ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय १५

    ॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
       अथ पञ्चदशोऽध्यायः
             पूर्व अध्यायों से इस अध्याय का संबंध— श्रीभगवान ने अध्याय सात में प्रकृति और पुरुष का वर्णन करते हुए स्वयं को सबका निमित्तोपादान ७/६ कारण अलग से बताया और यह भी बताया कि ‘मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति’ ७/७  अर्थात मुझसे परे अन्य कुछ है ही नहीं । उसी प्रकृति का इदं शरीरं एवं क्षेत्रज्ञं १३/१ में यह करके कि जितना जो भी कुछ है वह शरीर अर्थात प्रकृति का कार्य बताया और उस कार्य को जानने वाले जीव को क्षेत्रज्ञ बताया । अध्याय सात में जिसे निमित्तोपादान बताया उसी को अध्याय तेरह में क्षेत्रज्ञ १३/२ कहकर स्वयं से जीव की अभिन्नता कहते हैं । जीवत्व प्राप्ति का कारण संग बताते हैं जो नित्य अक्षर होकर भी इस बाहर भीतर से भिन्न भाव रखने वाली कूट प्रकृति में स्थित अर्थात कूटस्थ हो गया अतः अक्षर होकर भी क्षरण को प्राप्त होता सा दिख रहा है और सत् एवं असत योनियों में कीट से लेकर परमात्मा तक नाम धारण करता है । किन्तु जब संग का त्याग कर देता है तब वही ‘पुरुषः परः’ १३/२२ कहलाता है । उसी द्विविधा प्रकृति को जिसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ कहा गया है उसे ही यहाँ पर क्षर और कूटस्थ अक्षर यानी माया में स्थित पुरुष और जिसे माया यानी उपाधि से मुक्त पुरुषः परः १३/२२ कहा उसे यहाँ अन्य पुरुष यानी जो माया में बैठा पुरुष जैसा दिख रहा था वैसा न होकर स्वरूपतः अन्य ही है,  जिसको पुरुषोत्तम नाम से कहेंगे । जिस अव्यक्त की प्राप्ति देहाभिमानी के लिए अत्यंत दुःखद १२/५ बताया था उसी के देहाभिमान निवृत्ति के निमित्त अध्याय बारह में अधिकार भेद से साधन कहकर अध्याय तेरह और चौदह में गुणों, कार्य एवं विकारों सहित प्रकृति का एवं पुरुष के बंधन एवं मुक्ति के विभिन्न कारण एवं उपायों को बताते हुए अन्त में अपनी भक्ति और सेवा से तीनो गुणों को पार होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त होने की बात कही ।
              जन सामान्य शिष्टाचार वश कुछ बातें दबी जबान स्वीकार कर लेते हैं लेकिन अन्दर से बात पचती नहीं है और औषधि के रूप में पूछ भी नहीं सकते । यही हाल गुरु के सामने साधक का भी होता है, अतः इसी बात का ध्यान रखते हुए ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ १४/२७ में संपूर्ण जगत को अपने से अभिन्नता बताते हैं । बात समाप्त हो गई । संभवतः अर्जुन के अन्दर अब कोई प्रश्न शेष न रहा हो अतः मौन हो गया किन्तु अध्याय सात से लेकर अध्याय चौदह तक जो ज्ञान विज्ञान की प्रतिज्ञा की थी वह विवरण बहुत लंबा हो गया, अतः भगवान अपनी अहैतुकी कृपा से स्वयं अध्याय सात से चौदह तक दिये गये विवरण का सारभूत उपदेश संक्षेप से यहाँ पर करने के लिए उद्यत हुए हैं, बल्कि हम यह कहेंगे कि दूसरे अध्याय से यहां तक का सार भाव बता रहे हैं क्योंकि जिन  विषयी पुरुषों की बुद्धि विषयों द्वारा हर ली गई उनके लिए वेदों को दिखाऊ फूल २/४२, कामरूप २/४३, तीनो गुणों का विषय २/४५ बताया था, उन्हीं वेदों का विषय की प्रधान से यहां अध्याय प्रारंभ किया जा रहा है । यहाँ एक बात और ध्यान रखने की है कि अर्जुन का प्रश्न भी नहीं है और वर्णन संसार वृक्ष से प्रारंभ करते हैं जिनका संपूर्ण गीता में अर्जुन के किसी भी प्रश्न से कोई मेल नहीं खाता है । इससे भगवान की कृपा की अनुभूति की जा सकती है कि जीव कितना भी ज्ञानी क्यों न हो जाये ? कितने भी प्रश्नों की झड़ी लगा दे किन्तु जीवन की गुत्थी जिन सरल सूत्रों से हल हो सकती है उन पर उसका ध्यान ही नहीं जाता, वह तो गुरु या ईश्वर स्वयं ही कृपा करके अन्त में जब जीव का सभी ज्ञान एक सीमा में जाकर विश्राम करने लगता है तब वे वह ज्ञान देते हैं जो संपूर्ण ज्ञान का सार और जीवन का अन्तिम लक्ष्य होता है । उसी सरलता के लिए पहले संसार की स्थिति समझना आवश्यक है, क्योंकि बिना किसी वस्तु को पहचाने उसका न त्याग हो सकता है, न ही ग्रहण किया जा सकता है इसलिए— तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥ इसीलिये पहले संसार वृक्ष का वर्णन करते हैं……
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१५/१॥
          शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले— ऊपर की ओर जड़ वाला एवं नीचे की ओर शाखा वाला अश्वत्थ नामक अव्यय संसार वृक्ष है जिसके पत्ते वेद हैं इस प्रकार जो जानता है वही वेदवित् है ।
          तात्पर्यार्थ— ऊपर की जड़ वाला यह संसार है । बड़ी विचित्र बात है । जड़ अर्थात वृक्ष का जहाँ से उत्पति और पालन होता है वह मायोपाधिक हिरण्यगर्भ अत्यन्त सूक्ष्म मन बुद्धि से परे होने के कारण सबका मूल और सबसे ऊपर है यानी परे है,  उसी से संपूर्ण संसार का संरक्षण और ऊर्जा प्राप्त हो रही है । इसकी शाखा नीचे का मतलब उस परमेश्वर से नीचे सभी लोक आते हैं । लोक यानी उनमें रहने वाले मानस शरीर वाले ब्रह्म से लेकर स्तंब पर्यंत सभी शाखाएँ हैं ऐसा यह संसार नाम का अश्वत्थ वृक्ष है । ‘अ’ माने नहीं ‘श्व’ माने कल ‘त्थ’ माने स्थिर अर्थात जो आज तो है लेकिन कल नहीं रहेगा वह अश्वत्थ वृक्ष है । यह अव्यय अर्थात निरंतर इसका प्रवाह चलता रहता यानी बदलता रहता है । जैसे बारामासी नदी का प्रवाह कभी बंद नहीं होता, वैसे ही इस संसार रूप वृक्ष का अविरल प्रवाह अर्थात परिवर्तन कभी रुकता नहीं है । इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि तीसरे श्लोक में ‘न रूपमस्येह तथोपलभ्यते’ भी कहा है हम विवरण वहीं देंगे अतः अव्यय का अर्थ कभी नाश न होने वाला न मानकर अविरल धारावत् जन्म मरण रूप परिवर्तन मानना चाहिए । वेद इसके पत्ते कहे गये ह़ै । जिस प्रकार संसार का परिवर्तन कभी रुकता नहीं है उसी प्रकार इसके पत्ते हैं । पत्तों से ही वृक्ष का पोषण होता है और पत्ते कभी स्थिर नहीं होते । कभी जब आपको लगे कि हवा बिल्कुल थम गई है और लगे कि वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिल रहे हैं तब जाकर देखिये पीपल के वृक्ष को उसके पत्ते उस समय भी हिलते हुए मिलेंगे । इसीलिए यहां पीपल वृक्ष का वर्णन किया गया है कि वेद कर्मकांड में उलझाकर नये नये प्रलोभन लेकर कभी भी स्थिर यानी शान्त नहीं होने देते । 
               ऐसी कामना वाले के लिए ही कहा गया है ‘समाधौ न विधीयते’ २/४४ अर्थात एक क्षण के लिए वेदोक्त सकाम फलासक्त स्थिर नहीं रह सकता है अतः वे वेद निरंतर परिवर्तित होने वाले संसार के अव्यय अर्थात अवरिल हिलते हुए पत्ते हैं । ऐसा कहा गया है । अर्थात ऋषिभिर्बहुधा गीतं छंदोभिर्विविधैः पृथक् १३/४ यहाँ विद्वत्वृन्द एक और व्याख्या करते हैं छादति इति छन्दांसि अर्थात जो छादन करे अर्थात जो मूलस्वरूप को ढक दे उसे छन्दांसि कहते हैं । वेदों ने कर्माकाण्ड और भोग प्रवृत्ति का इतना वर्णन कर दिया कि वेदों का मूलभाव भी ढक गया । जीव का स्वरूप क्या है यह वेदों में वर्णित लोक परलोक की कामनाओं से ढक गया है । यह कार्य अविरल चल रहा है । इस प्रकार वेदो के तात्पर्य अर्थात रहस्य को जो जान लेता है वही वेदवित् अर्थात वेदों के तत्त्व को जानता है अर्थात वह जान लेता है कि संसार आज है कल का भरोसा नहीं, वेदों ने हमारे स्वरूप को कामनाओं से ढक दिया है । काम्यकर्मों से प्राप्त कर्मफल हिलते हुए पीपल के पत्ते के समान हैं, वे कब नष्ट हो जायें पता भी नहीं चलेगा । ऐसा जो जान लेता है वही वेद को जानने वाला है । यद्यपि इसका भाव स्पष्ट है कि ऐसा जानकर आत्मतत्त्व में स्थित होकर मोक्ष प्राप्त कर लेगा तथापि यहाँ विवरण क्रमशः भगवान के पीछे पीछे चलना ही ठीक है ।
             इसको हम इस प्रकार देख सकते हैं कि यह शरीर जन्म मृत्यु की अविरल धारा में प्रवाहित हो रहा है यदि यह स्वरूप को जानकर मुक्त नहीं होता है तो अव्यय रूप से चलता आया है और चलता रहेगा । इस शरीर का पालन करने वाला शिर है । सभी निर्णय शरीर के संरक्षण के विषय में शिर ही लेता है । हाथ, पांव एवं शरीर में रहने वाले सूक्ष्म कीटणु आदि ही शाखाएं हैं अथवा पंचमहाभूत और उनके पाचों विषय ही पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ही क्रमशः शाखाएं हैं, अन्तःकरण चतुष्टय ही पत्ते हैं जो कभी स्थिर नहीं होते अविरल चलायमान रहते हैं इस प्रकार जो जानता है वास्तव में वही वेद को जानने वाला है ।
              भाव यह है कि यह रूपक संसार को तत्त्वतः सझकर मन में वैराग्य अपना घर बना ले, संसार से उदासीनता हो जाये इतना ही इसका तात्पर्य है ।
          अथवा अध्याय ११ के अन्तिम दो श्लोक अध्याय १२-१३ के हेतु बने । अध्याय १२ के पांचवें श्लोक में अजितेन्द्रिय देहाभिमानी के अव्यक्तोपासना में अव्यक्त की अप्राप्ति बताया, जिसका विवेचन अध्याय १४ में किया गया । अन्त में त्रिगुणातीत होने का उपाय सगुणोपासना के द्वारा आत्मनिष्ठा से बताते हुए अन्त में ब्रह्म आदि की प्रतिष्ठा अहं के अर्थ में सुनिश्चित करके अस्ति पद का प्रतिपादन किया । चूंकि अव्यक्त की उपासना के सभी अधिकारी नहीं होते हैं । इसलिए अव्यक्त में स्थिति कैसे बने ? यह समझाने के लिए इस रूपक का वर्णन किया है ।
            ऊपर की जड़ वाले अर्थात संसार वृक्ष का कारण मायोपाधिक हिरण्यगर्भ है । वह संसार वृक्ष का जो अश्वत्थ अर्थात जो कल तक भी नहीं रहने वाला है, ऐसे अविनशी संसार वृक्ष की जड़ है । जिसके पत्ते वेद अर्थात काम्यकर्मों का वर्णन करने वाली जगत रूप वृक्ष के रक्षक पत्ते रूप में कहे गये हैं । इस प्रकार जो संसार वृक्ष के स्वरूप को जानता है वही तत्त्वतः जानता है अर्थात वह सर्वज्ञ हो जाता है ।
          यहां शंका हो सकती है कि जो अश्वत्थ है अर्थात जो कल तक स्थित रहने वाला नहीं है उसको अविनाशी क्यों कहा ? इसका उत्तर यह है कि अविनाशी इसलिए कहा कि संसार अनादि काल से चला आ रहा है इसके प्राकट्य का कोई प्रमाण नहीं है कि कब उत्पन्न हुआ ? और कब तक चलेगा ? यह भी पता नहीं है, इसलिए अविनाशी है लेकिन जिस समय इसके मूल का ज्ञान हो जाता है उसी समय यह संसार नष्ट हो जाता है । अर्थात जब तक स्वरूप ज्ञान नहीं होता है तब तक अन्य किसी उपाय से नष्ट न होने का कारण अविनाशी है और जिस समय स्वरूप का ज्ञान हो जायेगा उसी समय नष्ट हो जायेगा इसी अनिश्चितता के कारण अश्वत्थ कहा, यही इसका भाव है ।
           यहाँ पर हम पुनर्विचार करेंगे । कुछ लोग ऊर्ध्वमूल का अर्थ परमात्मा करते हैं तो उनके अनुसार जैसे वृक्ष की जड़ का भी नाश देखा गया है वैसे ही संसार के नाश से परमात्मा के नाश का भी भय उपस्थित हो जायेगा । तो इसका उत्तर यह है कि जहाँ भी सृष्टि क्रम होगा वहां भी परमात्मा का अर्थ हिरण्यगर्भ ही लेना चाहिए अन्यथा श्रुति विरोध होगा ।
            आचर्य शंकर ने कठोपनिषद में ऊर्ध्वमूल का अर्थ किया है ऊर्ध्व है मूल में जिसका वह । ऊर्ध्व का अर्थ विष्णु का परमपद किया है― यहाँ पर यह भी समझ लेना आवश्यक है कि परमपद विष्णु से भिन्न नहीं बल्कि निर्विशेष लक्ष्य को लक्षित कराने के लिए परम पद कहा है । जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से भिन्न नहीं है बल्कि सूर्य ही प्रकाश और प्रकाश ही सूर्य है । ऐसे विष्णु ही वह पद अर्थात स्वरूप जिसे निर्विशेष ब्रह्म नाम से जाना जाता है । यदि साकार सविषेश विष्णु मानते हैं तो अध्याय ७/३० में जो तामस, राजस और सात्त्विक स्वरूप में क्रमशः अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जिस माम् की बात कही उसका विरोध उत्पन्न होगा । अध्याय आठ में कृष्ण ने कहा अधियज्ञ मैं हूँ और यदि कृष्ण ही अधियज्ञ हैं तो अलग से वहां माम् को लक्षित क्यों किया ? अर्थात उन तीनो के सहित जो मृत्युकाल में भी मुझे जान लेता है वह परम पद प्राप्त करता है । इसका अर्थ यह हुआ कि यह माम् ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और ब्रह्मा का भी कारण विष्णु से भिन्न निर्विशेष ब्रह्म है । अतः यह जो माम् का अर्थ वहां पर कहा गया है वही यहाँ आचार्य जी ने विष्णु पद से कहा है, अतः यह सुनिश्चित हो गया कि विष्णु का अर्थ निर्विशेष ब्रह्म ही है । अतः अर्थ यह हुआ कि निर्विशेष ब्रह्म है जिसके मूल में वह मायोपाधिक हिरण्यगर्भ । गीता में भी ऊर्ध्वमूल का अर्थ मायोपाधिक हिरण्गर्भ ही किया है ।
           अब ऊर्ध्व और मूल का अन्वेषण गीता में करते हैं― अध्याय १४/३ में कृष्ण कहते हैं कि जिससे संपूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं उस संसार की कारणभूता विस्तार करने वाली महत् प्रकृति का गर्भाधान मैं करता हूँ । फिर कहते हैं― जिससे संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है वही प्रकृति मेरी योनि है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ । गर्भाधान कोई सामान्य स्त्री-पुरुष संसर्ग की तरह तो होता नहीं है । जड़ प्रकृति पर चिद्प्रकाश का पड़ना ही गर्भाधान है और यही गर्भ यानी बीज हिरण्गर्भ गर्भ संपूर्ण जगत को उत्पन्न करने वाला सबका कारण है । यह गीता ही सुनिश्चित कर देती है कि ऊर्ध्व अर्थ ब्रह्म है जिसका मूल हिरण्गर्भ । यह समष्टि व्याख्या है ।
           अब व्यष्टि में देखिए― चैतन्य आत्मा का प्रकाश बुद्धि पर पड़ा जिससे अहं की उत्पत्ति होती और इस अहं के उत्पन्न होते ही त्वम् की उत्पत्ति स्वतः हो जाती है । इसके बाद अहं त्वम् को धारण करने वाले सूक्ष्म विषय और उसके बाद उन विषयों को ग्रहण वाली इन्द्रियां और उसके बाद कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं । इस प्रकार संसार बुद्धि और उससे उत्पन्न अहं के संयोग से सृष्टि क्रम चल पड़ा, यही बुद्धि का अहं के साथ संयोग ही कारण शरीर है, इन्द्रियों का समूह सूक्ष्म शरीर है और उन कारण और सूक्ष्म शरीर के रहने का स्थान स्थूल शरीर है । स्थूल शरीर के नष्ट होने पर कारण शरीर सहित सूक्ष्म शरीर होता है जिसे हम स्वप्न के माध्यम और सूक्ष्म शरीर के नाश होने पर कारण शरीर शेष रहता है जिसे हम सुषुप्ति में अनुभव करते हैं । यही बुद्धि समष्टि में महत् यानी प्रकृति कहलाती है और इसमें पड़ने वाले चित्प्रकाश से अहं की उत्पत्ति होती है और यही महत् प्रकृति और समष्टि अहं मिलकर संपूर्ण जगत का कारण हिरण्गर्भ कहलाता है । जैसै व्यष्टि में कारण शरीर का नाश होता है वैसे ही समष्टि प्रलय में जगत का कारण हिरण्गर्भ का नाश होता है ।
           भावार्थ — इस प्रकार परम प्रकाश निष्क्रिय ब्रह्म या जिसे व्यष्टि में आत्मा कहते हैं वह हिरण्गर्भ नामक कारण शरीर से लेकर स्थूल शरीर पर्यंत संपूर्ण जड़ चेतन जगत जिसकी (कारण शरीर रूप)  जड़, सूक्ष्म शरीर संपूर्ण इन्द्रियां शाखाएं, एवं काम्यकर्म का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियाँ ही जिसका पालन करने वाली हैं वे ही इस संसार वृक्ष के पत्ते हैं ऐसा जो समष्टि, व्यष्टि रूप से जो जानता है वही तत्त्वतः जानता है यह भाव है ॥१॥

