ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय१२
॥ॐश्रीपरमात्मने नमः॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
पूर्वावलोकन— अध्याय दो से लेकर अध्याय सात तक “निस्त्रैगुण्यो भव २/४५, आत्मन्येवात्मना तुष्टः २/५५, यस्त्वात्मरतिरेव स्यात् ३/१७, तद्विद्धि प्रणिपातेन ४/३४, तद्बुधयस्तदात्मानः ५/१७, न किञ्चिदपि चिन्तयेत्” ६/२५ इस प्रकार त्वं पदार्थ लक्षित निर्गुण निराकार परमत्त्व का वर्णन करते हुए अध्याय सात से दश तक अहं, मयि, माम् उभय पक्षी शब्दों का प्रयोग करके तत् पदार्थ अर्थात् विराट रूप का वर्णन किया । उसी वर्णित विराट रूप का ग्यारहवें अध्याय में साक्षात्कार कराया गया है । अध्याय के अन्त में श्लोक ५२ और ५३ में देवदुर्लभ रूप की देवता भी नित्य दर्शन की इच्छा रखते हैं यह कहकर ‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया’ ११/५३ कहकर अपनी प्राप्ति दुर्लभता बता दिया । यहाँ तक विद्वानों में भले शैली भी कोई हो मतभेद नहीं है । बारहवें अध्याय में अर्जुन ने एवं पद का प्रयोग किया बस यहीं से मतभेद विद्वानों में हो जाता है ।
लगभग सभी विद्वान मात्र ‘मत्कर्मकृन्मत्परमो’ ११/५५ पर ही यह विचार रखते हैं कि अर्जुन ने ‘एवं’ से किस साकार रूप के विषय में पूछा है ? जो भगवान ने विराट रूप दिखाया वह या जो गदा, चक्र, चाबकु और लगाम वाला चतुर्भुज रूप दिखाया वह अथवा जिस द्विभुज मानुषी रूप को देखकर प्रसन्न या शान्त हुआ वह ? किस विषय में पूछा है ? इस पर एक बात और ध्यान देना चाहिए कि इसी श्लोक में अर्जुन अक्षर के उपासक की भी बात कर रहे हैं । इन दोनो साकार और निराकार में योगवित्तम कौन है ? अर्थात श्रेष्ठ कौन है ? योग अर्थात समत्त्व भाव में भलीभाँति स्थित हुआ कौन है ? ‘समत्वं योग उच्यते’ २/४८ यहाँ पर ‘योगवित्माः’ को समझने के लिए हम यदि ११/५५ के साथ ही ११/५४ श्लोक को भी लें तो बात समझ में आ जायेगी अर्जुन के भ्रम का कारण । भगवान ने कहा कि ‘भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप’ ११/५४ यहाँ पर स्पष्ट उस विराट रूप को शास्त्र से जानने, समझने और फिर तत्त्व में अर्थात निर्गुण निराकार नाम रूप रहित परमतत्त्व में प्रवेश करने की आज्ञा देते हैं, विराट रूप जो अर्जुन ने देखा और समझा वह और कोई भले देख और समझ न सके लेकिन ‘ऋषिभिर्बहुधा गीतं’ १३/४ से जाना और समझा जा सकता है उदाहरण के लिए सहस्रशीर्षा पुरुषः आदि पुरुष सूक्त में ऐसे ही विराट का वर्णन है, नमोस्वत्वनन्ताय सहस्रमूर्तये आदि ।
समस्या यहाँ तो बिल्कुल नहीं है किन्तु इसमें सामान्य जिज्ञासु टिक नहीं सकता अतः वह क्या करे ? इस पर कहा ‘मत्कर्मकृन्मत्परमो’ ११/५५ इत्यादि यही एक साधन है कनिष्ठ अधिकारी के लिए । अतः यहाँ किस रूप का चिन्तन करे ? तो विराट को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया तो निश्चित साधक भी भयभीत हो सकता है, द्विभुज क्रियात्मक मानवी रूप में कभी भी हम मानवी स्वभाव से दोषदर्शन भी कर सकते हैं । अब रही चतुर्भुज की बात तो जहाँ गदा सदैव पास के शत्रुओं का संहार करती है, वहीं चक्र दूर के शत्रुओं को संहार करती है । अर्थात हमारे आस पास उत्पन्न होने वाली बाधाओं के निवारण के लिए हमें गदा का स्मरण करना चाहिए, दूर की बाधाएं जो आयी नहीं हैं किन्तु कभी भी आ सकती हैं ऐसी बाधाओं के लिए हमें चक्र का स्मरण करना चाहिए, मन बड़ा चञ्चल है यह किसी की सुनता नहीं है ऐसे स्वेच्छाचारी मन रूपी घोड़े के नियंण के लिए संयम नामक चाबुक का स्मरण करना चाहिए, और इस मन की गति पर नियंत्रण रखने के लिए आत्मैक्य वृत्ति की निरंतरता नामक डोरी यानी लगाम का स्मरण करना चाहिए । ऐसा जो गदा, चक्र, चाबुक और लगाम जिनके हाथ में है ऐसे देवदुर्लभ चतुर्भुज कृष्ण का साकार उपासकों को चिंतन करना चाहिए । इस स्थिति में जब हमारी चारों दिशाओं में में ऐसे कृष्णमय होगी तो हर कर्म हर क्रिया ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म’ ४/२४ होगी । ये विभिन्न दृष्टिकोण विद्वत्वृन्दों के हैं तथापि हमें अर्जुन का दृष्टिकोण क्या है ? इसे पहले अर्जुन के प्रश्नों में ही खोजना चाहिए……
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥१२/१॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले ! इस प्रकार निरंतर आपमें समाहित होकर जो भक्त आपकी निरतंर उपासना करते हैं वे अथवा जो अक्षर अव्यक्त रूप आपकी उपासना करते हैं उन दोनों में योग जानने वाला कौन श्रेष्ठतम है ?
तात्पर्यार्थ— ‘एवं’ शब्द पूर्व अध्याय के अन्तिम श्लोक के अनुसार यहाँ पर श्लोक के पूर्वार्ध में भगवान के सगुण साकार की उपासना के विषय में श्लोक ११/५५ के अनुसार प्रश्न करते हैं क्योंकि निर्गुण निराकार में सब कुछ अक्रिय है, अतः वहां कर्म बनता ही नहीं है । सगुण साकार साधक की रुचि पर है कि वह विराट का चयन करता है या चतुर्भुज, द्विभुज, शिव, विष्णु देवी आदि किसका चयन करता है । उत्तरार्ध में अक्षर अव्यक्त से निर्गुण निराकार का स्पष्ट वर्णन है जिसका वर्णन ११/५४ में शास्त्र द्वारा जानकर परमतत्त्व में प्रवेश कर जाने की बात कही गई है क्योंकि परमतत्त्व में प्रवेश का अर्थ है प्रत्यक्चैतन्य से अभिन्न हो जाना, तद्रूप हो जाना । अतः सगुण साकार का तात्पर्यार्थ है आराध्य आराधक रूप से क्रियात्मक भिन्न भाव वाला और अव्यक्त अक्षर यानी अभिन्न भाव वाला, इन दोनों में योगवित्तम कौन है ? यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि वित् की तीन श्रेणियां होती हैं, वित्, वित्तर और वित्तम, वित् बहुतों मे एक, वित्तर अनेक वित् में एक, और उन अनेक वित्तर में से एक वित्तम होता है । मतलब यह कि यहाँ इन दोनो में से हम जो समत्त्व भाव रूप योग को जानने वाला एवं उसमें स्थित सर्वश्रेष्ठ योगवित्तम है वह कौन है ?
भावार्थ— यहाँ साकार उपासना को लेकर प्रश्न किया गया है, जबकि उत्तरार्ध में निर्गुण निराकार के उपासक के विषय पूर्व अध्याय के श्लोक ५४ के उत्तरार्ध में तत्त्व से जानकर उसमें प्रवेश अर्थात जीवब्रह्मात्मैक्य संबंधित प्रश्न किया गया है । प्रत्येक व्यक्ति सर्वोत्कृष्ट मार्ग का चयन करना चाहता है । जो सरल भी हो और उत्कृष्ट भी । रही साकार रूप में विराट या चतुर्भुज अथवा द्विभुज की बात तो यह व्यक्तिगत विषय है । जिसे जो समझना है समझ ले, यहाँ मात्र दो प्रश्न साकार और निराकार विषयक है, यही स्पष्ट है ॥१॥
संबंध— सगुण साकार उपासक की स्तुति…..
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥१२/२॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले— जो भक्त मन को मुझमें आवेष्टित अर्थात प्रवेश कराकर समाहित चित्त होकर अखंड श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं वे युक्ततम अर्थात श्रेष्ठ हैं ।
तात्पर्यार्थ— यहां ध्यान देना होगा कि ज्ञानी के लिए ‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’ ७/१८ और भक्त के लिए ‘एक भक्तिर्विशिष्यते’ ७/१७ कहा था, ठीक इसी प्रकार यहां भक्त को युक्ततम कहा है । ‘ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति’ अर्थात ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही होता है वहाँ जानना और उपासना संभव ही नहीं है, जबकि जानना और उपासना यह सब भिन्न भाव में ही संभव है तभी नित्ययुक्ता अर्थात निरंतर समाहित चित्त अर्थात सब ओर से मन को खींचकर सगुण साकार वासुदेव् सर्व ७/१९ के अनुसार मन को स्थिर करना ही मन को परमेश्वर में प्रवेश कराना है कि उसके अतिरिक्त और कुछ दिखे ही नहीं अन्य किसी विषय का चिन्तन ही न हो हो यही निरंतरता है और इसी सार्वभौमिक भाव में में स्थित को ही परम योगी कहा गया है स योगी परमो मतः ६/३२ उसी को यहाँ युक्ततम कहा गया है । सबसे बड़ी बात यह है कि ‘…… मद्गतेनान्तरात्मना । …...स मे युक्ततमो मतः’ ६/४७ में भी युक्ततम कहा जा चुका है और अर्जुन पुनः वही यहां पूछ रहा है, इसका अर्थ यह हुआ कि अर्जुन ने वहाँ पर इस विषय में ध्यान ही नहीं दिया जबकि श्रीभगवान ने बिना पूछे ही कह दिया था । इससे यह समझना चाहिए कि जब तक कोई प्रश्न न करे तब तक बात नहीं कहना चाहिए । अन्यथा सामने वाले को उसका महत्व पता नहीं होगा और बात की अनदेखी कर दिया जायेगा । परा श्रद्धा का अर्थ अखंड श्रद्धा जिसका कभी खंडन नहीं हो सकता निरंतर एकरस रहती है, वस्तुतः अखंड भी कहना नहीं बनता क्योंकि अखंड भाव एकरस रहता है घटता बढ़ता नहीं जबकि श्रद्धा सात्त्विक हो तो निरंतर बढ़ती है, श्रद्धा भक्ति की रीढ़ है बिना श्रद्धा के भक्ति नहीं हो सकती, अतः यहाँ परा श्रद्धा से सात्विक श्रद्धा समझना चाहिए यही आरुरुक्षु के लिए युक्ततम है ।
अथवा यहाँ साकार उपासक की स्तुति अर्थात प्रशंसा की गई । परा श्रद्धा का वर्णन अध्याय १७ में आयेगा । यहाँ पर जो ध्यान देने की बात है वह यह कि मन को परमेश्वर में पहले समाहित होकर रख दे यही उसकी नित्य निरंतर उपासना है । दूसरी बात कहा पराश्रद्धा से युक्त होकर । यहाँ साकार रूप की उपासना करने वाला भी ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ का ही अनुसरण करेगा, क्योंकि जब मन भगवान में चला गया तो वह बिना मन का हो गया अर्थात उसकी अपनी सीमित अहं यहीं समाप्त हो गई, फिर पराश्रद्धा से युक्त हो गया अर्थात वह सगुणस्वरूप की उपासना तो करता है तथापि उसी स्वरूप को अविनाशी अक्षर रूप से भी देखता है । उसके उस साकार परमेश्वर से भिन्न निर्गुण-निराकार परमेश्वर नहीं होगा । यही परा श्रद्वा है । यही ‘वासुदेवः सर्वम्’ है । यही ‘सर्वभावेन एवं परा भक्ति’ है ।
जबकि अविनाशी अक्षर का उपासक भी ‘वासुदेवः सर्वम्’ ही देखेगा तथापि वह निर्गुण निराकार का ही स्वरूप जगत को समझेगा अर्थात साकार (जगत सहित) को निर्गुण निराकार से अभिन्न ज्ञानी समझेगा और साकार भक्त साकार परमेश्वर से अभिन्न निर्गुण निराकार को देखेगा । वासुदेवः सर्वम् दोनो का लक्ष्य होने पर भी अधिकार भेद से इतना अन्तर होगा कि साकार में तो दूसरा निराकार में देखेगा । ऐसा जो पराभक्ति वाला साकार उपासक मेरा भक्त है वह सर्वश्रेष्ठ अर्थात जिससे बढकर कोई श्रेष्ठता नहीं हो सकती है ऐसा श्रेष्ठ है ।
