ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय ११
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथैकादशोऽध्यायः
संबंध— श्रीभगवान ने दशवें अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन करके अन्त में अपने एक अंश में संपूर्ण जगत के स्थित होने की बात कही, मानो कह रहे हैं कि मैं सर्व जगन्नियन्ता मायिक शरीर का आश्रय लेकर तेरा सारथी बना तेरी आज्ञा का पालन करनेवाला बन गया हूँ, फिर भी तेरा मोह नहीं गया ? इस पर अर्जुन तुरन्त सावधान होकर कहते हैं……
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्म सञ्ज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥११/१॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले― मुझ पर अनुग्रह करने के लिए अध्यात्म नाम से कहे जाने वाले आपके वचनों से मेरा मोह चला गया है ।
तात्पर्यार्थ― अर्जुन ने भगवान की कृपा का अनुभव किया । वह समझ गया कि जिसके एक अंश में संपूर्ण ब्रह्मांड स्थित है वह तो मुझ पर कृपा करने के लिए ही मेरा सारथित्व कर रहे हैं । कृपा का अनुभव करते हुए विचार करता है कि जिसके विषय में मैं स्वयं को मरने मारने वाला समझ रहा था, इस शोक निवारण के लिए अध्याय २/१२ से लेकर २/३० तक जिस त्वम् पदार्थ को विविध प्रकार से अध्याय छः तक त्वं पदार्थ विषयक आत्मविद्या का कथन किया उसी अमृतमय वाणी से मेरा मोह चला गया है अर्थात मरने, मारने संबंधित मोह नष्ट हो गया है ।
अथवा परमगोपनीय तो भगवान की विभूतियाँ एवं योग ही हैं जिनके रहस्य को न जानने के कारण ही ‘मैं-मेरा करके’ मोह उत्पन्न होकर ज्ञानमय स्वरूप को ढक लेता है और अध्यात्म नाम से जो आपने ‘बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह’ १०/४ से ‘चत्वारो मनवः’ १०/६ तक की विभूतियों को कहा जिनको जान लेने से आत्मा का ज्ञान हो गया है, यह सब का सब योगैश्वर्य है मैं व्यर्थ ही शोक कर रहा था । यह जानने के बाद अब कर्तव्य-अकर्तव्य विषयक जो मोह था वह नष्ट हो गया है । अर्थात अब कर्तव्य विषयक ज्ञान हो गया है कि मुझे क्या करना है ॥१॥
संबंध— ‘त्वं’ पदार्थ विषयक मोह के नाश की बात कहकर अध्याय सात से लेकर दस तक तत् पदार्थ की महिमा का गान करते हुए भगवान के स्वरूप को देखने की अगले तीन श्लोकों में इच्छा प्रकट करते हैं……
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमल पत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥११/२॥
शब्दार्थ— क्योंकि प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश मेरे द्वारा विस्तार से सुना गया है । हे कमलनेत्र ! आपके अव्यय माहात्म्य को भी आप से ही सुना है ।
तात्पर्यार्थ— आप संपूर्ण प्राणियों के निमित्त उपादान कारण हो । आपका माहात्म्य अव्यय है क्योंकि आप स्वयं अव्यय हो और आपके अव्यय स्वरूप को जो तत्त्व से जानता है “यो वेत्ति तत्त्वतः” १०/७ उसको अव्यय मोक्ष देकर साक्षात् आपने अव्यय निर्विशेष स्वरूप में विलय करके अव्यय कर देते हो ऐसा आपका माहात्म्य है ॥२॥
एवमेतद्यथात्थत्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥३॥
शब्दार्थ— हे परमेश्वर ! आपने अपना जैसा स्वरूप कहा है, वह वैसा ही है । हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके स्वरूप को देखना चाहता हूं ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ ऐश्वर्य माया विशिष्ट शक्ति, बल, वीर्य, तेज एवं ज्ञान-विज्ञान रूप जो ऐश्वर्य है, उसको ही देखने की इच्छा है क्योंकि माया विशिष्ट ही देखा सकता है माया रहित स्वसंवेद्य नहीं ।
भावार्थ— यहां अर्जुन को भगवान की बात पर संदेह नहीं है तथापि वह यह विचार करता है कि जब सब जगत ही ईश्वर रूप है तो जब ईश्वर ही मेरे सामने खड़ा है तो क्यों न इन नेत्रों से परोक्ष तो ही गया है लेकिन अपरोक्ष भी अनुभव किया जाये । इसलिये इतना विनम्र अर्जुन है कि वह यह नहीं कहता है कि अपना वह रूप दिखाओ बल्कि कहते है कि देखने कि इच्छा है । अर्थात मेरी इच्छा तो लेकिन जो उचित लगे तो वह रूप और ऐश्वर्य मुझे दिखाए ॥३॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥११/४॥
शब्दार्थ— हे प्रभो यदि मेरे द्वारा देखा जाना शक्य है अर्थात यदि मैं देखने में समर्थ हो सकूँ तो हे योगेश्वर ! आप आपना वह अविनाशी स्वरूप दिखाइए ।
तात्पर्यार्थ— सृष्टि, पालन, संहार, प्रवेश एवं अनुग्रह में समर्थ से प्रभु का तात्पर्य है । ब्रह्मात्मैक्य रूप योग के भी स्वामी योगेश्वर । यहां सबसे बड़ी शिक्षा ये है कि किसी से किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए दबाव न देकर अपनी इच्छा को प्रकट करके उसके विवेक पर छोड़ देना चाहिए । अव्यय रूप अर्थात क्षरण रहित, नित्य एवं अविनाशी स्वरूप ।
अथवा सब कुछ भगवान पर ही छोड़ दिया इच्छा मेरी है शेष आप जानो । यहाँ जिस प्रकार अर्जुन अपनी बात कहकर भगवान पर ही छोड़ देता है, कोई दबाव नहीं, इसी प्रकार भगवान भी अन्त में कह देंगे यथेच्छसि तथा कुरु १८/६३ अर्थात हमारे यहाँ न तो सेवक स्वामी पर और न ही स्वामी सेवक पर बलात् अपनी बात थोपते हैं । सभी अपनी अपनी बात कह देने में स्वतंत्र हैं और करने न करने के लिए भी स्वतंत्र, ये है हमारी भारतीय संस्कृति का गौरवशाली इतिहास । आज की शास्त्रीय व्यवस्था नष्ट होने के कारण तो स्थिति ही दयनीय है ॥४॥
संबंध— श्रीभगवान का अपना रूप दिखाने के लिए स्वीकृति देते हुए दिव्य दृष्टि पूर्वक तत्क्षण देखने के लिए चार श्लोकों में अनुमति देना……
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥११/५॥
सामान्य भाव— हे पार्थ ! मेरे सैकड़ों हजार अर्थात अनन्त रूपों को, जो विभिन्न प्रकार के भेदों वाले दिव्य अर्थात इस लोक में न दिखने वाले अलौकिक, नाना प्रकार के रंगों एवं आकृतियों वाले हैं उन्हें देखो ॥५॥
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥११/६॥
सामान्य भाव— हे भारत ! द्वादश आदित्य, अष्ट वसु, एकादश रुद्र, दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुतों सहित और भी बहुत कुछ जो पहले देखने समझने और अनुभव में न आया हो वह सब आश्चर्यमय देखो ॥६॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥११/७॥
सामान्य भाव— हे गुडाकेश यहीं इसी युद्धस्थल में इसी वर्तमान समय में तुम मेरे शरीर के एक ही स्थान में स्थित संपूर्ण चराचर जगत को देखो तथा इससे भिन्न भी जो तुम्हें देखने की इच्छा हो उसे देखो ॥७॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यंं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥११/८॥
शाब्दिक भाव— तथापि तुम इन प्राकृत अर्थात चर्मचक्षुओं से नहीं देख सकते इसलिये दिव्य अर्थात मेरे अलौकिक स्वरूप को देखने के लिए अलौकिक नेत्र तुम्हें प्रदान करता हूँ जिससे तुम मेरे सामर्थ्य एवं योग अर्थात माया का विस्तार देखो ।
तात्पर्यार्थ— अर्जुन को यही ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ ९/५ कहकर पहले योग क्या है, ऐश्वर्य क्या है इसका परोक्ष ज्ञान कराया । व्यक्ति जिस बात को पहले देखता और सुनता है उसी का मनन करता है अतः अध्याय नौ और दश में योग के ऐश्वर्य को भलीभाँति समझा और अब उसका अनुभव अलौकिक नेत्रों से करेगा । वस्तुतः आत्मा अनात्मा का विवेक न तो लौकिक बुद्धि से होता है और न ही जो इन्द्रिय गोचर है अतः उसे प्राकृत इन्द्रियों से भी नहीं देखा जा सकता है । इसीलिये जब हम ध्यान करते हैं उस समय चर्म चक्षु को बंद करके आन्तरिक विवेक चक्षु से ही परम प्रकाश का अनुभव करते हैं उसी बात की यहाँ पुष्टि मात्र है । साथ ही पश्य मे योगमैश्वरम् वाक्य यह भी सिद्ध करता है कि मेरे को तो कोई देख नहीं सकता केवल मेरी माया के ऐश्वर्य यानी विलास को ही देख सकता है अतः माया विलास ही अर्जुन को देखने के लिए कहते हैं । परमेश्वर को न देख पाने का कारण यह है कि वे संपूर्ण प्राणियों की आत्मा के रूप में उनके हृदय में ही रहते हैं १०/२० अतः उसे स्व से भिन्न करके देखा नहीं जा सकता वरन् अभिन्न आत्म रूप में अनुभव किया जा सकता है ।