               संबंध— संसार वृक्ष का पुनः दूसरे प्रकार से वर्णन……
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबधीनि मनुष्य लोके ॥१५/२॥
              शब्दार्थ— संसार वृक्ष की शाखाएं ऊपर और नीचे की ओर फैली है गुणों से बढ़ने वाले विषय ही इसकी कोपलें हैं । मनुष्य को कर्मों से बांधने वाली जड़े नीचे की ओर व्याप्त हैं ।
              तात्पर्यार्थ— पहले श्लोक में ऊपर जड़ और नीचे शाखाएं बताया और अब यहां बीच में वृक्ष है और जड़े ऊपर नीचे हैं । पहले मे मूल एकवचन है अर्थात समष्टि जगत का मूल एक मात्र ब्रह्म है जहाँ से संपूर्ण जगत को सत्ता मिल रही है और यहां मूलानि बहुवचन है अर्थात यहां एक नहीं अनन्त जड़े हैं । समष्टि में चार वेद ही पत्ते हैं अर्थात संसार के पोषणार्थ व्यवस्था देने वाले चार वेद हैं तो यहाँ विषयप्रवालाः अर्थात नई और आकर्षक अनन्त कोपलें हैं । पत्ते कड़क होते हैं और स्पर्श और खाने में आनन्ददायी होते हैं । इस प्रकार पहले समष्टि में और अब व्यष्टि में वर्णन कर रहे हैं । समष्टि में सबका मूल परमात्मा है तो व्यष्टि में मायोपाधिक जीव । 
           हम मध्यलोक में हैं और यहीं से गणना नीचे के सप्तलोक और पृथ्वी के अतिरिक्त ऊपर सत्यलोक पर्यंत छः लोक । दूसरे भाव से गति रूप में देखें तो ऊपर का अर्थ पुण्यात्मा देवयोनि और नीचे में पापत्मा पशु, पक्षी, वृक्ष, सर्प आदि । और अन्य भाव से गति के अर्थ में देखें ऊर्ध्व मतलब देव और पितृमार्ग और नीचे का अर्थ अत्यंत पापयोनि और स्थान विशेष । यही मध्य में स्थित कर्मों में बंधे हुए मनुष्य की राग द्वेष काम क्रोध आदि नीचे की ओर जाने वाली जड़ें अर्थात पतन का मार्ग है । यहां पर कर्मों से बंधी जड़ों का नीचे कहने का मतलब है कि इस निम्न लोक पृथ्वी पर ही कर्म का अधिकार है ऊपर के लोकों में नहीं । जो जड़े ऊपर की ओर गई हैं वे यज्ञ, दान, तप आदि कर्मरूप बंधे हुए मनुुष्य की ऊपर की ओर जाने वाली जड़ें हैं । ये जड़े संपूर्ण लोकों में व्याप्त हैं । गुण यानी सत्व रज और तम यही तीनो गुण ही इस संसार वृक्ष का जल है जिसको पाकर वृद्धि करते हैं । अर्थात ‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ १३/२१ अर्थात इन गुणों की संगति के कारण ही मनुुष्य गेंद की तरह ऊपर नीचे, इधर उधर पटक दिया जाता है । कभी पशु, पक्षी, वृक्ष, सर्पादि तमोगुण से पोषित होने के कारण, तो सत्त्वगुण पोषित होकर नाना प्रकार की देवयोनियों में, तो रजोगुण पोषित होकर मनुष्यों में भी नाना प्रकार की योनियों में डाल दिया जाता है इस प्रकार प्रवृद्धा यानी एक शरीर से दूसरे की प्राप्ति रूप संसार की वृद्धि होती रहती है । इस संसार अर्थात शरीर रूप वृक्ष को जीवित रखने के लिए श्वास अर्थात ऊर्जा की भी आवश्यकता है, उसके लिए पतझड़ के बाद कोपलें वृक्ष में निकलती हैं जिनमें कुछ पत्ते छोटे छोटे और लाल लाल निकल चुके होते हैं और कुछ बंद होते हैं तथा डंठल सहित लाल होते हैं । देखने में बड़े सुन्दर लगते हैं स्पर्श में देखने में भी आनन्द और अधिकारी प्राणी को खाने में भी आनन्द । डंठल यानी विषय संबंधित मन में उठने वाली वृत्ति और पत्ते विषयों का समाने उपस्थित होकर आकर्षित करके अपने में आसक्त बना लेना और बिना खिले पत्ते मतलब आगे शीघ्र प्राप्त होने वाले विषय । इस प्रकार रजोगुण प्रधान विषयी मनुष्य चौदहवें अध्याय में कहे गए गुणों द्वारा बंध जाता है । जो अपरिछिन्न आत्मा है वह परिच्छिन्न जीव हो जाता है । 
               यहाँ मुख्यतः इस रूपक के माध्यय से जो प्रकृति और गुणों का वर्णन तेरहवें और चौदहवें अध्याय में किया और वहीं पर जीव के बन्धन और मुक्ति की जो बात कही, वह ठीक से और अधिक समझ में आ जाये इसके लिए यह रूपक प्रस्तुत किया । हम जो पढ़ते हैं उतना ध्यान नहीं रहता है लेकिन जब उसी कहानी पर नाटक देखते हैं यो प्रत्येक बात ध्यान में रहती है । इसी प्रकार संपूर्ण व्याख्यान के बाद रूपक की भूमिका होती है । किसी भी समस्या का समाधान उसकी उत्पत्ति स्थान में ही छिपा होता है । जहाँ गांठ होगी वहीं खुलेगी । उसी प्रकार हम इस संसार में गुण, कर्म और उसकी फलासक्ति में बंधे हुए हैं अतः इसी संसार में कर्म का स्वरूप, गुणों का स्वरूप और फल की स्थिरता पर विचार करके उसका तत्त्वान्वेषण करके ही हम मुक्त हो सकते हैं । इसीलिए कर्म का तत्त्वान्वेषण चतुर्थ अध्याय में कराया गया । गुणों का चौदहवें अध्याय में, फल का परिणाम भी पीछे कराया है । उसका इस रूपक के माध्यम से स्मरण मात्र दिलाया जा रहा है ताकि हम अथाह संसार समुद्र की थाह पा सकें और उसे सहज में ही ज्ञान की नौका में बैठ कर पार हो सकें ।
          अगर कम शब्दों में कहें तो कर्मों से बंधे हुए― कर्म करने का एक मात्र मनुष्य का ही अधिकार है इसलिये मनुष्य लोक कहा । गुणों से संसार ऊपर नीचे बढ़ा है ? सदसद्योनिषु १३/२१ और अध्याय १४ में विस्तार से बताया गया है । इसकी दो ही जड़े हैं जो ऊपर नीचे सब ओर फैली हुई है, वे हैं पुण्य और पाप, जो इन तीनो गुणरूपी जल से बढ़ती हैं और विषय ही सुन्दर, कोमल, आकर्षक इसकी कोंपलें हैं । यह संसार वृक्ष का वर्णन हिरण्गर्भ से लेकर तृणपर्यंत नीचे की ओर का है । 
          भावार्थ― कर्मों के अनुसार पाप पुण्य होता है उसी से देव मनुष्य तिर्यगादि योनियों का विस्तार है । यह भावार्थ है ॥२॥

               संबंध— ऐसा क्यों कहा जा रहा है ? तो कहते हैं कि यह जैसा दिख रहा है वैसा है नहीं……
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥१५/३॥
               शब्दार्थ— इस संसार का जो रूप दिखता है वैसा विचार करने पर उपलब्ध नहीं होता, इसका न अन्त और न आदि तथा इसकी प्रतिष्ठा अर्थात स्थिरता भी नहीं दिखती । इस अश्वत्थ वृक्ष की जड़े अत्यन्त मजबूत हैं असंग रूपी शस्त्र द्वारा दृढतापूर्वक काटकर ।
             तात्पर्यार्थ— ऊपर जिस संसार का रूपक दिया गया है वैसा विचार करने नहीं दिखता । यहां रूपक स्थानीय यह विचार करते हैं कि संसार बहुत ही रमणीय दिखता है । मन को मोहित करने वाला । लगता है कि जीवन मात्र इन सुन्दर सुन्दर भोगों के लिए ही मिला है । धन है, पुत्र है, मान सम्मान है । सभी कुछ अपने अनुकूल यही तो स्वर्ग है । उपासना करो तो स्वर्गादि लोकों के दिव्य भोग भोगो इत्यादि जो हम रमणीय बुद्धि से देखते हैं तो तब तो सब ठीक दिखता है लेकिन जब विचार करो तब तो यह जो अभी अविचार पूर्वक सुन्दर देखा गया तो  मात्र दिखावा है, दिखाऊ फूल जैसी सुगंध और बंध्यापुत्र जैसा ही सुख देता । यह तो मात्र अविवेकी और मूढ़ पुरुष जिनका वर्णन पीछे अ.२/४२ से २/४४ तक किया गया है एवं अ.१६/४ से १६/२१ किया जायेगा उनके आकर्षण का केन्द्र है । वस्तुतः जब इसका विचार करने पर इसका आदि क्या है और कब हुआ यह भी पता नहीं चलता, और यह जगत कब तक चलेगा इस अन्त का भी पता नहीं चलता और आदि अन्त के मध्य जो वर्तमान है इसकी भी भलीभांति स्थिरता नहीं दिखाती । स्थिरता मध्य में भी क्यों नहीं दिखती ? इस पर कहते हैं कि यह संसार अश्वत्थ है अर्थात यह आज जो देखा गया वह कल तक भी स्थिर नहीं है तो और आगे क्या होगा ?  किन्तु इसकी वासनामयी जड़े अत्यंत मजबूत हो गई हैं । इसकी जड़ें काटनी पड़ेंगी । अतः शस्त्र चाहिए । इस पर कहते हैं असंग रूपी शस्त्र लो और दृढतापूर्वक काटकर— अर्थात लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा की इच्छा का त्याग कर दे, और दृढतापूर्वक त्याग कर दे । यह मत सोच कि ये मेरे पुत्रादि हैं ये मेरी पत्नी है । तुरंत अभी इसी समय त्याग दे । प्रश्न होगा कि ठीक है त्याग दूंगा लेकिन आज थोड़ा पुत्र पत्नी आदि के प्रति कुछ कर्तव्य शेष रह गया है अतः उसे पूरा करके कल त्याग दूंगा, इस पर कहते हैं अश्वत्थ अर्थात तुमने कल तक कैसे जान लिया कि रहेगा ? वह कल तक रहने वाला नहीं है इसलिये जो भी करना है उसे आज ही करो । बिलंब न करो । 
         अथवा यह तो सबके अनुभव का विषय है कि संसार जितना आकर्षक दिखता है उतना है नहीं अन्त में दुःख ही इसका परिणाम होता है । अनादि काल से इसी प्रकार चला आ रहा है और अनादि काल तक चलता रहेगा । तथापि इसकी कोई स्थिरता भी नहीं है कि कल तक रहेगा भी या नहीं । इस लिए असंग रूप शास्त्र पाप-पुण्य रूप जड़ो को अत्यंत दृढतापूर्वक काट देना चाहिए । असंग रूपी शास्त्र का मतलब है ‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसङ्गोऽस्य…..’१३/२१ अर्थात पुरुष तो सदैव मुक्त ही है वह प्रकृति में बैठ गया है जिसका कारण है उसके गुण । गुणों के लोभ से प्रकृति का आश्रय ले लिया और बंध गया । 
             आज भी संसार का नियम है कि आपके पास अगर कंचन और कामिनी है तो चार यार आपके दरवाजे पर हमेशा आपके चरणों की धूल चाटने आयेंगे और यदि इनमें से एक भी नहीं है तो मरते समय मुंह में पानी भी कोई डालने वाला नहीं दिखेगा । इसी प्रकार यह मुक्त पुरुष प्रकृति के गुणों की ओर खिंच गया तो प्रकृति ने इसे बंधक बनाकर जन्म-मृत्यु नामक संसार रूप जेल में ठूंस दिया । अतः यह यदि पुनः निश्चण करके गुणों की संगति छोड़ दे इस संसार की जड़ें ही नष्ट हो जायेंगी । जड़ें नष्ट हुईं तो वृक्ष स्वतः सूख जायेगा ।
              भावार्थ— हम इस उधेड़ बुन में लगे रहते हैं कि अभी तो सारा जीवन पड़ा है । हमारे जीवन में अभी बहुत कर्तव्य हैं उनको पूरा करके बुढापे में साधु बन जायेंगे और खूब भजन करेंगे लेकिन कल का क्या भरोसा ? जो करना है आज ही करो । जिस समय वैराग्य हो जाये उसी समय संन्यास ग्राहण कर लेना चाहिए । भगवान बुद्ध एक नवजात बालक सहित पत्नी का त्याग करके भिक्षु बन गये थे और आज वे संसार के आदर्श और मार्गदर्शक माने जाते हैं । अतः त्याग करने के समय वैराग्य का बल होना चाहिए । वैराग्य क्षणिक नहीं होना चाहिए । आत्मा से बढकर कोई किसी का प्रिय नहीं होता है । जिसने जीते जी आत्मा की प्राप्ति नहीं की या अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न नहीं किया वह आत्महत्यारा है । अतः शास्त्र तत्काल इस संसारासक्ति (ऐषणात्रय) का त्याग करके आगे बढ जाने की अनुमति देता है ॥३॥

               संबंध— जब संसार वृक्ष की जड़ें काट देगा उसके पश्चात……
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥१५/४॥
             शब्दार्थ— उस पद की खोजकरे जिस जिस मार्ग में जाकर पुनः वापस नहीं होता । जिससे अनादिकालिक  प्रवृत्ति का विस्तार हुआ है उस आदि पुरुष की शरण ग्रहण करे ।
            तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में संग रहित होने के पश्चात तुरन्त— मतलब संसार में दोष देखने के साथ ही वैराग्य पूर्वक उस परमतत्त्व की भी खोज करना जिसे प्राप्त करके संसार बंधन से मुक्ति हमेशा हमेशा के लिए मिल जाये । उस मार्ग की खोज करना जिस मार्ग पर जाकर पुनः मनुष्य वापस नहीं होता । मार्ग कोई भी हो जाने का मार्ग होगा तो वापस भी उसी मार्ग से आना संभव है लेकिन जिस मार्ग पर जाकर वापस ही नहीं होगा, इसका मतलब है कहीं जाना ही नहीं ठूंठ की तरह बैठे रहना है । अर्थात उस स्थिर भाव में स्थिर हो जाना, जिस स्थिरता के बाद कोई स्थिरता शेष ही नहीं बचती है । इसी को कहा ‘एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति’ २/७२  अर्थात यही वह परम स्थिर यानी शान्त पद है जिसके बाद कोई मोह को प्राप्त नहीं होता अर्थात कभी अशान्त नहीं होता क्योंकि जैसे चारों ओर से वर्षा के जल से परिपूर्ण उमड़ती हुई नदियाँ समुद्र में जाकर शान्त हो जाती हैं वैसे ही संपूर्ण कामनाएं जिसमें शान्त होकर तद्रूप हो जायें वही शान्त पद है २/७१ । वही यहां कहते हैं कि जिसकी प्राप्ति के पश्चात जन्म ही न हो तो मरण कैसे होगा ? अतः जाना क्रियात्मक अध्यारोप है । वह आत्मा सर्वगत अर्थात व्यापक है वह कहीं जाता नहीं है तथापि जैसे कोई रात्रि में नाव पर बैठकर नदी को पार करने के लिए रात भर नौका चलाता है और सुबह होने पर पता चलता है कि वह नौका तो खूंटे से बंधी है अर्थात कहीं गया ही नहीं । इसी प्रकार मोह अर्थात अज्ञान में जाना भी होता है और आना भी । वह ज्ञान दशा है और यह अज्ञान दशा । 
            अतः उस की प्राप्ति का मार्ग खोजे । इसका अर्थ सर्वकर्मसंन्यास पूर्वक भिक्षाचरण करने वाला संन्यासी होकर गुरू की शरण में जाकर आचार्य की सेवा सहित श्रवण मनन निध्यासन करके उस परम तत्त्व को जाने “तद्विद्धि प्रणिपातेन ४/३४, आचार्योपासनं शौचं” १३/७ इत्यादि ।
            अब कहते हैं कि जिससे अनादि प्रवृत्ति अर्थात कर्म विषयक गुणों का विस्तार हुआ है ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्’ १८/४६ संपूर्ण प्राणियों में जिससे कर्म की प्रवृति उत्पन्न होती है उस आदि पुरुष की शरण ग्रहण कर । यहां शंका हो सकती है कि जिसका आदि होता है उसका भी कोई आदि होगा और आदि वाला होगा तो अन्तवाला भी होगा ? इस पर पहले श्लोक में ही कह दिया कि जो इस संसार वृक्ष का मूल है, इसका मतलब संसार का तो मूल है किन्तु संसार के मूल का कोई मूल नहीं है अर्थात वह संसार का आदि होने के कारण ही आदि पुरुष कहा गया है । अहमादिर्हि देवानां १०/२ यहां भी देवादि का आदि कहा मतलब उसका कोई आदि नहीं किन्तु जो संपूर्ण जगत का आदि पुरुष है उसकी शरण ग्रहण करो । समष्टि के बाद व्यष्टि में देखिए । संकल्प विकल्प का आदि मन और मन का भी आदि बुद्धि और बुद्धि का आदि चित्त यानी मायोपाधिक विराट जिस परदे या भूमि पर सारे चित्र प्रकाशित हो रहे हैं । वह मायोपाधिक चित्त यानी विराट भी जिस प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है वह है असंग पुरुष आत्मा जिसे भगवान ने क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि १३/२, पुरुषः परः १३/२२ कहा था और आगे पुरुषोत्तम कहेंगे । उसी को अध्याय चौदह में त्रिगुणातीत कहा । अतः यही आत्मा इस जगत का आदि है और उसकी ही शरण गुरु एवं शास्त्रों से जानकर ग्रहण करना चाहिए और वह निरुपाधिक आत्मा सर्वत्र है, नित्य प्राप्त है मात्र विस्मृति हो गई है, अतः स्मृति की आवश्यकता है । स्मृति प्राप्त करने के लिए ही सारे उपाय किये गये हैं । अर्जन संपूर्ण गीता सुनने के बाद कहता है— ‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा’ १८/७३ अर्थात मोह नष्ट हो गया और स्मृति प्राप्त कर ली । देखिए जब तक मोह रहा तब तक सदसद् विवेक नहीं हो सका और बाहर ही परमेश्वर को खोजता रहा । कभी विराट रूप दिखाओ, तो कभी चतुर्भुज दिखाओ, तो कभी द्विभुज मेरे सारथी बनो । अब जब मोह नष्ट हो गया तब यह नहीं कहता है कि हे परमेश्वर मैने तुम्हें पा लिया है, बल्कि कहता है स्मृतिर्लब्धा अर्थात स्मृति प्राप्त कर ली है, याद आ गया है । इससे यह स्पष्ट है कि परमतत्त्व नित्य प्राप्त है किन्तु विस्मृति हो गई है मोह रूपी मदिरा पीकर, अब उसका नशा उतारने का प्रयास चल रहा है और जब नशा उतर जायेगा तब पता चलेगा कि हमने व्यर्थ इतना परिश्रम किया वह तो नित्य प्राप्त है । वह आत्मस्वरूप ही है भिन्न नहीं । अतः मोह रूपी मदिरा को उतारने के मायोपाधिक सगुण ब्रह्म रूपी औषधि की शरण ग्रहण करना चाहिए ।
           अथवा यह विषय बड़ा ही मार्मिक है संसार वृक्ष के रूप का ज्ञान ही तत्त्वतः परमार्थ स्वरूप का ज्ञान करा देता है । उसका ज्ञान हो जाने पर संसार वृक्ष की जड़े असंग रूपी शस्त्र से काटना है । जड़ें यहां दो प्रकार की कही गई हैं, एक पाप और पुण्य रूप और दूसरी इस जगत का मूल कारण हिरण्गर्भ । यह हिरण्गर्भ ही हमारा कारण शरीर है जो बुद्धि और उसमें पड़ने वाले चैतन्य प्रकाश के संयोग से स्फुरित होने वाला अहं है । जब अहं का स्फुरण बुद्धि से अगल हो जायेगा तब बुद्धि का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा । अर्थात तब कारण शरीर भी नष्ट हो जायेगा और ‘अहं’ स्वरूपगत होकर मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी । यही वह पद है जिसको प्राप्त करके कोई वापस संसार में नहीं आता । 
           जैसे स्थूल मनुष्यादि लोक और सूक्ष्म स्वर्गादि लोकों का मूल कारण और यहाँ रहने वाले प्राणियों की अपेक्षा इस समष्टि जगत से मुक्त पुरुष हिरण्गर्भ है, उसी प्रकार व्यष्टि में स्थूल और सूक्ष्म शरीर की अपेक्षा सबको व्याप्त करके स्थित जो बुद्धि में स्फुरित होने वाला चैतन्य अहं के सहित जो कारण शरीर है वह भी मुक्त पुरुष है । यह बात यहीं मन में बैठा कर रखना चाहिए जिससे कि सोलहवें श्लोक में अक्षर पुरुष का अर्थ मुक्त पुरुष या कारण शरीर कहने पर भ्रम उत्पन्न न हो ।
        यहाँ हम अध्याय तीन का अवलोकन करते हैं― “इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥”३/४२ अर्थात शरीर से परे इन्द्रियां, इन्द्रियों से परे मन और मन से परे बुद्धि एवं बुद्धि परे आत्मा है । बुद्धि कारण शरीर है यही सबसे ऊपर, इससे नीचे सभी शाखाएं हैं, किन्तु आत्मा तो बुद्धि का भी अधिष्ठान है अतः आत्मा में स्थित होने पर ही बुद्धि का विलय आत्मरूपता में हो जाता है तो अन्य संसार बचेगा ही कहाँ ? इसी प्रकार यहाँ पर कहा कि हमें उस आदि पुरुष की शरण लेनी है जिसके सान्निध्य मात्र से कारण अर्थात बुद्धि की चेष्टा विस्तार को प्राप्त हुई है । वही आदि पुरुष व्यष्टि में आत्मा और समष्टि में परमात्मा कहा जाता है । वस्तुतः ‘पर’ भी संसार जिस स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को ही आत्मा मान लेता है, उससे व्यापक आत्मा की विलक्षणता दिखाने के लिए ही पर शब्द का प्रयोग किया गया है । यह आत्मा ही पुराणपुरुष है और इसी की शरण ग्रहण करना चाहिए । “आत्मन्येवात्मा तुष्टः २/५५, यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ३/१७, आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्” ६/२५ यही आदि पुरुष की शरण लेने का तात्पर्य है कि बुद्धि में प्रतिफलित सीमित अहंता का विनियोग व्यापक अहंता में करके उसी व्यापक अहंता में निर्विकार रूप से स्थित होना ही उस मार्ग की खोज है, जहाँ जाकर पुनः इस अशुभ संसार का मुख नहीं देखना पड़ता है ।
          भावार्थ― एकनिष्ठ आत्मभाव में स्थित होना ही संसार रूपी वृक्ष की जड़ें काटना है ॥४॥