भावार्थ― चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हुए ज्ञानी भक्त को अपने से अभिन्न अतुलनीय अत्यंत प्रिय और भक्त सगुणोपासक को विशेष अर्थात श्रेष्ठ ७/१७ बताया था । इसका अर्थ यह है कि भक्त यानी जिज्ञासु एवं ज्ञानी । यही दो भक्त भगवान के लिए अभीष्ट हैं । शेष दो चूंकि अन्य किसी का आश्रय न लेकर भगवान की ही शरण लोक कामना से लेते हैं अतः वे मंद और मंदतर कोटि के उपासकों के अंतर्गत साधक समझना चाहिए, जबकि ज्ञानी और भक्त क्रमशः अति उत्तम और उत्तम कोटि के साधक समझना चाहिए । इन्हीं चारों को दृष्टि में रखते हुए ही पीछे अध्याय आठ और नौ की व्याख्या की गई । जो आठ लक्षणों वाला सहज अर्थात स्वभाव से ही सहज भाव में स्थित हो जाता है वह अति उत्तम और जो योग आदि उपासनाओं का आश्रय लेता है वह उत्तम कोटि का साधक है जबकि यज्ञादि के सहित नाना प्रकार के तपों का आश्रय लेकर उपासना करने वाला मंद और पत्रं पुष्पं के द्वारा मूर्ति आदि का आश्रय लेकर उपासना करने वाला मंदतर साधक है । इसके अतिरिक्त अन्य देवताओं की सकाम उपासना आसुरी और निषिद्ध गीता मानती है । इस अध्याय में भी इन चारों प्रकार के साधकों के लिए ही आगे चार साधन क्रमशः बताये जायेंगे । अपने अधिकार की पहचान करके उनका अनुशरण करने से कल्याण सुनिश्चित है ।
सारांश— सात्त्विक श्रद्धा के द्वारा जिनका मन मुझमें प्रवेश करके समाहित अर्थात स्थिर हो गया है वही मेरा भक्त श्रेष्ठ है ॥२॥
संबंध— ब्रह्म का स्वरूप और उसके उपासक की सद्यः मुक्ति……
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥१२/३॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥१२/४॥
शब्दार्थ— किन्तु जो अविनाशी, निर्देश रहित, निर्गुण-निराकार, सर्वव्यापी, अचिन्य, कूटस्थ, स्थिर और नित्य स्वरूप की भलीभांति उपासना करते हैं ॥३॥
जो संपूर्ण इन्द्रिय समूह को अनुशासित करके सर्वत्र समबुद्धि के द्वारा संपूर्ण प्राणियों के हित में आसक्त हैं वे मुझ आत्मस्वरूप को ही प्राप्त होते हैं ॥४॥
तात्पर्यार्थ— यहां विशेष है ‘तु’ पद । पहले कहा कि जो मन्द साधक साधक हैं जिनकी भलीभाँति इन्द्रियां अपने आधीन तो नहीं किन्तु मन मुझमे प्रवेश कर गया है अर्थात जो मुझ सविशेष से भिन्न और कुछ चिन्तन न करके मुझमें ही समाहित हो गया है, वह युक्ततम है किन्तु यहां से अपने उपरोक्त कथन का वैलक्षण्य प्रतिपादन करने के लिए तु निर्विशेष उपासक की सद्योमुक्ति का कथन करते हैं । जैसे ‘एक भक्तिर्विशिष्यते’ ७/१७ में भक्ति को ही विशेष कहा किन्तु कोई ज्ञानी पर आशंका करे कि ज्ञानी विशेष क्योंकि नहीं ? तो कहते हैं कि ‘ज्ञानी त्वात्मैव’ ७/१८ ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है आत्मा में क्या विशेष क्या निर्विशेष ? विशेष तो वह होता है जो स्व से भिन्न हो और अपने प्रति पूर्ण समर्पण हो, उसकी दृष्टि मुझसे से भिन्न अन्य गति ही न हो अतः वह विशेष है । इसी प्रकार यहाँ सविशेष उपासक को विशेष कह दिया क्योंकि वह भिन्न तो स्व से देखता है किन्तु मुझसे भिन्न वह अन्य न गति देखता है न ही मुझसे अतिरिक्त कुछ और चाहता ही है अतः वह युक्ततम है किन्तु जो मेरी उपरोक्त आठ लक्षणों से संपन्न की जो उपासना करता है वह साक्षात् मुझ मोक्ष स्वरूप को ही प्राप्त होता है ।
वे मुझ परमेश्वर के आठ लक्षण हैं— अक्षर अर्थात जो जो देश काल अपरिछिन्न होने के कारण कभी क्षरण को प्राप्त नहीं होता, हो सकता भी नहीं; अनिर्देश्य अर्थात वह ब्रह्म यही है, ऐसा ही है इतना ही है, इस प्रकार जिससे निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता है अर्थात जिसे नेति नेति कहा जाता है; अव्यक्त अर्थात जिसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि किसी भी साधन से व्यक्त नहीं किया जा सकता है; सर्वव्यापी अर्थात जो बाहर और भीतर आकाश के सामान सर्वत्र व्याप्त है; अचिन्त्य अर्थात जिसका हम इन्द्रियों के द्वारा अनुभव करते हैं चिन्तन भी उसी का करते हैं किन्तु वह इन्द्रियों का भी विषय न होने से अचिन्त्य है; कूटस्थ अर्थात जो बाहर से कुछ और दिखे और भीतर से कुछ और हो वह वह ब्रह्म भी माया या अविद्या आश्रित के लिए बाहर दिखने में कुछ और है किन्तु विचारशील के विचार में अन्दर से कुछ और होने के कारण ही कूटस्थ है, अथवा लोहार की निहाई पर जैसे पता नहीं कितना भी लोहा बन बिगड़ जाता है, किन्तु निहाई ज्यों की त्यों ही रहती है, इसी प्रकार उस ब्रह्म में पता नहीं कितनी सृष्टियों का उदय अस्त हो गया फिर भी वह ज्यों का त्यों है अतः वह कूटस्थ है; अचल अर्थात वह सर्वत्र परिपूर्ण होने से कोई ऐसी जगह ही नहीं है जहाँ वह हिलडुल सके अतः वह अचल है; ध्रुव अर्थात वह शाश्वत अर्थात नित्य एकरस है, अपरिवर्तनीय है; इन आठों लक्षणों से युक्त मुझ निर्विशेष की जो संपूर्ण प्राणियों की साधना करने वाला है, अर्थात उससे किसी को उद्वेग या भय नहीं होता, सभी प्राणी निर्भय रहते हैं, सर्वत्र बुद्धि रखता है ‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति यो’ ६/३२ अर्थात सर्वत्र सबमें वह स्वयं को ही आत्मरूप से देखता है, अर्थात सबमें जो स्थित आत्मा है वह सर्वात्मा मैं ही हूँ इस वृत्ति से भिन्न कभी भी कहीं भी बुद्धि जाती ही नहीं है, ऐसा जो भलीभाँति इन्द्रियों को वश में करके मुझ सर्वात्मा की उपासना करता है वह मुझको अर्थात मुझ साक्षात् मोक्षस्वरूप को ही प्राप्त होता है । इस प्रकार यहाँ मामेव में जो एव है वह संशय विपर्यय रहित सद्योमुक्ति का निश्चय करने के लिए है ।
अथवा अनिर्देश्य का अर्थ है कि उसे किसी संकेत/उपमा के द्वारा यह नहीं निश्चित किया जा सकता है कि यह बस ऐसा ही या इस प्रकार का ही है । जैसे नीलगाय गाय के समान दिखने पर भी गाय नहीं है किन्तु गाय की समानता को लेकर नीलगाय पहचानी जा सकती है, वैसे ही वह है तो अनिर्देश्य है तथापि श्रुति प्रदत्त सामानाधिकरण न्याय से उस अनिर्देश्य का निर्देश मात्र पहचान बताने के लिए है, यह बताने के नहीं है कि वह ऐसा ही और यही है । कूटस्थ का अर्थ है कि संपूर्ण जगत में व्याप्त होकर भी वह जैसा है वैसा नहीं दिखता और जो है वह भी बिना ज्ञान के नहीं दिखता अर्थात बाहर कुछ और भीतर की समझ में कुछ, यह कूटस्थ का लक्षण है । अचल अर्थात स्थिर कह दिया गया है, अतः ध्रुव का अर्थ अचल न होकर नित्य, शाश्वत होगा ॥३॥
{यह अव्यक्त की निरंतर उपासना में साध्य का स्वरूप या सिद्ध की स्थिति बताया गया है, किन्तु उसके साधन को अगले श्लोक से समझकर कर फिर साधना करना चाहिए । या यूं कहें कि पहले अगले श्लोक का अर्थ करके फिर इस श्लोक का समझना चाहिए}
‘संन्नियम्येन्द्रियग्रामम्’ से यहां पूर्णतः साधन चतुष्टय का वर्णन कर दिया गया है । विवेकशील अन्यत्र से की गई व्याख्या से ही समझ लें बार बार एक ही बात दुहराया नहीं जा सकता है । ‘सर्वत्रसमबुद्धयः’ यानी ‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति यः’ ६/३२ अर्थात मैं का अर्थ जो आत्मा है उस आत्मा को विवेक पूर्वक सुनिश्चित करके अनात्मपदार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण प्राणियों में स्वयं को आत्मरूप से देखना । प्राप्नुवन्ति का तात्पर्य है कि ऐसे जितेंद्रिय इसी जन्म में उसे शरीर रहते ही प्राप्त करके जीवन्मुक्त हो जाते हैं ।
‘सर्वभूतहिते रताः’ का अर्थ सभी प्राणियों के हित के लिए अपनी साधना छोड़कर उनका हित करने में आसक्त नहीं हो जायेगे कि किसी को बच्चा नहीं है तो बच्चा दे दें, किसी को धन नहीं है तो धन दे दें, किसी को शत्रु परेशान कर रहा है तो उसे मार डालें― नहीं करेगा बल्कि वह ‘अभयं सर्वभूतेभ्यः ददाम्येतद्व्रतं मम’ का ही अनुसरण करेगा । वह सबमें एक ही आत्मा ‘स्व’ से अभिन्न देखने के कारण किसी भी परिस्थिति से भयभीत होकर विचलित नहीं होगा । वह यह समझेगा कि प्रत्येक घटना अनात्मपदार्थ की क्रियामात्र है, इससे हमारा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है और उस साधक से कोई भयभीत नहीं होगा क्योंकि वह आत्मभाव में स्थित होने के कारण ऐसा कोई कार्य करेगा ही नहीं कि जिस व्यवहार को वह स्वयं भी पसंद न करता हो यही उसके द्वारा सभी प्राणियों का हित करना है । वही मुझे प्राप्त करेगा मतलब यहाँ माम् का अर्थ आत्मप्रत्य है अर्थ ‘त्वम्’ पदार्थ के लक्ष्यभूत तत् पदार्थ के साथ एकत्व को प्राप्त हो जायेगा । यही यहाँ पर ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ७/१८ अर्थात ज्ञानी मेरा स्वरूप है के भाव से अविरुद्ध अर्थ होगा । यहां कुछ विशेष शब्दों का भाव दिया गया इस प्रकार भाव है । शेष शब्द सामान्य अर्थ वाले हैं अतः उनको मुख्य अर्थ से ही समझें ॥४॥
संबंध— उपरोक्त निर्विशेष की ऊपासना के लिए जिस प्रकार इन्द्रिय निग्रह पर बल दिया वह इस बात का प्रतीक है कि यह उपासना उत्कृष्ट जितेन्द्रिय के लिए ही है । अजितेन्द्रिय के लिए तो यह बहुत ही क्लेशकारक और पतन का हेतु है…..
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥१२/५॥
शब्दार्थ— उन अव्यक्त की उपासना में आसक्त चित्त वाले साधकों को अधिकतर दुःख होता है, क्योंकि देहाभिमान रहते हुए अव्यक्त की गति दुःख से अर्थात अत्यंत कठिनता से प्राप्त होती है ।
तात्पर्यार्थ— अव्यक्त अर्थात जो मन और बुद्धि से व्यक्त न किया जा सके आदि उपरोक्त लक्षणों वाले की उपासना में अधिकतर दुःख होता है क्योंकि अव्यक्त की उपासना के लिए देहाभिमान का नष्ट होना आवश्यक है और जिनका देहाभिमान नष्ट नहीं हुआ है वे निश्चय ही क्लेश के भागीदार बनते हैं और दुःख पूर्वक ही अव्यक्त को प्राप्त करते हैं । [{(अर्थ का अनर्थ करने वाले अर्जुन के प्रश्न पर भी ध्यान दें अक्षरं अव्यक्तम् अतः यहाँ भी अक्षर अव्यक्त ही अर्थ करें न कि अव्यक्त का अर्थ त्याज्य प्रकृति और प्रकृति का कार्य}]
अवथा हम इस प्रकार से समझ सकते हैं— जिसने अव्यक्त की उत्तम महिमा को सुन सुनकर कर अव्यक्तासक्तचेतसाम् अर्थात निर्विशेष परमतत्त्व में आसक्ता मन वाला हो गया और उसने सविशेष ब्रह्म की अराधाना छोड़ दी किन्तु वह अभी देहवद्भिः अर्थात देहाभिमान से ऊपर उठ नहीं सका है अर्थात देहसंबंधित इन्द्रियादि पर विजय प्राप्त नहीं कर सका ऐसा अजितेन्द्रिय अव्यक्त में आसक्त चित्त होने के कारण ‘क्लेशोऽधिकतरं तेसाम्’ उन अजितेन्द्रिय अव्यक्त के उपासकों को मात्र दुःख ही नहीं होता है बल्कि अधिक दुःख होता है, क्योंकि अजितेन्द्रिय अत्यंत दुःखद गति को प्राप्त करता है । यहाँ सबसे अधिक ध्यान देने की बात यह है कि क्लेशोऽधिकतरं अर्थात अधिक से अधिक दुःख प्राप्त होता है अब इसके बाद कहते दुःखं गतिः अवाप्यते अर्थात जो साधन चतुष्टय संपन्न नहीं उनकी गति दुःख होती है, ऊपर कहा अधिकतर दुःख प्राप्त होता है और यहाँ कहते हैं दुःखद गति प्राप्त करता है यहाँ दुःखम् के स्थान पर दुःखतमम् का अध्याहार कर लेना चाहिए क्योंकि जो जिसे सैकड़ों में छांटा जाये वह तर होता है और उन तर में से सैकड़ों में एक छांटा जाये वह तम होता है । अतः अजितेन्द्रिय होने के कारण दुःख पर दुःख होगा इसलिये अव्यक्त को प्राप्त नहीं कर सकता और सविशेष पर निष्ठा समाप्त हो ही गई है अतः उसकी गति दुःखतम अर्थात जन्म मरण रूप पतन को प्राप्त ही होगा । वह उस परमतत्त्व को प्राप्त ही नहीं कर सकता है, ऐसा श्रीभगवान का तात्पर्य है ।
शंका— अध्याय छः के श्लोक ७ में ब्रह्म की प्राप्ति सुखपूर्वक कहा गया है और यहाँ दुःख पूर्वक क्यों कहा ? इससे पूर्वापर में विरोध उत्पन्न होता है ?
