्र नहीं है । यह धर्ममय अर्थात ज्ञानस्वरूप है इसका साक्षात्कार कर लेने पर अर्थात इस विद्या को आत्मसात कर लेने पर अव्यय अर्थात अविनाशी नित्य सुख देने वाला है । यहाँ धर्म का अर्थ ज्ञान किया गया है क्योंकि आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थित हो जाना ही मनुष्य का पहला और अन्तिम कर्तव्य है और आगे भी धर्म का यही अर्थ किया जायेगा ।
            भावार्थ— संसार का नियम  है कि बिना फलेच्छा के कभी भी कहीं भी कर्म में प्रवृत्ति नहीं होती, होगी भी नहीं और हो सकती भी नहीं । अतः यहाँ ज्ञान विज्ञान रूप आत्मा की स्तुति की गई है, जिससे सदसद् का विवेक रखने वाले नीरक्षीर विवेकपूर्वक इस विद्या का उत्तम, मध्यम एवं कनिष्ठ के अधिकार से अपने अपने साधन का चयन करके इस विद्या के निर्देशित लक्ष्य के अनुष्ठान में लगकर मनुष्य अपना कल्याण कर सके ॥२॥

                संबंध— इस ज्ञान विज्ञान पर श्रद्धा न रखने वालों के संसार चक्र में पुनरागमन का कथन……
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥९/३।॥
             शब्दार्थ— हे परन्तप ! इस ज्ञान विज्ञान में श्रद्धा न रखने वाला पुरुष मुझको प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार चक्र में वापस आते हैं ।
             तात्पर्यार्थ— यह ज्ञान अत्यंत गंभीर है । अध्यात्म मार्ग में विवेक ही नहीं श्रुत्याचार्य पर श्रद्धा की भी आवश्यकता है । अगर श्रद्धा नहीं होगी तो क्रियमाण नहीं हो सकता बिना क्रियमाण हुए मोक्षरूप सिद्धि नहीं हो सकती “न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।” ३/४ । श्रद्धा न होने के कारण ही जो निर्गुण निराकार के उपासक अहंकार वश श्रीभगवान की वाणी में दोष देखते रहते हैं । वे कहते हैं “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।” ९/२६ यह भगवान की वाणी कैसे हो सकती है ? यह तो अखंडित निरवयव को खंडित अवयव वाला सिद्ध करता है, असीम को ससीम करता है, इससे तो मूर्ति पूजा सिद्ध होती, वह मूर्ति कैसे हो सकता है ? यह भेद दृष्टि राजसी तामसी १८/२१-२२ है । यह भगवान की वाणी हो ही नहीं सकती है ?
              वहीं दूसरे कहेंगे कि नहीं.…, श्रीभगवान ने स्पष्ट रूप से “पत्रं पुष्पं फलं तोयं” से स्वयं श्रीभगवान सगुण साकार मूर्ति पूजा का वर्णन करके भेद को स्वीकार करते हैं, तभी अपनी शरण में आने वाले के लिए “अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।” की १८/६६ प्रतिज्ञा करते हैं । जीव भी सत्य और नित्य है ईश्वर भी सत्य एवं नित्य है । जीव जीव है ब्रह्म ब्रह्म है । जीव ब्रह्म नहीं हो सकता “मायाबस परिच्छिन्न जड़ जीव कि ईस समान” मायाधीन जड़ जीव क्या कभी ईश्वर हो सकता है ? अर्थात नहीं । इसी प्रकार ब्रह्म जीव नहीं हो सकता । इसी प्रकार दैवी माया से मोहित होकर मेरी ही वाणी में असूया करते हैं अर्थात दोष देखते हैं इसीलिये “इदं ते…… योऽभ्यसूयति” १८/६७ में चार कुलक्षण संपन्न को यह विद्या न देने की बात कही है । यह दोषदृष्टि अपने आचार्य एवं श्रुति में श्रद्धा न होने के कारण होती है ।  
                  यही कारण है कि इस परम धर्ममय अर्थात ज्ञान विज्ञान पर अश्रद्धा करता है अर्थात श्रद्धा नहीं रखता । दोनो अपनी अपनी हठधर्मिता से ग्रसित आसुरी राक्षसी मोहिनी माया से “राक्षसीमासुरीं चैव मोहिनीं प्रकृतिं श्रिताः ।” ९/१२ मोहित होकर प्रकृति को ओर बलात् खींच लिये गये हैं । इसी कारण मुझको प्राप्त नहीं होते और जन्म मृत्यु रूप संसार चक्र में बारंबार जन्मते और मरते रहते हैं । ऐसे कहकर श्रीभगवान मानो इन मोहित मनुष्यों पर अत्यंत क्रुद्ध होकर कोश रहे हैं कि जब तक मेरी बात नहीं मानोगे तब तक तुम्हें जन्म मृत्यु से छुटकारा मिलने वाला नहीं है, चाहे निर्गुण निराकार का अहंकार पालो चाहे भेद दृष्टि द्वारा मेरे ही टुकड़े टुकड़े कर डालो, मेरा कुछ बिगड़ता नहीं और तुम्हारा संसार सागर से उद्धार होता नहीं, लगाते रहो डुबकी ।
            भावार्थ— अश्रद्धालु का अर्थ अजितेन्द्रिय विषय लोलुप जिसका इसी अध्याय में आगे वर्णन किया जायेगा और धर्म यानी ज्ञान का अर्थ आत्मा-अनात्मा का बोध कराने वाला ज्ञान विज्ञान जिसकी अध्याय सात में प्रतिज्ञा की गई थी और जिसकी पुनः यहां पर भी पहले श्लोक में प्रतिज्ञा की गई है । अर्थात जो आत्मा अनात्मा का विवेक नहीं रखते और उसका प्रत्यक्ष आत्मैक्य रूप से अनुभव नहीं करते उनका इस संसार में वापस होना निश्चित ही है ऐसा कहकर मानो भगवान खेद प्रकट कर रहे हैं ॥३॥

                 संबंध— इस विद्या के अधिकारी अनधिकारी बताकर अब अगले दो श्लोक में पहले विधिमुख एवं फिर निषेधमुख से रहस्यमय परमतत्त्व का वर्णन करते हैं……
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९/४॥
             शब्दार्थ— यह संपूर्ण जगत मुझ अव्यक्त परमेश्वर द्वारा व्याप्त है, संपूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ ।
         तात्पर्यार्थ— ‘परः तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः’ ८/२० में जिस अव्यक्त से पर अव्यक्त को बताया गया था उसी तीनों गुणों की साम्यावस्था मूल प्रकृति से परे जो अव्यक्त अक्षर पुरुष “अव्यक्तोऽक्षर इति ८/२१ एवं पुरुषः स परः” ८/२२ कहा था उसी अव्यक्त अक्षर पुरुष का वर्णन यहाँ पर है यद्यपि अव्यक्त की व्याख्याएं पीछे की जा चुकी हैं तथापि पूर्वपक्ष कोई न कोई प्रश्न उपस्थित ही करता है । अतः शंका पक्ष कहता है कि आप श्रुति प्रमाण तो मानते ही हो और श्रुति कहती है कि संपूर्ण जड़ दृश्य का निषेध करके दृश्य जगत से विलक्षण ब्रह्म है ऐसा ज्ञान तो करती है तो वह अव्यक्त कैसे ?  इसका उत्तर यह होगा कि वह जब मन वाणी का विषय ही नहीं है तो वह ब्रह्म का प्रत्यक्ष बोध कैसे करा सकती है ? ‘यतो वाचो न निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सः। आनन्दं ब्रह्णणो वै…।’ यह भी तो श्रुति ही कहती है । अतः श्रुति साक्षात ब्रह्म का बोध नहीं कराती है, बल्कि परोक्ष कराती है । 
                   शंका पक्ष कहता है— तो फिर “सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म” “आनन्दं ब्रह्मणः” इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म का बोध कराती हैं ? सत्य, असत्य की सापेक्षता से है, अगर असत्य न हो तो सत्य कैसे कहा जा सकता है ? अन्त न हो तो अनन्त कैसे कहा जा सकता है ? दुःख न हो तो आनन्द कैसे कहा जा सकता है ? अज्ञान न हो तो ज्ञान कैसे होगा ? इत्यादि । अतः श्रुति हमेशा सापेक्ष वर्णन करती है निरपेक्ष नहीं । 
               शंका हो सकती है कि फिर श्रुति नहीं जानती ? इसका उत्तर यह है कि वह जानती तो किन्तु यह इतना ही है ऐसा कभी नहीं कहती है । यही प्रमाण है श्रुति के ब्रह्म को जानने का वह ज्ञानस्वरूप भी कहेगी, सतस्वरूप भी कहेगी, आनन्दस्वरूप भी कहेगी किन्तु बस इतना ही है कभी न कहकर “नेति नेति” अर्थात यह भी नहीं यह भी नहीं कहती है । तो फिर कैसे निर्णय होगा कि यही अव्यक्त ब्रह्म है ? इस पर कहते हैं जहाँ श्रुतियाँ मौन हो जायें वहां से आगे ब्रह्म है, और वह अव्यक्त है । चूंकि वह अव्यक्त मूल प्रकृति से भी परे है अतः उसको कैसे प्रत्यक्ष व्यक्त कर सकती है ? अतः जहाँ असत्य का ज्ञान कराकर ज्ञान नष्ट हो जाये, दुःख का नाश करके आनंद नष्ट हो जाये, असत्य का नाश कराकर सत्य नष्ट हो जाये उसके पश्चात जो शेष बचे वही अव्यक्त ब्रह्म है, ऐसा अव्यक्त से श्रुतियों का तात्पर्य है । सापेक्ष भाव से समझाया गया है और निरपेक्ष भाव से समझना है । ध्यान रहे यह निरपेक्षता कही सापेक्षता के सापेक्ष्य में न हो जाये । 
              कुछ लड़कियाँ… किसी बगीचे में खेल रही थीं । उनमें से एक लड़की का मंगेतर यानी भविष्य में होनेवाला पति आचानक कुछ लड़कों के साथ आता दिखाई दिया । अन्य लड़कियों ने दूर से जानना चाहा कि इसका मंगेतर कौन है ? अतः उंगली उठा उठाकर प्रत्येक के विषय में लड़कियों ने पूछा कि तुम्हारा होने वाला पति ये है ? ये है ? वह लड़की मना करती रही, किन्तु जब वास्तविक पति पर उंगली उठी तो वह मौन हो गई । यह मौन हां और न कुछ नहीं कहता, अतः यही प्रमाण है कि इसका पति यही है । इसी प्रकार श्रुति जहाँ मौन हो जाये वही स्वसंवेद्य आत्मतत्त्व अव्यक्तस्वरूप परब्रह्म परमात्मा है और इसी से संपूर्ण जगत व्याप्त है “येन सर्वमिदं ततम्” ८/२२।
            श्रीभगवान कहते हैं कि मेरी इसी व्यपकता में संपूर्ण चराचर, स्थावर जंगम, जड़ चेतना प्राणी मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ । यह कैसे संभव है कि परमात्मा सब में स्थित है, किन्तु परमात्मा सबमें नहीं है ? श्रीभगवान कहते हैं “अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा” ७/६ अर्थात संपूर्ण जगत का निमित्त उपादान कारण  मैं ही हूँ । “मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति” ७/७ अतः वे सर्वाधार हैं वे बाहर भीतर सर्वत्र स्थित हैं, इसलिये उनमें संपूर्ण प्राणी स्थित हैं । वे उनमें कैसे नहीं हैं ? जैसे अपना शरीर । शरीर में जीवात्मा है । जीवात्मा शरीर का आधार है । अतः यह शरीर जीवात्मा की व्याप्ति के कारण जीव के आश्रित है, बिना जीव के नहीं रह सकता है, किन्तु जीव शरीर नहीं हो सकता है, जब चाहे तब अलग, यह जीव का स्वरूप है । ऐसे ही ब्रह्म का स्वभाव है कि उसके आश्रित उसमें ही संपूर्ण प्राणी स्थित हैं किन्तु वह स्वतंत्र है, किसी में नहीं है ।
        आशंका होती है “तत्सृट्वा तदेवानुप्राविशत्” इस श्रुति के अनुसार वह ही संपूर्ण जगत में प्रविष्ट हुआ है तो वह उनमें क्यों नहीं हो सकता है ? इस श्रुति से विरोध हो रहा है । इस पर कहते हैं कि वह निष्कल, निष्क्रिय और असंग है यह भी तो श्रुति कहती है । अतः उसमे क्रिया कैसे संभव हो सकती है ? यहाँ भी श्रुति का ही श्रुति से क्रिया के कारण विरोध उपस्थित हो रहा है । अतः इस क्रिया विरोध के दिखने पर भी उसमें अक्रियत्व का विरोध नहीं है उसे इस प्रकार समझना चाहिए— घड़ा बना तो घटाकाश हो गया और मठ बना तो मठाकाश हो गया, अब बताइए घट और मठ जब बना तब महाकाश कहीं से चलकर इनमें प्रवेश करने आया ? या वहां पर पहले से ही स्वाभाविक था ? वस्तुतः आकाश निरवयव है वह कहीं भी आता जाता नहीं है । उसका स्वभाव ही यह है जहाँ भी कहीं घट, मठ होगा वहां वह घटाकाश मठाकाश स्वतः हो जाता है उसमें महाकाश को प्रवेश नहीं करना पड़ता । वस्तुतः मिट्टी से बना घट पहले मिट्टी ही था, मिट्टी जल, जल अग्नि, अग्नि वायु और वायु आकाश ही था अर्थात पहले सब कुछ आकाश ही था । आकाश से भिन्न कुछ था ही नहीं । फिर आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी यानी मिट्टी और मिट्टी से घट, मठ हो गये, अतः मूलतः घट मठ आकाश रूप ही है और आकाश में ही स्थित है किन्तु आकाश घट मठ में दिखने पर भी उनमे नहीं है । भले व्यवहार में आकाश को घट में प्रवेश कहा जाये किन्तु वह प्रवेश नहीं करता, यह तो आकाश का स्वभाव है । 
                 इसी प्रकार अव्यक्त ब्रह्म जब मूल प्रकृति की साम्यावस्था मे विस्फोट हुआ तो उसमें श्रुति ने ब्रह्म का प्रवेश आरोपित किया सामान्य जीवों में उसकी व्यापकता और स्वसंवेद्य “मैं” से अभिन्नता दिखाने के लिए वस्तुतः वह क्रिया उसमें हुई ही नहीं वह तो घटाकाश मठाकाश की तरह उसका स्वभाव है । जैसे सूर्य का स्वभाव है प्रकाश । उसे पता भी नहीं है कि मेरे प्रकाश से कोई प्रकाशित भी हो रहा है तथापि कहा जाता है कि सूर्य ने प्रकाश किया और इसी प्रकार से सब कार्य चल रहा है । इसी प्रकार उस अव्यक्त की व्याप्ति में जगत जड़ होते हुए भी चैतन्य सा परम प्रकाश के स्वभाव के कारण दिख रहा है परन्तु वह अव्यक्त उसमें है नहीं ।
             भावार्थ— सभी प्राणी मुझमें हैं कहने का तात्पर्य यह है कि उनकी अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है । वे प्राणी जो चैतन्य अपने को मानते हैं वह चैतन्यता मुझसे है ही है अर्थात वह अपने को जो आत्मरूप अनुभव करते हैं वह मुझसे ही है भिन्न नहीं इसलिये वे मुझमें हैं मैं उनमें नहीं हूँ, क्योंकि जगत व्यक्त अर्थात स्थूल और स्थूल में सूक्ष्म की व्यापकता है इसलिये मैं निरकार और अविनाशी स्वरूप से संपूर्ण जगत में व्याप्त हूँ फिर भी मैं उनके स्पर्श में नहीं आता यही भाव है ‘न चाहं तेष्ववस्थितः’ का ॥४॥

              संबंध— विधिमुख से वर्णन के बाद अब निषेधमुख से वर्णन करते हैं……
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥९/५॥
             शब्दार्थ— किन्तु वे प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं, मेरे योग अर्थात समत्वरूप ऐश्वर्य अर्थात सामर्थ्य को देखो, मेरे द्वारा संपूर्ण प्राणियों को उत्पन्न एवं धारण किया जाता है किन्तु मैं उन प्रणियों में स्वरूपतः नहीं रहता ।
             तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में कहा था कि संपूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ और अब कहते हैं वे भूत मुझमें नहीं हैं । इस बात को कैसे जानें ? यह मेरा सामर्थ्य है कि वे प्राणी मुझमें होते हुए भी मुझमें नहीं हैं । मेरे इस सामर्थ्य को योग द्वारा जान । योग का अर्थ है एकत्व बुद्धि के द्वारा । जैसे मिट्टी से घड़ा बना है । अब घड़े में मिट्टी है या मिट्टी में घड़ा ? यह जब विचार करेंगे तब पायेंगे कि घड़े से यदि मिट्टी निकाल लें तो घड़ा ही नहीं बचेगा । जिसका अर्थ घड़ा रूप उपाधि मिट्टी ने ही धारण किया है । इसी प्रकार परमेश्वर ने संपूर्ण प्रणियों को धारण किया है, संपूर्ण प्राणी परमेश्वर में हैं । विचार करने जैसे मिट्टी में घड़ा कल्पित है वस्तुतः नहीं, इसी न्याय से परमेश्वर में संपूर्ण चराचर प्राणी कल्पित है वस्तुतः है ही नहीं । यह कल्पित भाव जिसमें आरोपित है वही शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, निर्मल, निर्विकार, असंग, कूटस्थ, बाहर भीतर से रहित जो मेरा चिन्मय परमात्मस्वरूप ऐश्वर्य अर्थात सामर्थ्य है वह मैं ही हूँ ऐसा योग अर्थात अभिन्न भाव से जान ।
                जैसे मिट्टी में कल्पित घट मठ को मिट्टी ही धारण करती है और उनकी उत्पत्ति का हेतु भी मिट्टी ही है, वैसे ही संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति का हेतु मैं ही हूँ और उनको धारण करने वाला भी मैं ही हूँ— “अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।”७/६।।५।।
             अथवा यहां पर यह बताया कि  जो मैने पहले कहा कि सभी प्राणी मुझमें हैं किन्तु वास्तव में वे मुझमें नहीं हैं यह तो जो मुझमें दिख रहा है यह तो मेरी माया का चमत्कार है ऐसा देख यानी समझ । अध्याय ११/८ में भी भगवान यही कहते हैं पश्य मे योगमैश्वरम् यह कहकर अपनी अनुभूति कराते हैं और यहाँ उसी वाक्य द्वारा यह जो क्रियात्मक कहा जा रहा है उसे देखने का मतलब आत्मा अनात्मा के विवेक द्वारा समझने के लिए कहा जा है । प्रणियों का जो भी भरण पोषण होता है, प्राणियों की जो उत्पत्ति होती यह सब माया का चमत्कार है किन्तु जो प्राणियों में आत्मा करके मैं के अर्थ में जाना जाता है वह तो ममात्मा अर्थात मेरा स्वरूप ही है । 
         भगवान ने यहाँ पर संपूर्ण क्रियात्मक जड़ जगत को यहां पर स्व से भिन्न करके उन प्राणियों में जो चैतन्यता है वह मैं हूँ शेष माया का चमत्कार समझ लो यानी जान लो कहा है । इस प्रकार क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का दो विभाग यहीं पर कर दिया है जिसका विवरण भगवान तेरहवें अध्याय में देंगे ॥५॥

           संबंध— संपूर्ण प्राणियों को धारण एवं पोषण करने वाले होकर भी किस प्रकार निर्लिप्त रहते हैं यह बता रहे हैं……
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९/६॥
               शब्दार्थ— जिस  प्रकार महान वायु आकाश में  स्थित होकर सर्वत्र विचरण करती  है, उसी प्रकार संपूर्ण प्राणी मुझमें स्थित होकर क्रियाशील होते हैं ।
          तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में भगवान की निर्लिप्तता को योगमैश्वरम् द्वारा दिखाया गया और अब आकाश के दृष्टान्त द्वारा निर्लेपता बताते हुए कहते हैं कि जैसे महान यानी व्यापक आकाश से उत्पन्न वायु भी महान् अर्थात संपूर्ण आकाश में व्याप्त है वह सौम्य, रौद्र चाहे जिस रूप में विचरण करे किन्तु वह न तो आकाश से भिन्न सत्ता वाला हो सकता है और न ही आकाश का वायु से कोई संबंध बनता है क्योंकि वह वायु भी आकाश से उत्पन्न होने के कारण आकाश रूप ही है किन्तु आकाश की महानता का ज्ञान न होने के कारण भिन्न प्रतीत हो रही है । इसी प्रकार संपूर्ण प्राणी मेरी ही सत्ता मात्र से उत्पन्न होकर मुझसे ही धारण किये जा रहे हैं अतः वे मुझसे अभिन्न हैं, फिर भी मैं उनकी प्रत्येक क्रिया कलापों से निर्लिप्त शुद्ध चिन्मात्र चैतन्य सबका प्रकाशक निर्विशेष परमतत्त्व मैं ही हूँ ऐसा जान ॥६॥