यहाँ एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि कुछ विद्वान यह मानते हैं कि अर्जुन के कहने से भगवान तुरन्त अपना विराट स्वरूप भावावेश में आकर उसी प्रकार दिखाने लगे जैसे एक गाय घास चरकर जंगल से लौटने पर तुरन्त वात्सल्य के कारण थनों में उतरे हुए दूध को तत्क्षण पिलाने लगती है, किन्तु अर्जुन जब उस रूप को देख नहीं सका तब दिव्य नेत्र प्रदान किये थे । यह मात्र विद्वानों की अपनी मान्यता और अतिसंयोक्ति है । इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान में भी अधिक राग है जिसके कारण विवेक खो बैठते हैं, फिर तो उनमें हम मनुष्यों की तरह द्वेष भी होना चाहिए और राग द्वेष के कारण हम मनुष्यों की ही तरह भगवान नामक जीव को भी जन्म मृत्यु के चक्कर में नष्ट होना स्वाभाविक है और उसका माया का अधिष्ठान होना, माया को अपने आधीन करके प्रकट होना, षड्विकारों से रहित और नित्यत्व एकरसत्व सिद्ध ही नहीं होता, तथापि ये आपके विचार हैं, आवश्यक नहीं है कि आपके विचारों को विवेक रहित के समान ज्यों का त्यों मान ही लिया जाये । उपरोक्त भगवान के द्वारा कहे गये श्लोकों म़े ऐसा कहीं कुछ सिद्ध नहीं होता है कि जिससे अर्जुन को पहले विराट रूप दिखाया हो और बाद में दिव्यनेत्र दिये होंं, यह ईश्वर के भी अल्पज्ञत्व को सिद्ध करने वाला वाग्विलास मात्र है ॥११/८॥
संबंध— सञ्जय द्वारा भगवान के अलौकिक स्वरूप का वर्णन……
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शायामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥११/९॥
सामान्य भाव— संजय बोले― हे राजन् ! इस प्रकार कहने के बाद महान् योगेश्वर श्रीहरि ने अपना ऐश्वर्यशाली विराट रूप प्रकट किया ॥११/९॥
अनेक वक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेक दिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥११/१०॥
सामान्य भाव— अनेकों (अगणित) अद्भुत सिर, नेत्र, अनेकों दिव्याभूषणों एवं युद्ध के लिए तत्पर हाथ में उठे हुए अनेकों दिव्यायुधों अर्थात अस्त्र-शस्त्रो का दर्शन कराया । यहां आयुधों का दर्शन कराने का भाव यह है कि अगर अर्जुन यह समझे कि मैं निहत्था हूँ और युद्ध नहीं कर रहा हूँ तो वह इस भ्रम को निकाल दे और यह समझे कि वे अस्त्र-शस्त्र भी मुझसे अभिन्न हैं मेरी उपस्थित मात्र ही तुम्हारे रथ पर (युद्धक्षेत्र) में विजय के लिए पर्याप्त है ॥१०॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्मयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११/११॥
शब्दार्थ— अलौकिक माला एवं वस्त्र धारण किए हुए, अलौकिक गंध का लेप किये हुए देव सब प्रकार से आश्चर्यमय एवं विराट मुख वाले हैं ।
तात्पत्यार्थ— दिव्य पुष्पों की मालाएं एवं वस्त्र धारण किये हुए हैं । दिव्य सुगन्धित द्रव्यों कि लेप किये हुए हैं, वे अनन्त देव विश्वतोमुख अर्थात संपूर्ण विश्व ही जिनका मुख है यहाँ मुख के साथ आंख, कान, नाक आदि सभी अंगों का अध्याहार कर लेना चाहिए “विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पाद” इस श्रुति का यहाँ दिग्दर्शन कराया या यूं कहें कि “सर्वतः पाणिपादं तत्” अ.१३/१३ का साक्षाकार पहले ही करा दिया और व्याख्या बाद में करेंगे । ऐसे देव अर्थात परमात्मा के दर्शन में सब कुछ अद्भुत है— यहाँ अद्भुत के अनतर्गत सर्वेन्द्रियगुणाभासं १३/१४-१६ तक की व्याख्या समझ लेना चाहिए ॥११॥
दिवि सूर्य सहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११/१२॥
सामान्य भाव— उस समय जो विराट भगवान की प्रभा थी वह एक क्षण में एक साथ ही आकाश में उदित हुए हाजारों सूर्य भी मिलकर यदि प्रकाश करें तो भी उसके प्रकाश के बराबर शायद ही हो अर्थात नहीं हो सकता क्योंकि “ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः” १३/१७ अर्थात वह ज्योतियों का भी ज्योति है ॥१२॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥११/१३॥
सामान्य भाव— अर्जुन ने उस श्रीभगवान के शरीर के एक ही भाग में अलग अलग अनेक प्रकार से संपूर्ण जगत, जो देवताओं के भी देवता श्रीभगवान हैं उनमें देखा ।
विशेष भाव— श्लोक सात में भगवान ने कहा “मम देहे इहैकस्थं एवं मम देहे” अर्थात मम देहे इहैकस्थं और यहाँ सञ्जय कहते हैं “तत्रैकस्थं एवं देवदेवस्य शरीरे” अर्थात तत्र देवदेवस्य शरीरे एकस्थं । यहां स्पष्ट हो जाता है कि जो श्रुति विराट रूप का वर्णन करते हुए कहती है— “सभूमिं सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्” अर्थात उसने संपूर्ण लोको को अपने अन्दर ही आवृत करके उससे भी दश अंगुल ऊपर स्थित है । अर्थात अर्जुन ने यहां भगवान विराट का जो मायाविष्ट स्वरूप है उसको भी उसने पूरा नहीं देखा दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भी तो स्वसंवेद्य स्व से अभिन्न को बाहर किस आधार पर देखा जा सकता है ? मेरा मानना है कि जीव और ईश्वर भिन्न है तथापि अर्जुन ने एक ही परमेश्वर के ही किसी छोटे से अंश में भिन्न भिन्न चराचर जगत को देखा, अब प्रश्न यह है कि जो अर्जुन ने भिन्न भिन्न चराचर जगत् को देखा वह उससे भिन्न था या अभिन्न ? यदि भिन्न था तो वह संपूर्ण जगत उसी एक परमेश्वर में ही क्यों दिखा भिन्न अर्थात उससे अलग हटकर भी दिखना चाहिए था, और अभिन्न था तो भिन्न भिन्न क्यों दिखा ? अब यदि कहा जाये कि यह सब माया के द्वारा दिखा तो इसका अर्थ यह होगा कि माया के द्वारा दिखने का अर्थ ये है कि यह दिखना भ्रम था अर्जुन को और जब माया का संवरण हो गया तब भ्रम निवारण हो जाने से वह सब कुछ दिखना बंद हो गया ? दूसरी बात यह कि जब अर्जुन ने संपूर्ण विश्व को विराट के किसी एक भाग में देखा तो स्वयं को कहाँ देखा ? क्योंकि संपूर्ण दिशाएं तो उसी एक विराट परमेश्वर से व्याप्त थीं “द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः” ११/२० इसका अर्थ यह हुआ कि अर्जुन ने स्वयं को भी विराट परमेश्वर में ही देखा क्योकि पृथ्वी से लेकर आकाश तक एवं दिशा विदिशाओं में भी वही एक मात्र परमेश्वर था अर्थात् वहाँ विराट रूप परमेश्वर से भिन्न कुछ देखा ही नहीं, सब कुछ परमेश्वर में ही देखा, किन्तु वह सब माया के कारण देखा, इसी माया के कारण ही परमेश्वर में स्वयं को देखकर भी भिन्न स्यवं को और परमेश्वर को देखता रहा । वस्तुतः वह उनमें कुछ नहीं है “मत्स्थानि सर्वभूतानि” ९/४ एवं “न च मत्स्थानि भूतानि” ९/५ की यहाँ परिपुष्टि होती है एवं “सदसच्चाहमर्जुन” ९/१९ एवं “न सत्तन्नासदुच्यते” १३/१२ को भी इसी प्रसंग में ठीक से समझा जा सकता है ।
माया का लक्षण यही है कि कुछ भी न होने पर भी सब कुछ दिखा दे । स्वप्न में एक मात्र स्वप्नद्रष्टा के अतिरिक्त कुछ नहीं होता । नदी तालाब पहाड़ शेर और भोजन आदि सब कुछ वही होता है तो भी सब कुछ अपने से भिन्न दिखता है, भिन्न व्यवहार होता है, सुख दुःख भी होता है, इतना होने पर भी एक मात्र मैं ही था और कोई नहीं इसका ज्ञान तब होता है जब नींद खुल जाती है । उसी प्रकार माया का निवारण हो जाने पर नींद से जगे हुए के समान एक मात्र स्वसंवेद्य परमेश्वर से अभिन्न स्वयं को ही देखता है । इन दो श्लोकों में भिन्न दिखना फिर भी उसी एक परमेश्वर में ही दिखना और उसी में विलीन होना यही सिद्ध करता है कि ऐन्द्रजालिक माया के ऐन्द्रजालिक मायावी में जैसे विलय होने पर ऐन्द्रजालिक मायावी शेष रहता माया नहीं, इसी प्रकार माया भ्रम का निवारण हो जाने पर एक मात्र परमतत्त्व परमेश्वर ही शेष रहता है उससे भिन्न जीव नहीं । यही संख्या रहित एक होकर भी अद्वितीय ब्रह्म है “एकमेवाद्वीतीयम्” । यही केवलाद्वैत है । इस प्रकार यहाँ एकस्थं का अर्थ है एक ही परमेश्वर के किसी एक अंश स्थित विराट रूप ॥१३॥
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभासत ॥११/१४॥
सामान्य भाव— श्रीभगवान के उस विराट रूप को देखकर अर्जुन आश्चर्यचकित होकर रोमांचित हो गये और दोनो साथ जोड़कर शिर से उन विराट देव को प्रणाम करके बोले.....।
रोम दो प्रकार से खड़े होते हैं एक भय से, दूसरे अधिक अचिन्तनीय प्रसन्नता प्राप्त हो जाये । यहाँ अर्जुन के रोम खड़े होने का पहला कारण भय ही है जिसकी आगे स्वयं प्रव्यथितास्थाहम् ११/२३ कहकर पुष्टि करेंगे ॥१४॥
संबंध— अर्जुन ने विराट रूप में क्या क्या देखा सोलह श्लोकों में वर्णन……
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेष सङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥११/१५॥