समाधान— नहीं, विरोध नहीं है क्योंकि वहां जो सुखपूर्वक कहा गया है वह साधन सिद्ध हो होकर देहाभिमान आदि के कल्मषों से रहित हो गया है जबकि यहाँ देहाभिमान का कल्मष स्पष्ट कह दिया है और जब तक कल्मष है तब तक क्लेश है ।
विशेष— श्लोक दो में सविशेष ब्रह्म के उपासक को कहा युक्ततम और निर्विशेष ब्रह्म के उपासक को कहा प्राप्नुवन्ति १२/४, अब विचार करो कि जो नाना प्रकार के योग साधन करने वाले हैं उनकी अपेक्षा जिनका मन प्रभुमय हो गया है वह युक्ततमा है अर्जुन ने भी यही पूछा था कि ‘तेषां के योगवित्तमाः’ १२/१ अब विचार करो कि अर्जुन ने योगवित्तम अर्थात सविशेष और निर्विशेष जानने वालों में श्रेष्ठ पूछा है । जैसे कोई बच्चा कहे कि पिता जी ! आपको मैं अधिक प्रिय हूँ या मां अधिक प्रिय है, तो बच्चे को संतुष्ट रखने के लिए पिता कहता है कि मुझे तुम अधिक प्रिय हो, इस पर बच्चा पूछता है कि मां प्रिय नहीं है ? पिता कहता है वो तो मेरी आत्मा ही है प्रिय तो तुम हो, भगवान पहले भी कह चुके हैं कि ‘एकभक्तिर्विशिष्यते’ ७/१७ किन्तु ‘ज्ञानीत्वात्मैव’ ७/१८ भला सोचो आत्मा यानी स्वयं के प्रिय अप्रिय की बात कहां से आ गई ? जहां ‘स्व’ से भिन्न होगा वहीं प्रिय अप्रिय का प्रसंग उपस्थित होता है । इसी प्रकार सविशेष उपासक को कहा युक्ततम अर्थात सर्वश्रेष्ठ तथापि ‘तु’ १२/३ अर्थात किन्तु लगाकर कहा प्राप्नुवन्ति १२/४ युक्ततमा में प्राप्त तो नहीं है किन्तु भविष्य में प्राप्त करेगा और प्राप्नुवन्ति अर्थात वर्तमान में ही प्राप्त करता है अर्थात निर्विशेष ब्रह्म उपासक की सद्यः मुक्ति कही है और सविशेष ब्रह्म की भविष्य में कही गई है तो सर्वश्रेष्ठ कौन हुआ ? जो अभी भोजन करता हुआ क्षुधा तृप्ति का अनुभव कर रहा है वह या जो क्षुधा से पीड़ित भोजन बना रहा है और धुंवें से परेशान हो रहा है वह सुखी है । दूसरी बात रही क्लेश की बात तो निर्विशेष उपासक को यदि क्लेश होता तो सविशेष ब्रह्म को छोड़कर निर्विशेष उपासना करता ही क्यों ? जिन्हें क्लेश होता है, बल्कि अधिक क्लेश होता है । उन्हें देहाभिमान ही प्रमुख कारण है; देहाभिमान को लेकर ही मैं ब्राह्मण तू चाण्डाल आदि भाव बनता है । यह भाव आते ही द्वेष भाव उत्पन्न हो जाता है और द्वेष के आते ही फिर प्रत्येक दुर्गुण उत्पन्न हो जाते हैं ‘सर्वत्र समबुद्धयः’ नष्ट हो जाता है ‘सर्वभूतहिते रताः’ पाताल में चला जाता है, तो क्लेश होगा थोड़ा नहीं बहुत होगा इसीलिये दुःख अधिक होगा यह नहीं कहा बल्कि कहा अधिकतर दुःख होगा ।
इतना ही नही ‘दुःखं अवाप्यते’ कहा जिसका अर्थ यह है कि कदाचित ही वह शरीराध्यास से ऊपर उठकर परमतत्त्व को प्राप्त कर पाये अन्यथा उसका पतन निश्चित है या सीधे शब्दों में कहा जाये तो उसे ब्रह्मतत्त्व की प्राप्ति होती ही नहीं, वह सविशेष और निर्विशेष ब्रह्म में किसी की भी प्राप्ति नहीं कर सकता, उभय भ्रष्ट होकर जन्म मृत्यु को प्राप्त होता है । जिसका शरीराध्यास नहीं गया वह ज्ञानी हो भी कैसे सकता है ? शरीराध्यास वाले हमेंशा प्रवृत्तिमार्गी होते हैं, निवृत्तिमार्गी हो ही नहीं सकते क्योंकि प्रवृत्तिमार्गी का धन संचय फिर उसकी सुरक्षा आदि नाना प्रकार के क्लेश प्रवृत्तिमार्गी को स्वतः सिद्ध है जबकि निवृत्तिमार्गी निर्विशेष ब्रह्म का उपासक जिसने सगुण और निर्गुण दोनो का अनुभव किया है जिसे ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ १२/१३ आदि से आगे कहा जायेगा उसे क्लेश अर्थात दुःख कैसे हो सकता है ? ‘अद्वैतमृतवर्षिणीं भगवतीम्’ कैसे कहा गया गीता को ? अद्वैत रूपी अमृत में डुबकी लगाये और दुःख हो तो वह अमृत कैसे हो सकता है ? अतः यहां अर्जुन को भगवान ने प्रवृत्तिमार्गी के लिए युक्ततम इसलिए कहा कि देहाभिमान गया नहीं कर्म करेगा ही तो पतन को प्राप्त न हो इसलिये ‘मत्कर्मकृन्मत्परमो’ ११/५५ आदि कहा था और उसी को यहाँ युक्ततम कहा है, न कि ‘ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च’ ११/५५ निर्विशेष ब्रह्म को नीचा दिखाने के लिए । जो लोग इसी श्लोक में पूर्वार्ध में कहे क्लेश का अर्थ अलग करते हैं देहाभिमानी के साथ में नहीं जोड़ते हैं वे निश्चित ही अर्थ का अनर्थ करते हैं और वे गीता के अद्वैतामृतवर्षिणी के स्थान पर द्वैतविषवर्षिणी ही अर्थ करते हैं और वे बालवत् उपेक्षणीय हैं ।
अथवा जिन विवेकशील गीता प्रेमियों ने अध्याय पांच एवं छः को ठीक से पढा है वे देखें कि भगवान ने पहले भी ‘दुःखमाप्मयोगतः’ ५/६ अर्थात सन्न्यास यानी ज्ञानयोग अयोगी अर्थात अजितेन्द्रिय को प्राप्त ही नहीं होता, जिसके कारण को वहीं देखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त अजितेन्द्रिय योगी के विषय में अर्जुन द्वारा पूछने पर भगवान ने स्वयं ही बताया ‘असंयतात्मनः योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः’ ६/३६ अर्थात अजितेन्द्रिय को परमतत्त्व प्राप्त ही नहीं होता है । पीछे जिसे अयोगी, असंयतात्मनः कहा गया है उसे ही यहां देहवद्भिः कहा गया है जिसका अर्थ होता है अजितेन्द्रिय, साधन चतुष्य से रहित, स्वेच्छाचारी ।
मेरा मानना है कि स्वेच्छाचारी को तो साकार की भी प्राप्ति संभव नहीं है इसीलिये भगवान, अन्ययोग, अनन्य मन, अनन्य चित्त, अव्यभिचारिणी भक्ति आदि की बारंबार बात करते हैं और यहाँ भी पहले ही बता दिया कि श्रेष्ठ भक्त कौन है ? मय्यवेश्य मनः, नित्युक्ता, श्रद्धया परयोपेताः १२/१ यह अर्थ वहीं समझ लेना चाहिए । तो आप किस बल पर यह कहते हो कि अव्यक्त उपासना में अधिक क्लेश है ? बल्कि जिसका चित्त शुद्ध नहीं हुआ है उसका मन अव्यक्त अर्थात निर्गुण निराकार तो क्या सगुण साकार में भी टिक नहीं सकता है । इसलिये चंचल मन वाले साधकों का मन स्थिर हो उसके लिये यह साधन बताया है ताकि चित्त शुद्ध हो जाये और फिर मुझ अव्यक्त में वह भी आसक्त होकर मुझे सहज ही प्राप्त कर लेगा, क्योंकि क्लेश तो साधनकाल में ही होते हैं साधनसिद्धि में नहीं । अतः चित्तशुद्ध होने पर ही भगवान फिर जो ज्ञानी के लक्षण हैं वही इस जिज्ञासु साकार उपासक के स्वरूप प्राप्ति के साधन रूप नित्य ज्ञानस्वरूप उपासनीय भगावन कहेंगे १२/२०। यद्यपि यह ज्ञान नहीं है तो भी अक्षय अमृत स्वरूप ज्ञान का साधन होने के कारण ही ‘धर्म्यामृतम्’ १२/२० अर्थात अक्षय ज्ञान यानी नित्यज्ञान इन साधनों को ही कह दिया जो आगे ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ १२/१३ से कहे जायेंगे । इतना ही नहीं अध्याय १३ में भी ‘अमानित्वमदम्भित्वम्’ १३/७ आदि भी ज्ञान नहीं ज्ञान का साधन ही हैं तो भी उन्हें ज्ञान नाम से ही कहा है ।
अतः विवेकशील को गीता के पूर्वापर का विवेकपूर्वक अनुशीलन करते हुए सत्य को स्वीकार करते हुए अर्थ का अनर्थ करके न तो स्वयं भ्रमित हों और न ही समाज को भ्रमित करें एवं सनातन संस्कृति की इस प्रकार रक्षा करते हुए अपना कल्याणमार्ग प्राप्त करें ।
टिप्पणी— यहाँ भगवान स्पष्ट रूप से भविष्य में ब्रह्म प्राप्ति के लिए युक्ततम कहकर मध्यम अधिकारी सविशेष उपासक की स्तुति अर्थात प्रशंसा करके संतुष्ट मात्र किया जिससे वह हीन मन होकर उभय भ्रष्ट न हो जाये और प्राप्नुवन्ति से ज्ञानी के सद्योमुक्ति का वर्णन करके यह भी सिद्ध कर दिया कि निर्विशेष ब्रह्म की उपासना से श्रेष्ठ सविशेष श्रेष्ठ हो ही नहीं सकती । इस प्रकार कूटवाणी द्वारा दोनो को संतुष्ट कर दिया ॥५॥
संबंध— उपरोक्त अजितेन्द्रिय अव्यक्तोपासक के लिए ही उसका पतन दिखाकर ‘मत्कर्मकृन्मत्परमो’ ११/५५ की आज्ञा दी गई थी, उसी के लिए पुनः कर्मसंन्यास की आज्ञा देते हैं……
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥१२/६॥
शब्दार्थ— किन्तु जो संपूर्ण कर्मों को मुझमें सम्यक् रूप से मेरे परायण होकर अनन्यभाव से मेरा ही ध्यान करते हुए उपासना करते हैं ।
तात्पर्यार्थ— यद्यपि यहां से आगे छः श्लोक सगुण ब्रह्म की उपासना संबंधित विभिन्न साधनों का वर्णन किया गया है तथापि सर्वप्रथम यहां अतिशीघ्र उद्धार का साधन बताते हैं— ‘तु’ शब्द उपरोक्त अजितेन्द्रिय अव्यक्त साधक की पुनः आवृत्ति करता हुआ उसके शीघ्र उद्वार के साधन रूप में इस प्रसंग को कहने के लिए है । यद्यपि कर्माणि बहुबचन होने से सभी कर्म स्वतः समाहित हो जाते हैं तथापि सर्वाणि कहने का तात्पर्य यह है कि जो आपके अदृष्ट पूर्व कर्म हैं वे भी अर्थात लौकिक और अलौकिक दोनो कर्म जैसा कि ‘यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्’ ९/२७ में जुहोसि, ददासि एवं तपस्यसि ये अलौकिक और शेष लौकिक दोनो ही कर्मों को ईश्वरार्पण करने को कहा गया है, इसी प्रकार यहां सर्वाणि कर्माणि से समझना चाहिए । जो यहां सन्न्यस्य आया है उससे कर्मों का स्वरूपतः त्याग नहीं हो सकता है क्योंकि देहाभिमानी प्रवृत्तिमार्ग का आश्रय वाला होने से कर्म किये बिना रह नहीं सकता है जैसा कि न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत ३/५ कर्म करेगा ही अतः सभी कर्मों के त्याग का तात्पर्य यह है कि उन सभी लौकिक अलौकिक निमित्त से किये गये और आगे किये जाने वाले शास्त्रीय कर्मों का जो फल है उन का भली प्रकार से मुझमें विनियोग कर दे मुझमें अर्पित कर दे यही यहां का ईश्वरार्पण किया जाने वाला सम्यक् त्याग है जैसा ‘अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स सन्न्यासी च योगी च निरग्निर्न चाक्रियः’ ६/१ मत्पराः यानी मैं ही जिसकी परमगति हूँ ।
अनन्येन योगेन से यहां निर्णय हो जाता है कि सगुणोपासक भगवान के किस रूप का ध्यान करे ? योग का अर्थ होता है समाधि और समाधि होती है भगवान के विश्वरूप में ‘विश्वतो चक्षुरुत विश्वतोमुखो’ आदि अर्थात भगवान के विश्वरूप का ध्यान करे कि उससे भिन्न कुछ है ही नहीं । उसकी वृत्ति परमेश्वर के विश्वरूप में तदाकार होकर मदाकार अर्थ मैं और परमेश्वर का एकाकार होकर मात्र मै रूप ही बचे ऐसी वृत्ति जब हो जाये, इस प्रकार का ध्यान करते हुए उपासना करता है । अध्याय ११/५५ के मत्कर्म से यहां सर्वाणि कर्माणि, मत्परमः से यहां मत्पराः, निर्वैरः सर्वभूतेषु से अनन्येन एवं मद्भक्तः से मां ध्यायन्त आदि का समन्वय है ।
भावार्थ— यहाँ अनन्ययोग का अर्थ प्रथम श्लोक में ही ‘वासुदेवः सर्वम्’ से समझा दिया है । ‘सर्वाणि कर्माणि’ को अध्याय ११/५५ के अनुसार समझ लेना चाहिए । इसके अतिरिक्त यत्करोषि यदश्नासि ९/२७, एवं अध्याय ५/८-९ आदि के अनुसार समझ लेना चाहिए । यहाँ ध्यायन्त और उपासते ये शब्द आये हैं जिसमें ध्यायन्त का अर्थ परमात्मा के तात्त्विक स्वरूय का चिन्तन एवं उपासते का अर्थ ‘पत्रं पुष्पं’ ९/२६ आदि से सकार उपासना से है ।