             संबंध— प्राणियों की उत्पत्ति एवं लय का वर्णन……
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥९/७॥
            शब्दार्थ— हे कौन्तेय ! कल्प के क्षय होने पर संपूर्ण प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त हो जाते हैं । कल्प के पुनः प्रारंभ में मैं उनकी रचना करता हूँ ।
           तात्पर्यार्थ— प्राकृत लय में ब्रह्मा  जी का भी नाश होता जाता है । इस समय संपूर्ण प्राणी त्रिगुणात्मिका प्रकृति में लीन हो जाते हैं, पुनः कल्प के प्रारंभ होने पर मैं उनकी सृष्टि करता हूँ ।
              वस्तुतः ब्रह्म  तो असंग एवं निर्विकार  है तथापि “ममयोनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्” १४/३ प्रकृति जड़ है । बिना चैतन्य के सृष्टि का कार्य हो नहीं सकता, अतः जड़ प्रकृति को परमेश्वर से गर्भ होने का तात्पर्य है परमेश्वर के चैतन्यभाव के आश्रित संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति का हेतु अर्थात कारण । वह चैतन्य प्रकाश ही सबका बीज है “बीजं मां सर्वभूतनाम्” ७/१० वह पर प्रकाश ही सबका कारण होने के कारण सबकी सृष्टि करता ऐसा स्वयं श्रीभगवान आगे ९/१० में प्रकृति द्वारा सृष्टि का अपनी अध्यक्षता अर्थात प्रकाश में होने की बात कहेंगे । यहां अध्यारोप और वहां अपवाद ।
          अथवा अब ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अध्यारोप एवं अपवाद द्वारा अपने को निर्विकार और सभी विकारों का प्रकृति में होना दिखाने के लिए श्लोक दस तक चार श्लोकों में वर्णन करते हैं । पहले अपने ऊपर ही प्रणियों की उत्पत्ति का अध्यारोप करते हुए कहते हैं कि संपूर्ण प्राणी कल्प के क्षय अर्थात नाश होने पर मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और फिर जब नये कल्प का आरंभ होता है तब उन्हीं प्राणियों की मैं रचना करता हूँ । यहाँ विचारणीय यह है कि जब कोई प्राणी परमात्मा को प्राप्त ही नहीं होते हैं तो उन्हीं प्राणियों की वे सृष्टि कैसे करते हैं ? दूसरी बात यह है कि सृष्टि करने का अर्थ है कि जो है नहीं उसकी उत्पत्ति करना― जैसे किसी संतान नहीं है अतः वह संतान की उत्पत्ति करता है लेकिन अगर किसी की संतान है और वह कहे कि मैं अपनी उसी संतान की पुनः उत्पत्ति करता हूँ तो यह बात समझ के बाहर है तथापि भगवान कहते हैं कि मैं उन्हीं प्राणियों का सृजन करता हूँ अन्य का नहीं । इसका स्पष्टीकरण भगवान स्वयं ही आगे करेंगे ॥७॥

               संबंध— प्रकृति को अपने आधीन करके सृष्टि की रचना का कथन……
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्रामिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥९/८॥
            शब्दार्थ— प्रकृति  के आधीन होने के कारण परवश हुए प्राणि  समुदाय को प्रकृति को अपने आधीन करके बार बार उत्पन्न करता हूँ ।
             तात्पर्यार्थ— प्रकृतेर्वशात् अवशः अर्थात प्रकृति के आधीन परवश जिसे “प्रकृतिं यान्ति भूतानि”  ३/३३ में कहा वही यहाँ की प्रकृति है जिसे व्यष्टि प्रकृति कह सकते हैं । इस प्रकृति के अन्तर्गत राग द्वेष ईर्ष्या काम क्रोध आदि अनन्त विकार होते हैं । इन्हीं विकारों के परवश हुआ संपूर्ण जीव समुदाय अर्थात चार प्रकार के जीव अंडज, पिंडज, स्वेदज एवं जरायुज प्राणियों को, अपनी प्रकृति को आधीन करके अर्थात शुद्ध सत्वात्मिका प्रकृति का आश्रय लेकर पुनः पुनः उनके गुण कर्म स्वभाव के अनुसार उत्पन्न करता हूँ ।
          अथवा अध्याय ४ में अपने प्राकट्य को लेकर कहा था ‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय’ ४/६ और यहाँ पर ‘प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य’ कहा अर्थात चाहे जीव की रचना करना हो या फिर स्वयं को प्रकट करना हो प्रकृति का विराट परमेश्वर पर कोई नियंत्रण नहीं होता है बल्कि प्रकृति पर परमात्मा का ही नियंत्रण होता है जबकि जीव प्रकृति के आधीन होता है और वह अपने ही किये गये पुण्य-पापमय कर्मों के फलस्वरूप उनके पराधीन वैसे ही होता है जैसे बलि का बकरा रस्सी और खूंटे से बंधकर पराधीन होता है और उसका स्वामी बलि का समय उपस्थित होने पर बलि दे देता है । इसी प्रकार ‛मैं मैं’ करने वाला जीव बलि का बकरा है, उसके पुण्य-पापमय कर्मों के प्रति आसक्ति ही रस्सी है एवं प्रकृति अर्थात स्वभाव ही खूंटा है जिसे वह चाहकर भी नहीं तोड़ सकता ‘प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ३/३३, प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति” १८/५९ इस प्रकार अपने ही कर्मों के फलस्वरूप पराधीन जीव प्रकृति के आधीन होता है जिसकी मैं सृष्टि के आदि में पुनः पुनः रचना करता हूँ 
             यहाँ पुनः पुनः कहने का तात्पर्य यह है कि वह अपने स्वभाव को फलासक्ति के कारण जब तक परिवर्तित करके मेरे साथ एकात्मता प्राप्त नहीं कर लेता तब तक वह निरंतर जन्मता मरता रहेगा यह भाव है ।
              टिप्पणी— बार बार उत्पन्न करने के साथ बार बार मरना भी अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि जब जन्मेगा तो मरेगा ही मरेगा नहीं तो जन्मेगा कहाँ से ? अर्थात “क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु” ।१६/१९ एवं “आसुरीं योनिमापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि ।” १६/२० समझना चाहिए ॥८॥

                 संबंध— मैं ही सबको उत्पन्न और नाश करने वाला हूँ फिर भी मुझे कर्म नहीं बांधते, क्योंकि……
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मषु ॥९/९॥
              शब्दार्थ— हे धनञ्जय ! किन्तु उन उन रचना आदि कर्मों में अनासक्त उदासीन की तरह स्थित रहने से वे कर्म मुझे नहीं बांधते ।
           तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान पाप, पुण्य रूप कर्म और उसके फल में क्यों नहीं बंधते इसका कारण बताया कर्मों के प्रति आसक्ति का न होना, उदासीन की भांति स्थित रहना, जैसे उन कर्मों से कोई मतलब ही न हो । यहां उदासीनवत् कहा है जैसे कोई कर्मों से उदासीन हो जाये तो कर्मों का प्रश्न ही नहीं, किन्तु यहां सृष्टि स्थिति रूप संहार हो रहा है, किन्तु जैसे कर्मों के प्रति उदासीन की आसक्ति न होने के कारण उदासीन हो जाता है अर्थात कर्म नहीं करता है, किन्तु यहां कर्मों के प्रति आसक्ति तो नहीं है किन्तु तटस्थ भाव से कर्म है ।           
            शंका उठती है कि कर्म तो है भले कर्मों के प्रति आसक्ति न हो, उदासीन की तरह ही हो, किन्तु उसका फल तो होगा ही, इस पर कहते हैं— “न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते” ४/१४ मुझे कर्म क्यों नहीं बांधते इसका कारण कर्मों के प्रति केवल अनासक्ति और उदासीनत्व ही नहीं है बल्कि कर्मफल की भी इच्छा नहीं रखता । मनुष्य को कर्मफल की इच्छा ही जन्म-मृत्यु रूप बंधन में बांधती है । कर्मफल की इच्छा न रखने वाला मनुष्य भी कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है तो फिर वही कर्म मुझे कैसे बांध सकते हैं ?  अतः यहाँ कर्मों के प्रति अनासक्ति और उदासीवत् का अर्थ है कर्मफल के प्रति अनासक्ति, उदासीनता, अनिच्छा ।
             इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को कर्म नहीं कर्मफल आसक्त कर देता है क्योंकि फल की चाह से कर्म में तत्पर होने वाला स्वतः आसक्त हो जाता है और यदि फल न चाहे तो भी वह अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जो समाज के लिए कर्म करता है उसमें जो मैने समाज के लिए यह किया और आगे ऐसा करूंगा, यह जो कर्तापन है यह भी बंधन देने वाला है । अतः यहाँ भगवान यह कहना चाहते हैं कि मुमुक्षु जिस समय आसक्ति और कर्तापन का त्याग कर देगा उसी समय वह भी मेरी ही तरह कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा । यही यहाँ का तात्पर्य है ॥९॥
           अथवा (बाद में उत्पन्न भाव―) यहाँ “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि” २/४७ की व्याख्या को समझना चाहिए श्लोक के पूर्वार्द्ध में कर्म करने का अधिकार बताया किन्तु फल पर अधिकार नहीं, और उत्तरार्द्ध में कर्म का हेतु अर्थात निमित्त बनने को भी मना किया है जिसका अर्थ कर्म तो करो, फल मत चाहो और मैं कर्मकर्ता हूँ यह भाव भी मत रखो साथ ही कर्मकर्ता नहीं हूं का भी भाव मत रखो । अटपटी बात है कर्म का अधिकार वर्ण आश्रम आदि स्थान के अनुसार जो है, उस कर्म फल को न चाहकर भी प्रमाद मत करो और फल की इच्छा से कर्म मत करो, निष्कामकर्म कर्म तो करो लेकिन निष्काम कर्मी होने का भी भाव मत रखो फिर सकाम भाव कैसे रखा जा सकता है ? अतः इस कर्म की पूर्ति बिना योग के संभव नहीं जिसे २/४८ में कहा है और योग की परिभाषा “समत्त्वं योग उच्यते” की ।  इसी दशा में कर्म में लिपायमान और उसके बन्धन में न बंधने की बात ४/१४ में करते हैं और उसी का समाधान पुनः यहाँ स्वयं के प्रमाण द्वारा तीनो लोकों की सृष्टि स्थिति संहार करके भी कर्म में न बंधने की बात कहकर यह कहना चाहते हैं कि इसी प्रकार जिसकी बुद्धि कर्म और कर्मफल से लिप्त नहीं होती वह भी चाहे तीनो लोकों की सृष्टि स्थिति संहार कर डाले फिर भी यह सब करता हुआ भी वह न कुछ करता है और न ही उस कर्म के फलस्वरूप उसके पुण्य पाप से बंधकर जन्म मृत्यु को ही प्राप्त होता है अर्थात वह सदा सर्वदा मोक्षस्वरूप ही है “यस्य नाहङ्कृतोभावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते १८/१७ ऐसा भाव है ॥९॥

              संबंध— पूर्व श्लोक में बताया कि आसक्ति न होने के कारण मैं कर्मबंधन में नहीं बंधता और अब यहाँ बता रहे हैं कि वस्तुतः मैं कर्म करता ही नहीं हूँ, मेरे प्रकाश में मेरी प्रकृति ही संपूर्ण चराचर के परिवर्तन का हेतु है……
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥९/१०॥
          शब्दार्थ— हे  कौन्तेय ! मेरी अध्यक्षता में प्रकृति ही संपूर्ण चराचर प्राणियों की रचना करती है, इसी कारण संसार परिवर्तित होता रहता है ।
             तात्पर्यार्थ— जैसे राजा की सत्ता मात्र से ही सत्तावन होकर प्रधानमंत्री से लेकर जल्लाद तक सभी अपना अपना कार्य करते हैं, राजा कुछ नहीं करता । राजसत्ता के अधिकार से किसी को पुरस्कार या फांसी देने वाले कर्मचारियों को पुण्य, पाप नहीं होता, क्योंकि वह कार्य राजा के लिए हो रहा है, राजा से प्राप्त अधिकार से हो रहा है, राजा किसी से शत्रुता मित्रता राग द्वेष रखता नहीं है, अतः राजा उन उन कर्मों से नहीं बंधता ।
              जैसे सूर्य के प्रकाश से ही संपूर्ण प्राणियों की कर्म में प्रवृत्ति होती है । उस प्रकाश के आश्रित चाहे चोरी करे या धर्म, चाहे किसी की रक्षा करे या हत्या, किन्तु सूर्य के प्रकाश से कोई लेना देना नहीं है । वहां उसका आश्रय लेकर सदसद् कर्मों से संबंध बनता नहीं तो उसका भोग रूप बंधन कैसे उपस्थित होगा ?
                इसी प्रकार परमात्मा की अध्यक्षता अर्थात परमात्मा के सहज स्वाभाविक चैतन्य प्रकाश की सत्ता मात्र से सत्तावन होकर समष्टि प्रकृति ही संपूर्ण स्थावर जंगम प्राणियों का प्रसव करती है । चूंकि प्रकृति परिवर्तनशील है इसी कारण यह संसार बारंबार परिवर्तित होता रहता है । बारंबार परिवर्तन का अर्थ है कि बारंबार उत्पत्ति, वृद्धि एवं क्षय को प्राप्त होता रहता है । यहां ध्यान देने की बात यह है कि माया अर्थात प्रकृति पुरुष से भिन्न है या अभिन्न, कहना कठिन है, इसीलिये आचार्य शंकर ने माया को अनिर्वचनीय माना है । प्रकृति अनादि भी है और अव्यक्त भी है । अनादि इस लिए कि इसका जन्म अर्थात प्रकाट्य कब हुआ कोई नहीं जानता, अव्यक्त इसलिये कि प्रलय काल में अव्यक्त ही होती है । वस्तुतः इस समय भी व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूपों में उपस्थित है जिसे हम व्यष्टि और समष्टि प्रकृति के रूप में जानते हैं ।
            प्रकृति का अनादित्व तो सिद्ध है किन्तु नाश किसी भी श्रुति शास्त्र ने सिद्ध नहीं किया है । श्रुति शास्त्र ने प्रकृति को परिवर्तनशील अवश्य माना है जैसा कि यहां भी “जगद्विपरिवर्तते” कहा गया है । हमारे यहाँ गांव की भाषा में आरोप प्रत्यारोप चलता ही रहता है जिसे वेदान्त की भाषा में अध्यारोप और अपवाद कहते हैं । जैसे कोई मर गया यह सामान्य प्रक्रिया है मरना, जबकि शास्त्रानुसार मृत्यु असंभव है तो मरना होगा कैसे ? जीव और शरीर के संबंध/रूप परिवर्तित हो गये हैं । जीव ने जहां दूसरा शरीर धारण कर लिया है वहीं शरीर पंचभूतों का अंश होने से पंचभूतों में मिल गया न कि नष्ट हुआ यही है परिवर्तनशील प्रकृति । मरना या मर जाना अध्यरोप हो गया और शरीर का पंचभूतों में मिल जाना अपवाद हो गया ।
              एक कागज का टुकड़े जला दिया, जलकर मिट्टी में मिल गया, फिर जल, अग्नि, वायु और आकाश में क्रमशः मिल गया । आकाश अव्यक्त प्रकृति में और अव्यक्त प्रकृति पुरुष के साथ मिलकर शान्त हो गई । यही आत्यन्तिक प्रलय है । अब देखिए 👉एक कागज का टुकड़ा जिसे जल जाने पर हम नष्ट होना कहते हैं, वही जब मूलभाव में पहुंचा तब कहां पहुंचा ? अर्थात कागज कार्य रूप को त्याकर अपने मूल कारण भाव को प्राप्त हो गया । आज का विज्ञान भी इस बात को मानता है कि संसार की कोई भी वस्तु नष्ट नहीं होती है, उसका रूप परिवर्तित होता है । उसके सूक्ष्म परमाणु आकाश मंडल में स्थित रहते हैं । फिर हमारा श्रुति सिद्धांत इस बात को मानता है इसमे क्या आश्चर्य ?
             अनादि प्रकृति का अभिन्न होकर शान्त हो जाने को ही “अनादि शान्त प्रकृति” के नाम से जाना जाता है, आचार्य श्री यह बात अनेक स्थानों पर कहते हैं । इसी अनादि शान्त प्रकृति में जब हलचल होती है, जो हलचल से पूर्व तीनों गुणों की साम्यावस्था अनादि अव्यक्त एवं शान्त प्रकृति कही गई है तब उसी चैतन्य प्रकाश का आश्रय लेकर, क्योंकि प्रकृति का नियम है कि जिसका आश्रय लेती है उसी का विषय करती है अतः अपने आश्रयी चैतन्य प्रकाश को ही विषय बनाकर संपूर्ण चराचर जगत का प्रसव करती है । इसे ही समष्टि प्रकृति कहते हैं । जिन राग द्वेष अस्मिता आदि को लेकर प्राणी प्रकृति में लय को प्राप्त हुए थे उन्हीं गुणों के आश्रित अर्थात परवश होकर उत्पन्न होने वाले प्राणियों का स्वभाव ही व्यष्टि प्रकृति कहलाती है ।
               जड़ प्रकृति स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं कर सकती है, चैतन्य प्रकाश भी अकेले कुछ नहीं कर सकता है क्योंकि वह निष्क्रिय है । अतः चैतन्य प्रकाश की सत्ता से जड़ प्रकृति में प्रकट हुआ चैतन्याभास ही सृष्टि का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है । प्रकृति को स्वतंत्र सत्ता नहीं दिया जा सकता है, क्योकि पहली बात वह स्वतंत्र कुछ कर नहीं सकती, दूसरी बात पुरुष से भिन्न अर्थात अलग होने के लिए देश काल की आवश्यकता होगी । अलग देश काल की आवश्यकता होने के लिए उसका भी व्यापकत्व चाहिए, क्योंकि प्रकृति और पुरुष की सत्ता के लिए उनका और भी कोई आधार चाहिए, फिर उनका, फिर उनका । अतः इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होगा, इसलिये प्रकृति पुरुष को अभिन्न मानना ही युक्ति संगत है ।
                जब प्रकृति पुरुष अभिन्न हैं तो  इसी अभिन्नता से सारी सृष्टि उत्पन्न होती है । इसी कारण प्रकृति सृष्टि का उपादन कराण है और पुरुष निमित्त कारण है । प्रकृति पुरुष की अभिन्नता के कारण ही परमेश्वर ही सृष्टि के अभिन्न निमित्तोपादान कारण कहे गये हैं ।
             थोड़ा विचार कीजिए कि अर्धनारीश्वर मे आधे शरीर में महादेव और आधी भगवती पार्वती हैं । इस में दोनो को यह कहना कठिन है कि किसने किसको अपने आधे शरीर में धारण किया है ? तथापि दोनो अभिन्न हैं यही यथार्थ सत्य है । इस आधार पर जबकि प्रकृति का नाश नहीं होता, मात्र परिवर्तन होता है, इसमें परिवर्तन प्रकृति और नाश न होना सत्ताधिपति अविनाशी परमेश्वर है इसी बात को लेकर श्रुति कहती है “पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥” अर्थात वह ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत भी ब्रह्म से उत्पन्न होने के कारण पूर्ण है । उस अर्थात ब्रह्म के कारण ही इसे अर्थात संपूर्ण जगत को पूर्ण कहा जाता है । पूर्ण से पूर्ण निकाल लेने पर अर्थात उस पूर्ण से इस पूर्ण को निकाल लेने से अर्थात संसार रूप पूर्ण के परिवर्तन होने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है ।
              इसी श्रुति के अनुसार भी प्रकृति को अनादि मानना और नष्ट होना भी मानना युक्तिसंगत नहीं है । जब प्रकृति नष्ट ही होती है तो अनन्त कल्पों से अब तक नष्ट क्यों नहीं हुई ? बार बार कल्प और प्रलय महाप्रलय यानी आत्यंतिक प्रलय के बाद बिना प्रकृति के सृष्टि कैसे उत्पन्न हो गई ? ब्रह्म अविनाशी अव्यय है, प्रकृति अनिर्वचनीय एवं ब्रह्म से अभिन्न है । प्रकृति के नाश होने पर पुरुष के नाश का भय उपस्थित होकर श्रुति शास्त्र द्वारा पुरुष को नित्य अव्यय शाश्वत कहना निरर्थक हो जायेगा । अतः यह सिद्ध हुआ कि प्रकृति नष्ट नहीं होती है । मात्र रूपगत परिवर्तन होता है, जैसा कि यहां पर “जगद्विपरिवर्तते” द्वारा कहा गया है । यही मानना पड़ेगा ।         
           अथवा चैतन्य प्रकाश है परमात्मा, उसी चैतन्य के प्रकाश से चैतन्य भाव को प्राप्त जड़ प्रकृति ही संपूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करती है इस आधार पर सबका आत्मा ‘अहमात्मा’ १०/२० मैं ही हूँ सभी आत्माओं का आत्मा यानी अधिपति मैं ही हूँ अतः मैं अध्यक्ष हूँ । मेरी ही अध्यक्षता में प्रकृति जो नित्य क्षरण को प्राप्त हो रही है, परिवर्तन शील है और उसी के द्वारा संपूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने के कारण ही संपूर्ण जगत परिवर्तन को प्राप्त हो रहा है ।
              अभी तक जो पहले कहा था कि मैं ही संपूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करने वाला हूँ अपने ऊपर यह अध्यारोप किया था उसी का अब अपवाद कर देते हैं कि यह सब मैं ही करता हूँ यह कहने का कारण यह था कि मैं ही सबका अधिष्ठान हूँ अतः मैं ही सब कुछ करता हूँ यानी जो कुछ भी हो रहा है, हुआ और होगा वह सब क्रियाएं मुझमें ही थीं, हैं और होंगी ऐसा समझो, किन्तु यदि मैं ही सृष्टि करता तो मैं नित्य हूँ, अज यानी अजन्मा हूँ, निर्विकार हूँ, अक्षय हूँ अर्थात अविनाशी हूँ तो फिर मुझसे यह मरणधर्मा विकारी जगत कैसे उत्पन्न होगा ? अर्थात मेरी ही तरह षड्विकारों से रहित ही जगत होता किन्तु यदि मुझसे ही षड्विकारों से रहित जगत होता तो फिर अनेक नित्य सत्ताएं होने से भी परिच्छिन्नता का दोष और सृष्टि में अनवास्था दोष उत्पन्न हो जाता इससे मेरा सावयत्व सिद्ध होने से मेरा ही विनाश हो जाता जबकि मैं अविनाशी नित्य एकरस हूँ । अतः परिवर्तनशील प्रकृति से ही यह परिवर्तनशील जगत उत्पन्न हुआ है और मैं निर्विकार निष्क्रिय एकमेवाद्वितीम् हूँ ऐसा निश्चय करके जानना चाहिए ।
              भावार्थ— चैतन्य प्रकाश की सत्ता से प्रकृति ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती है । पुरुष निरपेक्षभाव, अक्रिय रूप से स्थित है । परमेश्वर ही अभिन्न निमित्तोपादान कारण है । कर्तृत्व, भोक्तृत्व, आदि गुण प्रकृति के परिवर्तन से संबद्ध हैं यही यहाँ “जगद्विपरिवर्तते” का एवं असंगत्व, अक्रियत्व आदि गुण संपन्न होने पर भी उसके चैतन्य प्रकाश में सभी क्रिया का होना अध्यक्षत्व है मयाध्यक्षेण का भावार्थ है ॥१०॥