              संबंध— परम पद को प्राप्त करने के लिए उस आदि पुरुष की शरण कैसे ग्राहण करे ? यह बता रहे हैं……
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्तः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा पदमव्ययं तत् ॥१५/५॥
             शब्दार्थ— मान और मोह से रहित होकर, संग के दोष को जीतकर, नित्य अध्यात्म अर्थात आत्मा और परमात्मा से संबंधित विषयों का आचार्य, श्रुति, शास्त्र का विचार करते हुए, लौकिक, पारलौकिक कामनाओं से भलीभाँति मुक्त,  सुख-दुःख नामक द्वन्दों से मुक्त होकर विद्वान उस अव्यय पद को प्राप्त करता है ।
                तात्पर्यार्थ— मान अर्थात रजोगुण से उत्पन्न मैं ज्ञानी हूँ, धनी हूँ, मैं ब्राह्मण, संन्यासी आदि हूँ इनके प्रति जो आदर भाव है देहाध्यास है उसका अहंकार न होना, मोह यानी तमोगुण का उपलक्षण अज्ञान का न होना । अर्थात विनम्रतापूर्वक संसार के वास्तविक स्वरूप को जानना ही बाह्यवृत्ति ज्ञान है, इससे रहित मूढ यानी मोह कहा जाता है । इस प्रकार ज्ञान पूर्वक विनम्र अर्थात सहज भाव से संसार का विचार करके उसके प्रति उपरामता ही मान और मोह से रहित होना है संसार से उपराम होने के बाद भी मन में सूक्ष्म कामनाएं बनी रहती हैं उनका निवारण करना चाहिए उसके लिए तो हमें ईश्वर की शरण लेनी चाहिए जिसे पूर्व श्लोक में आदि पुरुष और पूर्व अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में कहा गया है । संसार से यानी बाह्य आसक्ति हमें छोड़नी होगी और आन्तरिक यानी सूक्ष्म आसक्ति ईश्वर की कृपा से जायेगी । इसके बाद ही हमारी प्रवृत्ति अध्यात्म में बनेगी । अध्यात्म का अर्थ है जो साधन हमारे स्वरूप का ज्ञान करा दें, आत्मसाक्षात्कार करा दें वह साधन अध्यात्म नाम से कहे गये हैं । अध्याय तेरह में अमानित्वादि साधन इसी कोटि में आते हैं । यह आत्मसाक्षात्कार कराने वाले साधनों का नित्य अनुष्ठान करना चाहिए जिसमें आचार्य एवं श्रुति शास्त्र द्वारा श्रवण मनन निदिध्यासन भी कहे गये हैं । तात्पर्य यह है कि नित्य आत्मानुसंधान करना चाहिए, यही आत्मनिष्ठा है जिसमें अनवरत प्रयत्न पूर्वक स्थिर रहना ही अध्यात्मनिष्ठा है । अब देखो पहले कहा कि उस आदि पुरुष की शरण लो और यहां कहते हैं कि नित्य आत्मानुसंधान करो । इसी प्रकार पूर्व अध्याय में बात करते हैं अपनी अर्थात सविशेष ब्रह्म की उपासना की और फल बताते हैं ब्रह्म की प्राप्ति की और ब्रह्म का लक्षण किया ‘अनादिमत्परं ब्रह्म’ १३/१२ अर्थात प्रत्यागात्मा ही ब्रह्म है । यह विशेष विज्ञान है बिना ईश्वर और गुरु की कृपा के समझ में आने वाला नहीं । 
             मतलब यह है कि ईश्वर यानी तत् पदार्थ लक्ष्यार्थ ब्रह्म का ‘त्वं’ पदार्थ लक्ष्यार्थ आत्मा के रूप में ध्यान करो । क्योंकि अशेष संसार की प्रतिष्ठा उसी एक मात्र आत्मा में प्रतिष्ठत है भिन्न नहीं है । यहाँ पर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति दिख रही है किन्तु वस्तु सत्य यह है कि जैसे अग्नि में भिन्न भिन्न प्रकार की लकड़ियां जलने पर बची राख में कौन राख किस लकड़ी की है ? यह समझा नहीं जा सकता है उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार होने जब ज्ञानाग्नि द्वारा जीव या आत्मा नाम की उपाधि नष्ट हो जाती और ब्रह्म या परमात्मा नाम की उपाधि नष्ट हो जाती है तब कौन जीव होगा और कौन ब्रह्म ? मात्र ‘अस्मि’ नामक सत्ता होगी । यही यहाँ पर ‘तत्त्वमसि’ है । यह अस्मि भी कहने के लिए है वस्तुतः ‘अस्ति’ ही है । ईश्वर की शरण लेकर आत्मा का निरंतर चिंतन करना मतलब तत् पदार्थ का त्वम् पदार्थ में प्रतिष्ठित करना । इसी को कहा था ‘ब्रह्म संपद्यते तदा’ १३/३० अर्थात जब तत् पदार्थ को त्वं पदार्थ में देखता है उस समय ब्रह्म का संपादन करता है अर्थात जो सत्ता मात्र है जो सबको सत्ता देता है किन्तु जिसकी और दूसरी कोई सत्ता नहीं है वह निर्विशेष ब्रह्म है और उसी का संपादन करना यानी जो औपाधिक परिच्छिन्नभाव का उपाधि के कारण दोष था उसका निवारण करता है अर्थात आत्मैक्यता को प्राप्त हो जाता है । इसी बात को ‘ब्रह्मभूयाय कल्पते’ १४/२६ अर्थात त्रिगुणातीत होने पर परिच्छिन्न भाव नष्ट करने का संकल्प करता है अर्थात ब्रह्मात्मैक्य भावस्थ अपरिच्छिन्नता का सामर्थ्य प्राप्त करता है । इस प्रकार यहाँ अध्यात्मनित्या से अपरिच्छिन्नता का बोध कराया गया है और इसी अपरिच्छिन्नता को कहा ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’ १३/२ । इस प्रकार जब आत्म साक्षात्कार कर लेगा उसके बाद ही संपूर्ण मनोगत २/५५ कामनाएँ नष्ट होकर ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ २/५५ होगा । जब तक मन में कोई भी शुभाशुभ कामना होगी तब तक द्वन्द्व रहित नहीं हो सकता, सुख दुःख, सर्दी गर्मी आदि द्वन्द्व रहेगे ही । जब उन द्वन्द्वों से मुक्त होगा तब तत्त्व का साक्षात्कार कर लेने वाला तत्त्वज्ञानी अव्यय अर्थात अविनाशी कभी परिवर्तित न होने वाला नित्य, आनन्दस्वरूप, एकरस सत्तामात्र कहे जाने वाले अद्वितीय आत्म पद को प्राप्त कर लेता है ।
         अध्यात्म नित्या का अर्थ हमने ऊपर भी एकमात्र आत्मनिष्ठ किया है और वही अर्थ यहाँ भी है । ऊपर में पुराण परुष तत् पदार्थ का वाचक है और यहां त्वम् पदार्थ का वाचक है । पहले तत् पदार्थ की शरण ग्रहण करने को कहना और फिर त्वम् पदार्थ में निरंतर स्थित होने के लिए कहना इससे तत् और त्वम् पदार्थ में एकत्व का भगवान स्पष्टीकरण करते हैं । इसी को― ‘अध्यात्मचेतसा’ ३/३० कहा था जिसमें परमेश्वर में सभी कर्मों का त्याग करके प्रकृति के गुणकर्मविभाग का ज्ञान प्राप्त करके आत्मभाव में स्थित होना बताया था । उसी को यहाँ अध्यात्मनित्या कहा गया है । विनिवृत्तकामाः का अर्थ मनोगत २/५५ सभी कामनाओं से शून्य हो जाना ।
             विशेष भाव— इसमें यहाँ यह भाव दिख गया है कि मान और मोह अर्थात संसार विषक मूढभाव हमें स्वयं प्रयत्नपूर्वक दूर करना होगा । तीनो गुणों के कार्य पर विजय ईश्वर और गुरुकृपा से ही होगा, उनकी कृपा होने पर ही आत्मसाक्षात्कार संभव है और बिना आत्मसाक्षात्कार के कामनाएँ, द्वन्द्व, सुख दुःख आदि नष्ट होने वाले नहीं हैं ।
             मेरा व्यक्तिगत भाव यह है कि इस अध्याय में पूर्व के सभी अध्यायों का सारांश सम्मिलित है । अगर पूरी गीता का चिंतन करें तो प्रत्येक श्लोक में पूरी गीता दृष्टिगोचर होगी जिसकी व्याख्या करना कठिन है । जैसे इस श्लोक में अध्याय २/४५ पूरा का पूरा दिख रहा है जबकि अन्य प्रसंग कुछ दिये हैं और कुछ नहीं दिये हैं अतः मैं प्रयत्न करके संक्षिप्त विवेचन करता हूँ । तथापि ईश्वर की इच्छा ॥५॥

            संबंध— प्राप्त किये जाने वाले अविनाशी पद का स्वरूप कहते हैं……
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥१५/६॥
           शब्दार्थ— सूर्य, चंन्द्र, अग्नि उस परम आत्मस्वरूप ज्योति को प्रकाशित नहीं कर सकते, आत्मस्वरूप को जानने के बाद जहाँ जाकर संसार में वापस नहीं लौटता है वह मेरा परम धाम है ।
             तात्पर्यार्थ—अध्याय तेरह में प्रत्यगात्मा का जो स्वरूप बताया था वही स्वरूप यहाँ परमपद का बताया गया है । सूर्य आदि उसे क्यों नहीं प्रकाशित कर सकते हैं, इसका विवरण श्लोक १२ में दिया गया है । अर्थात अध्याय १३/१७ और इस श्लोक से घनिष्ठ संबंध और अभिन्नता है एवं इस श्लोक और इसी अध्याय के बारहवें श्लोक में अत्यन्त घनिष्ठता और अभिन्नता है । इससे यहां यह सिद्ध होता है कि तज्ज्योतिः १३/१७, यहाँ का परधाम एवं पूर्व श्लोक का परमपद एवं मेरा तेज अर्थात ब्रह्म का प्रकाश १५/१२ ये चारों ही अभिन्न हैं । साथ ही अगले श्लोक में जीव को अपना सनातन अंश कहकर इसी श्लोक से संबंध जोड़कर जीव की सहज गति परमेश्वर की ही ओर जाने के कारण उनसे अभिन्न है यह भी आगे बतायेंगे । अतः यह श्लोक पूर्व और पश्चात दोनो से संबद्ध समझना चाहिए ।
                सूर्य, चन्द्र, और अग्नि जड़ हैं अतः ये जड़ आंख, मन, और वाणी को ही प्रकाशित कर सकती हैं अतः जड़ आंखे जड़ प्रकाश से चैतन्यप्रकाश ब्रह्म अर्थात आत्मप्रकाश को नहीं देख सकती हैं इसीलिये विराट रूप देखने के लिए अर्जुन को दिव्यनेत्र दिये गये थे । मन और वाणी के लिए भी ऐसा ही समझना चाहिए कि जहाँ से ये दोनो वापस लौट आयें वहां से उसकी सीमा प्रारंभ होती है, जहाँ आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करने वाला आत्मज्ञानी लौटकर वापस नहीं आता वह मेरा परमधाम है । यहाँ मम से सविशेष ब्रह्म और परमधाम से उसका जो निर्विशेष स्वरूप है । सविशेष की साधना से उससे अभिन्न निर्विशेष स्वरूप को प्राप्त होकर जन्म मरण से मुक्त हो जाता है, संसार सागर में पुनः वापस नहीं आता जैसा कि अध्याय १४/२ में कहा गया है । यह भाव है ॥६॥

             संबंध— अज्ञान में स्थित सनातन जीव का वर्णन……
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥१५/७॥
            शब्दार्थ— जीवलोक में जीवभूत मेरा सनातन अंश है । प्रकृति में स्थित मन सहित छः इन्द्रियां को अपनी ओर आकर्षित करता यानी आपना मान लेता है ।
            तात्पर्यार्थ— यहाँ सबसे पहली बात ध्यान देने योग्य यह है कि कहा जीवलोक । मनुुष्यलोक नहीं कहा । इसका अर्थ चौदहों भुवन के ब्रह्मा से लेकर कीट पर्यंत सभी जीव हैं और वे जहाँ रहते हैं वह जीव लोक है । दूसरी बात कही जीवभूत मेरा सनातन अंश । जीवभूत का अर्थ यह है कि वह जीव है ही नहीं बल्कि जीव भाव को स्वीकार किया यानी जीव बना हुआ है, जैसे नाटक में कोई राजा बनता है कोई देवता, तो कोई भिखारी । अतः परमेश्वर का अंश है लेकिन वह प्रकृति का अर्थ अज्ञान, जो अज्ञान में स्थित अर्थात अज्ञान से उत्पन्न मन सहित छः इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है अर्थात अपना मान लेता है । पहले भी कहा था ‘जीवभूतां महाबहो ययेदं धार्यते जगत’ ७/५ अर्थात जीव है नहीं जीवभाव को प्रकृति अर्थात अज्ञान के कारण प्राप्त हुआ है । फिर अंश क्यों कहा— अंश मायोपाधिक होता है जो मायोपाधिक का ही अंश हो सकता है । इसलिए यह अंश जब तक जीव है तब तक ईश्वर है क्योंकि ईश्वर अंश जीव अविनाशी यहाँ ब्रह्म अंश नहीं, ईश्वर अंश कहा है । आकाश घड़े में रहे तो आकाश, और घड़ा फूट जाये तो आकाश । घटाकाश उपाधि हो जाने से घड़े का आकाश कह देने मात्र से आकाश परिच्छिन्न अर्थात खंडित नहीं होता । जल में दिखने वाला सूर्य कह देने मात्र से सूर्य टुकड़ों में नहीं बंट जाता । आवश्यकता है घड़ा फूटने और जल सूखने की, वे स्वयं जिसका अंश उपाधि के कारण कहे गये वे जहाँ के तहां अपने मूल रूप से अभिन्न हो जायेंगे और फिर उन स्थानों को कभी वापस नहीं आयेंगे । घट के टूटने पर क्या घट का आकाश ऊपर जो नीला दिखाई देता है वहां मिलने जायेगा ? क्या जल सूखने पर जल में स्थित सूर्य का प्रतिबिंब यानी अंश ऊपर दिखने वाले सूर्य के प्रकाशपुञ्ज में मिलने जायेगा ? नहीं, वह जहाँ है वहीं तद्रूपता को प्राप्त हो जायेगा । यही मुक्ति अर्थात मोक्ष है, इसी प्रकार प्रकृतिस्थ जीव का जब स्थूल सूक्ष्म और कारण नाम का घड़ा यानी शरीर नष्ट हो जायेगा तब वह स्वतः जहाँ का तहां अपने अभिन्न ब्रह्मरूपता को प्राप्त हो जायेगा कहीं जाना नहीं पड़ेगा । ये सभी प्रकृति के गुणरूप जल से सिंचित हैं जब यह जल सूख जायेगा यानी त्रिगुणातीत हो जायेगा तो वह अभिन्न ब्रह्मस्वरूपता को प्राप्त हो जायेगा । तथापि जब तक प्रकृति से संबंध नहीं तोड़ता, उसे अपना मानता है तब तक वह औपाधिक जीव नामक ईश्वर का अंश प्रतिबिंबवत कहा जायेगा और वह नाटक के पात्र की भांति वैसा ही कर्म भी करेगा । ऐसा तात्पर्य है ।
         अथवा इसमें अधिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है । अध्याय १० में बहुत से जीवों को बताते हैं कि यह मैं हूँ , यह मैं हूँ, और अन्त में कहते बहुत कहने का कोई प्रयोजन नहीं है, जहाँ कहीं भी ऐश्वर्य और बल की प्रधानता दिखाई देती है वह मेरे ही तेज के अंश से― तेज यानी प्रकाश और अंश यानी परावर्तित प्रतिबिंब― जैसे घड़े में सूर्य का प्रतिबिंब वैसे ही परमेश्वर के तेज का परावर्तन ही अंश है । पहले कहते रहे ‘मैं’ हूँ । फिर कहते हैं मेरे तेज का अंश है और फिर कहते हैं कि मेरे एक अंश में संपूर्ण जगत स्थित है । इसका अर्थ क्या हुआ ? इसका अर्थ यह हुआ कि भागवान और उनका तेज, तेज का अंश, भगवान का अंश ये सब एक ही हैं भिन्न नहीं । उसी को यहाँ भगवान से अभिन्न जो परावर्तित अंश, कल्पित अंश है वह मुक्तस्वरूप होकर भी सगंति के कारण मन और इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है क्योंकि इनके बिना वह विषयों का भोग नहीं कर सकता है । यह भाव है ॥७॥

              संबंध— शरीर में स्थित इन्द्रियों को क्यों आकर्षित करता है ? इस पर कहते हैं……
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥१५/८॥
            शब्दार्थ— जब देह का स्वामी जीव शरीर को छोड़कर दूसरे को जब प्राप्त करता है तब जैसे वायु गंध के स्थान से गंध को अपने साथ ले जाती है वैसे ही इन छहों इन्द्रियों को पकड़कर ले जाता है ।
             तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में कर्षति शब्द आया था जिसका अर्थ होता है आकर्षित करना । जब व्यक्ति किसी को अपना मान लेता है तब उसकी ऐसी क्रियाएं होती हैं कि वह उसकी ओर आकर्षित हों । यही आकर्षण पूर्व श्लोक में अज्ञान के कारण जीव करता है किन्तु जब शरीर छोड़ता है तब जैसे वायु किसी सुंगध या दुर्गंध के स्थान से उसकी गंध को अन्यत्र ले जाता है वैसे ही यह जीव इन्द्रियों को पकड़कर दूसरे शरीर में ले जाता है । उन इन्द्रियों को इतना अधिक अपना मान लेता है कि उनके बिना वह रह ही नहीं सकता । ऐसा व्यवहार में भी देखने में आता है कि एक के अभाव में दूसरा या तो पागल हो जाता है या आत्महत्या कर लेता है । यही स्थिति माया में फंसे जीव की है । वह सोचता है कि इन इन्द्रियों का इतना पालन पोषण किया और अब साथ कैसे नहीं जायेंगी ? अतः बलात् अर्थात बलपूर्वक पकड़ कर ले जाता है । यहाँ ईश्वर शब्द जीव के लिए आया है ॥८॥

              संबंध— छहों इन्द्रियों का स्पष्टीकरण……
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥१५/९॥
            शब्दार्थ— यह जीवात्मा मन का आश्रय लेकर— श्रोत्र, चक्षु, स्पर्श, रसना और घ्राण से भी विषयों का सेवन करता है ।
             तात्पर्यार्थ— जीवात्मा मन सहित पांचों ज्ञानेन्द्रियों को अपनी ओर क्यों आकर्षित करता है, अपना मानता है ? और क्यों जबरन् पकड़कर एक शरीर से दूसरे शरीर में ले जाता है ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि वह स्वयं तो कोई भोग भोग नहीं सकता । मन इन्द्रियों का स्वामी है । अतः मन के बिना इन्द्रियां भी तद्विषयक भोग नहीं भोग सकती हैं अर्थात मन के न होने पर विषयों की अनुभूति नहीं होगी अतः वह पांचों ज्ञानेन्द्रियों का आश्रय लेकर तद्विषयक भोग का आनन्द लेता है । जैसे श्रोत्र से मधुर शब्द का, चक्षु से सुन्दर रूप का, स्पर्श से स्त्री आदि त्वचा का, जिह्वा से विभिन्न रसों का, नाक से गंध का आनंद लेता है । कर्मेन्द्रियाँ यहां न कहने का तात्पर्य यह है कि वे ज्ञानेन्द्रियों के आधीन होने से उनके अनुसार ही कार्य करती हैं । इस प्रकार जीव भोगासक्त होकर अनवरत ऊपर नीचे अर्थात सत् असत् १३/२१ योनियों में भ्रमण करता रहता है ।
              शंका होती है कि बिना कर्मेन्द्रियों के कैसे विषयों का ग्रहण होगा ? क्योंकि यहाँ कर्मेन्द्रियाँ नहीं कही गई है । तो इसके समाधान में यह समझना चाहिए कि कर्मेन्द्रियां ज्ञानेन्द्रियों के अन्तर्गत ही कह दी गई है क्योंकि बिना ज्ञानेन्द्रियों के कर्मेन्द्रियों की अपनी कोई सत्ता नहीं होती ।
           विशेष— विषयों की आसक्ति के कारण यह स्थिति होती है और विभिन्न उपाधियों १३/२२ को धारण करता है । किन्तु वह ईश्वर का अंश है, इतना नहीं वह स्वयं भी ईश्वर १५/८ अर्थात इतना समर्थ है कि वह इन्हें जब चाहे तब छोड़ सकता है, क्योंकि प्रकृति विजातीय है उसके साथ जीव का कोई संबंध है ही नहीं किन्तु भूलवश अपना मान बैठा है । जिस समय वह अनेक भोगो में लिप्त है उस समय भी वह मुक्त है तथापि जैसे निद्रा में सोये हुए व्यक्ति को स्वप्न में गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है जबकि वस्तुतः वहां कुछ नहीं है उसके सिवाय, किन्तु जब तक नींद न खुले तब तक तो समसया है ही । ऐसे ही जब तक स्वरूप बोध न हो जाये तब तक तो बंधन है । इस बंधन से मुक्ति का एक मात्र साधन ईश्वर शरणागति और आत्मसाक्षात्कार है । जो ज्ञानस्वरूप है अतः अज्ञान में फंसे जीव की मुक्ति का साधन एक मात्र ज्ञान है ॥९॥

              संबंध— इस आत्मा अर्थात जीव को कौन देखता है, यह बता रहे हैं……
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढ़ा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा ॥१५/१०॥
            शब्दार्थ— गुणों से युक्त जीवात्मा के शरीर का त्याग करते हुए, शरीर के रहते हुए अवथा भोग करते हुए भी अज्ञानी नहीं जानते, किन्तु ज्ञाननेत्र वाले जानते हैं ।
            तात्पर्यार्थ— विमूढ़ा अर्थात अत्यंत मूढ़ता को अर्थात अत्यन्त अन्धकारमय अज्ञान को जो प्राप्त हो चुके हैं वे सभी विमूढ हैं । यही दैवी गुणमयी अत्यंत दुर्लंघ्य प्रभु की माया है कि जो वस्तु जैसी है वैसी देख नहीं सकते । इसी बात को भगवान ने स्वयं को न जानने वालों के लिए कहते हैं— “अल्पमेधसाम् ७/२३, अबुद्धयः ७/२४, मूढोऽयं” ७/२५ अर्थात अल्पबुद्धि, बुद्धिहीन, ये मूढ या मूर्ख हैं । मूढ लोग शरीर वाला जानते हैं ९/११ । इसी बात को यहाँ विमूढा कहा गया है । मूढ लोग क्या देखते हैं कि जीव शरीर छोड़ रहा, इस शरीर में है, नाना प्रकार के भोग भी भोग रहा है लेकिन विमूढ़ा यानी जिनको विवेक नहीं है वे आत्मा को जन्मते, मरते, जीते और भोग करते हुए भी यह नहीं जानते कि वस्तुतः जीव का स्वरूप क्या है ? जबकि ज्ञाननेत्र वाले देखते अर्थात अनुभव करते हैं कि ये सभी गुण जो जन्मना मरना आदि दिख रहे हैं वे प्रकृति के हैं । जीव तो अकर्ता, असंग, शुद्ध चिन्मय, अज, अव्यय, नित्य, अविनाशी एवं सबका प्रकाशक सर्वात्मा है । इस प्रकार ज्ञाननेत्र से देखने वाले जीवात्मा नाम कहे जाने वाले औपाधिक रूप से परे पुरुषः परः १३/२२ रूप में ही जानते हैं अतः वे मुक्त होते हैं, जबकि मूढ लोग जन्म मृत्यु के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ।
           भावार्थ— गुणान्वितम् का अर्थ तामस, राजस और सत्त्व प्रधान गुणों के कार्य में प्रवृत्त होने पर भी । बाकी अर्थ स्पष्ट है । 
       यहां ज्ञाननेत्र उन्हीं को कहा है जो तीसरे चौदहवें अध्याय के अनुसार गुणकर्मविभाग को जानते हैं और अध्यात्मचेतसा एवं अध्यात्मनित्या हैं । विमूढ़ो अर्थात अज्ञानी क्यों नहीं जानता ? इसके लिए अध्याय सात एवं नौ में भेददर्शी के रूप में कह दिया है और आगे अध्याय सोलह में आसुरी संपत्ति में कहेंगे ॥१०॥
          
            संबंध— पूर्व श्लोक का स्पष्टीकरण……
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्यचेतसः ॥१५/११॥
         शब्दार्थ—क्योंकि प्रयत्नशील योगी आत्मा में ही इसे देखते हैं । और जिनका चित्त शुद्ध नहीं वे अविवेकी यत्न करने पर भी इस आत्मा को नहीं देखते ।
            तात्पर्यार्थ— यत्नशील अर्थात जिनका चित्त शुद्ध हो गया है वे योगी अर्थात ‘समवस्थितमीश्वरम्’ १३/२८ अर्थात समान रूप से सर्वत्र स्थित आत्मा को आत्मा यानी बुद्धि में स्थित देखते हैं । यहाँ पर आत्मा का अर्थ बुद्धि किया गया है देखिए अध्याय १३/२८ की व्याख्या । बुद्धि को भी जो प्रकाशति करता है वह असंग, अकर्ता निर्विकार, निरंजन, नित्य शुद्ध, बुद्ध मुक्तस्वभाव आत्मा है ऐसा ज्ञाननेत्र वाले शुद्ध चित्त निरंतर आत्मानुसंधान करने वाले देखते हैं । किन्तु जो अकृतात्मा हैं अर्थात जिनका चित्त शुद्ध नहीं हुआ है ऐसे विषयों में निरंतर लगा रहने के कारण अचेत अर्थात असावधान है । वे अविवेकी विषयी इस असंग आत्मा को स्वरूपतः नहीं देखते । आर्थात आत्मा का जड़ देह के साथ मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ आदि प्राकृतिक गुणों में बंधे रहते हैं । जबकि ज्ञानी अकर्ता आदि रूप में आत्मा को जानकर मुक्त होता है ।
             अथवा ज्ञानी क्यों देख लेता है ? अज्ञानी क्यों नहीं देखता ? इसका विवरण देते हैं― यहाँ योगी को यतन्तः कहने का अर्थ साधन-चतुष्टय संपन्न आत्मा को आत्मा से आत्मा में स्थित देखने का तात्पर्य यह है कि पहला आत्मा जिसे यहाँ ‘एनम्’ से कहा गया है वह पूर्व श्लोक में कहे गये विभिन्न परिस्थितियों में भी एक अविनाशी आत्मा, दूसरे और तीसरे में आत्मा का आत्मा में स्थित देखने का तात्पर्य है कि उसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं है उसकी ऐसी महिमा है कि वह स्वमहिमा में ही स्थित रहता है । इस प्रकार गुणविभाग पूर्व स्वमहिमा में स्थित अध्यात्मचेतसा आत्मा के नित्यत्व, अजत्व, निर्विकारित्व, निर्गुणत्व आदि लक्षणों वाला देखते हैं ।
             जबकि जिनका चित्त अचेत है अर्थात द्वैत भ्रम रूपी मूर्छा में चला गया है ऐसे अविवेकी अर्थात गुणकर्मविभाग को न जानने वाले जो अकृतात्मा अर्थात साधन चतुष्य संपन्न नहीं हैं वे आत्मा के नित्यत्व को लाख प्रयत्न करके भी नहीं जानते । यह भाव है ॥११॥

              संबंध— आत्मा के प्रभाव का वर्णन……
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१५/१२॥
             शब्दार्थ— संपूर्ण जगत को प्रकाशति करने वाला जो तेज सूर्य में है, और जो चन्द्रमा में है एवं अग्नि में है वह तेज मेरा जान ।
             तात्पर्यार्थ— यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि आत्मा से भिन्न यहां किसी अन्य ब्रह्म का वर्णन नहीं है । जिसे क्षेत्रज्ञ १३/२ कहा था उसे ही प्रत्यागात्मा १३/१२ कहकर ज्योतियों का ज्योति १३/१७ कहा था । उसी प्रकार यहाँ पहले जीव के बद्ध होकर मुक्त होने का जो साधन बताया था उसमें दो साधन विशेष थे पहला जितसङ्गदोषा १५/५ यानी पहला ईश्वर शरणागति और दूसरा अध्यात्मनित्या१५/५ अर्थात आत्मानुसंधान । यहां ईश्वर और आत्मा की एकता का जैसा प्रतिपादन किया गया है और आत्मा और परमात्मा की एकता दर्शाया गया है उसे उपरोक्त स्थान पर ही देखना चाहिए । इसी प्रकार परमपद, आत्मपद एवं परमात्मा में अभिन्नता कैसे है इसी अध्याय का छठा श्लोक देखना चाहिए । छठे श्लोक से जिस जीवात्मा का प्रकरण चलता है उसका स्वरूप क्या और कैसा है उसे अज्ञानी नहीं जानते किन्तु ज्ञानी ही जानते हैं १५/१० कहकर उसे अज्ञानी असावधान होने के कारण प्रयत्न करने पर भी नहीं जानते किन्तु सावधान होने के कारण योगी लोग प्रयत्नपूर्वक आत्मा यानी विवेक अर्थात ज्ञान को भी जो प्रकाशित कर रहा है उसके रूप में आत्मा को देखते हैं यह १५/१२ में स्पष्ट कर दिया । अब इस श्लोक में जिसे द्वैतवादी अगल से परमात्मा सिद्ध करना चाहते हैं उनसे हम पूछना चाहेंगे कि कोई योगी परमात्मा को छोड़कर उससे भिन्न आत्मा की प्राप्ति के लिए जन्म जन्मान्तर अपने सुख का त्यागकरके दुःख क्यों उठाना चाहेगा ? क्या कोई दोष है परमात्मा में ? अगर हाँ ! तो परमात्मा नाम की संसार में कोई चीज ही नहीं है, वह भी हमारी तरफ संसारी, विषयी और जन्म मरण रूप देश काल परिच्छिन्न साधारण जीव ही हुआ । अगर वह निर्दोष और देश काल अपरिछिन्न होता तो आत्मा को छोड़कर उसकी ही सभी आराधना क्यों नहीं करते ? अतः आपकी बात तो गले से नीचे उतरती नहीं है । मेरी दृष्टि में ‘मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति’ ७/७ अर्थात उससे भिन्न इस जगत में और कोई है ही नहीं तो यह आत्मा नाम का चमचा बीच में कहां से आ गया ? जो परमात्मा को छोड़कर आत्मा की उपासना करने लगे ? 
               अरे भाई ! घी तो घी होता तथापि जब लोग डालडा को घी बोलने लगे तो घी के साथ उपाधि लगानी पड़ी देशी की और वह हो गया देशी घी । इसी प्रकार पहले आत्मा से भिन्न कुछ था ही नहीं इसलिए श्रुति भी कहती है ‘अयमात्मा ब्रह्म’ माण्डू.उ.२, अर्थात तू अपने को भूल गया है लेकिन जिसे तू आत्मा कहता है यही ब्रह्म है और मात्र बारह मंत्रों माण्डूक्योपनिषद में समझा दिया और वह ब्रह्म हो गया । इतना ही नहीं श्रुति तो कहती है ‘आत्मैवेदं’ अर्थात यह सब आत्मा ही है, लेकिन जब शरीराभिमानी होकर शरीर को ही आत्मा मान बैठा, यहाँ शरीर मन बुद्धि और कारण सहित कहा गया है,  तो फिर शरीर से परे या भिन्न है उसे परमात्मा कह दिया गया । अतः जिस आत्मा को योगी लोग यत्न पूर्व श्लोक के अनुसार देखते हैं उसका प्रभाव बताते हैं—
          श्लोक छः का विशेष स्पष्टीकरण यहाँ करते हुए कहते हैं—  पहले कहा था कि वह उस आत्मज्योति को प्रकाशित नहीं करता और अब कहते हैं कि जो तेज सूर्य में है जिससे सूर्य संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है मतलब इस प्रकार— नेत्र का विषय रूप अधिभूत है, इसमें नेत्रज्योति अध्यात्म और सूर्य अधिदैव है यह अधिदैव ही हिरण्य गर्भ है और हिरण्यगर्भ को सत्ता देने और प्रकाशति करने वाला अधियज्ञ ब्रह्म है । अब देखो जो स्वयं पर-प्रकाशित है वह दूसरे यानी जगत को कैसे प्रकाशित कर सकता है ? किन्तु ब्रह्म सत्ता से जगत को प्रकाशति कर रहा है । यही ब्रह्म सत्ता वही आत्मा है जिसे योगी लोग प्रयत्न पूर्वक जन्म जन्मांतर सांसारिक भोग का त्याग करके नाना प्रकार के कष्टों को सहन करके भी देखने का प्रयत्न करते रहते हैं और देखते भी हैं एवं तद्रूप होकर परमपद यानी मोक्ष भी प्राप्त करते हैं । इसी प्रकार चंद्रमा मन का उपलक्षण है मन के स्थूल विचार (संकल्प-विकल्पात्मक) अधिभूत हैं, सूक्ष्म विचार (स्थिर एवं आत्मतत्त्व का नीर क्षीर की भांति निश्चय) अध्यात्म है । उन विचारों का पोषण कर्ता देव चन्द्रमा है । अन्नादि के रूप में मन का स्थिर और नाश होना होता है और वह अन्न का पोषण करने वाला चन्द्रमा है यहां मन और बुद्धि दोनो मन के अन्तर्गत समझना चाहिए । और चन्द्रमा को ब्रह्म प्रकाशित करता है । इसी प्रकार बोलना वाणी का अधिभूत है, वाणी का जो उद्गम वाक् है वही अध्यात्म है और अग्नि यानी जो शरीर में गर्मी है अधिदैव है । यह गर्मी किसके कारण है ? आत्मा के कारण है और जब शरीर में गर्मी है तभी वाक् और वाक्य है । 
              इस प्रकार नेत्रज्योति, मन और शरीर में स्थित गर्मी आत्मा से प्रकाशित होता यह व्यष्टि में और सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि समष्टि में इस संसार को प्रकाशित करते हैं और व्यष्टि की प्रतिष्ठा समष्टि में है अतः व्यष्टि समष्टि से अभिन्न है यह बात अध्याय १४/२७ में भी कह चुके हैं और यहाँ भी कह रहे हैं । अतः यहाँ जो प्रभाव इदं का त्याग कर जो ‘प्रत्यागात्मा क्षेत्रज्ञ’ १३/ २ है वह मैं हूँ और मुझ प्रत्यागात्मा से ही यह संपूर्ण जगत प्रकाशित हो रहे हैं अतः आत्म प्रकाश के बिना स्वयं अन्धकारमय होने से उनकी अपनी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये वे आत्मा को प्रकाशित नहीं कर सकते हैं ऐसा अभिन्न भाव है ।
              अथवा यहाँ सूर्य के भिन्न भिन्न पदार्थ को भिन्न भिन्न रूप में प्रकाशित करने वाले सूर्य के दृष्टांत से यह बता रहे हैं कि जहाँ कहीं भी जो कुछ प्रकाश― चैतन्यता दिखती है वह मेरी ही चैतन्यता, मेरा ही प्रकाश जान । यह उदाहरण क्यों दिया ? इसलिये दिया कि जिस जीव को अनेक रूपों में नाश होता हुआ प्रत्यक्ष देखा जा रहा है, वह ब्रह्म के समान स्वमहिमा वाला कैसे हो सकता है ? स्वमहिमा में स्थित तो एक मात्र ब्रह्म है । इतने भिन्न भिन्न अलग अलग जन्म मरण वाले सभी जीवों में एक ही आत्मा कैसे हो सकती है ? यदि एक आत्मा हो तो सभी को एक ही साथ मरना, पैदा आदि होना चाहिए ? इसी शंका के निवारण के लिए सूर्य के दृष्टांत से यह समझाया तथापि फिर से निरीक्षण करते हैं― जैसे किसी कमरे में अंधेरा है और बाहर सूर्य के प्रकाश की ओर दर्पण का मुख भाग करके कमरे की ओर मोड़ देने से जो दर्पण द्वारा परावर्तित प्रकाश कमरे में जाकर प्रकाश करेगा वह प्रकाश दर्पण का होगा या सूर्य का ? स्वाभाविक है कि वह प्रकाश दर्पण का नहीं सूर्य का है भले माध्यम दर्पण हो ।
           इसी प्रकार इसी अध्याय के सातवें श्लोक में अपना सनातन अंश कहा, जो जीवभूत है । इसका तात्पर्य यह है कि वह चित्प्रकाश जीव रूप दर्पण में परावर्तित होने वाला और कोई नहीं सबको प्रकाशित करने वाला परम प्रकाश ही वहाँ चित्प्रकाश हो रहा है । अतः परावर्तित चित्प्रकाश और स्वमहिमा वाला प्रकाश दोनो एक ही हैं अन्य नहीं । इस प्रकार और भी भगवती गीता अध्याय १४ सहित अनेक प्रमाण देती है विस्तार न हो अतः विवेकशील जीवब्रह्म की एकता इतने से ही समझ लेंगे और अविवेकी को समझने की आवश्यकता नहीं है ।
               अतः यहाँ सिद्ध हुआ कि जीव नामक परावर्तित आत्मांश जब गुणविभाग पूर्वक अपने को जान लेता है तब देशकाल अपरिच्छन्न ब्रह्मस्वरूप हो जाता है । उसी ब्रह्मस्वरूपता को ज्ञानीजन उत्क्रामन्तं आदि सभी अवस्थाओं में एक रस देखते और विचारहीन अजितेन्द्रिय त्रिकाल में भी प्रयत्नशील होकर भी नहीं देख सकते हैं यह भाव है ॥१२॥

              संबंध— उस परमात्मा का समष्टि प्रभाव क्या है ? यह बता रहे हैं….…
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१५/१३॥
            शब्दार्थ— पृथ्वी और प्राणियों में प्रवेश करके अपने तेज से धारण करता हूँ, चन्द्रमा होकर सभी औषधियों का पोषण करता हूँ । 
             तात्पर्यार्थ— यहाँ श्लोक १२ से लेकर श्लोक १५ तक एक प्रकार अध्याय १० का उपसंहार करते हुए अपनी विभूतियों को उनके प्रभाव सहित बता रहे हैं । यहाँ पर पृथ्वी में प्रवेश करके अपने तेज से पृथ्वी और प्राणियों में प्रवेश करके अपने प्रभाव से धारण करता हूँ यह बात भगवान की बड़ी सहज दिख रही । लेकिन अध्याय सात में देखें— ‘जीवभूतां महाबहो ययेदं धार्यते जगत्’ ७/५ संपूर्ण जगत को धारण करने का काम जीव का है ब्रह्म का नहीं । श्रुति कहती है— ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ अर्थात उसने पृथ्वी आदि लोकों-लोगों की सृष्टि की और फिर उसमें प्रवेश कर गया । अर्थात उसमें प्रवेश करके उन्हें धारण किया । वही यहाँ भी अपने प्रभाव से धारण किया किन्तु अध्याय सात में जीव धारण करता है । यह तो परस्पर विरोध होगा । अब अध्याय १३ में पहले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विभाग करके फिर क्षेत्रज्ञ भगवान अपने आपको बताते हैं । इस पर द्वैतवादी कहते हैं कि जिसे अध्याय १३/१ में क्षेत्रज्ञ कहा वही क्षेत्रज्ञ १३/२ कैसे हो सकता है ? बात तो ठीक है अब हम पूछते हैं कि जब उसने सृष्टि की और उसमें प्रवेश करके उसी ब्रह्म या परमात्मा ने उसे धारण किया तब वह जीव हुआ या ब्रह्म ? क्योंकि गीता में उस धारण करने वाले का लक्षण ७/५ में जीव किया है । अब अगर ब्रह्म को जीव नहीं मान सकते तो जीव को ब्रह्म मानो ? क्या मानोगे ? या यह कहोगे कि यह श्लोक भगवान का नहीं है प्रक्षिप्त है ? चलो यह भी छोड़ो ? इसी अध्याय के पन्द्रहवें श्लोक में भगवान ने जीव को ईश्वर कहा है तो क्या जीव ईश्वर हो गया ? अगर नहीं तो भगवान झूठ बोल रहे हैं ? अगर यहाँ पर जीव ईश्वर नहीं हो जाता तो वे जब कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ १३/२ मैं हूँ तो वहां वे जीव कैसे हो सकते हैं ? इस प्रकार जिसे औपाधिक जीव कहा गया और औपाधिक ब्रह्म कहा गया अथवा आत्मा और परमात्मा कहा गया वे वस्तुतः भिन्न नहीं एक ही हैं । इस रहस्य को न जानने वाले के लिए ही “अबुद्धयः ७/२५ एवं मूढोऽयं नाऽभिजानाति” ७/२५ और यहाँ अचेतसः १५/१  कहा गया है । किन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह नहीं कहते हैं कि मैं धारण करता हूँ, वे कहते हैं तेजसा अर्थात अपने तेज यानी प्रभाव से धारण करता हूँ । जैसे राजा के प्रभाव से ही प्रजा नियंत्रित होती, राजा स्वयं नियंत्रित नहीं करता उसी प्रकार प्रभाव से धारण करना यानी जिसके भय से सूर्य तपता है आदि अर्थात मेरा प्रभाव ऐसा है कि मेरे प्रभाव के भय से स्वयं ही पृथ्वी आदि लोक और उनके प्राणी स्थिर हैं । मैं तो उनसे निर्लेप और अकर्ता हूँ फिर भला मैं कैसे धारण कर सकता हूँ ?
               अध्याय १० में कहते हैं ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ ९/५ अर्थात मेरी माया शक्ति का अनुभव करो । ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ ११/८ अर्थात तू मुझे नहीं देख सकता है इसलिए मेरी माया का ऐश्वर्य अर्थात प्रभाव देख सकते हो उसे देख । चमड़ी के नेत्र से नहीं अन्तर्चक्षु से देखो और अनुभव करो । वही यहाँ कहते हैं कि मैं अपने तेज से अर्थात प्रभाव यानी माया से संपूर्ण लोकों को धारण करता हूँ । इस सिद्धांत के अनुसार जिसे जीव ७/५ में कहा वह जीव पना भी माया ही है न कि ब्रह्म से भिन्न कोई उनका चमचा । इस प्रकार आत्मा और ब्रह्म का जो एकीभाव सत्ता मात्र है उसकी सत्ता में ही सब सभी लोक और प्राणी स्वतः अपनी अपनी धुरी में स्थित हैं । ‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्’ ९/१० अर्थात उस परम प्रकाश की सत्ता में धारण और संहार तथा स्थिरता का काम प्रकृति ही कर रही है वह निष्क्रिय, निर्विकार कुछ नहीं करता है मात्र उसकी सत्ता को समझाने के लिए अध्यारोप मात्र उसमें क्रिया का किया जाता है किन्तु अध्यारोप के सार निक्रिय, निर्विकार आदि अपवादों पर भी ध्यान देकर तत्त्व निर्णय करना चाहिए । 
             भाव यह है कि वह अपने प्रभाव से पृथ्वी आदि संपूर्ण लोकों को धारण करता है और चंन्द्रमा— यहाँ सोम शब्द है जो पोषकता का प्रतीक है व्यष्टि में जहाँ चन्द्रमा बनस्पतियों और औषधियों का पोषण करता है किन्तु वहीं अन्न संपूर्ण शरीरों का । अन्न का अर्थ अकेले गेहूँ, चावल, दाल न समझकर जिसके ग्रहण से जीवनी शक्ति प्राप्त हो वह अन्न कहा जाता है । ब्रह्मा से लेकर स्तंब पर्यंत सभी जीव कोटि में ही आते हैं और इस न्याय से चन्द्रमा जीव ही है । और वह आत्म प्रकाश से ही औषधियों को पुष्ट करता है ऐसा समझना चाहिए ।
           भावार्थ— उस महान आत्मा के प्रभाव से ही पृथ्वी आदि धारित हैं ॥१३॥

            संबंध— वह परेश्वर ही चतुर्विध अन्न को पचाता है—
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्रणिनां देहमाश्रितः ।
प्रणापान समायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१५/१४॥
            शब्दार्थ— मैं ही शरीर का आश्रय लेकर प्राण-अपान से युक्त होकर चारों प्रकार के अन्न पचाता हूँ ।
            तात्पर्यार्थ— वैश्वार अग्नि यानी जठराग्नि होकर प्राण और अपान वायु से भलीभाँति मिलकर भक्ष्य यानी भक्षण करने योग्य चने आदि भुना हुआ अन्न, भोज्य अर्थात रोटी-दाल आदि खाने योग्य, चोष्य यानी चूसने योग्य गन्ना आदि, लेह्य यानी चाटने योग्य चटनी आदि इन चारों प्रकार के अन्न पचाता हूँ ।
            भावार्थ— पूर्व श्लोक में भगवान ने कहा था कि चन्द्रमा होकर मैं ही औषधियों और वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ । थोड़ा वनस्पति और औषधि में भेद है जैसे बड़े पेड़ और झाड़ियां वनस्पति और घास और वृक्षों पर चढ़ने और लटकने वाली बेल औषधि है । पूर्व श्लोक का यहां वर्णन करने का भाव यह है कि सोम यानी चन्द्रमा ही खाया जाता है । श्रुति में भी चन्द्रमा देवताओं का भोजन कहा गया है, लेकिन अन्न के रूप में चन्द्रमा ही खाया जाता है और अग्नि ही उसे पचाती है । अतः यह संपूर्ण जगत अग्नि सोममय है । इसे ही रुद्रहृदयोपनिषद में कहा— अग्निषोमात्मकं जगत ॥९॥  अर्थात रुद्र अग्नि है और उमा सोम यानी चंद्र । इस प्रकार संपूर्ण जगत अग्नि यानी रुद्र कहिए पुरुष को और अन्न यानी सोम अर्थात उमा कहिए प्रकृति को । संपूर्ण जगत प्रकृति और पुरुषमय है यह भाव यहाँ दिखलाया गया है । संपूर्ण जगत यानी प्रकृति को पुरुष यानी निर्विकार, निर्लेप सर्वात्मा ने धारण कर रखा है यही भाव ‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’ १५/१३ से सिद्ध होता है ।
               विशेष— चैतन्यात्मा वह चाहे जीव रूप बन जाये या ब्रह्म रूप दोनो उपाधि मुक्त होकर एक ही हैं यही यहाँ विशेता बताई गई है ॥१४॥

              संबंध— प्रथम श्लोक में संसार वृक्ष के वर्णन में वेदों को हिलते हुए पत्तों की संज्ञा दी थी और कहा था कि संसार वृक्ष को जो इस प्रकार जानता है वही वेदवित् है, अतः वह वेदवित् किस प्रकार होगा वहां से लेकर संपूर्ण बीच के विषय का यहाँ उपसंहार किया जाता है……
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ठटो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । 
वेदैश्चसर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५/१५॥
            शब्दार्थ— सभी के हृदय में भलीभांति बैठकर मेरे द्वारा ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन किया जाता है । सभी वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ, वेदान्त का उपदेष्टा और वेदार्थ को जानने वाला भी मैं ही हूँ ।
             तात्पर्यार्थ— यहाँ सन्निविष्टः कहा गया है अर्थात मैं भलीभाँति बैठा हूँ । भलीभाँति का मतलब साधू के हृदय में साधू यानी ज्ञान बनकर बैठा हूँ मार्ग दर्शन और लक्ष्य की प्राप्ति कराने के लिए और विषयी के अन्दर विषय बनकर बैठा हूँ कि जिन्दगी भर विषयों का ही चिंतन अर्थात स्मरण करते रहो अतः उनकी स्मृति हूँ एवं जो दूसरों को पीडित करने वाले दुष्ट लोग हैं उनके अन्दर मैं स्मृति और ज्ञान दोनो को नाश करने के लिए कुबुद्धि बनकर बैठा हूँ अर्थात स्मृति और ज्ञान का नाश करने वाला अपोहन हूँ । 
                भगवान ने अध्याय १३/१७ और अध्याय १८/६१ में भी हृदय में रहने की बात करते हैं । वही यहां फिर कहते, लेकिन यहाँ संन्निविष्टः हैं । मतलब जो जिस प्रकार की भावना वाला है उसकी बुद्धि में उसी भावना की पुष्टि अर्थात पोषण करने वाली वृत्ति बनकर बैठे हैं । हम कोई बात भूल गये उसके स्मरण की जो वृत्ति है वह स्मृति है । प्रत्यक्ष वस्तु को समझने की वृत्ति ज्ञान है और मूर्छा की स्थिति में उन दोनो वृत्तियों का लय होने से अपोहन है । स्वप्न में देखी गई वस्तुओं का स्मरण स्मृति है जाग्रत की वस्तु समझ ज्ञान है और सुषुप्ति में इन दोनों का लय ही अपोहन है । गुरू, आचार्य, और शास्त्र से सुना-पढ़ा समय पर उपस्थित होना स्मृति है और उस स्मृति द्वारा सदसद्विवेक ज्ञान है, सामाधि अवस्था या नेति नेति अथवा निर्विकल्पता ही अपोहन है । संशय स्मृति है, संकल्प ज्ञान है इन दोनो का लय अपोहन है । अर्थात ये सारी वृत्तियाँ बुद्धि में ही प्रकाशित होती हैं और बुद्धि मुझसे प्रकाशित होती है अतः सबके मूल में सर्वोपरि होने से मैं सर्वात्मा ही इन तीनो वृत्तियों का प्रकाशक और नाशक हूँ । यह अर्थ हो गया ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् १५/१.का ।
            वेदों को पत्ते की तरह हिलने का रहस्य बताते हैं— वस्तुतः मूढ़ बुद्धि मनुुष्य यह नहीं जानते हैं कि संपूर्ण वेदो को जो कहने का मुख्य तात्पर्य है वह मैं हूँ, वहां स्पष्ट कहा गया है इन्द्र ब्रह्म है, सूर्य ब्रह्म है, खूंटा ब्रह्म है इत्यादि मंत्रभाग में ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ अर्थात ब्रह्मतत्त्व को जानने वालों ने मुझ एक का ही वर्णन अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु आदि के रूप में किया है तो भी अज्ञानी मूढ पुरुष कामनाओं से प्रेरित होकर उन्हें मुझसे भिन्न मानकर यज्ञादि काम्यकर्मों में लगे रहते हैं जिसके कारण वे नाना प्रकार की सत् असत् १३/२१ योनियों में भ्रमण करते रहते हैं और पीपल के पत्ते की भांति कभी स्थिर नहीं होते अर्थात शांति को प्राप्त नहीं करते । पीपल का पत्ता हवा बिल्कुल रुक जाने पर भी जब एक तिनका भी हिलना पसंद नहीं करता है उस समय भी ध्यान से देखें तो हिलता मिलेगा यही काम्यकर्मियों की दशा कही गई है । जबकि संपूर्ण वेदों द्वारा उनके तात्पर्य में मैं ही जानने योग्य हूँ अर्थात अहं वृत्ति से प्रस्फुटित अस्मि रूप अनुभूति का लक्ष्यभूत अस्ति पद ही जानने योग्य वेदों द्वारा है ऐसा तात्पर्य है
             अब कहते हैं कि मैं ही वेदान्त का करने वाला यानी उपदेष्टा हूँ  तो सृष्टि के आदि में वेद ब्रह्मा को प्रदान किया और वेदों के तात्पर्य का उपदेश किया, यही उपदेश ब्रह्मा ने अपने पुत्र वशिष्ठ को और उन्होंने अपने पुत्र शक्ति को, शक्ति ने परासर को और परासर ने कृष्णद्वैपायन को इस प्रकार वेदो के तात्पर्य वेदान्त की संप्रदाय परंपरा के आचार्य स्वयं नारायण ही हैं । जिसकी श्वास वेद हैं उनसे अधिक वेद के तात्पर्य को और कौन जान सकता है ? अतः वेदान्त के उपदेष्टा उपाधिविशिष्ट नारायण हैं । 
            यहां कोई शंका कर सकता है ऊपर तो परमेश्वर को बुद्धि में बैठाकर अहं का अर्थ आत्मा किया है तो यहाँ अहं का अर्थ परमात्मा कैसे हो गया ? इसका समाधान यह है कि पहले तो ठीक से ऊपर पढ़ो । अध्याय तेरह से लेकर कहीं भी आत्मा से भिन्न कोई परमात्मा नाम की चीज मिली नहीं है वह आत्मा ही कार्य के अनुसार अनेक नाम धारण करती है उन्हीं में एक नाम ईश्वर, परमात्मा या ब्रह्म भी है । अतः यहां भी वेदान्त का रचयिता वही प्रत्यगात्मा ही है । वेदों के तात्पर्य की जो अनुभूति है वही वेदान्त जिसे ‘ऋषिभिर्बहुधा गीतम्’ १३/४ द्वारा भी कहा है तो ऋषि का लक्षण शरीर करेंगे या प्रत्यगात्मा ? प्रत्यागात्मा ब्रह्म से भिन्न है या अभिन्न ? भिन्न कहने मात्र से देश काल परिच्छिन्न हो जायेगा परिच्छिन्न होते ही किसी न किसी शरीर वाला हो जायेगा भले ही वह ब्रह्मा जी की तरह मानस शरीर ही क्यों न हो…!! जैसे मन का नाश हो जाता है वैसे परिच्छिन्न का नाश होना निश्चित है भले ही जीव हो अथवा ब्रह्म । अतः ये शंका निर्मूल है ।
             अब कहते हैं कि वेदवित्  अर्थात वेद को जानने वाला भी मैं ही हूँ । वेद इदमर्थक यहाँ पर है अतः क्षेत्र के अन्तर्गत है और क्षेत्र को वही जान सकता है जो पूर्णतः असंग पुरुषः परः १३/२२ हो अर्थात परम पुरुष या पुरुषोत्तम हो । दूसरी बात ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति अर्थात ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म होता है अर्थात ब्रह्म ही ब्रह्म को जानता है इस न्यास से जिस ब्रह्म के साथ एकात्मानुभूति हो चुकी है वही वेद के रहस्य को जानता है । ऋषि आदि ये सभी आत्मरूपता से स्वयं को स्वयं से जानने वाले वेद वेत्ता मेरा ही साक्षत अभिन्न स्वरूप हैं ।
           अथवा सबके हृदय में स्थित होने का अर्थ यह है कि बुद्धि पर जिस चैतन्य का प्रकाश पड़ रहा है वह आत्मप्रकाश मैं ही हूँ, पूर्व में किये गये क्रिया कलापों की स्मृति, स्वरूप विषयक ज्ञान एवं विस्मृति अर्थात ज्ञान पर पर्दा डालने की विपरीतता भी मुझ सर्वेश्वर से ही होती है । 
          वेदों में विभिन्न देवो की भिन्न भिन्न आराधना दिखने पर भी उन सबका तात्पर्य जानने योग्य इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य आदि के माध्यम से मैं ही जानने योग्य हूँ । वेदान्तकर्ता अर्थात वेदान्त की परंपरा का रचयिता मैं ही हूँ । यही गीता के चतुर्थ अध्याय में ‘इमं विवश्वते योगम्’ से स्वतः सिद्ध है, प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । वेदों का जो तात्पर्य है वह मैं ही जानता हूँ । अर्थात वेदों का जो भी तात्पर्य जानता है वह साक्षात् नारायण ही है ।
             यहां पर द्वैतवादियों को पहले ही यह समझना होगा कि अभी इसी श्लोक में भगवान ने कहा कि प्राणियों के हृदय में आत्मप्रकाश रूप से मैं ही हूँ इसके साथ ही पूर्व के दो श्लोकों में विभूति रूप से जीव रूप में स्वयं को स्वीकार किया है अर्थात जीव से अभिन्न माना है और इससे भी पहले बाहवें और छठे श्लोक में भी अभिन्नता सिद्ध की है । संपूर्ण गीता ही ब्रह्मात्मैक्यता से परिपूर्ण है ।
              भावार्थ— इस प्रकार अध्याय के प्रारंभ से यहां तक बताना तो अपना प्रभाव था लेकिन प्रभाव बताने के साथ यह भी बता दिया कि जिनको मैने अपनी विभूति बताया है वे भी तो जीव ही हैं जैसे— ‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः’ १०/१७ यहाँ वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव भगवान हूँ यह भाव नहीं है वरन् यह भाव है कि वृष्णिवंशियों में जो श्रेष्ठ पुरुष हुए हैं उन सबमें श्रेष्ठ पुरुष मैं हूँ, इही प्रकार पाण्डवों मे सबसे श्रेष्ठ अर्जुन को बताते हैं न कि भगवान । इसी प्रकार असुर गुरु शुक्राचार्य, सर्प, नाग, गरुड़ आदि को भगवान बताना नहीं बल्कि श्रेष्ठता बताकर अपनी जीव से अभिन्नता बताना यही भगवान का लक्ष्य है जिसे उन्होंने यहां सिद्ध कर दिया एकमेवाद्वीतीयम् के अतिरिक्त कुछ नहीं है और अगर कुछ है तो वह भ्रम है और उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है ‘नासतो विद्यते भावो’ २/१६ ऐसा भावार्थ है ॥१५॥

            संबंध— अध्याय के प्रारंभ से उपरोक्त श्लोक तक रूपक सहित संसार, बद्ध जीव और विशुद्ध निरुपाधिक आत्मतत्त्व का वर्णन उसके प्रभाव सहित किया । अब पूर्वोक्त विषय का तीन श्लोकों में स्पष्टीकरण करण किया जाता है । 
            अतः अब यहाँ से आगे का तात्पर्य विवेक पूर्वक समझने का प्रयत्न करें कि ये दो प्रकार के पुरुष क्या हैं ? इन दोनों से भिन्न तीसरा पुरुष क्या है ? ‘अस्मि’ एवं ‘माम्’ से क्या तात्पर्य है ? श्रुति शास्त्र पहले अध्यारोप और फिर अपवाद करके तत्त्व निर्णय करता है, यही प्रक्रिया बताने के लिए पहले संपूर्ण वर्ग को दो विभागों में स्पष्ट करते हैं……
द्वामिमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१५/१६॥
              शब्दार्थ— इस संसार में दो प्रकार के पुरुष कहे गए हैं— क्षर और अक्षर भी । संपूर्ण भूतों को क्षर एवं अक्षर को कूटस्थ कहा गया है ।
               तात्पर्यार्थ— इस श्लोक का हम दो प्रकार से चिंतन करेंगे एक वह जो अभी तक मन में बैठा है और दूसरा वह जो हमारे आचार्य शंकर से लेकर अन्य अद्वैताचार्यों ने मार्ग दर्शन किया है । हमारे अपने विचार को इसलिये भी प्रकट करने की आवश्यकता है कि जिन्होंने कूटस्थोऽक्षर का अर्थ मुक्तात्मा मात्र इसलिए किया है कि उन्हें प्रत्येक स्थिति में जीवात्मा को परमात्मा से भिन्न दिखाना है । उन्होंने अध्याय छः के श्लोक ३१ में एकत्वमास्थितः का अर्थ भी ब्रह्म के समान किया है ब्रह्म से अभिन्न नहीं और अनेक जगह पर अपरिछिन्न ज्ञान स्वरूप भी कहा है लेकिन ब्रह्म नहीं माना है । पता नहीं अपरिछिन्न कहकर भी आत्मा का परिच्छिन्न वर्णन किस आधार पर करते हैं । अध्याय १३/२ में भी इसी स्थान का उदाहरण प्रस्तुत करके क्षेत्रज्ञ १३/२ को शुद्धात्मा तो माना है किन्तु ब्रह्म से अभिन्न नहीं माना, ब्रह्म के समान माना है और उसका उदाहरण दिया ‘मम साधर्म्यमागताः’ १४/२ इसका उत्तर भी १४/२ में दे दिया है । जीव को भी कूटस्थ कहा गया है और ईश्वर को भी । अन्य भी बहुत सी समानताएं जीव और ब्रह्म की कही गई हैं किन्तु उन समानता को लेकर तो हम अर्थ नहीं करते सकते । उदारहण इसी अध्याय के आठवें श्लोक में ईश्वर स्पष्ट रूप से शब्द जीव के लिए आया है । अब नाम समानता से जीव ईश्वर तो नहीं हो गया ? अतः हमें यथावत स्थान एवं प्रसंगानुसार ही अर्थ करना उचित होगा । हम जो अर्थ करने जा रहे हैं उससे मधुसुदन सरस्वती जी सहमत नहीं हैं । उनका तर्क हैं कि लक्ष्य शुद्ध ब्रह्म का प्रतिपादन है इसलिए कूटस्थोऽक्षर का अर्थ जीव युक्ति संगत नहीं है । तथापि मेरा मत कहता है जैसे रात्रि के बिना दिन की कोई पहचान नहीं होती, वैसे ही जब तक मायोपाधिक का वर्णन नहीं होगा तब तक निरुपाधिक का वर्णन कौन समझेगा ? फिर भी हम साधारण प्राणी होकर आप आकाश को समझ नहीं सकते हैं अतः आपमें नीलापन न होकर भी नीलापन देखना हमारा स्वभाव है, फिर भी जैसे आकाश किसी को अपने से बाहर नहीं फेंक सकता उसी प्रकार आप अपनी कृपा दृष्टि से हमें वंचित नहीं कर सकते । आप सभी के श्रीचरणों में नमन करता हुआ अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगता हूँ……
                मेरे विचार— संपूर्ण जगत को दो विभागों में बांट दिया गया है अध्याय सात में अपरा और परा प्रकृति ये दोनो स्त्रीलिंग हैं । अध्याय तेरह में इदं और क्षेत्रज्ञं, अर्थात यह और ज्ञाता पुरुष। इसमें इदं नपुंसक है । यहां पर दोनो ही पुरुष हैं । यहाँ क्षर का अर्थ है आकाशादि जड़ वर्ग है । इस जड़ वर्ग को पुरुष क्यों कहा ? इसका कारण है कि बिना पुरुष का संसर्ग प्राप्त किये इसकी कोई सत्ता नहीं है, जैसे दूध में मिला पानी दूध कहा जाता है उसी प्रकार जड़ वर्ग का जब संसर्ग पुरुष से होता है तब वह पुरुष कहा जाता है जैसे कार्य और करण के जड़ संघात को ही मैं यह शिवाश्रम हूँ, मैं मर रहा हूँ, मैं दुःखी हूँ इस प्रकार क्षरणशील जड़ का चेतन पुरुष से संसर्ग होने के कारण इस जड़ को भी पुरुष कहा गया है । जो कूट यानी माया है उसमें जो अक्षर पुरुष बैठा है कूट+स्थ, वही कूटस्थ अक्षर जीव संज्ञा वाला कहा गया है । इस प्रकार से यहाँ कूटस्थोऽक्षर का अर्थ मुक्तात्मा कभी नहीं हो सकता है । अष्टम अध्याय में भी जो उत्पन्न और नाश होने वाले शरीरादि हैं उसको अधिभूत और जो अहं भाव का स्फुटन स्थल स्व का भाव अर्थात शरीर और इन्द्रियों से भिन्न उसे अध्यात्म और स्वयं को अधियज्ञ कहा है । यहाँ हम थोड़ा क्षर अक्षर और आगे आने वाले पुरूषोत्तम के बारे में गीता के माध्यय से देखते हैं—
        क्षर— अपरा प्रकृति, अधिभूत, कर्म क्षेत्र, महद्ब्रह्म, योनि ।
      अक्षर— परा प्रकृति, जीव, अध्यात्म, अधिदैव, क्षेत्रज्ञ, गर्भ, बीज ।
         पुरुषोत्तम— अहम्, ब्रह्म, अधियज्ञ, माम्, पिता । इसी आधार पर यहां तीन प्रकार के पुरुष में कूटस्थोऽक्षर का अर्थ माया में बैठा जीव भी युक्तिसंगत मुझे लगा । यहां क्षर और अक्षर को स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग कहकर परस्पर अभिन्नता बताना ही लक्ष्य है कि एक ही वस्तुतत्त्व अनेक रूपों में प्रतिभासित हो रहा है ।
              यहाँ क्षर के अर्थ में सूक्ष्म इन्द्रियां भी कही जायेंगी क्योंकि हमारे जीते जी वाणी का क्षरण हो जाता है जाता है, हम बोल नहीं सकते, स्पर्श का अनुभव नहीं होता है, नेत्रेन्द्रिय आदि भी काम नहीं करते फिर भी मैं हूँ इसमें किसी को संदेह नहीं होता है । यह जो कूट भाव है कि बाहर से तो कुछ और दिख रहा था और अन्दर से कुछ और, यही माया यानी प्रकृति का कार्य है और इसी प्रकृति में जो अक्षर आत्मा बैठा है उसको ही प्रकृतिस्थ १३/२१ कहते हैं और वही यहां कूटस्थ कहा गया है यह इसका भाव है । मैं अपने इन विचारों से कुछ विचलित था क्योंकि मेरा शास्त्राध्ययन न होने से कोई साक्ष्य उपस्थित नहीं कर सकता था । तथापि लिखते लिखते हमें स्वामी अखंडानंद जी को देखने लगा और वहीं श्रीधर स्वामी का वरद हस्त सिर पर आ गया और उन्होंने इस अर्थ को प्रमाणित कर दिया । 
              साथ ही अभिनवगुप्त जी भी अक्षर का अर्थ  आत्मा करते हैं और कूटस्थ का अर्थ स्थिर रहने वाला करते हैं । मतलब यह कि क्षर यानी इन्द्रियों सहित शरीर का विनाश हो जाने पर भी जीव वैसे ही स्थिर रहता है, जैसे निहाई पर पता नहीं कितना लोहा कूट कर बिगाड़ और बिगाड़ कर नया रूप दे दिया जाता है लेकिन वह निहाई ज्यों की त्यों रहती है । इसी प्रकार यह अक्षर जीव पता नहीं कितने क्षरित होने वाले ब्रह्मा से लेकर स्तंब पर्यंत अथवा देव से लेकर कीट पर्यंत शरीर धारण करता है और उनका नाश भी हो जाता है किन्तु वह आत्मा ज्यों का त्यों है उसका कुछ भी नहीं बिगड़ा । ऐसे भाव में स्थिर रहने वाला कूटस्थ और अक्षर का मतलब आत्मा ।
              अब विचार करते हैं अपनी आचार्य परंपरा से— हमारे सभी अद्वैताचार्यों ने— जिनका मैं अवलोकन कर चुका हूं उन्होंने क्षर और अक्षर को कार्य और कारण भाव से अर्थ किया है । कार्य संपूर्ण जड़ चेतन जगत है । यह नित्य निरंतर क्षरण को प्राप्त हो रहा है । जड़ वर्ग चैतन्य पुरुष के प्रकाश से संयुक्त है अतः पुरुष कहा गया है । इसमें जिसे चेतन यानी अविनाशी जीव है उसका क्षरण यही है कि कभी देव योनि, तो कभी मनुुष्य तो कभी पशु, पक्षी, वृक्ष आदि के रूप में ऊपर नीचे पटका जाता है इस प्रकार उसके नित्य आनन्द का भी क्षरण हो जाता है । अतः जीव सहित यह क्षर पुरुष कहा गया है । कूट का अर्थ होता है छल, प्रपंच से परिपूर्ण, अस्थिर, राग द्वेष काम क्रोध आदि जिसमें कूट कूट कर भरे हों और उसमें जो बैठा हो वह है कूटस्थ । मतलब माया अक्षर होकर भी छल प्रपंच में बैठी है, छुप कर सब कार्य कर रही है इसलिए कूटस्थ है । माया परमात्मा की अभिन्न शक्ति है इसलिए अक्षर है । संपूर्ण प्राणियों के कर्मों के बीज का संरक्षण करती है और समयानुसार उसको उत्पन्न या नाश करती है । इस प्रकार संपूर्ण जगत की हेतुभूता जो तीनो गुणों की जो साम्यावस्था प्रकृति है वही यहाँ कूटस्थ अक्षर कही गई है ।
              समन्वय भाव— इस प्रकार दोनो अर्थ सार्थक हैं जब कूटस्थोऽक्षर का अर्थ जीव करेंगे तो जीव उपाधि वाला होगा और जब कार्य कारण भाव से कूटस्थ का अर्थ अव्यक्त प्रकृति करेंगे तो वह भी बिना अधिष्ठान के नहीं हो सकती अतः जीव अगर उपाधि वाला है तो वह ब्रह्म नहीं हो सकता । एक उपाधि को लेकर और दूसरा अधिष्ठान को लेकर है, किन्तु ब्रह्म अधिष्ठान वाला न होकर है वरन् सबका अधिष्ठान है, और न ही उपाधि वाला है वरन् उपाधि रहित है इन दोनो प्रकार के ही विचार से दोनो ही अर्थ सार्थक हैं क्योंकि वह इन दोनों से भिन्न है । जैसे रस्सी में दिखने वाले सर्प का अधिष्ठान रस्सी है, इसका मतलब सर्प दिख भले रहा हो लेकिन रस्सी का ज्ञान होते ही सर्प नष्ट हो जायेगा, वैसे ही अधिष्ठान के ज्ञान से माया का नाश, और उपधि के नाश से जीव का नाश हो जाता है और एक मात्र चिन्मयमय तत्त्व जिसे आत्मतत्त्व या पुरुषोत्तम नाम से आगे कहा जायेगा वही शेष बचता है । यही आत्मा और परमात्मा, जीव और ब्रह्म का प्रतिपादन गीता का लक्ष्य है । 
             मूल में एव पद जो आया है वह इस बात को पुष्ट करता है कि भले ही क्षर और अक्षर भिन्न दिखते हों लेकिन वे मुझसे अभिन्न ही हैं । जैसे— क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि १३/२ में अपि आया था । 
           अथवा क्षर प्राणियों के अन्तर्गत संपूर्ण आकाश आदि महाभूत, मन सहित छः इन्द्रियों का समूह सूक्ष्म जीव, ये सभी निरंतर क्षरण को प्राप्त हो रहे हैं यही सर्वाणि भूतानि से अर्थ उचित प्रतीत होता है । प्रथम श्लोक में जिसे मायोपाधिक हिरण्गर्भ कहा गया है यह संसार में यद्यपि देखने में नहीं आता है । तो भी सभी प्राणियों की समझ से विलक्षण संपूर्ण सृष्टि का कूट यानी छिपा हुआ कारण है । संसार के प्राणियों का नाश होने पर भी उसका नाश नहीं होता अर्थात संसारी प्राणियों अपेक्षा से वह मुक्त एवं अक्षर पुरुष है इसलिये समष्टि में हिरण्गर्भ को ही गीता  के इसी अध्याय में अविनिशी कूटस्थ कहा गया है । समष्टि में समष्टि नायक जानें, किन्तु शरीर और मन सहित संपूर्ण इन्द्रियों के लय हो जाने पर भी मनुष्य प्राणियों का कारण शरीर ज्यों का त्यों रहता है और यह कारण शरीर ही संपूर्ण विस्तार का बीज है । होने पर भी कूट भाव में स्थित है, अतः यह कारण शरीर ही अविनिशी पुरुष कहा गया है ।
            सर्वाणिभूतानि को विशेषण मानकर उड़िया बाबा ने क्षर के अन्तर्गत कारण शरीर का नाश मानते हुए आचार्य शंकर के अनुसार माया को अक्षर कूट माना है । यह अर्थ उचित है तथापि मेरा प्रश्न यह है कि जिस समय कारण शरीर का ही नाश हो गया तो फिर माया किसको लेकर अक्षर है ? क्योंकि माया तभी तक है जब तक कोई भी उपाधि है भले वहां अहं के उत्पत्ति का केन्द्र कारण शरीर ही क्यों न हो । अतः अक्षर माया मानने में कोई आपत्ति नहीं है किन्तु व्यष्टि में कारण शरीर के नाश का अर्थ हुआ हिरण्गर्भ गर्भ का नाश । हिरण्गर्भ का नाश होने पर माया अपने अधिष्ठान में स्वतः प्रविष्ट हो जाती है अर्थात नष्ट हो जाती है । फिर माया अक्षर कैसे हुई ?  अतः यहाँ कूटस्थ का अर्थ कारण शरीर का नाश मेरे लिए सर्वथा अमान्य है । और कूटस्थ का अर्थ समष्टि में हिरण्गर्भ और व्यष्टि में कारण शरीर ही अपेक्षित है ।
            इसे समझने के लिए पुनः श्लोक एक से लेकर श्लोक चार तक की समष्टि और व्यष्टि में व्याख्या देखें ।
              भावार्थ— जीव-ब्रह्म, आत्मा परमात्मा उपाधि से भिन्न कहा गया है, वस्तुतः उपाधियों का नाश हो जाता है परन्तु ‘अस्ति’ मात्र कही जाने वाली सत्ता मात्र शेष बचती है यही उस सर्वात्मा के साथ अभिन्नता है । यही इस श्लोक का भाव है ॥१६॥

             संबंध— क्षर अक्षर से विलक्षण उत्तम पुरुष का वर्णन……
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृत्य । 
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्य ईश्वरः ॥१५/१७॥
              शब्दार्थ— किन्तु उत्तम पुरुष उन दोनों से विलक्षण है जिसे परमात्मा इस प्रकार कहा गया है । जो तीनो लोकों में प्रवेश करके भरण-पोषण करता है/धारण करता है ।
             तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में कुछ विद्वान कूटस्थ अक्षर का अर्थ मुक्तात्मा करने के साथ ही यहां पर तीन लोक का अर्थ करते हैं— लोक्यत इति लोकः अर्थात जो देखा जाये वह लोक है । इस न्याय से अचेतनं तत्संसृष्टः चेतनो मुक्तः इति च प्रमाणावगम्यम् अर्थात जड़, और उससे संयुक्त चेतन अर्थात बद्ध जीव और मुक्तात्मा इस प्रणाम से ये तीन लोक हैं । एतत्त्रयं य आत्मतया आविश्य विभर्ति अर्थात इन तीनो को जो आत्म रूप से धारण करता है/भरण पोषण करता है वह परमात्मा कहा गया है । अब यहाँ पर यह शंका बनती है कि आपके अनुसार आत्मा मुक्त होने पर भी देखा जाता है तो वह द्रष्टा हुआ या दृष्य ? क्योंकि दृष्य ही देखा जाता है । अतः द्रष्टा तो हो नहीं सकता । दृश्य कहने पर वह किसी न किसी शरीर वाला तो अवश्य होगा । जब शरीर होगा तो वह असंग हो नहीं सकता । जब तक असंग नहीं होगा तब तक उसकी मुक्त संज्ञ कैसे हो सकती है ? इस प्रकार से भी यहाँ कूटस्थ अक्षर का अर्थ मुक्तात्मा न होकर बद्धजीव ही होगा । जिस परमात्मा को यहाँ आत्म रूप में मान लिया है उसी प्रकार क्षेत्रज्ञ १३/१ को क्षेत्रज्ञ १३/२ मानने में क्या आपत्ति है ? क्योंकि जब वही क्षेत्रज्ञ १३/१ बन सकता है तो क्षेत्रज्ञ १३/१ से क्षेत्रज्ञ १३/२ क्यों नहीं बन सकता ? तथा यहाँ परमात्मा आदि जो कहा गया है उसे १३/२२ में जीव की ही उपावधि विशेष कहा गया है । अतः यहाँ पर भी आपका ईश्वर परमात्मा बद्ध जीव ही होना चाहिए ? क्योंकि वहां आने भी वहां ‘पुरुषः परः’ से अभिन्न न करके आत्मा को स्वतंत्र माना है ।
              इसी प्रकार ईश्वर ही तीनो लोकों में प्रवेश करके उन्हें धारण करता है जो यहाँ कहा उसी को जीवभूतां महाबहो धार्यते जगतः ७/५ अर्थात जीव ही संपूर्ण लोकों को धारण करता है । अब यहाँ ईश्वर जीव है या जीव ईश्वर ? अब या तो ईश्वर को जीव मानो या जीव को ईश्वर जैसा कि १५/८ में जीव को ईश्वर कहा भी है । इसके अतिरिक्त श्रुति भी कहती है कि ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्’ संपूर्ण जगत की सृष्टि करके उसमें प्रवेश कर गया । श्रुति के इस वाक्य में जीव ने प्रवेश किया या हिरण्यगर्भ ने ? जहाँ से गांठ होती है वहीं से खुलती है इस न्याय से आप देखिए— जीवभूतां ७/५  अर्थात वह जीव है नहीं, जीव बना है, जीवभूतः सनातनः अर्थात वह सनातन परमात्मा यहाँ भी जीव है नहीं बल्कि बना है जीवभूतः । जैसे कोई अपने घर में धन धान्य संपन्न व्यक्ति नाटक के अभिनय में भिखारी बने वैसे ही वह जीव बना है, है नहीं । इस प्रकार सबसे विलक्षण बात यह है कि जीव नाम की कोई चीज ही नहीं है सब माया है, भ्रम है । अधिक समझने के लिए श्लोक १३ की व्याख्या देखें । इसी विलक्षणता को दिखने के लिए यहां मूल में अन्य शब्द आया है, भेद दिखाने के लिए नहीं । विलक्षणता यही है कि वह ईश्वर का अंश है, उससे अभिन्न है, सदा एकरस आनंद वाला है, असंग और निर्विकार है तो भी वह जब से जीव बना, तब से वह अपने असंग भाव की ओर ध्यान भी नहीं देता और निरंतर जड़ प्रकृति की ओर आकर्षित होता रहता है जबकि जो उत्तम पुरुष आत्मदर्शी हैं वे सदैव असंग और मुक्त होते हैं वही परुषः परः १३/२२, यहाँ का उत्तम पुरुष और अगले श्लोक का पुरुषोत्तम होते हैं । ‘विमूढ़ा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञान चक्षुषा’ १५/१० अर्थात जो माया द्वारा मोहित हो रहे हैं वे मूढ इस रहस्य को नहीं देख सकते मतलब अनुभव नहीं कर सकते, किन्तु ज्ञाननेत्र वाले इसका अर्थात आत्मा का अनुभव करते हैं । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जिस समय माया की उपाधि अपने स्वरूपावलोकन से नष्ट हो जायेगी, वह असंग हो जायेगा, उसी समय जीव ब्रह्म की एकता हो जायेगी । अर्थात जीव ब्रह्म हो जायेगा वरन् इसी को आचार्य शंकर कहते हैं— जीवो ब्रह्मैव नापरः । वस्तुतः जीव भ्रम है वस्तु स्थिति नहीं । 
              हमारी अद्वैत परंपरा के अनुसार उपरोक्त विचार माया दृष्टि से करने पर कूटस्थ का अर्थ छल, प्रपंच युक्त बाहर से कुछ और भीतर से कुछ और है जैसा कि— न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । १५/३ जैसा ये प्रकृति या माया दिखती है रमणीय, आकर्षक, सुखदायिनी इत्यादि वैसी विचार करने पर उपलब्ध यानी प्राप्त नहीं होती है । इसके आदि, अन्त और मध्य में कही भी स्थिरता नहीं दिखती । ऐसी ये माया है और माया अपने अधिष्ठान के बिना हो नहीं सकती । इसका अर्थ यह हुआ कि अधिष्ठान के ज्ञान से माया भी नष्ट हो जायेगी । जब तक अधिष्ठान का ज्ञान है तब तक यह अक्षर है और जड़, और उससे युक्त प्राणी क्षरित अर्थात विनाश जैसी परिवर्तनशील गति को प्राप्त होते रहेंगे उन क्षरणशील प्राणियों की अपेक्षा से माया अक्षर है और अधिष्ठान का ज्ञान होते ही वैसे ही नष्ट हो जायेगी जैसे रस्सी रूप अधिष्ठान में प्रातिभासिक सर्प का, यह रस्सी है ऐसा अधिष्ठान का ज्ञान होते ही नाश हो जाता है । इसी को आचार्य शंकर कहते हैं— ‘मायामित्रमिंदं द्वैतं अद्वैतं परमार्थतः’ । इस प्रकार एकमेवाद्वीतीयम् के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं । यह अर्थ हुआ उपाधि रहित परमात्मा का ।
               दूसरे प्रकार से तीनो लोक के अन्तर्गत पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग ये तीन । विश्व, तैजस, प्राज्ञ ये तीन । स्थूल, सूक्ष्म, कारण ये तीन । जाग्रत, स्वप्न सुषुप्ति ये तीन । ये सभी लोक ही हैं । इन सबके अन्दर प्रविष्ट एक ही आत्मा इनका इनकी प्रकृति के अनुसार भरणा पोषण भी करता है और धारण भी करता है । इसी कारण वह इन सब अवस्थाओं पर शासन करने के कारण ईश्वर कहा गया है ।  इन तीनो अवस्थाओं को जानने वाला होने से वह इन सबसे अन्य अर्थात विलक्षण और उत्तरोत्तर की उत्तमता से भी उत्तम है । इन्द्रियों से परे मन, मन से परे बुद्धि, बुद्धि से परे अव्यक्त अर्थात जहाँ इन्द्रियां, मन, बुद्धि अपने भाव को त्यागकर बीज रूप से जिसमें विश्राम करती हैं वह महद्ब्रह्म १४/४ परे है और उससे भी परे आत्मा है यही आत्मा परमात्मा कहा गया है । ईश्वर का अर्थ होता है शासक इसे सगुण ब्रह्म या हिरण्यगर्भ भी कह सकते हैं क्योंकि जब तक मायोपाधिक नहीं होगा तब तक क्रियमाण नहीं हो सकता है, क्योंकि क्रिया मात्र प्रकृति में है पुरुष में नहीं ।              

                 भावार्थ— रस्सी में जिस समय रस्सी दिख रही है उस समय भी रस्सी है, जिस समय उसमें सांप दिख रहा है उस समय भी रस्सी है और प्रातिभासिक सर्प के नाश हो जाने पर भी रस्सी है । उसी प्रकार जिस समय अधिष्ठान का ज्ञान हो जाता है उसी समय जीव ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति कर लेता है । इसमें अहं अर्थात मैं और अस्मि सत्ता का वाचक है । ब्रह्म एक ढांचा या शरीर है । जो तत्त्वज्ञान होने पर भी परिच्छिन्न भाव की द्योतक है । जिस समय अहमस्मि में सत्ता की अनुभूति होती है उस समय ब्रह्म नाम का ढांचा भी ढह जाता है और मात्र अहमस्मि सत्ता बचती है क्योंकि अहं की अनुभूति इदं की अपेक्षा से होती है । यह अहमस्मि की अनुभूति का भी लय होकर अस्ति नाम की सत्ता बचती है । अब उस आत्मा को जिसे क्षेत्रज्ञ १३/१ और १३/२ कहा था वही सत्ता अब अस्ति मात्र बचती है । यही जीव-ब्रह्म का एकत्व है । शेष परमात्मा, ईश्वर, नाम की कार्यविशेष को लेकर धारण की हुई जीव की भांति उपाधियां हैं वस्तु स्थिति नहीं ।
          अथवा यहाँ पर जिसे उत्तम पुरुष कहा गया है वही तीनो लोकों में प्रवेश करके सबका भरण पोषण करने वाले ईश्वर के नाम से कहे गये हैं । यह जो क्रिया भाव है, इस भाव को लेकर भले कोई ईश्वर का अर्थ शुद्ध ब्रह्म करता हो तथापि मुझे इससे भिन्न कुछ और ही दिखता है । अध्याय ७/३० में अधिभूत और अधिदैव का अर्थ क्रमशः संपूर्ण क्षरणशील स्थूल स्थावर जंगम प्राणी, एवं कारण/हिरण्गर्भ । हिरण्यगर्भ का अर्थ अधिकांश रजोगुण प्रधान ब्रह्मा को ही माना गया है । इसके बाद तीसरा आता है अधियज्ञ जिसका अर्थ सत्त्वगुण प्रधान विष्णु किया गया है जिस स्पष्टीकरण अध्याय आठ में दिया गया है । अर्थात ब्रह्मा को भी जन्म देने वाले विष्णु या वैदिक शब्दों में विराट कहा गया । इस प्रकार पूर्व के दो पुरुष जो अधिभूत और अधिदैव नाम से जाने जाते हैं और पुरुष अर्थात शुद्ध ब्रह्म के चैतन्य प्रकाश से सम्बद्ध होने के कारण पुरुष नाम से कहे गये हैं इन तामस और राजस से सात्त्विक यज्ञपुरुष श्रेष्ठ है क्योंकि यही सबको धारित और पोषित करता है एवं सब पर शासन करने वाला सबका स्वामी होने से ईश्वर नाम से जाना जाता है । इस प्रकार यहाँ पर अध्याय सात के अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ की व्याख्या इन दोनो श्लोकों में पूर्ण हुई ॥१७॥

               संबंध— दो श्लोक में क्षर अक्षर से विलक्षण उत्तम पुरुष बताकर अब उसका कारण कहते हैं……
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१५/१८॥
               संबंध— जिसलिए मैं क्षर से अतीत और अक्षर से भी उत्तम हूँ इसलिये लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम है प्रसिद्ध हूँ ।
                तात्पर्यार्थ—क्षर से अतीत अर्थात संपूर्ण क्षरणशील पदार्थ नित्य क्षरण को प्राप्त हो रहे हैं, इसलिए वे स्थिर तत्त्व परमात्मा को तो जान ही नहीं सकते, जैसे रात्रि में कोई यात्रा कर रहा बस में बैठकर तो रास्ते में क्या आया क्या गया पता नहीं चलता है वैसे ही निरंतरगतिमान पदार्थ मुझे जान ही नहीं सकते । यह भाव हो गया क्षर पुरुष का । कूटस्थ अक्षर अर्थात जड़ संसर्ग में संलिप्त जीवात्मा यद्यपि जान सकता है किन्तु उसका आकर्षण मेरी ओर न होकर माया की ओर है ‘प्रकृतिस्थानि कर्षति’ १५/७ अर्थात उसका आकर्षण भोगों की ओर होने से वह भी मुझे नहीं जान सकता इसलिये मैं इन दोनो से उत्तम हूँ । इसका अर्थ यह हुआ कि जीवात्मा का आकर्षण प्रकृति की ओर न होकर पुरुष की ओर हो जाये तो वही उत्तम पुरुष है, इसी को ‘पुरुषः परः’ १३/२२ कहा गया है । इस प्रकार कूटस्थ के अर्थ जीवात्मा संबंधित संपूर्ण गीता में बहुत देखा जा सकता है तथापि विस्तार की अपेक्षा इतने में ही लयभाव को समझना पर्याप्त है ।
                 दूसरे पक्ष में कूटस्थ अक्षर का अर्थ छल प्रपंच में संलग्न माया करते हैं तो भी अध्याय १४ में प्रकृति को योनि बताकर उसमें बीज स्थापित करने की बात कहकर प्रकृति के गर्भ का वर्णन किया जिससे संसार का प्रादुर्भाव होता है । उसमें प्रकृति कूट है और बीच अक्षर । उस अक्षर का कूट में स्थित होना ही कूटस्थ है और यही जीव का कारण शरीर यानी बीज है । यह पुरुष की अनिर्वचनीय अभिन्न माया ही उसकी शक्ति है । यहीं से संपूर्ण अध्याय चौदह का अध्ययन प्रकृति की महत्ता का कर लेना चाहिए । अब पहुंच गये अध्याय १५ में । यहाँ कहते हैं ‘ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्’ १५/१ जिसकी जड़े सबसे ऊपर हैं । तो इन्द्रिय, से परे मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे तीनों गुणों की साम्यावस्था मूल प्रकृति उत्तरोत्तर सबसे परे अर्थात ऊपर हो गई । उस मूल प्रकृति में चिदाभास ही बीज है अर्थात प्रकृति में चिद् प्रकाश का पड़ना ही गर्भ स्थापन है । यही संपूर्ण जगत का कारण हिरण्यगर्भ ही अक्षर है और संपूर्ण जीवों की उत्पत्ति का हेतु है । इसे जीव का हेतु होने से जीव भी कहते हैं । इस बीज की वृद्धि— मूल प्रकृति के तीनों गुणों का विभाजन ही गर्भ वृद्धि है । पहले तीनो गुण पूर्णतः अलग होते हैं और फिर उनका आनुपातिक मिश्रण होकर संसार की उत्पत्ति कही गई है । अतः यहां हिरण्यगर्भ का अर्थ कारण शरीर समझना चाहिए । जब तक कारण शरीर नही नष्ट होता है तब तक जीव अक्षर है तो भी वह प्रकृतिस्थ होने के कारण उत्तम नहीं है । जो प्रकृति का अतिक्रमण कर चुका है वही उत्तम पुरुष है । इसीलिए लोक में— लोक का अर्थ है ऋषियों मुनियों द्वारा जो अनुभव किया गया है और जो अनुभवगम्य के विषय में कहा है वह भी और वेदों में भी प्रसिद्धि है कि वह पुरुष (आत्मा) उस परं ज्योति को पाकर वही रूप हो जाता है इसलिये पुरुषोत्तम है । यहां लोक का अर्थ भक्तियोगी अनुभव शील और वेद से तत्त्वदर्शी ऐसा भी अर्थ किया जा सकता है । इस प्रकार मेरी प्रसिद्धि पुरुषोत्तम नाम से है । 
              अथवा जिसमें क्षर से अतीत एवं अक्षर यानी कारण शरीर वाला पुरुष अथवा हिरण्गर्भ नाम पुरुष और ईश्वर से भी अतीत, यहां पर दिया गया च शब्द से ईश्वर संज्ञक उत्तम पुरुष भी ले लेना चाहिए । यह मैं ही नहीं अन्य भाष्य एवं टीकाकारों ने भी ‘च’ का अर्थ अनेक जगह अलग से पूर्व के प्रसंगों से अध्याहार किया है, अतः हमने भी वर्तमान प्रसंग से ही ईश्वर का समुच्चय कर लिया है । अर्थात क्षर, अक्षर और ईश्वर से भी जो उत्तम पुरुष अर्थात जिसकी उत्तमता से बढ़कर कोई उत्तम नहीं है ऐसा अनुत्तम पुरुष ही लोक और वेद में पुरुषोत्तम कहा गया है । यहाँ हम यह भी बता दें कि अध्याय १३/२२ में इसी पुरुषोत्तम को ही पुरुषः परः कहा गया है जबकि परमात्मा औपाधिक नाम होने के कारण जीव कोटि के अन्तर्गत कहा गया है । 
                इस प्रकार अध्याय ७/३० के उत्तरार्ध में में कहा गया था कि मृत्यु के समय भी जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के सहित जानकर शरीर छोड़ता है वह परमगति प्राप्त करता है— का विवरण यहां निर्विरोध पूर्ण होता है । अन्यथा वहां के प्रसंग से यहां विरोध उत्पन्न हो जायेगा और शास्त्र की अनर्थकता सिद्धि होगी । यही अध्याय सात का परमेश्वर का समग्र रूप है ‘असंशयं समग्रं माम्’ ७/१ इसी समग्रता को ही दर्शाने के लिए अगले श्लोक में सर्वभावेन और ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’ ७/२ अर्थात जिसे जानकर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा को अगले ही श्लोक में सर्ववित् अर्थात सर्वज्ञ कहकर अध्याय सात की प्रतिज्ञा को पूर्ण करते हैं ।
                   भावार्थ— इस प्रकार भी समझ सकते हैं जाग्रत अवस्था स्थूल जगत क्षरणशील, स्वप्नावस्था में यद्यपि प्राणी से मनुष्य स्वयं अकेला होता है तथापि भिन्नता का स्वयं में अनुभव करके नाना प्रकार के क्लेश उस स्वप्न के सूक्ष्म शरीर में भी पाता है । इन दोनों सूक्ष्म और स्थूल शरीरों का जहाँ विलय होता है वह सुषुप्तावस्था है । ये सुषुप्ति ही तमो प्रधान कारण शरीर है । इस तम प्रधान कारण शरीर में अहंवृत्ति तो रहती है किन्तु बीज रूप होने से अनुभव में नहीं आती । यह सुषुप्ति ही प्रकृति है । यह भी जिस अधिष्ठान की सत्ता से सत्तावान है वही सबसे उत्तम आत्मा है । अथवा स्थूल शरीर और उसमें अहं का तादात्म्य भाव नित्य क्षरित होता है और सूक्ष्म इन्द्रियों सहित अन्तःकरण का समूह सूक्ष्म शरीर स्थूल की अपेक्षा कूट और अक्षर है, इन दोनो का मूल कारण शरीर है और कारण शरीर का भी अधिष्ठान आत्मा है । अतः आत्मा ही सर्वोत्तम या पुरुषोत्त है । यही इसका भाव है ॥१८॥

            संबंध— उपरोक्त कथनानुसार आत्मा को जानने का फल बता रहे हैं……
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१५/१९॥
              शब्दार्थ— हे भारत ! जो विद्वान मुझे पुरुषोत्तम करके जानता है वह सब कुछ जानता है एवं सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है ।
         अथवा इस प्रकार जो विवेकशील मुझ आत्मस्वरूप को पुरुषोत्तम करके जानता है वह सभी प्रकार से जानने वाला सर्ववित् अर्थात सर्वज्ञ हो जाता है ॥११॥
             तात्पर्यार्थ— इस प्रकार अर्थात पुरुषोत्तम रूप जो निरुपाधिक, निर्विकार रूप में जो सम्मूढ नहीं हैं । सम्मूढ कहते हैं कि वस्तु स्थिति को यथार्थ रूप से न जानना यानी विपरीत ज्ञान । जो यथार्थ रूप से जानते हैं वे असम्मूढ हैं— ‘विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा’ १५/१० ये जो विमूढा मूल में आया है इसी को यहाँ सम्मूढ समझाना चाहिए किन्तु प्रस्तुत प्रसंग में सम्मूढा न देकर असम्मूढ दिया है । अतः असम्मूढ से ज्ञानचक्षुषा समझकर असम्मूढ का अध्याहार स्वतः हो जाता है । जो कहा था ज्ञाननेत्र वाला ही आत्मा के स्वरूप को देखता अर्थात यथार्थ अनुभव करता है, उसी को पुनः यहाँ पर स्पष्ट किया जा रहा है कि जो विमूढ नहीं हैं अर्थात जिनकी बुद्धि विपरीत सांसारिक विषयों का चिंतन नहीं करती वरन् स्वरूपानुकूल बुद्धि है वह संसार की ओर न देखकर निरंतर स्वरूप का अभिन्नभाव से चिन्तन करता हुआ पुरुषोत्तम रूप में मुझे जानता है । इसी पुरुषोत्तम को ही अव्यय अनुत्तमम् ७/२४ अर्थात जिसका कभी क्षरण नहीं होता और जो अनुत्तम अर्थात जिससे बढ़कर और कोई उत्तम नहीं हो सकता । उत्तम और उससे बढ़कर क्यों नहीं हो सकता है ? इसके लिए अर्जुन कहता है— “न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव” ॥११/४३॥ जब उसके समान ही कोई नहीं होगा तो कोई अधिक कैसे हो सकता है ? उसके मापने का कोई पैमाना ही नहीं है, उपमा ही नहीं है वह अनुपमेय है ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः’ । इसलिये वह पुरुषोत्तम है । ऐसा जो जानता है वही मुझे ठीक ठीक जानता है ।
              अब तत्त्वतः जानने का फल बता रहे हैं— वह सर्ववित् हो जाता है । देखिए पहले श्लोक में संसार का रूपक देकर कहा कि जो इस प्रकार संसार के मूल अर्थात अधिष्ठान या बीज को जो जानता है वास्तव में वही संसार की यथार्थता को जानता है ‘यस्तं वेद स वेदवित्’ १५/१ और यहाँ कह रहे हैं स सर्ववित् वह सब कुछ जानने लेता है कुछ भी शेष नहीं रहता । श्रुति में भी एक के जान लेने से सब जान लेने की बात आती है । वही यहाँ अधिष्ठान के ज्ञान से सर्वज्ञान होना है अर्थात वह सर्वज्ञ हो जाता है । उपक्रम हुआ ‘यस्तं वेद स वेदवित्’ से और उपसंहार हुआ स ‘सर्ववित्’ से । सर्ववित् तो एकमात्र परमेश्वर वेदविदेव चाहम् अर्थात वेद के तात्पर्य को मैं ही जानता हूँ, इसी लिए वेदों का अन्तिम लक्ष्य अर्थात वेदान्त का उपदेष्टा भी मैं ही हूँ । अब देखिए इस श्लोक १५वें श्लोक में सब कुछ जानने वाले और वेदान्त तत्त्व के उपदेष्टा हैं और सभी वेदों से जो जानने योग्य है वह भी भगवान ही हैं और यहाँ कहते हैं ‘स सर्ववित्’ वह सर्ववित् हो जाता है अर्थात वह मैं ही हो जाता हूँ भाव यह है कि अभिन्न हो जाता है । इसका निष्कर्ष यही निकला जो आत्मतत्त्व को जानता है वही आत्म रूप सर्वज्ञ हो जाता है और वही पुरुषोत्तम है ।
             जब सर्वभाव को प्राप्त हो जाता है अर्थात संपूर्ण प्राणियों में स्वयं को और सबको स्वयं में आत्मरूपता को प्राप्त हो जाता है तभी वह सर्वज्ञ हो जाता है । सर्वात्मा हो जाता है एवं सर्वभाव से ही मेरा भजन करता अर्थात मुझे जानता । वह सर्वत्र मुझे ही देखता है । चाहे मूर्ति में हो या ध्यान में, घर में हो या वन में सगुण में हो या निर्गुण में । खाना, पीना, चलना, बैठना, बोलना आदि सब कुछ तो वही है इस प्रकार वह सर्ववित् अर्थात सर्वज्ञ रूप अभिन्नता को प्राप्त हो जाता है और चिदेकरस का आनन्द लेता हुआ शरीर छूटने पर विदेह कैवल्य अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । यहां आचार्य शंकर का यह स्तोत्र प्रस्तुत प्रसंग की सार्थकता का वर्णन करता है 
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहरचरा प्राणं शरीरं गृहं,
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा सामाधिस्थितिः ।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो,
यद्यत्कर्मकरोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥
          अर्थात हे महादेव मैं जिसे आत्मा करके स्वयं को जानता हूँ वह मैं नहीं बल्कि आप ही हो, मेरी जो बुद्धि है वह बुद्धि नहीं बल्कि साक्षात् देवी पार्वती जी हैं । यहां भाव यह है बिना पार्वती की प्रसन्नता के महादेव को प्राप्त नहीं किया जा सकता है वैसे ही संस्कारित बुद्धि अर्थात बिना तात्त्विक ज्ञान के आत्मस्वरूप को प्राप्त नहीं किया जा सकता है । जैसा कि प्रस्तुत प्रसंग है । हमारे जो दश प्राण हैं वे प्राण ही आपके सहचर अर्थात साथ में विचरण करने वाले भूतगण हैं, यह जो शरीर है वही आप आत्मरूप महादेव और बुद्वि रूप पार्वती जी का निवास स्थान है । जितने भी हमारे भोग के विषय हैं वही हमारे चुन चुन कर संजोये गये आपके पूजा की सामग्री है और जब मैं सोता हूँ वही आपके ध्यान के निमित्त मेरी समाधि की स्थिरता है । जहाँ कहीं भी चलता हूँ वही आपकी परिक्रमा है, जो कुछ भी बोलता हूँ वही वाणी आपकी स्तुति । संक्षेप में इतना समझो जो जो कर्म करता हूँ वे वे सभी कर्म हे शम्भो ! आपकी आराधना है । यही सर्वभाव है । यही सर्वज्ञता है यही भजन है और प्रस्तुत प्रसंग का लक्ष्य भी यही है ।
           अथवा पूर्व श्लोक में जो ‘अस्मि’ का अर्थ किया गया उसी का यहां पर स्पष्टीकरण करते हैं कि जो इस प्रकार गुणकर्मविभाग द्वारा मेरे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के क्रमशः तामस, राजस और सात्त्विक भेद को जानते हैं ऐसे जो विवेकशील तत्त्वदर्शी मुझको ही पुरुषोत्तम करके अर्थात उन तीनो पुरुषों से भी श्रेष्ठ पुरुष मुझ सर्वात्मा को ही जानते हैं । ऐसा जो जानने वाला है वही सर्ववित् अर्थात सर्वज्ञ है उसे अब कुछ जानना शेष नहीं रह गया है । इस प्रकार जब सर्वरूप से, समग्र रूप से सगुण, निर्गुण के स्वरूप को भलीभाँति जान लेता अर्थात अनुभव कर लेता है तब सर्वभाव से अर्थात उसमें चाहे सत्त्वगुण बढ़े या रजोगुण अथवा तमोगुण सभी परिस्थितियों में वह मुझे ही भजता है अर्थात सभी भावों में मुझे ही आत्मरूप से ही जानता है ।
           इस श्लोक में माम् शब्द दो बार आया है । जिसमें पूर्वार्ध का माम् तत् पदार्थ का प्रति निधित्व करता है और दूसरा माम् त्वम् पदार्थ का प्रतिनिधित्व करता है । अर्थात तत् पदार्थ को त्वम् पदार्थ अर्थात मुझ सर्वात्मा को आत्मा अर्थात स्वयं से अभिन्न करके जानता है यही सब कुछ जानकर सब प्रकार से सभी भावों में उसका भजन करना है । यह पराभक्ति की चरमसीमा है । यहाँ भजता है का अर्थ यद्यपि जानना होता है तथापि जानकर जब तक प्रारब्धवश शरीर है तब तक उसमें स्थिरता की निरंतरता बनाये रखना, प्रमाद न करना ही भजन करता है कहने का उद्देश्य है ।
            इस प्रकार यहाँ पर ‘तत्’ पदार्थ का ‘त्वम्’ पदार्थ में विलय करके न ‘तत्’ बचता है न ‘त्वम्’ बचता है । वहां तो ‘अस्मि’ १५/१८ नाम की शरीर रहते अनूभूति बचती है और शरीर छूटने पर यही अस्मि असि में परिवर्तित होकर नित्य परमशांति स्वरूप स्वमहिमा में प्रतिष्ठित हो जाता है ।
                यहां पर जिस प्रकार से तत् पदार्थ का त्वम् पदार्थ में विलय किया गया है इसी प्रकार अध्याय १८ में ‘तमेव शरणं गच्छ’ १८/६२ का विनियोग ‘मामेकं शरणं ब्रज’ १८/६६ में करते हुए तत् पदार्थ का त्वम् पदार्थ में विनियोग करके निर्विशेष केवलाद्वैत असि पद में प्रतिष्ठित करेंगे ।
            यहां एक विशेष बात यह है कि अध्याय दो से लेकर छः तक तत् पदार्थ का त्वम् पदार्थ में विनियोग किया गया है, जबकि अध्याय सात से बारह तक त्वम् पदार्थ का तत् पदार्थ में विनयोग हुआ है । और यहाँ अध्याय तेरह से लेकर उपदेश के अन्तिम भाग अध्याय पंद्रह तक पुनः तत् पदार्थ का त्वम् पदार्थ में विनियोग करके असि या अस्ति नामक सत्तापद में विनियोग किया गया  है । इसका कारण यदि खोजा जाये कि परमात्मा का विनियोग आत्मा में ही क्यों किया गया है ? तो इसका उत्तर अध्याय १४/२७ होगा जहाँ पर अहं के अर्थ में ही ब्रह्म, ज्ञान आदि की प्रतिष्ठा अर्थात सब कुछ अहमर्थ के ही आश्रित है । त्वम् का तत् में विनियोग करने पर भी अहं का ही अर्थ बचता है और तत् का त्वम् में विनियोग करने पर भी अहं का ही अर्थ बचता है अतः अन्तिम अहं का ही अर्थ शेष बचने के कारण ही अहं में ही विनियोग किया गया है ।
              भावार्थ— परमात्मतत्त्व को जानने वाला यद्यपि इदमर्थक पदार्थों से संबंध विच्छेद हो जाने के कारण जीते जी मुक्त है तथापि शरीर छूटने पर विदेह मुक्ति को प्राप्त होकर पुनरागमन को प्राप्त नहीं होता है । ऐसा इसका भाव है ॥१९॥

               संबंध— प्रकरण की स्तुति……
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा  बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥१५/२०॥
              शब्दार्थ— हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार मेरे द्वारा यह शास्त्र कहा गया । और हे भारत ! इसको जानकर बुद्धिमान कृतकृत्य हो जाता है ।
              तात्पर्यार्थ— ‘इति’ शब्द उपदेश की परिसमाप्ति अर्थात गीता का उपदेश यहाँ से पूर्ण हुआ इस बात का सूचक है । यद्यपि संपूर्ण गीता शास्त्र है तथापि ‘इदं उक्तं शास्त्रम्’ इस वाक्य के अनुसार यह जो अध्याय कहा गया यही शास्त्र के नाम से कहा गया है । शास्त्र का लक्षण है क्षेत्र क्षेत्रज्ञ और परमात्मा का ज्ञान कराना । उसका इस अध्याय में विशेष रूप से वर्णन किया गया है । अतः इस पंद्रहवें अध्याय रूप शास्त्र के विषय में कहा गुह्यतमम् यह इतना गोपनीय है कि लाखों में कोई एकाध समझ सकता है जो निष्पाप अर्थात जिसकी चित्तशुद्धि साधन चतुष्टय द्वारा हो चुकी है इसी बात को बताने के लिए ही निष्पाप संबोधन है । यहां आत्यंतिक गोपनीयता कहने का भाव यह भी है कि जिस किसी को देने के योग्य यह ज्ञान नहीं है इसका अधिकारी चाहिए । अधिकारी का अध्याय १८/६७ में विस्तृत वर्णन करेंगे यहाँ संक्षेप में गुह्यतमम् से बता दिया । 
              श्लोक के उत्तरार्ध में भारत संबोधन का तात्पर्य है कि अर्जुन का जन्म भरत जैसे बुद्धिमान के कुल में हुआ है अतः अर्जुन बुद्धिमान अर्थात विचार कुशल है, मतलब इस अध्याय रूप शास्त्र के रहस्य को जो निष्पाप भी हो और विचार कुशल भी हो वही समझ सकता है । इसी के लिए कहा एतद्बुद्ध्वा अर्थात यह जो हमने रहस्य कहा इसको आचार्यों और शास्त्रों से जैसा पुरुषोत्तम का स्वरूप कहा गया है वैसा सुनकर समझ कर जो मनन करता है, ध्यान रहे अध्याया १४ में पहले श्लोक में जानकर सिद्धि प्राप्ति की बात कहा और फिर दूसरे श्लोक में ‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य’ कहा है । अर्थात जानकर उसके अनुसार आरूढ होकर वह बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है । बुद्धिमान का मतलब पूर्व श्लोक में सर्ववित् कहा है अर्थात वह सर्वज्ञ हो जाता परमात्मा से अभिन्न हो जाता । परमात्मा से अभिन्न होने पर वह कृतकृत्य हो जाता है इसका मतलब ऐसा कोई शास्त्रीय कर्म नहीं रह जाता जिसको उसने जाना नहीं, किया नहीं और उसका फल नहीं पाया अर्थात सभी कर्मों का एक ही फल है परमतत्त्व की प्राप्ति और वह जब प्राप्त हो गया तो वह कृतकृत्य हो गया ।            
             प्रत्येक अध्यायों में विस्तृत उपदेश हुआ लेकिन अध्याय के अन्त में एक नई कड़ी जुड़ जाती है और नया अध्याय प्रारंभ हो जाता । कोई ऐसा इसके अतिरिक्त अध्याय नहीं है जहाँ अध्याय का उपसंहार उसी अध्याय के उपक्रम से हो और यहाँ प्रथम श्लोक में ‘यस्तं वेद स वेदवित्’ १५/१ उपक्रम और उपसंहार स सर्ववित् १५/१९ से होता है । यहाँ उन्नीसवें श्लोक में असम्मूढः और सर्वभावेन कहा है । यह अध्याय १४/२६ का विवेचन भी समझना चाहिए क्योंकि अव्यभिचारी भक्तियोग द्वारा त्रिगुणातीत होना बताया था । यहां सर्वभावेन ही अव्यभिचारी है अर्थात उस परमतत्त्व को सबमें देखना, सबको उसमें देखना यही अव्यभिचार है  ऐसा सर्वभाव वाला ही असम्मूढ अर्थात ज्ञानी है । यहां पर सर्ववित् कहने का मतलब यह है कि ब्रह्म आदि की प्रतिष्ठा १४/२७ जिसमें है वह मैं हूँ और मैं यहां का पुरुषोत्तम हूँ । अर्थात क्षर और अक्षर को प्रकाशित मैं ही कर रहा हूँ, वे सभी मुझसे ही प्रकाशित हैं इसलिए वे मुझसे अभिन्न हैं । यही एक अधिष्ठान के ज्ञान से सर्वविज्ञान है । इस प्रकार गीता का क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम संबंधित कृष्ण का उपदेश यहां पर विश्राम को प्राप्त हुआ ।
       अथवा ‘इति’ शब्द उपदेश की परिपूर्णता के लिए और ‘इदं शास्त्रम्’ से ‘अशोच्यानन्वशोचस्त्वं’ २/११ से लेकर यहाँ तक दिये गये उपदेश से है । अनघ का अर्थ है जो पाप रहित अर्थात नित्यसत्त्वस्थ २/४५ है वही विवेकशील इस उपदेश अर्थात गीता शास्त्र का अधिकारी इसका भलीभांति विचार करके कृतकृत्य हो जाता है अर्थात कुछ भी करना और पाना शेष नहीं रहता है― ‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते’ ४/३३ इस निर्विशेष ‘अस्मि’ पद में प्रतिष्ठित होने पर ही वह निस्त्रैगुण्य २/४५ हो जाता है, यही अस्मि में स्थित हुआ मुमुक्षु ही आत्मवान् २/४५ है । आत्मन्येवात्मा तुष्टः २/५५ अर्थात पूर्ण काम भी हो जाता है । यही इस शास्त्र की महिमा है ॥२०॥

                 समीक्षा― चूंकि यह अध्याय पीछे सभी अध्यायों का सारभूत है इसलिये भगवान ने सहज भाव से समझ में आ सके इसके लिए संसार के अविनाशित्व के कथन पूर्वक इसकी न तो ठीक स्थिति ही है और न ही यह कल तक टिकने वाला है, ऐसे अश्वत्थ वृक्ष के रूपक द्वारा संसार की स्थिति समझते हुए प्रकृति के गुण कार्यो से असंग रूपी शस्त्र से दृढतापूर्वक इसकी राग द्वेष रूपी जड़ो को काटकर उस मार्ग की खोज का निर्देश दिया जिसे प्राप्त करके पुनः संसार का मुख न देखना पड़े । वह पद और कोई नहीं बल्कि हमारे संकल्प की जड़ बुद्धि में भी जिस आत्मप्रकाश के पड़ने पर अहं की स्फूर्ति पूर्वक संपूर्ण संसार के कारण कारण भाव को भी जो प्रकाशित करता है उस सबके आदि आत्मपद की शरण लेना बताया और उसकी महिमा बताया कि वह पद स्वयं प्रकाश रूप मेरा स्वरूप ही है जहाँ जाकर वापस नहीं होना पड़ता है ।
          फिर जीव को अपना सनातन अंश कहते हुए छः इन्द्रियों को लेकर अन्य शरीर में जाना और तत्त्वदर्शी द्वारा उन परिवर्तनशील परिस्थितियों में एक अपरिवर्तनीय नित्य स्वमहिमा में साधन चतुष्य संपन्न होकर परम सत्ता रूप में जान लेना, जबकि अजितेन्द्रिय के प्रयत्न करने पर भी उसे न जानने और सूर्य की उपमा द्वारा उस आत्म प्रकाश को स्वयं से अभिन्न जानने की बात भगवान ने कहा । 
          इसके आगे पृथ्वी में प्रवेश, प्राणियों को धारण करना, चन्द्रमा रूप में रसमय औषधियों का पोषण करना, प्राणियों की जठराग्नि के रूप में प्राणियों के खाये अन्न को पचाने एवं सभी प्राणियों में स्थित होकर स्मृति, ज्ञान और उनके विरुद्ध स्वयं को क्रिया करने, वेदों से जानने योग्य, वेदान्त परंपरा के प्रथम आचार्य और वेदों के रहस्य को जानने वाला स्वयं को बताकर जीवों से अपना एकत्व सिद्ध किया ।
         इसके बाद क्षर, अक्षर और उत्तम पुरुष द्वारा अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ का संक्षिप्त वर्णन करते हुए इन तीनो उपाधियों से भिन्न निरुपाधिक अनुत्तम ७/१८ एवं ७/२४ पुरुष के नाम से लोक और वेद में प्रसिद्ध होना बताते हुए इस प्रकार के सर्वरूप अर्थात समग्र रूप में जानने वाले को सर्वज्ञ और सब प्रकार से सभी भावों को जानकर उनमें स्थित होकर अस्मि पद की अनुभूति करता है । इस प्रकार मुझ सर्वात्मा कृष्ण के द्वारा कहे गए इस अत्यंत गोपनीय शास्त्र का विवेकशील भलीभांति विचार करके कृतकृत्य हो जाता है अर्थात जीते जी कुछ भी करना और पाना शेष उसके लिए नहीं बचता और शरीर छूटने पर अस्ति नामक परम पद में प्रतिष्ठित हो जाना बताकर अपने उपदेशों का उपसंहार कर दिया ॥१-२०॥

              वह परमतत्त्व अत्यंत गूढ़ है जिसको बड़े बड़े ज्ञानी न जानकर मूढ़ता को प्राप्त हो जाते हैं, फिर मेरे जैसे विषय चिंतक उसे कैसे जान सकते हैं ? बस इतना जानता हूँ कि कोई तो परमतत्त्व है जो हम सबको मोह में डाल रहा है । जिसे कोई नहीं जानता है किन्तु वह सबको जानने वाला और सब पर शासन करने वाला है । हम उस अज्ञात और ज्ञानियों के स्वरूपभूत परमतत्त्व को अपनी बाल चपलता से ही प्रणाम करते हैं वह जो भी है जैसा भी और जहाँ भी है वही परमतत्त्व रासलीला विसारद यशुदानन्दन कृष्ण ही है अतः वे ही हम पर कृपा बनाये रखें ।
              इस प्रकार कृष्ण का तत्त्व तो कृष्ण ही जाने और मुझ पर कृपा बनाये रखें । इसी के साथ ये विचार भी कृष्ण को ही समर्पित हैं । ओ३म् !

॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक पन्द्रहवां प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत् !!!
   श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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