टिप्पणी— उपरोक्त सभी अर्थ ज्यों का त्यों रहेगा, उसी समय निम्न श्लोक के अनुसार इसी जगह (सगुणोपासना) से मुमुक्षु का उद्धार हो जाता है, किन्तु यदि वह संपूर्ण कर्मों का परमेश्वर में संन्यास करने में असफल रहा तो वहां पर योग का अर्थ सामर्थ्य हो जायेगा अर्थात जितनी उसमें सामर्थ्य है, जितना उसमें साहस और धैर्य है उतना वह आगे बताये जाने वाले किसी न किसी एक साधन को अपना कर एकमात्र मेरे परायण होकर मेरी उपासना करते हैं ऐसा अर्थ कर लेना चाहिए । जिसका परिणाम आगे कहा जा रहा है ॥६॥
संबंध— इस प्रकार जो देहाभिमान के आधीन हुआ प्रवृत्तिमार्गी भी जब संपूर्ण प्रवृत्ति के हेतु शुभाशुभ कर्मोको ईश्वरार्पण करने वाले का उद्धारक स्वयं ईश्वर के होने का कथन……
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥१२/७॥
शब्दार्थ— जिनका मन मुझमें प्रवेश कर गया है, हे पार्थ ! मैं शीघ्र ही जन्म मृत्यु रूपी समुद्र से उनका भलीभाँति उद्धार करने वाला होता हूँ ।
तात्पर्यार्थ— आश्वासन मानव जीवन की रक्षा करता है, आश्वासन मानव जीवन के उत्थान का उत्कृष्ट श्रोत है । अगर कोई डूब रहा हो और वह जीवन से निराश हो चुका हो उसी समय कोई जोर से चिल्लाकर कहे घबड़ाना नहीं मैं आ गया, तो उस डूबने वाले का साहस बढ़ जाता है उसमें और अधिक जीवनी शक्ति का संचार हो जाता है, इसी प्रकार यहां श्रीभगवान भी अपने उस भक्त को आश्वासन दे रहे हैं जो अभी जितेन्द्रिय होकर अपना उद्धार नहीं कर सका है लेकिन उद्धार चाहता है । यह जिज्ञासु कोटि का साधक है अतः इसे साधने की आवश्यकता है, अतः भगवान कहते हैं जैसा मैं कहता हूं वैसा करने वाले का उद्धारक मैं होता हूँ, मैं उद्धार करने वाला कैसे होता हूँ यह नहीं बताया, इससे यह समझाना चाहिए कि जिस प्रकार हमारा उद्धार हो सकता है वही करेंगे । शास्त्र कहते हैं ‘ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः, ज्ञानादेव तु कैवल्यं’ अर्थात ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती और भगवान यहां कहते हैं— मुत्यु संसार सागरात् समुद्धर्ता यहां मात्र स्वयं को उद्धार कर्ता ही नहीं कहा बल्कि सम् उपसर्ग पूर्वक उद्धर्ता कहा मतलब उसका जन्म मृत्यु वाले संसार समुद्र से उद्धार करके अमर अर्थात मात्र देवता बना देते हैं ऐसी बात नहीं है क्योंकि काल पाकर वह भी मृत्यु को प्राप्त होते हैं अतः वे ऐसा उद्वार करते हैं कि पुनः जन्म मृत्यु का प्रश्न ही नहीं अर्थात मोक्ष देने वाले हो जाते हैं, मोक्ष कैसे देंगे उद्धार कैसे करते हैं इसके लिए कह चुके हैं ‘ददामि बुद्धियोगं तम्’ १०/१० अर्थात मैं ज्ञानयोग देता हूँ, ‘…..अज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता’ १०/११ अर्थात अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार अर्थात सगुण निर्गुण रूप भ्रम का निवारण आत्मभाव में स्थित होकर ज्ञान रूपी दीपक अर्थात प्रकाश से प्रकाशित कर देता हूँ । तात्पर्य यह है कि वे उद्धार तो करते हैं लेकिन आत्म रूप में साधन चतुष्टय संपन्न होने पर हृदय के अन्दर ही आत्म रूप अर्थात स्व-स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं, और जो ज्ञान देते हैं वह श्रुति, संत, गुरु आदि अनेक रूपों में ज्ञान देकर उद्धार करने वाले हैं न कि हाथ पकड़कर उठाने वाले होते हैं ।
अथवा यहाँ भगवान यह नहीं कहते हैं कि मैं स्वयं उद्धार करता हूँ, बल्कि करते हैं मैं उद्धार कर्ता बन जाता हूँ । कैसे उद्धार कर्ता बन जाते हैं ? इसके लिए कहा ‘मय्यावेशितचेतसाम्’ अर्थात जिनका मन मुझमें प्रवेश कर गया है अर्थात मुझे सर्वात्मा रूप से जो देखने लगे हैं और स्वयं को भी मुझसे अभिन्न मानते हैं ऐसे मुझ से युक्त भाव वालों का उद्धार कर्ता बन जाता हूँ । इसका साधन ‘मच्चित्ता मद्गतप्राणा’ १०/९ कह दिया है । जब इस स्थिति वाला हो जायेगा तब― ‘ददामि बुद्धियोगं तम्’ १०/१० अर्थात ज्ञानयोग आचार्य, श्रुति के माध्यम से देते हैं जिससे वह मुझ आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है । ज्ञान प्राप्त होने पर भी उसका आत्मसात् होने पर उसके प्रकाश का उद्भव हृदय में ही होकर अज्ञानान्धकार का नाश करके प्रकाशित होता है यानी अपरिच्छिन्न अनुभव होता है ।
क्योंकि बिना ज्ञान के कर्मबीज नष्ट नहीं होते और कर्मबीज नष्ट हुए बिना मोक्ष नहीं होता, अतः “सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ४/३३, सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि” ४/३६ अर्थ वहीं देखना चाहिए । अतः यह भ्रम कभी नहीं पालना चाहिए कि बिना साधन चतुष्टय के, बिना जितेन्द्रिय हुए भोग लिप्सा का त्याग किये बिना कोई मुक्त हो जायेगा ।
भावार्थ― भगवान् भी बिना शर्त किसी का उद्धार करने वाले नहीं हैं । कहते हैं ‘तेषामहं समुद्धर्ता’ अर्थ इसी का उद्धार करने वाला बनता हूँ जो मेरी शर्त मानेगा और शर्त रखी है सभी कर्मों का त्याग मुझमें कर दे कर्मों का कर्मों से प्राप्त होने वाले फल से आने वाले रस को मेरे अर्पण कर दे यदि उद्धार चाहता है तो । जिस समय संपूर्ण चेष्टाओं और उसके रस से अहं वृत्ति हट जायेगी तो उसी समय मैं तुम्हारे उद्धार का तत्क्षण प्रबंध कर दूंगा । यहाँ यह भी समझना चाहिए कि कर्म करेंगे तो कर्मों में रस अर्थात उनकी फलश्रुति को लेकर आसक्ति उत्पन्न हो सकती है, अतः कर्ममात्र का यहाँ परमेश्वर में त्याग बताया गया है । जब कर्म का त्याग हो जायेग तो फल के प्रति रस की संभावना ही समाप्त हो जाती है ‘त्याज्यं दोषवदित्येके’ १८/३ यह अर्थ यहां इसलिये अपेक्षित है कि ग्यारहवें श्लोक में सभी कर्मों को करने को तो कहा गया है लेकिन त्याग मात्र उन कर्मों के फल का बताया है । अतः यहाँ कर्ममात्र का त्याग अर्थात सर्वकर्मसंन्यास अतिउत्तम अधिकारी के लिए उचित ही यहां पर है ।
यही चौथे श्लोक में अव्यक्त उपासक के लिए कहते हैं ‘सन्नियम्येन्द्रियग्रामं, अब द्वैतवादी क्या कहेंगे ? किसे अधिक क्लेश होगा ? विचार करने पर यह निर्णय स्वतः हो जाता है कि क्लेश किसे होगा ? अतः पहले ही सच्चाई स्वीकार करके ‘एकमेवाद्वितीम्’ केवलाद्वैत की शरण ग्रहण कर लो ।
टिप्पणी— हमने ‘दैवी ह्येषा गुणमयी’ ७/१४ को भक्तियोग अध्याय १२ का बीज बताया था अब यहाँ देखिए— ‘क्लेशोऽधिकतरं तेषाम्’ यही ‘दैवी ह्यैषा गुणमयी मम माया दुरत्यया’ है । देहाभिमान का नष्ट न होना ही माया है दुर्लंघ्य है यही ‘क्लेशोऽधिकतरं तेषाम्’ १२/५ में कहा गया है । ‘मामेव ये प्रपद्यन्ते ७/१४ को यहाँ ‘मां ध्यायन्त उपासते’ १२/६ एवं ‘मायामेतां तरन्ति ते’ ७/१४ और यहां ‘तेषामहं समुद्धर्ता’ १२/७ कहकर अध्यास ७/१४ को यहाँ परिपुष्ट कर दिया ॥७॥
संबंध— ईश्वराकार जिसका मन हो गया है वह उसी परमेश्वर में ही निवास करता है, इसका कथन……
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥१२/८॥
शब्दार्थ— मुझमें मन को रख दे, मुझमें बुद्धि प्रवेश करा दे, इसके पश्चात मुझमें ही निवास करेगा इसमें संशय नहीं है ।
तात्पर्यार्थ— हमारे देहाभिमान का कारण है मन और बुद्धि का संसार में रखा या टिका होना । मन को परमात्मा में रखने का मतलब परमात्मा से भिन्न कुछ भी मनन न करे, बुद्धि का परमात्मा से निवेश करने का मतबल बुद्धि परमात्मा को दे देना, परमात्मा में सुला देना । जब बुद्धि परमात्मा को दे दी जायेगी, परमात्मा में सो जायेगी तभी तो वह परमात्मा के स्वरूप को परमात्मा से अभिन्न होकर समझने में समर्थ होगी यही है ‘ददामि बुद्धियोगं’ १०/१० इस प्रकार जिस काल में मन और बुद्धि परमात्मा से अभिन्न हो जायेगी उसी के पश्चात ऐसा भक्त मुझमें निवास करेगा अर्थात वह मोक्षस्वरूप मुझको प्राप्त होकर मुझसे अभिन्न हो जायेगा । यहाँ अत ऊर्ध्वं से कुछ विद्वत्चूड़ामणि शरीर छूटने के पश्चात विदेह मुक्ति मानते हैं जो श्रुति शास्त्र के अनुसार उपासकों के लिए कहा भी गया है तथापि ज्ञान प्राप्ति होने पर शास्त्र तत्क्षण मुक्ति कहता है । जिस क्षण मन तदाकार हो जाये उसी क्षण वह मुक्त हो जाता है
अथवा यहाँ पर भगवान में ही मन रखने का अर्थ है संपूर्ण कामनाओं की उत्पत्ति की जड़ है संकल्प ६/२४, इस लिए मन को भगवान में रखने का अर्थ है भगवान से भिन्न अन्य सब कुछ संकल्प-विकल्प का परित्याग करना ‘न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ ६/२५ बुद्धि का व्यापार भगवान में ही करने का अर्थ है― ‘व्यसायात्मिका बुद्धिरेकेह’ २/४१ अर्थात निश्चयात्मिका बुद्धि का व्यापार परमात्मा के स्वरूप चिन्तन से भिन्न और कुछ भी चिन्तन न करे, यही एक बुद्धि यानी एकनिष्ठ व्यापार वाली बुद्धि कही गई है । वैसे अन्तःकरण कहने मात्र से मन और बुद्धि एक साथ आ जाते हैं तो भी मन और बुद्धि को अलग कहने का तात्पर्य यही है कि बुद्धि अर्थात विवेक द्वारा एकमात्र आत्मा-अनात्मा अथवा ईश्वर-जगत के सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्वरूप का अन्वेषण करके आत्मपदार्थ का निश्चय करके त्याग करके और मन उस आत्मा का मनन करके उसमें अभिन्न रूप से प्रवेश करे । इसलिये इन दोनो को अलग अलग कहा गया है । जब इस प्रकार भगवान की शर्त मान लेगा उसके पश्चात जीते जी भगवान में ही निवास करेगा अर्थात ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करेगा । इसमें संशय नाम का कोई स्थान नहीं है । यह साधन अति उत्तम अधिकारी के लिए कहा गया है ।
टिप्पणी— विवेकशील अपनी अपनी वृत्ति से ‘अत ऊर्ध्वं’ का अर्थ समझ लेंगे हमने दोनो पक्ष उपस्थित कर दिये हैं ॥८॥
संबंध— यदि पूर्वोक्त साधन में समर्थ नहीं है तो……
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥१२/९॥
शब्दार्थ— इस प्रकार चित्त यानी मन और बुद्धि को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं है तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोग के द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर ।
तात्पर्यार्थ— पूर्वोक्त श्लोक के अनुसार यहां चित्त का अर्थ मन एवं बुद्धि दोनो समझना चाहिए । अथ पूर्वोक्त से संबद्ध है । मन और बुद्धि को समाधातुं अर्थात समाधान, समाधि करके मुझ सर्वात्मा में स्थिर करने में समर्थ न होने पर अभ्यासयोग का आश्रय लेना चाहिए । अभ्यास अर्थात बारंबार एक ही वृत्ति में मन को केन्द्रित करना और उसके लक्ष्य से युक्त होना योग है । इस प्रकार अपने लक्ष्य में एकाग्रचित्त होकर मेरी प्राप्ति की इच्छा करना चाहिए । अथवा ‘समत्त्वं योग उच्यते’ २/४८ अर्थात यदि परमात्मा में मन बुद्धि का समर्पण संभव न हो तो समत्वभाव से युक्त होकर परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा करना चाहिए । यही अर्थ युक्तिसंगत भी प्रतीत होता है ।