सामान्य भाव— हे देव ! आपके शरीर में संपूर्ण देव अर्थात जितने भी देवलोक के समुदाय हैं— द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, अष्ट वसु, दो अश्विनीकुमार ये तैंतीस कोटि देवों का समूह हैं, पितर, गंधर्व, किन्नर, पिशाच आदि सब इन्हीं तैंतीस कोटि के अन्तर्गत आते हैं । विशेष रूप से प्राणियों का समूह कहने का तात्पर्य यह है कि संपूर्ण चराचर प्राणियों का दर्शन तो हो रहा है लेकिन देवता कहने के बाद विशेष का तात्पर्य है, दैत्य, दानव, मानव, असुर, राक्षस आदि समूह, कमलासन पर बैठे जगन्नियंता ब्रह्मा जी, ऋषिगण, दिव्यरूपधारी अर्थात अलौकिक रूप वाले, तक्षक, कर्कोटक, अनन्त, वासुकि आदि उरग अर्थात सर्प एवं नागों को देख रहा हूँ ॥१५॥
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥११/१६॥
सामान्य भाव— हे विश्वेश्वर ! आपके चारों ओर अनन्त भुजाएं, पेट, सिर, नेत्र देख रहा हूँ । हे विश्वरूप ! आपका न अन्त, न मध्य, न आदि ही देख रहा हूँ ॥१६॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥११/१७॥
सामान्य भाव— शिर आदि जो दिख रहे हैं वे आभूषण मुकुट, गदा, चक्र तथा चारों ओर उनके तेज का समूह दीप्तिमान अर्थात प्रकाशित हो रहा है । आपकी द्युति अर्थात तेज अग्नि और सूर्य के समान कठिता से किन्तु उनकी भी तुलना नहीं हो सकती क्योंकि मैं जिसे देख रहा हूँ वह आपका तेज अप्रमेय है ।
यहाँ अर्जुन ने अग्नि और सूर्य के प्रचंड स्वरूप से तुलना करने के बाद अप्रमेय बताया है । क्योंकि पहले द्वादश सूर्यों का उदय तो कह चुका है अतः द्वादश सूर्यों की उपमा कम पड़ने पर प्रचंड प्रलयकालीन अग्नि और प्रलयकालीन सूर्य के तपने से यहाँ तुलना करने पर भी उनका वह तेज फीका पड़ गया अतः कोई उपमा न मिलने पर अप्रमेय अर्थात अनुपमेय कह दिया । इसी बात को स्तुति करते हुए ११/४३ में पुनः अन्य विशेषणों के साथ कहेंगे ॥१७॥
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥११/१८॥
सामान्य भाव— आप मुमुक्षुओं के जानने योग्य अक्षर “अक्षरं ब्रह्म परमम्” ८/३ हो, आप ही इस संसार वृक्ष के बीज का आश्रय स्थान अर्थात निधान हो, आप अव्यय अर्थात अविनाशी, शाश्वत अर्थात नित्यधर्म के रक्षक एवं सनातन पुरुष हो ऐसा मेरा मत है ।
निधान यानी सभी प्राणियों के सूक्ष्म कर्मबीजों का जहाँ संग्रह होता और भोग काल में जहाँ से प्राप्त होता है । शाश्वतधर्मगोप्ता अर्थात शाश्वत यानी नित्य, गोप्ता यानी जिसे भगवान बारंबार गुह्यतम कहते हैं और धर्म यानी ज्ञान, सनातन यानी अनादि, पुरुष यानी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि पुरियों में शयन करने वाला सर्वात्मा । शेष अर्थ स्पष्ट है ॥१८॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥११/१९॥
शब्दार्थ—आपको आदि मध्य अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य, अनन्त भुजाओं, चंद्रमा एवं सूर्य रूप नेत्रों वाला देख रहा हूँ । आपका मुख जिसमें आहुति दी जा सके ऐसी प्रचंड अग्निवाला आपमें है कि उससे संपूर्ण विश्व को तपा अर्थात जला जा रहा है ।
सामान्य भाव—आहुति वाली अग्नि का मतलब कालाग्नि है जिसमें बड़े बड़े शूरवीर अपनी आहुति देते हैं, जिसे प्रचंड अग्नि क्षण भर में सूखी हुई छोटी लकड़ियों के समान क्षण भर में भस्म कर देती है । जैसे अग्नि के पास के लोग तपने लगने हैं वैसे ही आपकी हुताग्नि अर्थात मुखाग्नि से संपूर्ण लोक तप रहे हैं ।
आदि, मध्य और अन्त नहीं है कहकर स्व-तेज से परिपूर्ण परमेश्वर तत्त्व को देशकाल अपरिच्छिन्न बताया है ॥१९॥
संबंध— संपूर्ण विश्व को आपकी मुखाग्नि क्यों जला रही है उसका कारण अर्जुन बता रहे हैं—
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥११/२०॥
सामान्य भाव— क्योंकि पृथ्वी एवं आकाश की दिशाएं एकमात्र आपसे ही व्याप्त हैं और आपका रूप इस समय अत्यंत उग्र एवं अद्भुत है, ऐसे विचित्र रूप को देखकर हे व्यापक आत्मन् अर्थात महात्मन् ! ये तीनो लोक अत्यंत व्यथित अर्थात व्याकुल हो रहे हैं ।
विशेष— “त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः” अर्थात आप हो तो एक ही परन्तु आपमें ही ये संपूर्ण लोक भिन्न भिन्न दिखने पर भी अभिन्न और अभिन्न होने पर भी भिन्न भिन्न दिखना यही अद्भुत है ॥२०॥
संबंध— अब अपनी व्याकुलता का कारण बता रहे हैं—
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥११/२१॥
सामान्य भाव— क्योंकि वे देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं अर्थात अमर कहे जाने वाले देवता ही जब आपके अन्दर प्रवेश कर रहे अर्थात मौत को प्राप्त हो रहे हैं, तो अन्य जीवों की बात ही क्या ? अतः अन्य कोई दोनों हाथ जोड़कर स्वस्ति अर्थात जगत का कल्याण हो कल्याण हो कहते हुए महर्षियों और सिद्धों के समूह बहुत प्रकार से आपकी स्तुति कर रहे हैं ।
विशेष— युद्ध मनुष्यों में होना है और शास्त्र उठाये युद्ध के लिए तैयार देवताओं को देखा था ११/१० वही यहाँ पर उन्हीं को भगवान में प्रवेश होता देखने का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी का भार उतारने मानव रूप में जो देवगण आये थे उन मानवी योद्धाओं का विनाश इस प्रकार से पहले ही अर्जुन ने देख लिया, यही भाव प्रतीत हो रहा है ॥२१॥
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥११/२२॥
सामान्य भाव— रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, दोनो अश्विनीकुमार, मरुत, पितॄगण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, एवं अन्य सिद्धों के समूह ये सभी आपको आश्चर्यचकित होकर देख रहे हैं ॥२२॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥११/२३॥
सामान्य भाव— हे महाबाहो ! आपका रूप बहुत विशाल है, जिसमें मुख, नेत्र, भुजाएं, उरु, चरण, पेट और भयंकर दाढ़े बहुत हुत हैं जिसे देखकर संपूर्ण लोक (प्राणी) भयभीत हो रहे हैं तथा मैं भी निर्भय नहीं अर्थात मेरा मन भी व्यथित हो रहा है ।
विशेष भाव— बारंबार जो सिर, नेत्रादि अंगों के नाम आ रहे हैं उसका कारण प्रसंगानुसार सौम्य, उग्र एवं अकल्पनीय विचित्रता दिखाने के लिए है । श्लोक में उरु एवं पाद दो शब्द आये हैं, उरु का उपलक्षण पैर हो सकता है तथापि अलग से पाद अर्थात पैर दिया गया है जिसका अर्थ है अपना भयंकर स्वरूप दिखाने के लिए जांघे, जांघें किसी और प्राणी की तो शेष पैर किसी और प्राणी के तो हाथ सिर और नेत्र भी परस्पर तालमेल नहीं खाते— कोऊ मुखहीन विपुल मुख काहू । बिन पदकर कोऊ बहु पद बाहू ॥ बिपुल नयन कोउ नयन विहीना । हृष्टपुष्ट कोउ अति तनु छीना ॥ इस प्रकार किसी एक शरीर में आश्चर्यचकित कर देने वाली भिन्नताएं प्रकट की गई हैं । अगर उरु का अर्थ पैर करें और पाद का अर्थ चरण करें तो संगति इस लिए नहीं लगती है कि जब पैर हैं तो चरण (पैर का सबसे अन्तिम पंजा वाला भाग) तो स्वतः होंगे । अतः पैरों में भी परस्पर जांघों और शेष पैरों की विविधता ही युक्ति संगत है । तथाहम् का अर्थ मेरा मन ही युक्ति संगत है क्योंकि प्रव्यथितं मनो मे ११/४५ आया है ॥२३॥
नभःसपृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दन्ति शमं च विष्णो ॥११/२४॥
सामान्य भाव— क्योंकि हे विष्णो ! आकाश को छूता हुआ, अनेक रंगों से प्रकाशमान, फैला हुआ मुख, उद्दीप्त हुए आपके विशाल नेत्र, देखकर अत्यन्त व्याकुल हुआ मैं कहीं धैर्य और शान्ति को नहीं देख रहा हूँ ।
शिक्षा— विचारणीय तथ्य यह है पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत एक मात्र विराट रूप के अतिरिक्त दिशा विदिशा में अन्य कोई है नहीं ११/२० तो अर्जुन बीच में कहाँ से आ गया जो भयभीत हो रहा है ? यह भेद दृष्टि है, सबमें तो परमात्मा को जीव देख सकता है किन्तु अपने में नहीं देख सकता, जिस कारण से उसके भय का निवारण कभी नहीं होता और अर्जुन की ही भांति एकमात्र परमेश्वर की शरण ग्रहण करके भी भय रहित नहीं हो पाता और धैर्य का त्याग कर योगभ्रष्ट हो जाता है । इस प्रसंग से यही शिक्षा मिलती है ॥२४॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११/२५॥
सामान्य भाव— तथा आपके मुखों में भयंकर दाढों को देखकर किधर पूरब है और किधर पश्चिम यह भी भूल गया, नहीं जानता और न ही शान्ति मिल रही है, इसलिये हे जगन्निवास ! प्रसन्न होइए ॥२५॥
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रास्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥११/२६॥
सामान्य भाव— हमारे पक्ष के मुख्य मुख्य योद्धाओं सहित भीष्म, द्रोण तथा वह सूतपुत्र कर्ण, पृथ्वी का पालन करने वाले सभी राजाओं के समूह और धृतराष्ट्र के दुर्योधनादि पुत्र सभी आप में प्रवेश कर रहे हैं ।
विशेष— पाण्डवपक्ष के मुख्य योद्धा कहे गए हैं लेकिन नाम नहीं दिये गये हैं अतः धृष्टद्युम्न, विराट, अभिमन्यु आदि समझ लेना चाहिए और यह भी समझ लेना चाहिए कि इस माध्यम से अर्जुन ने अपनी विजय भी देखी ॥२६॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्माङ्गैः ॥११/२७॥
सामान्य भाव— उपरोक्त सभी आपके भयंकर मुखों में शीघ्रतापूर्वक प्रवेश कर रहे हैं । उनमें कोई कोई तो चूर्ण हुए सिर के सहित दांतों में चिपके हैं ॥२७॥
यथा नदीनां बहवोऽम्बु वेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥११/२८॥
सामान्य भाव— जैसे नदियों का जल बड़े वेग से समुद्र की ओर दौड़ता है, वैसे ही ये मनुष्यलोके के वीर अर्थात क्षत्रिय आपकी प्रज्वलित मुखाग्नि में प्रवेश कर रहे हैं ॥२८॥
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्ध वेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥११/२९॥
सामान्य भाव— जैसे पतिंगा प्रदीप्त अग्नि में अपने विनाश के लिए शीघ्रतापूर्वक प्रवेश कर जाते हैं वैसे ही संपूर्ण लोक (प्राणी) अपने विनाश के लिए शीघ्रतापूर्वक आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं ।
यहाँ पर यह बताया गया है कि जब व्यक्ति ईर्ष्या द्वेष संपन्न होता है तब विवेक रहित कार्य करता हुआ कब काल के गाल में जाता है पता ही नहीं चलता ॥२९॥
लेलिह्यसे ग्रसमाना समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णोः ॥३०॥
सामान्य भाव— आप सभी मुखों द्वारा संपूर्ण लोकों अर्थात प्राणियों को जो मुख में प्रवेश कर रहे हैं उन्हें सब ओर से ग्रसित करते हुए चाट रहे हो अर्थात जो मुख में प्रवेश कर रहे हैं उन्हें तो आप सीधे निगल जाते हो और जो दांतों में चिपके रह गये हैं उन्हें आप चाट रहे हो । हे विष्णो ! आपका तेज समूह संपूर्ण जगत को व्याप्त करके अधिक तपा रहा है ।
विशेष- व्यक्ति का अपना अनुभव ही सामने दिखाई देता है । वस्तुतः वहाँ अभी न कोई मर रहा है न खाया जा रहा है और न ही तपाया जा रहा है, दिखने में आनेवाला कृष्ण से अतिरिक्त कोई है भी नहीं तथापि अर्जुन यह सब माया कार्य देखकर इतना अधिक व्यथित हो चुका है कि वही उसको सर्वत्र मरता और तपता हुआ दिखाई दे रहा है जैसा कि वह स्वयं अनुभव कर रहा है ।
यहां पर ग्रसमानः से यह प्रतीत होता है कि किसी को चबाये बिना ही सीधे निगल जाते हैं जैसा कि पहले भी राजाओं का सीधे मुख में प्रवेश बताया गया है । चूंकि विराट का मुख चतुर्दिक् है अतः सभी ओर जो दाढों में फंस गये, उन्हें चाट रहे हैं । जैसे सूर्य का तेज तो सूर्य में केन्द्रित होकर उसका प्रकाश लोकों को उष्णता प्रदान करता है वैसे ही विराट का तेज विराट में ही केंद्रित है तो भी उसका उग्र फैला हुआ प्रकाश लोकों को जलाये डाल रहा है ॥३०॥
संबंध— इस प्रकार व्यथित अर्जुन का कृष्ण का वास्तविक परिचय पूछता है……
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तुते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥३१॥
सामान्य भाव— हे देवश्रेष्ठ ! आप क्या करना चाहते हो मैं आपकी इस प्रवृत्ति को नहीं जानता, आप उग्ररूपधारी कौन हैं, यह मेरी जानने की इच्छा है, अतः प्रसन्न होइए और मुझसे अपना आदि अर्थात प्रथम प्राकट्य कहो ।
तात्पर्य— जब कोई बल न चले तब जिससे भय हो उसी की शरण ग्रहण करने कि अनादि परंपरा है उसी का आश्रय लेकर दिशा और धैर्यहीन अर्जुन भय के कारण भगवान की ही शरण ग्रहण करके स्तुति करता हुआ प्रसन्न करके उनके स्वरूप और युद्ध से पहले ही भयंकर रूप धारण करने का अर्जुन कारण जानना चाहता है ।
टिप्पणी— यहां आद्य का अर्थ लगभग सभी टीकाकारों ने सृष्टि के आदि के रूप में कहा है । अतः उनके इस भाव को सिर झुकाकर नमस्कार करते हुए हम अपना विचार रखते हैं— अर्जुन यह रूप देखकर भयभीत है, अतः यह भयंकर विनाशकारी अत्यंत उग्र रूप युद्ध के आदि में प्रकट होने का कारण जानना चाहता है, क्योंकि अर्जुन युद्ध नहीं चाहता था, किन्तु युद्ध विषयक मोह निवृत्त ११/१ होने पर अब विराट रूप में दोनो ओर के भूपाल विराट के मुख में प्रविष्ट अर्थात विनाश को प्राप्त होते दिखे जिससे अर्जुन भयभीत हो गया क्योंकि दोनों ओर के जिन प्रधान (अभिमन्यु आदि) सैनिकों को मौत के मुंह में युद्ध से पूर्व देखा उसकी कल्पना करना भी कठिन है । यहां आदि रूप पूछने का अर्थ होगा युद्ध के आदि अर्थात प्रारंभ से पहले के इस उग्र रूप के प्राकट्य का रहस्य जानना ही अर्जुन का लक्ष्य है न कि सृष्टि के आदि का रूप ॥३१॥
संबंध— अगले तीन श्लोकों में श्रीभगवान का अर्जुन को अपना परिचय कराते हुए विजय का आश्वासन देते हुए निमत्तमात्र बनकर युद्ध के लिए आज्ञा देना……
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योद्धाः ॥११/३२॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― मैं काल हूँ लोक अर्थात पापात्मा प्राणियों के नाश के बढ़ा हुआ हूँ । ऐसे प्राणियों के संहार में प्रवृत्त हूँ । ये तुम्हारे विरुद्ध तुम्हारे युद्ध न करने पर भी नहीं रहेंगे अर्थात मरेंगे ।
तात्पर्यार्थ— अर्जुन के क्रमशः प्रश्नों का उत्तर देते हुए युद्ध के प्रारंभ में ही अपने इस बढ़े हुए विराट रूप का कारण लोगों यानी जो युद्ध में विरुद्ध अन्याय पक्ष में खड़े हैं इनके नाश के लिए बढ़ा हुआ हूँ अर्थात युद्ध के प्ररंभ से पहले यह विराट रूप काल रूप होकर लोकों (युद्ध में खड़े मनुष्यों) के नाश के लिए प्रकट हुआ है । यहां गंभीर बात यह है कि ये जो विरोधी योद्धा खड़े हैं इनका नाश करने आया हूँ जिनमें भीष्म, द्रोण आदि भी सम्मिलित हैं किन्तु अर्जुन ने पहले कहा था ‘सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः’ ११/२६ अर्थात मेरी सेना के प्रधान योद्धाओं के साथ ये सभी आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं । अर्थात योद्धा तो दोनो ओर के ही मारे जायेंगे यह भी निश्चित अर्जुन ने देख लिया था जिनमें अभिमन्यु भी सम्मिलित था, फिर भगवान केवल विरुद्ध सेना के ही योद्धाओं को मारने की बात क्यों कही ? जबकि काल तो किसी भी पक्ष को नहीं छोड़ता है । भगवान् स्वयं को काल बता रहे हैं अतः बात विरुद्ध लगती है ? इसका एक ही उत्तर है कि भगवान को युद्ध तो कराना ही है जो अर्जुन के बिना संभव नहीं था । अर्जुन पहले ही शोकग्रस्त था और यदि दोनो पक्षों के सैनिकों के नाश का नाम लेते तो जो अर्जुन ने कहा था ‘मोहोऽयं विगतो मम’ ११/१ तो पुनः मोहग्रस्त हो जाता और युद्ध होना कठिन हो जाता इसीलिये भगवान मात्र विरोधियों को ही मारने को कहते हैं ताकि युद्ध अबाध संपन्न हो सके । कुछ ऐसा ही उत्तर अन्त में अर्जुन भी आधा अधूरा उत्तर नष्टो मोहः १८/७३ में देंगे ॥३२॥
टिप्पणी— अर्जुन ने पूछा था— “आख्याहि मे को भवानुग्र रूपो”११/३१ तो भगवान कहते हैं “कालोऽस्मि” । अर्जुन कहता है अर्जुन कहता है “विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यम्” ११/३१ तो भगवान कहते हैं— “लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो" । अर्जुन कहता है कि “न हि प्रजानामि तव प्रवत्तिम्” ११/३१ तो भगवान कहते हैं— लोकन् समाहर्तुमिह प्रवृतः । इस प्रकार अर्जुन के प्रश्न के साथ श्रीकृष्ण का उत्तर संयुक्त करने पर “भवन्तमाद्यम्” में “आद्यम्” का अर्थ सृष्टि के आदि का रूप नहीं बल्कि वर्तमान युद्ध के आदि में अर्थ युक्ति संगत है ॥३२॥
तस्मात्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११/३३॥
सामान्य भाव— क्योंकि मेरे द्वारा ये सभी पहले ही मार डाले गये हैं इसलिये तुमने जो कहा था “यदि वा जयेम यदि वा नो जयेयुः” २/६ इस भाव का त्यागकर उठकर खड़े हो जाओ । हे सव्यसाचिन् ! मेरे मारे हुओं को मारने में निमित्त मात्र बनो और शत्रुओं को जीतकर यश के प्राप्त करके संपूर्ण ऐश्वर्य संपन्न अकंटक पृथ्वी का भोग करो ।
शंका— मरे हुओं को फिर अर्जुन को मारने के लिए भगवान ने क्यों कहा ?
समाधान— भगवान ने कहा था “न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते” ३/४ ‘लोकसंग्रहमेवापि’ ३/२० इत्यादि के अनुसार पुरुषार्थ संसार की मर्यादा के लिए भी करना ही चाहिए यह लोक शिक्षा है । दूसरी बात भगवान कहते हैं ‘यशो लभस्व’ अर्थात मैं तुझे यश दे रहा हूँ उसे ले ले, इसका तात्पर्य यह है कि भगवान अपने भक्त को यश देते ही हैं और वह अर्जुन को दे रहे हैं । अतः इसमें यह प्रश्न ही नहीं उठता है कि भगवान मरे हुओं को मारने के लिए क्यों कहते हैं ।
शिक्षा— हमें इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान उसी की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करता है ॥३३॥
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युद्ध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥११/३४॥
सामान्य भाव— जो तुमने पूज्य भीष्म द्रोण आदि को मारने की शंका २/४-५ व्यक्त की थी उन भीष्म, द्रोण, जयद्रथ कर्ण तथा इनके अतिरिक्त अन्य जितने भी योद्धा हैं उन सब जो अत्यंत अजेय, वरदानी एवं शक्तिसंपन्न हैं मेरे द्वारा मारे गये हैं । तुम व्यथित अर्थात व्याकुल मत होओ उन शूरवीरों को मारो । युद्ध में विजय की आशंका मत करो युद्ध में अपने शत्रुओं को जीतोगे अर्थात विजयी होओगे ॥३४॥
संबंध— सञ्जय के द्वारा अर्जुन का गद्गद होकर स्तुति किये जाने का कथन……
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥११/३५॥
सामान्य भाव— संजय बोले― श्रीभगवान ने कहा कि मैं काल हूँ सबका नाश करने के लिए बढा हूँ इससे अर्जुन पहले की अपेक्षा और अधिक भयभीत हो गया और भगवान केशव के उपरोक्त वचन सुनकर भय से व्याकुल होकर मुकुटधारी अर्जुन कांपने लगा और दोनो हाथ जोड़कर कृष्ण को नमस्कार किया और पुनः गद्गद कंठ किन्तु भय से व्याकुल होकर बोला…
विशेष भाव— यहां गद्गद प्रसन्नता का सूचक है और भीतभीतः अत्यंत भय का । इससे यह समझना चाहिए कि भागवान का उग्र रूप देखकर और काल रूप परिचय पाकर भय से व्याकुल हुए जिसके कारण शरीर कांप रहा है और सहज ही विजय की प्राप्ति सुनकर कृष्ण की अहैतुकी कृपा का अनुभव करके इतना अधिक प्रसन्न हुआ कि रोमांचित हो गया, रोंगटे खड़े हो गये, गला अवरुद्ध हो गया, शरीर कांप रहा है, भयाक्रांत भी है उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है । अतः दोनो हाथ जोड़कर मनुष्य का अन्तिम शस्त्र नमस्कार और प्रणाम का आश्रय लेकर फिर कहा अर्थात स्तुति प्रारंभ की ॥३५॥
संबंध— अर्जुन का ग्यारह श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए विभिन्न युक्तियों द्वारा ज्ञात, अज्ञात अपराधों को क्षमा करने तथा अपने गदाचक्रधारी चतुर्भुज रूप दर्शन देने की प्रार्थना करना……
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषिकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥३६॥
सामान्य भाव— अर्जुन बोले― हे हृषीकेश ! अर्थात जो इन्द्रियों को प्राणियों के शुभाशुभ कर्मानुसार निर्भयता एवं भय में प्रवृत्त करता वह हृषीकेश— आपके देखे जाने वाले उग्ररूप आपके नाम रूप लीला गुण का गान करते हुए पुण्यात्मा लोग प्रसन्न हो रहे हैं, जबकि पापात्मा राक्षस, प्रेत पिशाच आदि भयभीत होकर दशों दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धगण आपकी स्तुति कर रहे हैं । आप में यह सब उचित ही है ।
विशेष भाव— पुण्यात्मा ही नाम आदि का संकीर्तन कर सकता है और वही प्रसन्न भी रह सकता जबकि राक्षस, प्रेत, पिशाच ये सभी पापात्मा हैं और आपनी कहीं सुरक्षा इन्हें दिखाई नहीं देती है, अतः चारों ओर भयभीत होकर भागते ही रहते हैं । सभी सिद्ध समूह से भृगु, वशिष्ठ आदि ऋषि, कपिल आदि सिद्ध जो परमात्मतत्त्व को जानने वाले हैं वे नमस्कार अर्थात लोक कल्याण के निमत्त स्वस्तिवाचन आदि के द्वारा जगत के कल्याण के निमित्त आपकी स्तुति कर रहे हैं । यह सभी के लिए आपमें उचित ही है क्योंकि जो जिस इन्द्रिय वृत्ति वाला है वह वैसा ही कर रहा है (यह श्लोक रक्षा कवच में भी प्रयोग किया जाता है) ।
मूल में सर्वे दिया गया है किन्तु सिद्ध का एक ही समूह कहा गया है अतः यहाँ ऋषियों का अध्याहार कर लेना चाहिए जैसा कि ‘स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः’ ११/२१ पहले कहा जा चुका है । शेष अर्थ स्पष्ट है ॥३६॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥११/३७॥
सामान्य भाव—हे महात्मन् ! वे आपको कैसे नमस्कार न करें ? अर्थात करना ही चाहिए क्योंकि ब्रह्मा आदि के भी कर्ता हो, अथवा आप ब्रह्मा से भी ज्येष्ठ, श्रेष्ठ हो । हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप सत्, असत् एवं जो कुछ भी सत असत से परे है वह भी आप ही हो ।
विशेष— जगन्निवास अर्थात संपूर्ण सृष्टि का संहार हो जाने के बाद यह जगत बीज रूप से जिसमें रहता है, वह जगन्निवास अर्थात जगन्निधान है । ब्रह्मा से भी ज्येष्ठ श्रेष्ठ कहने का तात्पर्य है कि जब आप ब्रह्मा जी द्वारा भी स्तुति करने योग्य हो तो अन्य द्वारा स्वतः स्तुत्य हो अतः स्तुति करना ही चाहिए । शेष संबोधनों का विवरण अनेक स्थानों पर दे चुका हूँ । सत यानी नाम रूप से जो व्यक्त और असत यानी अस्थिर अव्यक्त प्रकृति अथवा सत यानी विधि और असत यानी निषेध । एवं सत असत से जो परे है जो सबका कारण अक्षर ब्रह्म है वह आप ही हो “अक्षरं ब्रह्म परमम्” ८/३ ।
अथवा हे महात्मन् ! आप षड्विकारों से रहित एवं नित्य होने के कारण अक्षर हो, यह व्यक्त रूप से सत् सा दिखने वाला जगत्, और जो सामान्य लोगों की दृष्टि में न आने के कारण असत् दिखने वाली प्रकृति और उससे भी परे जो कुछ भी है वह आप ही हो । अथवा आप सत् यानी विधि और असत् यानी निषेध से परे जो कुछ भी शेष बचता है वह आप ही हो अतः आपको नमस्कार करना उचित ही है ॥३७॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥११/३८॥
सामान्य भाव— आप आदिदेव पुराण पुरुष हो, इस संसार के आप परमधाम हो, जानने वाले एवं जानने योग्य तथा परमधाम आप हो । हे अनन्तरूप ! आप से ही संपूर्ण जगत व्याप्त है ।
विशेष भाव— संपूर्ण सृष्टि के आदिदेव हिरण्यगर्भ, अनादि, नित्य पूर्णता में स्थित आप ही हो । संसार के बीज रूप में स्थित रहने के स्थान आप ही हो । वेत्ता अर्थात जानने वाले आप हो, इसी को “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” १३/२ कहा गया है । वेद्य अर्थात जानने योग्य आप ही हो “वेदैश्चसर्वैरहमेव वेद्यो” १५/१५ । आप परमधाम अर्थात माहेश्वर मोक्ष रूप परमपद आप हो । हे अनन्त रूप वाले अर्थात देशकाल परिच्छिन्नता से रहित ! संपूर्ण चराचर जगत आपसे ही व्याप्त है ॥३८॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥३९॥
शब्दार्थ— वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति, प्रपितामह अर्थात ब्रह्मा जी के पिता भगवान विष्णु ! आपको नमस्कार है, यह आपके लिए हजारों बार नमस्कार है । पुनः नमस्कार है, बारंबार नमस्कार है ।
तात्पर्यार्थ— वायु अर्थात प्राणियों के प्राण, यम यानी जीवन का इन्द्रियादि संयम करना, अग्नि अर्थात प्रालयकाल में संपूर्ण सृष्टि को ही पचा जाने वाली अथवा प्राणियों के अन्नादि को पचाने वाली वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) पचाम्यन्नं चतुर्विधम् १५/४, चंद्रामा का उपलक्षण जीवन को स्वस्थ एवं मजबूती प्रदान करने वाली औषधि वनस्पति अन्नादि, वरुण यानी सरस और सरल जीवन, प्राजापति से विद्वानों में अंशतः मतभेद हैं एक कल्प में जैसे चौदह मनु होते वैसे ही अठ्ठाइस प्रजापति माने गये हैं अब याद नहीं है कि कहां पढ़ा था किन्तु इतना याद है कि दक्ष चौदहवें प्रजापति थे जबकि वर्तमान में हम दक्ष के जमाता कश्यप प्रजापति की संतति हैं । कुछ विद्वानों ने प्रजापति का अर्थ ब्रह्मा माना है तथापि मुझे दक्षादि प्रजापति ही युक्तिसंगत लगता है ।
मूल श्लोक में पितामह यानी ब्रह्मा जी का नाम नहीं आया है तथापि प्रपितामह आया है, जिसकी संतान का वर्णन हो और उसके पिता का वर्णन हो तो वह स्वयं ही वर्णित हो जाता है अतः ब्रह्माजी का अध्याहार स्वयं कर लेना चाहिए अर्थात ब्रह्मा को भी उत्पन्न करने वाले आप ही हो । यहां प्रपितामह से संपूर्ण चराचर के मूलाधार आप ही हो यह कहने का भाव है । इस प्रकार सबके मूल आपको जितना नमस्कार करूँ उतना कम ही है अतः संधि रहित अर्थात अनवरत आपको नमस्कार है ।
विशेष— अर्जुन ने जब विश्वरूप के प्राकट्य का लक्ष्य और अपनी विजय को समझ लिया तो प्रसन्नता से अत्यंत गद्गद हो गया है, अतः नमस्कार करते हुए तृप्ति नहीं हो रही है, इतने नमस्कारों से यही सूचित होता है ॥३९॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥११/४०॥
शब्दार्थ— आप को आगे से, पीछे से नमस्कार है, हे सर्वरूप यह नमस्कार आपके लिए सब ओर से है । अनन्त तेज वाले, अमित (अनन्त) पराक्रम वाले आपने सबको अपने में समेट रखा है इसलिये आप ही सब हो ।
सामान्य भाव— अथ शब्द का प्रयोजनपूर्व श्लोक में गद्गद होकर कुछ विभूति के रूप से नमस्कार से अतृप्त होने के कारण पुनः नमस्कार करना है ।
पूर्व से पश्चिम से अर्थात आपको आगे से पीछे से सर्वत एव से दिशा के अतिरिक्त विदिशा अर्थात ऊपर से नीचे से इधर से उधर से जहाँ जो कहने में नहीं आ रहा है या भूल रहा हूँ वहां से हे सर्व रूप अर्थात् सर्वात्मा आपके लिए यह मेरा नमस्कार है । आप जिस स्थान में जिस रूप में जैसे हो वहां की अनुकूलता के अनुसार आपको नमस्कार है, क्योंकि आप ही अनन्त सामर्थ्य और असीम पराक्रम वाले हो । मैने देखा कि आपने इस विराट के एक अंश मात्र में संपूर्ण लोकों को समाहित कर लिया है । अतः आप व्यापक सर्वात्मा हो ।
यहां द्वैतवादियों से पूछना चाहिए कि अर्जुन कहता है कि आप ही सब हो, उस सब में अर्जुन भी आता है या अर्जुन को छोड़कर सब ? यदि अर्जुन स्वयं को छोड़कर सबको कहता है तो अर्जुन झूठ बोल रहा है कि भगावन ही सब कुछ हैं । क्योंकि उसने कहा है सबको अपने में समेट रखा है तो फिर अर्जुन भगवान से बाहर खड़ा कहाँ है ? और यदि अर्जुन सहित सब कुछ भगवान हैं तो द्वैत आया कहाँ से ? अर्थात यहाँ अर्जुन ने ही द्वैत का निराकरण कर दिया ॥४०॥
संबंध— सखा शब्द बराबरी का द्योतक है । अतः अगले श्लोक सहित यहां बराबरी के प्रमाद से उत्पन्न अपराधों के लिए क्षमा मांगना...….
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥११/४१॥
सामान्य भाव— सखा इस प्रकार मानकर आपकी विराट महिमा को न जानने के कारण मेरे द्वारा प्रमाद अर्थात विक्षेप से जो हे कृष्ण, हे यादव, अथवा हे सखा भी ॥४१
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्चुत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥११/४२॥
सामान्य भाव— और जो आपके साथ साथ घूमने या खेलने में, सोते समय, एक साथ एक आसन पर बैठकर, भोजन करते समय, एकांत में, बहुत लोगों के सामने हे अच्चुत अर्थात अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले ! अप्रमेय अर्थात किसी प्रमाण से जानने में न आने वाले मैं आपसे उन सभी अपराधो को क्षमा कराने के लिए प्रसन्न करता हूँ जो बराबरी की समझ के कारण जानबूझकर आपकी हंसी करता था अर्थात उपहास पूर्वक आपका अपमान करता था ।
अवसाहार्थं अर्थात हास-परिहास― गांव की भाषा में हंसी-मजाक, दिल्लगी । असत्कृत यानी अपमान करना ।
विशेष— यह सब कहने का तात्पर्य है कि मन, वाणी और क्रिया द्वारा जो भी मैने अपराध किया वे सभी क्षमा कर दो ॥४२॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभावः ॥११/४३॥
शब्दार्थ— आप चराचर जगत को उत्पन्न करनेवाले पिता हो, आप गुरूओं के गुरु एवं सबके पूजनीय हो, आपके समान कोई नहीं है फिर आप से बढ़कर कोई कैसे हो सकता क्योंकि तीनो लोकों में आप अप्रतिम प्रभाव वाले हो ।
तात्पर्यार्थ— चराचर जगत के पिता अर्थात जगत के निमित्त कारण । चूंकि परमात्मा के स्वरूप को परमात्मा ही ठीक से जानता है और जो ठीक जानता है वही ठीक से कहता भी है अतः ऐसा तत्त्वविवेचक जो गुरु है आप उसके भी गुरु हो, इसीलिए आप ब्रह्मादि सहित संपूर्ण जगत के पूज्य हो । आपके प्रभाव की कोई समानता भी नहीं कर सकता तो अधिक कैसे हो सकता है ? अर्थात जब समान नहीं हो सकता तो अधिक भी नहीं हो सकता है, क्योंकि आप तीनो लोकों में अप्रतिम प्रभाव वाले हो ।
प्रतिमा सादृश्य भाव को प्रकट करती है अर्थात जिससे समानता की जाये वह प्रतिमा, प्रतिमूर्ति कही गई है किन्तु तीनो लोकों में आपसे या आपके प्रभाव से समानता किसी से भी नहीं की जा सकती अतः आप अप्रतिम हो । ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः’ शु.य.वे.३२/३ एवं श्वे.उ. ४/१९ श्रुति का महद्यशः यहाँ का प्रभाव और श्रुति का ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति’ यहाँ का अप्रतिम है । अतः मूर्ति पूजा के विरोधियों को और जो जीव को ब्रह्म के समान मानते हैं उनको इस श्लोक पर विचार करना चाहिए ॥४३॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥११/४४॥
सामान्य भाव— चूंकि आप गुरुओं के गुरु एवं संपूर्ण जगत के पूज्य हो इसलिये आप ईश्वर को मैं प्रसन्न करने के लिए शरीर को आपके चरणों में गिराकर अर्थात साष्टांग प्रणाम करते हुए प्रार्थना करता हूँ कि प्रमाद से, उपहास में, जानबूझकर जो भी मुझसे अपराध हुए हैं उनको जैसे पिता पुत्र के, मित्र मित्र के, पति सुशीला पत्नी के अपराधों को सहन कर लेता है वैसे ही आप मेरे अपराधों को सहन कर लो अर्थात क्षमा कर दो ।
मनुष्य का स्वभाव है कि किसी की महिमा या महत्व जाने बिना समझाने पर भी मानता नहीं और अपमान करता ही है और बाद में पछताता है ऐसे ही अर्जुन को भगवान की महिमा का अब जब ज्ञान हुआ तो पछतावा हो रहा है ॥४४॥
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११/४५॥
सामान्य भाव— इससे पहले आपके इस रूप को कभी नहीं देखा जो अभी देख रहा हूँ इसलिये यह रूप देखकर प्रसन्न हो रहा हूँ, किन्तु भय के कारण मेरा मन भी व्याकुल हो रहा है, इसलिये हे देवदेव ! हे एक मात्र जगत के आश्रय स्थान ! प्रसन्न होइए मुझे वही देवस्वरूप जो इस विराट रूप से पहले का था उसी रूप में दर्शन दो । विराट रूप से पहले अर्थात रथारूढ़ कृष्ण रूप में जो….।
तत् यानी वही का अर्थ क्या है वह आगे समझ में आयेगा । यहां तो इतना समझना चाहिए कि जिस रूप का भी पहले दर्शन किया उसी के विषय में ‛वही’ कहा है ॥४५॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥११/४६॥
सामान्य भाव— मुकुट धारण किये हुए, गदा और चक्र हाथ में लिये हुए हे अनन्त भुजाओं वाले विश्वरूप ! वही पहले वाला चतुर्भुज रूप देखना चाहता हूं ।
तात्पर्यार्थ— यहां किसी भी प्रकार की शंका का स्थान नहीं है क्योंकि वे संभवतः कभी चतुर्भुज रूप में और कभी द्विभुज अर्थात दोनो रूपों में रहते थे जैसा कि ११/५० में आयेगा । पुराण प्रसिद्ध भी है कि पौण्ड्रक नामक राजा चतुर्भुज रूप में नकली वासुदेव बनकर स्वयं को असली वासुदेव घोषित करता है जिसका वध स्वयं भगवान श्रीकृष्ण करते हैं । अतः दो हाथों में गदा और चक्र एवं दो हाथों में घोड़ों की लगाम और चाबुक लिए हुए चतुर्भुज रूप में अर्जुन के सारथी बने उसी रूप के तेन एव एवं तत् एव ११/४५ कहा गया है क्यों इस तेनैव एवं तदेव ११/४५ का यहाँ पर अन्य कोई प्रयोजन सिद्ध ही नहीं होता है ।
फिर भी एक शंका हो सकती है कि जब कृष्ण ने शस्त्र ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा करते हैं तो फिर शस्त्र धारण करके यदि रथारूढ़ हैं तो मिथ्याभाषी सिद्ध हो रहे हैं ? इसका समाधान यह है कि शस्त्र न धारण करने का उपक्षण युद्ध न करना है अर्थात इस माध्यम से युद्ध न करने की प्रतिज्ञा की थी अतः यहाँ मिथ्या दोष नहीं है । दूसरी बात हनुमान जी अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान होने पर भी किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे, इसी प्रकार अर्जुन को भी उपरोक्त रूप में चतुर्भुज दिखते हों अन्य को नहीं इसलिये भी मिथ्या दोष नहीं है । इसका स्पष्टीकरण भी अगले श्लोक में करते हैं ॥४६॥
संबंध— श्रीभगवान का अपने इस रूप दुर्लभता बताते हुए तीन श्लोकों में निर्भय होकर सौम्य रूप के दर्शन करने के लिए कहना……
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥११/४७॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― हे अर्जुन ! मेरी प्रसन्नता से जो तुमने यह तेजोमय विश्वरूप जो आदि अन्त से रहित देखा है वह मेरे आत्मयोग से अर्थात बिना किसी का आश्रय लिए ही एक मात्र मेरी महिमा में देखा है जो तुम्हारे अतिरिक्त और किसी ने भी इससे पहले नहीं देखा ।
शंका— भगवान ने कौशल्या, यशोदा हस्तिनापुर की राजसभा इत्यादि में बहुत बार विराट रूप दिखा चुके हैं फिर यह कैसे मिथ्याभाषी की तरह कहा कि विराट रूप और किसी ने तुम्हारे अतिरिक्त नहीं देखा ?
(यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूं कि कुछ बुद्धिजीवी कहते हैं कि कृष्ण ने विराट रूप हस्तिनापुर राजसभा में प्रकट अवश्य करते हैं किन्तु देखा किसी ने नहीं । हम उनसे कहना चाहते हैं कि विद्वत्ता का दुरुपयोग लोगों की आस्था पर मत करो, आपको इतिहास का ज्ञान नहीं है, महाभारत पढ़ो, तब पता चलेगा कि संधि प्रस्ताव लेकर पाण्डवपक्ष की ओर से गये कृष्ण को बंदी बनाने के लिए कर्णादि योद्धा दौड़ पड़े थे तब विश्वरूप प्रकट करके ही बचे थे । यदि कोई देख नहीं सका था तो कृष्ण बंदी क्यों नहीं बने ? हस्तिनापुर राजसभा में ही युद्ध क्यों नहीं हुआ ? अतः इतिहास पढ़ो ।)
समाधान— श्रीभगवान के पूर्व विराट रूपों के समय भिन्न भिन्न परिस्थितियां थी, अतः उस आधार पर वैसा रूप दिखाया और यहाँ की परिस्थिति संहारक है अतः यह विराट रूप पहले कभी प्रकट नहीं हुआ ।
टिप्पणी— अथवा अब जिस गदा, चक्र, चाबुक और लगाम वाले चतुर्भुज रूप दर्शन की अर्जुन इच्छा कर रहा है उस रूप का भी इससे पहले किसी ने दर्शन नहीं किया, क्योंकि ऐसा इतिहास में इससे पहले कोई अवसर ही नहीं मिला कि जो स्वयं जगन्नियन्ता हो जिसके भय से सूर्य निरंतर गतिमान हो, निरंतर अग्नि में दाहकता हो, निरंतर वायु बहती हो वह किसी के रथ का सारथी बनेगा, किसी अन्य की आज्ञा का पालन करेगा ऐसी कल्पना भी कैसे हो सकती है ? अतः यह पूर्व में भी दुर्लभ था और इस समय भी तू ही उस रूप को देखेगा जिसकी देवता भी नित्य दर्शनार्थ अभिलाषा रखते हैं ११/५२ ।
अथवा यहाँ आत्मयोगात् भगवान ने कहा है जिसमें आत्म स्वरूप तो स्वयं ब्रह्म है और योग माया शक्ति है । अर्थात मुझसे अभिन्न मेरी माया के द्वारा यह विराट स्वरूप जो आदि अन्त से रहित है दिखाया गया है । इसका तात्पर्य यह है कि मेरी सत्तामात्र से यह जो भी मेरी अनन्तता का अनुभव किया यह माया ही है, मैं नहीं । इससे यह सिद्ध होता है जब तक माया स्वयं परमेश्वर का ज्ञान नहीं कराती है, तब तक उसका ज्ञान नहीं होगा । इसके लिए लिए परमात्मा अर्थात सर्वात्मा की शरण ग्रहणा करना चाहिए ७/१४ । परमात्मा एक आधार बन जाता है और समयानुसार ज्ञान भी उसकी कृपा से १०/१० हो जाता है इसी बात को आगे ११/५४ में स्पष्ट करेंगे ॥४७॥
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥११/४८॥
शब्दार्थ— हे कुरुवंश के उत्कृष्ट वीर ! अंगों सहित वेदों के पढ़ने से, स्वर्गादि फल प्रदान करने वाले यज्ञों के सूक्ष्म ज्ञान से, दान से, उग्र तप से— इन किसी भी साधनों द्वारा मनुष्य लोक में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई इस प्रकार का रूप देखने में समर्थ नहीं है ।
विशेष— शास्त्रों में स्वर्णदान, तुलादान सहित बहुत दानों का वर्णन है । तथापि सर्वाभूषण अलंकृत कन्यादान से बढ़कर कोई दान नहीं माना गया है । शास्त्र ने सर्वालंकृत सात वर्ष की कन्या को सरस्वती, आठ वर्ष की लक्ष्मी और नौ वर्ष की कन्या को पार्वती का दान कहा है । बारह वर्ष में शास्त्रों ने भी रजस्वला होना स्वीकार किया है, जो संपूर्ण कुल के लिए विवाह के पूर्व का रजस्वला होना कलंक माना गया है । आज की परिस्थिति में रजस्वला तो क्या कदाचित कुछ अपवाद छोड़ दें तो अक्सर मां बनकर और गर्भ में एक से लेकर अधिक बच्चों की हत्या करने के बाद ही विवाह संपन्न होता है । ऐसे दूषित स्त्री-पुरुषों से उत्पन्न संतान से उसके संयमित जीवन की आशा भी कैसे की जा सकती है ? जिस पेड़ की जड़ ही सड़ गई हो उस पेड़ से आशा भी क्या कर सकते हैं ? खैर….।
अर्थात कन्यादान जैसे विशिष्ट दान से भी मेरा यह स्वरूप देखा नहीं जा सकता है । क्रिया से अग्निहोत्र आदि नित्यनैमित्तिक कर्म, यम नियमादि क्रियाएं, उग्रतप के अन्तर्गत सर्दी में जल में खड़े रहना, गर्मी में पंचाग्नि तपना, बरसात में खुले आकाश के नीचे रहना, कृच्छ्र चान्द्रायण आदि इन किसी भी साधन से कोई मेरा दर्शन करने में समर्थ नहीं है ।
कोई शंका कर सकता है कि वह विराट रूप व्यास जी और संजय ने भी देखा तो भगवान यह कैसे कह सकते हैं कि अन्य ने नहीं देखा ? तो इस उत्तर यह है कि व्यास जी त्रिकालज्ञ और साक्षात् स्वयं विष्णु का ही कृष्ण की ही तरह अवतार थे, अतः स्वयं तो स्वयं को देख ही सकते हैं, अतः यहाँ विरोध नहीं है । संजय को व्यास जी ने ही दिव्य दृष्टि दी थी, व्यास जी संजय के गुरु थे । गुरु सर्वथा समर्थ होता है अतः गुरु के सामर्थ्य से देखा जैसा कि ‘व्यासप्रदाच्छ्रुतवानेतद्’ १८/७५ में संजय स्वयं कहेंगे । समर्थ गुरु और ईश्वर में अभेद होता है, मतलब स्वयं श्रीकृष्ण की इच्छा से ही वह रूप देखा । जैसे भगवान अर्जुन को कहते हैं तूने मेरी प्रसन्नता से यह विराट रूप देखा, वैसे ही संजय को अपनी प्रसन्नता से ही दिव्य दृष्टि देकर अपना विराट स्वरूप दिखाया, अतः यहाँ भी कोई विरोध नहीं है ॥४८॥
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥११/४९॥
सामान्य भाव— मेरे बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं ११/२३, लेलिह्यसे ग्रसमाना ११/३० इत्यादि भयंकर रूप को देखकर व्यथित मत हो, अधिक मूढ़ता को मत प्राप्त हो, निर्भय होकर तुम पुनः मेरे उसी पूर्व रूप अर्थात गदा, चक्र, चाबुक और लगाम वाला रूप देखो ॥४९॥
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥११/५०॥
सामान्य भाव— संजय बोले― इस प्रकार वासुदेव अर्जुन से कहकर पुनः अपना चतुर्भुज रूप दिखाया । भयभीत अर्जुन को विजय का आश्वासन देकर पुनः सौम्य अर्थात शान्त हो गये ।
विशेष— यहाँ दो भाव अपेक्षित हैं— श्लोक के पूर्वार्द्ध में अर्जुन के कथनानुसार चतुर्भुज रूप में दर्शन देते हैं उत्तरार्ध के पूर्वभाग अर्थात श्लोक के तृतीय चरण में भयभीत अर्जुन को आश्वसान देते अर्थात निर्भय करते हैं, उसके बाद फिर से अपने सौम्य अर्थात् सामान्य द्विभुज मानवी रूप को प्राप्त करते हैं, क्योंकि अगले श्लोक में अर्जुन के कथन से भी यही द्विभुज मानवी रूप ही सिद्ध होता है ।
आश्वासन देने का मतलब अर्जुन का अपनी विजय पर जो संदेह था उसका निवारण किया कि चिन्ता मत करो विजय तुम्हारी ही निश्चित है ।
टिप्पणी— अर्जुन इस ग्यारहवें अध्याय में भगवान के तीन रूपो का साक्षाकार करता करता है, विराट, चतुर्भुज सारथी रूप में द्विभुज मानवी कृष्ण अर्थात मित्र रूप का ॥५०॥
संबंध— अर्जुन का सचेत होना……
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥११/५१॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले― हे जनार्दन ! आपका सामान्य एवं शान्त मानुषी रूप देखकर मेरी यह प्रकृति अर्थात मोहवश मूढता को प्राप्त प्राकृत भाव नष्ट हो गया है अब मैं सचेत अर्थात स्थिर हूँ ।
तात्पर्यार्थ— भगवान के प्रलयंकारी रूप को देखकर भयभीत हुए अर्जुन ने चतुर्भुज की कामना की थी किन्तु गदा और चक्र सहित चतुर्भुज की कामना की थी यही कारण है पद्म और अभय मुद्रा सहित विष्णु रूप न दिखाकर अर्जुन की इच्छानुसार गदा, चक्र, और लगाम एवं वर्तमान लक्ष्य के अनुसार चाबुक और लगाम के रूप में ही स्वयं को दिखाया । इस प्रकार अर्जुन को पुनः आश्वासन पूर्वक लक्ष्य का स्मरण कराकर विराट और चतुर्भुज रूप का कार्य पूर्ण होने के कारण उन रूपों का उपसंहार करके साधारण द्विभुज मनुष्य रूप में हो जाते हैं । इसी द्विभुज मानुषी रूप को देखकर अर्जुन स्वस्थ एवं स्थिर हो जाते हैं ।
अथवा यहाँ संवृत्तः सचेताः का अर्थ होता है― स्थिर चित् होना । तो जब स्थिर चित्त हो गया तो फिर अलग से प्रकृतिं गतः का अर्थ अपनी स्वाभाविक प्रकृति को प्राप्त होना, यह कहना कुछ समझ में नहीं आता है तथापि आचार्य शंकर सहित अन्य कई विद्वानों ने यह अर्थ किया है तो ठीक ही किया होगा । विद्वानों को समझने का अधिकार चाहिए, संभवतः वह मेरा अधिकार ही कम पड़ गया । शंकरानंद जी ने प्रकृतिं गतः का अर्थ जो विराट रूप को देखकर भय के कारण स्थिरता नष्ट हो गई थी वह स्थिर होते ही स्वतः वापस स्वभाव की प्राप्ति हो जायेगी और स्थिरता तो तब होगी जब पहले मोह नष्ट होगा । अर्जुन ने अध्याय के प्रारंभ में ही कहा था मोहोऽयं विगतो मम ११/५५ अर्थात मेरा मोह नष्ट हो गया है उसी की भगवान का मनुषी रूप देखकर और आश्वासन प्राप्त करके यहाँ पुनरावृत्ति अर्जुन करते हुए कहते हैं कि आपका आश्वासन पाकर मेरा मन पुनः स्थिर हो गया है । विराट रूप के दर्शन से जो मेरा को मोह प्राप्त हुआ था वह चला गया यानी नष्ट हो गया यह अर्थ प्रकृतिं गतः का मुझे अभीष्ट है ॥५१॥
संबंध— देवदुर्लभ विराट दर्शन की दुर्लभता, तत्त्व में प्रवेश अर्थात आत्मैक्य भाव की प्राप्ति के लिए एक मात्र अनन्य भक्ति को साधन बताते हुुए अगले चार श्लोकों में सङ्ग रहित होकर ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने की आज्ञा देना……
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥११/५२॥
शब्दार्थ— यह जो मेरा रूप है अत्यंत दुष्कर दर्शन वाला है, जिसे तुमने सरलता पूर्वक भलीभांति देखा । देवता लोग इसी दर्शन की नित्य इच्छा रखते हैं ।
भावार्थ— यहां पूर्व प्रसंगानुसार यह समझना चाहिए कि अगर इस विराट रूप के दर्शन की देवता लोग इच्छा रखते हैं ऐसा माना जाये तो युक्तिसंगत नहीं होगा क्योंकि यह विराट साक्षात् संहार के निमित्त प्रकट काल है और देवता जो सबका कल्याण करने वाले हैं वे कभी संहार नहीं चाहेंगे अतः नित्य विराट अयुक्त है । चतुर्भुज विष्णु रूप भी अयुक्त है क्योंकि दर्शन दिया और चलते बने जबकि यह गदा, चक्र, चाबुक और लगाम वाला रूप नित्य दर्शन का मतलब हमारे जीवन की डोरी आप स्वयं ही संभालें और मैं अर्जुन की तरह निश्चिंत हो जाऊं ॥५२॥
नाहं वेदैर्न न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥५३॥
शब्दार्थ— जैसा चतुर्भुज रूप तुमने देखा इस प्रकार का मेरा रूप न वेदाध्ययन से, न शारीरिक तप से, न दान से, न यज्ञ से ही देखा जा सकता है ।
भावार्थ— जिस प्रकार का तुमने चतुर्भुज रूप देखा ऐसा न तो वेदाध्ययन से— यहां से जानने में न आने का तात्पर्य है कि केवल वेद पढ़ने मात्र से मैं देखा अर्थात समझा नहीं जा सकता, साधन चतुष्ट संपन्न होकर आरूढ़ भी तदनुसार होना होगा । ऐसा अर्थ न करने पर ‘वेदैश्चसर्वैरहमेव वेद्यो’ १५/१५ अर्थात सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ का विरोध हो जायेगा, इस दृष्टि से यहाँ मात्र वेदाध्यन ही अर्थ सटीक है । तप और दान का विवरण पूर्व में दिया जा चुका है एवं उपासना से भी मैं देखा अर्थात समझा नहीं जा सकता हूँ अर्थात यहाँ क्रिया मात्र का ईश्वर की प्राप्ति में निषेध किया गया है । इसी बात को श्रुति कहती है— ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन’ मु.उ.३/२/३ अर्थात इस आत्मा को प्रवचन के द्वारा, बहुत बुद्धि से, बहुत श्रवण करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता है ॥५३॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥११/५४॥
शब्दार्थ —हे अर्जुन ! इस प्रकार के रूप वाला मैं अनन्य भक्ति से देखा जा सकता हूँ । हे परन्तप ! आचार्य एवं श्रुति से जानकर‚ फिर समझकर अर्थात आत्मैक्य भाव का अनुभव करके तत्त्व में प्रवेश कर जा ।
भावार्थ— अनन्यभक्ति अर्थात जहाँ अन्यभाव ही न हो एकमात्र ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ ही हो । वासुदेव से अतिरिक्त ‘अहं इदं’ भी न हो ऐसी अनन्यभक्ति के द्वारा ही मुझे प्राप्त किया जा सकता है, शास्त्रों से जानकर समझा जा सकता है एवं तत्त्व से जानकर उसमें प्रवेश अर्थात अभिन्न स्वरूप में स्थित हो जा । अर्थात परमेश्वर के विराट स्वरूप को भी बिना अभिन्नभावापन्न तत्त्वज्ञान के नहीं जाना जा सकता है ।
टिप्पणी— यद्यपि कुछ विद्वान श्लोक में ज्ञातुं, द्रष्टुम् एवं तत्त्वेन प्रवेष्टुं ऐसा तीन पद मानते हैं तथापि कुछ विद्वानों के अनुसार ‘ज्ञातुं द्रष्टुं च’ एक पद है, और ‘तत्त्वेन प्रवेष्टुं च’ एक पद है, इस प्रकार यहां मात्र दो पद हैं, मैं भी इसी से सहमत हूँ तीन पद युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि ‘भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ १८/५५ में भी पराभक्ति अर्थात यहाँ की अनन्यभक्ति द्वारा भगवान जितने हैं और जैसे हैं तत्त्व से जान लेता है फिर अर्थात तत्त्व से जानने के पश्चात मुझमें प्रवेश कर जाता है अर्थात दोनो स्थानों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ पर ज्ञातुं का अर्थ शास्त्र द्वारा जानना और द्रष्टुं का अर्थ देखना नहीं बल्कि स्वरूपतः तात्त्विक रूप से समझना है, इस प्रकार ज्ञातुं द्रष्टुं एक ही पद है और तत्त्वेन प्रवेष्टुं एक पद जिसकी पुष्टि १८/५५ में स्वयं श्रीभगवान करते हैं ।
अथवा इस श्लोक के पूर्वार्ध में सगुण साकार का वर्णन करता है । यद्यपि आचार्यों की अपनी अपनी टीकाएं अपना अपना मत प्रस्तुत करती हैं तथापि यहां ‛एवं विधः’ अर्थात इस प्रकार का रूप― इस प्रकार यानी जो पहले कहा गया वह चाहे कोई विराट रूप समझें या चतुर्भुज । अनन्य भक्ति यानी अपने आपको पूर्णतः सगुण सकार आराध्य के अर्पण कर देना, अपनी कोई महत्वाकांक्षा न होना, यही है अनन्य का मतलब ।
कहते हैं कि अर्जुन और दुर्योधन दोनो ही कृष्ण से युद्ध में सहायता मांगने गये, तो कृष्ण ने शर्त यह रखी कि एक ओर हमारी संपूर्ण नारायणी सेना रहेगी और दूसरी ओर शस्त्र रहित मैं । मैं युद्ध नहीं करूंगा । अब पहले अर्जुन से मागंने को कहा तो अर्जुन ने कृष्ण को ही मांग लिया । बाद में पूछने पर बताया कि मुझे न युद्ध से मतलब है और न विजय से । मैं तो अपनी जीवन डोरी आपको ही सौपने आया हूँ । मेरे रथ के सारथी बनकर मेरी जीवन डोरी आप ही संभालिए । इस प्रकार जीवन की डोरी का यह प्रतीक लगाम और अनुशासन का नाम चाबुक एवं दूर के शत्रुओं के नाश के लिए जो आधिदैविक, आध्यात्मिक हैं उनके लिए चक्र और पास के शत्रुओं के लिए यानी आधिभौतिक तापों के नाश के लिए गदा । इस प्रकार का चतुर्भुज रूप तो अर्जुन की तरह आप ही सब जानो करके समर्पित करने वाला ही देख सकता है अन्य नहीं ।
श्लोक के उत्तरार्ध में यह कहते हैं कि चाहे विराट रूप देखो या चतुर्भुज रूप देखो, है तो मेरा आत्मयोग अर्थात मेरी अभिन्न माया का ही रूप । मुझे देखना अर्थात समझना है तो आचार्य के पास जाकर तद्विद्धि प्रणिपातेन ४/३४ आदि के माध्यम से श्रुति के माध्यम से साधन चतुष्टय संपन्न होकर मेरे स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करो और ज्ञान प्राप्त करके फिर उसको देखो अर्थात साक्षात्कार करो और फिर मुझ परमतत्त्व में प्रवेश कर जाओ । इस प्रकार मुझसे अभिन्न होकर ही मुझे आत्मरूप से ही देखा जा सकता है, भिन्न नहीं । अथवा यूं कहें कि पूर्व के तीन चरण साधन हैं और अन्तिम चतुर्थ चरण साध्य ॥५४॥
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥११/५५॥
सामान्य भाव— जो भी क्रियाएं हों मेरे लिए हों, मुझसे पर अर्थात उत्कृष्ट यानी उत्तम और कुछ न हो अर्थात एक मात्र मेरी शरणागति हो अनात्म पदार्थ का मन से भी चिंतन न करता हुआ आत्मरूप चिंतन द्वारा मेरी ही भक्ति करे । हे पाण्डुपुत्र ! इस प्रकार जो मेरा अनन्यभक्त है वह मोक्षस्वरूप मुझको ही प्राप्त होता है ।
टिप्पणी— भक्ति की व्याख्या में आचार्य शंकर आत्मस्वरूप का निरंतर चिन्तन के रूप में करते अर्थात आत्मनिष्ठा ही भक्ति है ॥५५॥
समीक्षा― इस अध्याय में अर्जुन ने प्रत्यक्ष अनुभूति करके परमेश्वर को जीव से अभिन्न अवथा जीव को परमेश्वर से अभिन्न अनुभव किया और जाना वेत्तासि वेद्यम् ११/३८ अर्थात सब कुछ जानने वाला सर्वज्ञ अर्थात क्षेत्रज्ञ १३/२ एवं जानने योग्य परम् तत्त्व परमेश्वर ही हैं । फिर शंका होता है कि जब अर्जुन ने क्षेत्रज्ञ रूप से परमात्मा को जान लिया तो भयभीत क्योंकि हुआ ? इसका उत्तर यह होगा कि अर्जुन एकमात्र परम् तत्त्व परमात्मा को यह तो जान लिया की यह परम् तत्त्व मैं के अर्थ रूप आत्मा ही है तथापि परिच्छिन्नता नहीं मिट सकी । उसी परिच्छिन्नता के कारण भय उत्पन्न हुआ, क्योंकि श्रुति भी कहती कि― ‘दो से ही भय होता एक अकेले नहीं’ उसी अपरिच्छिन्नता के नाश हेतु से पहले अध्याय छः तक त्वम् पदार्थ का अनुभव कराकर यहाँ तत् पदार्थ का अनुभव कराया । उसके बाद भगवान ने अपरिच्छिन्नता मिटाने के लिए ही श्रुत्याचार्य के माध्यम से तत्त्व का स्वरूप समझकर उसमें प्रवेश अर्थात अभिन्न होने की बात कहते हुए संपूर्ण कर्मों और फलों से असंग, निर्वैर, और परमेश्वर के परायाण होकर ही सभी कर्म एकनिष्ठ होकर करने की आज्ञा प्रदान की । शेष अगले अध्याय में... ॥१-५५॥
॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकाशोऽध्यायः ॥११॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक ग्यारहवां प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत् !!!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
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