ब्राह्मात्मैक्य विचार अध्याय १०

     ॥ॐश्रीपरमात्मने नमः॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथ दशमोऽध्यायः
              संबंध— प्रथम दृष्टिकोण से विचार करने पर परमेश्वर तत्त्व बहुत ही दुर्विज्ञेय है “न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः” १०/२ अर्थात जिसकी उत्पत्ति यानी लीलाओं को देवता यानी ऋषिगण भी नहीं जानते फिर अन्य कोई कैसे जान सकता है ? ऐसे दुर्विज्ञेय तत्त्व को समझाने के लिए ही ज्ञानविज्ञान का वर्णन सप्तम अध्याय से नवम अध्याय तक किया । वह परम तत्त्व निर्गुण निराकर है यह ज्ञान है, किन्तु सगुण साकार सामान्य बालकों की तरह दिखने वाला कौशल्यानन्दन, यशोदानन्दन साढे तीन हाथ के शरीर वाला भी ब्रह्म हो सकता है, यह जान लेना ही विज्ञान है । यह विज्ञान भी उसे ही समझ में आता है जिसे वे स्वयं ज्ञान देते हैं । वे ज्ञान भी उसी को देते हैं जो “मन्मना भव” ९/३४ के अनुसार मन को मेरे रंग में रंग लेता है, जो अनन्यभाव हो जाता है उसी को “ददामि बुद्धियोगं तम्” १०/१० वह दुर्विज्ञेय तत्त्व मंदबुद्धी वालों को कैसे समझ में आयेगा ? 
             अथवा यूं कहें कि परमेश्वर के निर्गुण स्वरूप को तो सभी जानते ही हैं यह ज्ञान सभी को सुलभ है—  ‘निर्गुन रूप सुलभ अति’ किन्तु साढ़े तीन हाथ के शरीर वाला कृष्ण अथवा कोई भी प्राणी परमेश्वर कैसे हो सकता है ? यह तो संभवतः कदाचित कोई विरला ही जानता है ‘सगुन जान नहिं कोइ’ ‘सगुन अगुन नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ’ सगुण को कोई नहीं जानता है इसी बात को बताने के लिए कहा कि— अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ७/२४ अर्थात बुद्धिहीन मैं ही सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परम सत्ता रूप हूं अर्थात सबको सत्ता देने वाला हूं ऐसे मन वाणी से अतीत को भी सामान्य स्त्री-पुरुष के समान उत्पन्न हुआ मानते हैं ।  अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ९/११ अर्थात संपूर्ण प्राणियों की ‘मैं’ के अर्थ आत्मा की परमसत्तात्मक स्वरूप से अनजान केवल कार्य-करण संघात वाला ही जानते हैं । अर्थात आत्मा के स्वरूप से पूर्णतः अपरिचित अज्ञानियों को आगे ‘विचेतशः’ अर्थात विकृत बुद्धि वाले कहते हुए उन्हें व्यर्थ आशा, कर्म, ज्ञान वाले कहते हुए राक्षस एवं असुर तक कह दिया । 
           तात्पर्य यह है कि जो शरीरस्थ ‘मैं’ का अवबोधक आत्मा को जो प्रकृति से अतीत सबकी आत्मा रूप परमसत्ता को नहीं जानता वही राक्षस एवं असुर है । अब प्रश्न यह है कि ‘मैं’ के अर्थ आत्मा को यह कैसे जाना जाये कि वही परमसत्तात्मक है ? तो यही दुर्विज्ञेय विज्ञान समझाने के लिए विभिन्न साधन एवं स्वरूप के सहित अध्याय ७/८-११ एवं अध्याय ९/१६ से १९ तक विभूतियों का भी वर्णन कर चुके हैं, तथापि कृपा परवश हुए मुमुक्षुओं पर अनुग्रह करने के लिए अपनी विशिष्ट विभूतियों के माध्यम से पुनः जड़-चेतन रूप में प्रतिपादित करते हुए सबको अपने से अभिन्न बताते हुए स्वयं को सबसे भिन्न बताने के लिए इस दसवें अध्याय का प्रारंभ करते हैं……
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१०/१॥
          शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― हे महाबाहो ! मेरे श्रेष्ठ वचनों को पुनः सुनो जो मैं तुम्हारे सुख एवं हित के लिए कहता हूँ ।
             तात्पर्यार्थ— आशंका होती है कि पुनः उसी प्रसंग को क्यों कहना चाहते हैं ? इसके लिए कहते हैं कि अर्जुन श्रेय चाहता है “यच्छ्रेय स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे” ३/७ अतः उसके श्रेय रूप हित का ध्यान रखकर जिन वचनों से श्रेष्ठ अन्य वचन हो ही नहीं सकते ऐसे श्रेष्ठ वचन कहते हैं । श्रेष्ठता तो मोक्ष साधक वचनों में ही है अतः मोक्ष साधक होने से परम अर्थात श्रेष्ठ वचन हैं और स्थिर प्रसन्नता भी मोक्ष से ही होती है तभी जो तुम्हारे (अर्जुन) मुख पर छाया विषाद स्थायी रूप से नष्ट होगा । अतः प्रसन्नतापूर्वक मोक्ष के साधन रूप मेरे श्रेष्ठ वचन सुनो ।
         अथवा अर्जुन को अपने अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञ सहित तात्त्विक स्वरूप अध्याय सात से नौ तक समझा चुकने पर भी अर्जुन को सुख पहुंचने वाले एवं तत्त्व का निर्णय करने वाले वचनों को पुनः यहां श्लोक दस तक बताएंगे कि किस प्रकार मैं सबका निमित्तोपादन ७/६ कारण हूँ ? किस प्रकार सभी मुझे में मणियों के धागे में पिरोये के समान मुझसे अभिन्न हैं ? किस प्रकार मैं ही संपूर्ण प्राणियों का बीज आदि हूँ ? मेरे समग्र रूप को जानने का साधन क्या है और किस प्रकार मुझे कोई भी प्राप्त कर सकता है । यह सब अर्जुन को प्रिय लगे अर्थात अर्जुन ने श्रेय का मार्ग अ.२/७, ३/२ एवं ५/२ में पूछा था उसी श्रेय की प्राप्ति का साधन बताने में ही अर्जुन को सुख पहुंचेगा और उस साधन की प्राप्ति से ही उसका कल्याण भी होगा ऐसे परम वचन अर्थात जिन वचनों से बढकर और कोई वचन नहीं हो सकते ऐसे तत्त्व का निर्णय करने वाले वचनों को भगवान अब अर्जुन के बिना पूछे ही कहकर अर्जुन के प्रश्न का उत्तर पूर्ण करते हैं ॥१॥

              संबंध— यह ज्ञान स्वयं क्यों कह रहे हैं ? इसका कारण बताते हैं……
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥१०/२॥
            शब्दार्थ— मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते हैं और न ऋषिगण ही, क्योंकि मैं देवताओं और ऋषियों का भी आदि हूँ । 
          तात्पर्यार्थ— भगवान की नाट्यलीला कब क्या करना है इसे शुद्ध सत्व संपन्न देवता और ब्रह्मज्ञान संपन्न ऋषिगण भी नहीं जानते, फिर साधारण मनुष्य कैसे जान सकता है ? यह सामान्य बात है कि प्रत्येक मनुष्य जितना बाहर भीतर से अपने विषय में जानता है और कोई भी नहीं जान सकता । उसी प्रकार परमात्मा जो है, जैसा है, जिस प्रकार का और जितना है वही जानता है दूसरा नहीं, क्योंकि सबके आदि कारण परमेश्वर हैं, अतः देवत्व और ऋषित्व वही प्रदान करते हैं । जैसे एक शिशु यह नहीं जानता कि उसके पिताश्री कब क्या करने वाले हैं वैसे ही देवता और ऋषि भी परमात्मा के विषय में उनकी नाट्यलीला में यह नहीं जानते कि कब वे मछली, वराह, राम, कृष्ण आदि बनेंगे ?
               प्रभव का अर्थ विद्वत्वृन्द प्रभाव भी करते हैं । प्रभाव अर्थात षडैश्वर्य संपन्न सृष्टि स्थिति प्रलय प्रवेश नियमन एवं अनुग्रह ये सभी उसके ऐश्वर्य हैं । भगवान की पांच शक्तियां निरंतर सक्रिय रहती हैं— १-सृष्टि, २-स्थिति अर्थात पालन, ३- संहार, ४- माया जो मनुष्यों को मोहित करके जन्म मृत्य के चक्र में डालती रहती है, ५- अनुग्रह शक्ति— ब्रह्म अपने मूलस्वरूप में कुछ भी नहीं कर सकता है अतः बद्ध जीवों पर गुरु, शास्त्र आदि के रूप में अनुग्रह करता है । अनुग्रह के अन्तर्गत ही अवतार एवं सन्तावतार, गुरु अवतार होते हैं जिनकी अनुग्रह से ही जागतिक दिशानिर्देश और मोक्ष प्राप्त होता है । अतः इन पांचो रूपों में है वह कार्य करता है । आज रणक्षेत्र में परमात्मा की अनुग्रह शक्ति ही संपूर्ण मानव के उद्धार के लिए ही कार्य कर रही है, जब गीता का उपदेश देने के लिए स्वयं परम प्रभु उद्यत हुए हैं । जिनकी नटलीला देव दानव मानव कोई भी नहीं जानता है वे कृपा परवश उपदेश कर रहे हैं । ऐसा तात्पर्य है ।
          अथवा  इसका समाधान दो प्रकार से देखिए कि जो मेरा आत्मस्वरूप और मुझसे अभिन्न ‘वासुदेवः सर्वम्’ करके जो अद्वितीय रूप से जानता है वही मुझे जानता है किन्तु जो मेरा गुणमयी अवतार आदि के हेतु के स्वरूप होता है उसको माया से मोहित मूढबुद्धि, अल्पबुद्धि और बुद्धिहीन कभी नहीं जानते । ७/२३-२५ किन्तु जो मुझे अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ के सहित इन तीनो स अभिन्न किन्तु इनसे भिन्न जानता है वही मुझे जानता है है अन्य नहीं । यही बात अध्याय नौ में राक्षसी और आसुरी प्रकृति से अचेत हुए मूढबुद्धि द्वारा न जानने की बात ९/११-१२ कही है । अतः यहाँ पर जिन देवताओं और ऋषियों के द्वारा न जानने की बात कही है उसके साथ ही यह भी कह दिया है कि अहमादिः अर्थात मैं ही सबका आदि हूँ । मतलब जो देवता आदि ब्रह्मा पर्यंत रजोगुण प्रधान हैं वे मुझे नहीं जानते, और महर्षि सत्त्वगुण प्रधान होने के कारण मुझे नहीं जानते क्योंकि तीनो गुणों का प्रकाशक मैं ही हूँ और वे अभी तीनो गुणों से ऊपर नहीं उठ सके इसलिये अभी उनमें भेद दृष्टि होने के कारण वे नहीं जानते । इसका मतलब जो तीनो गुणों से ऊपर उठ चुका है जिसे भगवान अपनी आत्मा ७/१८ अर्थात अपना स्वरूप कहते हैं वह स्वरूप होने के कारण स्वसंवेद्य रूप से जानता है यही गीता का निर्णय समझ में आता है । 
             दूसरी बात यह कि देवताओं और महर्षियों का आदि होने का अर्थ है देवत्व और ऋषित्व तो मैं ही प्रदान करता हूँ अतः जैसे बच्चा अपने पिता की उत्पत्ति नहीं जानता है वैसे ही ये भी मेरी उत्पत्ति नहीं जानते हैं ।
           यहाँ जो द्वैतवादी यह कहते हैं कि वेदान्ती कहते हैं कि भगवान को कोई नहीं जानता, वे गीता के इस भगवद्वचन को वेदान्तियों का वाक्य कहकर गीता से बाहर अब तक क्यों नहीं किया ? या आपकी बुद्धि कहीं घास चरने गई है ? विचार करो कि भगवान कहते हैं― जो शरीर को तपाने वाला अर्थात गुरु के पास रहकर गुरु की सेवा न करने वाला हो, मेरा भक्त न हो, जो सुनने की इच्छा न रखता हो, मुझमें एवं मेरी वाणी में दोष देखता हो १८/६७ वह इस गीता ज्ञान का अधिकारी ही नहीं है । तो सोचो कि ये भगवान की वाणी में आपके द्वारा देखा जाने वाला दोष क्या भगवान में दोष देखना नहीं हुआ ? इस दोष के चलते अन्य तीन दोष भी स्वतः आ ही जाते हैं । ऐसे विचार कर दिया अपने क्षुद्र विचारों पर ध्यान दो और फिर बात करो क्योंकि ठीक इसके अगले ही श्लोक में भगवान को कौन जानता है अध्याय सात में निर्णय करके यहां भी निर्णय दिया जा रहा है अपने चर्म चक्षु की जगह विवेक चक्षु से अगले श्लोक का भी विचार कर लो ॥२॥

               संबंध— ज्ञानोपदेश का प्रयोजन बता रहे हैं……
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१०/३॥
              शब्दार्थ— जो मनुष्य मुझे अज अनादि और संपूर्ण लोकों का स्वामी जानता है वह मनुष्यों में ज्ञानी है और संपूर्ण पापों से भलीभाँति मुक्त हो जाता है ।
             तात्पर्यार्थ— परमात्मा अज है अर्थात उसका जन्म ही नहीं होता अर्थात नित्य है । वे सबके आदि कारण अर्थात उत्पन्न करने वाले हैं, किन्तु वे जन्मादि षड्विकारों से रहित और उनका कोई भी उत्पन्न करने वाला न होने से अनादि हैं ।  संपूर्ण स्थूल, सूक्ष्म, कारण लोक, शरीर, जीव, आत्मा, जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति, विश्व, तैजस, प्राज्ञ ये सभी लोक ही हैं, वह इन संपूर्ण लोक का स्वामी है, किन्तु उसका कोई स्वामी नहीं है । असम्मूढ यानी विवेकशील अर्थात जिसने श्रुत्याचार्य प्रसाद से परमतत्त्व को समग्र रूप से जान लिया है, ऐसा आत्मा अनात्मा का विवेक करके परमतत्त्व का निर्धारण अर्थात निश्चयपूर्वक संशय विपर्यय रहित जिसने जान लिया है वह कायिक, वाचिक, मानसिक, संचित एवं क्रियमाण सभी पापों से भलीभाँति मुक्त हो जाता है ।
          अथवा इस श्लोक में जिस प्रकार से भगवान जानने की बात कह रहे हैं उसके अनुसार पूर्व श्लोक में जो विद्वानों ने यह कहा है कि देवता और ऋषि अवतारों के रहस्य को नहीं जानते यह बात आपके अनुसार उचित है तो भी, अवतारों का लक्ष्य पहले से आंशिक रूप से निश्चित होता है अतः ऋषिगण उतना तो जानते ही हैं तभी श्रीराम के वन गमन पर भरतादि को भरद्वाज आदि ऋषियों ने वनगमन का लक्ष्य बताया था, किन्तु यहाँ जिस स्वरूप की बात कही है वह माया से मोहित त्रिगुणात्मक प्राणियों के संबंध में ही कहा है चाहे वे रजोगुणी देवता हों या सत्त्वगुणी ऋषिगण । क्योंकि जो निराकार का आदर करता है साकर की उपेक्षा करता है और जो साकार का आदर करता है और निराकार की उपेक्षा करता है वे ब्रह्म के एक एक भाग को ही जानते हैं पूर्णतः नहीं जानते यही उपरोक्त श्लोक का तात्पर्य प्रतीत होता है किन्तु जो साकार और निराकार में सर्वत्र एक ही परमसत्ता को जानता है वही सर्वत्र आत्मस्वरूप वासुदेवः सर्वम् के रहस्य को जानने वाला विवेकशील जीवनमुक्त साक्षात् मेरा आत्मा यानी मेरा स्वरूप है और स्वरूप स्वयं ही स्वयं को नहीं जानेगा तो और कौन जानेगा ?
            सारांश― जो नित्य, एकरस, षड्विकारों से रहित, सबका आत्मा, प्रकृति के गुण कार्यों पर शासन करने वाला, चिन्मात्र, सत्तामात्र, स्वसंवेद्य आत्मरूप करके जो जानता है वही जानता है अन्य नहीं । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः ४/१८ की ही आवृत्ति यहाँ असम्मूढः से समझना चाहिए ॥३॥

                संबंध— दो श्लोकों द्वारा सर्वलोकमहेश्वर के प्रभाव कथन…… 
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥१०/४॥
          शब्दार्थ— बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य,दम, शम, सुख, दुःख, उत्पत्ति, प्रलय अर्थात विनाश, भय एवं निर्भय भी ।
          तात्पर्यार्थ— जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व का निर्णय अर्थात निश्चय कर सके वह बुद्धि है । आत्मा अनात्मा को नीर-क्षीर की भांति जान लेना ज्ञान है । अनात्म पदार्थों के प्रति आसक्त न होना ही असम्मूढता है । निंदा, एवं शारीरिक पीड़ा दिये जाने पर भी उसके प्रति मन में विकार का उत्पन्न न होना ही क्षमा है, आध्यात्मिक, अधिदैविक एवं आधिभौतिक तापों को निर्विकार रूप से सहन करना भी क्षमा है । मन बुद्धि द्वारा जैसा ठीक ठीक विचार निश्चित किया गया हो, जैसा देखा सुना गया हो और जिसका अनुभव भी किया गया हो, वैसा का वैसा ही दूसरे को आवश्यक होने पर ही बताना सत्य है । बाह्य इन्द्रियों का निग्रह करना दम और आन्तरिक विकारों से उपरति ही शम है । सुख यानी स्वाभाविक प्रसन्नता, दुःख यानी शारीरक मानसिक क्लेश । उत्पत्ति एवं प्रलय एवं भय और निर्भयता भी ॥४॥

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥१०/५॥
           शब्दार्थ— अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश, अपयश, इस प्रकार प्रणियों में अनेक प्रकार के विकार मुझसे ही उत्पन्न होते हैं ।
          तात्पर्यार्थ— प्राणियों को शारीरिक मानसिक वाचिक क्लेश न देना अहिंसा है । संपूर्ण प्राणियों में सब पर ईश्वर की बराबर अनुकंंपा का अनुभव करते हुए सबके साथ अपने शरीर के विभिन्न अंगों की भांति समान व्यवहार करना समता है । बाह्य पदार्थों की आवश्यकता पूर्ति कभी होती नहीं अतः जो प्रभु कृपा से प्राप्त है उसी में संतोष करना ही संतुष्टि है “यदृच्छालाभसंतुष्टः” ४/२२अथवा स्वयं को स्वयं को स्वयं में समेटकर स्वयं से स्वयं में संतुष्ट रहना “आत्मन्येवात्मना तुष्टः” २/५४ तुष्टि अर्थात संतोष है । साधन चतुष्ट संपन्न होकर कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत करके शरीर को नियंत्रित करना तप है । सामर्थ्य के अनुसार असमर्थों की शारीरिक मानसिक आर्थिक सहयोग करना अथवा “अभयं सर्वभूतेभ्यः ददाम्येतत् व्रतं मम” अर्थात संपूर्ण प्राणियों को अभयदान देना ही दान है । पुण्य अर्थात विहित कर्मों के कारण गायी जाने वाली निर्मल गाथा ही यश है और शास्त्र निषिद्ध कर्मों के फल स्वरूप होने वाली निंदा ही अपयश है ।
           भावार्थ— इस प्रकार उपरोक्त दो श्लोकों द्वारा प्राणियों में उत्पन्न होने वाले भिन्न भिन्न भाव मुझ ईश्वर से ही उत्पन्न होते हैं ।  यहाँ पर मात्र बीस भाव दिये गये हैं तथापि जैसे अहिंसा के सापेक्ष हिंसा, ज्ञान के सापेक्ष अज्ञान आदि भाव यहाँ जो नहीं दिये गये है उन सबको स्वयं समझ लेना चाहिए । इन्हीं भाव विकारों से युक्त संपूर्ण सृष्टि कही गई है । तथापि बुद्धि, ज्ञान आदि लक्षण मुमुक्षु के हृदय में और दुर्बुद्धि, अविवेक आदि विषयी लोगों के हृदय में उत्पन्न होते हैं । यही भगवान का विशाल प्रभाव है । ऐसा तात्पर्य समझना चाहिए ।
            भावार्थ— ये सभी अलग अलग प्रकृति के प्राणियों उत्पन्न होने वाले बीस भाव परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं अर्थात परमेश्वर की ही विभूतियां हैं । इनमें जो परमार्थ पथ के साधन रूप में हैं उनका तो आचरण करना, भय और निर्भय, जीवन और मृत्यु , सुख और दुःख आदि विपरीत स्थिति को परमात्मा की विभूतियों का अनुग्रह समझकर उनसे उद्विन न होना यही भाव इन विभूतियों से मुमुक्षु के लिए निर्दिष्ट हैं ॥५॥

             संबंध— ऐश्वर्य अर्थात प्रभाव यानी सामर्थ्य बताकर अब विभूतियों का कथन……
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥१०/६॥
          शब्दार्थ— पूर्वकाल में अत्रि आदि सप्त ऋषि, सनकादि चारों ऋषि, चौदह मनु मेरे भाव से भावित अर्थात मेरी ईश्वरीय सामर्थ्य से युक्त मेरे मन से उत्पन्न हुए जिनकी इन संपूर्ण लोकों में प्रजा है ।
           तात्पर्यार्थ—  यहाँ मूल में “पूर्वे” का अध्याहार सप्त ऋषयः, चत्वारः के साथ ही होगा,  मनवः के साथ नहीं तभी हम चौदह मनुओं का जो सात हो चुके हैं, और जो सात होने वाले हैं का समन्य निर्दोष रूप से कर सकेंगे । तथापि पहले हम विभिन्न मतों का सिंहावलोकन करते हैं…
            हमारे यहाँ पांच कल्प हैं माने गये हैं… 
            १-महत् कल्प २- हिरण्यगर्भ कल्प, ३-ब्रह्म कल्प, ४-पद्म कल्प । ५-वाराह कल्प,
            १- महत्कल्प— महत् का अर्थ होता है अंधकार । इस कल्प के इतिहास का विवरण नहीं मिलता । इसके बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया । लेकिन माना जाता है कि इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् वाले प्राणी और मनुष्य होते थे । 
            २- हिरण्यगर्भ कल्प : इस काल में धरती पीली थी इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे।
             ३- ब्रह्मकल्प— इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्‍वर) की उपासक थी। प्राणियों में विचित्रताएं और सुंदरताएं थी। इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र स्थल की ब्राह्मी प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की उपासक थी । ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसके ऐतिहासिक विवरण संकलित किए हैं। 
           ४-पद्मकल्प— इस कल्प का विवरण पद्म पुराण में मिलता है। इस कल्प में १६ समुद्र थे । यह कल्प नागवंशियों का था । इस काल में उनकी अधिकता थी । कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था । सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी।
            ५- (श्वेत) वाराह कल्प— वर्तमान में यह कल्प चल रहा है । वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है । इस कल्प में वराह अवतार का वर्णन है । इसी कल्प में विष्णु के १२ अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है  । इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी ।
             चौदह मनु एवं मन्वतर माने गए हैं और उन्हीं मनुओं के नाम से ही मन्वतर कहे गये हैं—
            १- स्वायंभुव— मरीचि, वशिष्ठ, अंगिरा (आंगिरस), अत्रि, पुलस्त्य, क्रतु, पुलह । ये सात ऋषि ।
            २- स्वरोचिष— प्राण, बृहस्पति, दत्तात्रेय, अत्रि, च्यवन, वायुप्रोक्त, तथा महाव्रत । ये सात ऋषि ।
            ३-उत्तम या औत्तमी— ऊर्ज, तनूर्ज मधु, माधव, शुचि, शक्र, सह, नभस्य तथा नभ । ये सात ऋषि ।
            ४- तामस या तापस— कव्य, पृथु, अग्नि, जह्नु, धाता, कप्वा, अकपीवान । ये सात ऋषि ।
        ५- रैवत— देवबाहु, यदुघ्र, वेदशिरा, हिरण्यरोमा, पर्जन्य, सोमनन्दन, ऊर्ध्वबाहु तथा अत्रिकुमार सत्यनेत्र । ये सात ऋषि ।
            ६- चाक्षुष या चाक्षुक—  मृग, नभ, विवस्वान, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु । ये सात ऋषि ।
          ७-वैवस्वत— इन मनु या इस मन्वन्तर का नाम महाभारत में श्राद्धदेव नाम से भी वर्णित है ऐसा विद्वानों का कथन है ।  इस मन्वतर के सात ऋषि— अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र एवं जमदग्नि ।
          इनमें स्वायंभू, स्वारोचिष एवं वैवस्वत के सप्तर्षियों में अत्रि संयुक्त हैं अब यह कहना कठिन है कि तीनो अत्रि एक ही हैं या भिन्न, बाकी सबमें अलग अलग हैं ।
          तामस, चाक्षुष एवं वैवस्वत के सबके दस दस पुत्र हैं शेष में भिन्न भिन्न संख्या है । सप्त ऋषियों की गणना में जहाँ “तथा” लिखा है वहां संभवतः नामों में मतभेद हो या एक ही ऋषि के नाम हो सकते हैं, ऐसा समन्वय कर लेना चाहिए । 
             उपरोक्त सात मनु एवं मन्वन्तर के पश्चात अभी जो नहीं आये हैं उनके नाम....
              ८- सावर्णि, ९- दक्षसावर्णि, १०-ब्रह्मसावर्णि, ११- धर्मसावर्णि, १२- रुद्रसावर्णि, १३- देवसावर्णि, १४- इन्द्रसाावर्णि या भौत । 
                इन सभी मन्वन्तरों के सप्तर्षि, प्रधान देवता, सभी भिन्न भिन्न कहे गये हैं । अब आते हैं गीता के लक्ष्य पर....
             पूर्वे सप्त ऋषयः — ध्यान रखना होगा कि इस समय (श्वेत) वाराह कल्प और वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है । अतः हमें प्रत्येक गणना वर्तमान कल्प एवं मन्वन्तर में करना होगा । इसी आधार पर सप्त ऋषियों का चयन उपरोक्त वैवस्वत मन्वतर से कर लेना चाहिए । तथा “चत्वारो मनवः” यहाँ पर आचार्य शंकर, शंकरान्द एवं रामानुजाचार्य जी ने सावर्णि आदि चार मनु माने हैं । आप सभी सूर्य हैं । आपके दृष्टिकोण को सभझने के लिए हमारा अधिकार कम पड़ रहा है, अतः स्वाभाविक संशय होता है कि सावर्णि नाम से सात मन्वन्तर कहे गये हैं, हम उनमें किन चार का चयन करें ? अथवा सावर्णि नाम से अभी कोई मन्वतर आया ही नहीं है, अभी तो सातवां वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है । अतः जो अभी आया ही नहीं उसके साथ पूर्व में बीते किन किन तीन मन्वारों से जोड़ कर चार की गणना पूरी कर दूँ ? अतः आप सभी को नमस्कार पूर्वक दूसरे पक्ष पर विचार करने की अनुमति प्रदान करने कृपा करें ।
               दूसरे पक्ष में यद्यपि “सप्त ऋषयः” निर्विवाद हैं तथापि हम पूर्वे यहाँ पर न रखें तो मात्र “चत्वारः” के साथ पूर्वे जोड़ देने पर अर्थ में इतना  अन्तर होगा कि सप्त ऋषि और उनसे भी पहले सनकादि चारों ऋषि होगा और मनवः से चौदह मनु स्वतंत्र हो जायेंगे । 
                महर्षयः सप्त पूर्वे एक सर्वेक्षण—
               सप्त ऋषियों के कल्प भेद पर गीता का प्रसंग और समाधान गीता से….
              पहले अध्याय ४/१ से विचार करते हैं…
इमं विवश्वते योगं प्रोक्तवाहनमव्ययम् । 
विश्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽवेब्रवीत् ॥४/१॥
               इस प्रमाण के अनुसार सूर्य वंश की निम्न दो सूची में प्रथम सूची के अनुसार वैवस्वतमनु के आठवीं पीढ़ी में इक्ष्वाकु का जन्म होता है । अतः प्रथम सूची के इक्ष्वाकु को नजरंदाज किया जाता है । दूसरी सूची के अनुसार वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में इक्ष्वाकु आते हैं । अतः इस श्लोक के प्रमाणानुसार मान्य है, और इससे यह भी सिद्ध होता कि गीता का उपदेश इसी मन्वन्तर का है जो समयानुसार लुप्तप्राय हो गया था और वही उपदेश अब दिया जा रहा है ।    
             रामायण और महाभारत में इन दोनों वंशों के अनेक प्रसिद्ध शासकों का उल्लेख है।
              ब्रह्मा जी के १० मानस पुत्रों मे से एक मरीचि हैं । जिनका राजा इक्ष्वाकु तक का अवलोकन…
           १- ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि, २- मरीचि के पुत्र कश्यप, ३- कश्यप के पुत्र विवस्वान या सूर्य, ४- विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु - जिनसे सूर्यवंश का आरम्भ हुआ, ५- वैवस्वत के पुत्र नभग, ६- नाभाग, ७-अम्बरीष- संपूर्ण पृथवी के चक्रवर्ती सम्राट हुये, ८- विरुप, ९- पृषदश्व, १०- रथीतर, ११- इक्ष्वाकु - ये परम प्रतापी राजा थे, इनसे इस वंश का एक नाम इक्ष्वाकु वंश हुआ।
              २-सूर्य के पुत्र वैवश्वत यानी श्राद्धेव मनु हुए । इनके दश पुत्र हुए―
           इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। इनमें विशेषतः इक्ष्वाकु वंश का ही विस्तार हुआ ।
             अब आता है “पूर्वे सप्त ऋषयः” सप्त ऋषियों के दो समूह ही प्रसिद्ध हैं, जिनका वर्णन महाभारत में मिलता है―
             स्वायंभू कल्प के ऋषि— अत्रि, वशिष्ठ, मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं ।
           श्वेतवाराह कल्प के सप्त ऋषि— कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं ।
             पुराणों के भतभेदों में कश्यप और मरीचि एक ही ऋषि के नाम हैं ।
        श्वेतवाराहकल्प का वर्णन विष्णु पुराण मे संभवतः द्वतीय अंश के प्रथम अध्याय में वर्णित है । (संभवतः इसलिये कि हमने प्रमाण अन्य के प्रमाण से लिया है, इस समय पुस्तक उपलब्ध नहीं है ।)
         प्रस्तुत श्लोक के अनुसार स्वायंभुव मनु एवं कल्प नहीं लिया जा सकता क्योंकि उनके पुत्रों के नाम प्रियव्रत और उत्तानपाद था । अतः प्रथम कल्प में गीता का उपदेश प्रस्तुत प्रमाण से सिद्ध ही नहीं होता ।
           अब जिज्ञासा होती है कि जब इसी कल्प में गीता उपदिष्ट है तो प्रथम कल्प के सप्त ऋषियों की गणना इस कल्प में क्यों ? उत्तर मिलता है― भगवान कहते हैं “मनसा जाता” तो इसका उत्तर मिलता है कि मानसी पुत्रों में इस कल्प के ऋषियों में अत्रि और वशिष्ठ के अतिरिक्त अन्य पांच ऋषि न तो भगवान के मानस पुत्र हैं और न ही ब्रह्मा जी के । इस पर हम कहना चाहेंगे कि आपकी बात तो सही है किन्तु ब्रह्मा जी के अतिरिक्त भगवान की किसी भी ऋषि मानस सन्तान का किसी भी शास्त्र में अब तक का कोई प्रमाण नहीं मिला और सभी ब्रह्मा जी की मानस संतान सप्त ऋषि बन नहीं गये क्यों ?
        इसका समाधान यह होगा— “अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः” १०/३  यहाँ पर भगवान कहते हैं कि मैं ही देवताओं और ऋषियों का आदि हूँ । इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि देवताओं का देवत्व और ऋषियों को ऋषित्व मैं ही प्रदान करने वाला हूँ, क्योंकि “एतां विभूतिं योगं” अर्थात यह मेरा स्वातंत्र्य है और यही मेरी परा शक्ति है । विभूति का अर्थ स्वातंत्र्य और योग का अर्थ उससे अभिन्न शक्ति और यही ऐश्वर्य है, स्वातंत्र्य ही जिसका ऐश्वर्य है और माया का का आश्रय लेकर उसमें संन्निहित अर्थात छिप गया है इसको कोई तत्त्ववेत्ता ही जानता है “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः” ७/३, “यो वेत्ति तत्वतः” १०/७ ।।
              इस सिद्वांत के अनुसार कि भगवान ही देवत्व और ऋषित्व प्रदान करने वाले हैं । और यहाँ “मानसा जाता” का अर्थ है कि जिसे वे जिस पद को देना चाहते हैं मानसिक वह भाव आते ही वह उस भाव को प्राप्त हो जाता है । यही उत्पन्न होना है, जैसे ब्रह्म नित्य प्राप्त है तथापि प्राप्त हुआ कहा जाता है, वैसे ही मन में आया और वह पद प्राप्त हो गया जिसे उत्पन्न हुआ कहा जाता है । यह उसका ऐश्वर्य और सामर्थ्य है यही उसका स्वातंत्र्य है कि करता कुछ है और उत्पत्ति, सृष्टि और प्रलय फिर बिना उसकी सत्ता के हो नहीं रहा है । ये सभी उस ब्रह्म की विभूतियां अर्थात उसी के ऐश्वर्य से संपन्न हैं क्योकि “मद्भावा” अर्थात वे मुझसे अभिन्न हैं । जो मेरा सामर्थ्य है वही उनका सामर्थ्य है तभी विश्वामित्र जहाँ दूसरी सृष्टि का सामर्थ्य रखते हैं तो वहीं उन पर भी नियंत्रण वशिष्ठ जी कर सकते हैं, तो अत्रि के सामर्थ्य में त्रिदेवों को उनका पुत्र बनता पड़ता इत्यादि परस्पर ऐश्वर्य संपन्न हैं अतः “मद्भावा का अर्थ साक्षात् परमेश्वर के स्वरूप से अभिन्न” । 
           इस प्रकार सूक्ष्मता से अवलोकन करने पर सप्त ऋषि जो इसी मन्वन्तर के हैं वही मेरी दृष्टि से और गीता का सिंहावलोकन करने से सिद्ध होते हैं न कि प्रथम मन्वन्तर के । वस्तुतः कुछ शास्त्रीय विद्वानों के अनुसार यह सातवां मन्वन्तर चल रहा है । कुछ लोग मानते हैं कि वैवस्वत मन्वन्तर समाप्त होकर वैवस्वत और सावर्णि इन दो मन्वन्तरों का सन्धि काल चल रहा है,  तथापि जो भी हो हमारा लक्ष्य सप्त ऋषियों का निर्णय गीता के अनुसार करना है और अपने निर्णय पर दृढ हूँ ।
            शंका बनती है कि पूर्वे का अन्यव हम सात, चार एवं चौदह के साथ करें तो अभी तो सात ही मनु हुए हैं और आगे सात होने हैं इस आधार पर विरोध दिख रहा है । 
            सामाधान— नहीं, विरोध नहीं है क्योंकि पूर्वे शब्द सप्त ऋषयः और चत्वारः के बीच में आया है अतः पूर्व काल में सप्त ऋषि और सनकादि चार कर लेना चाहिए अथवा सप्त ऋषि और उनसे भी पूर्व सनकादि चार कर लेना चाहिए, फिर मनवः शब्द स्वतंत्र होगा संपूर्ण बीते हुए वर्तमान और भविष्य के सभी चौदह मनु पूर्णतः निर्विवाद हो जायेंगे ।
          अब अन्तिम शंका यह भी बनती है कि “कल्पादौ विसृजाम्यहम्” ९/७ अर्थात भगवान कहते हैं कि कल्प के आदि में मैं सृष्टि करता हूँ । तो जब कल्प के आदि में भगवान सृष्टि करते हैं तो उस समय भी तो उपदेश करते होंगे ? तो इसका उत्तर है कि अवश्य उपदेश करते होंगें नहीं, बल्कि उपदेश करते हैं और वह उपदेश ब्रह्मा को होता है । तथापि मान भी लें कि किसी मनु को उपदेश करते होंगे या करते हैं तो भी यहां वैवस्वत मनु का ही वर्णन है अन्य का नहीं । हम विचार श्वेतवाराहकल्प के वैवश्वत मनु और मन्वतर की कर रहे हैं अन्य का नहीं । साथ यह भी देखो कि यहाँ “कल्पादौ विसृजाम्यहम्” ९/७ कहते हैं तो “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्” ८/१० कहते हैं । इसी प्रकार “मनसा जाता” १०/६ कहते हैं लेकिन सारी सृष्टि ब्रह्मा जी करते हैं । अतः यह सिद्ध हुआ कि “मनसा जाता” का अर्थ मन से उत्पन्न होना नहीं वरन् भगनवान के मानसी संकल्प से सप्त ऋषियों के समूह का निर्माण है अर्थात सप्तर्षि पद प्रदान करना है न कि उन्हें उत्पन्न करना । बाकी चत्वारः से सनकादिक चारों भ्राता और मनवः से जो मनु हो चुके हैं और जो होंगे वे सभी चौदह मनु । यही एक कल्प की अगल अलग कल्प के अलग अलग सात, चार और चौदह का रहस्य है… महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मनसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥

           अब विचार करते हैं “चत्वारः” पर । गौड़ीय संप्रादय, स्वामी रामसुखदास, अभिनवगुप्त, आनन्दगिरि, अखंडानंद और द्वतीय विकल्प मधुसूदन सरस्वती जी ने भी “चत्वारः” का अर्थ सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार इन चार ऋषियों को ही माना है और इन्हीं आचार्यों ने “मनवः” का अर्थ किसी ने स्वायंभू आदि मनु कहा है तो किसी ने स्पष्ट चौदह मनु कहा है । मैं भी दूसरे पक्ष पर ही अडिग हूँ । 
          शंका— “येषां लोक इमाः प्रजाः” के द्वारा भगवान के सप्त ऋषियों और मनुओं को संतानोत्पत्ति वृद्घि वैवाहिक दृष्टिकोण कोण से कहा है, क्योंकि इनसे ही मैथुनी सृष्टि हुई है किन्तु सनकादिक तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं फिर इनकी संतान के साथ संगति कैसे बैठेगी ?
           समाधान— इसका समाधान बहुत ही साधारण है । जब परमात्मा ने सृष्टि उत्पन्न की तो पहले कर्म में प्रवृत्त हुआ अतः प्रवृत्तिमार्ग की रचना हुई फिर पुनः लोक में नित्य जन्म मरणादि क्लेश देखकर उससे जीवों के उद्धार के लिए निवृत्तिमार्ग की रचना की । निवृत्तिमार्ग के प्रथम आचार्य सनकादिक चारों भ्राता ही हैं ।
            हमारे यहाँ दो प्रकार की संतति कही गई है एक नादज और दूसरी बिन्दुज । जहाँ सप्त ऋषियों और मनुओं ने बिन्दुज सृष्टि से संपूर्ण जगत व्याप्त कर दिया वहीं सनकादिकों ने निवृत्तिमार्ग में नादज अर्थात ब्राह्मी उपदेश देकर, मंत्रादि के उद्घोष से जीवों के उद्धार के निमित्त निवृत्तिमार्गी तत्त्वदर्शियों द्वारा संपूर्ण जगत को व्याप्त कर दिया है । अतः “चत्वारः” का अर्थ सनकादिक चारों भ्राता ही युक्तिसंगत है । इस प्रकार प्रत्येक कल्प में सात, चार और चौदह की उत्पत्ति होकर इनकी संतति से संपूर्ण लोक परिपूर्ण हो जाते हैं । ये सभी मेरे मानसी संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से साक्षात् मेरा ही स्वरूप हैं । ऐसा “भद्भावा मनसा” जाता से तात्पर्य है ।
             भावार्थ— यद्यपि भगवान अगले श्लोक में सात, चार और चौदह को अपनी विभूति बताएंगे तथापि इसका अन्तर्भाव यह समझना चाहिए कि पहले जो कहा था कि “अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः” १०/२ मैं ही सबका आदि हूँ । सबका आदि कैसे हूँ ? इस श्लोक में सात, चार और चौदह और उनकी संतति द्वारा संपूर्ण जगत का मूल कारण स्वयं को बताकर अपनी व्यापकता और अभिन्नता का प्रतिपान दर्शाते हुए यह बताया है कि मुझसे भिन्न कुछ है ही नहीं ॥६॥
            टिप्पणी— अखंडानंद जी ने सप्त ऋषयः का अध्यात्मिक रूप शरीर के ऊपरी भाग के सात छिद्र दो नासा छिद्र, दो कर्ण, दो नेत्र, एक मुख माना है, इसी प्रकार “चत्वारः” से सनकादि चारों को माना है जिसका आध्यात्मिक भाव अन्तःकरण चतुष्टय है । “मनवः” से चौदह मनु माने है जिसका आध्यात्मिक भाव है मन सहित चौदह, अर्थात पंचकर्मेन्द्रियां+पंचज्ञानेन्द्रियां+अन्तःकरण चतुष्ट यानी मन बुद्धि चित्त एवं अहंकार इस प्रकार से चौदह माने हैं । यहाँ यह बात समझ में नहीं आयी कि अन्तःकरण चतुष्टय चत्वारः के अन्तर्गत हो जाने पर भी इन्द्रियों के साथ पुनः क्यों लिया ? तथापि इसका परिहार यह हो सकता निवृत्ति अर्थात वैराग्य को प्राप्त हुआ अन्तःकरण चतुष्टय को चत्वारः अर्थात चारों ऋषियों के अन्तर्गत रखा और जो सांसारिक वासनामय अन्तःकरण चतुष्टय है उसे इन्द्रियों के साथ रखा गया है ।
              दृष्टिकोण २— सप्तर्षि एक पद है, सनकादिक चारों भाइयों को जो जगद्गुरु का पद प्राप्त हुआ है, प्रत्येक कल्प में प्रजा की वृद्धि और संरक्षण एवं शासन करने वाले प्रत्येक मन्वन्तर के प्रथम शासक के मनु नाम का पद मेरे ही संकल्प से उत्पन्न होता है । जो साक्षात् मेरे ही स्वरूप हैं ।
             यहाँ पर हम बता देना चाहते हैं कि जिन भी आचार्यों ने पूर्वे को सप्तर्षियों के साथ संलग्न करके चत्वारो को मनवः के साथ संलग्न करके सावर्णि आदि चार मनु की कल्पना की है । यह बात भले ही उचित हो तथापि मेरे गले के नीचे नहीं उतरती है कारण की चौदह में से सातवां वैवश्वत मन्वन्तर अभी चल रहा है और इसकी समाप्ति के बाद ही सावर्णि नाम से कहे जाने वाले अन्य सात मन्वन्तर प्रारंभ होंगे । किसी चर्चा के समय किसी विद्वान महात्मा ने आचार्य शंकर के सावर्णि आदि का पक्ष मजबूत करते हुए कहा कि वैवश्वत मन्वन्तर समाप्त हो गया है । तो हमने प्रश्न किया कि अगर वैवश्वत मन्वन्तर समाप्त हो गया है तो ‘श्वेतवाराहकल्पे वैवश्वत मन्वन्तरे’ संकल्प वैदिक कार्यों में क्यों पढ़ा जाता है ? ‘सावर्णि मन्वन्तरे’ क्यों नहीं ? इस पर उन्होंने कहा कि इस लिए पढा जाता है कि वैवश्वत मन्वन्तर समाप्त हो गया है और सावर्णि के प्रारंभ के पहले का संधि काल चल रहा है । हमने पुनः प्रश्न किया कि मन्वन्तर में कितने युग होते हैं क्योंकि वर्तमान संकल्प में पढे जाने वाले मन्वन्तर में अठ्ठाइसवीं चतुर्युगी चल रही है । इस पर वे महाराज भड़क गये बोले तुम आचार्य का विरोध करते हो अपनी जबरन बात मनवाते हो । यह सुनकर मैं मौन हो गया । जितने भी विवेकशील हैं वे थोड़ा विचार करें और जिन्होंने योगवाशिष्ठ पढ़ी है तो वे यह भी जानते हैं कि वशिष्ठ जी श्रीराम जी से कहते हैं कि हे राम ! तुम ब्रह्मकल्प के बहत्तरवें त्रेतायुग में उत्पन्न हुए हो । वशिष्ठ जी की इस बात के अनुसार कोई बता सकता है कि जब हम स्पष्ट श्वेतवाराहकल्प का अठ्ठाइसवां कलियुग पढते हैं अर्थात अठ्ठाइसवीं चतुर्युगी इस कल्प की चल रही है तो कल्प का निर्णय कौन करेगा कि प्रत्येक कल्प में कितने युग होते हैं और इस समय सावर्णि मन्वन्तर का पक्ष क्यों ? यदि कोई यह कहे कि कल्पभेद से ऐसा भी हो सकता है, तो मेरा प्रश्न होगा कि आचार्य शंकर ने जिस गीता की व्याख्या की वह किस कल्प के किस मन्वन्तर की होगी और ये आचार्य जी भी किस कल्प के किस मन्वन्तर में अवतरित हुए थे ? क्या इसका उत्तर भी किसी के पास है ?
            हमने ये विचार विवेकशीलों के निमित्त रखा है । मैं इस विषय में अनभिज्ञ हूँ, अतः निर्णय आप लोग ही कर लें मैं यहाँ गीता अध्याय ८/१७ के आधार पर कल्प और मन्वन्तर का विवेचन कर रहा हूँ । ब्रह्मा जी का एक दिन एक हजार चतुर्युगी का होता और इतने ही युग की रात्रि होती है । यही एक हजार चतुर्युगी कल्प कहलाता है । इस एक दिन में चौदह इन्द्र और चौदह मनु एवं मन्वन्तर कहे गये हैं यह शास्त्र विधान करता है । अतः हम ब्रह्मा जी के एक दिन अर्थात एक कल्प की हजार चतुयुगी को चौदह से विभाजित करते हैं तो― १०००÷१४=७१.४२८५७१४ अर्थात ७१.४२८५७१४ चतुर्युगी होती हैं । जैसा कि योगवासिष्ठ का उदाहरण बहत्तरवीं चतुर्युगी का दिया । इस आधार पर वैवश्वत मन्वन्तर आधा भी नहीं गया है । सब ओर से विचार करके देखने पर चतुर्दिक् मात्र धर्म और धर्माचार्यों की श्रद्धा के नाम पर मुंह बंद करने की अवैदिकता, हठधर्मिता लोगों में अत्यंत व्याप्त है । वे यह भूल जाते हैं कि आचार्यों ने भाष्य टीकाएं जिन पर की हैं वे उनके उन पर अपने अनुभव हैं मुख्य शास्त्र नहीं । शास्त्र के अनन्त भाव हैं और उन भावों, विचारों पर नियंत्रण करना विचारहीनता है । यही विचारहीनता का बंधन आज हमारे समाज को ऐसी एक गहरी खाई में गिरा चुका है जिसका बचना तो अब परमेश्वर की कृपा पर ही निर्भर करता है । रूढिवादी विचार इसी को कहते हैं कि नये विचारों को ऊपर उठने न देना और पुराने जो देश काल का अनुगमन नहीं करते ऐसे विचारों को थोपना और उनके विचारों के नाम से समाज को गुमराह करना । आज के मानव समाज को ऐसे रूढिवादी विचारों से ऊपर उठना ही होगा यदि वह अपना कल्याण चाहता है तो । 
             यह प्रमाण तो हमने भगवती गीता के आधार पर दिया जो स्वयं गीता की काल गणना का विरोधी है । अब हम नेट से लिए गये कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं जो समय का निर्णय करेंगे । वह भी इसलिये कि आचार्य शंकर कभी श्रुति और शास्त्र के विरुद्ध नहीं बोल सकते, जबकि यह अंश शास्त्र की काल गणना के अनुसार सनातन संकृति के विरोधियों द्वारा प्रक्षेपित करके आचार्य को शास्त्र विरोधी बताकर समाज में भ्रम फैलाकर हमारी सनातन संस्कृति को विकृत करने का असफल प्रयत्न किया गया है ।
                                           
            सृष्टि की कुल आयु : ४२९४०८०००० वर्ष इसे कुल १४ मन्वन्तरों मे बाँटा गया है ।
      वर्तमान मे ७वें मन्वन्तर अर्थात् वैवस्वत मनु चल रहा है. इस से पूर्व ६ मन्वन्तर जैसे स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत, चाक्षुष बीत चुके है और आगे सावर्णि आदि ७ मन्वन्तर भोगेंगे ।
          १ मन्वन्तर = ७१ चतुर्युगी १ चतुर्युगी = चार युग (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग)
           चारों युगों की आयु :— सतयुग = १७२८००० वर्ष त्रेतायुग = १२९६००० वर्ष द्वापरयुग = ८६४००० वर्ष और कलियुग = ४३२००० वर्ष इस प्रकार १ चतुर्युगी की कुल आयु = १७२८०००+१२९६०००+८६४०००+४३२००० = ४३२०००० वर्ष अत :
             १ मन्वन्तर = ७१ × ४३२००००(एक चतुर्युगी) = ३०६७२०००० वर्ष चूंकि एेसे - एेसे ६ मन्वन्तर बीत चुके है, इसलिए ६ मन्वन्तर की कुल आयु = ६ × ३०६७२०००० = १८४०३२०००० वर्ष वर्तमान मे ७ वें मन्वन्तर के भोग मे यह २८वीं चतुर्युगी है । इस २८वीं चतुर्युगी मे ३ युग अर्थात् सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग बीत चुके है और कलियुग का ५११५ वां वर्ष चल रहा है । २७ चतुर्युगी की कुल आयु = २७ × ४३२००००(एक चतुर्युगी) = ११६६४०००० वर्ष और २८वें चतुर्युगी के सतयुग, द्वापर, त्रेतायुग और कलियुग की ५११५5 वर्ष की कुल आयु = १७२८०००+१२९६०००+८६४०००+५११५ = ३८९३११५ वर्ष इस प्रकार वर्तमान मे २८ वें चतुर्युगी के कलियुग की ५११५ वें वर्ष तक की कुल आयु = २७वे चतुर्युगी की कुल आयु + ३८९३११५ = ११६६००००+३८९३११५ = १२०५३३११५ वर्ष इस प्रकार कुल वर्ष जो बीत चुके है = ६ मन्वन्तर की कुल आयु +७ वें मन्वन्तर के २८वीं चतुर्युगी के कलियुग की ५११५ वें वर्ष तक की कुल आयु = १८४०३२००००+१२०५३३११५ = १९६०८५३११५ वर्ष । अत: वर्तमान मे १९६०८५३११५वां वर्ष चल रहा है और बचे हुए २३३३२२६८८५ वर्ष भोगने है जो इस प्रकार है ... सृष्टि की बची हुई आयु = सृष्टि की कुल आयु - १९६०८५३११५ = २३३३२२६८८५ वर्ष । यह गणना महर्षिदयानन्द रचित ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका के आधार पर है ।
             इस आधार मैं इस बात पर अडिग हूँ कि यह आचार्य का यह भाष्यांश प्रक्षिप्त है । ये शास्त्रीय विचार हैं इन पर जितना मंथन किया जाये कम है । अतः इन विचारों को यहीं विश्राम देते हुए आगे अपने लक्ष्य की ओर बढते हैं । 
              सारांश— सप्तर्षियों से प्रवृत्तिमार्गी मैथुनी सृष्टि, सनकादिकों से निवृत्ति मार्गी और मनुओं से अनुशासनात्मक सृष्टि से जो त्रिलोकी व्याप्त है वह सब मेरे साक्षात् स्वरूप सात, चार, चौदह की संताति होने के कारण सब के मूल में मैं परमात्मा ही हूँ अतः संपूर्ण सृष्टि इस प्रकार से मेरा ही मुझ परमेश्वर से अभिन्न स्वरूप है यह इसका भाव है । अस्तु ॥६॥
             सूचना :— इस श्लोक में अष्ट टीका सहित अन्य विभिन्न विद्वानों आचार्यों के मतों का सर्वेक्षण किया । सभी आचार्य परस्पर बंटे हुए हैं । एक मात्र “सप्त ऋषयः पर लगभग सभी विद्वान एक मत हैं, तथापि सप्त ऋषियों की गणना वर्तमान मन्वन्तर की न करके स्वायंभुव कल्प की की गई है । मात्र एक आचार्य ने वर्तमान कल्प के सप्त ऋषियों को माना है किन्तु गणना करते हुए स्वायंभुव मन्वतर की गणना करा दिया है, अतः सभी पाठक वृन्द अपने अपने विवेक से निर्णय लें । ओ३म् !

           संबंध— बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः १०/४ से लेकर इमाः प्रजाः १०/६ तक अपने प्रभाव का वर्णन करके अब तत्त्व से जानने का फल बता रहे हैं……
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥१०/७॥
           शब्दार्थ— इस प्रकार उपरोक्त कहे गये विभूति योग को जो तत्त्व से जान लेता है वह अविचल योग से युक्त हो जाता है इसमें संशय नहीं है ।
          तात्पर्यार्थ— विभूति का ऐश्वर्य करने पर योग का अर्थ शक्ति होगा ऐश्वर्य यानी स्वातंत्र्य शक्ति और योग यानी माया शक्ति को जो तत्त्व से जानता है अर्थात स्वातंत्र्य और माया शक्ति के अन्तर्भूत जो परमतत्त्व है उसको जो जानता है, ऐसा अर्थ होगा । विभूति का अर्थ विस्तार करने पर योग का अर्थ युक्ति होगा अर्थात जो परमेश्वर के उपरोक्त तीनो श्लोकों में वर्णित विस्तार को जो युक्ति पूर्वक तत्त्व से जानता है वह । विभूति का अर्थ राम, कृष्ण आदि अवतारों की तरह करने पर उनमें ईश्वरत्व माना पड़ेगा, क्योंकि ज्ञानी सबमें एक तत्त्व को जानता है और भक्त सबमें ईश्वर को मानता है ।
           सबका सारांश यह है कि संपूर्ण सृष्टि परमात्मा से ही हुई है इस बात को तत्त्व से जान लेने से, मान लेने से सर्वत्र आत्मस्वरूप का अनुभव होने से, सबके अन्दर परमेश्वर के दर्शन होने से— ज्ञानी परमात्मा का आत्मभाव से अभिन्न अनुभव करता है और भक्त सर्वत्र भगवान का दर्शन करता है । इस प्रकार अनुभव एवं दर्शन करने से वह ज्ञानी भक्त किसी भी प्रकार के विकल्प अर्थात संशय रहित होकर समत्वरूप योग के द्वारा “अहं ब्रह्मास्मि” “वासुदेवः सर्वम्” के रूप में मेरी उपासना करता है । यहाँ किसी भी प्रकार का मेरी व्यापकता और एकमेवाद्वितीयं पर संशय नहीं होता ।
              अथवा विभूति का अर्थ विस्तार और योग का अर्थ प्रकृति या माया शक्ति । बुद्धि आदि बीस भाव, सात, चार, चौदह अर्थात पच्चीस, इस प्रकार कुल पैंतालीस विभूतियों का यहाँ पर वर्णन किया  जो परमेश्वर और प्रकृति के संयुक्त अभियान का अंग । यहाँ तत्त्व यह जानना है संपूर्ण जगत प्रकृति और पुरुष से ही व्याप्त है उससे भिन्न नहीं है । एवं प्रकृति का अधिष्ठान पुरुष प्रकृति की अपनी कोई सत्ता नहीं है । साथ ही वह इस इन विभूतियों की ही संतति से संपूर्ण जगत व्याप्त है, अतः जगत उनसे भिन्न नहीं और वे परमात्मा से अभिन्न हैं क्योंकि ये सभी भगवान के मन से के संकल्प से उत्पन्न इसीलिये कहा भद्भावा यानी मेरे भाव वाले अर्थात मेरी ही ऐश्वर्य अर्थात सामर्थ्य से युक्त साक्षात् मुझसे अभिन्न मेरा ही स्वरूप हैं । प्रकृति पुरुष के रहस्य को भलीभांति स्वरूपतः जानने वाला कभी विचलित नहीं होता योग के द्वारा यजन का अर्थात समत्व भाव में समाहित अर्थात स्थिर हो जाता है ॥७॥

             संबंध— इस प्रकार वस्तु तत्त्व के निश्चय हो जाने पर की जाने वाली उपासना का वर्णन……
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्त्वा भजन्ते मां बुधा भाव समन्विताः ॥१०/८॥
           शब्दार्थ— मैं संपूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करने वाला हूँ । सभी मुझसे ही प्रवृत्त होते हैं । इस प्रकार जानकर विवेकशील मेरे भाव से भावित होकर मेरा भजन करते हैं ।
        तात्पर्यार्थ— अहं सर्वस्य प्रभवो का शैली भेद से अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है । मैं वासुदेव ही सबको उत्पन्न करने वाला हूँ । सभी में जो प्रवृत्ति और निवृत्ति नामक क्रिया हो रही है वह मुझसे ही हो रही है— “यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्” १८/४६ इस प्रकार मुझे तत्त्वतः जानकर विवेकशील मेरे भाव से भावित अर्थात सर्वत्र और सब में मुझ परमात्मा को तत्त्वरूप से जानकर मेरा ही भजन अर्थात अभिन्नभाव से चिन्तन करते हैं ॥८॥

            संबंध— किस प्रकार मेरे भाव से भावित होकर चिन्तन करते हैं ? इस पर कहते हैं……
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥१०/९॥
           शब्दार्थ— मुझमें चित्तवाला, मुझमें प्राण वाला, परस्पर मेरे स्वरूप का अनुभव करते हुए, कथन करते हुए और नित्य संतुष्ट रहते हुए इस प्रकार मुझमें ही रमण करते हैं ।
           तात्पर्यार्थ—  यहाँ पर मन और प्राणों को परमेश्वर से अभिन्न कहा गया है, अर्थात समाहित होकर स्वयं को परमात्मा से अभिन्न मानता हुआ परस्पर स्वरूप के तात्त्विक अनुभव एक दूसरे मुमुक्षु को कहता हुआ मुझ स्वसंवेद्य सर्वात्मा में ही ही संतुष्ट रहे ‘आत्मन्येवात्मा तुष्टः’ २/५५, मुझमें ही रमण करे ‘यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते’ ३/१७ अर्थात आत्मयोगी का आत्मा से भिन्न संतुष्टि, रमण और कार्य कुछ और कहीं है ही नहीं । अतः आत्मा से भिन्न कोई भी वृत्ति बनती ही नहीं यह भाव है ॥९॥

              संबंध— उक्त प्रकार से भजन करने वालों को बुद्धियोग देना……
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येनमामुपयान्ति ते ॥१०/१०॥
          शब्दार्थ— उन निरंतर मुझसे युक्त और प्रीतिपूर्वक भजन करने वालों को मैं बुद्धियोग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ।
            तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में कहे गये “मच्चित्ता मद्गतप्राणा” से जिस प्रकार से कहा गया है वैसा का वैसा तादात्म्य भाव को प्राप्त कर लेना ही सतत युक्त होना है । “एतां विभूतियोगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः” १०/७ । विभूतियों को उनके मूलभाव को जानना ही तत्त्व से जानकर भजन करना है, लेकिन परमेश्वर की व्यापकता को तत्त्व से जानकर तत् तत् रूपों में ही स्वीकार कर लेना प्रीति है, क्योंकि “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते” १०/८ वही सब है, उसी से सारी क्रियाएं हैं, मन, बुद्धि, इन्द्रिय, क्रिया, सब उसी में समाहित हो जाने पर जैसे नदी समुद्र में प्रवेश करते ही नदीत्व भाव स्वतः नष्ट होकर समुद्रत्व भाव स्वतः हो जाता है, उसी प्रकार मन आदि का प्रभु में तादात्म्य प्राप्त होने पर वे प्रभु रूप ही हो जाते हैं । 
             इसी प्रकार जो मुझे तत्त्व से जानकर आत्मभाव से प्रेम करता है, क्योंकि आत्मा ही सर्वाधिक प्रिय होता है तब मैं उसे बुद्धियोग देता हूँ । जिससे वह “सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः” १०/७ अर्थात संशय रहित होकर स्थिर भाव से मुझ आत्मस्वरूप का भजन अर्थात चिन्तन करता है जिससे वस मुझको ही प्राप्त होता है । श्लोक सात से लेकर यहाँ तक बारंबार चिन्तन करने से ही रहस्य ठीक समझ में आयेगा तभी बुद्धियोग अर्थात बुद्धि में समत्वभाव उत्पन्न होगा । समत्वभाव से ही परमेश्वर की प्राप्ति होगी । 
                 अर्थात यहां पर भगवान ने यह स्पष्ट किया है कि मेरी प्राप्ति ज्ञानमार्ग से ही होगी अन्य किसी साधन से नहीं । ऐसा तात्पर्य है ॥१०॥

            संबंध— इस प्रकार जब तत्त्वतः मुझे जानकर समत्वभाव को प्राप्त हो जाता है तब भगवान उस पर कृपा करते हैं……
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥१०/११॥
           शब्दार्थ— पूर्वोक्त प्रकार से उन भजन करने वालों पर ही अनुग्रह करने के लिए मैं आत्मभाव में स्थित होकर अज्ञान से उत्पन्न हुए अंधकार को उद्दीप्त हुए ज्ञानदीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ ।
             तात्पर्यार्थ— श्लोक सात से लेकर, विशेषतः श्लोक नौ के अनुसार अनन्यता को साधाक प्राप्त हो जाता है “अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्” “नित्याभियुक्तानाम्” ९/२२ तब भगवान स्वयं ही योगक्षेम के निर्वाह की प्रतिज्ञा करते हैं “योगक्षेमं वहाम्यहम्” ९/२२ उसी प्रतिज्ञा के अनुसार पहले बुद्धियोग देते हैं जिससे संशय विपर्यय नष्ट होकर अविकम्पित अर्थात अविचल भाव से स्थिर हो जाये । जब वह अचल स्थिर हो जाता है, मुझसे अतिरिक्त और कोई वृत्ति उठती ही नहीं तब मैं उस पर अनुग्रह करता हूँ ।
           इसी अनुग्रह करने की इच्छा से ही आत्मभावस्थ अर्थात बुद्धिवृत्ति में स्थित जो अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार है उसे उद्दीप्त हुए ज्ञानदीप के द्वारा नष्ट कर देता हूँ ।
           यहाँ दूसरा पक्ष यह भी है “तेषां एव अनुकम्पार्थं अहं आत्मभावसथः अज्ञानजं तमः भास्वता ज्ञानदीपेन नाशयामि” अर्थात यहाँ आत्मभाव का तात्पर्य सामान्य मनुष्य ‛मैं’ के अर्थ को प्रकृतिस्थ अज्ञान के कारण शरीर भाव को लेकर जानता है, किन्तु जिस समय तत्त्व से मुझ सर्वात्मा को जान लेता है उसी समय अज्ञानमय अंधकार का त्याग करके स्वसंवेद्य ‛मैं’ के अर्थ रूप में जानता है । यही जो स्वसंवेद्य आत्मभाव है, इसी आत्मभाव में मैं स्थित हूँ ।  उसी आत्मा का प्राकट्य उद्दीप्त ज्ञानदीपक के द्वारा मैं स्वयं नाश करता हूँ । अर्थात मैं स्वयं उद्दीप्त ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान से परे अन्य कोई ज्ञान है ही नहीं, ऐसे सर्वोत्तम ज्ञान के रूप में मैं स्वयं हृदय में प्रकाशित हो जाता हूँ । इसी को श्रुति कहती है “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनु स्वाम्” मु.उ.३/२ अर्थात इस आत्मा को जो वरण करता है यह आत्मा भी उसका वरण करके स्वयं को प्रकट कर देती है ।
              ठीक इसी प्रकार जिसकी हर क्रिया ने परमेश्वर का वरण कर लिया है उसके सामने वह आत्मस्थ परमेश्वर उद्दीप्त ज्ञान रूप में प्रकट होकर जो अज्ञान से उत्पन्न अंधकार अर्थात आवरण है उसका प्रकाश— दीपक प्रकाश अर्थ में है, द्वारा नाश कर देते हैं ।
         अन्य पक्ष में वे परमेश्वर जगद्गुरु हैं । आचार्य आदि के द्वारा उपदेश कराकर फिर आत्मभाव अर्थात अपने अन्दर में ही गुरुजनों के उपदेश की अनुभूति कराकर उसमें आत्मा अनात्मा के विचार रूपी ज्ञानदीप के प्रकाश अर्थात आत्मा में एकमेवाद्वितीम् का दृढ निश्चय कराकर अज्ञान से उत्पन्न अंधकार यानी मूढता का नाश कर देते हैं । मूढता यानी स्वरूपगत विस्मृति का नाश कर देते हैं, जिससे जीवब्रह्मात्मैक्य बोध हो जाता है यह भाव है ॥११॥

            अध्याय सात से लेकर यहां तक श्रीभगवान ने ज्ञान-विज्ञान का विस्तृत वर्णन करते हुए जीवब्रह्मात्मैक्य के साधनों का विधिवत प्रतिपादन कर दिया । भगवान ने कहा था पश्य में योगमैश्वरम् ९/५ अर्थात मेरे योग यानी प्रकृति को और ऐश्वर्य अर्थात उसके और मेरे संयुक्त सामर्थ्य को जान लो । उसी का स्मरण करता हुआ अर्जुन विचार करता है कि योग और ऐश्वर्य का वर्णन तो भगवान ने कर दिया और हमने उस सामर्थ्य और परमेश्वर के निर्विकारी भाव को समझ भी लिया है तथापि और अधिक विस्तार समझ में आ जाये तो अच्छा हो, किन्तु सीधे तो बोल नहीं सकता था इसलिए  भगवान के अलौकिक स्वरूप एवं विभूतियों के श्रवण से अर्जुन का भावविभोर होकर स्तुति करता है……

अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥१०/१२॥
           शब्दार्थ— अर्जुन बोले― आप परब्रह्म, परम् धाम, परम पवित्र, दिव्य, शाश्वत, पुरुष, आदिदेव, अज और विभु हो ।
           तात्पर्यार्थ— मन, वाणी, बुद्धि अर्थात अव्यक्त प्रकृति से परे, सबके निवास स्थान, पवित्रों में पवित्र “पवित्रानां पवित्रं यो” नित्य स्व महिमा में स्थित, सबके आदि कारण, अजन्मा और व्यापक । इन सभी नामों का विस्तार हो चुका है ॥१२॥

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥१०/१३॥
           सामान्य भाव— आपके भावापन्न १०/५ अत्रि, वशिष्ठ आदि सप्त ऋषि तथा देवर्षिनारद एवं असित, देवल व्यास और स्वयं आप भी कह रहे हो अर्थात आप कैसे हो ? यह तो उपरोक्त ऋषि विभिन्न प्रकार से कहते ही हैं “ऋषिभिर्बहुधा गीतम्" १३/४ किन्तु आपने भी वही कहा ॥१३॥ 

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥१०/१४॥
              सामान्य भाव— इसलिये हे केशव ! यह सब सत्य है जैसा कि ऋषियों ने कहा और आप भी कह रहे हो । हे भगवन् ! आपके व्यक्तभाव अर्थात प्राकट्य भाव को न ही देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं जैसा कि आपने भी कहा है “न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः” १०/२ [{तो फिर मैं कैसे जान सकता हूँ ? इतना भाग स्वयं जोड़ लेना चाहिए क्योंकि आगे जानने की ही इच्छा से योग और विभूति के विस्तार के लिए प्रार्थना करने वाले हैं ।}] ॥१४॥

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थत्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१०/१५॥
             सामान्य भाव— आप क्षर, अक्षर नाम से कहे गये पुरुषों से उत्तम पुरुष होने से पुरुषोत्तम हो, आकाशादि भूतों को उत्पन्न करने वाले अथवा संपूर्ण प्राणियों को सत्ता देने वाले हो, संपूर्ण प्राणियों के स्वामी अर्थात शासक हो, आप देवताओं के भी देवता अथाव अधिभूत इन्द्रियों के अधिदैव कहे जाने वाले सभी देवता उनके भी अधियज्ञ रूप में देवता अर्थात आत्मा हो, आप जगत का पालन करने वाले हो, अतः आपकी महिमा आपसे बढ़कर और कौन जान सकता है ? अर्थात आप स्वयं से स्वयं को स्वयं ही जानते हो ॥१०/१५॥

             संबंध— जब किसी के किसी गूढ रहस्य को जानना हो तब उसे प्रसन्न करना होता है । स्तुति करना होता है । तब वह प्रसन्न होकर अपने हृदय की बात कहता है । श्लोक बारह से पंद्रह तक अर्जुन ने भगवान की स्तुति की है । उसका कारण यह है कि अभी तक श्रीभगवान ने जिस परमतत्त्व निर्गुण, निर्विकार, अव्यक्त, अव्यय एवं अचिन्त्य स्वरूप का वर्णन किया वह उत्तम अधिकारी के लिए तो ठीक है तथापि मेरे जैसे मूढबुद्धि वालों का मन वहां कहीं टिकता नहीं, अतः उस स्वरूप का चिन्तन कर नहीं सकते । हम मन को कहाँ टिकाएं ? इत्यादि मंदबुद्धि अधिकारी के कल्याण के निमित्त स्तुति करते हुए अगले तीन श्लोकों में योग और विभूतियों का पुनः वर्णन करने के लिए प्रार्थना करते हैं……
वक्तुमर्हस्यशेषेण     दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥१०/१६॥
            शब्दार्थ— आपकी जो भी दिव्य विभूतियां इस संसार को व्याप्त करके स्थित हैं उन्हें अशेष रूप से कहो, क्योंकि आप ही अशेष रूप से कहने में समर्थ हो ।
     तात्पर्यार्थ— अध्याय सात में “रसोऽहमप्सु” ७/८ से लेकर “कामोऽस्मि” ७/११ तक,  “अहं क्रतुरहं” ९/१६ से लेकर “सदसच्चाहमर्जुन” ९/१९ तक एवं “महर्षयः सप्त” १०/५ इत्यादि को “एतां विभूतियोगं” १०/६ से जिन विभूतियों का वर्णन किया, उनकी व्यापकता, उनका महत्त्व, जो ऐश्वर्य कहा, वे दिव्य विभूतियां कैसे इन लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं ? यह सब अशेष अर्थात कुछ भी जानना शेष न रहे इतने विस्तार से कहने में आप ही समर्थ हो, क्योंकि क्योंकि आप ही स्वयं से स्वयं को जानते हो, बाकी देव दानव आदि तो आपको, आपके प्रभाव को जानते नहीं हैं, इसलिये आप ही कहो ॥१६॥

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१०/१७॥
            शब्दार्थ— हे योगिन् ! निरंतर पुनः पुनः मैं आपका चिन्तन करता हुआ आपके दिव्य स्वरूप को कैसे जानूं ? हे भगवन् ! मेरे द्वारा किन किन रूपों और भावों में आपका चिन्तन करना चाहिए ?
            तात्पर्यार्थ— माया के योग से उत्पन्न ऐश्वर्य जिसमें है वह योगी, हे भगवन् ! यह भगवन् प्रत्याक्ष साकार रूप के लिए है । अर्जुन का भाव यह है कि किस किस वस्तु पदार्थ आदि में आपका चिन्तन करूँ और किस भाव से करूँ ? और उनमें किस प्रकार का भाव करना चाहिए ? ‘यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्’ ६/२६ में जो कहा था कि जहाँ जहाँ मन जाये वहां वहां आत्मभाव में मन का नियमन करे, वही अर्जुन यहां पूछ रहा है कि किन किन वस्तुओं, रूपों में आत्मभाव अर्थात आपके स्वरूप का चिंतन करना चाहिए ।
         दूसरे पक्ष में यहाँ अर्जुन कह रहा है यह बात तो ठीक है कि आपको न देवता जानते हैं और न ही ऋषिगण तथापि मैं आपको जानना चाहता हूँ और आप योगी अर्थात माया के स्वामी हो अतः उस माया को पार करके कैसे आपको जानूं क्योंकि माया के पार तो आप ही कर सकते हैं । दूसरी बात आप भग अर्थात ऐश्वर्यशाली हो तो आप का ऐश्वर्य का किन किन प्राणियों वस्तुओं आदि में चिन्तन करने योग्य है । यद्यपि संपूर्ण जगत परमात्मा का ऐश्वर्य है तो भी एक चिन्तन पतन की ओर ले जाता है और दूसरा चिन्तन उत्थान की ओर अतः चिन्तन के योग्य कहने का भाव है कि मेरा उत्थान जिन पदार्थों के चिन्तन से हो सके वह मुझे बताइए, इतना अध्याहार कर लेना चाहिए ॥१७॥

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥१०/१८॥
            शब्दार्थ— हे जनार्दन ! अपने योग और विभूति को विस्तार से कहो क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ।
            तात्पर्यार्थ— सातवें, नौवें एवं इसी दसवें अध्याय में अपने ऐश्वर्य और विभूतियों का भगवान वर्णन कर चुके हैं तथापि विस्तार की प्रार्थना का उद्देश्य दो प्रकार से है, पहला तो यह “केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया” यह जो पूर्व श्लोक में कहा उससे यह स्पष्ट है कि श्रीभगवान के द्वारा जो ऐश्वर्य एवं विभूति कहा गया है, वह ठीक से समझ में नहीं आया । बिना ठीक से समझे कोई साधना/उपासना नहीं हो सकती, इसलिये उसी को ठीक से समझने के लिए विस्तार से कहने का आग्रह किया है, क्योंकि मंदबुद्धि को सूत्रवत् कही गई बात समझ में आती नहीं है । दूसरी बात यह कि यदि कोई शंका करे समझ में नहीं आया इसके लिए भगवान क्या करें ? पुनः क्यों कहना ? इसके लिए कहते हैं कि मुझे नहीं हो रही है । आपकी अमृतमय वाणी है ही ऐसी कि तृप्ति न होकर और अधिक अतृप्ति बढ़ रही है, इसलिये पुनः विस्तारपूर्वक कहो । जितनी अधिक परमेश्वर के स्वरूप, गुण, लीला श्रवण से अतृप्ति बढ़े उतना अधिक चित्त शुद्ध होता है । ये अतृप्ति चित्तशुद्धि की पहचान है । अगर और अधिक अतृप्ति नहीं बढ़ी तो समझना चाहिए कि इसने साङ्गोपाङ्ग वेदाध्ययन करके भी परमेश्वर के स्वरूप को, लीला को, ब्रह्म के समग्र रूप को नहीं जाना अर्थात इसका चित्त कल्मषों से सराबोर है— राम कथा जे सुनत अघाहीं । रस विशेष जाना तिन नाहीं ॥१८॥

          संबंध— अर्जुन की जिज्ञासा और स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीभगवान ‘हन्त’ कहकर अपनी प्रधान विभूतियों के कहने की प्रतिज्ञा करते हैं……
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥१०/१९॥
            सामान्य भाव—  दिव्य का अर्थ है अलौकिक अर्थात जिसको मात्र अनुभव से जाना तो जा सकता है, लेकिन किसी लौकिक अर्थात प्राकृत उदारहण से नहीं समझा जा सकता है, ऐसा अलौकिक यानी अप्राकृत । आत्मविभूति अर्थात साक्षात् मेरा ही स्वरूप, ऐसी प्रधान विभूतियों को तुम से कहूंगा, क्योंकि मेरी विभूतियों का अन्त नहीं है ।
           विशेष— यहाँ दिव्य विभूति का अर्थ आचार्य जी ने देवलोक में रहने वाली विभूति किया है तथापि आगे कही जाने वाली लगभग सभी विभूति पृथ्वी पर ही अवतरित हुई हैं, अतः उन्हें पृथ्वी लोक से भिन्न नहीं किया जा सकता है ॥१९॥

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०/२०॥
        शब्दार्थ—    हे गुडाकेश ! संपूर्ण प्राणियों में शयन करने वाली अर्थात हृदय में अहमर्थक आत्मा मैं हूँ । संपूर्ण प्राणियों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ ।
            तात्पर्यार्थ— हे निद्रा के स्वामी अर्जुन ! संपूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थिर भाव से रहने वाली आत्मा मैं हूँ । यहां ध्यान देना चाहिए कि शरीर और मन बुद्धि को जो आत्मा मानते हैं, उनके प्रति यह कथन है कि शरीर मान बुद्धि अगर आत्मा मानते हो तो वह स्थिर नहीं है किन्तु संपूर्ण प्रणियों के हृदय में शयन करता हुआ सा शान्त, कूटस्थ और स्थिर साक्षी भाव से जो स्वसंवेद्य आत्मा है वह मैं हूँ । आदि अन्त और मध्य— जैसे घड़ा बनने से पहले मिट्टी, घड़ा बनने पर मिट्टी और घड़ा फूट जाने पर मिट्टी । इस प्रकार आदि मध्य और अन्त मिट्टी होने के कारण मिट्टी ही घड़े का मूल का कारण है, इसी प्रकार प्राणियों का जीवन, उनका मध्य में पालन और अन्त में संहार मैं ही हूँ, क्योंकि सबकी उत्पत्ति मुझसे हुई है, मुझमें ही स्थिर एवं लीन होगी । अवथा प्राणियों की सृष्टि के कारण आदि यानी ब्रह्मा, अन्त यानी संहार कर्ता रुद्र, मध्य यानी सृष्टि और संहार के मध्य की स्थिरता एवं पालन कर्ता विष्णु मैं हूँ ।
        दूसरे पक्ष में सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा जिसे सीमित अहंता वाला ‛मैं’ करके जाना जाता है वह मैं और कोई नहीं स्वयं परमात्मा ही है अतः सीमित अहंता का त्याग करके व्यापक अहंता के साथ तादात्म करके संपूर्ण प्राणियों में स्थित आत्मा मैं ही हूँ इस प्रकार मुमुक्षु चिन्तन करे । ऐसा चिन्तन होने पर वह यह भी जान लेगा कि संपूर्ण प्राणियों का आदि अर्थात उत्पत्ति, मध्य अर्थात उसका जीवन, अन्त अर्थात विनाश मैं ही हूँ ।
            विशेष— उत्तम अधिकारी इस प्रकार सर्वत्र स्वसंवेद्य आत्म रूप का चिन्तन करते हुए आरूढ हो और कनिष्ठ निम्न विभूतियों या इनकी तरह जहाँ कहीं कोई विशेषता दिखे वह श्रीहरि ही हैं ऐसा चिन्तन करे ॥२०॥

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥१०/२१॥
             सामान्य भाव― बारह आदित्यों में विष्णु मैं हूँ, अग्नि आदि ज्योतियों में अंशुमान नामक गतिमान सूर्य मैं हूँ, उनचास मरुतों में मरीचि मैं हूँ, अश्विनी भरणी आदि नक्षत्रों का स्वामी चंद्रमा मैं हूँ ॥२१॥

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥१०/२२॥
           सामान्य भाव— वेदों में सामवेद, देवताओं में इन्द्र, इन्द्रियों में मन और प्राणियों की क्रिया शक्ति या जीवनी शक्ति मैं हूँ ॥२२॥

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥१०/२३॥
         सामान्य भाव— ग्यारह रुद्रों में शंकर, यक्ष राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर मैं हूँ, अष्ट वसुओं में अग्नि और शिखरों में मेरु मैं हूँ ॥२३॥

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कंधः सरसामस्मि सागरः ॥१०/२४॥
          सामान्य भाव— हे पार्थ ! पौरोहित्य कर्म करने वाले पुरोहितों में प्रधान बृहस्पति पुरोहित मैं हूँ । सेनापतियों में स्कंध एवं सरोवरों में समुद्र हूँ ॥२४॥

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥१०/२५॥
            सामान्य भाव— महर्षियों में भृगु, शब्दों में एकाक्षर प्रणव, यज्ञों में जप यज्ञ, और स्थिर रहने वालों में हिमालय मैं हूँ ॥२५॥

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥१०/२६॥
           सामान्य भाव—  वृक्षों में पीपल, देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ एवं सिद्धों में कपिल मुनि हूँ ॥२६॥

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥१०/२७॥
              सामान्य भाव— घोड़े एवं हाथियों में अमृत के उत्पत्ति स्थान क्षीरसागर से उत्पन्न उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी तथा मनुष्यों में राजा मैं हूँ ॥२७॥

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥२८॥
                सामान्य भाव— आयुधों में वज्र मैं हूँ । धेनुओं में कामधेनु— यहाँ गाय शब्द नहीं धेनु शब्द है । गाय तो बांझ भी हो सकती है किन्तु धेनु सवत्सा दुधारु गाय को ही कहते हैं । अतः सवत्सा दुधारू गाय यानी धेनु मैं हूँ । प्रजा की उत्पत्ति का मूल कामदेव— यहां ध्यान देने योग्य यह है कि “धर्माविरुद्धो कामोऽस्मि” ७/११ अर्थात वह काम जो धर्म के विरुद्ध न हो, साथ ही संतानोत्पत्ति के निमित्त उत्पन्न काम जो धर्म से प्राप्त वैहिक जीवन में पत्नी के साथ ही संभव है अर्थात जब संतान की उत्पत्ति करनी ही हो तब जो काम होता है मात्र वह क्योंकि पशु पक्षियों में भी काम संतान उत्पन्न करने के लिए ही होता है । अन्य समय में काम में प्रवृत्ति अर्थात संभोग वहां भी देखने में नहीं आता है । ऐसा जो संतानोत्पत्ति के लिए धर्म का विरोध न करने वाला काम है वह काम मैं हूँ । इसका अर्थ यह हुआ कि जब संतान की उत्पत्ति न करनी हो तो पत्नी के साथ भी संभोग करना धर्म के विरुद्ध अर्थात अधर्म है, अधर्म निश्चित ही पतन का श्रोत है । इसके लिए ही भगवान सावधान करते हुए कहते हैं कि धर्म से विरोध न हो और संतान उत्पत्ति का हेतु जिसमें हो वह काम मैं हूँ । सर्पों की अनेक प्रजातियों में वासुकि मैं हूँ ॥२८॥

आनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥१०/२९॥
             शब्दार्थ—  नागों की अनेक जातियों में अनन्त, सरोवरों अथवा जलचरों का स्वामी वरुण मैं हूँ । पितरों में अर्यमा एवं नियमन करने वालों में यम मैं हूँ ॥२९॥

प्रह्लाश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥१०/३०॥
             सामान्य भाव—  दैत्यों में प्रह्लाद, गणना करने वालों का समय, पशुओं में सिंह एवं पक्षियों में वनितानन्दन गरुड़ हूँ ॥३०॥

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोसामस्मि जाह्नवी ॥१०/३१॥
            सामान्य भाव— पवित्र करने वालों में वायु, शस्त्रधारियों में राम मैं हूँ । झष यानी जलचरों में मगर मैं हूँ । स्रोत अर्थात निरंतर प्रवाहित होने वाला जल यानी नदियों में जाह्नवी मैं हूँ । 
            यहाँ जाह्नवी कहने का तात्पर्य यह है कि गांग जी ने स्वर्ग से पृथ्वी पर आते समय पृथ्वी की रक्षा के लिए हजारों धाराएं कर ली थीं जो आकाश पाताल एवं पृथ्वी पर भी अनेक नामों से कही गई हैं, उनमें से एक धारा को राजा भगीरथ लाये थे, जो भागीरथी कहलायीं किन्तु मार्ग में गंगा की उद्दंडता के कारण जह्नु ऋषि पी गये, जिससे भगीरथी का अस्तित्व ही संकटमय हो गया था, फिर भगीरथ की प्रार्थना से कृपापरवश हुए ऋषि ने अपनी जांघ (जंघा) से गंगा को पुनः प्रवाहित किया अतः वे जाह्नवी कहलायीं । यही यहाँ जाह्नवी कहने का तात्पर्य है ।
            श्लोक २९ में वरुणो यादसामहम् आया है जिसका अर्थ जलचरों का स्वामी किया है क्योंकि सरोवरों का स्वामी समुद्र किया नहीं जा सकता कारण कि सरसामस्मि सागरः १०/२४ कहा जा चुका है । अतः यहां यह समझना चाहिए कि जलचरों का स्वामी अर्थात संरक्षक वरुण है क्योंकि परस्पर भिन्न स्वभाव के एक दूसरे को खा जाने वाले जीव जल में एक साथ रहते हैं और अगर उनका संरक्षण नहीं होगा तो विनाश हो जायेगा, जबकि यहां पर जलचरों में अधिक बलशाली होने के कारण उनके राजा के रूप में यहाँ मगर कहा गया है ॥३१॥

सर्गणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥१०/३२॥
           शब्दार्थ— हे अर्जुन ! संपूर्ण सृष्टियों का आदि मध्य और अन्त मैं हूँ । विद्याओं में अध्यात्मविद्या, परस्पर विवाद करने वालों का वाद हूँ ।
           तात्पर्यार्थ— सृष्टियों का आदि, मध्य और अन्त “अहमादिश्च मध्यं च” १०/२० में देखना चाहिए । सभी विद्याएं श्रेष्ठ हैं तथापि जो अध्यात्मविद्या अर्थात वह विद्या जो आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करा दे वह आत्मविद्या (ब्रह्मविद्या) मैं हूँ । जल्प, वितंडा और वाद ये तीन प्रकार के वाद कहे गए हैं । जल्प में अपने पक्ष का प्रतिपान और दूसरे के पक्ष में दोष दिखाना, वितंडा यानी अपना तो कोई पक्ष नहीं और दूसरे के पक्ष में दोष पर दोष निकालना, वाद यानी परस्पर अपने और दूसरे यानी दोनो पक्षों में दोष देखकर उनका निवारण करके जो तत्त्व निश्चय करने के लिए चर्चा की जाती है वह चर्चा यानी वाद मैं हूँ ॥३२॥

अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखम् ॥१०/३३॥
            शब्दार्थ— अक्षरों में अकार, समासों में द्वन्द्व समास, अक्षय काल, संपूर्ण प्राणियों को धारण करने वाला एवं विश्वरूप मैं हूं ।
              तात्पर्यार्थ— जैसे संपूर्ण प्राणियों में चेतना न हो तो उसका कोई अस्तित्व नहीं होता है, वैसे ही अक्षरों अकार न हो तो उनका कोई अस्तित्व ही नहीं अर्थात उच्चारण ही नहीं हो सकता है अतः इसी व्यापक विशेषता के कारण अकार मैं हूँ । तत्पुरुष आदि समासों में द्वन्द्व समास मैं हूँ । दिन, पक्ष, मास, वर्ष आदि सभी काल हैं किन्तु इन सबका क्षय होता है तथापि जिसका क्षय नहीं होता वह अक्षय काल मैं हूँ । संपूर्ण प्राणियों के कर्मफल को धारण करनेवाला मैं हूँ । ९/१७ मैं धाता का अर्थ किया जा चुका है । विश्व ही जिसका मुख है वह विश्वतोमुख मैं हूँ ॥३३॥

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥१०/३४॥
               सामान्य भाव— सब कुछ हरण करने वालों में मृत्यु एवं मनुष्य का होने वाला उत्कर्ष मैं हूँ । स्त्रियों में कीर्ति, श्री,वाणी, स्मृति, मेधा, धृति एवं क्षमा मैं हूँ ॥३४॥

बहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीषोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः ॥१०/३५॥
            सामान्य भाव— रथन्तर आदि सामवेद में देवाताओं की स्तुति के अनेक प्रकार हैं, उनमें विशेष रूप से इन्द्र की स्तुति बहत्साम से की जाती है, अतः वह बृहत्साम मैं हूँ । छन्दों में गायत्री छंद, महीनों में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन का महीना मैं हूँ । ऋतुओं में कुसुमाकर अर्थात ऋतु के आगमन से संपूर्ण प्रकृति नवीन वस्त्र धारण करके पुष्पवत् प्रसन्न हो जाये वह कुसुमाकर अर्थात वसन्त ऋतु मैं हूँ ॥१०/३५॥

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्ववतामहम् ॥१०/३६॥
              सामान्य भाव— पासा से खेले जाने वाले जुवें का छल हूँ, तेजस्वियों का तेज हूँ, विजय की कामना वाले की विजय हूँ, व्यापारी का व्यापार या मुमुक्षु की एकाग्रता एवं सात्विकों का सत्व मैं हूँ— यहाँ ध्यान यह रखना है कि भगवान ने पुरुष या पदार्थ का नाम नहीं लिया है अतः सत्त्व गुण संपन्नता जहाँ भी पाई जाती है फिर चाहे वह जड़ हो या चेतन वह सत्त्वगुण मैं हूँ ऐसा समझना चाहिए ॥३६॥

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥१०/३७॥
            सामान्य भाव— वृष्णिवंशियों में वासुदेव, पाण्डवों में धनञ्जय (अर्जुन), मुनियों में वेदविस्तार करने वाले श्रीकृष्णद्वैपायन, तत्त्वदर्शियों में त्रिकालदर्शी शुक्राचार्य मैं हूँ ॥३७॥

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥१०/३८॥
            सामान्य भाव— दण्डित करने वालों का दण्ड, विजय की इच्छा रखने वालों की विजय, गोपनीयता बनाये रखने वाले साधनों में मौन एवं ज्ञानियों के आत्मैक्य बोध का साधन ज्ञान मैं हूँ ॥३८॥

             संबंध— “अहमात्मा गुडाकेश” १०/२० से लेकर “ज्ञानं ज्ञानवतामहम्” १०/३८ तक विभिन्न विभूतियों का अलग अलग वर्णन करके अब सबका सार एक साथ बता रहे हैं……
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥१०/३९॥
            शब्दार्थ— और हे अर्जुन ! संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति का हेतु अर्थात जो बीज है वह मैं हूँ, क्योंकि कोई भी चराचर प्राणी ऐसा नहीं है जो मेरे बिना हो ।
         तात्पर्यार्थ— भगवान प्रधान विभूतियों को बताकर अब एक मात्र पहचान बता रहे हैं जिससे परमेश्वर तत्त्व को कहीं भी पहचाना जा सके और वह प्राणियों के उत्पत्ति का हेतु अर्थात कारण बीज वृक्ष और वनस्पतियों में होता है, मनुष्य, पशु पक्षी में वीर्य रूप से होता है लेकिन खटमल, जूं ? इनका बीज पसीना है । गिंजइया—  बरसात अधिक होने पर जमीन जगह जगह लाल हो जाती है, थोड़े दिनों में उनमें जीवत्व उत्पन्न होकर चलने लगती हैं, इन्हें हमारी ग्राम्य भाषा में गिंजइया कहते हैं, इनका बीज क्या कहेंगे ? इसी प्रकार कुकुरमुत्ता आदि का बीज ? 
               प्राणी चार प्रकार के होते हैं—
          १-अण्डज— अंडे से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सांप, छिपकली आदि ।
       २- पिण्डज अर्थात मिट्टी से उत्पन्न होने वाले (गोबर से) बिच्छू, कुकुरमुत्ते, वृक्ष, घास, गिंजाई आदि ।
           ३- स्वेदज— जूं, खटमल आदि ।
         ४- जरायुज— जेर यानी गर्भ में निवास करके झिल्ली सहित उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु, आदि ।
              इन चार प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति का जो हेतु अर्थात कारण बीज है वह मैं हूँ “बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्” ७/१०, “बीजमव्ययम्” ९/१८ और प्रस्तुत श्लोक में बीज । अर्थात संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति का हेतु अव्यय बीज मैं हूँ इस रूप में मुझे सर्वत्र देख या जान । ऐसा तात्पर्य है ॥३९॥

            संबंध—  एक मात्र पहचान बताकर अब विभूतियों के वर्णन के उपसंहार का कारण बता रहे हैं……
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥१०/४०॥
            शब्दार्थ— हे परन्तप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है, ये विभूतियाँ संक्षेप में तुम्हारे उद्देश्य से  कहा है ।
            तात्पर्यार्थ— परमेश्वर निर्विशेष है वही अपनी माया शक्ति के कारण विशेष विशेष स्थानों में विशेष विशेष रूप से प्रतीत हो रहा है, किन्तु जब वही सबका बीज है तो फिर उसकी गणना कैसे की जा सकती है ? वह निर्विशेष परम सत्ता का चैतन्य प्रकाश ही है ऐसा समझना चाहिए । जहाँ भी दिव्यता दिखती है माया को लेकर है । निर्विशेष सामान्य है, सम और साक्षी मात्र है । अतः वह मात्र स्वसंवेद्य है । दूसरों में देखने और समझने में भी बिना माया विशिष्टता के नहीं आता ॥४०॥

             संबंध— उसकी अनुभूति मात्र लक्षणों से की जा सकती है……
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंऽशसमुद्भवम् ॥४१॥
           शब्दार्थ— जो जो ऐश्वर्य संपन्न, सत्वगुण संपन्न प्राणी या पदार्थ एवं श्री और शक्ति अर्थात शोभा (सुन्दरता) या बल संपन्न है उस उस को तू मेरे से उत्पन्न हुआ जान ।
            तात्पर्यार्थ— जिस जिस प्राणी या पदार्थ में सात्विक सुन्दरता या बल अर्थात जीवन प्रदान करनेवाली, पथ प्रदर्शक इत्यादि क्रियाशक्ति दिखे उस उस को तू मेरे अंश से उत्पन्न हुआ जान ॥४१॥

            संबंध— कितने अंश में समझना चाहिए ? इसका प्रतिपान……
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥१०/४२॥
        शब्दार्थ— अवथा हे अर्जुन ! इन विभूतियों को बहुत जानकर क्या करेगा ? मैं इस संपूर्ण जगत को एक अंश में व्याप्त करके स्थित हूँ ।
           तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में भगवान ने कहा मेरे तेज के अंश संपूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है और अब कहते हैं कि अपने एक अंश से संपूर्ण जगत में को व्याप्त करके स्थित हूँ । इन दोनो बातों में परस्पर विरोध सा प्रतीत हो रहा है । जिसका समाधान यह है भगवान ने पहले ही कहा था कि मेरी विभूति और योग अर्थात मेरी माया और उसका विस्तार जो तत्त्व से जानता है १०/७ वहीं यहां पूर्व श्लोको में मम तेजोंऽश से यह कह रहे हैं कि मेरे तेज से संपन्न माया द्वारा संपन्न होने से माया मेरे समान ऐश्वर्य और सामर्थ्य संपन्न होने के कारण संपूर्ण जगत को उत्पन्न करती है यह इस जगत की उत्पत्ति का तत्त्व अर्थात रहस्य है और इस श्लोक में कहते हैं कि मेरे एक अंश से संपूर्ण जगत को व्याप्त करके मैं स्थित हूँ । अर्थात जैसे बर्फ के बाहर भीतर उपर नीचे इधर उधर संपूर्ण बर्फ ही पानी से ओतप्रोत है अथवा सूर्य बाहर भीतर प्रकाश से भिन्न कुछ नहीं है उसी प्रकार संपूर्ण जगत को मैं व्याप्त करके स्थित हूँ अतः मुझसे अतिरिक्त और कुछ जगत है ही नहीं । इस पर शंका होती है कि क्या आप जितना जगत है इतने ही हो ? तो इस पर कहते मैं इससे कहीं अधिक हूँ । मेरे एक एक रोम में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं― रोम रोम प्रति लागे जासु कोटि ब्रह्मंड । तो शरीर में साढे तीन करोड रोम होते हैं उनके ब्रह्मांड गिन लो । जब गणना हो जाये तब समझना कि वह मेरा एक अंश है जबकि मेरे चार अंश में से तीन अंश और भी हैं । 
            इस प्रकार परमेश्वर तत्त्व की संपूर्ण प्राणियों की स्वरूपगत एकता स्वयं भगवान ही कहते हैं । अतः किसी द्वैत का गीता में कोई स्थान बचता ही नहीं है । अगर कोई स्थान बचता है तो वह है अविवेक का । ऐसे अविवेक प्रधान से हमारा कोई संबंध भी नहीं बनता । 
              अध्याय दश में भगवान ने समग्र रूप का वर्णन करते हुए यह कहते हुए कि जीव मेरा अंश ही नहीं बल्कि मैं ही हूँ इस प्रकार जीवब्रह्मात्मैक्य से उपसंहार किया ॥४२॥
              विभूति योग में ध्यान देने योग्य तथ्य— हमें पहले तो यह समझना होगा कि भगवान ने ज्ञान-विज्ञान सहित अपने स्वरूप के कथन की प्रतिज्ञा की थी किन्तु इन विभूतियों में ऐसा क्या विज्ञान है जिसे पुनः विस्तार से कहने की आवश्यकता पड़ गई ? इसके लिए पहले अध्याय सात का अवलोकन करते हैं कि वहां पर विभूतियों के कहने का कारण क्या था ?
            भगवान स्वयं को संपूर्ण प्राणियों का निमित्तोपादान कारण बताते हैं ७/६ । इसी बात को समझाने के लिए कहते हैं— मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति ७/७ अर्थात जो कुछ भी स्थावर जंगम है वह कुछ भी मुझसे भिन्न है ही नहीं अर्थात वह सब मेरा ही स्वरूप है । इसी बात को पुष्ट करने के लिए चार श्लोकों में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं संपूर्ण प्राणियों का जीवन अर्थात जीवनी शक्ति प्राण, संपूर्ण प्राणियों का सनातन बीज, यहां तक मर्यादा का अतिक्रमण न करने वाला संतानोत्पत्ति का हेतु काम मैं हूं, इत्यादि कहकर अपनी विभूतियों के माध्यम से जगत से अपनी अभिन्नता बता दी । विचारणीय तथ्य यहां यह है कि जब प्राण भी भगवान ही हैं तो आप कार्य-करण में अहंता पालने वाले प्राणों से भिन्न कौन हैं ?
             अध्याय नौ में कहते हैं— ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥९/१५॥ अर्थात अन्य यानी ज्ञानयोगी विश्वरूप में अलग अलग बहुत प्रकार के भेदों से स्थित मेरी ब्रह्मात्मैक्य रूप में आत्मा-अनात्मा के विवेक द्वारा मेरी उपासना करते हैं । इसी बात को बताने के लिए सबसे पहले कहते अहं क्रतुरहं यज्ञः अर्थात जिस वैदिक नित्य-नैमित्तिक कर्तव्य कर्म को करने के लिए जो मन में कर्तव्य कर्म के प्रति मन में संकल्प बनता है वह मैं हूं एवं उस सत्य संकल्प को मूर्तरूप देने के लिए जो निष्काम कर्तव्य पालन है वह मैं हूं । चार श्लोकों में विभूति का वर्णन करते हुए आगे कहते हैं— अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन १/१९ जीवन को धारण करने की जो अमृतस्वरूप शक्ति है वह मैं हूं, मृत्यु का निमित्त विष (विष तुल्य विभिन्न प्रकार के रोग) भी मैं ही हूं । इतना ही नहीं जो कुछ भी सत्य सा दिखने वाला जगत है और अज्ञानी की जो समझ में नहीं आता आता वह उसकी दृष्टि से असत रूप भी मैं ही हूं । यहां पर विचारणीय तथ्य यह है कि जब वह ही संकल्प और कर्तव्यकर्म है, अमृत और विष यानी जीवन और मृत्यु है । इससे भी भिन्न यदि कुछ सत् या असत् है वह भी वही है तो आप कौन हो ?
                अब इस अध्याय दस में कहते हैं कि संपूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित ‘मैं’ का अर्थ आत्मा भी परमेश्वर ही हैं । संपूर्ण जगत का आदि, मध्य और अन्त भी परमात्मा ही हैं, तो इससे भिन्न आप कौन हो ? 
              इन्द्रियों में मन, प्राणियों की चेतना परमात्मा ही हैं तो इससे भिन्न आप क्या हो ? प्रजनन हेतु कामदेव परमेश्वर हैं तो इससे भिन्न अपने किस प्रकार किसे और आपको किसने और कैसे उत्पन्न किया ? अक्षय काल परमेश्वर है, मृत्यु परमेश्वर है, वाणी परमेश्वर है, मौन परमेश्वर है, परमेश्वर से भिन्न कुछ भी है नहीं १०/३९ तो फिर परमेश्वर से भिन्न आप कौन हो जो चराचार जगत से बाहर और भिन्न अहंता धारण करने वाले हो ?
             साधन-साध्य के अन्तर्गत संपूर्ण वेदों में जानने योग्य एकमात्र ओंकार ९/१७ भी परमेश्वर है तपस्वियों का तप, बुद्धिमानों की बुद्धि परमेश्वर है, उत्पत्ति और प्रलय भी वही है तो इससे भिन्न आप कौन हो ? जिसके माध्यम से आत्मा-अनात्मा का विवेक होता है वह अध्यात्म विद्या परमेश्वर है, मंत्र परमेश्वर है, यज्ञों में जप यज्ञ (अनुष्ठेय मंत्र) परमेश्वर हैं, उच्चारण किये जाने वाले वर्णों में अकार परमेश्वर है, तो इससे भिन्न आप किसको जानने के इच्छुक हैं ? और भिन्न रूप में आप कौन हैं एवं किसे जानना चाहते हैं ? किसका अनुष्ठान करना चाहते हैं ?
           इतन ही नहीं, सर्प, पक्षी, पशु,  इत्यादि जो कुछ विशेषता को लेकर गिनाया उन विशेषताओं वाला तो मैं हूं ही किन्तु प्राणियों का बीज मैं ही हूं अतः वे सभी मेरे बिना कोई नहीं हैं अर्थात वे मुझसे अभिन्न रूप से मुझमें ही स्थित मेरा ही स्वरूप हैं । यहां पर रुद्राष्टाध्यायी का पांचवां अध्याय चिन्तनीय है ।
               इस प्रकार सब कुछ तो मुझ सर्वात्मा परमेश्वर का स्वरूप ही है अर्थात परमेश्वर से अभिन्न आत्ममाया का ही ऐश्वर्य है । इसका अन्त नहीं है क्योंकि परमेश्वर अनन्त है इसलिए योग माया का अभिन्नता के कारण ऐश्वर्य भी अनन्त है, अतः प्रधान रूप से मुमुक्षुओं को जीवात्मैक्य दृष्टि से परमतत्त्व को समझाने के लिए  विभूतियां कही गई हैं । फिर भी जहां कहीं न्याय संगत धन, बल आदि कुछ भी दिखता है उसको भी मेरा अंश समझो ।
               यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है कि अध्याय सात में भगवान ने कहा था— ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ७/१८ अर्थात ज्ञानी मेरा आत्मा यानी स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है । और यहां जितनी विशेष विभूतियां हैं जिन स्थावर जंगम प्राणियों का परमेश्वर तत्त्व से सीधा संबंध है, वे हिमालय, इन्द्र, गरुण, वासुकि सर्प, अनन्त नाग, गरुड़, कामधेनु आदि को कहा मैं ही हूं अर्थात जिसने सीधा आत्मस्वरूप परमेश्वर को जान लिया वह अभिन्न वही हो गया ‘जानत तुम्हहिं तुम्हहिं होइ जाई’ और जिनका संबंध आत्मैक्य रूपता से नहीं है उनको यहां अपने तेज से उत्पन्न अंश कहा है । तात्पर्य यह है कि मेरा अंश होने से अन्य प्राणी भी अविनाशी और मुझसे अभिन्न हैं तथापि वे अज्ञान की निवृत्ति करके मुझसे अभिन्न मोक्ष स्वरूपता को प्राप्त कर सकते हैं ।
              अब प्रश्न यह उठता है कि क्या जितनी माया है उतना ही परमेश्वर है तो इसके कहते हैं कि बहुत जानकर क्या करेगा ? संपूर्ण जगत को अपने एक अंश में व्याप्त करके स्थित हूं । मतलब यह कि माया मुझे कभी संपूर्ण रूप से मेरी समानता नहीं कर सकती है क्योंकि उसका भी अधिष्ठान मैं ही हूं ।
             इस प्रकार विभूतियोग के माध्यम से परमेश्वर कृष्ण ने संपूर्ण जीवों की अपने से एकता का प्रतिपादन करके यह बता दिया कि भिन्न भाव से देखने वाले पूर्णतः अज्ञानी हैं इसीलिए भिन्न-भिन्न देवों की फलाकांक्षा को लेकर उपासना करते हैं । अब एक प्रश्न और अर्जुन के मन में उठेगा कि जब संपूर्ण जगत आपके एक अंश में स्थित है तो आपका विराट स्वरूप कितना विशाल है ? इसका उत्तर देने के लिए विराट रूप का दर्शन होगा जिसमें अर्जुन श्रीकृष्ण के किसी एक ही भाग में अन्त प्रकार की आदि, मध्य और अन्त रहित सृष्टियों का दर्शन करेगा किन्तु वह पूर्णतः की कौन कहे आधा भी दर्शन नहीं कर सकेगा और सौम्य स्वरूप के लिए प्रार्थना करता हुआ मनुषी रूप में ही शान्ति को प्राप्त करेगा ।
              सारांश— श्रीभगवान ने अध्याय ९ में जिस योगमैश्वरम् को जानने की बात कहा था उसका शेष अंश साधनों सहित यहां वर्णन करते हुए स्व से भिन्न अन्य कोई सत्ता है ही नहीं यह कहते हुए अध्याय १० का उपसंहार करते हुए विश्राम किया ॥१-४२॥

॥ॐतत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्ष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक दसवां प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत्!!!
    श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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