अथवा ‘शनैः शनैः परमेद्बुद्ध्या धृति ग्रहीतया’ ६/२५ अर्थात धीरे धीरे धैर्यपूर्वक पूर्वक मन पर नियंत्रण करते हुए― ‘यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्’ ६/२६ अर्थात अभ्यास यह करे कि जहाँ जहाँ मन जाये वहीं मन को आत्मा या परमात्मा में लगावे । यह जो चारों तरफ से मन को बारंबार खींचकर एक स्थान, वस्तु आदि में लगाने की वृत्ति का नाम ही अभ्यास है । इसी अभ्यास का आश्रय आचार्य, श्रुति, साधन-चतुष्य और अष्टांयोग आदि साधनों के निमित्त ही अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ६/३५ कहा था वही यहाँ शैली भेद से पुनरावृत्ति अभ्यास के लिए कहा है । यहा साधन उत्तम अधिकारी के लिए कहा गया है ॥९॥
संबंध— बारंबार अभ्यास भी कठिन प्रतीत होता हो तो……
अभ्यासेऽप्यसमर्थोसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१२/१०॥
शब्दार्थ— अभ्यासयोग में भी असमर्थ होने पर मेरे परायण होकर मेरे लिए कर्म करने वाला हो । मेरे लिए कर्म करने से सिद्धि को प्राप्त कर लेगा ।
तात्पर्यार्थ— अभी तक मानसिक आंतर साधन कहे गये किन्तु बहिर्वृत्ति होने के कारण न ही परमात्मा के सकल-निष्कल स्वरूप में मन, बुद्धि स्थिर कर पाते और न ही अभ्यास कर पाते हैं, अतः बहिर्वृत्ति वाले साधक को बाह्य कर्म ही सरल और सरस होते हैं । जब तक किसी भी कर्म में रस नहीं मिलता तब तक कर्म नहीं हो सकता है । अतः आन्तर साधन छोड़कर बाह्य जो उसके स्वाभाविक कर्म हैं उनको करे । हम आज की लुप्त वर्ण व्यवस्था के अनुसार तो नहीं कह सकते किन्तु भगवान कहते हैं— ‘स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दन्ति तच्छृणु’ १८/४५ । अर्थात अपने अपने कर्म करते हुए जैसे सिद्धि प्राप्त होती है उसे सुनो— ‘यतः प्रवृत्तिभूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ १८/४६ अर्थात संपूर्ण कर्मों में प्रवृत्ति उस व्यापक परमात्मा से होती है । अतः यह सभी कर्म उसी के लिए हो रहे हैं ऐसा भाव होने से भी मोक्ष रूप सिद्धि को मनुष्य प्राप्त कर लेता है । कर्म भगवान के निमत्त हैं, इसका महत्त्व है कर्म का नहीं, मंदिर का महत्त्व नहीं है बल्कि मन्दिर में स्थित भगवद्भाव ही प्रधान है । घर में रोज भोजन बनता ही है लेकिन उसी में यह भाव हो जाये कि भगवान के लिए बन रहा है तो वह भगवद्बुद्धि वाला हो गया । ऐसे भगवदर्थ कर्म करने से सिद्धि मोक्ष प्राप्त होना है बात ये नहीं है बात ये है कि कर्म चित्तशुद्धि करके आत्मा-अनात्मा रूप विवेक उत्पन्न करके मोक्ष रूप सिद्धि देते हैं ।
अथवा उपरोक्त अभ्यासयोग में भी समर्थ न होने पर कर्म का ही जिनका अधिकार है वे यज्ञ, नित्यनैमित्तिक जो भी क्रियामात्र चेष्टाएँ हैं वे परमेश्वर के लिए ही करे मन में यह भावना करे कि― ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवाः’ १८/४६ अर्थात जिस परमेश्वर से संपूर्ण जगत व्याप्त है और जिससे संपूर्ण प्राणी चेष्टा अर्थात क्रिया करता है उसकी उन्हीं, उनके द्वारा ही की जाने वाली चेष्टाओं को उन्हें ही समर्पित करता हूँ । श्वास, भोजन, सहित जीवन और मृत्यु भी वही हैं ‘जीवनं चैव मृत्युश्च’ ९/१९ अतः यह सब कुछ आपका है, इस शरीर, मन, बुद्धि के भी आपका होने से इनके द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया अर्थात चौदह इन्द्रियों द्वारा होने वाली प्रत्येक चेष्टा आपके लिए ही है । इसमें मेरा कुछ नहीं है । इस प्रकार मेरे परायण अर्थात शरणागत होकर मेरे लिए ही कर्मों को करने से सिद्धि को प्राप्त कर लेता है अर्थात इन क्रियाओं से संपूर्ण इन्द्रिय कर्मों से अहंता वृत्ति नष्ट होकर चित्तशुद्धि होकर आत्मसाक्षात्कार रूपी सिद्धि प्राप्त कर लेगा । यह साधना मंद अधिकारी के लिए कहा गया है ॥१०॥
संबंध— मंदिर बनवाने, किसी की सहायता करने आदि में धन की भी आवश्यकता होती है अतः इसमें भी असमर्थ होने पर……
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रिताः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥१२/११॥
शब्दार्थ— इस प्रकार भी करने में असमर्थ है तो मन को अपने वश में करके मेरा आश्रय लेकर मेरे लिए कर्म कर फिर संपूर्ण कर्मों के फल का त्याग कर ।
तात्पर्यार्थ— भगवद्बुद्धि से किया जाने वाला हर कर्म योग हो जाता है, इसी दृष्टि से यहाँ भगवान ‘मद्योग’ कहते हैं अर्थात हम जो भी कर्म करें उसमें भगवद्बुद्धि का आश्रय लेकर निष्कामकर्म करें, उन संपूर्ण कर्मों के फलत्याग का यही अर्थ है निष्कामकर्म । उसमें स्वयं को कर्ता न मानकर ईश्वर की इच्छा से कर रहा हूँ ऐसा भाव रखना चाहिए इसी को मा कर्मफलहेतुर्भूः २/४७ कहा था । जब कर्म का हेतु अर्थात कर्ता नहीं बनेगा तो फल पर भी अधिकार कर्ता का होता है अकर्ता का नहीं, अतः फल की कामना न रखना ही सर्वकर्मफलत्याग है इसके लिए मन को अपने आधीन रखना आवश्यक है, स्वेच्छाचारी मन से कर्मफलत्याग नहीं हो सकता है ।
अथवा यतात्मान् अर्थात जीते हुए मन वाला । अब यहाँ यह विचार करना चाहिए कि पांचवें श्लोक में देहाभिमान अर्थात अजितेन्द्रिय के लिए अव्यक्त की अप्राति का कथन किया । जबकि चौथे श्लोक में इन्द्रिय समूह को अनुशासित करने वाले द्वारा उसी अव्यक्त की प्राप्ति बताया । वही यहाँ प्रत्येक चारों प्रकार के साधकों के लिए सर्वत्र सामान्य नियम बताया है ।
यहाँ कोई शंका कर सकता है कि पूर्व के तीन साधनों में तो मन को जीतने की बात नहीं की है तो चारों के लिए कैसे कह सकते हो ? तो इसका उत्तर यह है कि जो व्यक्ति पांचवीं कक्षा में पढ रहा है, दसवीं में पढ रहा है, और स्नातक आदि कर रहा है इन तीनो की अपेक्षा प्राथमिक कक्षाओं में ही स्वर-व्यंजन रटाने की बात की जाती है पांचवीं, दसवीं, और स्नातक इनको कहने की आवश्यकता इसलिये नहीं है कि यह रटने के बाद ही क्रमशः वहां पहुंचे हैं । अथवा कह दिया कि सन्न्यासी, तो संन्यासी कहते ही उसमें ब्रह्मचर्य की गणना अलग से कराने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि वह स्वतः उसके अन्तर्भूत होता । इसी प्रकार यहाँ अतिमंद साधक में मन को वश में करने की बात कहने का तात्पर्य यह है कि वह जितेन्द्रिय स्वतः है तब उन अधिकारों में स्थित है । अतः यहाँ कर्म तो अतिमंद करेगा अवश्य मात्र उसके फल को परमेश्वर में अर्पण करेगा अर्थात फल नहीं चाहेगा ‘मा फलेषु कदाचन’ २/४७ । यहाँ पर कर्मफल त्याग का कोई फल नहीं कहा गया है । अतः अगले श्लोक में क्रमशः कहेंगे ।
भावार्थ— श्लोक पांच में देहाभिमानी को अव्यक्त की प्राप्ति अत्यंत दुष्कर बताया गया था, उसे सरलता से प्राप्त करने के लिए कई साधन बताते हुए अन्त में पुनः यतात्मवान् कह दिया । यतात्मवान् का जहाँ अर्थ समाहित चित्त या जीता हुआ मन होता है वहीं यत् एवं आत्मान् इस प्रकार संधि का विच्छेद कर देने पर आत्मवान् का अर्थ बनता है ‘जो विवेकपूर्वक’ अर्थात जो विवेक पूर्वक भगवद्बुद्धि का आश्रय लेकर वैदिक-शास्त्रीय कर्म तो करता है लेकिन उन सभी कर्मों से होने वाले पुण्यापुण्य फल का त्याग करने वाला है वैसा ही तू भी कर यही भाव अध्याय ६/१ में भी संन्निहित है । अविवेकपूर्ण कर्म अजितेन्द्रिय एवं भोग प्रधान होने से त्याग नहीं हो सकता इसलिये यतात्मवान् कहा है ॥११॥
संबंध— कर्मफल के त्याग की स्तुति……
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्फलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२/१२॥
शब्दार्थ— अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, ध्यान से कर कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, त्याग पश्चात तत्क्षण शान्ति प्राप्त होती है ।
तात्पर्यार्थ— उपरोक्त श्लोक में कर्मफल का त्याग कहा गया है किन्तु कोई फल नहीं कहा गया अतः कर्मफल के त्याग का क्या महत्त्व है यह बताकर कर्म में प्रवृत्त कराने के लिए कर्मफलत्याग की स्तुति अन्य साधनों की अपेक्षा इसलिये करते हैं ताकि जो अपना कल्याण तो चाहते हैं किन्तु वे न तो शास्त्र ज्ञान रखते हैं और न ही पूर्व के श्लोकों में कहे गये साधनों को कर सकते हैं ऐसे अत्यंत मंद अधिकारी के कल्याण के निमित्त ही कर्मफलत्याग की स्तुति की गई न कि अन्य साधनों को निम्न बताने के लिए ।
अविवेकपूर्ण यम नियमादि का अभ्यास की अपेक्षा ब्रह्मात्मैक्य का बोध कराने वाला श्रुति-स्मृति प्रतिपादित ज्ञान श्रेष्ठ है क्योंकि जब तक ब्रह्मात्मैक्य का बोध नहीं होता तब तक अभ्यास किसी काम का नहीं अतः ब्रह्मात्मैक्य का परोक्ष ज्ञान ही श्रेष्ठ है । ब्रह्मात्मैक्य का परोक्ष ज्ञान भी मनुष्य का कल्याण करने में सक्षम नहीं है । अतः उसका ध्यान अर्थात ब्रह्मात्मैक्य की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाले अनात्म भाव से उपरत होकर आत्मभाव में स्थिर होकर प्रत्यक् रूप आत्मानुसंधान श्रेष्ठ है । यही ध्यान सर्वश्रेष्ठ है तथापि मन्दाधिकारी जिसे शास्त्र का ज्ञान नहीं वह क्या करे ? इसके लिए ही कहते हैं जो भी आपने कर्म किया है उसके फल का त्याग कर दो । यहां ध्यान यह देना होगा कि कर्मफलत्याग है क्या ? हम हर उस वस्तु का त्याग कर सकते हैं जो अपने से भिन्न हो, जिससे मेरा संबंध हो, संबंध राग से हो या द्वेष से किन्तु संबंध है तभी त्याग कर सकते हैं । फल की कामना आसक्ति के कारण होती है, ममता या मोह से होती है अतः कर्मफलत्याग का अर्थ आसक्ति, मोह ममता, द्वेष आदि का त्याग समझना चाहिए जैसा कि अगले श्लोक से अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् आदि कहेंगे । इस प्रकार कर्मफलत्याग के अर्थभूत आगे आने वाले लक्षणों से संपन्न होने पर ही शान्ति अर्थात परमशान्ति का श्रोत मोक्ष को तत्क्षण ही प्राप्त कर लेता है । ऐसा तात्पर्य है ।
अथवा यह कर्मयोगी की स्तुति है । यहाँ एक शंका उठ सकती है कि नवें श्लोक में अभ्यासयोग की बात कहा है और यहां अभ्यास से ज्ञान को श्रेष्ठ बताया गया है यह तो विरोध प्रतीत होता है ? दूसरी बात ‘ज्ञानादेव तु कैवल्यं’ अर्थात ज्ञान से ही मोक्ष की प्रसिद्धि है और गीता में भी ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ ४/३८ अर्थात ज्ञान से बढकर और कुछ पवित्र नहीं है कहा फिर यहाँ ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान को क्यों कहा ?