               संबंध— संपूर्ण शरीरों मे साक्षीभाव से स्थित मुझ परमेश्वर को मूढ़ नहीं जानते, इसका कथन……
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजान्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥९/११॥
             शब्दार्थ— मूढ़ लोग संपूर्ण प्राणियों के ईश्वर मेरे परम सत्ता रूप को नहीं जानते, मुझे मनुष्य शरीर वाला अर्थात साधारण मनुष्य की तरह स्वरूपतः मुझे न जानकर मेरी अवज्ञा अर्थात अपमान करते हैं ।
             तात्पर्यार्थ— मूढ लोग अर्थात अविचार प्रधान, जिनमें सदसद् का कोई विवेक नहीं ऐसे लोग मुझे स्वरूपतः न जानकर साधारण मनुष्य समझकर मेरी अवज्ञा करते हैं, उपहास/अपमान करते हैं, क्योंकि मूढ़ता को प्राप्त होने के कारण मैं जो संपूर्ण भूतों अर्थात आकाश से लेकर पृथ्वी तक, पाताल से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत मैं ही देव, दानव, मानव सहित संपूर्ण चराचर प्राणियों का स्वामी हूँ मैं ही सबको सत्ता देनेवाला आकाश का भी आकाश हूँ । मेरा यह जो सच्चिदानन्दस्वरूप, निष्कल, निष्क्रिय, साक्षी रूप को आचार्य और श्रुति के द्वारा मेरा जो परम सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है उसको स्वरूपतः न जानने के कारण मैं कृष्ण शरीर वाला ही हूँ ऐसा साधारण मनुष्य समझकर मेरा उपहास करते हैं ।
              यहां ध्यान देने की बात यह है कि प्रस्तुत श्लोक में मनुष्य शरीर की बात कही गई है और साथ में संपूर्ण प्राणियों का स्वामी साक्षी रूप स्वीकार करते, इसलिये मनुष्य पशु पक्षी वृक्षादि योनियों में जलचर थलचर नभचर रूप में भी अवतरित शरीरों का यहां पर अध्याहार कर लेना चाहिए, साथ ही संपूर्ण प्राणियों में मैं स्थित हूँ, क्योंकि मैं ही सर्वरूप हूँ “वासुदेवः सर्वम्” । अतः अन्य प्राणियों को भी विवेकशील द्वारा अपमानित न किये जाने का प्रत्यक्ष निर्देश है, मात्र मूढ पुरुषों को छोड़कर ।
           अथवा परम् यानी जिससे पर यानी श्रेष्ठ अन्य कोई भी सत्ता नहीं है । भाव सत्ता का बोध कराता है जिससे अपने निर्विशेष, सबको सत्ता देने वाला किन्तु जिसकी और कोई सत्ता न होकर स्वयं से स्वयं में स्थित है ऐसे स्वरूप का संकेत करते हैं । भूतमहेश्वर से अपने औपाधिक ईश्वर रूप का बोध कराते हुए ब्रह्मा से लेकर स्तंब पर्यंत सब पर अनुशासन करने का बोध कराते हैं । मूढा यानी जिनकी कोई आत्मा अनात्मा आदि की सोच उत्पन्न ही नहीं होती ऐसे विषय लोलुप अनीश्वरवादी । तनुमाश्रितम् अर्थात जैसे हम सभी स्त्री पुरुष के संसर्ग से उत्पन्न होने वाले हैं वैसे ये देवकीनंदन, कौशल्यानंदन हमारी ही तरह उत्पन्न हुए मनुष्य से भिन्न ईश्वर हो ही नहीं सकते इस प्रकार अवजान्ति अर्थात जानते हैं । यही इनकी मूढता है ॥११॥

           संबंध— जो लोग मुझे स्वरूप से नहीं जानते वे व्यर्थ आशादि वाले राक्षस एवं असुर हैं इसका कथन……
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव मोहिनीं प्रकृतिं श्रिताः ॥९/१२॥
              शब्दार्थ— जो राक्षसी आसुरी एवं मोहिनी प्रकृति का आश्रय लेने वाले हैं उन विचार हीन अविवेकी पुरुषों की आशाएं, कर्म और ज्ञान सभी व्यर्थ हैं ।
           तात्पर्यार्थ― आत्मस्वरूप परमसत्ता को आत्म रूप में न देखने वाले की आशाएं अर्थात् आत्मा से कोई भिन्न परमात्मा है, मैं उसकी प्राप्ति करूंगा ऐसी जो आशाएं हैं वे व्यर्थ हैं, स्व से भिन्न किसी परमात्मा की प्राप्ति की प्रत्येक चेष्टाएं (कर्म) व्यर्थ हैं, आत्मा-परमात्मा का बड़ी ही सूक्ष्मता से विवेचन करने वाला भेद ज्ञान भी व्यर्थ है, क्योंकि उन्होंने मोहित करने वाली राक्षसी-आसुरी स्वभाव का आश्रय लिया हुआ है । 
          इस श्लोक में स्प्षट रूप से संपूर्ण प्राणियों में स्थित आत्मा को परमात्मा रूप में न देखकर भिन्न भाव रखने वाला राक्षस एवं असुर कहा गया है । दुर्भाग्यवश आज पत्थर में भगवान तो सिद्ध हो गया है लेकिन इंसान में भगवान तो क्या इंसान भी भी सिद्ध नहीं हो पाया ।
          अथवा पूर्वोक्त श्लोक में बताया कि जो संपूर्ण प्राणियों के स्वामी सर्वात्मा परमेश्वर हैं, उनकी विभिन्न शरीरों में स्थिति न देखते हुए सामान्यजन क्यों समझकर तिरस्कार करते हैं ? उसका कारण यहां बता रहे हैं कि वे राक्षसी और आसुरी प्रकृति अर्थात तामसी और राजसी गुणों के आधीन होकर दिन प्रतिदिन मोह के आश्रित होकर वे नित्य तमोगुणोत्पन्न काम क्रोधादि के आधीन रहकर श्रुति शास्त्र प्रतिपाद्य मुझ सर्वात्मा को तत्त्वतः न जानने के कारण तमोगुण प्रधान आशाएं करते हैं— किसी के धन और मरने की आशा करना “असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि” १६/१४, तदनुसार तंत्र मंत्र मारण मोहन उच्चाटनादि कर्म करना, और इसी प्रकार का ज्ञानार्जन करना । इसी प्रकार राजस प्रधान स्वर्गादि की कामना करना, विभिन्न देवी देवताओं से संबंधित उपासना करके सांसारिक भोगों की प्राप्ति, इन्द्रिय और प्राणों का पोषण करना आदि से संबंधित व्यर्थ की आशाएं, कर्म और ज्ञान रखने वाले विचेतस अर्थात सदसद् विवेक रहित हैं । 
           भावार्थ— सारांश यह कि जो आशाएं आत्मैक्य की भावना से भावित नहीं हैं, जो कर्म सर्वात्मा का दर्शन करा पाने में असमर्थ हैं, जिस ज्ञान द्वारा अन्तर्गुहा में स्थित सर्वात्मा का साक्षात्कार न हो सके वह आशा कर्म एवं ज्ञान राक्षसी आसुरी अर्थात तामसी और राजसी है । (अ.१६ में वर्णन फल सहित किया जायेगा)॥१२॥

             संबंध— आसुरी संपत्ति संपन्न अविद्वानों का वर्णन करके अब दैवी संपत्ति का कथन……
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥९/१३॥
           शब्दार्थ— परन्तु हे पार्थ ! महात्मा लोग दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर संपूर्ण प्राणियों के आदि रूप से मुझको जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं । 
            तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में वर्णित आसुर संपत्ति से विलक्षणता दिखाने के लिए “तु” शब्द है । दैवी संपत्ति का वर्णन अध्याय १६/१-३ देखना चाहिए । यहां पर दैवी संपत्ति से साधन चतुष्ट अर्थात विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान ये षट्संपत्तियां), और मुमुक्षुत्व से संपन्न समझना चाहिए । इन साधनों से जिसकी आत्मा उत्कृष्टता को प्राप्त हो चुकी है वे महात्माजन संपूर्ण प्राणियों का आदि अर्थात उत्पन्न करने वाले को श्रुत्याचार्य प्रसाद से तत्त्वतः मुझे जानकर अनन्य मन से अर्थात जिसका मन मुझ सच्चिदानन्द, नित्यैकरस, कभी क्षरित न होने वाले अव्यय में ही जिसका मन एकाकार हो गया है । मुझ सर्वात्मा से अभिन्न और कुछ है ही नहीं ऐसी एकनिष्ठ वृत्ति वाला मेरा अभिन्न भाव से भजन अर्थात चिन्तन करता है ।
             शंका-समाधान— अध्याय ७/१४ में दैवी माया यानी प्रकृति को दुर्लंघ्य बताया गया है और यहां उसका आश्रय लेकर तत्त्वतः स्वरूप से परमेश्वर को जानकर आत्मनिष्ठा से भजन करने को कहा है वह भी अगले श्लोक के अनुसार नित्य अभिन्न भाव से इसी विरोधाभास का निवारण करने के लिए दैवी प्रकृति का भी वर्णन अध्याय १६ में किया जायेगा ।
           भावार्थ— भजन्त्यनन्यमनसो अर्थात एकाकार वृत्ति है जिसकी ऐसा । ऐसी एकाकार वृत्ति में बारंबार यत्नपूर्वक स्थित रहना । ऐसा भाव है (पूर्वोक्त और इस श्लोक का वर्णन अध्याय १६ में आयेगा । यहाँ पर दोनो श्लोक बीज रूप में समझना चाहिए) ॥१३॥

              संबंध— पूर्वोक्त अनन्य मन वाला किस प्रकार भजन करेगा इसका वर्णन……
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥९/१४॥
             शब्दार्थ— निरंतर यत्नपूर्वक दृढव्रती होकर कीर्तन करते हैं, मुझे भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं और नियमपूर्वक उपासना करते करते हैं ।
           तात्पर्यार्थ— प्रस्तुत प्रसंग में विचित्र कूट भाव है । ‘इदं तु ते…’ मोक्ष्यसेऽशुभात् की उपक्रम में की गई प्रतिज्ञा से विरुद्ध भाव उत्पन्न न हो यह ध्यान रखना आवश्यक है, जिसके अनुसार दृढव्रती अर्थात संशय विपर्यय रहित श्रुति शास्त्र द्वारा निर्धारित तत्त्व की दृढता होनी चाहिए । किसी भी प्रकार के लौकिक पारलौकिक भोगो के प्रति आकर्षण मन में न हो । ब्रह्मचर्य शमादि का दृढता से प्रयत्नपूर्वक पालन होना चाहिए । निरंतर आचार्य के पास रहकर वेदान्त के सिद्धांत का श्रवण करना और कराना ही कीर्तन करना है । उस परमात्मा के स्वरूप का तत्त्वतः विवेचन करना ही कीर्तन है यही उस परमेश्वर के गुणों का कीर्तन है । यह कार्य सतत अर्थात अनवरत चलते रहना चाहिए । सोये तो उसी का चिन्तन, जागें तो उसी का स्मरण और बात करें तो उसी परमतत्त्व की यही कीर्तन है । और “माम् नमस्यन्तः” अर्थात मुझको नमस्कार का तात्पर्य है जिस गुरु से वेदान्त श्रवण किया गया है वह गुरु कोई और नहीं मैं स्वयं वासुदेव ही हूँ “वन्दे कृष्णं जगद्गुरुम्” अतः गुरू में ही स्थित मुझ वासुदेव को नमस्कार करे । मुमुक्षु नमस्कार करेगा तो जो प्रार्थना करता है जिससे हृदय के निश्छल उद्गार निकलते हैं वही भक्ति है । अतः मुमुक्षु के उद्गार मोक्ष से अतिरिक्त और हो भी क्या सकते हैं ? “तं ह देवमात्मबुद्धि प्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।” अर्थात मैं मुमुक्षु बुद्धि में आत्मतत्त्व का प्रकाश करने वाले देव की शरण ग्रहण करता हूँ, यही उद्गार ही भक्ति है अतः भक्तिपूर्वक नमस्कार करे । इसी प्रकार की मुमुक्षु की उपासना होती है अतः नियमपूर्वक अनवरत ऐसी उपसनाकीर्तन और भक्तियुक्त नमस्कार पूर्वक मुमुक्षु करते हैं । यही इसका तात्पर्य है अन्यथा उपक्रम के विरुद्ध होने से गीता के स्वरूप का हनन होगा ।
          टिप्पणी— ये साधना उच्च अधिकारी के लिए तो ठीक है, आगे मध्यम और कनिष्ठ अधिकारी जो भेदोपासना करते हैं उनका भी वर्णन अगले श्लोक के उत्तरार्ध से आ रहा है । हम कनिष्ठ तो क्या अधम अधिकारी भी कहलाने के योग्य नहीं हैं । अतः हमारे परमाराध्य श्री कहते थे दिन में कम से कम सौ बार भगवान को नमस्कार करना चाहिए । उनका जप ओम, नमः शिवाय आदि, मंत्र आदि का जप सतसंग और शास्त्र चिन्तन करते रहना चाहिए यहाँ पर भी कीर्तन नमस्कार से यही समझना चाहिए । उपासना से गीता, विष्णु शिव सहस्रनाम आदि का पाठ स्तुति और उपासना भी हो गई और नाम कीर्तन भी यह समझना चाहिए । स्वयं आनन्दगिरि जी ने भी यही माना है ॥१४॥

              संबंध— उत्तम अधिकारी का कथन करके अब मध्यम और कनिष्ठ अधिकारी का वर्णन करते हैैं……
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥९/१५॥
              शब्दार्थ—  अन्य एक तो एकत्व रूप ज्ञानयज्ञ द्वारा मेरा यजन करते हैं और दूसरे मुख विश्वतोमुख अर्थात विश्व ही जिसका मुख है ऐसे विश्वतोमुख की भेद द्वारा उपासना करते हैं ।
             तात्पर्यार्थ— यहाँ विश्वतोमुख दोनो पक्ष में जायेगा । एकत्व पक्ष अर्थात संपूर्ण विश्व ही जिसका मुख अर्थात स्वरूप है मनुष्य तिर्यगादि योनियों में जो सबके अन्दर आत्मा है वही आत्मा “भूतादिमव्ययम्” ९/१३ है विराट भाव में । वह आत्मा से अभिन्न होने के कारण “मैं ही हूँ” इस प्रकार “अयमात्मा ब्रह्म” का अनुसंधान “अहं ब्रह्मास्मि” के रूप में अनुभूत होता हुआ वेदान्त प्रतिपाद्य परमतत्त्वमय वृत्ति में बारंबार स्थित होने का प्रयत्न ज्ञानरूप यज्ञ करते हैं । वेदान्त का यही निदिध्यासन है । 
          भेदोपासक यानी प्रतीकोपासक ॐ, सूर्य, गणेश, शिव, विष्णु, दुर्गा आदि में ब्रह्माकार वृत्ति से मुझ विश्वरूप की उपासना करते हैं ।
            अथवा यहाँ ज्ञानयज्ञ द्वारा अध्याय ४में जीव की ब्रह्म में आहुति देना अर्थात जीवब्रह्मात्मैक्य रूप उपासना करना, ब्रह्मार्पणं ब्रह्म द्वारा अपने सहित प्रत्येक क्रिया में ब्रह्म दृष्टि करना, अयमात्मा ब्रह्म, इत्यादि श्रुति वर्णित अभिन्न उपसना करना । भेदोपासक ॐ, शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश आदि के रूप में उन्हीं का स्वरूप संसार है ऐसा करके स्वामी सेवका भाव से उपासना करते हैं ॥१५॥

           संबंध— सभी उपासनाएं भिन्न भिन्न होने पर भी एक ही परमेश्वर की कैसे हैं ? यह अगले चार श्लोक में बता रहे हैं……
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥९/१६॥
            शब्दार्थ— मैं संकल्प हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं आज्य अर्थात हवन में प्रयुक्त होने वाला घी हूँ, मैं अग्नि हूँ, मैं हुत हूँ ।
            तात्पर्यार्थ— प्रथम पक्ष— क्रतु यानि अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम श्रौत यज्ञ मैं हूँ । यज्ञ यानी बलि प्रधान स्मार्त यज्ञ मैं हूँ (ऐसा मूर्धन्य आचार्यों का दृष्टिकोण है) । स्वधा यानी संपूर्ण प्राणियों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला अन्न मैं हूँ । औषध अर्थात शरीर संबंधित रोगों का निवारण करने वाली औषधि मैं हूँ । ॐ नमःशिवाय आदि गुरु प्रदत्त मंत्र मैं हूँ । आज्य अर्थात शरीर को पुष्ट करने वाला अमृतस्वरूप घृत मैं हूँ । संपूर्ण प्रणियों की क्षुधादि निवृत्ति के निमित्त भोजन, अग्निहोत्रादि या संपूर्ण ब्रह्मांड को ही प्रलयकाल में पचा जाने वाली अग्नि मैं हूँ । हुत अर्थात देव के प्रति किया जाने वाला त्याग मैं हूँ ।
              द्वितीय पक्ष— क्रतु का अर्थ होता है संकल्प, जो किसी शुभ कार्य से पहले लिया जाता है और बाद में सामग्री आदि की तैयारी की जाती है । अतः यज्ञादि का संकल्प मैं हूँ । पितरों को पर्व आदि के समय किया जाने वाला श्रद्धा मैं हूँ । यज्ञ मे जो जौ तिल आदि औषधियों का हवन होता है वह औषधि मैं हूँ । जिन मंत्रों से हवन होता है वह मंत्र मैं हूँ । यज्ञ में दी जाने वाली आज्या यानी घृत की आहुति मैं हूँ । जिस अग्नि में यह सारी सामग्री दी जाती है वह अग्नि मैं हूँ । हुत अर्थात जो स्वाहा पूर्वक देवताओं के निमित्त “इदं न मम” से दी जाने वाली आहुति मैं हूँ ।
              टिप्पणी—  यहाँ सब कुछ वह ब्रह्म ही है ऐसा प्रस्तुत श्लोक का तात्पर्य है । यह यज्ञ का प्रकरण चतुर्थ अध्याय में विस्तृति देखना चाहिए । इस प्रस्तुत श्लोक में “ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ॥”४/२४ की प्रत्यक्ष अनुभूति है ॥१६॥

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥९/१७॥
            शब्दार्थ— इस  जगत के पिता, माता, धाता, पितामह, जानने योग्य पवित्र ओंकार, ऋक्, साम एवं यजुर्वेद मैं हूँ ।
            तात्पर्यार्थ— अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः ७/६ अर्थात मैं ही जगत का उत्पन्न करने वाला संपूर्ण जगत का पिता हूँ । अध्याय १४/३-४ के अनुसार संपूर्ण जगत को अपने गर्भ में धारण करने वाली प्रकृति ही जगत की माता है और वह मैं हूँ । 
             धाता का अर्थ पूर्वपक्ष ने ब्रह्मा किया है सो युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता क्योंकि आगे पितामह शब्द स्पष्ट कहा गया है । यहाँ धाता का अर्थ है संपूर्ण प्राणियों के कर्मफल को धारण करने वाला, सुरक्षित रखने वाला सभी प्राणियों के कर्मों के अनुसार उचित समय पर उचित भोग प्रदान करेगा अर्थात प्राणियों के कर्मफल को धारण करने वाला धाता मैं हूँ ।
               जानने योग्य पवित्र ओंकार मैं हूँ । यहाँ पवित्र कहने का तात्पर्य है कि अन्य सभी कर्म पापों का क्षय करके पवित्र तो करते हैं लेकिन तत् तत् कर्मों के अनुसार तत् तत् पापों के प्रायश्चित से तत् तत् पवित्रता होती है, मुक्ति मिलती है शेष से नहीं । दूसरा पक्ष यह भी है कि पुण्य भी एक प्रकार का पाप ही है जो जन्म मृत्यु का हेतु है । अतः पुनः पुण्य पाप सुनिश्चित है । जबकि ओंकार के अबल-सबल स्वरूप को भलीभाँति जान लेने पर पाप और पुण्य दोनो से मुक्ति मिल जाती है, इसलिये पवित्र ओंकार कहा, जो एकमात्र उभय ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ है । और वह मैं हूँ । 
            ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद और च से अथर्ववेद का अन्वय कर लेना चाहिए । साथ ही इतिहास, पुराण और स्मृतियों को भी विद्वानों ने लिया है तथापि इनका उतना ही अंश ग्राह्य है जितने का श्रति समर्थन करती हैं । यहाँ स्थूल वेद का वर्णन है, अतः “वेदैश्चसर्वैरहमेव वेद्यो” १५/१५ अर्थात संपूर्ण वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ के अनुसार संपूर्ण वेदों में बताये गये जिन साधनों के द्वारा मैं स्वरूपतः जाना जाता हूँ वे साधन मैं ही हूँ ऐसा संपूर्ण वेदों से समझना चाहिए । एवं निश्चयार्थक “मैं” ही हूँ के लिए है ॥१७॥

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥९/१८॥
            शब्दार्थ— गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, सुहृत्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान, एवं अव्यय बीज मैं हूँ ।
           तात्पर्यार्थ— कर्मों के फलस्वरूप स्वर्गादि स्थान प्राप्त किये जाते हैं वह जो प्राप्ति रूप क्रिया है वह क्रिया मैं हूँ, मुमुक्षु के लिए एक मात्र स्वसंवेद्य परमतत्त्व ही गति है, भक्त की एक मात्र भगवान गति है, अर्थात हमारा जो सर्वोत्कृष्ट चरम लक्ष्य है वह चरम लक्ष्य मैं हूँ । भर्ता का अर्थ द्वैत-अद्वैत दोनो आचार्यों ने धाता किया है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ । मात्र आचार्य शंकर एवं आनन्दगिरि ने भर्ता का अर्थ पति अर्थात पालन पोषण करने वाला कहा है और यही अर्थ मुझे भी मान्य है । अतः पालन पोषण करने वाला भर्ता अर्थात जगत्पति मैं हूँ ।
              प्रभु अर्थात ‘कर्तुं अकर्तुं अन्यथा कर्तुम्’ जो कुछ भी कर सकने में समर्थ है वह सर्वसमर्थ प्रभु मैं हूँ । संपूर्ण प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों को साक्षी भाव से, तटस्थ भाव से देखने वाला सूर्य, चंद्र, वायु, आत्मा आदि मैं हूँ । संपूर्ण प्राणियों को सत्ता मुझसे मिलती है और मुझमें ही निवास करते हैं अतः वह निवास स्थान मैं हूँ । जो संसार से ठोकर खा चुका है, जिसका कोई शरणदाता नहीं है उस अशरण की शरण मैं हूँ । बिना किसी उपकार की भावना के मात्र निरपेक्ष भाव से जो सबका शुभचिंतक है वह शुभचिंतक अर्थात सुहृत् मैं हूँ ।
              सबको उत्पन्न करने वाला मैं हूँ । संपूर्ण जगत का प्रलय अर्थात नाश करने वाला मैं हूँ । प्रलय के पश्चात अपने अपने कर्म बीजों के साथ जिस स्थान का सूक्ष्म प्राणी आश्रय लेते हैं वह स्थान मैं हूँ । संपूर्ण कार्य करण भाव जहाँ रहते हैं वह निवास स्थान अर्थात निधान मैं हूँ । संपूर्ण चराचर प्राणियों का अव्यय बीज मैं हूँ “बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्” ७/१० कभी व्यय अर्थात क्षय न होने वाला अनादि काल से संपूर्ण जगत का कारण अव्यय बीज मैं हूँ । ऐसा तात्पर्य है ॥१८॥

तपाम्यहमहंं वर्षं निगृह्यणाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥९/१९॥
           शब्दार्थ— हे अर्जुन ! मैं ही तपता हूँ, मैं ही वर्षा करता हूँ, मैं ही निग्रह करता हूँ, मैं ही उत्सृजन करता हूँ, मैं ही अमृत हूँ, मैं ही मृत्यु हूँ, सत और असत भी मैं ही हूँ ।
           तात्पर्यार्थ— मैं सूर्य रूप से तपता हूँ वर्षम् अर्थात वर्षा शब्द से जल और वृष्टि दोनो को वाचक है । अतः वर्षं निगृहणामि अर्थात गर्मियों में मैं तपता हूँ और उस तपन से अपनी किरणों में जल का संग्रह करके रोक लेता हूँ और वर्षं उत्सृजामि अर्थात वर्षाकाल मे उसी जल की वृष्टि करता हूँ । 
             अमृतं चैव मृत्युश्च पर त्रिविध दृष्टि डालते हैं । अमृत का अर्थ यदि जीवन करें तो— जीवन और मृत्यु दोनो ही मैं हूँ । अतः जीवन मौत के विषय में निश्चिंत होना चाहिए । दूसरे पक्ष में यदि देवताओं का भोग्य पदार्थ अमृत अर्थ करें तो— देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत और मर्त्यधर्मा की मृत्यु का हेतु 【विष, सिंह, सर्प रोग आदि】 मैं ही हूँ । एव निश्चयात्मक अर्थ में है यही अर्थ तीनों पक्षों में होगा । अतः श्रीभगवान ही जिनकी गति हैं उन्हें देवत्व और मनुष्यत्व से क्या संबंध ? तीसरा पक्ष अमृत का अर्थ यदि मोक्ष करें तो— मोक्ष और मृत्यु यानी मृत्यु का हेतु जन्म】भी मैं ही हूँ । अतः जब हम उस परमतत्त्व का साक्षात्कार कर लेंगे तो मोक्ष स्वाभाविक है, इसलिये अतः मोक्ष प्राप्ति के विषय में उस परमतत्त्व से भिन्न विचार करने की क्या आवश्यकता है ? और यदि मोक्ष प्राप्त नहीं कर सके तो मृत्यु भी उस परमतत्त्व में कल्पिता है अतः उसका भी भय नहीं होना चाहिए क्योंकि मोक्ष और मौत दोनो मैं ही हूँ ।
              सत और असत भी मैं हूँ । सत अर्थात अव्यक्त परमत्त्व और असत यानी प्रातिभासिक व्यक्त भूत समुदाय मैं ही हूँ । अथवा सत् सा दिखने वाला प्रतिभासित जगत और जिसकी अविवेकी की दृष्टि में कोई इस जगत से भिन्न सत्ता दिखती ही नहीं वह असत सा समझ में आने वाला अव्यक्त परमतत्त्व मैं हूँ । इस प्रकार अहं क्रतु से लेकर यहाँ तक चार श्लोकों में मुमुक्षु की सत और असत सर्वत्र ब्रह्म बुद्धि से जिस जिस की उपासना करता है उस उस उपास्य में ब्रह्म बुद्धि से उपासना करने से चित्त की शुद्धि होकर क्रमशः मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है । ऐसा मध्यम अधिकारी के लिए कहा गया है क्योंकि उत्तम अधिकारी तो गुणागुणेषु वर्तन्ते करके प्रकृति और पुरुष का अन्तर करके स्वभाव में स्वतः स्थित होकर सद्योमुक्ति को प्राप्त करता है । जबकि मध्यम अधिकारी को ब्रह्म बुद्धि करनी पड़ती है ।
               यहां पर आचार्य शंकरान्द जी के कुछ विचार ज्यों के त्यों रख रहा हूँ । मूल और अनुवाद से कलेवर अधिक हो जायेगा, अतः मात्र हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ—
           शंका— अब्रह्म में ब्रह्म बुद्धि से की गई उपासना फल की हेतु कैसे होगी ? और ब्रह्म दृश्य कैसे होगा ?
            समाधान— दृश्य नाम की कोई वस्तु है या नहीं ? दूसरा पक्ष तो युक्त नहीं है क्योंकि उसके मानने से संपूर्ण व्यवहार के लोप का प्रसंग उपस्थित हो जायेगा ।
            पहले पक्ष में वस्तु सद्रूप से है या असद्रूप से ?  दूसरा पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि खरगोश के सींग के समान असत् वस्तु ‘है’ कहना घटता नहीं है । सत् रूप से ही है यदि ऐसा कहो तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने से तो सब ब्रह्म ही होगा, क्योंकि ब्रह्म से भिन्न किसी वस्तु का अस्तित्व है नहीं ।
           शंका— जब सब ब्रह्म ही है तब घट पट आदि का नाश होने पर ब्रह्म के नाश का भी प्रसंग उपस्थित होगा ।
         समाधान— ऐसा युक्त नहीं है, क्योंकि नाश का विषय कल्पित व्याप्य अंश है । जैसे मिट्टी के घड़े में कंबु ग्रीवा आदि आकार वाले व्याप्य अंश का नाश देखने में आता है, व्यापक अंश मिट्टी का नाश देखने में नहीं आता, वैसे ही भ्रम कल्पित नाम रूप आदि व्याप्य अंश का ही नाश होता है व्यापक अंश सत् का नहीं । उसका नाश होने पर दृश्य के अभाव से मान का अभाव प्राप्त हो जायेगा । दृश्य और दृश्य का अभाव दोनो सत् स्वरूप में स्थित हैं यह सिद्ध हुआ । इसलिए इष्ट वस्तु में की गई ब्रह्म बुद्धि से उपासना फल देने योग्य ही होती है, क्योंकि भावना के अनुसार ही फल की सिद्धि होती है ।
        भावार्थ—सत् यानी जो विधि मुख से जाना जाये और असत् यानी जो निषेध मुख से जाना जाये । अवथा जिस जगत की अपनी तो कोई सत्ता नहीं है फिर भी अज्ञानियों की दृष्टि मेंं सत् सा भासित होने वाला जगत भी मैं हूँ और अज्ञानियों के लिए ही मैं जानने में न आने के कारण असत् सा प्रतीत होने वाला भी मैं ही हूँ । अथवा ज्ञानियों की दृष्टि में जो नित्य आत्मस्वरूप ही सत्य है और संसार असत्य है इसमें सत् तो मेरा स्वरूप है और असत् जगत मुझमें भासित होने से मुझसे अभिन्न होने से वही भी मैं ही हूँ ।
             मेरे निजी विचार― तप से लेकर असत् तक जो मैं हूँ कहा गया है वहाँ मैं का अर्थ ‛मुझसे’ कर लेना चाहिए तात्पर्य यह हुआ कि जितनी विभूतियां जहां बताई गई हैं वे और जो नहीं बताई गई हैं जिन्हें एक ही शब्द सत् और असत् में कह दिया गया है वे सब उस परम सत्ता से सत्तावान हैं, न कि वे स्वयं हैं, क्योंकि आगे ‘न सत्तन्नासदुच्यते’ १२/१३ कहकर अपवाद कर दिया गया है कि यह मैं कुछ नहीं हूँ । मैं हूँ का तात्पर्य मुझसे सत्तावान समझना चाहिए ॥१९॥

           संबंध— इस प्रकार सद्योमुक्ति और क्रम मुक्ति का चिन्तन एवं उपासना को कहकर दो श्लोकों द्वारा सकाम उपासना करने वालों की गति का वर्णन……
त्रैविद्या मां सोमपाः पूततपापा यज्ञैरिष्ट्वास्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्यसुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥९/२०॥
            शब्दार्थ— तीनो वेदों में कहे गए यज्ञों के द्वारा मेरा यजन करके, सोमरस का पान करके जिनके पाप नष्ट हो गए हैं वे स्वर्ग प्राप्ति के लिए कामना करते हैं, वे पुण्यों के द्वारा देवलोक को प्राप्त करके स्वर्गलोक के दिव्य भोगों को प्राप्त करते हैं ।
          तात्पर्यार्थ— यहाँ यज्ञ अर्थात कर्मकांड का प्रसंग है अथर्ववेद ब्रह्मविद्या है इसलिये यहां उसकी गणना नहीं की गई है । अतः ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद ही यहाँ विद्यात्रयी है । सोमवल्ली द्वारा निकाला गया सोमरस इन्द्र को बहुत प्रिय है । आज तो सोमवल्ली, सोमरस कथा कहानियों की तरह हो गई है । जो हमने कठपुतली का नृत्य जादू का खेल देखा था आज जो स्थिति है उसके अनुसार यह ऐन्द्रजालिक खेल भी भविष्य में आने वाली संतति नहीं जान सकेगी कि ये सब क्या होता है ? जैसा कि आज राजसूय, अश्वमेध, सोमयज्ञ, अग्निष्टोम, आदि पुस्तकीय बातें रह गई हैं, तथापि प्रसंगानुसार— देवताओं द्वारा पीने के बाद बचा हुआ सोमरस पीने से जिनके पाप नष्ट हो गये हैं जो कामनाओं से परिपूर्ण हैं वे प्रार्थना करते हैं ।
                यहाँ शंका होती है कि जब सब ब्रह्म है मूर्ति आदि धातुओं में पूजन से क्रम मुक्ति मिल सकती है, क्योंकि “सर्वं खल्वमिदं ब्रह्म” “वासुदेवः सर्वम्” है तो फिर यज्ञ कर्म तो वैदिक हैं, वेद परमात्मा की श्वास है, ऐसे वैदिक यज्ञ के द्वारा मोक्ष क्यों नहीं हो सकता है ? इसके लिए कहते हैं— प्रार्थयन्ते अर्थात वे प्रार्थना करते हैं । क्या क्या प्रार्थना करते हैं ? कहते हैं कि ये सकामी हैं अतः मुमुक्षु की तरह प्रार्थना नहीं करते “तं ह देवमात्मबुद्धि प्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।” अर्थात अर्थात बुद्धि में आत्मप्रकाश के लिए प्रार्थना नहीं करते, वे प्रार्थना करते हैं “दिव्यान्दिवि देवभोगान्” अर्थात स्वर्गलोक के दिव्य भोगों के लिए प्रार्थना करते हैं, इसलिये यज्ञ के पुण्य के फलस्वरूप अपनी कामना के अनुसार ही प्राप्त करते हैं । ऐसा तात्पर्य है ॥२०॥

             संबंध— ऐसे सकामियों के जन्म मरण रूप दुःख का वर्णन……
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥९/२१॥
            शब्दार्थ— वे विशाल स्वर्गलोक के उन दिव्य भोगों को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्यु लोक में प्रवेश करते हैं, इसी प्रकार पुनः त्रयीधर्म का अनुसरण करके कामनाओं की इच्छा रखने वाले आवागवन अर्थात जन्म मृत्यु को प्राप्त होते हैं ।
             तात्पर्यार्थ— यहाँ पर लोक से लेकर परलोक तक को नश्वर दिखाकर यह कहा गया है कि संपूर्ण यज्ञों के स्वामी एवं स्वयं यज्ञ भी परमात्मा हैं “यज्ञों वै विष्णुः” तथापि मेरी उपासना न करके देवताओं को मुझसे भिन्न मानकर कामना पूर्ति के लिए उनकी उपासना करके बारंबार जन्म मृत्यु को प्राप्त होकर नाना प्रकार के दुःख भोगते रहते हैं । ऐसा भोगों के प्रति वैराग्य के लिए इन दो श्लोकों द्वारा सावधान किया गया है ॥२१॥

          संबंध— भेद दृष्टि रखकर तो देवाराधन करने वाले को तो भीख मांगनी पड़ती है लेकिन मेरा जो अनन्य भक्त है उसके योगक्षेम की रक्षा मैं स्वयं बिना मांगे करता हूँ, इसका कथन……
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥९/२२॥
             शब्दार्थ— जो अनन्य चिन्तन द्वारा मेरी आराधना करते हैं उन भलीभाँति समाहित चित्त वाले भक्त के योगक्षेम को मैं संभालता हूँ ।
             तात्पर्यार्थ— अहं होगा तो इदं होगा । इदं होगा तो बुद्धि का चिन्तन अन्य अन्य होगा । इसी अन्य का निराकरण करने के लिए ही कहते हैं— अनन्याश्चिन्तयन्तो मां अर्थात अहंता और इदंता को हटाकर जो स्वसंवेद्य मैं हूँ, ऐसे स्वसंवेद्य मेरा चिन्तन करनेवाला ही अनन्य चिन्तक मेरा भक्त है ऐसा जो स्वसंवेद्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रूप से जो मेरी उपासना करता है उस नित्य निरंतर मुझमें समाहित चित्तवाले, यहाँ ध्यान देने की बात है कि पहले नित्य कहा और फिर अभि उपसर्ग पूर्वक युक्तानां कहा जिसका अर्थ है कि नित्य समाहित चित्तवाला तो है लेकिन शरीर रक्षा रोग, क्षुधा, पिपासा आदि से पीड़ित होकर बार बार मन बाहर भागता है, किन्तु फिर भी इन त्रिविध तापों की चिन्ता किये बिना पुनः बारंबार समाहित चित्त हो जाता है अपने योगक्षेम की चिन्ता बिल्कुल नहीं करता, ऐसा जो योगक्षेम की चिन्ता से मुक्त होकर निरंतर समाहित चित्त अनन्य चिन्तन ही जिसकी उपासना है उसके योगक्षेम की रक्षा मैं करता हूँ । हो भी क्यों न ? क्योंकि “ज्ञानी त्वात्मैव मे” ७/१८ अर्थात ज्ञानी तो ब्रह्म की आत्मा है । अतः जिस परमतत्त्व के साथ एकाकार होना चाहता है किन्तु हो नहीं सका उस अप्राप्त लक्ष्य की प्राप्ति कराने के लिए जो लक्ष्य में बाधक रोग, क्षुधा पिपासा आदि आध्यात्मिक, अधिदैविक, आधिभौतिक नामक विघ्न प्राप्त हुए हैं उनसे उसकी रक्षा करता हूँ,  इस प्रकार लक्ष्य की प्राप्ति में सहयोग करता हूँ अर्थात लक्ष्य प्राप्त कराता हूँ ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ । 
            अथवा बुद्धि में अहं और इदं की वृत्ति का होना ही अन्य अन्य है । अन्य का अर्थ जितने भी अनात्मपदार्थ है उनका त्याग करके एक मात्र नित्य निरंतर समाहित चित्त होकर अर्थात सावधान होकर एकमात्र आत्मपदार्थ परमेश्वर का अहंता इदं के त्यागपूर्वक जो स्वसंवेद्य स्वरूप का चिंतन करता उसके योग क्षेम का चिन्तन परमेश्वर ही करता है । यहाँ योग का अर्थ परमात्मा है जो हमें अप्राप्त के समान है उसकी प्राप्ति अर्थात स्वरूप की नित्य प्राप्त की प्राप्ति के समान अनुभूति करा देते हैं । कैसे योग की प्राप्ति करा देते हैं ? इसका उत्तर “ददामि बुद्धियोगं तम् १०/१०, ज्ञानदीपेन” १०/११ से अलगे अध्याय में देंगे एवं ‘तेषामहं समुद्धर्ता’ १२/७ से इस ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ की प्रतिज्ञा पुनः दोहराते हैं । इस के लिए क्षेम यानी रक्षा करते हैं, वह कैसे करते हैं ? अनात्मपदार्थों के द्वारा आने वाली आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक ये तीनों प्रकार की बाधाओं से रक्षा करते हैं ।
          आज हम सबकी लगभग यही एक समस्या है कि हम उपदेश तो दूसरों को करते हैं किन्तु न तो हमें भगवान की इस प्रतिज्ञा पर ही विश्वास है और न ही हमें हमारे प्रारब्ध पर । अगर ईश्वर पर भरोसा होता तो भी हम भगत जगत को ही अपने शारीरिक नाशवान भोगों का आधार बनाकर आज इधर उधर भंडारे खाने के लिए न दौड़ना पड़ रहा होता, पैसों/वैभव के लिए आज हम भक्तों के चक्कर में पड़कर नाना प्रकार से Blackmailing के द्वारा हम जेल की यात्रा न कर रहे होते ।
              सारांश― अनात्मपदार्थ का चिंतन न करते हुए परमेश्वर या प्रारब्ध पर विश्वास करते हुए जो व्यापक अहंता वाला सबका आत्मा है ऐसे आत्मभाव में निरंतर समाहित चित्त होकर स्थित हो जाना चाहिए यही नित्य सत्त्वस्थ २/४५ है ॥२२॥

               संबंध— अनन्य भक्त का लक्ष्य एवं उसकी रक्षा का भार स्वयं पर लेते हुए अब अन्य देवताओं के रूप में जो मेरी ही अश्रद्धा पूर्वक उपासना करते हैं, इसका कथन……
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥९/२३॥
           शब्दार्थ— हे कौन्तेय ! जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक दूसरे देवताओं की आराधना करते हैं वे भी अविधिपूर्वक मेरी ही आराधना करते हैं ।
              तात्पर्यार्थ— यदि कोई कहे कि “सर्वं खल्वमिदं ब्रह्म” इस श्रुति के अनुसार कृष्ण ही ब्रह्म क्यों ? शिव, विष्णु, इन्द्र, वरुण, गणेश, दुर्गा आदि सभी ब्रह्म ही हैं उनकी आराधना से मुक्ति होनी चाहिए । इसके लिए ही अन्य शब्द का प्रयोग किया गया है । श्रुतियों में अभेद रूप से ब्रह्म की आराधना विभिन्न देवताओं की की गई है जिससे क्रममुक्ति का भी वर्णन मिलता है । ब्रह्म बुद्धि ही अनन्य अर्थात अभेद बुद्धि है, जबकि यहाँ अन्य शब्द भेद दर्शन कराने के लिए ही है । कामना में ही भेद होता है और भेद अज्ञान की सीमा । यह अज्ञान ही अविधि है । अतः श्रद्धा तो है लेकिन वह अज्ञानमय है अतः जिन जिन कामनाओं से जिन जिन  देवता का यजन करके उनको प्राप्त होते हैं, तथापि यह अज्ञानमय मेरा ही यजन है ।
             भावार्थ— मतलब अभेद बुद्धि से की गई उपासना ही मोक्ष का हेतु है । भले ही वह किसी भी रूप में हो । भेदबुद्धि ही जन्ममृत्यु रूप समस्त दुःखों का श्रोत अज्ञान है ॥२३॥

               संबंध— अन्य देवताओं की आराधना परमेश्वर की ही अज्ञानपूर्ण आराधना कैसे है का कथन……
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥९/२४॥
             शब्दार्थ— क्योंकि मैं ही संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता एवं स्वामी हूँ । वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते इसलिये पतित हो जाते हैं ।
            तात्पर्यार्थ— यहाँ सर्वयज्ञानां आया है । आजकल अग्निष्टोम, राजसूय, सोमादि यज्ञ तो संभव ही नहीं है । फिर भी मनुष्य प्रतिदिन कोई न कोई यज्ञ कर ही रहा है किन्तु अज्ञान के कारण जानता नहीं है । अध्याय ३/१२ में वर्णित यज्ञ की व्याख्या देखना चाहिए । वहां पर पंचमहायज्ञों का वर्णन मिलेगा जो “अधियज्ञोऽहम्”  ८/४ को समझाएगा । संपूर्ण प्राणियों में अधियज्ञ रूप से नित्य प्रतिष्ठित परमेश्वर ही संपूर्ण यज्ञों के भोक्ता और स्वामी हैं “यज्ञो वै विष्णुः” यज्ञ ही विष्णु है, विष्णु ही यज्ञ है । इस बात को भेदबुद्धि और कामनाओं के कारण विधिहीन अर्थात तत्त्व से अर्थात अभिन्नभाव से मुझे न जानने के कारण पतित अर्थात जन्म मृत्यु के रूप में ऊर्ध्वलोकों में जाकर भी संसार में पुनः गिर जाते हैं । ऐसा तात्पर्य है ॥२४॥

            संबंध— पतित होने का कारण बता रहे हैं……
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥९/२५॥
         शब्दार्थ— देवव्रत रखने वाले देवताओं को, पितॄव्रत रखनेवाले पितरों को, भूतों का यजन करने वाले भूतों को और मेरा यजन करने वाले मुझको प्राप्त होते हैं । 
            तात्पर्यार्थ— देवताओं  से सात्विक और पितरों से राजस एवं भूतों से भैरवी यक्षिणी आदि जीव बलि प्रधान तामस समझना चाहिए । उन उन के आराधक उन उन को प्राप्त होते हैं और मेरी आराधना करने वाले मुझको प्राप्त होते हैं । माम् से सगुण सकार और अपि से निर्गुण निराकर समझते हुए जिस जिस भाव से मेरी आराधना करता है उसके अनुसार क्रममुक्ति एवं सद्योमुक्ति प्राप्त करता है । ऐसा तात्पर्य है ॥२५॥

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥९/२६॥
           शब्दार्थ— जो शुद्ध अन्तःकरण वाला मेरा भक्त प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल भी मुझे देता है मैं उसको प्रेमपूर्वक खाता हूँ ।
             तात्पर्यार्थ— विभिन्न देव संबंधित उपासना में अपनी अपनी विधि है । उन विधियों में थोड़ी भी त्रुटि हुई तो परिणाम विपरीत हो जाता है, परन्तु परमेश्वर की उपासना में किसी भी विधि की आवश्यकता नहीं है । उपरोक्त वस्तु सब हों या एक ही हो सब चलता है । ये वस्तुएं भी ऐसी हैं कि प्रत्येक घर में सहज ही प्राप्त हो जाती हैं । 
             पूर्व में उत्तम, मध्यम अधिकारी का वर्णन किया गया, फिर अधम कोटि के देवाराधकों का वर्णन करके अब जिनको वेदान्त का ज्ञान नहीं है किन्तु अपना कल्याण चाहते हैं ऐसे कनिष्ठ अधिकारी भी साकार रूप में भी मेरी उपासना करके कल्याण को प्राप्त कैसे हों ? इस उद्देश्य से यह प्रसंग है क्योंकि एक से एक दुराचारी भी हृदय परिवर्तन होने पर अपना कल्याण कैसे कर सकते हैं “अपि चेत्सु दुराचारो” ९/३० का भी शास्त्र ध्यान रखते हैं अतः यह प्रकरण आरंभ किया आरंभ किया गया है ।
          टिप्पणी— यहां ध्यान देने की बात है कुछ अविवेकी लोग कहते हैं “न तस्य प्रतिमा अस्ति” अर्थात उसकी को मूर्ति नहीं है । तो ठीक है उसकी कोई मूर्ति नहीं है तो बताओ श्रीभगवान ने जिन उपरोक्त वस्तुओं की बात कही है वे कहाँ अर्पण की जायें ? इतनी श्रद्धा है नहीं कि आपके सिर पर ही चढ़ा सकूं । कोई तो उन्हें अर्पित करने का आधार होगा ? तो क्या हम आपके कहने से मान लें कि उसकी प्रतिमा नहीं होती ? क्या हम मान लें कि यह वाक्य श्रीभगवान का नहीं है ? ये तुम्हारी विचारहीनता और ये अज्ञान तो नरक में ले जाने वाला है और समाज को भ्रष्ट करके उसे भी नरक का अधिकारी बनाएगा और ले जायेगा, ऐसे ही खलों, आसुरों और राक्षसों को ही तुलसीदास जी कहते हैं— आपु गये अरु तिनहूं घालहिं । जे कहुं सत मारग प्रतिपालहिं ॥ तुम्हारे अधूरे ज्ञान की निंदा करते हुए मैं प्रमाणित करता हूँ कि हमारे यहाँ क्रिया का नहीं भाव का ही महत्त्व है । भाव ही उन उन रूपों में प्रकट होता है । भाव है तो मूर्ति में भगवान है । इतरा के पुत्र ऐतरेय के श्रीविष्णु के मंदिर में होने और श्रीविष्णु के वरदान द्वारा अज्ञात वेद मंत्रों के साक्षात्कार होने का वर्णन “ऐतरेय ब्राह्मण” में मिलता है जो सबसे प्राचीन ऋग्वेद का अंग है । 
                तुम्हारे अधूरे ज्ञान की जानकारी के लिए बता रहा हूँ— “न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ।” शु.य.वे.३२/३ यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि जिसका नाम महान् यश है, जिसके महान् यश के सामने किसी का कोई यश नहीं टिकता, उसकी कोई प्रतिमा अर्थात अर्थात उपमा अर्थात उसका कोई सानी नहीं है । इस मंत्र के उत्तरार्ध में तीन मंत्रों “हिरण्यगर्भ, मा हिंसीत, यस्यामान्जात" द्वारा स्तुति का वर्णन है । 
            इतना ही नही कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतर उपनिषद कहता है— नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्च न मध्ये परिजग्रभत् ।  न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥श्वे.उ.४/१९॥ अर्थात उसे न ऊपर से (न नीचे से), न इधर उधर से, न मध्य से ही कोई ग्रहण कर सकता है । जिसका नाम महान यश है उसकी कोई उपमा, माप-तौल, या सूत्र अर्थात जिससे यह जाना जा सके यह इतना ही है, क्योंकि ब्रह्म अनुपमेय है, अग्राह्य है । इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि उसकी मूर्ति नहीं है । जो मन वाणी का विषय नहीं है, अनुपमेय और अग्राह्य है फिर भी उसे यदि इन साधनों से आप जान सकते हैं तो दूसरा मूर्ति आदि के माध्यम से उसकी आराधना क्यों नहीं कर सकता ? ये खल तो मानने वाले नहीं हैं, स्वयं ही जनसामान्य को इसका ज्ञान अर्जित करके असुरों से बचना चाहिए ।
             जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ॥ फल भावना के अनुसार ही होगा । अतः शालिग्राम शिवलिंग आदि में मिट्टी, पत्थर, धातु, लकड़ी आदि पर बनी प्रतिमाओं पर मेरी अर्थात मुझ सच्चिदानन्दघन परब्रह्म की भावना से कृष्ण आदि की आराधना में पत्र, पुष्प, फल, जल इतना ही अर्थात इनमें जो भी सहजता से प्राप्त हो उसी को शुद्ध एवं निश्छल मन से जो मुझे अर्पण करता है मैं उसे प्रेम से खाता अर्थात ग्रहण करता हूँ । 
             यहाँ दूसरा भाव यह भी है कि “अतिथि देवो भव, अभ्यागतः स्वयं विष्णुः” अर्थात आगन्तुक अथिति को भी साक्षात् नारायण स्वरूप समझकर कभी निराश भूखा वापस न करे जो कुछ पत्र यानी शाक, पुष्प अर्थात खाने योग्य कच्चे फल, पके फल एवं जल जो भी सामार्थ्य के अनुसार उपस्थित हो वही उसे प्रेमपूर्वक अर्पण करे, उस रूप में मैं ही प्रेमपूर्वक खाता हूँ ।
         चूंकि अधियज्ञ मैं ही हूँ, अतः पंचमहायज्ञों द्वारा तत् तत् को अर्पण किया गया पत्र पुष्पादि मैं ही प्रेमपूर्वक खाता, ग्रहण करता हूँ । ऐसा समझकर जहाँ आस्था स्थिर हो जाये वहीं मेरी आराधना करे । ऐसा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है ।
          अथवा यहाँ पर प्रयतात्मनः का अर्थ प्रयत्नशील है और उसी का अर्थ निश्छल मन भी है निश्छल यानी शुद्धबुद्धि । तात्पर्य यह है कि जिसका चित्त सांसारिक विकारों से रहित हो गया है एक मात्र मैं ही जिसकी गति हूँ ऐसा मुझ सगुण साकार की उपासना करने वाला जो कुछ भी मुझे जैसे भी अर्पण करता है, चाहे वह किसी प्राणी में मेरे उद्देश्य से भोजन वस्त्र आदि देकर या किसी मूर्ति आदि में पूजन विधि के रूप में अथवा मेरे उद्देश्य से से मेरी प्रतिमा आदि में जो भी कुछ अर्पण करता है उसे प्रेम पूर्वक स्वीकार करता हूँ । यहाँ भक्ति का अर्थ प्रीति है और खाने का अर्थ स्वीकार करना है ।
              इस प्रकार भगवान यह कहना चाहते हैं कि देवाताओं के पूजन विधि में अगर थोड़ी भी त्रुटि हुई तो सब कुछ उल्टा हो जायेगा किन्तु मेरे पूजन की एक ही विधि है मन की निर्मलता, निश्छलता, अन्य कोई विधि मेरे लिए है ही नहीं और इसका कोई फल उलटा नहीं होता, मनुष्य का कल्याण होता ही है ।
              अथवा यहां शंका होती है कि पहले नादत्ते कश्यचित्पापं…...७/१५ अर्थात परमात्मा किसी का पाप-पुण्य ग्रहण नहीं करता है फिर यहां वह पत्रपुष्पादि कैसे ग्रहण करने की विरोधी बात स्वयं भगवान कह सकते हैं ? इसका समाधान यह है कि वहां ज्ञानमार्ग में स्थित साक्षी आत्मस्वरूप का अभिन्न भाव में स्थित का वर्णन किया गया है । अतः जब कोई भिन्न है ही नहीं तो ग्रहण कौन करेगा ? किन्तु वहां भी तद्बुद्धयस्तदात्मानः ….. ७/१७ इत्यादि साधन रूप से कहा गया है । यहां पर भी उसी प्रकार अज्ञान के पराधीन हुए दूसरे देवताओं की आराधना करने वालों का परमेश्वर की प्राप्ति का सहज साधन भी अज्ञानमय ही है तथापि जैसे कोई कपड़े धुलने का साबुन कपड़े ठीक से साफ नहीं करता है तो दूसरे अच्छे साबुन से कपड़े को साफ कर देते हैं उसी प्रकार उन अज्ञानी जीवों को परमेश्वर में लगाने का यह साधन मात्र पत्रं पुष्पं आदि से कहा गया है । जब इस भाव में प्रयतात्मा अर्थात तल्लीनता या तादात्म्य भाव को प्राप्त हो जायेगा तब उनके लिए क्या आदेश होगा वह आगे कह रहे है जो तद्बुद्धयस्तदात्मानः को ही स्थूल रूप से कहकर फिर समत्व का उपदेश देकर उसी ज्ञान दशा को प्राप्त करा देंगे जिसे नादत्ते कश्यचित्पापं…. द्वारा कहा गया है ॥२६॥

              संबंध— पूर्वोक्त पत्रं पुष्पं फलं से जो कहा गया है उसका विशेष तात्पर्य यह है कि जो कुछ भी कर सकते हो करो किन्तु “मा कर्मफलहेतुर्भूः” २/४७ अर्थात मैं करता हूँ ऐसा भाव मन में भी नहीं आना चाहिए । इसके लिए कहते हैं……
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥९/२७॥
              शब्दार्थ— हे अर्जुन ! जो करते हो, जो खाते हो, जो यजन करते हो, जो देते हो, जो तप करते हो वह सब मुझे अर्पण करो ।
               तात्पर्यार्थ— भगवद्बुद्धि में कोई भी कर्म और खानपान निषिद्ध होने की संभावना ही नहीं रहती है । सब शास्त्र विहित ही होता है ऐसा समझ लेना चाहिए । यजन करना अर्थात पूजा-पाठ, अग्निहोत्रादि नित्य-नैमित्तिक कर्म, देना अर्थात दान देना, जरूरतमंद की सेवा करना । इन्द्रिय निग्रह रूप तप । यहां आध्यात्मिक और समाजिक विस्तृत विवेचन है जो अपनी अपनी समझ पर निर्भर करता है । प्रत्येक वस्तु परमात्मा को अर्पण करने का यह मतलब नहीं कि हम छूट गये । सभी कृतकर्म और उसका फल प्रभु को समर्पण का तात्पर्य है अहंकार का समर्पण । जब आपका अहंकार ही नहीं रहा तो आप कहां बचे ? अर्थात आप परमेश्वर के तत्त्व को जानो या न जानो आप अपने आप को उनके हवाले कर दो बाकी वे जानें उनका काम जाने । स्वयं को अर्पण करना ही सब कुछ अर्पण करना है ।
           अथवा अध्याय ३ में यज्ञ के प्रकरण में कहा था कि सबके मूल में अक्षर ब्रह्म ही है जो इस यज्ञ चक्र का अनुसरण नहीं करता है वह पापायु है अर्थात उसका संपूर्ण जीवन ही पापमय है और वह व्यर्थ ही जीता है ३/१६ अर्थात ऐसे व्यक्ति का मर जाना ही भगवान की दृष्टि में श्रेष्ठ है । अगर यह कोई प्रश्न करे कि यज्ञ करने के लिए धन चाहिए तो भगवान उत्तर देते हैं कि तुम कुछ न कुछ तो करते ही हो जैसे खाते हो, जो अन्य देवताओं के निमित्त पूजन करते हो, जो जरूरतमंद की सहायता करते हो यानी दान देते हो, तप यानी जो भी व्रत उपवास आदि करते हो ये जो तुम्हारी सहज और स्वाभाविक क्रियाएं हो रही है पश्यन्श्रृण्वन्…..५/८-९ वे सभी क्रियामात्र तो हो ही रही हैं और नहीं चाहोगे तो भी होंगी ही, जैसे नदी की धारा अनवरत बहती ही है किन्तु अपनी आवश्यकता के अनुसार धारा को मोड़ देना है उसी प्रकार ये ये क्रिया मात्र का उद्देश्य मेरे निमित्त एक मोड़ दे दो । जी रहे हैं तो भगवान के लिए और मर रहे हैं तो भगवान के लिए । इसी को आगे “यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” १८/४६ अर्थात प्रत्येक चेष्टा उसी एक सत्ता से ही हो रही है अतः उसी की चेष्टा को उसे ही अर्पित करके उसे ही संतुष्ट करके आत्मसिद्धि को प्राप्त कर लें । यही इसका भाव है ॥२७॥

            संबंध— पूर्वोक्त श्लोक में संपूर्ण कर्मों का त्याग बताया गया है, उसका लाभ यहाँ बता रहे हैं……
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपास्यसि ॥९/२८॥
           शब्दार्थ— इस प्रकार संपूर्ण कर्मों को मुझे अर्पण कर देने से शुभ और अशुभ कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा, सर्वकर्मसंन्यास से युक्त होकर शुभाशुभ कर्मबन्धन से मुक्त हुआ तू मुझको ही प्राप्त होगा ।
            तात्पर्यार्थ— संपूर्ण बंधनों के हेतु शुभ और अशुभ कर्म और कर्मफल ही हैं । अतः उन्हें परमेश्वर को अर्पण करके बंधन से मुक्त होकर संन्यायोग अर्थात जो कर्म और कर्मफल हैं उसका ईश्वर में त्याग हो जाने से वह योग हो जाता है । जैसे प्रथम अध्याय में अर्जुन अपने लिए नहीं जनकल्याण के लिए विषाद करता है अतः अर्जुनविषाद योग बन जाता है, ऐसे ही सर्वकर्मसंन्यास का विनियोग ईश्वर में होने के कारण संन्यास योग हो गया । ऐसे सन्न्यायोग से जिसका अन्तःकरण जितना संपन्न है, वह जीते जी उतना ही मुक्त है अर्थात मुझ परमतत्त्व को मैं ही सर्वेश्वर हूँ इस रूप में जानकर मुझ सर्वेश्वर को ही प्राप्त होता है ।
               अथवा पूर्वोक्त श्लोक के अनुसार शुभ और अशुभ कर्मों को परमेश्वर में ही अर्पण करने के कारण सर्वकर्म संन्यास हो गया उसका फल परमात्मा के साथ एकत्व की अनुभूति योग हो गया इस प्रकार सर्वकर्मसंन्यास पूर्वक परमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव करने वाला यानी ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ की अनुभूति करने वाला मुमुक्षु जीवित अवस्था में ही संसार के देने वाले सभी कारणों से मुक्त होकर शरीर त्याग कर परमात्मा को यानी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥२८॥
             
               तात्पर्यार्थ— परमेश्वर सम है, जो जिस प्रकार की कामना से भजन करता है उसको बिना राग द्वेष के वैसा ही फल देने का कथन……
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥९/२९॥
              शब्दार्थ— मैं संपूर्ण प्राणियों में समान रुप से स्थिति हूँ, मुझे न किसी से द्वेष है, न ही कोई प्रिय है । जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं मैं भी उनको वैसा ही भजता हूँ ।
            तात्पर्यार्थ— परमात्मा संपूर्ण प्राणियों में समान रूप से हैं “निर्दोषं हि समं ब्रह्म” ५/१९ क्योंकि वह ब्रह्म सम है और राग द्वेष नामक उसमें कल्मष नहीं है । “सुहृदं सर्वाभूतानाम्” ५/२९ इसलिये कोई धर्मात्मा है तो राग नहीं और अधर्मी है तो द्वेष नहीं । ब्राह्मण हो या चाण्डाल इससे उसे कोई मतलब नहीं है, तथापि एकमात्र मनुष्य को ही यह स्वतंत्रता मिली है कि वे अपने स्तर पर जैसा चाहें वैसा स्वर्ग, नर्क या मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ हैं, जैसे कर्म करते हैं वैसी ही सिद्धि प्राप्त करते हैं “कर्मणैव हि संसिद्धिं” ३/२० क्योंकि “न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।” ३/४ अतः सभी अपने अपने कर्मों के अनुसार ऊंच, नीच फल स्वयं प्राप्त करते हैं । मैं किसी को राग के कारण न मोक्ष या उच्च गति देता हूँ और न ही द्वेष के कारण पतित करता हूँ । 
                तथापि जो मेरा भक्तिपूर्वक भजन करते हैं— यहां भजन का अर्थ है तत्त्वतः जानकर और भक्ति का अर्थ है एकनिष्ठ अनन्यभाव । जहाँ अन्य भाव की कोई संभावना भी न हो, ऐसे अनन्यभाव से जो मेरा तत्त्वतः चिन्तन करते हैं वे मुझमें हैं, जैसे नदी समुद्र में है, इसका अर्थ यह है कि सीमित अहंता का व्यापक अहंता के साथ एकात्मकता को प्राप्त हो जाना, परिच्छिन्नता का समाप्त हो जाना, अर्थात जिसका परिच्छिन्नभाव समाप्त होकर अपरिच्छिन्न हो गया है मैं उसमें हूँ अर्थात अभिन्न रूप से मैं वही हूँ । अपरिच्छिन्न रूप में जो आत्म प्रत्यय की  अनुभूति ‘अहं ब्रह्मास्मि’ होती है उस अनुभूति के रूप में मैं ही उसके अन्दर हूँ । वह साक्षात् मेरा स्वरूप ही है “ज्ञानी त्वात्मैव मे” ७/१८ ।
            अथवा यहां भगवान कहते हैं कि यदि कोई शंका करे कि जब आप ही यज्ञ को भोक्त और स्वामी हो तो भले अन्य लोग अविधि पूर्वक अन्य देवताओं के बहाने आपकी ही पूजा करते हैं, लेकिन करते तो हैं तो क्या आप भी उनसे द्वेष करते हैं जो भेद करते हुए अपने भक्त को ही प्राप्त होते हो ? इस पर कहते हैं नहीं…, ऐसा नहीं है । मेरा न तो कोई प्रिय ही है और न ही द्वेष्य मैं तो सर्वत्र सर्वकालिक सम हूँ  ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ ५/१९ अतः मैं किसी को प्राप्त नहीं होता और न ही मुक्ति देता हूँ तथापि जैसे अग्नि के पास जाने वाले की ही ठंडी का निवारण होगा, यत्नपूर्वक अग्नि का आश्रय लेकर भोजन सिद्धि करने वाले की क्षुधा का निवारण होगा वैसे ही जो प्रीति पूर्वक अनन्य भाव से मेरा भजन करते वे मेरे में और मैं उनमें निवास करता हूँ । यहाँ पर मैं उनमें वे मुझमें निवास करता हूँ से भगवान ने यह बताया है कि परस्पर हम भक्त और भगवान दो दिखने पर एक ही हैं और अभिन्न हैं । एकमेवाद्वितीम् हैं ॥२९॥

             संबंध— पूर्व श्लोक में जो भजन करने की बात कही उसका विश्लेषण……
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९/३०॥
        शब्दार्थ— यदि कोई बहुत बड़ा दुराचारी भी हो, फिर भी अनन्य भाव से मेरा भजन करे तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि वह भलीभांति समाहित चित्त हो गया है ।
             तात्पर्यार्थ— सातवें अध्याय में “न मां सुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।” ७/१५ कहा था । ऐसे दुराचारी, दुष्कृती जिनका चित्त माया के द्वारा हरण कर लिया गया है वे मेरी शरण में नहीं आते । यहाँ ठीक उसके विरुद्ध कहा गया है इससे स्वयं गीता के परस्पर कथन में विरुद्धता प्रतीत होती है । इसका समाधान स्वयं भगवती गीता ही करती है— पूर्व श्लोक में शंकापक्ष राग द्वेष को लेकर भगवान पर पक्षपात की शंका करता है कि जो आपका भजन करते हैं उनको मोक्ष देते हो दूसरे को नहीं यह आपका राग द्वेष ही है । इस पर श्रीभगवान स्वयं को राग द्वेष रहित होना कहकर अनन्य भक्त के अभिन्नत्व की बात करते हैं । अब यहाँ जिसके लिए शंका पक्ष द्वेष की बात करता है उसके लिए पहले ही अपनी शरण ७/१५ में न आने की बात कह चुके हैं तथापि यदि वह भी शरण में आ जाये तो— इसके लिए यहाँ अपि और चेत् का प्रयोग किया गया है कि यदि ऐसा दुराचारी भी मेरी शरण में आ जाये, पहली बात तो वह मेरी शरण में आयेगा नहीं तथापि किसी पूर्व पुण्य प्रताप के चमत्कार से आ भी जाये तो वह पूर्णतः समाहित चित्त एकाग्रचित्त वाला, एक निश्चय वाला होने के कारण उसे साधु ही मानना चाहिए । 
              साधु ही मानना चाहिए में किसी शंका का कोई स्थान नहीं है । लोगों का नियम है कि जीवन भर पुण्य करो, धर्म करो और एक दिन किसी शराब के ठेके के पास आपको किसी बोतल में कोई पेय औषधि लाकर दे दी और वहाँ आपको पहचानने वाले ने दूर से देख लिया तो वो यही कहता है कि मैं इसे बड़ा धर्मात्मा मानता था किन्तु यह तो शराब पीता है मैने स्वयं ठेके के पास दारू की बोतल हाथ में देखा था । उसके सारे जीवन का धर्म एक क्षण में गायब हो गया, जबकि कोई पापात्मा यदि पाप कर्म छोड़कर यदि साधु बन जाये तो उसको साधु न मानकर उसके पूर्व कर्मों का स्मरण कर करके उसे ढोंगी, दंभी आदि पता नहीं क्या क्या कहकर विक्षिप्त करते रहते हैं । इसीलिए कहा कि ऐसी नकारात्मक सोच वालों को भी सोच बदलकर उसे साधु ही मानना चाहिए ।
            सुदुराचारी—  ‘सु’ उपसर्ग पूर्वक दुराचारी कहने  का तात्पर्य है कि बहुत ही सुदृढ पापी, कोई भी पाप ऐसा नहीं जो उसने किया न हो और जो कर न सकता हो । पाप की अनेक कोटियां होती हैं— वर्ण, जाति, देश, काल, भोजन, पात्र आदि के द्वारा । अजामिल, अंगुलिमाल, रत्नाकर, सदन कसाई आदि पापी ही थे । ऐसे पापात्मा भी अनन्यभाव से— यहाँ अनन्य भाव से यह समझना चाहिए कि ये वे लोग हैं जिनका संसार पूर्णतः साथ छोड़ चुका है । जगत में अकेले पड़ चुके हैं । आंखों के सामने अंधेरा छाया हुआ है । अब दो ही रास्ते शेष बचे हैं या तो आत्महत्या या भगवान की शरण । ७/१५ वाले तो अधिकतर आत्महत्या ही करते हैं तथापि पूर्व पुराकृत पुण्यों के जाग्रत हो जाने के कारण किसी स्थान विशेष, महात्मा आदि की संगति से हृदय परिवर्तित हो जाये और मेरी शरण में आ जाये तो वह पूर्णतः भलीभांति समाहित चित्तवाला होकर अनन्यभाव से अर्थात अब जगत में श्रीहरि के अतिरिक्त कहीं दूसरी ओर मन जाता ही नहीं । उसकी सीमित अहंता परमेश्वर में भलीभाँति स्थिर हो गई है । अब वह व्यापक अहंता वाला हो गया है, अतः उसे साधु ही मानना चाहिए ।
              भोजन  दोष भी  पाप ही है  जैसे किसी रजस्वला स्त्री द्वारा भोजन प्राप्त होना, जो मुझे भी प्राप्त हो चुका है । देश, काल के अनुसार शूलपाणी की झाड़ी में भीलों के यहाँ उन्हीं के बर्तनों में गोबर भरे हाथ से लेकर खाना पड़ा क्योंकि जिस स्थान पर था वहाँ और कोई चारा नहीं था, यह काल अर्थात परिस्थिति थी । जिस पात्र में भोजन मिला वह पात्र अशुद्ध हो यह भी दोष है । साधक के लिए लहसुन, प्याज, उड़द, मसूर, गाजर, मूली, सलजम, सहजन इत्यादि । संन्यासी के लिए उपरोक्त सहित धन संचय, तेल, घी, पुआ, एकान्न आदि वर्जित होने से शास्त्र दृष्टि से पाप ही है तथापि मधुकरी में प्राप्त जो प्रारब्ध से है वह अन्न पवित्र है यह भी शास्त्र ही कहता है । आज देशकाल और परिस्थिति ही ऐसी है कि इनका परिहार कठिन है । अतः इन सभी पापों के प्रायश्चित के लिए प्रस्तुत प्रसंग में दो शब्द महत्वपूर्ण हैं— “अननन्यभाक् एवं सम्यग्व्यवसितः” । इतना ठीक है तो वह निर्दोष और साधु ही है ऐसा मानना चाहिए ।
         अथवा भगवान अपनी समता का प्रमाण दे रहे हैं । कितना भी दुराचारी क्यों न हो यदि मेरी शरण में अन्य सभी सुकृत, दुष्कृत के भाव का त्याग करके एकमात्र मेरा ही भजन करता अन्य कुछ भी चिंतन नहीं करता तो उसे साधु मानना ही चाहिए क्योंकि वह भलीभांति मुझ आत्मस्वरूप में ही समाहित हो चुका है वह ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ ही सर्वत्र देख रहा है । इसलिए उसका अपमान नहीं करना चाहिए ।
             एक किंवदंती के अनुसार एक बहुत ही दुराचारी डाकू था उसने सत्तर कत्ल भी किये थे । एकाएक उसके मन में वैराग्य जाग्रत हो गया और वह किसी महात्मा के पास दीक्षा प्राप्त करने के लिए गया । महात्मा ने सोचा कि यह पापी है इसे दीक्षा दे नहीं सकता किन्तु यदि मना किया तो ये मुझे अवश्य मार डालेगा । ऐसा सोचकर पूछा कि आप शिष्य बनने आये हो तो यह जानते हो कि गुरु की आज्ञा का पालन करना पड़ता है, करोगे ? उसने कहा अवश्य वह सब करूंगा जो आप कहोगे । फिर महात्मा ने एक कपड़ा कोयले में तेल मिलाकर रंगकर उसका झंडा बना दिया और उसे देते हुए कहा कि यह झंडा लेकर सभी तीर्थों में घूमों और इसे धोना बिल्कुल नहीं । अन्यथा पाप नष्ट नहीं होंगे । वह उस झंडे को लेकर बहुत से तीर्थ करते हुए एक जंगल के मार्ग से जा रहा था तो उसे किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनायी पड़ी । अन्दर जाकर देखा तो उस स्त्री से दस लोग छेड़छाड़ कर रहे थे और वह उनसे बचने के लिए छटपटा रही थी । उसे गुस्सा आया और सोचा जहाँ सत्तर वहां अस्सी । ऐसा सोचकर उसने उन सभी को अपने फरसे से मार डाला । वह स्त्री चली गई । यह डाकू जब जंगल से बाहर रास्ते पर आया तो देखता है कि उसका झंडा सफेद हो गया है, अतः गुरु के वचनों का स्मरण करके वापस आ गया । गुरु ने पूछा कि किस तीर्थ पर यह सफेद हुआ तो वह बोला सत्तर अस्सी के बीच और सारी घटना सुना दी । तो कहने का तात्पर्य यह है कि उसकी वृत्ति उस हत्या जैसे पाप कर्म में भी गुरु के प्रति समर्पित थी, अतः वह पापमुक्त हो गया । वही यहाँ पर कहते हैं कि कितना भी पापी हो मेरे सामने आते ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं― कोटि विप्र अघ लागहिं जाही । आये शरण तजउं नहिं ताही ॥ सन्मुख होई जीव मोहिं जबहीं । कोटि जन्म अघ नासहिं तबहीं ॥ 
            शंका हो सकती है कि पहले कहा था कि पापी मेरा भजन नहीं करते ७/१५, और यहाँ उसके द्वारा भजन करने की बात कही है यह तो पूर्वापर का विरोध हो रहा है ? इसका समाधान यह है कि वहां पर कहा ‘माययापहृतज्ञाना’ ७/१५ और यहाँ पर कहा चेत् मतलब यह कि माया द्वारा हरण किये गये चित्त के कारण एक तो मेरी शरण में आयेगा ही नहीं और यदि कदाचित आया भी तो मैं यह ध्यान नहीं रखता हूँ कि वह पापी है क्योंकि पुण्यात्मा से प्रेम नहीं और पापात्मा से द्वेष नहीं क्योंकि मैं सर्वत्र समभावस्थ हूँ, इसलिये मेरी शारण में आने वाला साधु ही है । मैं उसके पापों से उसे ज्ञान देकर मुक्त कर देता हूँ, भगवान प्रतिज्ञा भी करते हैं ‘सर्वाधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः’ १८/६६ अर्थात जो सभी अनात्मपदार्थ का त्याग करके एकमात्र आत्मपदार्थ में स्थित हो जाता है मैं उसके सभी पाप नष्ट कर देता हूँ इसमें शोक करने की आवश्यकता नहीं है ॥३०॥

             संबंध— दुराचारी अनन्यभाव से समाहित चित्त से जो भजन करता है उसका फल बता रहे हैं……
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥९/३१॥
           शब्दार्थ— हे कौन्तेय ! वह शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है, नित्य शान्ति को प्राप्त करता है, मेरा भक्त कभी पतित नहीं होता ऐसा तुम भलीभांति जान लो ।
         तात्पर्यार्थ— जो सम्यग्व्यवसितः एवं अनन्यभाक् हो चुका है अर्थात पूर्व श्लोक के अनुसार जो समाहित चित्त हो चुका है और मुझसे अतिरिक्त और किसी का कोई आश्रय नहीं देखता है, वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, कारण कि अन्दर से जगत और उसके भोगों के प्रति ग्लानि हो जाती है । ऐसा धर्मात्मा शीघ्र नित्य स्थिर रहने वाली परमशान्ति अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।
             यदि शंका हो कि इतना बड़ा पापात्मा भले धर्मात्मा बन जाये लेकिन यदि पूर्व स्वभाववश पुनः पाप कर बैठे तो ? इस पर कहते हैं मेरा भक्त पतित नहीं होता । मैं स्वयं उसके योगक्षेम की रक्षा करता हूँ “योगक्षेमं वहाम्यहम्” ९/२२ ऐसी मेरी प्रतिज्ञा है ऐसा दृढ निश्चय करके जानो । मैं कोई विघ्न नहीं आने देता तथापि प्रारब्धवश कोई विघ्न आ भी जाये तो तो पुनः श्रीमान एवं ज्ञानी के घर में जन्म लेकर अ.६/४१-४२ योग द्वारा मुझे ही प्राप्त होगा । अतः मेरा भक्त पतित नहीं होता है ऐसा दृढ निश्चय करो ।
          अथवा वह यानी पूर्व का पापात्मा और इस समय परमेश्वर के शरणागत हुआ जिस समय बाह्य प्रपंचों का त्याग करके एकमात्र मेरे शरणागत हो जाता है उसी समय धर्मात्मा यानी मेरे स्वरूप को ठीक से जानने वाला ज्ञानी हो जाता है और उस ज्ञान का आश्रय लेकर नित्य रहने वाली शान्ति अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेता । अब अर्जुन ने जो छठे अध्याय में योगभ्रष्ट को लेकर शंका किया था उसका यहां पुनः उत्तर देते हुए कहते हैं कि वह योगभ्रष्ट तो पुण्यात्मा है किन्तु ऐसा पापियों का सरदार भी मेरी शरणागति स्वीकार करने पर पतित नहीं होता तो योगभ्रष्ट के लिए कहना ही क्या है ? अर्थात तुम यह भलीभाँति जान लो कि मेरा भक्त, मेरा शरणागत त्रिकाल में भी पतित न होता, हो सकता है ।
           यहां धर्मात्मा का अर्थ ज्ञान किया है क्योंकि अधिकांश टीकाकारों और भाष्यकारों ने इसका अर्थ स्पष्ट नहीं किया है और जिस किसी ने अर्थ स्पष्ट किया हो तो मुझे पता नहीं । यहां धर्म का अर्थ ज्ञान इसलिये किया है कि इसी श्लोक का द्वितीय चरण शाश्वत शान्ति प्राप्त करने की बात कहते हैं जो बिना आत्मतत्त्व के परमतात्त्विक ज्ञान के संभव ही नहीं है श्रुति भी कहती है “ज्ञानादेव तु कैवल्यं एवं सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ४/३३, सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि” ४/३६ यहाँ जो धर्मात्मा का अर्थ ज्ञान किया है वह इस अध्याय ४/३६ में कहे गये के अनुसार ही किया है, क्योंकि पूर्वापर का विरोध किसी भी परिस्थिति में शास्त्र का हनन करेगा । बिना ज्ञान के मोक्ष होता ही नहीं है यह पहले ‘वृजिनं संतरिष्यसि’ के साथ ज्ञानरूपी नौक द्वारा ही पार होने के रूप में बताया गया है और इस प्रसंग में ही इससे संबद्ध अगले श्लोक में ‘तेऽपि यान्ति परां गतिं’ कहा गया है । अतः कोई यह भ्रम न पाले कि धर्मात्मा का अर्थ ज्ञानी नहीं हो सकता है क्यों विद्वान स्वयं जानते हैं कि धर्म का अर्थ ज्ञान होता है । इस प्रकार ये सभी प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि धर्मात्मा का अर्थ ज्ञानी ही है यह स्पष्ट हुआ ॥३१॥

            संबंध— इस प्रकार अन्याय और अधर्म करने वाले की भगवत् शरणागति द्वारा उद्धार बताकर जन्मज स्वाभाविक दोषों से दूषित का वर्णन करते हैं……
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९/३२॥
             शब्दार्थ—हे पार्थ ! जो भी भलीभांति मेरा आश्रय लेते हैं पापयोनि हों, स्त्री, वैश्य, शूद्र हों वे भी परगति अर्थात जिससे बढकर उत्तम गति है ही नहीं ऐसी श्रेष्ठ गति को प्राप्त करते हैं ।
              तात्पर्यार्थ— यहाँ कुछ लोग बिना विचार के स्त्री और शूद्र को पापयोनि में गणना कर लेते हैं फिर वैश्य भी तो है जो वेद और यज्ञ का अधिकारी है उसे भी गणना में लेना चाहिए । स्त्री शब्द में ब्राह्मणादि भेद न होने से चारों वर्णों की हैं, अतः पापयोनि के साथ संगति नहीं बैठती । वेदाधिकारी होने से वैश्य के साथ तो प्रश्न ही नहीं है । शूद्र के लिए यद्यपि यद्यपि छान्दयोग्योपनिषद ५/१०/७ में कहा गया है कि पुण्य कर्म करने वाले ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य के कुल में जन्म लेते हैं, किन्तु पापकर्मा कूकर शूकर चाण्डाल योनि में जन्म लेते हैं । यहां शूद्र शब्द है ही नहीं । अतः यहाँ भी शूद्र का पापयोनि होना सिद्ध नहीं होता ।
                शंका यह भी है कि अगले श्लोक में पुण्यकर्मा ब्राह्मण और क्षत्रिय कहा है फिर श्रुति के विरुद्ध यहाँ वैश्य को अलग क्यों किया ? इसका उत्तर यह है कि वैश्य तमोगुण मिश्रित रजोगुण प्रधान होता है जो सत्वप्रधान ब्राह्मण और सत्वमिश्रित रजोगुण प्रधान क्षत्रिय जैसी तर्क पूर्वक ब्रह्मविद्या समझने की शक्ति नहीं होती है, इसलिए यहाँ अलग रखा गया है । ऐसा ही स्त्री और शूद्र के प्रति भी समझना चाहिए । यहाँ पापयोनि स्वतंत्र सिद्ध होता है । जिसमें शक, हूण, कोल, किरात, यवन, म्लेच्छ आदि बहुत जातियाँ आ जाती हैं । पशु पक्षी भी पापयोनि हैं । इनमें भी यदि पूर्व संचित ज्ञान का उदय हो जाये तो अर्थात चाहे जन्म से हो या कर्म से भगवान के शरणागत को परमगति अर्थात मोक्ष होता ही है । जिसकी एक मात्र गति परमेश्वर हैं, वे अभी तक कैसे कर्म करते आये हैं ? और किस कुल के हैं ? भगवान को इससे कोई मतलब नहीं, वे भक्त का उद्धार करते ही हैं ।
           अथवा यहां पर मैं उन सभी विद्वानों से असहमति प्रकट करता हूं जो भी पापयोनि की संगति स्त्री, वैश्य और शूद्र लगाते हैं, क्योंकि ये चारों वर्ण वैदिक हैं । स्त्री मात्र कहने पर चारों वर्ण की स्त्रियां भी आ जाती हैं, तो क्या ब्राह्मण आदि कुल की स्त्रियों को पापयोनि कहोगे ? यदि हां तो वे सभी आचार्य इस पापयोनि स्त्री के गर्भ से उत्पन्न होकर धर्मात्मा कैसे हो गये ? क्यों पापयोनि के गर्भ में आना स्वीकार करते हैं ? पापयोनि यानी जन्म से ही पाप वृत्ति वाले, राक्षस, असुर, पशु, पक्षी, आदि कहे शास्त्र द्वारा प्रमाणित हैं ।
            बहस— अज्ञानी संसार का चिन्तन करते हुए जब परस्पर एक दूसरे की काट छांट करते हैं तब उसे बहस कहते हैं । इसी बहस को जब दो विद्वान आधार श्रुति-शास्त्र का बनाकर करते और अपना पक्ष कोई न हो तब उसे कहते हैं वितंडा । यही बहस जब अपने पक्ष को बलवान करने के लिए अपने दोषों को छिपाते हुए दूसरे के दोषों को प्रकट करता तब उसे कहते हैं जल्प । इसी बहस को जब श्रुति-शास्त्र के आधार पर दोनो पक्षों के दोषों का निराकरण करते हुए एक निश्चित परम तत्त्व और समाज को दिशा निर्देश मिलता है उसे कहते हैं वाद । इसी वाद को भगवान कहते हैं ‘वादः प्रवदतामहम्’ १०/३२ वही यहाँ पर समझना चाहिए । मैं अधिक व्याख्या नही करना चाहता था तथापि यह बहस का मुद्दा बन गया कि आचार्य शंकर के विरुद्ध अर्थ नहीं होना चाहिए । जबकि मेरा मत है कि शास्त्र के लक्ष्य को लेकर आचार्य प्रमाण हैं, आचार्य के लक्ष्य को लेकर शास्त्र प्रमाण नहीं हो सकता है । यदि श्रुति विरुद्घ भगवान भी बोलते हैं तो उनकी भी बात अमान्य होना हमारी वैदिक आर्य संस्कृति की परंपरा रही है । इस बात को स्वयं आचार्य जी ने अनेकों बार कहा है । इसीलिये हम बुद्ध को भगवान तो मानते हैं, लेकिन उनका श्रुति विरुद्ध सिद्धांत नहीं मानते । इसी बात को लेकर हुई चर्चा के आधार पर यद्यपि मैने ऊपर संक्षिप्त भावना व्यक्त कर दी थी तो भी मेरी बात का कोई तो प्रमाण होना चाहिए था जो किसी अशिक्षित के लिए कठिन है तथापि हमने प्रयत्नपूर्वक कई आचार्यों की टीकाएं और भाष्य देखा । निम्न लेख कई भागों में विचार पूर्वक बहुत सोच समझकर विद्वानों के मतों की समालोचना करते हुए लिखा है ।
            इस बीच हमें बड़ी गंभीर बात मिली कि वैश्यों का वेदों पर अधिकार नहीं है लगभग सभी टीकाकारों ने यह बात स्वीकार की है । अब प्रश्न यह बैठता है कि परंपरा से हम सुनते आ रहे हैं कि वेदों पर स्त्रियों, शूद्रों के अतिरिक्त त्रैवर्णिक अधिकार है और यहाँ अनधिकार क्यों ? इसका कारण दिया कि वह खेती करता है, गोपालन करता है, व्यापार करता है । तो भाई ! यह कार्य क्या नया है ? यह तो अति प्राचीन परंपरा रही है, स्वयं श्रीकृष्ण ने भी उनका यही कार्य बताया है । अतः वे शास्त्र गलत जिन्होंने वैश्य को वेदाधिकार दिया या वे भाष्यकार, टीकाकार, टिप्पणीकार गलत जो वैश्यों का वेदों में अनधिकार बता रहे हैं ? श्रुति स्वयं अपने विरुद्ध या आप श्रुति विरुद्ध ? आचार्य शंकर ने जो स्त्री, वैश्य शूद्र को पापयोनि कहा उसमें उनका साथ उड़िया बाबा के अतिरिक्त अष्टटीका के नाम से प्रसिद्ध गीता की टीकाओं में से भाष्योत्कर्षदीपिका, परमार्थ प्रभा एवं राघवेन्द्रविवृति नामक तीन टीकाओं ने दिया है, शेष ने अलग वही अर्थ किया है जो मैने किया है बस उनकी बात गले से एक ही नहीं उतरती वैश्यों को उन्होंने भी वेदों अनधिकारी बता दिया, यह श्रुति विरुद्ध है और इसे कोई भी स्वीकार कैसे कर सकता है इसका प्रमाण भी अखंडानंदजी के माध्यम से नीचे दिया जा रहा है ।
              हमने स्त्री, वैश्य और शूद्र को पाप योनि क्यों नहीं माना और पापयोनि को इन तीनो से भिन्न क्यों कहा इसका तो स्पष्टीकरण ऊपर कर चुका हूँ किन्तु श्लोक में देखिये श्लोक के पूर्वार्ध में ‘येऽपि स्युः’ के साथ में ‘पापयोनयः’ आया है जबकि स्त्री वैश्य एवं शूद्र के साथ उत्तरार्ध में तेऽपि आया है । जिसका अर्थ यह है येऽपि अर्थात ‛जो भी’ की संगति पापयोनयः के साथ लगेगी एवं तेऽपि अर्थात ‛वे भी’ की संगति स्त्री वैश्य और शूद्र के साथ ही लगेगी । इस प्रकार स्वयं गीतोपदेशक ही पापयोनि का वर्णन अलग और स्त्री आदि का वर्णन अलग कर रहे हैं । इन सम्यक विचारों से दूर दूर तक स्त्री आदि का पापयोनि होना सिद्ध नहीं होता ।
             उड़िया बाबा से भी असहमति― ये विचार लेख से कुछ दिन बाद के हैं जब उड़िया बाबा की टीका देखा उस समय यहाँ पर विचार प्रकट कर दिया । आपने स्त्री, वैश्य और शूद्र के पापयोनि होने का बड़ी ही सावधानी से समर्थन किया है और आपके अनुसार ठीक भी हो सकता है तथापि सामाजिक व्यवस्था के अनुसार जो हमारी वैदिक व्यवस्था स्त्री, वैश्यों और शूद्रों को प्राप्त हुई है, उसको स्मृति और पौराणिक काल ने तार-तार कर दिया है । हमारे समाज का विघटन उसी काल में प्रारंभ हो जाता है जिस काल में स्मृतियों का उदय होता है जिसके कारण अत्यंत कम शब्दों में प्रसंगानुसार ही बताने का प्रयत्न करूंगा । हमने अन्त में प्रमाण के लिए दो पुस्तकें दी हैं और स्मृतियां अलग से समझ कर रखना चाहिए । ये सभी पुस्तकें नेट पर भी उपलब्ध हैं जिन्हें कोई भी संग्रह करके प्रमाण देख सकता है । अब आगे का विषय―
           आपने कहा कि स्त्री में लोभ, अशुद्धि, काम की प्रधानता अधिक होती है । स्त्री की सभी इच्छाएं नष्ट हो जाने पर भी पति-सुख की कामना रहती है । इन्हें थोड़ा भी प्रलोभन देकर नीच से नीच कार्य करवाया जा सकता अर्थात आपका स्पष्ट संकेत उनके व्यभिचार से संबंधित है ।
             मेरा प्रश्न है कि इनमें से ऐसे कौन से कार्य हैं जो ब्राह्मण और क्षत्रिय पुरुषों में नहीं हैं और वे मात्र स्त्रियों में ही हैं ? शास्त्रों में बहुत से ऋषि भी जंगल में पड़े पाये गये जिनमें कुरुकुल के श्रेष्ठ पुरोहित आचार्य कृप और उनकी बहन कृपी प्रमाण हैं । विश्वामित्र जैसे तपस्वी और मेनका ने भी नवजात बच्ची शकुंतला को वन में छोड़ दिया था । आज कोई बच्चे को जन्म देकर फेंक नहीं सकता है लेकिन उस समय के इस अमानवीय कृत्य का यह जीता जागता प्रमाण है । क्रोध और लोभ तो द्रोणाचार्य का तब देखते बनता है जब राजा द्रुपद ने मित्र मानने से मना कर दिया तो उनको बंदी बनाकर बहुत से निर्दोषों की हत्याकराकर उनका आधा राज्य ही हड़प लिया । इतना ही नहीं महाभारत की जड़ भी आचार्य द्रोण को ही कह सकते हैं मात्र नौकरी के कारण, धन के कारण अन्याय पक्ष को ही महत्व दिया, न कि ब्राह्मणोचित न्याय पक्ष अथवा निवृत्ति पक्ष, इतना ही नहीं स्वार्थ की चरमसीमा तब देखने को मिलती है जब आचार्य द्रोण, कृप भी युद्ध के सिद्धांतों के विरुद्घ आचारण करके अन्यायपूर्वक अभिमन्यु का वध करवा देते हैं और अश्वत्थामा का क्रोधमय कुकृत्य उस समय देखने को मिलता है जब अन्यायपूर्वक सोते हुए सैनिकों के शिविरों में युद्ध सिद्धांत के विरुद्ध आग लगकर सैनिकों को जिन्दा जला देता और गर्भस्थ शिशु पर भी ब्रह्मास्त्र जैसे निर्निवारक यानी अमोघास्त्र का प्रयोग करता है, क्या आपने इन्हें पापयोनि कहा ? जिन्हें आप पुण्य योनि कहते हैं उनकी काम प्रधानता तो स्मृतियों में प्रसिद्ध है । किसी भी राजभवन या स्त्री के पास चले जाना और उससे उत्पन्न संतान की एक नई जाति बना देना और उनके साथ घृणित अमानवीय व्यवहार करना-करवाना यह स्मृति काल के ऋषियों का ही कार्य था । आज संपूर्ण मानव समाज इनकी इसी कामुकता के पापों का परिणाम भोग रहा है । तो फिर स्त्रियों को ही अकेले पापयोनि क्यों, इन ऋषि-ब्राह्मणों को भी पापयोनि क्यों न कहा जाये ? जो अपनी काम तृप्ति के लिए किसी भी स्त्री को रति दान नाम के नाम पर दूषित कर देते थे और उससे उत्पन्न संतान से अमानवीय व्यवहार करते थे ?
           आपने कहा कि वैश्य लोभ और कपट वाले होते हैं और व्यापार में झूठ भी बोलते हैं, तो क्या ब्राह्मण-क्षत्रिय पुरुषों में यह नहीं था या आज नहीं है ? यदि आप यह स्वीकार करते हैं तो फिर ब्राह्मण-क्षत्रिय पुरुष पापयोनि क्यों नहीं ?
           आपने शूद्रों को सत् और असत् अर्थात अन्त्यज दो भागों में बांटा और बात भी ठीक है तथापि क्या ये दोनो ही वर्ग स्मृतियों के आधार पर आपकी कामुकता के पापों का जीता-जागता प्रमाण नहीं है ? जिन काम, क्रोध की प्रधानता के कारण शूद्र पापयोनि हो जाता है उन पापों का बीज भी तो आप ही हो फिर आप पापयोनि क्यों नहीं हो सकते ? और अगर आप पाप का कारण होने पर भी पापयोनि नहीं हैं तो आप अपनी ही सत् असत् संतान के प्रति अमानवीय व्यवहार कैसे कर सकते हैं ? 
            अपवाद रूप से देखा जाये तो ये सभी गुण दोष सर्वत्र व्याप्त हैं । जहाँ ऋषियों-क्षत्रियों (पुरुष वर्ग) में भी ये दोष पाये जाते हैं वहीं स्त्रियों का पातिव्रत्य धर्म जगविदित रहा है । स्त्री जहाँ एक ही पति को अपना सर्वस्व निछावर कर देती थी तो वहीं यह पुरुष वर्ग सैकड़ों हजारों विवाह के लिए शास्त्रों में प्रसिद्ध है, यह प्रथा अभी भी हमारी आंखों के देखते देखते कई पत्नियां रखने की परंपरा रही है । जबकि कितनी दासियों से अनैतिक संबंध अगल से रहते होंगे यह एक रहस्य है । इसका जीता जागता प्रमाण शास्त्रों में अनेक स्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध उनका अपहरण और बलात्कार के रूप में देखा जा सकता है । दुर्योधन का भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण तो मानव मात्र के हृदय के अनन्त टुकड़े ही कर देता है, जिसका परिणाम आज भी समाज भोग रही है । मंन्दालसा, गार्गी और सुलभा इत्यादि शास्त्रों में जितेन्द्रिय सत्त्वगुण संपन्न संसार की संपूर्ण नारी जाति का गर्व हैं । कौशल्य और देवकी, यशोदा जैसी राम-कृष्ण की जननी हम सबके स्मरण मात्र से पापों को नष्ट करने वाली हैं, जिनकी संतान बनने को भगवान् भी तरसते हैं उनको एक ही स्वर में पाप योनि कह देना मातृ शाक्ति का इससे बढकर अन्य कोई अपमान हो ही नहीं सकता । ऐसा जघन्य अपराध कृष्ण तो कभी भी नहीं कर सकते, उनकी ओट लेकर अपना स्वार्थ चाहे स्त्री विषयक हो या जाति विषयक कुछ निजी स्वार्थी लोग ही ये जघन्यतम व्याख्या करके सकते हैं । अन्य नहीं ।
           शास्त्रों का सूक्ष्मता से अध्ययन करने से पता चलता है कि जाति समाज उन्नति की एक व्यवस्था थी न कि आज की तरह जातिवाद । इस व्यवस्था को लोग स्वेच्छा से स्वीकार करते थे । शास्त्रों में ब्राह्मणेतर का ब्राह्मण होना और ब्राह्मण का ब्राह्मणेतर होना भी प्रसिद्ध है । जो जिस कार्य में कुशल होता था उसी वर्ग के अनुसार जाति स्वीकार कर लेता था । आज की तरह शास्त्रों में घृणा जाति को लेकर नहीं थी । यह भी स्वार्थ से ऊपर उठकर शास्त्रों में देखा जा सकता है ।
         गीता जैसे दिव्य ग्रंथ में भी भाष्यकारों, टीकाकारों और टिप्पणीकारों ने जातीय भेदभाव इतना अधिक घुसा दिया है कि यह लगता ही नहीं है कि जातिविशेष के अतिरिक्त गीता पर अन्य का भी अधिकार हो सकता है । जातीय भेदभाव की घृणित व्यवस्था महाभारत में कर्ण, एकलव्य आदि के रूप में भी देखी जा सकती है । यहाँ तक कि गीतानायक भी अहीर, ग्वाला आदि से तिरस्कृत होकर इस भेदभाव के शिकार हुए थे, यह किसी से भी छिपा नहीं है । उन्हीं कृष्ण पर चार वर्णों के निर्माण का आरोप लगाते हैं, लेकिन वे यह नहीं देखते कि वहां वर्ण की गुण और कर्म के आधार पर व्यवस्था की है न कि जन्म के आधार पर । कोई इस वर्ण व्यवस्था की गलत व्याख्या न कर सके इसके लिए उन्होंने स्वयं ब्राह्मण के नौ गुण १८/४२, क्षत्रिय के सात गुण १८/४३, वैश्य के तीन और शूद्र का एक गुण १८/४४ बताते हुए वर्ण व्यवस्था को और अधिक स्पष्ट किया है । जहाँ कहीं भी ये गुण हों और इनके अनुसार ही कर्म हों वही उस गुण कर्म के आधार पर ब्राह्मण आदि है अन्यथा नहीं । क्या ये गुण न होने पर भी ब्राह्मण-क्षत्रिय पुरुष पापयोनि नहीं हैं ?
             इस जातिवाद की जड़ हमारा स्मृति और पौराणिक काल ही है । सर्वत्र स्वार्थ से परिपूर्ण व्यवस्थाएं स्पष्ट देखी जा सकती है । गीता में भी जातिवाद घुसा देना स्वार्थ सिद्धि की चरमसीमा है । आज समाज में जो अव्यवस्था बनी है ऐसे ही कामी और स्वार्थ परायण लोगों के कारण ही बनी है । इतने पर भी अपनी मानसिकता बदलने को तैयार न होना आज के समाज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है । स्मृतियों के अतिरिक्त ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड, जाति भास्कर आदि में जातियों की घृणित उत्पत्ति और जातीय परिवर्तन प्रमाणों के सहित स्पष्ट देखा जा सकता है । कम से कम आज के समय में तो मानसिकता बदलो । वेदों पर स्त्री का अधिकार नहीं है, शूद्रों का अधिकार नहीं है यह घृणित भेदभाव वेदों का नहीं वरन् स्मृतियकारों और पौराणिकों का है ।
            हम क्षमाप्रार्थी हैं उन ऋषियों के जिनको लेकर यह अपवाद किया, क्योंकि आपके उस समय के दृष्टिकोण को न समझते हुए अर्थ का अनर्थ करने वाले आचार्यों की इस कलियुग में बाढ आ गयी है । जहाँ तक समझ सका वहां तक वेद कहीं भी निषेध नहीं करते, ब्राह्मण आदि की स्त्री पति के साथ यज्ञ में बैठती है यदि पापयोनि है तो इस पापिनी को यज्ञ मंडप में जाने ही क्यों देना ? क्या पति के साथ यज्ञ में बैठते पवित्र हो जाती हैं और यज्ञमंडप से उठते ही पाप का पिटारा बन जाती हैं ? तो फिर शूद्र स्त्रियां भी यज्ञ में पति के साथ बैठने में पवित्र होना चाहिए ? बाद में भले पाप का पिटारा बन जायें, क्योंकि वहाँ तो स्त्रीमात्र शब्द है ब्राह्मण आदि की स्त्री कहकर भेद नहीं किया गया है ।
             वैश्य, लोभी, कपटी, झूठ बोलने वाले पापी का धन यज्ञ में लगाकर यज्ञ तो पापमय हो गया और आप भी, ऐसी दशा में उसका धन क्यों लेना ? और यज्ञादि में लगाकर स्वयं पापमय होकर सत्कर्म को भी पापमय क्यों बना देना ? शूद्र तो कामी, क्रोधी है ही ऐसे पापी द्वारा समिधा का संचय, मंडप की तैयारी आदि कराकर पूरा मंडप और समिधाओं को पापी का हाथ लगने से पूरा यज्ञ ही पापमय हो गया, तो ऐसा पाप आप क्यों करते हैं ? चारों वर्ण स्त्री सहित वेदाधिकारी हैं ऐसी मेरी अपनी मान्यता है, कुछ काल विशेष को छोड़कर । अब जिन्हें पापयोनि कहा गया है उन्हें भागवत के अनुसार उड़िया बाबा से ही समझ लेते हैं―
किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कषा आभीरकंकाः यवनाः खशादयः ।
येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ।।
         अर्थात जिन जगत् उत्पादक परमेश्वर की शरण लेने पर किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कष, आभीर, कंक, यवन, खश आदि (वेद बाह्य भी) पाप मुक्त हो जाते हैं उनको नमस्कार है । 
         इस प्रकार स्त्री, वैश्य और शूद्र को एक साथ पापयोनि कह देना विवाद को जन्म देकर समाज में विस्फोट करना है । आप व्यक्तिगत अपनी जो मान्यता हो उसे मानो, अधिक हो तो मौन रहो । अन्यथा शास्त्र में जहाँ आप अपने स्वार्थ की मिलावट करना जानते हैं तो दूसरा छंटनी करना भी जानता है । इससे समाज में अनवास्था दोष उत्पन्न हो जायेगा ।
            अखंडानंद सरस्वती जी— पापयोनयः – मधुसूदन सरस्वती ने इसकी टीका लिखी है कि ‛पापयोनयः’ माने ‛गृधादयः’ गोस्वामी तुलसीदास जी भी यही कहते हैं― गीध अधम खल आमिष भोगी । पाव सो गति जेहिं जाचत योगी ॥
         शंकराचार्य जी ने ‛पापयोनयः’ को ‛स्त्रियोवैश्यासतथा शूद्राः’ का विशेषण माना है । मधुसूदन जी शंकराचार्य के अनुयायी हैं, फिर उन्होंने ने शांकर भाष्य में ऐसा रहते हुए बदला क्यों ? इस पर विचार करें । शंकराचार्य का यह कहना है कि जहाँ व्यासकृत ब्रह्मसूत्र भी श्रुति के विरुद्घ हो जाता है वहाँ बलात् ब्रह्मसूत्र का अर्थ श्रुति के अनुकूल करना चाहिए । उन्होंने ने यहाँ तक कह दिया कि बलपूर्वक ब्रह्मसूत्र को श्रुत्यारूढ करो । श्रुति परम प्रमाण है, यह नियम शंकराचार्य ने ही बनाया है और भाष्य में अनेक स्थानों पर इसका पालन भी किया है ।
        अब मधुसूदन सरस्वती ने देखा कि शंकराचार्य बोलते तो हैं, परन्तु एक श्रुति ऐसी भी है जिसके विरुद्ध उनका भाष्य जाता है । वह कौन श्रुति है ?__
         तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वा । अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिं पद्येरन् श्वयोनिं वा शूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा ॥५/१०/७॥
         अर्थात उन में जो अच्छे आचरण वाले होते हैं वे शीघ्र उत्तमयोनि को प्राप्त होते हैं । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि को प्राप्त होते हैं । तथा जो अशुभ आचरण वाले होते हैं वे तत्त्काल अशुभ योनि को प्राप्त होते हैं । वे कुत्ता, शूकर अथवा चाण्डालयोनि को प्राप्त होते हैं ।
         {निज विचार― यहाँ यह चाण्डाल शब्द से स्पष्ट हो जाता है कि जो शूद्र नहीं बल्कि वेद बाह्य अन्त्यज पापयोनि के अन्तर्गत कहे गये हैं । शक, हूण, म्लेच्छ आदि मनुष्य एवं अन्य पशु, पक्षी, सर्प आदि पापयोनि अर्थ ही युक्तिसंगत है ।}
          तो यहाँ वैश्य को रमणीयचरणा अर्थात उत्तमयोनि में श्रुति का उल्लेख है और शंकराचार्य का भाष्य जाता है इस श्रुति के विरुद्ध । 
        {(इतना ही नहीं आचार्यचरण ने स्वयं अध्याय १८/४१ के अपने भाष्य में भी वैश्य को पघ वेदाधिकारी कहा है । वह वेदाधिकारी हो और पापयोनि भी इस प्रकार दोनो ही परिस्थिति एक साथ दिन-रात इकठ्ठा होकर एक ही थाली में भोजन कैसे कर सकते हैं ? यह अंश पूर्णतः प्रक्षेपित है ।)}
          जबकि इसे प्रक्षिप्त कहने की बजाय इसके आगे का अर्थ अखंडानंदजी का समन्वयवादी है । आगे कहते हैं― तब क्या करना चाहिए, बोले कि भाई ! श्रुति का पक्षपात करना ही ठीक है जिसमें कि फलश्रुति लग जाये । इसलिये उन्होंने ‛पापयोनयः’ का अर्थ ‛गृधादयः’ कर दिया, लेकिन इसमें शांकर भाष्य में कोई अन्तर पड़ा ? अन्तर तो नहीं पड़ा, फिर क्या हुआ ? वही आपको सुनाता हूँ―
          देखो चाहे गृधादि हों, स्त्रियां हों, वैश्य हों, शूद्र हों इस श्लोक में एक बात लगी हुई है― ‛तेऽपि यान्ति परां गतिम्’ । इसलिये निकृष्टता तो कहीं न कहीं आती ही है । बोले कि हां, निकृष्टता तो आती है और इसीलिये शांकर सिद्धांत मान्य है, परन्तु किसकी अपेक्षा से निकृष्टता आती है― आगे ब्राह्मण पुण्य है, राजर्षि भक्त है इस प्रकार अगले श्लोक के साथ जोड़कर समन्वय कर दिया ।
        मेरा प्रश्न ये है कि जातीय व्यावहारिक उत्कृष्टता और निकृष्टता होना स्वाभाविक है इसका यह तो अर्थ नहीं है कि श्रुति विरुद्ध जाकर हम कुछ भी बोल दें ? यह बोल दें कि वैश्य वेदाधिकारी नहीं है । क्या ब्राह्मण का ब्राह्मण में और क्षत्रिय का क्षत्रिय में एवं ब्राह्मण और क्षत्रिय में उत्कृष्टता और निकृष्टता नहीं है ? इनमें जो निकृष्ट है वह पापयोनि हो गया ? आज यही तो समस्या हमारे समाज में व्याप्त है कि पहले शूद्र का वेदाधिकार में निषेध किया, फिर आपने वैश्य का निशेष किया और अब मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ कि तथाकथित ब्राह्मण लोग क्षत्रियों का भी वेदाधिकार नहीं मानते । जिसके परिणामस्वरूप आज के समाज की भयंकर दयनीय स्थिति हो गई है । हमारे यहाँ म्लेच्छ (अंग्रेज) वेद पढ सकते हैं, यवन (मुसलमान) वेद पढ सकते हैं लेकिन हिन्दू वेद नहीं पढ सकता है क्योंकि वह शूद्र है, वह स्त्री है । यह करके हिन्दुत्व के नाम पर बरगालने वाले यह भी क्यों नहीं सोचते कि जो वेदबाह्य हमारे सनातन धर्म, सनातन संस्कृति के विरोधी हैं, वे वेद पढ सकते हैं तो हिन्दू क्यों नहीं पढ सकता ? स्त्रियां क्यों नहीं पढ सकतीं ? बात जाति की नहीं है, बल्कि बात है उसकी लगन, उसके प्रयत्न की, रुचि और लक्ष्य की है । यदि मेरे से कोई पूछे कि हृदय पर हाथ रखकर कहो कि आचार्य शंकर के इस श्रुति विरुद्ध भाष्ययांश पर सहमत हो― तो मैं यही कहूंगा कि यह भाष्यांश आचार्य का त्रिकाल में हो ही नहीं सकता । यह प्रक्षेपित है, किसी विधर्मी, स्वार्थी असुर ने, राक्षस ने, हमारी संस्कृति का नाश करने के लिए षड्यंत्रकारी ने यह आचार्य शंकर पर लोगों कि आस्था को देखकर उनके नाम पर समाज को भ्रमित करने के लिए यह भाष्यांश जोड़ा हुआ है, प्रक्षिप्त कर दिया है ताकि परस्पर लड़कर आर्य और आर्य संस्कृति यानी वैदिक व्यवस्था नष्ट हो सके । 
           एक और प्रमाण देता हूँ  आचार्य शंकर की अन्तिम आयु बत्तीस वर्ष की प्रसिद्ध है, तो भी आचार्य के नाम पर एक ‘देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र’ प्रसिद्ध है । आज आचार्य, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर यह भी ध्यान नहीं देते कि इस स्तोत्र में स्पष्ट लिखा है — ‘मया पञ्चासीतेरधिकमपनीते तु वयसि’ अर्थात स्तोत्रकार कहता है कि हे मां ! मेरी पच्चासी वर्ष से अधिक आयु बीत चुकी है । जबकि आचार्य शंकर की आयु बत्तीस वर्ष की थी तो यह स्तोत्र उनका हो भी कैसे सकता है ? हमको विरोध स्तोत्र से नहीं है, बल्कि स्तोत्र को किसी कपटी के द्वारा आचार्य के नाम पर की गई प्रसिद्धि से समाज में फैलने वाले भ्रम से है । ये दो प्रमाण प्रक्षिप्त आचार्य के नाम से दिये । विवेकशील स्वतः संज्ञान लेकर भारतीय संस्कृति का नाश करने वाले वेदविरोधियों के अभियान को कुचलें । आज के स्वार्थी पदासीन शंकराचार्य भी इन प्रक्षेपों को जाति आदि के आधार ही सिद्ध करने में लगे हैं । वस्तु विचार तो कहीं दूर दूर तक नहीं दिखता है । हमने एक बार एक मंडलेश्वर से पूछ दिया, तो वे इतने भड़के कि मैं पिटते पिटते बचा । यही कारण है कि जो सर्वत्र पूजे जाते थे वही धर्माचार्य आज जेलों में ठूंसे जा रहे हैं । लोगों की श्रद्धाएं ही दंभियों और संस्कृति विरोधियों के कारण उठ गईं हैं । मेरा यही मत है कि बिना विचार के अक्षरशः कोई भी किसी भी भाष्य, टीका और  टिप्पणी, स्तोत्र आदि पर विश्वास न करे ॥९/३२॥
  
            संबंध— जब ऐसा दुराचारी, पापी स्त्री, शूद्रादि का भी भगवान की शरणागति से उद्धार हो जाता है तो फिर ब्राह्मण क्षत्रिय के लिए कहना ही क्या है……?
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥९/३३॥
           शब्दार्थ— जो पुण्यात्मा अर्थात पवित्र आचरण करने वाले मेरें शरणागत भक्त ब्राह्मण क्षत्रिय के लिए कहना ही क्या ? इसलिये इस अनित्य और दुःखरूप इस शरीर को प्राप्त करके मेरा भजन कर ।
           तात्पर्यार्थ— यहाँ ब्राह्मणाः पुण्या और भक्ता राजर्षयः इस प्रकार दो पदों में श्लोक का पूर्वार्ध है । अब पद भेद के अनुसार पुण्या शब्द ब्राह्मण के साथ जैसा कि भाष्यकारों और टीकाकारों ने माना है लिया जाये तो भक्ता शब्द भी राजर्षयः के साथ ही युक्तिसंगत होगा । इससे क्या होगा कि ब्राह्मण मात्र यज्ञ, दान, तप आदि वैदिक पुण्य कर्म करके और राजर्षिगण भक्ति से मोक्ष को प्राप्त करने का भिन्न प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । क्योंकि “किं पुनः” ये दोनो शब्द पापयोनि, स्त्री आदि की अपेक्षा यहाँ उत्कृष्टता दिखाना है कि जब उन्हें मुक्ति इस प्रकार मुक्ति मिल सकती है तो आपको क्यों नहीं ? अर्थात मोक्ष मिलना ही है । यह युक्ति संगत प्रतीत नहीं होता । यहां ऋषयः शब्द जन्म से ही शुद्धता के लिए अर्थात जो जन्म से शुद्ध क्षत्रिय हैं उसे भक्ति से और ब्राह्मण को यज्ञादि सदाचार से मुक्ति मिलती है ऐसा सिद्ध नहीं होता । अतः भक्ता शब्द उभय पक्ष की अन्तर्पवित्रता के साथ अध्याहार कर दिया गया है ।
               अब यहाँ शंका यह है कि दूसरे पद के भक्ता का अध्याहार प्रथम पद में हो सकता है तो तो पुण्या और ऋषयः शब्द उभयपक्षी क्यों नहीं हो सकते ? राजर्षयः ४/२ में राजा और ऋषि टीकाकारों ने माना है इसी प्रकार पुण्या और ऋषयः उभयपक्ष के साथ अन्वय करने से— जो पुण्य कर्म करने वाले सदाचारी तपः प्रधान (यहाँ ऋषयः से तपः प्राधान समझना चाहिए) अन्तर्बाह्य पवित्र जो ब्रह्मर्षि और राजर्षिगण हैं उनको परम गति प्राप्त हो तो क्या कहना अर्थात मोक्ष मिलना ही है । यहाँ ऋषि शब्द का उभयपक्षी कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, भले ही वह पुण्यकर्मा है लेकिन यदि तपस्वी जीवन न होकर विलासतापूर्ण जीवन है तो उसका भी उद्धार होने वाला नहीं है ।
               इसी विलासिता के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने के लिए ही आगे कहते हैं “इमं लोकं अनित्यं असुखम्” अर्थात यह शरीर अनित्य है इसको सुख देने के लिए कितनी भी विलासिता कर लो, इसके लिए कुछ भी कर लो किन्तु ये भोग और शरीर दोनो ही दुःखप्रद ही हैं, इस लिए यह जो शरीर अनित्य और दुखप्रद प्राप्त हुआ है इसका आश्रय लेकर स्थायी और नित्य सुख प्राप्त करने के लिए मुझ सर्वात्मा वासुदेव का भजन कर । यहाँ भजन करने का आदेश दे रहे हैं । क्योंकि धर्म अर्थ और काम से स्वाभाविक हैं, इनमें किसी पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं है । पुरुषार्थ साध्य तो एकमात्र मोक्ष ही है । अतः प्रयत्नपूर्वक मोक्षस्वरूप मेरा चिन्तन कर ।
               अथवा पूर्व श्लोक में कहे गये स्त्री वैश्य शूद्र तथा अन्य पापात्माओं की अपेक्षा से ब्राह्मण और क्षत्रिय की उत्कृष्टता अध्यात्म क्षेत्र में दिखाना है न कि स्त्री आदि को पाप योनि कहना । स्त्री में सदैव ममत्व रूप मोह का पिटारा सदैव रहता ही है, वैश्य में लोभ की ही प्रधानता है, वह धन प्राप्ति के कुछ भी कर सकता है और किसी भी सीमा तक जा सकता है जबकि शूद्र तमोगुण प्रधान होने के कारण उसमें सत्, असत् का विवेक होना भी असंभव जैसा है, पाप योनि यानी जिनका जन्म से ही स्वभाव हिंसात्मक हो ऐसे कोल, किरात, पुल्कस, इत्यादि । अतः इनमें मेरी शरणागति की संभावना ही नहीं होती है तो भी यदि मेरी शरण में आ जाते हैं तो वे भी परम गति को प्राप्त करते ही हैं क्योंकि मेरे भक्त का पतन नहीं होता । ऐसा समझकर जो स्वभाव से पुण्य अर्थात पवित्र हैं, जिनमें सत्वगुण की ही प्रधानता है, शम दम आदि १८/४२ नौ गुण जिनमें स्वभाव से ही विद्यमान हैं वे ब्राह्मण एवं सत्त्वगुण मिश्रित रजोगुण की ही प्रधानता जिनमें है, शौर्य आदि सात गुण जिनमें स्वभाव से ही विद्यमान हैं १८/४३ वे क्षत्रिय यदि मेरी शरण में आकर मेरा भजन करते हैं तो इसमें कहना ही क्या है ? अर्थात इसमें किसी प्रशंसा की आवश्यकता इसलिये नहीं है कि यह तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और उन्हें अध्यात्म पथ पर विचरण करना ही चाहिए । अतः इस प्राप्त शरीर को ही दुःख का हेतु समझकर नित्य सुख का साधन समझकर इसे प्राप्त करके मेरा ही भजन कर ॥३३॥

            संबंध— मुख्यतः अष्टम अध्याय में निर्विशेष ब्रह्म के उपासक के उपासक उत्तम और मध्यम का वर्णन हुआ जिसमें एक तो एकात्मत्व का चिन्तन पूर्वक और दूसरा ओम की प्रतीकोपासक की क्रम मुक्ति का वर्णन किया गया । प्रथम दो के बाद चतुर्थ अधम अधिकारी भेदोपासक देवाराधक कहे गये । बाद में तृतीय कनिष्ठ अधिकारी को सात भागों में— पहला दुराचारी अर्थात यह किसी भी जाति धर्म कुल आदि का हो सकता है । दूसरा पापयोनि के अंतर्गत कूकर, शूकर, चाण्डाल, म्लेच्छ, यवन, हूण, कोल, किरात, वर्णसंकर आदि । तीसरी स्त्री, चौथा वैश्य, पांचवाँ शूद्र, छठा ब्राह्मण और सातवां क्षत्रिय । इन सात विभागों मे कोई भी नहीं छूटता सभी के लिए ९/३०-३३ तक कह दिया अब ऐसे कनिष्ठ अधिकारी की उपासना और भक्ति के स्वरूप का वर्णन करते हैं……
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥९/३४॥
              संबंध— मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे नमस्कार कर, मुझमे मुझसे युक्त होकर मेरे परायण होकर मोक्ष को प्राप्त करेगा ।
            तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने कहा था “मय्यासक्तमनाः” ७/१ तो मन भगवान में कैसे आसक्त हो ? उसी की यहां व्याख्या करते हैं ।  “योगं युञ्जन्मदाश्रयः” ७/१ में जो एकत्व और शरणागति कही थी वही यहाँ “युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः” कहते हैं । उसी का एकत्व नवम अध्याय में ज्ञानविज्ञान ९/१ के रूप में यहाँ दर्शाते हुए अन्त में अपने हृदय की बात कहते हैं कि वस्तुतः अपना कल्याण चाहने वाले को किस प्रकार अपने मन को मुझ में आसक्त करना चाहिए । हृदय की बात किसी दोषदृष्टि से रहित वाले से ही कही जा सकती है, इसके लिए ही “अनसूयवे” ९/१ कहा था । यहाँ पर श्रीभगवान अपने हृदय की बात कहते हैं अतः इस अध्याय को भगवान का हृदय कहा जाता है ।
                 एक बात और ध्यान देने योग्य है कि हमारी आसक्ति जहाँ होगी हमारा मन न चाहकर भी उसी का बारंबार स्मरण करेगा इसीलिये “मय्यासक्तमनाः” कहा था मन कैसे आसक्त हो इसके लिए कहते हैं— मन्मना भव अर्थात मैं वासुदेव ही मानव जीवन का चरम लक्ष्य हूँ, क्योंकि मैं ही सर्वात्मा हूँ । अतः मुझे आत्मरूप में देखे । अपने से दूर यानी भिन्न न देखे ऐसा मन हो जाये । ऐसा होने पर प्रत्येक कर्म उसकी आराधना हो जायेंगे । वह जो खायेगा, पियेगा, लेगा, देगा इत्यादि । जो भी करेगा “ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः” ४/२४ अर्थात ध्याता, ध्यान, ध्येय ; पूजक, पूजन और पूज्य सब कुछ वासुदेव ही होगा “वासुदेवः सर्वम्” ७/१९ इस प्रकार मेरा पूजन करे । माता-पिता, गुरु, ब्राह्मण, गाय, हाथी, चांडाल, कुत्ता आदि में भी आत्मरूप से मुझे देखे और जो हो रहा है परमात्मा की ही इच्छा से हो रहा है और वे जो करेंगे अच्छा ही करेंगे यही उनकी स्तुति अर्थात नमस्कार है ।
                इस प्रकार तेरा मन अर्थात स्वयं आत्मभाव से युक्त अर्थात अभिन्न होकर मद्रूप मेरे परायण हुआ तू मुझको ही प्राप्त होगा । यहां युक्तात्मानम् का अर्थ परमात्मा के साथ अभिन्नता का सूचक है, कारण यदि आत्मानम् का मन करें तो युक्त के साथ अर्थ बनता है कि मन मुझसे युक्त अर्थात मुझमें मन वाला बनता है, जो मन्मना भव की पुनरुक्ति दोष होगा । अतः मद्रूप अर्थात परमात्मा के साथ अभिन्न भाव ही युक्तात्मानम् का अर्थ ठीक प्रतीत होता है । सर्वत्र वासुदेव को देखना, उसी में संपूर्ण क्रियाओं का होना, करना और देखना ही उसके परायण अर्थात शरणागत होना है । परमात्मा को प्राप्त होना ही विदेह कैवल्य अर्थात मोक्ष प्राप्त करना है ।
          अथवा अध्याय सात में कहा था मय्यासक्त मनाः ७/१ तो परमेश्वर में मन आसक्त कैसे हो ? इसका उत्तर यहाँ के पूर्वार्ध में एवं ‘योगं युञ्जन्मदाश्रयः’ ७/१ का उत्तर यहां के उत्तरार्ध में दे दिया । सातवें अध्याय के प्रथम श्लोक में की गई प्रतिज्ञा का उत्तर नवें अध्याय के अन्तिम श्लोक में देने का अर्थ यह है कि अब ज्ञान विज्ञान के कथन की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई । 
         मद्भक्तः का अर्थ परमेश्वर के सगुण निराकार स्वरूप की उपसना करना अर्थात परमेश्वर के निराकार स्वरूप को परोक्ष रूप से समझकर सगुण सकार का आश्रय लेकर उसका पूजन करना और नमस्कार करना उसी स्वरूप में निराकार परमेश्वर का सर्वत्र आत्मौपम्येन अनुभव करना यही नमस्कुरु एवं मद्भक्तः है । मन्मना का अर्थ है मन को परमेश्वर से अभिन्न कर देना युक्त्वैवात्मनं इसी अभिन्न किये हुए मन के द्वारा मेरे परायण हुआ मुझ सर्वात्मा को प्राप्त करेगा । 
            यहां श्लोक के पूर्वार्ध में आया हुआ प्रथम माम् आत्मा का वाचक है आगे इसका स्पष्टीकरण करते हुए मैं ही संपूर्ण प्राणियों की आत्मा हूँ १०/२० कहेंगे । तभी दूसरे माम् सर्वात्मा ब्रह्म को आत्म रूप से प्राप्त करेगा । यहाँ मेरे परायण कहने का तात्पर्य है कि तत् पदार्थ के साथ अभिन्न हुआ आत्मा यानी त्वं पदार्थ । इस प्रकार भगवान ज्ञान विज्ञान के रहस्य को समझाकर जीव-ब्रह्मात्मैक्य द्वारा ही जीव का कल्याण सुनिश्चित करते हैं ॥३४॥

                 समीक्षा― पूर्व अध्याय में परमात्मा के समग्र रूप का विवेचन करते हुए उत्तम साधकों के साध्य-साधन, शुक्ल-कृष्ण यानी निवृत्ति और प्रवृत्ति मार्ग का वर्णन करते हुए निवृत्ति मार्ग के साधन कर्मोयोग की स्तुति करते हुए अब यहाँ अध्याय सात के छूटे हुए ज्ञान विज्ञान को आत्यंतिक रहस्यमय और सभी पवित्र करने वाली विद्याओं की राजमहिषी बताते हुए इस ज्ञान विज्ञान के प्रति श्रद्धा न रखने वाले का जन्म मृत्यु रूप संसार में बारंबार आगमन बताते हुए अपने से भिन्न किन्तु जगत से निर्लेप बताते हुए संपूर्ण प्राणियों के सर्गादि के लय और सृजन में प्रणियों के कर्मबीज की परवशता और परिवर्तनशील प्रकृति के द्वारा ही परिवर्तनशील जगत की उत्पत्ति चैतन्य प्रकाश के सान्निध्य मात्र से बताते हुए अपनी निर्विकारता का वर्णन करके पुनः जो मेरे सत्तात्मक और सबके संपूर्ण लोकों के शासक के अवतारों को सामान्य स्त्री-पुरुष के संसर्ग से उत्पन्न हुए मनुष्य की भांति जानते हैं उनको राक्षसी आसुरी प्रकृति से मोहित हुए मूढ, विचारहीन बुद्धिवाला बताकर दैवी संपत्ति का आश्रय लेने वाले के द्वारा आत्मरूप निष्ठा वाले होकर संपूर्ण प्राणियों के आदि मुझ अविनाशी का भजन करते हैं यह बताया ।
               निरंतर स्वरूप कथन, चिंतन, प्रयत्नपूर्वक नमस्कार करते हुए ज्ञानयज्ञ के द्वारा अभिन्नोपसना एवं प्रथक् प्रतीक एवं कर्मोपसना के साथ चार श्लोकों में अपनी विभूति के वर्णन पूर्वक एकत्व प्रतिपादन करते हुए स्वर्गकामी द्वारा वैदिक फल श्रुति द्वारा देवाराधन, उन लोकों की प्राप्ति और पुनः उनके नाश का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार देवाराधन नाशवान कामनाओं की पूर्ति के लिए करते हो उसी प्रकार अन्य का आश्रय छोड़कर अकाम भाव से मेरी निरंतर उपासना करो मैं किसी देवाराधन की आवश्यकता ही नहीं होगी, योगक्षेम का निर्वाह तो मैं स्वयं करूंगा ।
            क्योंकि दूसरे देवता की भी आराधना विधि रहित और भयकारी मेरी ही उपासना है, इससे अच्छा तुम्हारे पास जो कुछ भी पत्र पुष्प उपस्थित हो वही मुझे अपने सहित समर्पित कर दो तो निर्भय पद प्राप्त होगा । मैं परमेश्वर किसी से भी यद्यपि राग द्वेष नहीं करता तो भी मुझ समत्व रूप ब्रह्म की अभिन्नोपसना करने वाला मेरे अन्दर और मैं उसके अन्दर रहता हूँ क्योंकि ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ७/१८ अर्थात ज्ञानी तो मेरा साक्षात्स्वरूप ही है । कितना भी दुराचारी पापी ही क्यों न हो मेरा शरणागत होने के कारण वह साधु ही है, वह शीघ्र ही ज्ञान को प्राप्त करके नित्य शान्ति को प्राप्त कर लेता है क्योंकि मेरा भक्त का पतन तो कभी होता ही नहीं है । अर्जुन के द्वारा छठे अध्याय में योगभ्रष्ट की गति का उत्तर देते हुए कहते कि जब मोह की साक्षात् प्रतिमूर्ति स्त्री, लोभ का साक्षात् प्रतिमूर्ति वैश्य, तमोगुण का साक्षात् प्रतिमूर्ति शूद्र और अन्य भी जो पाप की साक्षात् प्रतिमूर्ति भी मेरी शरणागति से परम कल्याण को प्राप्त कर लेते हैं तो फिर सत्त्वगुण प्रधान त्याग की प्रतिमूर्ति ब्राह्मण और सत्त्वगुण मिश्रित रजोगुण प्रधान जो दूसरों की रक्षा और पालन के लिए अपने प्राण तक दांव पर लगा देने वाले क्षत्रियों को परमगति प्राप्त हो इसमें कहना ही क्या है अर्थात क्या प्रशंसा की जाये क्योंकि यह यदि वे प्राप्त करते हैं तो कोई आश्चर्य ही नहीं है क्योंकि यह उनका स्वभाव ही है । इसलिये इस दुःखदायी अनित्य शरीर को प्राप्त करके नित्य सुख प्राप्ति के साधन द्वारा आत्मस्वरूप परमेश्वर का भजन करना ही चाहिए अतः भजन कर । अन्त में अन्त में मन्मना अर्थात अति उत्तम अधिकारी अभिन्न भाव द्वारा निर्विशेष की, और उत्तम अधिकारी सगुण-निराकार की उपासना करे । मंद जो कर्माधिकारी हैं वे यज्ञादि कर्मों से एवं जो अतिमंद अधिकारी हैं वे सर्वत्र आत्मरूप की भावना करते हुए मुझे नमस्कार करते मुझ सर्वात्मा से अभिन्न आत्मा वाले अर्थात व्यपक अहंता में सीमित अहंता का विलय करके आत्मस्वरूप को ही प्राप्त होते हैं, यह कहते हैं सातवें अध्याय के पहले श्लोक में की गई प्रतिज्ञा को भगवान पूरी कर देते हैं ॥१-३४॥

॥इति तत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक नौवां प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत्!!!
   श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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