इसका समाधान यह है कि परमेश्वर निमित्तार्थ किया गया कर्म ही योग होता । वहां पर भगवान ने दो बातें कही हैं ‘मयि स्थिरम्’ एवं ‘मामिच्छाप्तुं’ अर्थात मुझमें स्थिर होकर एवं मेरी प्राप्ति की इच्छा कर यह अभ्यास योग है जबकि अन्य प्रणायामादि क्रिया मात्र है उनमें जड़ता है जड़ता का निवारण बिना श्रुति शास्त्र ज्ञान के नहीं हो सकता है, अतः शास्त्र ज्ञान उस अभ्यास से श्रेष्ठ है । यहाँ पर श्रुति शास्त्र विषयक ज्ञान की बात कहा गया है तत्त्व ज्ञान का यहाँ कोई प्रसंग नहीं है । शास्त्र ज्ञान से ध्यान अर्थात उसका निदिध्यासन, आरूढता श्रेष्ठ है । निदिध्यासन से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है यह कहकर कर्मयोगी को कर्म में प्रवृत्त कराने के लिए स्तुति की गई है, क्योंकि निदिध्यासन का अर्थ है स्वरूप से ही कर्मों के त्यागपूर्वक आत्मतत्त्व में आरूढ होना । तो जहाँ स्वरूप से ही कर्म न हो तो वहां फल भी कैसे हो सकता है क्योंकि ‘योगः कर्मशु कौशलम्’ २/५० अर्थात सभी कर्मों की कुशलता है परमात्मा की प्राप्ति । उसी कुशला की प्राप्ति के लिए जो जन्म मृत्यु रूप संसार का बीज है कर्मासक्ति उसका भी सूक्ष्म बीज है कामनाओं का होना और जब कामनाएं ही नहीं होंगी तो फल की चाह किसके लिए होगी ? अतः कहना तो है ‘प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्’ २/५५ अर्थात मन में जितनी भी कामनाएं हैं उनका अशेष रूप से त्याग कर दे और ‘जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्’ ३/४३ अर्थात कामरूप शत्रु को मार डाल । तथापि ऐसा कहने पर फिर साधक विचलित न हो जाये कि मनोगत न काम नष्ट कर सकूंगा और न ही आपको प्राप्त कर सकूंगा, ऐसा हीन भाव मन में उत्पन्न न हो इसके लिए कहा तुम्हें कुछ नहीं करना है केवल जो कर्म करते हो उसके फल की प्राप्ति की मन में होने वाली इच्छा का त्याग कर दो बस तुम मुझे प्राप्त कर लोगे ।
इस प्रकार जब फल त्याग करेगा तो मन स्वरूप से ही कर्मों के प्रति उदासीन हो जायेगा और कामनाएं नष्ट हो जायेंगी । कामनाओं के नष्ट होते ही चित्तशुद्धि हो जायेगी और चित्तशुद्धि होते ही तत्त्वमसि आदि महावाक्य श्रवण करते ही तत्क्षण ज्ञान प्राप्त होकर उसी काल में नित्यशांति अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेगा, जीवन्मुक्त हो जायेगा । इसी भाव को समझाने के लिए ही प्रथम तीन साधको का फल साथ में ही कह दिया था और इसमें संदेह की कोई जगह न रहे इसलिये बाद में कहा ।
भावार्थ― फल त्याग के मूल में जितेन्द्रियता और काम नाश का लक्ष्य कराया गया है ।
टिप्पणी— साधकों के लिए इतना अर्थ पर्याप्त है शेष शास्त्रार्थ विद्वानों का विषय है । अतः हम उन ज्ञान शिरोमणियों को साष्टांग नमन करते हुए अनुग्रह बनाये रखने की प्रार्थना करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति चाहता हूँ ॥१२॥
संबंध— जिस प्रकार कोई बीमार हो उसे चिकित्सक दवा दे और वह काम न करे तो वह रोग की अनुभूति करता हुआ दवाएं बदलता रहता है, जब उसके रोगानुकूल औषधि मिल जाती है, तब उसके स्वास्थ्य के लक्षण स्वतः दीखने लगते हैं । उसी प्रकार यहां पर भगवान ने जिसे द्वैत नाम का रोग लगा है किन्तु वह अपने से भिन्न ईश्वरीय सत्ता को अपने कल्याण का श्रोत मानता भी है और प्राप्त भी करना चाहता है और कुछ नहीं चाहता उसे भगवान ने युक्ततम अर्थात सर्वश्रेष्ठ बताया, किन्तु अव्यक्तोपासक को वर्तमान में ही मोक्ष की प्राप्ति कर लेने की बात कहते हुए ज्ञान सिद्ध ज्ञानी की महिमा की स्तुति कर दी । यह बात वैसे ही हो गई जैसे कोई पिता अपने अबोध पुत्र को कहे कि तुम मुझे अधिक प्रिय हो और तुम्हारी माता तो मेरी आत्मा है, बच्चा यह तो नहीं जानता कि आत्मा क्या होता है ? किन्तु मैं पिता का बहुत प्रिय हूँ यह जानकर प्रसन्न होता है, इसी प्रकार युक्ततमा कहकर संतुष्ट करते हुए ज्ञानी की महिमा और स्तुति करके पुनः उसे अजितेन्द्रिय एवं देहाभिमानी द्वारा अत्यंत क्लेश पूर्वक प्राप्ति या यूं कहें अप्राप्ति बताया । आगे १२/६ से १२/११ तक छः श्लोकों में विभिन्न साधन विभिन्न रोग यानी प्रकृति के अनुसार बताया । जिसकी जो प्रकृति है वह उसके अनुसार अपना साधन चयन कर करके भगवत्प्राप्ति कर ले । सभी साधन अपने आप में परिपूर्ण हैं, कोई किसी से कम नहीं तथापि ये सभी साधन करने पर भी सर्वकर्म फलत्याग अन्त में निकृष्ट साधन की दृष्टि से कहा ऐसी बात नहीं है, फल की कामना ही हमें राग द्वेष आदि पता नहीं कितने अनर्थों का शिकार बना देती है । अतः कर्मफलत्याग का उपलक्षण आगे सात श्लोकों में कहे जाने वाले सिद्ध ज्ञानी के लक्षण जब साधक में प्रकट होने लगें तब समझना चाहिए कि मेरा रोग ठीक हो रहा है अर्थात त्याग के बाद प्राप्त होने वाली शान्ति उपलक्षित मोक्ष रूप स्वास्थ्य प्राप्त होने वाला है । यही आगे कहे जाने वाले ज्ञानी के लक्षण जिनमें भी हैं वही भक्त भगवान को अत्यन्त प्रिय है । यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि चार प्रकार के भक्तों में ज्ञानी भक्त भगवान का आत्मा अर्थात भगवान से अभिन्न है ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम् ७/१८ यहां भी वही ज्ञानी भक्त मुझे प्रिय है ऐसा कहेंगे । इसका अर्थ यह है सविशेष यानी सगुण ब्रह्म के उपासक को युक्ततम बताकर उसका साहस बढ़ाते हुए विभिन्न साधनों के माध्यम से ज्ञानयोग में स्थित करना है और ऐसा आत्मस्थ ज्ञानी ही मेरा प्रिय है कहकर अगले श्लोक से ज्ञानी की ही सर्वोकृष्टता सिद्ध करते हैं ……
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥१२/१३॥
शब्दार्थ— संपूर्ण प्राणियों से द्वेष न करना, मैत्रीभाव, स्वभाव से ही करुणा, संसार के प्रति अर्थात अनात्मपदार्थों में ममता यानी मोह का अभाव, सीमित अहंता से रहित अर्थात व्यापक अहंता वाला, सुख और दुःख आने जाने वाले होने से समान ही हैं अर्थात आज हैं कल नहीं इस प्रकार सम रहना अर्थात विचलित न होना, क्षमाशील ।
तात्पर्यार्थ— राग होने पर ही द्वेष होता है जब राग नहीं तो द्वेष नहीं । ये राग द्वेष ही बंधन का हेतु हैं, अतः अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् का तात्पर्य संपूर्ण प्राणियों में राग द्वेष रहित होना । किसी के गुणों के कारण नहीं बल्कि अपनी करुणा यानी दया के कारण सबसे मैत्रीभाव अर्थात सबका हित करने वाला, किसी से किसी प्रकार की ममता अर्थात मोह नहीं भले वह अपना शरीर ही क्यों न हो, क्योंकि शरीर आदि अनात्मा है और वह आत्मा से भिन्न कुछ चाहता नहीं अतः वह निर्मम होता है । वह किसी कृत कर्म में, साधन साध्य में, यहाँ तक शरीर में भी अहंभाव नहीं रखता, सुख-दुःख आने जाने वाले अनात्म पदार्थ हैं अतः उनके प्राप्त या अप्राप्त होने पर विचलित या प्रसन्न न होना ही समदुःखसुखः है । किसी के द्वारा अपकार करने पर, गाली आदि मिलने पर भी उस पर क्रोध नहीं करता बल्कि सहज ही क्षमा करने वाला ।
टिप्पणी— वस्तुतः सबका मूल अहंकार है, अनात्मा में अहंकार के कारण ही शेष अनर्थ स्वतः हो जाते हैं । अतः अहंकार रहित होना ही प्रधान है शेष लक्षण स्वतः आ जायेंंगे ॥१३॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२/१४॥
शब्दार्थ— निरंतर संतुष्ट रहने वाला, समाहित अर्थात एकाग्रचित्त, शरीर सहित इन्द्रियों को वश में रखने वाला, ब्रह्मात्मैक्य भाव में दृढ निश्चय वाला मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण करने वाला जो मेरा भक्त है वही मुझे प्रिय है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ आया हुआ सततम् पूर्व श्लोक सहित यहाँ तक सभी लक्षणों के साथ समझना चाहिए । निरंतर सुख-दुःख, मान-अपमान आदि, इसी प्रकार निरंतर संतुष्ट, दृढ निश्चय समाहित चित्त आदि । संतुष्ट यानी ‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’ ४/२२ कोई कामना नहीं जो मिला ठीक, नहीं मिला ठीक, अनुकूल है ठीक, प्रतिकूल है ठीक ऐसा जो भी कुछ प्रारब्धाधीन है सब ठीक है कोई क्षोभ नहीं, ऐसा निरंतर संतुष्ट रहने वाला, निरंतर अक्षरोपासना में एकाग्रचित्त अर्थात स्थित रहने वाला, शरीर एवं इन्द्रियों को निरंतर अपने आधीन अर्थात वश में रखने वाला जिसका मन और बुद्धि अर्थात मनन करने वाली इदंता और बुद्धि की वैचारिक अहंता सब मुझ सर्वात्मा वासुदेव को समर्पित हो गई है ऐसा जो मेरा ज्ञानी भक्त है वह मुझे प्रिय है ।
भावार्थ— मन और बुद्धि का अपनी स्वतंत्र सीमित सत्ता न होकर व्यापक सत्ता भाव में स्थित होना अर्थात मैं ब्रह्म हूँ यही व्यापक भाव और इसी भाव में स्थित होना ही तत् पदार्थ में उनका अर्पित होना है ।
विशेष— यहाँ भक्त मुझे भक्त प्रिय है में भेदोपासना का किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए क्योंकि ‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त’ ७/१७ कहकर ज्ञानी को अपने से अभिन्न कहकर ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मे प्रियः’ । ७/१७ अर्थात ज्ञानी मुझे और मैं ज्ञानी को प्रिय हूँ यही प्रियता यहां अद्वेष्टा आदि सात श्लोको में कही गई है जबकि भक्ति को वहां ‘एक भक्तिर्विशिष्यते’ ७/१७ अर्थात विशेष कहकर एवं यहाँ सविशेष को युक्ततम कहकर व्यक्तभाव को प्रकट मात्र किया है । इसको ‘ज्ञानीत्वात्मैव’ ७/१८ ज्ञानी को अपना आत्मा कहकर भी अभिन्नभाव प्रकट करके ज्ञानी की प्रियता का प्रतिपादन कर दिया था क्योंकि प्रत्येक अनुकूल वस्तु प्रिय होती है किन्तु आत्मा से प्रिय कुछ नहीं होता यही प्रिय ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ देखता है और उसी सर्वम् अर्थात ब्राह्मी भाव में अहंता इदंता समर्पित जिसने कर दिया है । ऐसे अव्यक्तोपासक की ही प्रियता यहाँ सातों श्लोकों में अपेक्षित है और जहाँ प्रिय शब्द न हो वहां जोड़ लेना चाहिए ॥१४॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥१२/१५॥
शब्दार्थ— जिससे प्राणी क्षुब्ध नहीं होते और जो प्राणियों से क्षुब्ध नहीं होता और जो हर्ष, अमर्ष, भय के उद्वेग से मुक्त है वह मुझे प्रिय है ।
तात्पर्यार्थ— हमारे किसी भी क्रिया कलाप रहन-सहन आदि से किसी को मानसिक क्लेश न होना, और किसी अन्य की विपरीत क्रिया से स्वयं को भी मानसिक क्लेश न होना यही परस्पर उद्वेग न होना है । हर्ष अर्थात लौकिक आत्यन्तिक अनुकूलता पर रोमांचित या गदगद न होना, अमर्ष अर्थात दूसरे की लौकिक या अलौकिक उन्नति को न देख पाना अमर्ष है ऐसे अमर्ष का जिसमें अभाव है, भय अर्थात सांप, सिंह, शत्रु आदि के भय से रहित होना । यहाँ मुक्त शब्द का तात्पर्य हर प्रकार के विकार भले वे अनुकूल हों या प्रतिकूल और उनके कार्यों से असंग होना है ।
भावार्थ— जब सब कुछ आत्म रूप या परमेश्वर रूप ही है उससे भिन्न कुछ है ही नहीं, तो किसी को स्वयं से स्वयं को किसी से क्षुब्धता, प्रसन्नता, अमर्ष, भय न होना युक्तिसंगत ही है, ऐसा आत्मस्वरूप ज्ञानीभक्त मुझे प्रिय है ॥१५॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२/१६॥
शब्दार्थ— इच्छा रहित, स्वभाव से ही पवित्र, चतुर, उदासीन, तीनो प्रकार की पीड़ा से रहित, सभी क्रियाओं का त्याग करने वाला जो मेरा भक्ता है वह मुझे प्रिय है ।
तात्पर्यार्थ— सब कुछ आत्मरूप है इस प्रकार जो आत्मतृप्त है ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ २/५५ ‘यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः’ ३/१७ वह संसार की किसी भी नाशवान वस्तु की कामना नहीं करता, पवित्रता अर्थात बाहर भीतर की पवित्रता, शौच, स्नान, मृत्तिका आदि से शुद्धि एवं पूजा आदि बाहर की पवित्रता, काम, क्रोध आदि अंदर के कल्मषों का त्याग अन्दर की पवित्रता या यूं कहें सभी अपवित्रताओं की अपवित्रता है विषयी पुरुषों एवं विषयों की संगति, इनका सर्वथा त्याग ही पवित्रता है । दक्ष यानी चतुर— जो आत्मनिष्ठा में निरंतरता बनाये हुए है, जो जीव ब्रह्मात्मैक्य के विचारों में सदैव निमग्न रहता है वही चतुर है । शत्रु-मित्र में स्व एवं पर में किसी भी प्रकार का पक्षपात न करना ही उदासीनता है । आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक तापों से जो आत्मनिष्ठा में स्थित होने के कारण व्यथित नहीं होता । सभी प्रकार के वैदिक एवं स्मार्त कर्मों का आरंभ सुख दुःखादि बंधन का हेतु है अतः उन सभी प्रकार की क्रयाओं से जो रहित है अर्थात जो सर्वकर्मसन्न्यासी है ऐसा जो मेरा भक्त है वह मुझे आत्मरूप होने के कारण प्रिय है।
टिप्पणी— यहाँ द्वैतवादी ध्यान दें कि सर्वारम्भपरित्यागी शब्द आया है जिसका अर्थ होता है सर्वकर्मसंन्यासी; सर्वकर्मसन्न्यासी कोई भी प्रवृत्तिमार्गी हो ही नहीं सकता सकता । सविशेष उपासक, सभी वैदिक कर्म करेगा और उसकी सामग्री संग्रह करेगा तो उसके क्लेशों की अनुभूति होने से कोई रोक भी नहीं सकता । अतः मात्र बार बार भक्त शब्द कहने मात्र से कोई सविशेष भक्त नहीं हो जाता है । यहाँ जो भक्त के लक्षण दिये गये हैं सातों श्लोकों में उन पर भी विचार करें और ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थम्’ ७/१७ पर भी विचार करें ।
दूसरी बात ‘मैत्रः करुण’ १२/१३ आया था इस पर भी कुछ लोग कहते हैं कि ज्ञानी सदैव संसार से उदासीन होते हैं अतः उनमें न तो मैत्रीभाव होता है और न ही करुणा अर्थात दया । इस पर भी उन्हें ‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः’ ६/३२ पर भी विचार करना चाहिए । ज्ञानयोगी किस प्रकार जगत को देखता है किस प्रकार मैत्री और करुणा रखता है जिस प्रकार अपने अंगों के प्रति उसमें उत्पन्न होने वाले अनुकूल, प्रतिकूल विकारों का निवारण करता हुआ भी सभी मिलकर शरीर हैं ऐसा भाव रखता है किसी भी अंग से भेदभाव नहीं रखता पण्डिताः समदर्शिनः ५/१८ ठीक इसी प्रकार संपूर्ण प्राणियों के साथ मैत्री एवं करुणा भाव ज्ञानी में ही संभव है, भक्त जो भेद दृष्टि रखता है इतना संभव कैसे हो सकता है ? पत्नी पति के संबंध से सभी पति संबधियों की सेवा करती है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि उनकी सेवा मन से करती हो, उनसे के प्रति प्रेम हो ही, पति पुत्र और आगन्तुक में भेद न करती हो, लेकिन अपनी ही सेवा में कौन सा भेद करेगी ? और कैसे करेगी ? अतः यह वस्तुतः भक्ति का वह प्रकरण है जिसके विषय में स्वरूपतः न जानकर अधिकतर लोग भ्रमित हो जाते हैं । जैसे जब व्यक्ति घर छोड़कर संन्यासी हो जाता है वह भी वैराग्य कहा जाता है लेकिन जब वह ज्ञान प्राप्त कर वैराग्य को समझता है तब वैराग्य का स्वरूप कुछ और ही हो जाता है, ठीक वैसे ही जब सविशेष परमेश्वर की ओर आकर्षित होता है तब भी भक्ति होती है और जब भक्ति के स्वरूप को समझता है तब भक्ति का स्वरूप कुछ और ही होता है, ठीक इसी प्रकार यहाँ पर भक्ति और भक्त शब्द पर भ्रमित द्वैतावादियों को थोड़ा सुधार करना चाहिए । कुछ द्वैतवादी गीता से समीक्षा प्रस्तुत करते हैं कि गीता में ‘मम प्रियः’ केवल भक्त के लिए ही आया है, न तो ज्ञानयोगी के लिए और न ही कर्मयोगी के लिए । संभवतः वे यह भूल गये कि भगवान ने भक्त के लिए ‘एकभक्तिर्विशिष्यते’ ७/१७ एवं ‘युक्ततमा’ १२/२ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं लेकिन ‘तेषां ज्ञानी नित्युक्त’ एवं ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ १/१७ एवं ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्’ ७/१८ तथा ‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव’ १२/४ के द्वारा द्वैतावादियों के सभी भ्रमों का निवारण कर देते हैं फिर भी यदि भ्रम निवारण न हो तो इसमें अधिकार की कमी न कि गीता और उसके उपदेशक की । वस्तुतः सविशेष की उपसना करते करते निर्विशेष को प्राप्त होना ही भक्ति की पराकाष्ठा है, यही परा भक्ति है ॥१६॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१२/१७॥
शब्दार्थ— जो हर्षित नहीं होता, द्वेष नहीं करता, शोक नहीं करता, इच्छा नहीं करता, जो शुभ और अशुभ का त्याग करने वाला है वह भक्तिमान् मुझे प्रिय है ।
तात्पर्यार्थ— पूर्व में कहे श्लोकों का अनुवाद जैसा है । अनुकूल प्राप्ति पर प्रसन्न न होना, प्रतिकूल परिस्थितियों से घबड़ाहट न होना, जो हो गया सो हो गया बीती हुई विपरीत परिस्थितियों पर शोक नहीं करना एवं बीती अनुकूल परिस्थितियों का स्मरण नहीं करना, आने वाली अनूकूल परिस्थितियों की इच्छा नहीं करना, शुभ या अशुभ जो भी कर्म हुए हैं अथवा होने वाले हैं उनके कर्तापन का अभिमान न होना, सर्वकर्मफलत्यागी १२/१२ का अनुवाद शुभाशुभपरित्यागी है । अतः जैसे सभी कर्मों के त्याग का अर्थ हर प्रकार की आसक्ति का त्याग है वैसे ही यहाँ कर्तापन का त्याग है । ऐसा जो आत्मनिष्ठ मेरा भक्ता है वह मुझे प्रिय है । आचार्य शंकर ने निरंतर आत्मानुसंधान को ही भक्ति कहा है ॥१७॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गवर्जितः ॥१२/१८॥
शब्दार्थ— शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में समभाव में स्थित रहना, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख में समभाव वाला तथा संग रहित ।
तात्पर्यार्थ— सङ्गवर्जितः आत्माभाव में निरंतर स्थिति के अतिरिक्त सभी अन्तर्बाह्य शब्दादि विषयों के स्पर्श होने पर भी उसको प्रभावों से निष्प्रभ होना ।
शंका होती है कि क्या कोई ज्ञानी का भी शत्रु या मित्र भी होता है ? इसका समाधान यह है कि ज्ञानी तो आत्मरूप है अतः उसका कोई शत्रु मित्र नहीं होता है तथापि ज्ञानी तो किसी का शत्रु, मित्र हो सकता है । अतः यहां शंका का स्थान नहीं है । शेष अर्थ स्पष्ट है ॥१८॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१२/१९॥
शब्दार्थ— निंदा-स्तुति में सम, मौनी, जिस किसी भी प्रकार से संतुष्ट, घर/कुटी रहित, स्थिर बुद्धिवाला भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है ।
तात्पर्यार्थ— निंदा-स्तुति में सम अर्थात अपने दोषों को सुनने पर विचलित न होना क्रोधादि किसी भी प्रकार का विकार न होना, इसी प्रकार गुणों का वर्णन सुनकर उनसे प्रसन्नता की अनुभूति न होना अर्थात सहज ही स्वभाव से गुण दोषों के बखान पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया से रहित होना, मौनी अर्थात आत्मतत्त्व मौन है उसी भाव में स्थित होने के कारण जो मौन है, अथवा अनधिकारी के सामने वह तत्त्व अकथनीय है इसलिये अनधिकारी के सामने मौन है जो, जो कुछ प्रारब्धानुसार शरीर निर्वाह के लिए सहज ही प्राप्त प्राप्त हो जाये उसमें अनुकूल प्रतिकूल भावना किये बिना उसी में संतुष्ट होना, अनिकेतः अर्थात निवास स्थान नियत न होना, अथवा रहने के स्थान में अनासक्त होना, ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९, ‘सर्वंखल्वमिदं ब्रह्म’ आदि जो आत्मनिष्ठा है विपरीत कुतर्कों के प्राप्त होने पर भी विचलित न होना, ठूंठ के समान स्थिर जिसकी बुद्धिः है ऐसा आत्मनिष्ठ भक्त मुझे प्रिय है ।
यहाँ पर नर शब्द का प्रयोग किया गया है । इससे यहाँ दो बातें समझी जा सकती हैं एक तो यह कि भगवान अर्जुन को उसके नर स्वरूप का स्मरण करा रहे हैं और दूसरा यह कि मनुष्य वही है जो परमतत्त्व को प्राप्त करके जन्म मरण के चक्र से छूट जाये वही नर यानी पुरुष है, इसके अतिरिक्त जितने भी प्राणी हैं वे ही अपरा और परा प्रकृति हैं । यहाँ के नर शब्द से अध्याय पन्द्रह के पुरुषोत्तम स्वरूप से अभिन्नता का भी संकेत भी माना जा सकता है ॥१९॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्द्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव प्रियाः ॥१२/२०॥
शब्दार्थ— किन्तु जो जैसा ऊपर कहा गया है वैसे का वैसा इस अक्षय धर्म अर्थात नित्य ज्ञानास्वरूप साधनों का मुझ परम आत्मस्वरूप में श्रद्धा का आधान करके अर्थात श्रद्धापूर्वक समर्पित भाव से मेरे निरंतर उपासना करते हैं अर्थात स्वरूपानुसंधान करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं ।
तात्पर्यार्थ— यहां ‘तु’ शब्द पूर्व में कहे गये सिद्ध ज्ञानी भक्त से भिन्नता दिखाने के लिए है । ‘ये’ और ‘पर्युपासते’ १२/१ में अर्जुन के पूछे प्रश्न के उत्तर में इन्हीं शब्दों की पुनरावृति करके अर्जुन को दिये जाने वाले उत्तर का उपसंहार का संकेत है । यहां धर्म्यामृतम् कहा गया है । एक वह अमृत है जो पीने से अमर बना देता है किन्तु काल प्रभाव से अमृत पीने वालों का भी नाश हो जाता है लेकिन यहाँ जो कहा गया धर्म्यामृतम् अर्थात अक्षयधर्म है, वह क्या है ? यह जो ऊपर ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ १२/१३ से लेकर ‘भक्तिमान्मे प्रियो नरः’ १२/१९ तक कहा गया यही आत्मनिष्ठ के लिए अक्षयधर्म है, यहां ‘नरः’ शब्द का अर्थ यह है कि वास्तव में मनुष्य वही है जिसने परमतत्त्व को प्राप्त कर लिया है अन्य मनुष्य अर्थात नर कहलाने योग्य नहीं हैं अन्य नर नहीं नारी (प्रकृति) या नपुंसक २/३ हैं । पर परमत्त्व पुरुष संज्ञक है उसे प्राप्त करने वाला पुरुष है शेष नारी या स्त्री जैसा कि अध्याय ७ में परा और अपरा प्रकृति कहा गया है वह प्रकृति यानी स्त्री है और प्रकृति का अतिक्रमण करके परमपुरुष परमत्त्व को प्राप्त करने वाला नर यानी पुरुष है । यह नर शब्द जीव-ब्रह्मात्मैक्य का स्पष्ट प्रतिपादन करता है अतः इसी अर्थ में नरः शब्द सार्थक है । भगवान ने पीछे सात श्लोकों में पांच बार सिद्धज्ञानी को प्रिय कहते हैं किन्तु वह जो सिद्ध के लक्षण हैं वह जिज्ञासु अर्थात मुमुक्षु के लिए बारंबार उपासनीय हैं । यही लक्षण मुमुक्षु के लिए अक्षय अमृतस्वरूप हैं यहाँ मत् शब्द आत्म प्रत्यय है । भगवान कहते हैं अपनी श्रद्धा का मुझ आत्मस्वरूप में आधान करके अर्थात स्थिर करके जो मुझ सर्वात्मा में एक निष्ठ हो जाता है तब उसके लिए इससे बढ़कर और कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रहता, आत्मनिष्ठा में स्थित होकर जो मेरे कहे हुए सिद्धों के स्वाभाविक अक्षयधर्म का पालन करता है वह मुझे अत्यंत प्रिय है । ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थम्’ ७/१७ का अर्थ १२/१३ से १२/१९ तक करके अध्याय सात में जिसे चार प्रकार के भक्तों में से जिज्ञासु कोटि का कहा था उसी को वेदान्त की भाषा में मुमुक्षु कहा जाता है । मुमुक्षु जिस समय सिद्धों के लक्षणों का अनुष्ठान करता है उस समय बहुत प्रकार के क्लेशो का सामना करना पड़ता है ‘क्लेशोऽधिकतरं तेषाम्’ १२/१५ फिर भी वह उनके अनुष्ठान में लगा रहता है इसलिए वह अधिक प्रिय है ऐसा तात्पर्य है ।
यहाँ ध्यान देना चाहिए कि भगवान ने कह दिया ‘अधिक प्रिय है’ इससे सिद्ध ज्ञानी की महत्ता कम नहीं हो जाती वरन् उसके सामर्थ्य की महिमा की स्तुति है । वह कितनी महिमा वाला है कि वह किसी के आश्रयीभूत नहीं है ‘न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः’ ३/३८ वह संपूर्ण प्राणियों यहां तक ईश्वर के भी आधीन नहीं होता है । उसे ईश्वर के भी आश्रय की आवश्यकता नहीं होती है इतना सिद्धज्ञानी स्वतंत्र है, जबकि कि जिज्ञासु भेददर्शी द्वैतवादी पराधीन हैं उनके उद्धारक ईश्वर को बनना पड़ता है ‘तेषामहं समुद्धर्ता’ १२/७ भगावन अपने भक्त को इस पराधीनता से मुक्त करना चाहते हैं इसीलिये कहते हैं यथोक्तं पर्युपासते हमने जैसा ऊपर ज्ञानी भक्त आत्मनिष्ठ का लक्षण कहा है ठीक वैसा का वैसा ही “सर्वंखल्वमिदं ब्रह्म, वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव करते हुए तत्त्वमसि का अर्थभूत ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रूप निर्विशेष ब्रह्म की प्रज्ञानं ब्रह्म की अनुभूति करते हुए अयमात्मा ब्रह्म की जो आराधना करता है वह मुझे अत्यंत प्रिय है ।
यहां ज्ञानयोगी की महत्ता इस बात से और अधिक बढ़ जाती है कि यदि सविशेष ब्रह्म अर्थात सगुण साकार ब्रह्म का उपासक भगवान को अत्यन्त प्रिय है तो फिर निर्विशेष उपासक सिद्ध ज्ञानी का अनुगमन करने को क्यों कहते हैं ? और जो उन सिद्धों का अनुगमन करता है वह ही मुझे अत्यधिक प्रिय है ऐसा क्यों कहते हैं ? इसका तात्पर्य यह हुआ कि अत्यन्त प्रिय तो ज्ञानी ही है अन्यथा उसका अनुगमन करने को क्यों कहते ? द्वैतावादियों को इस बात का भी हठ छोड़कर अनुसंधान करना चाहिए । ये सारे तत्थ्य यहाँ भक्ति के स्वरूप को ठीक ठीक समझा रहे हैं कि भगवान का लक्ष्य सविशेष साधन के द्वारा साध्य निर्विशेष ब्रह्म है ।
अथवा यहाँ पर अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् १२/१४ से लेकर जो उन्नीसवें श्लोक तक ज्ञानी के लक्षण बताए गए हैं वही साधन मुमुक्षु अर्थात परमेश्वर की प्राप्ति के निमित्त नित्यज्ञान की प्राप्ति का साधन अर्थात परमेश्वर की प्राप्ति का साधन बताया और उन ज्ञानियों का जो वह सहज स्वभाव है उसी को मेरे आश्रित होकर भलीभाँति― यहाँ पर्युपासते शब्द है जिसका अर्थ हैं निरंतर उपासना करने वाला अत्यंत प्रिय है । ध्यान देने की बात यह है कि ज्ञानी को तो बार बार कहते हैं कि ज्ञानी भक्त मुझे प्रिय है और साधक जिज्ञासु भक्त को कहते हैं अति प्रिय है, क्यों ? जैसे पुरुष को पत्नी प्रिय होती है लेकिन आज्ञाकारी पुत्र पत्नी और स्वयं को भी बहुत प्रिय होता है । क्योंकि पत्नी पति से भिन्न नहीं होती है वह तो स्वरूप होती है । अध्याय ७ में ज्ञानी के लिए कहा था― ‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थः’ ७/१७ अर्थात ज्ञानी इतना अधिक प्रिय है कि उसकी तुलना ही नहीं की जा सकती है । क्यों ? इस पर कहते हैं― ‘ज्ञानी त्वात्मैव मे’ ७/१८ अर्थात ज्ञानी तो मेरा ही स्वरूप है । वह तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ हो चुका है । उसी को यहां कहते हैं― ‘भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः’ ज्ञानी मेरा स्वरूप है इसलिये प्रिय है और भक्त मेरा आज्ञाकारी है इसलिए अधिक प्रिय है । क्योंकि अब वह मेरे बताये ज्ञानी के लक्षणों का अनुष्ठान करके वह भी मेरा ही स्वरूप ‘वासुदेवः सर्वम्’ का संकल्प ले चुका है ।
इस प्रकार जिज्ञासु कोटि के मुमुक्षु की स्तुति करके भगवान ने अर्जुन के पूछे गये प्रथम प्रश्न का उत्तर अर्थात पहले श्लोक के पूर्वार्ध का उत्तर यहाँ देकर इस भक्तियोग का उपसंहार किया ॥२०॥
उपसंहार— अध्याय दो से छः तक ‘त्वं’ पदार्थ के शोधन के बाद अध्याय सात से ‘तत्’ पदार्थ के शोधन में ज्ञान विज्ञान बताने की प्रतिज्ञा करते हुए भगवान कहते हैं कि इसके जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा । वहीं पर चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हुए दो को विशेष महत्त्व देते हैं जिसमें ज्ञानी को तो नित्युक्त कहते हैं तेषां ज्ञानी नित्युक्त और भक्त को ‘एक भक्तिर्विशिष्यते’ ७/१७ अर्थात भक्ति को विशेष कहते हैं । इनमें जब प्रियता की बात आती है कि आपको प्रिय कौन है तो कहते ‘प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मे प्रियः’ ७/१७ अर्थात परस्पर ज्ञानी और भगवान ही एक दूसरे को अधिक प्रिय हैं जिसका कारण बताते हैं ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे’ ७/१८ अर्थात ज्ञानी मेरी आत्मा है और अपना आत्मा किसे प्रिय नहीं होता ? वह तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ है अतः वही मुझे प्रिय है । इस प्रकार विभिन्न रूपों में तत् पदार्थ का वर्णन दसवें अध्याय तक करते हैं और उन्हें भी एकांश में ही बता देते हैं । अध्याय ग्यारह में अर्जुन विश्वरूप दर्शन का आग्रह करता है तो भगवान कहते हैं कि तू मुझे तो देख नहीं सकता है किन्तु मेरी माया के ऐश्वर्य को देख सकता है अतः ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ ११/८ मेरी माया का जो ऐश्वर्य है तुम उसे ही देखो, किन्तु इसके लिए भी चर्मचक्षु समर्थ नहीं हैं अतः जिस माया के दिव्य ऐश्वर्य को देखना चाहते हो उसी दिव्य माया के दिव्यनेत्रों से देखो । यह जो माया का रूप अर्जुन ने देख कर वह भी एकस्थं ११/७-१३ । एक ही स्थान में अर्थात एकांश में । अर्जुन ने जो देखा उसका आश्चर्यमय वर्णन यथास्थान पर ही देखना चाहिए । मेरा जो अपना स्वरूप है इसे तो देवता भी नहीं देख सकते । वेद, तप, दान आदि के द्वारा भी संभव नहीं है । मुझे तो अनन्यभक्ति द्वारा, ऋषिभिर्बहुधा गीतम् १३/४ आदि वेदान्त, शास्त्र, गुरु आदि द्वारा ‘ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुम्’ ११/५४ अर्थात जानकर समझकर मुझ परमतत्त्व में प्रवेश करके ही जाना जा सकता है ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति अर्थात ब्रह्म को ब्रह्म रूप होकर ही जाना जा सकता है तथापि जो अभी निर्विशेष मुझ परमतत्त्व में स्थित नहीं है उसका उसमें स्थिर होना संभव नहीं है इसलिए मुझ सविशेष ब्रह्म को ही निर्विशेष का लक्ष्य स्थिर करके मेरे लिए ही ‘मत्कर्मकृन्मत्परमो’ ११/५५ आदि उपदेश देते हैं । यहाँ अर्जुन पुनः भ्रमित हो जाता है क्योंकि वह श्रेष्ठ बनना चाहता है और भगवान पहले निर्विशेष ब्रह्म में प्रवेश की बात करके फिर सविशेष ब्रह्म के निमित्त कर्म मे लगा रहे हैं ऐसा क्यों ? इसके समाधान के लिए सविशेष एवं निर्विशेष में वास्तव में श्रेष्ठ कौन है यह प्रश्न करता है जिसके उत्तर में श्रेष्ठ तो सविशेष उपासक को बताते हैं किन्तु निर्विशेष उपासक जो कि जितेंद्रिय है वह वर्तमान में ही ब्रह्म को प्राप्त करता है कहकर निर्विशेष की ही श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं । फिर निर्विशेष उपासना अजितेन्द्रिय, देहाभिमानी के लिए क्लेशकारी है ‘क्लेशोऽधिकतरं तेषाम्….’ १२/५ ऐसा कहकर आगे सविशेष उपासना के श्लोक १२/६ से१२/११ तक पांच साधन कहते हैं और १२/१२ में आसक्ति का सर्वथा त्याग ही मोक्ष का साधन बताते हुए सविशेष की उपासना द्वारा निर्विशेष सिद्धि को प्राप्त सिद्धों के १२/१३ से १२/१९ तक लक्षण बताकर अन्त में जिज्ञासु अर्थात मुमुक्षु को उन्हीं ज्ञानी सिद्धों के लक्षणों का श्रद्धा समर्पण के द्वारा एक आत्मनिष्ठ होकर बारंबार उपासना करने वाले को अधिक प्रिय बताते हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि परमेश्वर को जिसने सविशेष उपासना पूर्वक निर्विशेष स्वरूप को प्राप्त कर लिया है, जिसने सगुण निर्गुण दोनों का अनुभव किया है वही सर्वात्मा को ठीक से जानता है और जो उस सर्वात्मा को ठीक से जानता है वही आत्मनिष्ठ पराभक्ति को प्राप्त अभेद दर्शी ज्ञानी ही परमेश्वर को प्रिय है न कि भेददर्शी । इस प्रकार यह भक्तियोग का स्वरूप ज्ञान समझाते हुए ज्ञानी की महत्ता एवं श्रेष्ठता प्रतिपादन करते हुए तत् पदार्थ में किस प्रकार स्थित होना चाहिए उसका साधन इस अध्याय में बताया गया है ॥२०॥
समीक्षा― अध्याय ग्यारह के अन्तिम दो श्लोकों में अर्जुन के मन में उठे प्रश्नों के फलस्वरूप साकार और निराकार के उपासकों की श्रेष्ठता जानने के विषय में प्रश्न किया गया । जिसके फलस्वरूप पहले सगुणोपासक की स्तुति करते हुए पुनः ज्ञान की महिमा का गान करते हुए बताया कि जो इन्द्रियों के संयम पूर्वक मुझ अव्यक्त की आराधना करता है वह इसी जन्म में मेरी प्राप्ति कर लेता है प्राप्नुवन्ति १२/४ इसी बात का सूचक है, किन्तु सगुणोपासक की स्तुति में श्रेष्ठ कहने पर भी वह परमेश्वर को कब प्राप्त करेगा यह नहीं बताया वरन् अजितेन्द्रिय को अव्यक्त की प्राप्ति हो ही नहीं सकती और यदि वह सगुणोपासना छोड़कर श्रुत के आधार पर अव्यक्त की उपासना करता भी है तो अजितेन्द्रिय के जीवन में नाना प्रकार के कष्टों के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता है ।
आगे बताते हैं कि यदि मेरी प्राप्ति करनी ही है तो मेरी आज्ञा का पालन करो तो मैं तुम्हारा उद्धार तो नहीं कर सकता हूँ क्योंकि यह अधिकार गुरु यानी आचार्य का है लेकिन उद्धारक अवश्य हो जाऊंगा अर्थात वैसा में संयोग उपस्थित कर दूंगा जिससे ज्ञान प्राप्त होकर शीघ्र मुझ सर्वात्मा की प्राप्ति हो जायेगी ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ ९९/२२ अर्थ उसी स्थान पर देखना चाहिए मनमानी अर्थ मत करना । शीघ्र उद्धारक बनने की भूमिका में अति उत्तम, उत्तम, मंद, और मंदतर साधकों के लिए चार साधन बताते हुए कर्मफल के त्याग से ही अन्त में चित्तशुद्धि पूर्वक तत्काल नित्य शान्ति बताया । चित्तशुद्धि के साधन आगे ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ १२/१३ आदि से लेकर प्रियो नरः १२/१९ तक सिद्धों के लक्षण बताते हुए अन्त में उन्हीं ज्ञानियों के स्वाभाविक, सहज लक्षणों को ही श्रद्धापूर्वक परेश्वर की शरण होकर निरंतर भलीभांति उपासना करने वाले को अत्यंत श्रेष्ठ बताया । अर्थात व्यक्त और अव्यक्त उपासकों में कौन श्रेष्ठतम है यही बताने के लिए अतीव प्रियः कहा । तथापि प्रियता बताने पर भी मैं उसको कब प्राप्त होऊंगा यह नहीं बताया । यह जानने के लिए ही अगला अध्याय प्रारंभ करते हैं । पन्द्रहवें अध्याय तक प्रतीक्षा करें । अध्याय दो से छः तक त्वम् पदार्थ का शोधन करके अध्याय सात से यहाँ तक ‘तत्’ पदार्थ का शोधन पूर्ण किया । आगे असि पदार्थ का विश्लेषण होगा ॥१-२०॥
॥ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक बारहवां प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरिः ॐतत्सत् ! हरिः ॐतत्सत् !! हरिः ॐतत्सत्!!!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें