ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय ६
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
॥श्रीमद्भगवद्गीता॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
संबंध— अर्जुन ने ५/१ में पूछा था कि कर्म और संन्यास मे कोई एक सुनिश्चित मार्ग कहिये जिसका वर्णन ५/२६ तक हुआ । अन्तिम तीन श्लोक संक्षेप से योगमार्ग के कहकर उसी के विस्तार हेतु छठा अध्याय प्रारंभ होता है......
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥६/१॥
शब्दार्थ— जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना अर्थात कर्मफल की चाह न रखकर कर्तव्य कर्म करता है वही संन्यासी और योगी है न कि अग्नि और क्रियाओं का त्याग करनेवाला ही ।
तात्पर्यार्थ—श्रीभगवान ने ‘सन्न्यासः कर्मयोगश्च’ ५/२ में जैसे कर्मयोग की स्तुति की थी वैसे ही यहाँ अनाश्रितः आदि से कर्मयोग की स्तुति करते हैं । ‘ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी’ ५/३ से वस्तुतः संन्यासी किसे कहते हैं बताया वही यहाँ ‘स सन्न्यासी च योगी च’ से पुनः संन्यास का स्वरूप समझा रहे हैं । यहाँ शंका होती है कि बार बार संन्यासी शब्द का प्रयोग और कर्मयोग की प्रशंसा श्रीभगवान क्यों कर रहे हैं ? इस पर पहले अर्जुन का भाव समझें— ‘श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके’ २/५ यहाँ पर अर्जुन द्वारा संन्यासियों की भिक्षावृत्ति का आश्रय लेने की बात कही गई है इससे यह सिद्ध होता है कि अर्जुन स्वरूप से ही कर्म का त्याग श्रेष्ठ समझते भी हैं और चाहते भी यही हैं इसलिए अर्जुन के मन के भाव को समझते हुए स्वयं ही श्रीभगवान उसका समाधान करने के लिए ही कर्मयोग की स्तुति करते हैं ।
‘न निरग्निर्न चाक्रियः’ से संन्यास की निंदा नहीं की, बल्कि इन वाक्यों से संन्यास का स्वरूप ठीक से समझाया है । इससे यह सिद्ध होता है कि विरजा संपन्न संन्यासी का किसी भी प्रकार से अग्नि पर अधिकार नहीं है । यदि वह भोजन अग्निहोत्रादि के माध्यम से भी अग्नि का चयन करता है तो वह पथभ्रष्ट है और जिन वेदों को साक्षी करके विरजा पूर्वक अग्नि त्याग का संकल्प लिया उन वेदों और उनके स्वामी साक्षात् नारायण का अपमान करके अपने पतन का मार्ग स्वयं ही सुनिश्चित कर रहा है । अक्रिय अर्थात उसके लिए यमादि पंचसाधनों के साथ वेदान्त का श्रवण, इस श्रवण में गुरुजनों से प्राप्त तत्त्वमस्यादि महावाक्य और प्रेसमंत्र भी सम्मिलित हैं । इनके श्रवण, फिर मनन अर्थात नीर-क्षीर विवेक पूर्वक तदानुसार आरूढ़ता का निश्चय करके निदिध्यासन करे अर्थात आरूढ़ता को प्राप्त करने के लिए प्राण पर्यंत प्रयत्नशील रहे ।
यह है संन्यास का स्वरूप, इसमें अन्य क्रियाओं विकारों के लिए कोई स्थान ही नहीं है । यदि करता है तो वह स्वधर्मी नहीं भय को प्राप्त होने वाला परधर्मी है । श्रीभगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! ऐसी अग्नि और क्रिया का त्याग करने मात्र से कोई संन्यासी या योगी नहीं हो जाता । वस्तुतः योगी वही है जो संसार में प्राप्त वस्तु है उसको संसार और परमात्मा का समझकर संसार में ही परमात्मा की सेवा में लगा दे, प्राप्त वस्तु में अहं भाव न रखना ही त्याग है । ऐसी जो कर्तव्यनिष्ठा है उससे मिलने वाला मान-सम्मान एवं स्वर्गादि लोकों की भी कामना न करता हुआ कर्मफल से निराश्रित अर्थात निष्कामता को प्राप्त मात्र कर्तव्यकर्म करने वाला भी संन्यासी और योगी ही है । संन्यास परधर्म है आप यदि परधर्म का आश्रय लेकर स्वधर्म का त्याग कर दोगे तो नित्य नैमित्तिक कर्म जो लक्ष्यार्थ चित्तशुद्धि के हेतु हैं कैसे करोगे ? जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत सोलह संस्कार जो अग्नि के आधीन हैं कैसे करोगे ? ।
यहाँ पर कर्म में प्रवृत्त कराने के लिए कर्म की स्तुति करते हैं । फल समानता की दृष्टि से ज्ञानयोग अर्थात सर्वकर्मसंन्यास की तुलना की गई । इसके साथ ही संन्यासी के क्या नियम विहित हैं यह संन्यासियों के लिए संक्षेप में ही मार्गदर्शन कर दिया । चूंकि कर्म का फल चित्तशुद्धि पूर्वक ज्ञान होता है यह बात पहले तो कही जा चुकी है और आगे भी यही समझना चाहिए । तथापि यहाँ का कर्मयोग शरीर और मन की एकाग्रता के निमित्त कर्मयोगी गृहस्थ और जो योगारूढ होने के जिज्ञासु गृहत्यागी संन्यासी हैं दोनो को ही समझ लेना चाहिए ॥१॥
संबंध— इतना ही नहीं, संन्यास के विषय में और भी.....
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्त सङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥६/२॥
शब्दार्थ— हे पाण्डव ! जिसको संन्यास कहा गया है उसी को तुम योग जानो, क्योंकि बिना संकल्प का त्याग किये कोई भी योगी नहीं हो सकता ।
तात्पर्यार्थ— अध्याय ५/५वें श्लोक का ही यहाँ अनुवाद मानना चाहिए— “यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति” ५/५ वहाँ ‘एकं साङ्ख्यं च योगं च’ फल दृष्टि से एक कहा गया है न कि संन्यास और योग को, व्याख्या वहीं देखना चाहिए । यहां भी ‘यं सन्न्यासं तं योगं इति प्राहुः’ फल दृष्टि से ही कहा गया है, क्योंकि संन्यासी मन से भी संपूर्ण कर्मों का त्याग कर चुका है ‘सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते’ ५/१३ तो फिर उसके फल स्वर्ग और मोक्ष का भी संकल्प संभव नहीं है, क्योंकि वह तो “आत्मन्येवात्मना तुष्टः २/५५, आत्मरतिः” ३/१७ इत्यादि है, अतः उसमें किसी भी प्रकार के संकल्प का अभाव होने से कर्मयोग अर्थात प्रवृत्तिमार्ग से कभी तुलना हो ही नहीं सकती है, यदि इसप्रकार की कोई मन में कामना या संकल्प है तो वह संन्यासी अर्थात मोक्ष का अधिकारी नहीं उससे अच्छा वह निष्कामकर्मयोगी है जो कर्म तो कर्तव्यभाव से करता है लेकिन कर्म का कोई फल भी होता है या मिले, ऐसा भाव भी अर्थात मानसिक संकल्प भी नहीं उठता ।
ऐसी दशा में मन से भी कर्मों और उसके फल के त्याग के फलस्वरूप सर्वकर्म संन्यासी को जो मिलने वाला मोक्ष है, वही मोक्ष फलाभिसंधि रहित कर्मयोगी को मिलने के कारण गौड़ दृष्ट्या संन्यास और योग एक है, मुख्य दृष्टि से नहीं । मुख्य दृष्टि से गृहस्थ अग्नि कार्य त्यागकर आग्नेयी अर्थात् अग्निहोत्रादि न करके पतित हो जायेगा, वहीं संन्यासी फल कामना के बिना अग्नि क्यों ग्रहण करेगा ? यदि ग्रहण करता है तो वह भी परधर्मी और पतन को प्राप्त होगा । अतः फल दृष्ट्या समानता गौड़ है । कर्मयोग का गुण है संन्यास अर्थात ज्ञान को प्राप्त कराना । अतः संन्यास और कर्म अंग अंगी हैं अर्थात संन्यास अंग है तो उसका साधन कर्म अंगी ।
अथवा पूर्वार्ध में में योग शब्द से वास्तविक संन्यासी अर्थात ज्ञानयोगी की समानता फल दृष्टि को लेकर समझना चाहिए । बिना संकल्प का त्याग किये कोई योगी अर्थात सर्वकर्मसंन्यासी नहीं हो सकता है मतलब ज्ञानयोगी पहले सभी कर्मों का स्वरूपतः त्याग कर चुका है और कर्मयोगी फल का त्याग करेगा । इसी त्याग की समानता को लेकर ही शास्त्रवित् कर्मयोगी को भी ज्ञानयोगी के समान ही फलदृष्टि से एक परमात्मा की प्राप्त के हेतुभूत कहते हैं इसलिए कर्मयोगी भी संन्यासी के समान ही है ऐसा समझना चाहिए । कोई कहे कि देवदत्त शेर के समान है या शेर है तो वह शेर नहीं हो जाता है बल्कि साहस की निर्भय समानता को लेकर तुलना की जाती है । इसी प्रकार कर्मयोगी संन्यासी के समान है, संन्यासी नहीं । समान इसलिये कि आज निरपेक्ष भाव से कर्म करता है तो कल चित्तशुद्धि होकर सर्वकर्मसंन्यासी भी हो जायेगा । इसीलिये संन्यासी के समान कहा गया है, संन्यासी नहीं ॥२॥
संबंध— कर्मयोग की प्रशंसा के बाद अब योग की प्राप्ति का उपाय कहते हैं……
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगरूढ़स्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
शब्दार्थ— (समत्वरूप) योग में आरूढ़ता की इच्छा रखने वाले मननशील के लिए कर्तव्यकर्म हेतु अर्थात साधन है, उसी कर्मयोगी के समत्व रूप योग की आरूढ़ता में हेतु शम अर्थात मन का शान्त अर्थात प्रसन्न होना है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ आरुरुक्षोः दिया गया है, तो किस पर आरूढ़ होने की इच्छा करेगा ? प्रसंग कर्मयोग का चल रहा है, अतः उसी की आरूढ़ता है ज्ञानयोग का नहीं । ज्ञान तो उसका फल स्वतः प्राप्त होने वाला फल है । अतः जो अभी योग में स्थित नहीं हुआ है लेकिन होना चाहता है ऐसा जिसके मनन में उसकी प्राप्ति के उपायभूत साधन निरन्तर चिन्तन अर्थात मनन करने वाला मुनि कहा गया है । यहाँ पर विद्वानों ने भविष्य में योग प्राप्ति के पश्चात चित्तशुद्धि होने पर श्रवण, मनन, निदिध्यासन करेगा इस दृष्टि से भविष्य का मुनि कहा है और होगा भी, इसमें संशय का कोई स्थान नहीं है तथापि मेरी दृष्टि में वह योग की तारतम्यता को प्राप्त होने से अभी भी मुनि ही है ।
अब योग का साधन बताते हैं— योगं कर्म कारणमुच्यते अर्थात ‘समत्वं योग उच्यते’ २/४८ के अनुसार समत्वरूप योग को प्राप्त करने का साधन कर्म को बताया है, क्योंकि ‘न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते’ ३/४ अर्थात बिना शास्त्रीय स्वधर्म प्राप्त स्वकर्म अर्थात कर्तव्य पालन के बिना कोई भी नैष्कर्म्य को प्राप्त नहीं हो सकता । बिना नैष्कर्म्य के समत्वभाव आयेगा नहीं, बिना समत्व भाव के त्वं पदार्थ का शोधन अर्थात सभी प्राणियों अपना आत्मरूप देखना होगा नहीं और बिना त्वम् पदार्थ के शोधन के तत् पदार्थ का शोधन अर्थात समस्त प्राणियों सहित उस परमात्मा में अभिन्न रूप से देखना कैसे हो जायेगा ? यह तो वंध्यापुत्र के गंधर्व नगर जलाने या कछुवे की पीठ पर बाल उगाने जैसा ही है । बिना तत्त्वम् के शोधन के असि भाव अर्थात जीव-ब्रह्म के बीच की परिछिन्नता मिटाने की बात स्वप्न के वंध्यापुत्र से अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? इसीलिये कहा था— ‘योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय’ २/४८ वह संग कैसे त्यागना है ? समत्त्वं योग उच्यते २/४८ में कैसे स्थित होना है ? इसके विषय में विस्तृत व्याख्या इस अध्याय में की जायेगी ।
यदि कोई कहता है कि वहाँ का विषय अलग और यहाँ का विषय अलग है तो मैं उसे दुराग्रही कहने का अधिकार तो नहीं रखता तथापि मैं इतना कहूंगा दूसरा अध्याय गीता में प्रतिपादित विषयों का उपक्रम है और आगे का १७वें अध्याय तक विस्तार है, जो विषय उपक्रम में नहीं होगा, संपूर्ण विषयों को एक स्थान पर कहने वाले उपसंहार में भी नहीं होगा, वह विषय बीच में कैसे हो सकता है ? यदि किसी को लगता है कि विषय उपक्रम एवं उपसंहार से अतिरिक्त भी है तो ऐसी स्थित के दो ही कारण हो सकते हैं, पहला यह कि वह शास्त्र ही नहीं है , दूसरा यह कि वह ऐसा मूढ़तम है कि उसके गले में पड़ा हार तो दिख रहा है लेकिन वह यह नहीं जानता है कि वह फूलों का हार है अथवा कुछ और ही है । अथवा वह दही तो देख रहा है सफेदी लक्षण को लेकर, लेकिन वह यह भूल गया कि सफेदी लक्षण चूने का भी होता है अर्थात कहीं दही के धोखे चूना तो नहीं चाट रहा है ? अस्तु ।
अब आगे कहते हैं कि ‘तस्य एव योगारूस्य कारणं शमः उच्यते’ अर्थात वही मननशील मुनि जो अब आरुढ़ हो चुका है अर्थात् अपने लक्ष्यार्थ मोक्ष को प्राप्त कर चुका है उसका उसका भी कारण शम अर्थात चित्त का शान्त या प्रसन्न होना है, यही उसकी सिद्धि के लक्षण हैं ऐसा योग दर्शन में भी वर्णित है । गीता में भी— ‘प्रसन्नचेतसो ह्याशुः बुद्धिः पर्यवतिष्ठते’ २/६५ शान्ति प्राप्त होना ही चित्त (मन) की प्रसन्नता है और चित्त (मन)की प्रसन्नता बुद्धि के परम लक्ष्य में प्रतिष्ठित होने का प्रमाण है । अन्यथा चित्त की प्रसन्नता के बिना शान्ति और सुख कुछ भी नहीं…… ‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ २/६६ अतः शम का अर्थ प्रसन्नता ही है, शान्ति ही है, इसके बिना योग संभव ही नहीं है अतः योगारूढ़ता का कारण (साधन) शम है ।
भावार्थ— निष्कामकर्म से समत्वयोग, समत्वयोग से प्रज्ञा की स्थिरता, प्रज्ञा की स्थिरता से चित्त की प्रसन्नता, चित्त की प्रसन्नता से समाधि अर्थात मोक्ष ऐसा भाव है ।
अथवा मुनि यानी मननशील विचार प्रचार प्रधान जो ध्यान में आरूढ नहीं हो सका है उसके लिए योग अर्थात समत्व में स्थित होने के लिए ‘सुखदुःखे समे कृत्वा’ २/३८ अर्थात सुख दुःख हानि लाभ आदि को समान समझकर कर्म करना ही परमात्मा में स्थित होने का हेतु यानी कारण है । किन्तु जो ध्यानयोग में आरूढ हो चुके हैं उसका हेतु शम अर्थात मन सहित इन्द्रियों का भलीभाँति वश में होना ही आत्मस्थिति का हेतु है । यहाँ शम शब्द इन्द्रियों को वश में करके इन्द्रियों और मन की प्रसन्नता का सूचक है । ‘प्रसन्नचेतसो ह्याशुः बुद्धिः पर्यवतिष्ठते’ २/६५ अर्थात मन के प्रसन्न होने पर बुद्धि भलीभांति आत्मा में स्थिर हो जाती है ।
यहां पर दो पक्ष दिख रहे हैं एक वह जो समत्व रूप योग या ध्यान में स्थित नहीं है और दूसरा वह जो समत्व रूप योग या ध्यान में स्थित है । ध्यान में स्थित होने के लिए कर्म योग है और जब ध्यान में स्थित हो जाये तब उसका परिचय बताया कि मन की प्रसन्नता ही आत्मा में स्थित होने का प्रमाण है, क्योंकि योगी की आन्तर स्थिति तो समझा नहीं जा सकता है किन्तु बहरी लक्षणों में उसकी इन्द्रियों की विषयों के प्रति उपरामता का होना और किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न रहना यही आत्म प्रतिष्ठित योगी का लक्षण है ।
सारांश― कर्म से ध्यान में लगना और फिर इन्द्रियों का विषयों से उपराम होना सर्वकर्मसंन्यास का प्रतिपादन करता है अर्थात कर्मयोग से ज्ञानयोग की प्राप्ति अर्थ ही यहाँ विवक्षित है ॥३॥
संबंध— योग प्राप्ति का उपाय बताकर अब योगारूढ़ता का अधिकारी बता रहे हैं……
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ॥६/४॥
शब्दार्थ— क्योंकि जिस समय न तो इन्द्रियों के विषयों में और न ही कर्मों में आसक्ति होती है ऐसा संपूर्ण सङ्कल्पों का त्याग करनेवाला योगारूढ़ कहा जाता है ।
तात्पर्यार्थ—यदा हि नेन्द्रियार्थेषु— इन्द्रियों के जो जो विषय हैं उन विषयों में आसक्त न होना ही तात्पर्य है बाकी प्रत्याहार पूर्वक रागद्वेषवियुक्तैस्तु २/६४ के अनुसार इन्द्रियों के भोग का उपभोग करना चाहिए, ऐसा तात्पर्य है । न कर्मस्वनुषज्जते— नित्यनैमित्तिक कर्मों में भी आसक्त न हो, कर्म करने से चित्तशुद्धि होती है, अतः कर्म करे अर्थात आसक्ति न रखे किन्तु निष्कामकर्म तो कर रहा है ऐसा भाव भी न रखे ‘ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि’ २/४७ सर्वसङ्कल्प सन्न्यासी अर्थात संपूर्ण संसार की जड़ है संकल्प— तदैक्षत, अकल्पयत् इत्यादि श्रुति वाक्य संकल्प को ही सृष्टि का कारण मानते हैं । अतः कारण के अभाव में कार्य का अभाव के अनुसार कारण संकल्प ही नहीं होगा तो जन्म मृत्यु रूप संसार कहाँ होगा ? अतः संपूर्ण मनोगतान् २/५५ संकल्पों का त्याग कर देना चाहिए । इसी को कहा न ‘किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ ६/२५ इस प्रकार जो पूर्व श्लोक में योगप्राप्ति का कारण शम कहा गया था वही यहाँ पर शम का फल कहा गया है जिसके प्रसाद से जब उपरोक्त स्थिति को मुमुक्षु प्राप्त कर लेता है तब योगारूढ़ कहा जाता है ।
अथवा पूर्व श्लोक में योग की आरूढता में शम को कारण बताया था उसी को यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जब योगी शम को प्राप्त हो जाता है अर्थात जब इन्द्रियों के विषयों में उसका प्रयोजन नहीं रहता है और कर्मों की आसक्ति समाप्त हो चुकी होती है तब कर्म, उसके फल एवं विषयों की त्रिपुटी भी समाप्त हो जाती है तो संकल्प करेगा किसके लिए ? अर्थात संकल्प का हेतु ही समाप्त हो जाता है । संपूर्ण सृष्टि का हेतु कामना ही है । सोऽकामयत्, अकल्पयन्, इत्यादि श्रुति प्रमाण है एवं यहाँ भी आगे संकल्प को ही कामनाओं का हेतु बताएंगे । अतः सृजन के हेतु संकल्प का समाप्त होना ही योगारूढता है । सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी का तात्पर्यार्थ यह है कि कर्मों का, उसके फल का, उसके हेतु अहंता का, निष्कामता का इन सबका मन से ही स्वरूप से त्याग करके एकनिष्ठ आत्मा में स्थित होना ही योगारूढता है । ऐसा योग के ममर्ज्ञ कहते हैं ॥४॥
संबंध— योगारूढ़ता बताकर अब अपना उद्धार स्वयं करना चाहिए, यह बता रहे हैं.....
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६/५॥
शब्दार्थ— मनुष्य अपना उद्धार आप स्वयं करे, आत्मा का पतन न करे, क्योंकि स्वयं ही स्वयं का बन्धु और स्वयं ही स्वयं का शत्रु है ।
तात्पर्यार्थ— श्लोक के प्रथम चरण में स्वयं से स्वयं का उद्धार करने की बात कही गई है जो कि पूर्व संसाधनों से संपन्न होने पर चित्तशुद्धि के प्रसाद से ही संभव है, क्योंकि चित्तशुद्धि के प्रसाद से ही श्रवण, मनन, निदिध्यासन अर्थात वेदान्त श्रवण तल्लक्ष्यार्थ महावाक्य श्रवण पूर्वक आत्मैक्य अर्थात अहं ब्रह्मास्मि में निष्ठा संभव है । ऐसा वेदान्त द्वारा लक्षित तत्त्वं पदार्थ के शोधन में निरंतरता को प्राप्त योगी ही स्वयं से स्वयं का उद्धार करने वाला और स्वयं से स्वयं का मित्र है ।
नात्मानमवसादयेत्— अवसाद को यदि गांव की भाषा में कहें तो बारंबार माथापीटता, अत्यंत दुःखी, ऐसा व्यक्ति कभी कभी अपनी चेतना को भी खो देता है । आज हम सभी की यही स्थिति है, जो हमारा नहीं है उसे अपना माना, जो मैं नहीं वही मैं माना । ईश्वर ने उस अनात्मतादात्म्य अर्थात अवसाद प्राप्त होने पर भी मानव शरीर देकर कृपा की गुरुसान्निध्य और गुरु के माध्यम से शास्त्र सान्निध्य देकर भी कृपा की है । अब कहते हैं हमने तीन तीन कृपाएं की है, एक कृपा अपनी स्वयं अपने ऊपर कर लो, उसके लिए पूर्वोक्त साधन भी बता दिये है । अब और अवसाद को प्राप्त न होकर इस मानव जीवन को जिससे तू स्वयं को पहचानकर अपने चैतन्य स्व-स्वरूप जो अखंड, अनन्त, असीम, नित्य शाश्वत, षड्विकार रहित और अजन्मा है उसको पहचान कर सुखी हो जा । इस मानव जीवन को खोकर तू स्वयं ही अपना शत्रु मत बन ।
अथवा आचार्य द्वारा श्रवण करके मनन और निदिध्यासन करके आत्म पदार्थ की प्राप्ति कर लेना ही अपना उद्वार करना है । वस्तुतः आत्मा तो स्वतः शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है उसका उद्वारा क्या करना ? तथापि अविवेक द्वारा हमने अनात्म पदार्थ से तादात्म्य बना लिया है इस लिए अवसाद प्राप्त हो गया है । इसमें पहले आत्मा का अर्थ हैं सत् और असत् विवेक का निर्णय करने वाली शुद्ध बुद्धि, दूसरी आत्मा का अर्थ मन है जो स्वसंवेद्य आत्मा पर औपाधिक जीवत्व का आवरण पड़ा हुआ है उसको नष्ट कर देना ही अपना उद्धार करना है क्योंकि आवरण नष्ट होते ही निर्विशेष स्वरूप में स्वतः पहले से ही जैसा स्वरूप है उसका स्मरण हो जायेगा । यह स्मरण होना ही स्व-स्वरूप की प्राप्ति या स्व-स्थ होना है यही अपने द्वारा अपना उद्धार करना है । तीसरी आत्मा का अर्थ है अविवेक पूर्ण अनात्पदार्थ में स्थित बुद्धि जिसके कारण सदैव शोक मोह को प्राप्त होकर नाना प्रकार की योनियों में जीव भ्रमण करता है । इसमें जो पहले पक्ष का मनुष्य है वह तो स्वयं ही अपना मित्र है क्योंकि गुरुजन तो मार्ग बताएंगे किन्तु चलना स्वयं पड़ता है और दूसरा पक्ष अपना ही शत्रु है क्योंकि पुरुषार्थ रहित अविवेक के द्वारा बड़े भाग्य से मिले मनुष्य शरीर को अपनी आवागमन की मुक्ति के यत्न न करके विषयों में पड़कर पुनः शोक मोह को प्राप्त कराने वाली चौरासी लाख योनियों के भ्रमण रूप पतन को स्वयं ही प्राप्त हुआ ॥५॥
संबंध— स्वयं ही स्वयं का मित्र, शत्रु कैसे है यह बता रहे हैं……
बन्धुरात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६/६॥
शब्दार्थ— जिसने स्वयं से स्वयं को जीत लिया वह मित्र एवं जिसने स्वयं को नहीं जीता ऐसे अनात्मा का स्वयं से ही शत्रु की तरह व्यवहार करने वाला स्वयं शत्रु ही है ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने जो स्वयं ही स्वयं का मित्र, शत्रु बताया था उसी का यहाँ स्पष्टीकरण करते हैं कि जिसने अपने मन को जीत लिया है वही अपना मित्र है । मन को कैसे जीतें ? इसके लिए पूर्व में ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन’ ४/३४ कहा था, आचार्योपासनम् १३/७ आदि से कहेंगे उसके माध्यम से कीचड़ में फंसे हुए को समीस्थ वृक्षादि के सहयोग से बाहर निकलने में मदद मिल जाती है, किन्तु निकलना स्वयं होता है, क्योंकि वहाँ कोई भी आपके आसपास भी नहीं होता, इसी प्रकार सद्गुरु के संदेह निवारक वेदान्त के श्रवण, मनन, निदिध्यासन के आश्रित होकर संसार रूप कीचड़ से बाहर निकले, वही अन्तःकरण चतुष्टय संपन्न स्वयं ही अपना मित्र है, किन्तु जैसे मरणासन्न व्यक्ति पथ्यापथ्य का विचार किये बिना ही जो मन में आता है वही खा लेता है, चिकित्सक की एक भी बात नहीं सुनता, वह रोगी जैसे अपनी मौत का कारण आप स्वयं अपना शत्रु बन बैठता है वैसे ही अनात्मा में आत्मा देखने वाला अर्थात शरीर-इन्द्रिय को ही आत्मा अर्थात मैं मानकर जो गुरु-शास्त्र के विपरीत व्यवहार करते हुए शरीर-इन्द्रिय के पोषण में लगे रहते हैं वे स्वयं ही नानाप्रकार के क्लेशों को भोगने हेतु चौरासी के चक्र को स्वयं ही आमंत्रित कर स्वयं ही अपने शत्रु हैं । ऐसा तात्पर्य है ।
अथवा मन को जीतने का मतलब मन सहित संपूर्ण इन्द्रियों को जिसने जीत लिया और मन को जीत कर संपूर्ण अनात्पदार्थ से स्वयं को अलग कर लिया है वही अपना मित्र है जो इन्द्रियाराम है वही अपना शत्रु है, क्योंकि जैसे शत्रु सदैव आपके नाश के विषय में सोचता रहता है वैसे इन्द्रियां मन को अपने आधीन करके किस गड्ढे में कब और कहाँ डाल दें कोई पता नहीं है । बाहर के शत्रुओं से तो बचा जा सकता है लेकिन इन शत्रुओं से बचना कठिन है । अतः इन पर ही विजय पाना चाहिए । यहाँ साधन चतुष्टय को भी समझकर रखना चाहिए ॥६॥
संबंध— पूर्वोक्त में आत्मनः जितः से स्वयं से स्वयं का मित्र बताया था उसी का प्रतिफल अगले दो श्लोकों में बता रहे हैं……
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६/७॥
शब्दार्थ— मन को जीतकर परमात्मा में समाहित अर्थात एकाग्रता को प्राप्त सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख एवं मान-अपमान मे भी प्रशान्त हुआ……
तात्पर्यार्थ— जिस समय मन को जीत कर मन परमात्मा में अखंड़ाकार वृत्ति को धारण कर लेता है उस समय सर्दी-गर्मी, सुख-दुख तथा मान-अपमान, इनका पूर्व में जगह जगह वर्णन हो चुका है इन सबसे किसी भी देश, काल, परिस्थिति में उद्विग्न अर्थात विचलित न होता हुआ प्रशान्त अर्थात लेशमात्र भी उद्विन न होता हुआ…।
शीतोष्णादि से सभी दैहिक, दैविक, भौतिक तापों को समझ लेना चाहिए ॥७॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥६/८॥
शब्दार्थ— भली भांति अन्तःकरण चतुष्टय सहित सभी इन्द्रियों को जीतने वाला ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हुआ, मिट्टी और स्वर्ण में भी समभाव वाला युक्त अर्थात समभाव रूप परमात्मा से अभिन्न है ऐसा कहा जाता है ।
तात्पर्यार्थ— पूर्वोक्त श्लोक में शीतोष्ण आदि को मन पर विजय प्राप्त करते हुए आचार्य के द्वारा वेदान्त श्रवणकाल में आचार्य की सेवादि के माध्यम से उपरोक्त द्वन्द्वों को सहन करते हुए जिस तत्त्वम् का परोक्ष रूप से अनुभव प्राप्त किया वह ज्ञान है, फिर उसी ज्ञान का मनन करके उसको अपरोक्ष प्राप्ति का निश्चय करके चारों ओर से अपने आपको खींचकर उस परमतत्त्व की अपरोक्ष प्राप्ति के लिए जिस निदिध्यासन रूप साधन के माध्यम से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति करता है वह विज्ञान है । इस प्रकार ज्ञानविज्ञान से तृप्त अर्थात परिपूर्ण हुआ मुमुक्षु विजातात्मा अर्थात पञ्चज्ञानेन्द्रियां, पञ्चकर्मेन्द्रियां ये दस बाह्य और अन्तःकरण चतुष्टय ये आन्तरिक इन्द्रियां, इस प्रकार जो चतुर्दश इन्द्रियों को भलीभांति वश में करने वाला है, जो मिट्टी,पत्थर और स्वर्ण को समान समझने वाला है । पत्थर, स्वर्ण चूंकि मिट्टी के गर्भ से उत्पन्न हुआ है कार्यकारण के अभिन्नभाव न्याय से पत्थर, स्वर्ण भी मिट्टी ही है यह भाव है । ऐसा योगी जो कूटस्थ अर्थात द्रष्टा या साक्षीभाव में स्थित हुआ युक्त अर्थात अभिन्नभाव को प्राप्त, ऐसा कहा जाता है ।
अथवा ज्ञान यानी आचार्य द्वारा शास्त्रों के अन्तिम लक्ष्य को भलीभांति समझना ज्ञान है और उसका भलीभाँति अपने में प्रत्यक्ष की भांति अनुभव करना विज्ञान है । ऐसे ज्ञान और विज्ञान से तृप्त हुआ अर्थात पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत कुछ भी न चाहने वाला मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान समझने का मतलब सर्वत्र सम भाव को प्राप्त हुआ योगी ब्रह्मात्मैक्य को प्राप्त हो गया है ऐसा अनुभवी जानकार कहते हैं ।
भावार्थ— पूर्व में जितात्मनः से शीतोष्णादि, समलोष्टाश्मकाञ्चनः के द्वारा बाह्य द्वन्द्वों पर विजय की बात कहकर, विजितेन्द्रियः द्वारा बाह्य और आंतरिक विजय प्राप्त कर गुरूपदिष्ट ज्ञान का मनन करके निदिध्यासन द्वारा विज्ञान अर्थात अयमात्मा ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, प्रज्ञानं ब्रह्म, वासुदेवः सर्वम्, ईश्वरः सर्वभूतानाम् आदि का अपरोक्ष करके तृप्त एवं कूटस्थ होकर समत्व रूप आत्मैक्य को प्राप्त अर्थात युक्त ऐसा कहा जाता है ॥८॥
संबंध— पूर्व दो श्लोकों में बाह्य और आन्तरिक साधनों का सांकेतिक निरूपण करके अब पुनः बाह्य साधन का निरूपण करते हैं……
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥६/९॥
शब्दार्थ— सुहृत्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ द्वेष्य, बन्धु, साधु और पापी में भी सम बुद्धि को ही श्रेष्ठ बुद्धि कहा गया है ।
तात्पर्यार्थ— सुहृत् अर्थात् बिना प्रत्युपकार की भावना के स्वभाव से ही सहयोग करने वाला, मित्र यानी बदले में सहयोग की इच्छा रखकर सहयोग करने वाला, शत्रु अर्थात जो सामने और पीठ पीछे भी अहित करने वाला हो, उदासीन यानी किसी से भी कोई मतलब नहीं, मध्यस्थ अर्थात न्याय की बात करना, वह बात चाहे अपने ही किसी खास के अनुकूल या विरुद्ध ही क्यों न हो फिर भी तटस्थ रहकर न्याय करना, द्वेष्य अर्थात जो हमारा वैरी हो और हमारे लिए द्वेष का पात्र हो, बन्धु अर्थात परिवारीजन जहाँ तक रास्ते नाते जा सकते हैं, शास्त्रीय कर्म करने वाला साधु और अशास्त्रीय कर्म करने वाला असाधु अर्थात पापी, दुष्ट इन सब में भी जिसकी बुद्धि आत्मदृष्टि से सम हो वही श्रेष्ठ कही गई है । जहाँ कहीं विशिष्यते की जगह विमुच्यते पाठ हो वहाँ उपरोक्त समभाव होने से बुद्धि राग द्वेष से मुक्त हो जाती है ऐसा समझना चाहिए ।
भावार्थ— पापी और पुण्यात्मा सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि होने से कार्य और गुण तो प्रकृति में होते हैं किन्तु एक ही आत्मा सर्वत्र सब में है अर्थात एक ही सत्ता सर्वत्र विद्यमान है ऐसा देखना श्रेष्ठ कहा गया है ॥९॥
संबंध— उपरोक्त तीन श्लोकों द्वारा त्रिविध तापों का सहन करने वाला ही आन्तरिक साधना का अधिकारी होता है बताकर अब यह बता रहे हैं……
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥६/१०॥
शब्दार्थ— योगी एकांत में स्थित रहकर बाह्य आशा और परिग्रह का त्याग करके वश में किये हुए अन्तःकरण चतुष्टय के द्वारा निरंतर आत्मा का अर्थात ‘त्वं’ पदार्थ का अनुसंधान करे ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ योगी अष्टांग योगी न होकर पूर्वोक्त समभावस्थ को कहा गया है । अपने अन्तःकरण चतुष्टय को― यहाँ मात्र अन्तःकरण चतुष्टय कहने का तात्पर्य यह है कि बाह्य साधन पूर्व में कहे जा चुके हैं अब आन्तरिक साधन का प्रसंग है । यहाँ यतचित्तात्मा में चित्त और आत्मा यानी मन ये दो अन्तःकरण कहे गये हैं, अतः अन्तःकरण चतुष्टय के दो करण बुद्धि और अहंकार का यहाँ अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि मन मनन करेगा, चित्त मनन की भूमि अपलब्ध करायेगा, बुद्धि नीरक्षीर विवेक पूर्वक निश्चय करेगी और अहं का त्वं पदार्थ के साथ तादाम्य बनाकर हैं तत्पदार्थ के साथ परिछिन्न अहं से व्यापक अहं होगा, क्योंकि अन्तःकरण चतुष्टय को अपने आधीन किये बिना कोई भी एकान्त रह ही नहीं सकता, उसे वासनाएं बलात् खींचकर बाहर कर देंगी ।
अतः इन्हें वश में करने वाला योगी ही संसार से किसी भी प्रकार की अपेक्षा न रखते हुए कि हमारा हमारे जीवन का संचालन कैसे होगा ? कौन करेगा ? कैसे करेगा ? इत्यादि पर विचार न करते हुए सब कुछ प्रारब्ध पर छोड़कर ‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’ ४/२२ का आश्रय लेकर सभी परिग्रह का त्याग कर सभी परिग्रह का त्याग का अर्थ है कि जितने कम से कम में काम चल सके मात्र इतना परिग्रह रखे, क्योंकि अभी सिद्ध नहीं मुमुक्षु है तभी तो इतना परिश्रम कर रहा है । सिद्ध दिव्य शरीर वाले होते हैं, शीतोष्ण का उन्हें स्पर्श भी नहीं होता है । अतः सिद्धों का अपरिग्रह यहाँ नहीं लेना है अन्यथा निदिध्यासन भी नहीं होगा, उल्टे शरीर असक्त होकर बोझ अलग बन जायेगा, बिना लक्ष्य प्राप्ति के शरीर छूट गया तो पुनः नई समस्या अलग खड़ी । अतः अपरिग्रह का शाब्दिक अर्थ न लेकर आवश्यक आवश्यकता कर लेना चाहिए ।
आवश्यकताएं तीन प्रकार की होती हैं, पहली आवश्यक आवश्यकता, जिसके बिना हमारा निर्वाह कठिन है । दूसरी आवश्यकता जो आज नहीं कल तो काम में आयेगी ही । तीसरी अनावश्यक आवश्यकता, मांस, मद्य, मीन, मैथुन आदि सहित लोगों को पीड़ित करने के लिए भी धन बल आदि ये अनावश्यक आवश्यकताएं हैं , इन सबमें आवश्यक आवश्यकता का चुनाव अपरिग्रह ही है, ऐसा समझना चाहिए । इस प्रकार जीर्णकाम होकर निष्काम भाव को प्राप्त हुआ पहले बाह्य वस्तुओं, वासनाओं से आप्तकाम हो जाये और फिर आत्मकाम हो जाये । आत्मकाम का मतलब ‘त्वं’ पदार्थ का लक्ष्यार्थ आत्म चिन्तन से अतिरिक्त और कोई भी काम अर्थात बाह्यवासना न रहे, क्योंकि जितना अधिक परिग्रह होगा उतनी अधिक बाह्यवासना होगी और जितना कम परिग्रह होगा उतना ही अधिक अन्तरंग साधन मजबूत होगा ।
ऐसा जितेन्द्रिय, निराशी, अपरिग्रही, अन्तःकरण चतुष्टय संपन्न विजयी योगी निदिध्यासन के द्वारा सततमात्मानम् अर्थात निरंतर आत्मा अर्थात वेदान्त लक्ष्यार्थ त्वम् पदार्थ का निरंतर द्वितीय अध्याय के अनुसार अनुसंधान करे । यहाँ युज् धातु है जिसका अर्थ विद्वान पाणिनीय व्याकरण के अनुसार समाधि बताते हैं, जिसका अर्थ होता है निरोध, तो यहाँ सतत आत्मा का निरोध तो कुछ युक्ति संगत नहीं लगता क्योंकि यतचित्तात्मा में पूर्णतः अन्तःकरण चतुष्टय को अपने आधीन कर लेने से ही उसका निरोध हो गया, इसलिए आत्मानम् का अर्थ मन नहीं लिया जा सकता है क्योंकि पुनरुक्ति दोष होगा । कुछ विद्वान युज् का अर्थ जोड़ना कहते हैं जो आत्मानम् के साथ तालमेल खाता है । चूंकि यहाँ अभी तक त्वं पदार्थ का शोधन ही चल रहा है और यहाँ आत्मानम् त्वम् पद वाचक जीव और लक्ष्यार्थ आत्मा होता है, अतः निरंतर आत्मा का युज् करने का अर्थ त्वम् पदार्थ का लक्ष्यार्थ तत् पदार्थ ब्रह्म के साथ निरंतर आत्मैक्य भाव का अर्थात ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का अनुसंधान करना ।
सभी आशाओं का तात्पर्यार्थ सिद्ध असिद्ध सहित सभी आशाएं । एकांत में आत्मा का निरंतर उपासना का मतलब त्वम् पदार्थ का निश्चय करके उसमें निरंतर स्थित रहने का प्रयत्न करना । यहाँ योगी को अष्टांग योगी न समझकर समत्व द्रष्टा के लिए जैसा कि प्रसंग चल रहा कहा गया है ।
भावार्थ— बाह्य भाव से हटकर अन्तर्भाव में निरंतर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का तब तक अनुसंधान करना चाहिए जब तक परिछिन्न भाव न मिट जाये ॥१०॥
समीक्षा― कर्मयोग की स्तुति करते हुए संन्यास के सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए बताया कि जो अशेष संकल्प का त्याग नहीं करता है वह कभी भी संन्यासी नहीं हो सकता । योग में आरुढता का निमित्त कर्म है और जो योगारूढ हो चुका है उसकी विषयों के प्रति उदासीनता, मन की प्रसन्नता अर्थात सभी संकल्पों का त्याग करने वाला ही ज्ञानयोगी कहा जाता है । अनात्म पदार्थ के त्याग पूर्वक आत्म पदार्थ में स्थिर होना ही स्वयं की स्वयं से मित्रता और इससे विरुद्ध जन्म मृत्यु की हेतु शत्रुता कही गई है । वस्तुतः शरीर सहित इन्द्रियां और अन्तकरण चतुष्टय पर विजय पाने वाला ही स्वयं का मित्र और इससे विरुद्ध शत्रु कहकर परमतत्त्व में एकाग्र एवं शीत उष्ण आदि द्वान्द्वों में विचलित न होने वाला निर्विकार ज्ञान विज्ञान से तृप्त हुआ सुहृद से लेकर पापी तक में एक ही परमेश्वर तत्त्व को देखने वाला योगी संपूर्ण आशाओं और अनावश्यक संग्रह वृृत्ति से रहित होकर एकांत में समाहित चित्त होकर आत्मानुसंधान करे । अर्थात मानव मात्र का कर्तव्य है कि वह एक मात्र स्वसंवेद्य परमतत्त्व को जाने ॥१-१०॥
संबंध— इस प्रकार जब बाह्य और आन्तर साधन से संपन्न हो जाये तब भी उसे आसन, आहार, विहार आदि पर ध्यान रखना होगा, एकांत में रहकर स्वेच्छाचार का आचरण करके पतित न हो जाये उसके लिए अष्टांगयोग के साधनों का कथन……
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥६/११॥
शब्दार्थ— पवित्र देश में आसन जो न अति ऊंचा हो न अति नीचा हो, कुश, मृगचर्म आज के समय में ऊनी आसन जो मात्र ध्यान के समय ही उपयोग किया जा सके, चूंकि कम्बल चुभे नहीं इसलिये उसके ऊपर वस्त्र बिछाकर इस क्रम से आसन स्थिर रूप से प्रतिष्ठित करे ।
तात्पर्यार्थ— शुचौ देश का अर्थ है कि पुराना जीर्णशीर्ण मंदिर जहाँ कोई आता जाता न हो यह बहुत ही कम आना जाना होता हो, नदी तट, समुद्र तट, पर्वत, कंदरा, गोशाला, पीपल, बिल्ववृक्षादि । साथ ही गंदगी न हो, कंकड़, पत्थर आदि झाड़ू से साफ कर दिये गये हों, गोमय, गोमूत्र से पवित्र किया गया हो, जो शोरशराबे से रहित हो । अपना आसन स्थिर हो का अर्थ दो प्रकार से समझें —
👉१-जिस जगह पर ध्यान करते हों बार बार उस स्थान को एवं वे कुश, मृगचर्म या कम्बल एवं वस्त्र जिनका उपयोग एक मात्र ध्यान में ही करना है वे भी बारंबार न बदलें वे स्थाई होने चाहिए ।
👉२-योगसूत्र कहता है— स्थिरसुखमासनम् अर्थात जिस आसन से बैठकर आप ध्यान करना चाहते हो महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि आप मूलबद्ध, पद्म, अर्धपद्म आदि किस आसन पर बैठते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्पूर्ण यह है कि आप किस आसन से सुखपूर्वक अधिक समय तक स्थिर होकर बैठ सकते हैं । अतः आप स्थिरमासनमात्मनः अर्थात स्थिरसुखमासनम् का चयन करें । इस प्रकार उभय रूप आसन का चयन करके फिर ऊंचाई पर ध्यान दें कि यदि आपको ध्यान में कदाचित तंद्रा अर्थात निद्रा आ जाये तो गिरने पर चोट लगे इतना भी ऊंचा न हो, आसन इतना नीचा अर्थात बिल्कुल जमीन पर भी न हो कि चीटी-चीटा, जहरीले दुर्गुची आदि आसन पर हमें दौड़ मचाकर विघ्न करते रहें । यहाँ पर चौकी का संकेत है जो जमीन से दो-चार अंगुल ऊपर होगी तो चीटी आदि नीचे से निकल जायेंगी और विघ्न भी नहीं होगा, तथापि गृहस्थ और आश्रमधारी महात्माओं के लिए तो सुलभ है लेकिन वीतरागी महात्मा चौकी कहां लादकर घूमेगा ? वक्ता ने कहा दिया और समन्वय आप कर लें ।
भावार्थ— एक स्थान, एक आसन जो आपको निर्विघ्न समझ में आये उसका चयन कर लें ॥११॥
संबंध— इस प्रकार आसनादि सिद्ध होने पर……
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥६/१२॥
शब्दार्थ— उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करके चित्त और इन्द्रिय की क्रियाओं को वश में करके आत्मविशुद्धि के लिए योग करे ।
तात्पर्यार्थ— आसन की विधि पूर्व श्लोक में कही जा चुकी है, उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करके, चित्त एवं इन्द्रिय की क्रियाओं को अपने आधीन रखते हुए, यहाँ पर जो मन की एकाग्रता है उस चित्त अर्थात वाह्य अहं वृत्ति के अवरोध एवं इन्द्रियों की बाह्य क्रियाओं पर अवरोध होने पर भी आन्तरिक उन उन विषयों के प्रति होने वाली भागदौड़ को रोकने के निमित्त अत्यंत सावधान रहना है, क्योंकि आगे कहेंगे न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ६/२५ उसी भूमिका में चित्त एवं इन्द्रियों की क्रियाओं पर ही नियंत्रण की बात की है, ये क्रियाएं सूक्ष्म और विक्षिप्त करके पतित करने वाली होती हैं । अतः स्वयं सावधानी पूर्वक एकाग्र वृत्ति से बिना हिले इन्द्रियादि की क्रियाओं को भलीभांति देखता एवं आधीन रखता हुआ आसन पर बैठकर; इन सबका तात्पर्य है । बिना हिले जो आगे कहा जायेगा के अनुसार आत्मसाक्षात्कार अर्थात त्वं पदार्थ के शोधन के लिए— यहाँ पर अधिकांश विद्वानों का मत है आत्मविशुद्धि से अर्थ चित्तशुद्धि लिया है अर्थात चित्तशुद्धि के लिए योग करे । सत्य भी यही है कि जब तक चित्त शुद्धि नहीं होती है तब तक तत् पदार्थ लक्ष्यार्थ ब्रह्म का बोध नहीं हो सकता, तब तक तत्त्वम् का एकत्व नहीं हो सकता । इसलिए आत्मविशुद्धि का अर्थ चित्तशुद्धि है, इस दृष्टि को लेने पर भी चित्तशुद्धि का परिणाम त्वम् पदार्थ यानी आत्मसाक्षात्कार ही है । स्वामी रामानुजाचार्य जी ने भी आत्मसाक्षात्कार ही माना है । अतः त्वम् पदार्थ का लक्ष्यभूत जो आत्मा है उसके साक्षात्कार के लिए योग करे अर्थात संपूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा है ऐसा ‛समत्वं योग उच्यते’ के अनुसार समभाव की एकत्व भावना से आत्मसाक्षात्कार करे ।
अथवा यहां मन, चित्त और आत्मा तीन शब्द दिये गये हैं । मन यानी विषयों का मनन करने वाला, उनमें रमणीयता देखने वाला । चित्त अर्थात विवेक बुद्धि जिसके द्वारा सत् असत् अथवा आत्मा और अनात्मा का विचार किया जा सके यही चित्त यानी बुद्धि का अनुशासन है । तीसरा है आत्मा की शुद्धि, तो आत्मा तो स्वभावतः शुद्ध ही है किल्बिष तो उस पर लादा गया है । उस संगति दोष से आये विकार का निवारण करना ही आत्मशुद्धि है । इन्द्रियों की क्रियाओं पर अनुशासन का अर्थ है उन्हें उनके विषयों के विचार से शून्य कर देना । विषयों का चिन्तन न करना । इस प्रकार चित्तशुद्धि के लिए जो वेदान्त आदि गुरु परंपरा से प्राप्त उसका चिन्तन यानी साक्षात्कार के लिए स्थिर होकर निर्भय होकर बैठे ॥६/१२॥
संबंध— पूर्वोक्त विधि का पुनः विस्तार……
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६/१३॥
शब्दार्थ— शरीर, ग्रीवा एवं शिर इन तीनों को सम और अचल करके अपनी नासिका के अग्रभाग को देखता हुआ, किसी भी अन्य दिशा में न देखता हुआ अचल एवं स्थिर हो जाये ।
तात्पर्यार्थ— पूर्वोक्त दो श्लोकों में उपयोगी बाह्य साधनों का वर्णन करके, जो यतचित्तेन्द्रियक्रियः से आन्तरिक साधन की बात कही थी उसी का यहाँ विस्तार समझना चाहिए । पहले बता रहे हैं कि योगी बैठे कैसे ? ६/११ के अनुसार स्वयं ही सुखासन का चयन करे कमर से ऊपर का भाग गर्दन तक १८०° की एक सीधी रेखा के अनुसार सम अर्थात सीधा बैठे और नीचे का भी भाग अर्थात संपूर्ण शरीर को हिलने-डुलने न दे, क्योंकि इससे विक्षेप होगा जिससे आत्मचिन्तन में बाधा होगी ।
इस प्रकार संपूर्ण शरीर को स्थाणुवत् स्थिर करके स्थित हो जाये । फिर मुमुक्षु दिशाओं को न देखता हुआ— यहाँ पर जो दिशाओं को न देखने की बात कही है वह पूर्व कथित यतचित्तेन्द्रियक्रियः का ही विस्तार समझना चाहिए, क्योंकि आंख बंद कर लेने पर भी इन्द्रियां अपनी अपनी दिशाओं में भागती ही हैं उनको वहीं का वहीं अचल, स्थिर करना ही दिशाओं को न देखना है । बिना आन्तरिक चाञ्चल्य के आप बाहर शरीर/नेत्र से कुछ भी कर/देख नहीं सकते । इस प्रकार पूर्णतः दिशावरोध करके अपनी नासिका के अग्र भाग को भलीभाँति देखे । ‘चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः’ ५/२७ के द्वारा नासिकाग्र की व्याख्या की जा चुकी है विस्तार वहाँ देखना चाहिए । आगे भी भ्रुवोर्मध्ये ‘प्राणमावेश्य सम्यक्’ ८/१० अर्थात दोनों भौंहों के बीच अर्थात आज्ञाचक्र में प्राणों को स्थिर करके, ५/२७ में भी प्राणायाम, ८/१० में भी प्राणायाम और यहाँ भी प्राणायाम ही है ।
अतः तीनों स्थानों में मतभेद नहीं हो सकता है तथापि विभिन्न विद्वानों के भी मत हैं, उसके अनुसार नासिका की ही सीधी रेखा में मूर्धा अर्थात सहस्रसार चक्र होने से नासिकाग्र सहस्रसार का उपलक्षण है, तथापि मैं सहमत नहीं हूँ क्योंकि नासिका की ही सीधी रेखा में मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि चक्र भी हैं तो उन्हें ही क्यों न लिया जाये सहस्रसार ही क्यों ? अतः यहाँ परस्पर विरोध होता है । गङ्गा में झोपड़ी न्याय से यहाँ नासिकाग्र का अर्थ आज्ञाचक्र ही है जिसकी पुष्टि स्वयं श्रीभगवान ५/२७ एवं ८/१० के माध्यम से कर रहे हैं । यही अर्थ समाचीन है । कुछ लोग कहते हैं कि जिसे नासिकाग्र नहीं दिखता वह आठ दिन में मर जाता है, अतः नासिकाग्र का अवलोकन करे ताकि ऐसी स्थिति जब आये तो चारों ओर से मन को खींचकर आत्मभाव में स्थित हुआ जा सके, तथापि यह भी युक्तिसंगत नहीं लगता, इसके लिए इतने आडंबर की क्या आवश्यकता ? यूं ही रोज नासिकाग्र का अवलोकन करते हुए अन्त समय की प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए, क्यों पहले से ही जीवन को उसके भोगों से वञ्चित करना ? कुछ लोगों का मानना है कि नासिकाग्र देखने से आधी आंखें खुली रहती हैं जिससे साधना काल में नींद नहीं आती, यह बात भी समझ से परे है क्योंकि लोग खड़े-खड़े, चलते-चलते एवं कार्य करते हुए भी नींद का आनन्द ले ही लेते हैं, मैं पढ़ता हुआ ही सो जाता हूँ तो जब मात्र आधी आंख खुली हो, मन भी एकाग्र हो और न नींद न आये इस बात का क्या प्रमाण ? सौ बात की एक बात, नासिकाग्र देखना लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य है मन को एकाग्र करके त्वम् पदार्थ अर्थात आत्मा का साक्षात्कार करना । इसलिए गीता को ही प्रमाण मानकर ध्यान का केन्द्र आज्ञाचक्र को ही मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
अथवा यहाँ नासिकाग्रं स्वं शब्द उपस्थित है । यहाँ हम दो प्रकार से विचार करेंगे । पहला विचार यह है कि ‘चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः’ ५/२७ एवं ‘भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्’ ८/१०, इस प्रकार जिस पांचवें अध्याय का योग विस्तार यहाँ किया जा रहा है उसके अनुसार नाक के अग्रभाग का अर्थ यहाँ आज्ञा चक्र यानी दोनो भौहों के बीच का भाग ही बनता है और अध्याय आठ में भी योग के अन्तर्गत यही अर्थ दिया गया है । वैसे भी नाक का ओठों के ऊपर का उठा भाग पुच्छ भाग है न कि अग्रभाग । अग्रभाग ध्यान से देखें तो भ्रकुटी के मध्य से ही दिखेगी अतः यहीं ध्यान का आदेश अन्यथा पूर्वापर से विरोध होगा । दूसरी बात यहाँ ध्यान का प्रसंग है यहाँ ध्यान का कोई लक्ष्य नहीं है जबकि आगे ‘युञ्जन्नेवं सदात्मानं’ ६/१५ अर्थात सदा आत्मा का ही अनुसंधान करे । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा ६/२५ अर्थात मन को आत्मा में स्थित करके कुछ भी चिंतन न करे । इसके अनुसार नाक का अगला भाग उपलक्षण है और भ्रकुटी में मन को स्थिर करके स्वम् अर्थात अपने आत्मस्वरूप का चिंतन करे । अर्थात अनात्पदार्थ पदार्थ से भिन्न स्वयं को देखे । यहां आचार्य शंकर नासिकाग्रं के साथ इव जोड़ते हैं । यहाँ इव का लोप माना है । मतलब दोनो नेत्रों की दृष्टि को भलीभांति नासिकाग्र में स्थिर करने के ही तरह आत्मस्वरूप का चिंतन करे यह भाव है ॥१३॥
संबंध— इस प्रकार मन को इन्द्रिय और शरीर के सहित स्थिर करके फिर……
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥६/१४॥
शब्दार्थ— प्रशान्त अन्तःकरण, भय रहित, ब्रह्मचारिव्रत में स्थित हुआ मन के संयम पूर्वक अपने चित्त को मुझसे युक्त करके मुझ परात्पर ब्रह्म में स्थित हो जाये ।
तात्पर्यार्थ— ‘यतचित्तेन्द्रियक्रियः’ ६/१२ एवं ‘दिशश्चानवलोकयन्’ ६/१३ के अनुसार अन्तःकरण को चारों ओर से फैले हुए राग द्वेष से लेकर ‘छिन्नद्वैधा’ ५/२५ सभी आन्तर्वाह्य द्वन्द्वों, विषयों से इन्द्रियादिकों को खींचकर उन्हें अन्तःकरण में स्थापित कर प्रशांत अर्थात् किसी भी प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म हलचल से रहित होता हुआ त्रैताप विषयक सभी प्रकार के विषयों से रहित, ब्रह्मचारिव्रत में स्थित होकर; यहाँ ब्रह्मचारिव्रत भी समझना आवश्यक है, ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ ८/११ अर्थात योगीजन जिस परमतत्त्व की प्राप्ति के लिए योगीजन आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं । ब्रह्मचर्य के लिए पहले दो बातें समझना आवश्यक है, पहली बात यह कि वेदपाठी को भी ब्रह्मचारी कहते हैं तथापि मुमुक्षु होने से वेदपाठ संपन्न कर चुका है, अतः परम्परा से प्राप्त वेदान्त के तात्पर्य को समझाने वाला एकाध कोई ग्रंथ साथ में हो ताकि उनका चिन्तन करके समाधि काल में तदनुसार आरूढ़ होने अर्थात निदिध्यासन का अभ्यास करे । उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया’ ४/३४ अर्थात कोई अटक बनती है तो किसी महापुरुष की सेवा और प्रश्न द्वारा समाधान करे । इत्र, तेल, स्त्री मिलन एवं संभाषण, अष्टविध मैथुनादि से दूर, आचार्योपासनम् आदि से युक्त होना चाहिए । भिक्षा में अनिश्चित घरों से मधुकरी का आश्रय ले । इत्यादि ।
इस प्रकार मन को संयम में रखते हुए मच्चित्तः अर्थात मत् पदार्थ का लक्ष्यार्थ ईश्वर/विराट् चित्त का तात्पर्य त्वं लक्ष्यार्थ आत्मा से युक्त अर्थात अभिन्न होकर मत्परः अर्थात् मुझ परब्रह्म में, यहाँ मत् पदार्थ का लक्ष्यार्थ असि पदार्थ है, परः का अर्थ जिससे पर अर्थात बढ़कर दूसरा कोई नहीं है, अद्वितीय ऐसे मुझ ‘असि’ पदार्थ में स्थित हो जा । यहाँ मच्चित्तः और मत्परः में दो बार मत् पद आया है, अतः पहले तत् पदार्थ का लक्ष्यार्थ विराट ही बनता है और चित्त का अर्थ त्वम् पदार्थ का लक्ष्यार्थ आत्मा ही बनता है । पीछे यतचित्तेन्द्रियः में चित्त का अर्थ जीवाभिमानी अहं लिया जा चुका है उसी जीवाभिमानी अहं प्रत्यय को मत् प्रत्यय के साथ युक्त अर्थात अभिन्न करके, फिर तत्त्वम् की परिच्छिन्न रेखा मिटाकर जो उपाधि रहित निर्विशेष मत् प्रत्यय अर्थात असि पदार्थ है उसमें आसीत अर्थात् बैठ जा यानी मुझ परात्पर से अभिन्न होकर स्थित हो जा ।
अथवा अन्तःकरण में मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त ये चार कहे गए हैं तथापि यहाँ मन अलग कह दिया गया है इसलिए शान्त अन्तकरण का मतलब कृतभाव के अहंकार से रहित बुद्धि का सभी विषयों से उपराम होकर एकमात्र आत्मा का निश्चय करके उसमें ही स्थित हो जाना, चित्त में चंचलता का न होना । निर्भय का मतलब ऐसे स्थान का चयन करना जहाँ मुमुक्षु को किसी से और किसी को मुमुक्षु से भय न हो । ब्रह्मचारि व्रत का मतलब अष्टविध मैथुन का त्याग, सुगन्धित द्रव्य का उबटन, तेल आदि का लेप न करना, गुरु सेवा में तत्पर रहना, वेदान्त का श्रवण मनन और निदिध्यासन करना, इत्यादि ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ ८/११ । इन सभी भावों में अविचल स्थित होकर मन को कहीं इधर उधर न जाने देकर चित्त को मुझ सर्वात्मा में जोड़कर अर्थात अभिन्न भाव से मुझ परब्रह्म परमतत्त्व में बैठ जाये अर्थात ‘मैं ही ब्रह्म हूँ ब्रह्म ही मैं हूँ’ इस भाव में अचल भाव से स्थिर हो जाये ।
भावार्थ— इस प्रकार आत्मैक्य ही जिसका लक्ष्य है वह मुमुक्षु अभिन्नता को प्राप्त हो जायेगा, क्योंकि अकेले त्वम् पदार्थ लक्ष्यार्थ आत्मा के ज्ञान होने से भी मोक्ष नहीं होता और न ही अकेले तत् पदार्थ लक्ष्यार्थ ब्रह्म के ज्ञान से ही । जब मोक्ष होगा तब अभिन्न होकर ही होगा ॥१४॥
संबंध— इस प्रकार यजन करने वाला मोक्षस्वरूप मुझको ही प्राप्त होता है, अब यह बता रहे हैं……
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६/१५॥
शब्दार्थ— इस प्रकार जीते हुए मन वाला योगी निरंतर अनुसंधान करता हुआ मुझस्थानीय निर्वाण नामक परम् शान्ति को प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ— एवं शब्द पूर्व श्लोक के साथ संबंध जोड़ते हुए कहता है कि जैसा पहले बाह्य और आन्तरिक साधन आत्मशोधन के लिए बताया उनका आश्रय लेकर मन को जीतने वाला योगी नित्य निरन्तर आत्मा का अनुसंधान करे । शंका होती है कि जब पू्र्व श्लोक से इसका संबंध है तो मनः संयम्य कहने के बाद नियतमानसः कहने की क्या आवश्यकता थी ? इसका समाधान यह है कि अभी योगी जो योग की मात्र वैचारिक अवस्था त्वम् पदार्थ में स्थित है, निर्वैचारिक व्यापक अहं भाव में स्थित नहीं हुआ है । इसे योगदर्शन की भाषा में कहें तो सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि है । विभूति पाद के अनुसार यहाँ पर नाना प्रकार की सिद्धियों का दर्शन प्रलोभन स्वाभाविक होते हैं । साधक का मन थोड़ा भी असावधान हुआ तो यह स्थिति पतन के ऐसे गर्त में डालेगी कि पुनः उत्थान होना कठिन है । अतिरिक्त नियतमानसः कहा, अर्थात जिसका मन वश में किया हुआ है वह इस प्रकार निरन्तर आत्मानुसंधान करे, जबकि वहां मनः संयम्य अर्थात मन को आधीन करने की बात कही गई है । वाक्यार्थ एक जैसा दिखने पर भी सूक्ष्म रेखा है जो महान अन्तर करती है । यह योग विषय है, योगदर्शन विभूति पाद देखें ।
इस प्रकार नित्य आत्मानुसंधान करने वाला योगी परम निर्वाण अर्थात कैवल्यमोक्षस्वरूप परम शान्ति जो कि मुझ सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्दस्थानीय है को अभिन्नभाव से प्राप्त कर लेता है ॥१५॥
संबंध— गी.अ. ५/२७ में जिस योग की चर्चा किया था उसका वर्णन योगी युञ्जीत ६/१० से लेकर युञ्जन्नेवं सदात्मानं ६/१६ तक कर दिया, जिसमें आन्तर्वाह्य सभी साधनों का वर्णन किया तथापि इतने मात्र से योग सिद्ध नहीं होता । अतः ब्रह्मचारिव्रते स्थितः जिसे कहा था उसका विस्तार से वर्णन आहार विहार के रूप में करते हैं जिसके बिना न प्राणायाम, न स्वाध्याय, न ही मनन और निदिध्यासन ही सिद्ध होता है……
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥६/१६॥
शब्दार्थ— यह योग न अधिक खानेवाले को, न कम खाने वाले को, न अधिक सोने वाले को और न ही कम सोने वाले को सिद्ध होता है ।
तात्पर्यार्थ— यह लोकप्रसिद्धि है कि अधिक खाने वाले की जठराग्नि मंद पड़ जाती है, जिससे बदहजमी सहित अनेक रोग हो जाते हैं । बिल्कुल न खाने से भी शरीर जीर्णशीर्ण हो जाने से भी योग सिद्ध नहीं होता शरीर असक्त हो जाता है, आत्मबल और शरीरबल का बड़ा तारतम्य है शरीर निर्बल होने पर अकेला आत्मबल भी क्या करेगा, बलहीन के द्वारा आत्म प्राप्त नहीं की जा सकती है ऐसी श्रुति प्रसिद्धि भी है । रोगी और बलहीन ये दोनो जहाँ हों वहाँ योग तो क्या‚ श्रवण मनन भी नहीं हो सकता । अधिक सोने से भी मन और शरीर प्रमाद ग्रस्त होगा और न सोने या बहुत कम सोने से भी तन्द्रा जैसी स्थिति और शरीर में विचित्र प्रतिक्रिया बनी रहती है फलतः योग सिद्ध नहीं होगा ।
मैने अधिक खाकर, बिल्कुल न खाकर, कम से कम सोकर, शायद रात्रि में एक-दो घंटे मुश्किल से सोकर सब देख लिया आज शरीर असक्त और जीवनपर्यंत के लिए रोगी हो चुका है । अतः इन अनुभवों का भी आश्रय लेना चाहिए ॥६/१६॥
संबंध— पुनः उचित दिनचर्या का कथन……
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६/१७॥
शब्दार्थ— भोजन, चलना, चेष्टाएँ, क्रिया, सोना और जागना ये सब उचित मात्रा में होना चाहिए, ऐसा योग दुःखों का नाश करने वाला होता है ।
तात्पर्यार्थ— भोजन उचित होने का अर्थ है जितना और जैसा भोजन सरलता से पच सके, जठराग्नि पर बल न पड़े । भोजन की मात्रा निश्चित नहीं की जा सकती । यह स्वयं निश्चित करे कि भोजन सुपाच्य और मन को प्रसन्न करने वाला हो और आलस्य को उत्पन्न न करे । चलना भी उतना ही चाहिए कि योग साधना के समय निद्रा, आलस्य या प्रमाद की स्थिति न बने । चेष्टा अर्थात ऐसी वार्ता जो निर्थक हो वह न करे एवं अनावश्यक विचारों का त्याग करे और जो कार्य अपने वश या अधिकार में न हो उस पर व्यर्थ का विचार न करे । कर्म/परिश्रम भी उचित मात्रा में थकान रहित करे । अधिक सोना और न सोना भी शरीर और मन को प्रभावित करता है, जिससे आलस्य, प्रमाद योग के शत्रु पैदा हो जाते हैं, अतः यह भी जितने से मन प्रफुल्लित हल्का हो उतना ही करे । यद्यपि शास्त्र और शास्त्रज्ञ दिन में सोने का निषेध करते हैं तथापि शारीरिक और मानसिक स्थित का भी विचार करना चाहिए । इस प्रकार का उचित आहार-विहार शरीर को स्वस्थ रखते हुए शारीरिक दुःखों तो नाश करता ही है साथ में योग सिद्धि में सहयोग करके जन्म-मरण के भी दुःख का नाश करता है ॥१७॥
संबंध— इस प्रकार तीन श्लोकों में योगी की दिनचर्या का वर्णन करके पुनः युक्त अर्थात आत्मैक्य का निरूपण करते हैं……
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६/१८॥
शब्दार्थ— जिस समय भलीभांति वश में किया हुआ चित्त आत्मा में स्थित हो जाता है, उस समय संपूर्ण कामनाओं से के स्पर्श से रहित युक्त कहा जाता है ।
तात्पर्यार्थ— कुछ विषय बड़े गंम्भीर होते हैं जिनके विवेचन में बड़े बड़े पण्डित धराशायी हो जाते हैं । यही कारण है कि दूसरों से स्वयं को भिन्न या स्वयं को उत्कृष्ट दिखाने के लिए ही अपनी विद्वता का प्रदर्शन करके अल्पज्ञ और अशिक्षित श्रद्धालुओं के मन में विरुद्ध भाव भर देते हैं, अत्यधिक श्रद्धा एवं गुरु के प्रति समर्पण के कारण बिना विचार किये हठधर्मिता का शिकार हो जाते हैं । वही यहाँ भी कुछ दिख रहा है…
मच्चित्तः एवं मत्परः ६/१४ मत्संस्थामधिगच्छति ६/१५ में कुछ लोगों ने सगुण साकार के वर्णन के अन्तर्गत मानते हैं । हमारी शंका ये है कि इसके पहले कहा आत्मविशुद्धये ६/१२ और फिर कहा चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ६/१८ तो जब त्वम् पदार्थ का लक्ष्यार्थ आत्मा पहले भी कहा और बाद में भी कहा तो बीच में सगुण साकार कहाँ से और कैसे आ गया ? अब आप कहोगे कि आप तो शांकरी वेदान्त परंपरा के हो, इसलिए ऐसा कहोगे ही, तो विशिष्टाद्वैत के आचार्य स्वामी रामानुजाचार्य के शब्दों में भी आत्मविशुद्धये का अर्थ आत्मसाक्षात्कार एवं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते का अर्थ आत्मा में ही निश्चल हो जाने की बात कही है जो त्वम् पदार्थ का लक्ष्यार्थ है । यह तो वही बात हुई कि रस्सी का प्रारंभिक भाग रस्सी और अन्तिम भाग रस्सी लेकिन बीच का भाग सर्प है । ये कैसे संभव हो सकता है ? या तो रस्सी ही होगी या सर्प ही । अतः ऐसी स्थिति में हमें कुछ नहीं कहना है । ६/१४-१५ की व्याख्या वहीं समझ लेना चाहिए ।
पूर्व में जिस आत्मा के साक्षात्कार के लिए विभिन्न आन्तर्वाह्य साधनों का वर्णन किया जो निदिध्यासन की वैचारिक स्थिति या सम्प्रज्ञात समाधि कही गई है उसी का यहाँ निर्वैचारिक असंप्रज्ञात दशा का अर्थात पहले योगी योग की प्रयत्नशीलता के कारण था और अब आत्मा में भलीभाँति स्थित होने के कारण है अर्थात जिस समय भलीभांति अपने आधीन किया हुआ चित्त यानी मन सर्वान्कामान्मनोगतान् २/५५ अर्थात पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत द्रष्ट-अद्रष्ट सभी प्रकार की कामनाओं से रहित हो जाता है उस समय वह आत्मा अर्थात स्व-स्वरूप में भलीभांति स्थित हुआ युक्त अर्थात जीवात्मैक्य रूप अभिन्नता को प्राप्त हुआ ऐसा समभावस्थ एकत्व विज्ञान को जानने वाले पण्डितों द्वारा कहा जाता है ।
अथवा यहाँ पर भलीभांति यह समझ लेना चाहिए कि यहाँ युक्त का अर्थ परमात्मा बिल्कुल नहीं है बल्कि परमात्मा के साथ आत्मा की अभिन्नता का कथन है क्योंकि इसी श्लोक में आत्मा में स्थित होने की बात कही गई है । इसी अध्याय में भी इससे पूर्व ऐसे ही कई श्लोक देखा जा सकता है । आत्मा में स्थित होकर आत्मसाक्षात्कार करने वाला ब्रह्म से अभिन्न कहा गया है । आत्मा में स्थित होकर आत्मसाक्षात्कार का तात्पर्य यह है कि आत्मा को भिन्न भावा से नहीं जाना जा सकता है क्योंकि जैसे नेत्र स्वयं को नहीं देख सकते वैसे ही स्वयं को स्वयं से अलग करके नहीं देख सकते, इसलिए आत्मा में स्थित होकर ही आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है । यहाँ दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि जब आत्मसाक्षात्कार कर लेता है तभी सभी कामनाओं का स्पर्श समाप्त होता है एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति २/७२ पहले नहीं और जब भी काम का स्पर्श समाप्त हो जाता है उसी समय ब्रह्मात्मैक्य कर्म का अपरोक्ष अनुभव हो जाता है यथैधांसि ४/३७ को भी देख लेना चाहिए ।
भाव यह है कि आत्मस्थिति के बिना काम नाश संभव नहीं है ॥१८॥
संबंध— आत्मस्थ योगी कैसे स्थित होता है इसकी उपमा दीपक से दे रहे हैं……
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६/१९॥
शब्दार्थ— जैसे वायु रहित स्थान मे दीपक की लौ निश्चल होती है, उसी प्रकार की स्थिति चित्त को वश में किये हुए आत्मयोग का अभ्यास करते हुए योगी की कही गई है ।
तात्पर्यार्थ— दीपक की तुलना चित्त अर्थात मन के साथ चाञ्चल्य भाव को लेकर की गई है । साथ ही दीपक का प्रकाश और मन का प्रकाश जागृति को लेकर एकांश में की गई है । ऐसी समानता किसी अन्य उपमा में नहीं मिलती । जैसे दीपक का शत्रु वायु है वैसे ही मन का शत्रु (सपरिवार) काम है । जैसे वायु रहित दीपक चञ्चलता से रहित होता है, वैसे ही काम रहित मन स्थिर होता है । शंका होती है कि अगर तेज वायु दीपक का शत्रु है तो वायु के बिना भी तो दीपक बुझ जायेगा, तो इसका उत्तर है हां ! तथापि अत्यंत कम वायु जिसका बारंबार कम या अधिक स्पंदन न हो दीपक स्थिर जलता है, वैसे ही मन वाह्यवासना से रहित और आत्मसाक्षात्कार कर लेने पर भी दीपक की स्थिर लौ के प्रकाश की तरह निरन्तर स्व-स्वरूप में जाग्रत रहना, सावधान रहना ही उसकी सूक्ष्मातिसूक्ष्म वासना है । उसी के द्वारा आत्मानः योगं युञ्जतः अर्थात आत्मा का अभिन्न भाव से अनुसंधान करता है । ऐसी ही स्थिति दीपक की उपमा से योगी की समझनी चाहिए या आत्मद्रष्टा पण्डितों द्वारा कही गई है । ऐसा तात्पर्यार्थ है ॥१९॥
संबंध— इस प्रकार अभिन्न भाव का अनुसंधान करते हुए अभिन्न भाव को चित्त के निरोध से प्राप्त होने की बात कहते हैं……
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥६/२०॥
शब्दार्थ— जिस समय योगाभ्यास से मन निरुद्ध होकर शान्त हो जाता है, जिस समय स्वयं से स्वयं में स्वयं को देखकर संतुष्ट हो जाता है ।
तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में योगी की तुलना दीपक से की गई है, उस दशा में यद्यपि वह योगी कामनाओं से रहित है तथापि बर्तन के बाहर तेल निकाल दिये जाने पर भी तेल का चिकनापन रहता है, वैसे वहाँ पर अभी ध्याता, ध्यान और ध्येय की त्रिपुटी है जो काम रूप वृक्ष के नष्ट होने पर भी अभी जीवित है । वह कभी भी पुनः वृक्ष का रूप धारण कर सकता है वह अत्यंत सात्विक आनंद की अनुभूति कराता है, यही सुख पुनः कर्मबन्धन या जन्म-मरण का हेतु हो सकता है, इसी को कहा सुख सङ्गेन बध्नाति ज्ञान सङ्गेन चानघ १४/६ । इसी दशा को विज्ञजन सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, इसीलिये प्रस्तुत विषय असम्प्रज्ञात समाधि की ओर ले जाते हुए कहते हैं कि जब पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर योगाभ्यास करते हुए चित्त(मन) निरुद्ध होकर उपराम हो जाता है, यह जो निरुद्धावस्था है यही निर्बीज अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि है । इस दशा में जिस समय स्वयं से स्वयं को स्वयं में देखता है । इसी को योगदर्शन के समाधिपाद में कहते हैं— “तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः” अर्थात् उसका यानी सम्प्रज्ञात समाधि की त्रुपुटि का निरोध करके पुनः सर्वनिरोध हो जाने पर अर्थात जिस वृत्ति से ध्याता, ध्यान, ध्येय की सम्प्रज्ञात समाधिस्थ त्रिपुटी का बाध हुआ है उस वृत्ति का भी निरोध हो जाने पर ही निर्बीज समाधि कही गई है । यहाँ पर किसी भी प्रकार का किसी भी दशा में स्व-भिन्न ज्ञान नहीं रहता । वहाँ तो एक मात्र वही मोक्षार्थी जो था वह अब स्वयं ही सर्वाधार है उसका आधार भी वही और आधेय भी वही, उससे भिन्न और कोई प्रकाश है ही नहीं, इसी दशा को कहा—
“न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम” १५/६ योगी अब जिस अवस्था में है वही अवस्था अयमात्मा ब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि इत्यादि श्रुति निर्देशित अभिन्नभाव को प्राप्त होकर स्वयं से स्वयं को स्वयं में देखकर संतुष्ट होता है, इसी को कहा ‘आत्मन्येवात्मनातुष्टः’ २/५५ अन्तर इतना है कि वह सिद्ध ज्ञानयोगी का सहज स्वभाव है और यह कर्मयोगी कर्म चित्तशुद्धि करके प्राप्त करता है । इसीलिये पहला जीवन्मुक्ति और दूसरा विदेहमुक्ति को प्राप्त करता है । इसी को कहा था न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ३/४ इस मोक्षफल दृष्टि से ही प्रमादी संन्यासी और कर्म न करने वाला इन दोनों के लिए इस मोक्षस्वरूप नैष्कर्म्य प्राप्ति की दुर्लभता बताते हुए फल दृष्टि से ही सांख्ययोग और कर्मयोग को एक कहा था न कि स्वरूप से । कर्मयोग की स्तुतिपरक श्लोक अ.५/२ एवं ६/१ और इनकी व्यख्या जो की गई है उसे यथास्थान पर देखा जा सकता है ।
अथवा यहाँ पर चित्त का अवरुद्ध होकर पूर्णतः शान्त होना निर्बीज समाधि का कथन करता है । निर्बीज दशा में स्वयं से भिन्न और कुछ होता ही नहीं है । स्वयं को स्वयं में देखने का अर्थ है कि वह परमतत्त्व स्वसंवेद्य है उसे न दूसरा देख सकता है और न ही दूसरा करके जाना जा सकता है यही स्वयं को स्वयं में देखना है । स्वयं ही संतुष्ट होने का तात्पर्य यह है कि और कोई वहाँ है नहीं- न तो ईश्वर न ब्रह्म और न ही जगत । अतः वह मात्र आत्मरति वाला है, आत्मक्रीड़ा वाला है । संपूर्ण जगत और ब्रह्म सब कुछ अभिन्न हो गया है । अतः वह स्वयं में संतुष्ट है आत्मन्येवात्मना तुष्टः २/५५ । उसकी संतुष्टि का कारण अगले श्लोक में स्पष्ट करते हैं ।
भावार्थ— इस प्रसंग में श्रीभगवान का एक ही लक्ष्य है चित्त का पूर्णतः निरोध करके निर्बीज अभिन्नभावापन्न निष्कैवल्य में स्थित होना ॥२०॥
संबंध— ऐसी निर्बीज स्थिति को प्राप्त योगी ही किसी भी दशा में विचलित नहीं होता, इसका कथन……
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥६/२१॥
शब्दार्थ— जो सुख आत्यंतिक इन्द्रियों से परे और बुद्धि ग्राह्य है, उस सुख को जिस समय जानकर योगी उसी सुख में स्थित हो जाता है, वह तत्त्व अर्थात् स्व-स्वरूप से विचलित नहीं होता ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ सुख को इन्द्रियों से परे कहने का तात्पर्य है कि इन्द्रियां राजस और तामस गुणों का समूह हैं, अगर उनकी प्रवृत्ति में कहीं सत्वगुण दिखता भी हो तो वह भी राजस तामस का मिश्रण ही होता है । अतः जो राजस तामस का विषय नहीं है उस योग के द्वारा परिमार्जित बुद्धि ही ग्रहण कर सकती है अन्य नहीं । सात्विक बुद्धि का लक्षण बताते हैं― “सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम्” १८/२० अर्थात जिस समय हमारी बुद्धि पूर्णतः सत्वस्थ होती है उस समय सब कुछ भिन्न दिखने पर भी एक मात्र अव्यय जीव-ब्रह्म को विभाग से रहित अर्थात अभिन्न देखने लगती है, इसी भाव को ‘नित्यसत्वस्थो’ २/४५ कहा था । अतः वह सुख अतीन्द्रिय अर्थात मन सहित इन्द्रियों का विषय न होने से अतीन्द्रिय और जिस सुख के बाद कोई सुख बचता ही नहीं, ऐसा असीम, अखंड, अनन्त सुख को आत्यंतिक सुख कहा गया है । ऐसा सुख स्वयं ही बुद्धि के रूप में स्थित होकर स्वयं के अनुष्ठान में जब स्वयं को चिदानन्दैरस, सबका आत्मा, सर्वरूप होकर अपने आपको जान लेता/अनुभव कर लेता है उस समय वह जिस तत्त्व अर्थात आत्मभाव में प्रतिष्ठित है वहाँ से विचलित नहीं होता अर्थात् अपने स्वरूप से पुनः नीचे नहीं आता अर्थात बाहर भीतर सर्वत्र आत्मरूप हो जाता है । इसी को एषा ब्रह्मी स्थितः पार्थ नैनां प्राप्यविमुह्यति २/७२ कहा है ।
टिप्पणी— आत्यंतिक सुख का तात्पर्य है जो अनन्त और असीम अर्थात जो अपरिच्छिन्न सुख इन्द्रियों का विषय नहीं होता बल्कि बुद्धि यानी विवेक द्वारा अनुभव किया जा सकता है ॥२१॥
संबंध— इस प्रकार आत्मलाभ प्राप्त करके और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता जिसे श्रुतियों ने एक विज्ञान से सर्वविज्ञान कहा है उसका कथन……
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मान्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरूणापि विचाल्यते ॥६/२२॥
शब्दार्थ— जिस समय आत्यंतिक सुखस्वरूप आत्मलाभ को प्राप्त करके योगी उससे बढ़कर अन्य लाभ नहीं मानता और जिसमें स्थित होने पर बड़े-बड़े दुःखों से भी विचलित नहीं किया जा सकता ।
तात्पर्यार्थ— जिस समय आत्मा का अभिन्नभाव से साक्षात्कार कर लिया, उसके बाद उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो वह अन्य किसकी प्राप्ति करना चाहेगा ? क्योंकि जिसकी भी पृथ्वी से लेकर ब्रह्मलोक पर्यंत प्राप्ति होगी वह स्व से भिन्न होगा, स्व से भिन्न वस्तु और उसकी वासना भी होनी चाहिए, जबकि वह सभी प्रकार के कल्मषों से निरावरण होकर स्वयं मोक्षस्वरूप है अभिन्नभावस्थ योगी को स्व से भिन्न कुछ मानता ही नहीं वही उसका सबसे बड़ा लाभ एक विज्ञान से सर्वविज्ञान है । उसके अन्दर ऐसी वृत्ति भी नहीं होती कि कुछ प्राप्त करना है । यही वह स्थिति है जिसमें स्थित होने पर तीनों तापों का कोई प्रभाव नहीं होता । संसार का सबसे बड़ा दुःख माना जाने वाला मृत्यु का है । किन्तु वह उस स्थिति में भी विचलित नहीं होता ‘नैनां विमुह्यति अन्तकालेऽपि’ २/७२ क्योंकि सुख-दुःख तो प्रकृतिस्थ १३/२१ के लिए हैं जबकि योगी तो प्रकृति के पार स्थित है । इसका उदाहरण गुरुगोविंद सिंह के पुत्रों और शम्भा जी आदि के रूप में इतिहास भी देखा जा सकता है ।
अथवा आत्मा के स्वरूप को जानकर उसमें स्थित रहने वाला योगी संसार के प्रत्येक सुख दुःख क्षणिक हैं यह समझकर उनसे विचलित नहीं होता । संसार और शरीर अन्त में नष्ट तो होना ही है तो फिर किसी भय से अपना कर्तव्य पालन क्यों त्यागा जाये । जब मरना ही है तो कर्तव्य पालन करके मरो ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’ २/३७ अर्थात सर्वकर्म संन्यासी को कभी जीवन के मोह में पड़कर अपने कर्तव्य से विरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिए । क्योंकि सब आत्मरूप ही है । अगर भय है तो हम कहीं न कहीं कमजोर अवश्य हैं ॥२२॥
संबंध— अब योग में जल्दबाजी न करने की बात कहते हैं……
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥६/२३॥
शब्दार्थ― दुःख के संयोग का वियोग ही योग नाम से जानकर वह ध्यानयोगी मन में उतकताहट अर्थात व्याकुलता के बिना योग का अनुष्ठान करे ।
तात्पर्यार्थ— ध्यानयोग का प्रसंग होने से योग का अर्थ ध्यानयोग समझना चाहिए एवं ‘समत्वं योग उच्यते’ २/३८ के अनुसार ध्यानयोग में ही समत्वभाव की प्राप्ति होना ही समीचीन भी है, इसीलिए ध्यानयोग को योग कहा गया है । इस योग का एक ही सबसे बड़ा गुण है कि दुःखसंयोगवियोगं अर्थात जिन जिन कारणों से दुःख प्राप्त होता है उन कारणों की प्राप्ति संयोग और उनसे निवृत्ति वियोग है । संसार का सबसे बड़ा दुःख तो जन्म लेना ही है, क्योंकि जन्म ही नहीं होता तो मृत्यु जैसा भयंकर भय (दुःख) भी कैसे होता ? बाकी सब तो बीच के ही हैं । अतः जन्म का हेतु पाप ही नहीं पुण्य भी है । अतः पाप-पुण्य दोनों के संयोग का नाश करने वाला यह ध्यानयोग है । ऐसा निश्चय करके ही योगी धृतिगृहीतया ६/२५ अर्थात धैर्य को धारण करके मन में बिना उकताये, बिना जल्दबाजी के योग अर्थात् ध्यान करे । वह यह विचार न करे कि इतना लंबा समय हो गया है अभी तक योग सिद्ध नहीं हुआ । ऐसे हीन विचार मन में न लाकर बल्कि ऐसा निश्चय करे कि इस जन्म में या ‘पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते’ ६/४४ के अनुसार अगले जन्म में सिद्ध होगा लेकिन संपूर्ण दुःखों के नाशक ध्यानयोग को तो करना ही है । ऐसा तात्पर्य है ।
अथवा दुःख का संयोग यानी दुःख किन कारणों से होता है उस कारण को जानकर उसके कारण का ही निवारण यानी कारण को ही नष्ट करना ही योग है । जब बीज नहीं तो वृक्ष नहीं । जब दुःख का कारण नहीं तो दुःख नहीं । अर्थात जन्म मृत्यु रूप दुःख का कारण है काम । अतः आत्मयोग काम को ही नष्ट कर देता है अतः निश्चय पूर्वक आत्मानुसंधान करना चाहिए बिना किसी जल्दबाजी के । क्योंकि जल्दबाजी में अनेक प्रकार के शारीरीरिक और मानसिक विघ्न उत्पन्न हो सकते हैं जिससे योगभ्रष्ट होने का भय है । अतः यह निश्चय करे कि निरंतर चिन्तन करता हुआ शान्त भाव से सिद्धि असिद्ध में सम भाव रखता हुआ योग करे अथवा यह समझे कर्म करना मेरा काम है अतः मैं योग नामक कर्तव्य का पालन मात्र कर रहा हूँ । अथवा इस जन्म में नहीं अगले जन्म में अथवा और अगले जन्म में तो आत्मसिद्धि मिलेगी ही जनम कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ सम्भु न तो रहहुं कुमारी ॥ इतना निश्चय और धैर्य पूर्वक किया गया योग का अनुष्ठान बड़े से बड़े दुःख का नाश करने वाला है ॥२३॥
संबंध— उकताहट का कारण काम का संकल्प है, अतः उसका का त्या……
सङ्कल्पप्रभावान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६/२४॥
शब्दार्थ— संकल्प से उत्पन्न सभी कामनाओं का अशेष रूप से त्याकर एवं मन सहित संपूर्ण इन्द्रिय समूह को भलीभांति नियंत्रित करके… ।
तात्पर्यार्थ— पूर्व श्लोक में दुःख का संयोग कराने वाले काम का नाश करने वाला योग बताया गया है । अब बताते हैं कि काम का भी मूल क्या है ? क्योंकि वृक्ष की जब तक जड़ का नाश नहीं होगा तब तक डालें और पत्ते तोड़ने से नाश नहीं होगा वरन् और अधिक फलीभूत होगा । इसीलिये यहाँ काम की उत्पत्ति का मूल श्रोत बताया संकल्प को, जो पहले देखा सुना और भोगा गया अथवा आगे भी जिसमें रमणीय बुद्धि योग्य श्रवण होगा । यदि मन संकल्प करना ही छोड़ दे तो काम तो अपने आप ही नष्ट हो जायेगा । इसके लिए कहते हैं कि पहले मन सहित सभी इन्द्रियों को अपने आधीन करके फिर…॥२४॥
संबंध— फिर धीरे-धीरे धैर्यपूर्वक……
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६/२५॥
शब्दार्थ— धीरे धीरे धैर्य पूर्वक बुद्धि के द्वारा वाह्यवृत्ति से उपराम होकर मन को आत्मा में स्थित करके कुछ भी चिन्तन न करे ।
तात्पर्यार्थ— शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य ६/११ से लेकर अब तक योग की अन्तर्बाह्य साधन सामग्री एवं लक्ष्य निर्धारित किया । अब यहाँ ध्यान की विधि बता रहे हैं । पीछे अनिर्विण्ण अर्थात बिना अकुलाहट/व्याकुलता के ऐसा जो कहा था उसी को यहाँ शनैः शनैः कहा गया । एकाएक सहसा आरूढ़ता व्याकुलता का लक्षण है, व्याकुलता में कार्य सिद्ध नहीं होता, न ही एकाएक कामनाओं की निवृत्ति ही होती है । अतः धीरे धीरे बुद्धि को वाह्य विषयों से उपराम/हटाकर…, यद्यपि विषय चिन्तन मन का विषय है और यहाँ मन ही कहना चाहिए था तथापि इन्द्रियों को जो भी पसंद आता है वह पहले मन को ही समर्पित करता है और मन बुद्धि को, फिर बुद्धि जैसा निश्चय करती है मन वैसा ही करता है । अतः ‘व्यवसात्मिका बुद्धिरेकेह’ २/४१ के अनुसार ही यहाँ मन के स्थान पर बुद्धि यानी विवेक कहा गया है । इसी प्रकार धृतिगृहीतया यद्यपिबुद्धि के द्वारा ग्रहण करना प्रतीत होता है तथापि यहाँ धृति का अर्थ धैर्य होगा, क्योंकि शनैः शनैः तभी संभव होगा । धैर्य के बिना निश्चयेन ६/२३ अर्थात दृढ़ निश्चय भी संभव नहीं हो सकता है ।
इस प्रकार धीरे धीरे अन्तर्बाह्य विषयों से नीर-क्षीर विवेक पूर्वक उपरामता को प्राप्त करके…, यहाँ एक और गंभीर विषय है कि पूर्व मे ‘बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्’ ६/२१ अर्थात मन सहित इन्द्रियों द्वारा आत्मा का अग्राह्य बताया था तो यहाँ मन को आत्मा में स्थित करने की बात क्यों कही ? इसका उत्तर है कि मन विषय चिन्तन अवश्य करता है बुद्धि नहीं, इसीलिये यहाँ मन कहा तथापि निश्चय बुद्धि ही करेगी इसलिये मन गौड़ हो जाता है और मन का स्थान बुद्धि ग्रहण करती है, इसीलिये मूल में आये बुद्ध्या से विवेक और धृति से धैर्य और मन से बुद्धि अर्थ स्वतः हो जाता है । मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय १२/८अर्थात बुद्धि द्वारा आत्मसाक्षात्कार का निश्चय करके बुद्धि को भी आत्मा से अभिन्न करके व्यापक, अखंड, अनंत, असीम, आत्यन्तिक सुखस्वरूप आत्मा से भिन्न और कुछ भी चिन्तन न करे ।
कुछ भी चिन्तन न करे से भोजन, दिनचर्या के विषय में भी कोई किसी भी प्रकार की आशंका नहीं करनी चाहिए । यह ध्यान काल में यदि चिन्तन करेगा तो आत्यन्तिक सुखस्वरूप आत्मा का साक्षात्कार कभी नहीं कर सकेगा । जब साधना/ध्यान से उपरत हो उस समय भोजनादि के विषय में प्रवृत्ति होना स्वाभाविक और निर्दोष है ऐसा किञ्चिदपि न चिन्तयेत् से अधिक समझ लेना चाहिए । ऐसा तात्पर्य है ।
भावार्थ— श्लोक २३ में अनिर्विण्णचेतसा कहा था उसी को यहाँ शनैः शनैः कहा है । बुद्धि के द्वारा यानी आत्मा और अनात्मा का श्रुति एवं आचार्य के अनुकूल नीर-क्षीर की भांति निश्चय करके बहुत ही धैर्यपूर्वक आत्मा में मन का विलय करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे, मतलब स्वरूप से भिन्न किसी भी अनात्म पदार्थ का चिन्तन न करे । इसका अर्थ यह हुआ जब तक हम आत्मसाक्षात्कार नहीं कर लेते हैं तब तक न कामना का ही नाश होगा और न ही संकल्प का, अतः हमें हर प्रयत्न आत्मसाक्षात्कार के लिए ही करना चाहिए ॥२५॥
संबंध— अभी मुमुक्षु निरुद्धावस्था को प्राप्त नहीं है । अतः कभी भी सामाधिकाल (ध्यान में भी) में बाह्यचिन्तन इन्द्रिय दुर्बलता के कारण हो सकता है, उसका निवारण करते हैं……
यतो यतो निश्चरति मनस्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६/२६॥
शब्दार्थ— अस्थिर एवं चञ्चल मन जहाँ जहाँ विचरण करे वहाँ वहाँ नियंत्रित और अपने आधीन करके आत्मा में लगावे ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ योग सूत्र में ‘यतो यतो मनो याति तत्र तत्र समाधयः’ की व्याख्या समझनी चाहिए । मन को वाह्य विषय का अभ्यास है अतः वाह्यविषय के लिए ही भागेगा । जब आन्तर अभ्यास हो जायेगा, आन्तरिक सुख का आनंद आने लगेगा तब बाहर नहीं जायेगा । अतः पूर्व में जिस विवेक बुद्धि से नियंत्रण बताया उसी विवेक बुद्धि का आश्रय लेकर जहाँ जहाँ मन वाह्य विषय की खोज में दौड़े वहाँ वहाँ उसे अनुशासित करके आत्मा में ही लगावे । यहाँ आत्मा का अर्थ परमात्मा न होकर ‘त्वम्’ पदार्थ लक्षित आत्मा समझना चाहिए । इस बात को पहले भी आत्मा की व्यापकता और अभिन्नता द्वारा कहा जा चुका है और यहाँ भी आगे त्वम् पदार्थ का लक्ष्य आत्मा का ही कथन है । यहाँ योग का प्रसंग है और ‘समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है अतः यहाँ ‘त्वम्’ पदार्थ लक्षित आत्मा की ही व्यापकता और अखंडता को दर्शाया गया है । जिस जिस वस्तु के लिए मन विचलित हो उस उस वस्तु में आत्मा से भिन्न सत्ता न देखना ही वहाँ वहाँ मन को आत्मा में लगाना है यही जो सर्वत्र व्यापक और सम भाव है ५/१८ यही योग है और इसी योग से चित्तवृत्ति का निरोध होता है— ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ । चारों ओर से अन्तर्बाह्य द्रष्ट-अद्रष्ट सभी वासनाओं में आत्मा से भिन्न कुछ न देखना ही चित्तवृत्ति का निरोध, समत्व एवं आत्मैक्य ही जिसका लक्ष्य है ऐसा धैर्यपूर्वक ध्यान अर्थात योग का अभ्यास करे । ऐसा तात्पर्य है ।
भावार्थ— मन का स्वभाव है कभी स्थिर न होना एवं चंचल होना अर्थात एक विषय की पूर्ति भी नहीं हुई और दूसरे तीसरे अप्राप्त विषय का चिन्तन करने लगना । ऐसे अस्थिर और चंचल मन को अनुशासित यानी अपने आधीन करके भलीभांति आत्मा में ही लगावे । उसे वश में कैसे करना इसके लिए परंपरा गत मिले मन्त्र में मन को लगा देना । श्वासों को जोर जोर से खींचना छोड़ना, आराध्य के स्तोत्र और उसके अर्थ पर विचार करना इत्यादि का आश्रय लेकर आत्मा अनात्मा का विवेक करके आत्मभाव में स्थित होना ही लक्ष्य है । चूंकि आत्मा सर्वव्यापक है अतः जहाँ कहीं मन जाये वहीं आत्मदर्शन करे ॥२६॥
संबंध— योगी के इस प्रकार के अभ्यास से पूर्णतः वासनाक्षय द्वारा आत्यन्तिक सुख की प्राप्ति……
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥६/२७॥
शब्दार्थ— इस प्रकार जब रजोगुण और रजोगुणोत्पन्न कल्मष जिसके शान्त हो गये हैं ऐसा ब्राह्मीभावापन्न योगी उत्तम सुख को प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ— ‘हि’ निश्चयात्मक पद है, निश्चय ही जिसके रजोगुण अर्थात रजोगुण के साथ तमोगुण का भी अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि जहाँ रजोगुण चाञ्चल्य का हेतु है, वहीं तमोगुण मूढ़ता का, देखिए अध्याय १४/१२-१३ जितने पुण्य कर्म हैं वे ब्रह्मलोक पर्यंत तक का प्रलोभन देने वाले रजोगुण की की देन है और जितने पापकर्म हैं वे नीच योनि में डालने वाले तमोगुण की देन है । अतः जितने भी पुण्य-पापमय कल्मष हैं का अतिक्रमण करता हुआ रजोगुण और तमोगुण से उपरामता को प्राप्त होकर जिसका मन प्रशान्त अर्थात किसी भी प्रकार की सूक्ष्मातिसूक्ष्म हलचल से रहित ब्रह्मभावापन्न अर्थात त्वम् पदार्थ का तत् पदार्थ से अभिन्नता का अनुभव करता हुआ उत्तम सुख को प्राप्त करता है । सुखमात्यन्तिकं ६/११, जो कहा था उसी को यहाँ उत्तम सुख समझना चाहिए । यही आत्यन्तिक सुख है, ऐसे आत्यन्तिक उत्तम सुख के बाद जहाँ और कोई उत्तम सुख न हो ऐसा अनुत्तम सुख को प्राप्त करता है । सत्वं सुखे सञ्जयति १४/९ यही है सत्वस्थ का लक्षण ।
अथवा मन पूर्णतः तब शान्त होता है अर्थात जब रजोगुण से उत्पन्न कामनाएं, लोभ, मोह आदि पूर्णतः नष्ट हो जायें ऐसा परम शान्त मन वाला निष्पाप अर्थात जिसने न पुण्य रूप कल्मष हैं न पाप रूप कल्मष हैं वह ब्राह्मी भाव को प्राप्त योगी अर्थात आत्मैक्यता को प्राप्त योगी आत्यंतिक सुख को प्राप्त करता है ।
यहां पर कुछ लोग रजोगुण की निवृत्ति होने के कारण सात्त्विक सुख को ही उत्तम सुख कह दिया है । यहाँ दो प्रकार से देखें कि अध्याय १४६ में ‘सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ’ सात्त्विक सुख को बन्धन का हेतु बताया है क्योंकि ‘ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था’ १४/१८ अर्थात सात्त्विक ऊर्ध्व लोक को यानी देवादि योनियों को प्राप्त होते हैं अतः वे उत्तम सुखवाले हो नहीं सकते । यदि ‘सर्वभूतेषु येनैकं’ १८/२० के अनुसार कहें तो वहाँ साधना के समय की जाने वाली भावना है जो परिच्छिन्न है और परिच्छिन्न को अपरिच्छिन्न का सुख हो नहीं सकता इसलिये वह भी आत्यंतिक सुख नहीं हो सकता है जबकि यहां ब्रह्मभूतमकल्मषं अर्थात निर्विकार ब्राह्मीभाव को प्राप्त होकर अपरिच्छिन्न भाव का अनुभव कर रहा है । अतः अपरिच्छिन्न सुख को भी शरीर रहते ही प्राप्त करके अर्थात वह जीते जी ही जीवन मुक्ति का आनन्द लेता है, यह भाव है ॥२७॥
संबंध— पुनः सुख का स्पष्टीकरण……
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगत कल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥६/२८॥
शब्दार्थ— इस प्रकार कल्मष रहित योगी सदा ही त्वम् पदार्थ लक्षित आत्मा का अनुसंधान करता हुआ सुखपूर्वक अर्थात् विघ्न रहित होकर ब्रह्म का स्पर्श करता हुआ अत्यन्त सुख को प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ— विगतकल्मषः अर्थात जिसके पुण्य-पापमय कल्मष और उसकी अहंता नष्ट हो गई है ऐसा योगी सदा सर्वदा आत्मा का अनुसंधान करता हुआ सुख पूर्वक…, यहाँ सुखपूर्वक कहने का मतलब है कि किसी भी प्रकार की विघ्नबाधा से रहित, क्योंकि पुण्य होगा तो सुख के कारण प्रमाद, विषयाकर्षण आदि के द्वारा विघ्न होगा और पाप होगा तो रोग, शत्रु आदि नानाप्रकार का भय विघ्न करेगा ऐसे उभय रूप जिसके विघ्न नष्ट हो गये हैं ऐसा योगी सुखपूर्वक ब्रह्म का स्पर्श करता हुआ; यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि त्वम् पदार्थ का अनुसंधान करते करते तत् पदार्थ का स्पर्श मात्र किया है एकीभूत नहीं हुआ है…, जैसे नदियां जिस समय समुद्र का स्पर्श करती हैं उस समय नदी न तो नदी रहती है और न ही समुद्र तथापि नदी को समुद्र के स्पर्श मात्र से समुद्रत्व का अनुभव हो जाता है, जिससे उसे समुद्रत्व का अपार आनन्द प्राप्त होता है, ऐसे ही अनुसंधान करते करते संपूर्ण विघ्नबाधाओं को पार करके ब्रह्म से अभिन्न होने का अनुभव कर रहा है । यही है ब्रह्मसंस्पर्शं अर्थात ब्रह्म का स्पर्श करना । इस प्रकार ब्रह्म का स्पर्श करता हुआ अत्यन्त सुख का अनुभव करता है । “सुखमक्षयमश्नुते ५/२१, सुखमात्यन्तिकं ६/२१, सुखमुत्तमम्” ६/२७ और यहाँ अत्यन्तं सुखमश्नुते एक ही समझना चाहिए ।
अथवा श्लोक २३ से जो उपासना क्रम प्रारंभ हुआ था उसी क्रम से पूर्व श्लोक तक क्रमशः साधना करता हुआ ब्रह्मीभाव को प्राप्त हो जाता है । जैसे नदी जब जिस समय समुद्र के निकट पहुंच कर समुद्रत्व का अनुभव करते हुए डेल्टा बनाती है उस समय भी यद्यपि लोगों द्वारा यह कहा जाता है कि यह नदी है और यह समुद्र तथापि नदी को अपने नदीत्व का ज्ञान बिल्कुल नहीं होता बल्कि वह समुद्रत्व का ही अनुभव करती है यही है नदी का समुद्रीभूत होना, किन्तु वहां से नदी का समुद्र से पीछे हटना संभव नहीं होता है और समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व को खोकर समुद्र हो जाती है वैसे ही पहले योगी ब्राह्मीभूत होकर आत्यंतिक सुख का अनुभव करता हुआ सभी कल्मषों से रहित होकर अपने लक्ष्य आत्मा का अनुसंधान करता हुआ ब्रह्म का भलीभाँति सुखपूर्वक यानी बिना किसी बाधा के सहज ही स्पर्श कर लेता है अर्थात जो अभी तक आत्मा और ईश्वर अलग है ऐसा जानता था वह भेद मिटाकर अब एकता को प्राप्त होकर जीवात्मैक्यता का अचिन्त्य सुख प्राप्त करता है । यहां पर भी पूर्वोक कहा गया उत्तम सुख ही है ।
यहाँ सुखपूर्वक ब्रह्म को प्राप्त करने का तात्पर्य यह है कि श्लोक १० से लेकर अब तक जो साधन बताये गये हैं उनका आश्रय लेकर उसके अनुसार जो साधन करता है उसके मार्ग की संपूर्ण बाधाएं नष्ट हो जाती हैं, बाधाओं के नाश होने पर सहज ही अचिन्त्य सुखदायक ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है इन्हीं साधनों को सन्नियम्येन्द्रियग्राम १२/४ संक्षिप्त रूप में कहेंगे और जो इन साधनों को बिना अपनाये अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करेगा उसके लिए ‘दुःखमाप्तुमयोगतः’ ५/६ में कह चुके हैं और ‘क्लेषोऽधिकतरस्तेषाम्’ १२/५ से आगे कहेंगे, इनकी व्याख्या उन्हीं स्थानों में देख लेना चाहिए ॥२८॥
संबंध— इस प्रकार जब ब्रह्म का स्पर्श करता है तब संपूर्ण प्राणियों को अपनी आत्मा में ही समदर्शन करता है इसका कथन……
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६/२९॥
शब्दार्थ— योगयुक्तात्मा अर्थात ध्यानयोग में स्थित ज्ञानयोगी अपने आपको संपूर्ण प्राणियों में और संपूर्ण प्राणियों को अपने में समरूप से देखता है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ दो शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं । पहला योगयुक्तात्मा— समत्वं योग उच्यते २/४८ जो मुमुक्षु समत्व में स्थित है ऐसा समत्व से युक्त समदर्शन अर्थात सम का अर्थात बताया निर्द्वन्दो हि ‘समं ब्रह्म’ ५/१९ ब्रह्म ब्रह्मा से लेकर स्तंब पर्यंत अर्थात जड़ और चेतन सर्वत्र सम भाव से स्थित है वह कहीं भी कम-ज्यादा, मोटा-पतला आदि नहीं है । वह जन्मादि षड्विकारों से रहित होने के कारण अशरीरी होने से बाहर भीतर लोहे में अग्नि की भांति समान व्यापक है । जैसे स्वप्न की हर जड़ चेतन सामग्री कहीं भी बिना भेदभाव के स्वयं ही होता है वैसे ही समत्वभाव से युक्त ब्रह्म के स्पर्श का अनुभव करने वाला ब्रह्मरूप से संपूर्ण प्राणियों को अपने अन्दर और अपने को संपूर्ण प्राणियों मे देखता है । कैसे देखता है ? आत्मरूप से सम देखता है । जैसे आधार पानी का आधेय तरंग, बुलबुले, फेन सब अपने आधार से भिन्न नहीं हैं सब पानी ही है । जैसे आधार रस्सी के ज्ञान से आधेय सर्प का ज्ञान बाधित हो जाता है, वैसे ही जगत के कारण परमतत्त्व आत्मा को जान लेने से कार्य जगत बाधित हो जाता है । सब कुछ भिन्न दिखने पर भी अपनी आत्मा में ही सबको और सबमें स्वयं को देखने के कारण बाहर भीतर एकरस स्थित होना ही समदर्शन है ।
भावार्थ— यहाँ संपूर्ण प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सबको देखने का तात्पर्य है एक अपरिच्छिन्न परमत्त्व को सबमें देखना । यह ध्यान के समय में इस प्रकार का अपरिच्छिन्न अनुभव करता है यह बताया गया है ॥२९॥
संबंध— वह योगी उस समय समभाव किस रूप में देखता है ? इसका कथन……
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६/३०॥
शब्दार्थ— जो सर्वत्र मुझको और सबको मुझमें देखता है उसके लिए मैं और मेरे लिए वह अदृश्य नहीं होता ।
तात्पर्यार्थ— अध्याय ५/१४ में आये हुए प्रभु शब्द से बताया गया कि अब यहाँ से ‘तत्’ पदार्थ की भूमिका तैयार की गई है जिसका आगे वर्णन किया जायेगा । प्रस्तुत प्रसंग में भी तत् पदार्थ का निरूपण किया जा रहा है । अ.३/३० में कहा था— ‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा’ अर्थात आध्यात्मिक चेतना द्वारा सभी कर्मों को त्याग दे । वहां का ‘अध्यात्मचेतस्’ गुणा गुणेषु वर्तन्ते ३/२८ आदि के अनुसार आत्मा-अनात्मा के विवेक से आत्मपद का ग्रहण और अनात्म पदार्थ का त्याग कहा गया था, विस्तार वहीं देखना चाहिए । वही ‘मयि’ शब्द प्रस्तुत श्लोक में पुनः दिया गया है । ‘येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि’ ४/२५ अर्थात् संपूर्ण प्राणियों को अपने में देखते हुए मुझमें देखेगा कहा था । कैसे देखेगा वही यहाँ कहते हैं— ३/३० में स्वयं को विभाग पूर्वक अनात्मा से भिन्न देखता है, ४/३५ में संपूर्ण प्राणियों अर्थात चेतन जगत को अपने में देखते हुए मुझमें देखता है । अब जबकि ब्रह्मसंस्पर्श ६/२८ हो चुका है तब मुझसे अभिन्नभावापन्न होकर मेरे रूप में ही स्वयं की सत्ता मिटाकर सर्वत्र का मतलब ब्रह्मा से लेकर स्तंब पर्यंत जड़, चेतन, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे, इधर-उधर अशेष रूप से सर्वत्र सबमें मुझको और सबको मुझमें देखता है ।
जैसे नदियां समुद्र का स्पर्श करते ही होकर सर्वत्र परिपूर्ण समुद्र को ही देखती हैं वैसे ही अभिन्नभावापन्न योगी स्वयं के रूप में नहीं बल्कि वासुदेवः सर्वम् ७/१९ के रूप में देखता है । श्रीभगवान कहते हैं कि ऐसा अभिन्नता को प्राप्त योगी न कभी मुझसे अदृश्य होता है और न ही मैं उससे अदृश्य होता हूँ । भला ऐसा हो भी क्यों न.....!!!!! क्योंकि ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्’ ७/१८ ज्ञानी तो परमात्मा का आत्मा है । भला आत्मा भी कभी अदृश्य होता है ? ब्रह्म सबका आधार है, संपूर्ण जड़ चेतन जगत आधेय है, ऐसा आत्मैक्यता को प्राप्त महानतम ब्रह्मवित्तम योगी ही ब्रह्म का आधार और ब्रह्म आधेय है । अगर कहीं प्रत्यक्ष ब्रह्म का दर्शन करना है तो ऐसे ब्रह्मवित्तम का दर्शन करना चाहिए । ब्रह्मवित्तम न हो तो ब्रह्म के रहने का कोई स्थान नहीं । ब्रह्मवित्तम के बिना ब्रह्म कौन है ? कैसा है ? कहाँ रहता है ? यह कैसे जाना जा सकता है ? ब्रह्म ब्रह्मवित्तम में आधार आधेय कौन है ? यह भी कहना नहीं बनता । इस प्रकार ‘त्वम्’ पदार्थ के परिपक्व होने पर तत् पदार्थ की व्यापकता और एकता का स्वतः अनुभव होना ही परस्पर एक दूसरे से अदृश्य न होना है ।
अथवा इससे पूर्व श्लोक में सबमें स्वयं को और सबको स्वयं में देखने को कहा और यहाँ पर सबको में ईश्वर में और ईश्वर को सबमें देखने की बात कहते हैं । पूर्व श्लोक में समदर्शन की बात कही ‘समत्वं योग उच्यते’ २/४८ अर्थात यदि समदर्शन नहीं हुआ तो समझो योग सिद्ध नहीं हुआ और सम दर्शन होने पर समत्व का लक्षण है ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ ५/१९ अर्थात समत्व दर्शन का अर्थ निर्विकार ब्रह्म में प्रतिष्ठा है । इसी प्रकार ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ २/५५ अर्थात आत्मा में स्थित होने के साथ ही ‘युक्त आसीत मत्परः’ २/६१ अर्थात मुझसे अभिन्न होकर बैठे अर्थात शान्त हो जाये कहा । इसी प्रकार ‘गुणकर्मविभागयोः’ ३/२८ अर्थात प्रकृति का ज्ञान करते हुए आत्मा में स्थित होने के लिए कहते हुए बीच में ‘मयि सर्वाणि कर्माणि’ ३/३० अर्थात सभी कर्म आध्यात्मिक बुद्धि से मुझमें त्यागकर । ‘तमेव शरणं गच्छ’ १८/६२ अर्थात उस परमेश्वर की शरण में सर्वप्रकार से जा । ‘मामेकं शरणं ब्रज’ १८/६६ अर्थात एकमात्र मेरी शरण में आ जा । इसके अतिरिक्त और भी बहुत जगह पर यह परस्पर विरोधी वाक्य अविवेक दशा में दिखने वाले हैं हैं किन्तु ‘पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः’ १५/१० अर्थात इस रहस्य को तत् और त्वम् पदार्थ का ज्ञान रखने वाले तत्त्वदर्शी भलीभांति जानते हैं । यहाँ के दोनो श्लोकों का दर्शन अध्याय ४ मे करते हैं― ‘येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि’ ४/३५ अर्थात जिसे जानकर पुनः मोह को प्राप्त नहीं होगा एवं संपूर्ण प्राणियों को पहले अपने में और फिर मुझमें देखेगा । ठीक यही व्याख्या यहां के पूर्व लोक के साथ येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मनि की व्याख्या और अथो मयि की इसी श्लोक के साथ स्पष्ट तत् और त्वं पदार्थ की अभिन्न व्याख्या की गई है ।
ये सभी प्रमाण इस बात को स्पष्ट करते हैं कि जो भी गीता में भेद दर्शन करते हैं वे भारतीय दर्शनशास्त्र में अभी नवजात शिशु हैं । हमें ऐसे शिशुओं की बातों की उपेक्षा करके ही अपना कार्य करना चाहिए । गीता आत्मा से भिन्न किसी अन्य ईश्वर को नहीं मानती, यही गीता का “एकमेवाद्वितीयम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म, वासुदेवः सर्वं” आदि श्रुति-स्मृति प्रतिपादित गीता का सिद्धांत है । जो कहीं भी ईश्वर या परमात्मा शब्द से वर्णन किया गया है वह मात्र व्यावहारिक और लक्ष्य तक अपने अपने अधिकार के अनुसार पहुंचने का मार्गदर्शन मात्र है । बल्कि गीता में परमात्मा, ईश्वर, और विराट को भी जीव कोटि में अध्याय १३,१४,१५ में उपाधि के कारण माना गया है । जिसे ब्रह्म नाम से अस्ति मात्र का लक्ष्य कराया गया है वही निर्विशेष केवलाद्वैत परमतत्त्व है उसी का इन दोनो श्लोकों में प्रतिपादन किया गया है और अगले दो श्लोकों में भी किया जायेगा ॥३०॥
संबंध— एकत्व भावापन्न की स्थिति का कथन……
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६/३१॥
शब्दार्थ— जो संपूर्ण प्राणियों में एकत्व भाव से संपूर्ण प्राणियों को मुझमें देखयता है वह योगी वर्तमान शरीर में भी मुझमें ही सारे व्यवहार करता है ।
तात्पर्यार्थ— संपूर्ण प्राणियों में एक मैं ही स्थित हूँ ऐसा जो भजन अर्थात चिंतन करता है । यहाँ ध्यान देने की बात है कि द्वैतवादी इस एकत्व को पति-पत्नी की तरह मानते हैं । लेकिन वे भूल जाते हैं कि पति-पत्नी शरीरधारी हैं जिससे अशरीरी की तुलना नहीं की जा सकता है । जबकि त्वम् पदार्थ का वाच्यार्थ जीव ही लक्ष्यार्थ आत्मा है और तत् पदार्थ का वच्यार्थ ईश्वर/विराट ही लक्ष्यार्थ सबका आत्मा है । अर्थात अशरीरी आत्मा के साथ अशरीरी आत्मा का एकत्व पति-पत्नी की तरह भिन्न कैसे हो सकता है ? अभिन्न क्यों नहीं ? दूसरी बात पत्नी कितनी भी पतिब्रता हो तथापि पत्नी की अपनी सत्ता और पति की अपनी सत्ता अलग होती ही है । जबकि त्वम् पदार्थ का तत् पदार्थ में लय हो जाने मात्र से त्वं पदार्थ की सत्ता ही समाप्त हो जाती है, ऐसी स्थिति में पति-पत्नी का दृष्टान्त असमीचीन है ।
हां ! यहाँ एक उदाहरण उचित दिखता है, वह है समुद्र का, जिसका उदाहरण स्वयं श्रीभगवान ने २/४६ एवं २/७० में दिया है । ज्ञानी जिसका अभी शरीरपात नहीं हुआ है किन्तु तत् पदार्थ में एकत्व की अनुभूति कर ली है वह जैसे नदी समुद्र का स्पर्श पाते ही नदीत्व को भूलकर समुद्रभावापन्न् हो जाती है है । समुद्र से भिन्न दिखने पर भी वह स्वयं को कभी नदी नहीं मान पाती, वैसे ही ज्ञानी का ब्रह्मसंस्पर्श ६/२८ होते ही वह शरीर में स्थित होते हुए भी ब्रह्म ही हो जाता है । जैसे श्रीविग्रह के नाखून,बाल, वस्त्र, कुण्डल आदि जड़ दिखने पर भी जड़ न होकर दिव्य हैं । लीला भी दिव्य है । जड़ भाव या लीला में मानवी भाव आना पतन का हेतु है, वैसे ही ऐसे ब्रह्मवित्तम का खाना, पीना, सोना, जागना पश्यञ्श्रृण्वन् ५/८-९ आदि सब ब्रह्म रूप ही है । तथापि यह सब वही जान सकता है जो उस स्थिति को प्राप्त कर चुका है । ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम् के अनुसार भी पति-पत्नी का उदाहरण असमीचीन है । क्योंकि आत्मा स्व से भिन्न नहीं होती । अगर कहो कि आन्तर्भाव को लेकर कहा गया है तो भी सूक्ष्म शरीर द्वारा भिन्न भिन्न गति का शास्त्रों द्वारा वर्णन सुना जाता है । जबकि श्रुति प्रमाणित जीव-ब्रह्म अभिन्न हैं । जीवो ब्रह्मैवनापरः ।
प्रस्तुत श्लोक की व्याख्या में पूर्वपक्ष एकत्वमास्थितः का अर्थ ब्रह्म साक्षात्कार करने के कारण आत्मा को ब्रह्म के समान माना है अभिन्न नहीं । इससे पूर्व के श्लोक में भी आत्मा को अभिन्न न मानकर ब्रह्म के समान माना है । अब प्रश्न उठता की शांकरी परंपरा के विरुद्ध नया संप्रदाय चलाने वाले इन आचार्यों ने क्या गीता पढ़ा भी था या भाष्य लिखकर लोगों में एक अनन्त काल तक चलने वाला भ्रम ही पैदा कर दिया । अब देखिये इन केवलाद्वैत के विरोधी आचार्य ने क्या लिखा स्वयं देखें और आगे भगवती गीता क्या कहती है यह देखिए— ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव’ ११/४३ यहां मैं नहीं स्वयं गीता के मुमुक्षु अर्जुन कह रहे हैं… आपके समान कोई भी नहीं है तो फिर आपसे अधिक कोई कैसे हो सकता है ? इतना ही नहीं आप तीनों लोकों में अप्रतिम प्रभाव वाले हो अर्थात आपके प्रभाव से किसी की तुलना नहीं की जा सकती है । इस बात से स्वयं ही द्वैतसंप्रदायाचार्यों का खंडन हो जाता है, अन्य किसी को खंडन की क्या आवश्यता ? तथापि अनुमान लगाया जा सकता है कि इनका उपनिषद और ब्रह्मसूत्र का भाष्य कैसा होगा जब गीता का भाष्य ऐसा है । शास्त्रों के मूलभाव को नष्ट करने वालों ने तो श्रुतियों और शास्त्रों पर भी कठोर प्रहार करने से परहेज नहीं किया, कितना दुर्भाग्य है इस भारतीय संस्कृति का कि लोग इतने मूढ़ हो गये कि बिना सोच विचार किये आज भी उनके पीछे लगे हैं । अर्थात तमराज किल्विष का अंधेरा कायम रहेगा ।
इस प्रकार एकत्व ही जिसका लक्ष्य है ऐसा योगी एकत्व कुछ को प्राप्त करके सर्वथा शरीर होते हुए भी मेरा ही साक्षात् अभिन्न स्वरूप है और मेरे में ही सारा व्यवहार कर रहा है । कहने का भाव यह है कि जब मेरे से अभिन्न हो गया तो उसका अहं भाव नष्ट हो गया, अहं के अभाव में त्वं का नाश हो गया और त्वम् के नाश होने पर असि जो सर्वथा वर्तमान देश, काल वस्तु से अबाधित, किन्तु देश, काल, वस्तु को भी व्यापकता करके इसी शरीर में असि नामक सत्ता को प्राप्त हो गया है । इसी प्रकार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के ‘अहं’ और ब्रह्म नामक उपाधि का नाश होने पर ‘अस्मि’ नामक सत्ता में वह समत्वदर्शी योगी सर्वथा अर्थात शरीर रहते और शरीर पात बाद भी सर्वथा स्थित है । अ.१३/२२ में पुरुष की व्याख्या करने के बाद इस श्लोक के उत्तरार्ध की व्याख्या— ‘सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते’ १३/२३ में करते हुए पुनः जन्म न लेने अर्थात एकत्व प्राप्ति से मोक्ष की प्राप्ति का कथन है जिसे वहीं कहा जायेगा ।
संक्षेप में यहाँ पर अपरिच्छिन्न देखने का अर्थ यह नहीं है कि सबमें तो परमेश्वर देखे और स्वयं को परमेश्वर से भिन्न देखे । संपूर्ण जगत के प्राणियों सहित स्वयं को भी परमेश्वर से अभिन्न देखे कि मैं सीमित अहंता वाला देवदत्त नहीं हूँ बल्कि व्यापक अहंता वाला सबका आत्मा परम तत्त्व हूँ । यह सब, मैं और वह ये सब मैं ही हूँ और मैं ही वह है । ऐसा अपरिच्छिन्न भाव में स्थित योगी का सभी व्यवहार परमेश्वर में ही जीते जी होने का मतलब वह जीवन रहते ही मुक्त हो गया है, वह सद्यः मुक्त है ॥३१॥
संबंध— अध्याय ६/२९ से लेकर ६/३१ तक त्वम् पदार्थ का तत् पदर्थ के साथ एकत्व करके अब समभाव का उपमा द्वारा वर्णन……
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६/३२॥
शब्दार्थ— हे अर्जुन ! जो अपनी उपमा से सर्वत्र बाहर भीतर समरूप देखता है एवं सुख एवं दुःख को भी समान देखता है । वही परम योगी है, ऐसा मेरा मत है ।
तात्पर्यार्थ— प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि जब पूर्वोक्त प्रकार से योगी जब अभ्यास में परिपक्व हो जाता है, जिससे वासना का क्षय हो जाता है । व्यष्टि शरीर में जैसे विभिन्न अंग मिलकर शरीर होता है भिन्न भिन्न व्यवहार होकर भी सबके प्रति सम भाव होता है उन उन अंगो के सुखी दुःखी होने पर हम सुखी दुःखी होते हैं, वैसे संपूर्ण जगत समष्टि आत्मा का शरीर है और उसमें सुखी-दुःखी होने वाला प्रत्येक आत्मा अर्थात जीव के रूप में समष्टि आत्मा ही उन उन रूपों में सुखी दुःखी हो रही है, और वह समष्टि आत्मा मैं हूँ । अर्थात् जब दूसरे का सुख-दुःख ही अपना सुख-दुःख बन जाये । अथवा सुख दुःख प्रकृति के आगमापयी धर्म हैं, मैं उनसे निर्लिप्त व्यापक आत्मा हूँ ।
अथवा शरीर के भिन्न भिन्न अंग और भिन्न भिन्न कार्य होने पर भी सभी अंगों को मिलाकर उनके साथ वैसा ही व्यवहार करते हुए भी एक ही शरीर का भाव रहता है । वैसे ही उस विराट का संसार की विविधता ही शरीर हैं और उसमें चेतना या क्रिया शक्ति का जिस प्रकाश में स्फुरण होता है वह प्रकाश सबमें बराबर एक ही है ऐसा जो समझते हुए व्यवहार करता है कि किसी को कष्ट न हो, अगर किसी को भी कष्ट या भय हुआ तो परमेश्वर का हनन होगा ऐसा व्यवहार करने में व्यक्तिगत रूप से भले सुख हो या दुःख हर परिस्थिति में सम रहने वाला ही आत्मैक्य को प्राप्त करने वाला योगी है ऐसा भगवान का मत है ।
संक्षेप में— शरीर में नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं से युक्त भिन्न-भिन्न अंग-प्रत्यंग और उनमें होने वाले सुख-दुःख में एक मात्र अहं बुद्धि के कारण उनके सुख-दुःख में आत्म तादात्म्य के कारण स्वयं में मानते हैं, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकृति, आकृति स्वभाव वाले प्राणियों में में व्याप्त एक आत्मा को जिस समय समान रूप से देखता है वह परम श्रेष्ठ योगी है ऐसा भगवान का मत है । अर्थात स्व से अभिन्न देखने वाला अपरिच्छिन्न भावापन्न ही योगी है अन्य नहीं ॥३२॥
समीक्षा― श्लोक १० में निरंतर ऐकान्तिक आत्मानुसंधान के लिए कहने के पश्चात मुमुक्षु के साधनों पर प्रकाश डालते हुए पवित्र देश, एकान्त, निरंतर समाहित चित्त होकर परमेश्वर में बैठकर यानी परमेश्वर से अभिन्न होकर स्थित हो जाने पर सदैव मन पर अनुशासन करते हुए आत्मा का अनुसंधान करते हुए परमेश्वर से अभिन्न परम् शान्त निर्वाण पद को को प्राप्त करता है यह बताया, किन्तु यह योग सिद्ध कैसे होगा इसके लिए आहार, बिहार, सोना, जागना इत्यादि चेष्टाओं के संयम पर भी प्रकाश डाला गया है ताकि योग में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो अन्यथा उचित क्रिया के अभाव में शरीर नाना प्रकार की व्याधियों से पीड़ित होकर योग का बाधक बन जाता है ।
जब मन आत्मा में भलीभांति प्रतिष्ठित हो जाता है तभी सभी कामनाओं की इच्छा समाप्त हो जाती है अर्थात सुने गये और सुने जाने वाले सभी शरीर के संबंध से प्राप्त होने वाले दुःख के हेतु सुखों से वैराग्य हो जाता है । तब वह स्पंदन रहित वायु के स्थान में रखे दीपक की लौ भांति अविचल आत्मा में स्थित होकर निर्विकल्प दशा में स्वयं को स्वयं में स्वयं ही देखता है अर्थात स्वयं से भिन्न कुछ भी नहीं देखता । जब समाधि से उपराम होता है तब भी स्वयं को स्वयं में ही देखकर संतुष्ट होता है कि हम जो पहले समझते थे उससे भिन्न ही सब कुछ निकला यह आश्चर्य करता हुआ स्वयं से भिन्न विचार न करना ही स्वयं से स्वयं में संतुष्ट होना है ।
यह आत्यंतिक सुख इन्द्रियों के द्वारा अग्राह्य किन्तु विवेकवती बुद्धि के द्वारा ही अभिन्न रूप से ग्रहण होता है, जिसे प्राप्त करके और कुछ भी प्राप्त करना आत्मा की प्राप्ति से बढकर न तो मानता है और न ही विचलित होता है । यह आत्मविद्या चंचलता का त्याग करके अनुष्ठान करने से जन्म मरण रूप दुःख के कारण काम का ही नाश कर देता है अतः बिना उकताए धैर्यपूर्वक धीरे धीरे मन को आत्मा में स्थित करके काम की जड़ संकल्प का ही त्याग कर देना चाहिए । फिर भी यदि मन बीच में पूर्व आसक्ति के कारण कहीं भागता है तो वहीं वहीं आत्म तत्त्व का दर्शन करके अनुशासित करते हुए निर्विकार ब्रह्म के आत्यंतिक सुख अनुभव करते हुए सुख पूर्वक बिना किसी बाधा के आत्मस्वरूप ब्राह्मी सुख को प्राप्त करता है ।
संपूर्ण प्राणियों को अपने में और अपने को संपूर्ण प्रणियों में देखता हुआ मेरे साथ एकीभाव को प्राप्त हुआ मेरा आत्मरूप ७/१८ मेरे लिए और मैं उसके लिए अत्यंत प्रिय होने के कारण ७/१७ कभी एक दूसरे से अदृश्य नहीं होते । इसी प्रकार सभी प्राणियों में अपनी ही आत्मा को और सभी प्राणियों को अपने में शरीर की दृष्टि से देखने वाला सर्वथा मुझमें ही सभी क्रियाओं को सुख दुःख की परवाह किये बिना जो आत्मभाव में स्थित है वही भगवान के मत में योगी है, अन्य नहीं ॥११-३२॥
संबंध— पूर्वोक्त शनैः शनैः से लेकर आत्मौपम्येन तक योगी का लक्षण एवं साधन सुनकर अर्जुन को वह कार्य अत्यंत कठिन लगा, अतः जिज्ञासा पूर्वक पूछता है....
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसून ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्तिथिं स्थिराम् ॥६/३३॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले― हे मधुसून ! आपके द्वारा यह जो समत्व योग कहा गया है मन की चञ्चलता के कारण इस योग की स्थिरता नहीं देखता ।
तात्पर्यार्थ— अर्जुन योग में मन की चञ्चलता को बाधक बताते हैं । यह मन चञ्चल वासनाओं में आसक्ति के कारण होता है । समत्वंयोग उच्यते २/४८, सुहृन्मित्रार्युदासीन ६/९, आत्मौपम्येन ६/३२ ये सभी समता मूलक श्लोक हैं ॥३२॥
संबंध— मन के स्थिर न होने का कारण बताते हैं……
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढ़म् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥६/३४॥
शब्दार्थ— हे कृष्ण ! मन चञ्चल, बलवान और दृढ़ निश्चयी एवं इद्रियों को मथ डालने वाला है । मैं तो इसका निग्रह करना वायु के समान दुष्कर मानता हूँ ।
तात्पर्यार्थ— ‘इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः’ २/६० इन्द्रियों का प्रमथनशील होना श्रीभगवान ने भी माना है, यदि विपरीत बुद्धि हो जाये तो साक्षात् ब्रह्म ही सामने क्यों न, मन सहित इन्द्रियां किसी की भी नहीं सुनतीं ‘यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः’ २/६१ । यद्यपि श्रीभगवान इसका समाधान स्वयं ही पहले कर चुके हैं तथापि अर्जुन अर्थात जिज्ञासु अधिकार की कमी होने से जब तक समाधान न हो जाये तब तक बारंबार पूछता ही है । अतः पूछते हैं कि भले वायु को रोक लिया जाये किन्तु मन अत्यंक बलवान और विषयों के प्रति चञ्चलता होने के कारण इन्द्रियों को मथ डालता अर्थात उन उन विषयों को ग्रहण करने के लिए बाध्य कर देता है । डरकर इन्द्रियां विषयों को ग्रहण करके मन को दे देती हैं । मन दृढ़ निश्चयी होने के कारण एक बार विचलित हुआ तो फिर किसी की नहीं सुनता । अर्थात इसका भी कोई उपाय है ? ऐसा भाव है ॥३४॥
संबंध— श्रीभगवान का उत्तर…
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥६/३५॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― हे महाबाहो ! इसमें संशय नहीं है कि मन चञ्चल और दुर्निग्रह है तथापि हे कौन्तेय ! उसका वैराग्य द्वारा निग्रह किया जा सकता है ।
तात्पर्यार्थ— जब किसी का मन अधिक भ्रमित होकर किसी की बात न माने तो उसी की बात मानकर किन्तु, परन्तु, लेकिन से समझाना चाहिए । अर्जुन ने कहा मन बलवान और दृढ़निश्चयी है तो श्रीभगवान ने भी कहा हां है लेकिन तुम भी तो बलवान और महाबाहु हो । बाह्य शत्रुओं को जीतने से कोई महाबाहु नहीं हो जाता । आन्तरिक शत्रुओं पर विजय पाने वाला ही महाबहु होता है । तुमने जो कहा कि ये मन दृढ़ निश्चय वाला है तो इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे बाह्य विषयों का अभ्यास होने से इन्द्रियों को मथ डालता है वैसे ही आन्तरिक अनन्द प्राप्त होने पर आनन्तरिक दृढ़ होगा और चञ्चलता से रहित भी हो जायेगा । इसमें असंशयं अर्थात संशय के लिए जगह ही कहाँ ? तुम तो कुन्तीपुत्र हो, कुन्ती को देखो एक राजकन्या होकर भी कैसे अभ्यास करके इन्द्रियों और मन पर विजय प्राप्त करके तपस्विनी बन गई है…? वैसे ही तुम भी वेदन्त के तात्पर्य को, जो गुरुजनों से सुना है उसका अभ्यास करते हुए विषयों में दोषदृष्टि करके वैराग्य प्राप्त करो क्योंकि बिना वैराग्य के श्रुत का मनन और निदिध्यासन कठिन है । वैराग्य मोक्ष की तीव्र इच्छा से ही दृढ़ होता है । जब वैराग्य दृढ़ होगा तभी विवेक अर्थात नीरक्षीर विवेक, आत्मा-अनात्मा का निर्णय कर सकेगा । आत्मा-अनात्मा का निर्णय होने पर ही दृढ़तापूर्वक संसार से उपरति होगी । तभी अन्तःकरण चतुष्टय अर्थात विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति (शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा एवं समाधान), और मुमुक्षा परिपुष्ट होंगे । योगानुसार यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार परिपुष्ट होकर निदिध्यासन रूप समाधि के लिए श्रवण, मनन के द्वारा मन का निग्रह कर सकता है ।
भावार्थ— अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन को रोकने की बात कही है अर्थात हमारा मन विषयी है अतः हमें विषयों से वैराग्य हो इसके लिए साधन चतुष्टय का आश्रय लेकर अभ्यास करना होगा, जब वैराग्य निर्वेद को प्राप्त हो जाये अर्थात वैराग्य की चरमसीमा संपूर्ण अनात्म पदार्थ से वैराग्य हो जाये, मात्र आत्मपद के अतिरिक्त कुछ भी शेष न बचे ऐसा वैराग्य निर्वेद कहलाता है । ऐसा जब वैराग्य हो जाये तब मन को नियंत्रित किया जा सकता है ॥३४॥
संबंध— और भी…
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥६/३६॥
शब्दार्थ— असंयत मन से योग दुष्प्राप्य है, ऐसा मेरा भी भत है । तथापि वश में किये हुए मन के द्वारा उपाय पूर्वक प्रयत्न करने पर प्राप्त किया जा सकता है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ पर प्रथम आत्मा का अर्थ विवेक किया है कारण कि योग प्राप्ति में बुद्धि का एकनिष्ठ होना अत्यावश्यक है ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह’ २/४१ जबकि ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते’ २/४४ यहाँ पर व्यवसायात्मिका में ‛अ’ का लोप विद्वानों ने माना है । ‘अ’ के सहित अव्यवसायात्मिका हो जायेगा जैसा कि २/४१ में है अर्थात चंचल बुद्धि आत्मा अनात्मा का विचार कभी नहीं कर सकती है बिना विचार के निश्चय नहीं होगा और बिना निश्चय के मन न स्थिर होगा और न वश में, किन्तु जो मुमुक्षु सर्वकर्म संन्यासी श्रुति एवं आचार्य के मार्गदर्शन में साधन चतुष्टय संपन्न होकर आत्मा अनात्मा का नीरक्षीर न्याय से विवेक करके एकमात्र आत्मा में ही एकनिष्ठ हो जाता है वह मन को वश में करने वाला ही इस समत्व रूप योग को प्राप्त करने में समर्थ होता है ।
यहां पर विद्वानों ने ‘शक्यः’ का अर्थ सकना यानी सामर्थ्य में किया है अर्थात वह समत्व को प्राप्त कर सकता है । ‛सकता है’ यह वाक्य संशय ग्रस्त है हो भी सकता है और नहीं भी, किन्तु यह अर्थ सकना के स्थान पर समर्थ कर देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि जो भगवान की वाणी का अक्षरशः क्रमशः पालन करता है वह समत्वयोग को बलपूर्वक या पुरुषार्थ से प्राप्त कर ही लेता है । अतः यही आधार मानकर हमने शक्यः का अर्थ समर्थ किया है
भावार्थ— यम, नियम आदि से जिसका मन वशीभूत नहीं है, ऐसा व्यक्ति विषयों में रागादि को महत्व देता है इससे कभी योग को प्राप्त नहीं हो सकता, तथापि जिसने अन्तःकरण चतुष्टय संपन्न होकर है प्राप्त कर लिया है वही निरंतर अभ्यास द्वारा विभिन्न उपाय करके येनकेन प्रकारेण योग को प्राप्त कर ही लेता है ॥३६॥
संबंध— श्रीभगवान ने बताया अजितेन्द्रिय और प्रयत्न रहित को योग अर्थात समत्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं होता । इस पर अर्जुन पुनः जिज्ञासा करते हैं……
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलित मानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गति कृष्ण गच्छति ॥६/३७॥
शब्दार्थ— अर्जुन बोले― हे कृष्ण ! जिसकी ब्रह्मतत्त्व में श्रद्धा है तथापि उचित प्रयत्न न करने के कारण जिसका मन विचलित हो गया है, ऐसा योगी ब्रह्म साक्षात्कार को प्राप्त न होने के कारण किस गति को प्राप्त करता है ?
तात्पर्यार्थ—यहाँ पर विद्वानों के बहुत शास्त्रार्थ हैं तथापि सर्वसामान्य बात समझ लेना चाहिए कि ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए श्रद्धा तो है तथापि शरीर या मन अपने आधीन न होने के कारण प्रारबधवश, रोग आदि के कारण शरीर असक्त है और उचित प्रयत्न नहीं कर सका जिससे ब्रह्मसाक्षात्कार हो सके, साथ ही सन्न्यास के कारण यज्ञादिक देवाराधन भी नहीं किया, ऐसी स्थिति में मृत्यु होने पर क्या गति होगी ? अर्थात आत्म साक्षात्कार न होने से मोक्ष होगा नहीं और यज्ञादिक देवाराधन न करने से पुण्य की कमी के कारण स्वर्गादि की प्राप्ति होगी नहीं, ऐसी स्थिति में उसकी क्या गति होगी ?
यहां पर मूल अयतिः शब्द है जिसका अर्थ विद्वानों ने प्रयत्न की शिथिलता किया है तथापि वास्तव में अर्थ अजितेन्द्रियता है ‘यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः १५/११ यहां पर भगवान ने ही स्पष्ट कर दिया है कि कितना भी प्रयत्नशील क्यों न हो किन्तु जो जितेन्द्रिय नहीं है वह उस परमतत्त्व आत्मा को देख नहीं सकता अर्थात आत्मस्वरूप को जान नहीं सकता अतः ‛अयतिः’ का अर्थ अजितेन्द्रिय ही होगा । इन्द्रियों पर विजय प्राप्त नहीं किया बलात् सर्वकर्मसंन्यासी हो गया है, अतः इसी दंभ के चलते मन की आन्तरिक विषयासक्ति के कारण अंत में पतन हो गया । यह अर्थ अध्याय ३/६ के आधार पर समझना चाहिए ॥३७॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो हि महाबाहो विमूढ़ो ब्रह्मणः पथि ॥६/३८॥
शब्दार्थ— संसार का त्याग करने वाला परमार्थ मार्ग से मोहित अर्थात भ्रष्ट हुआ योगी दोनो ओर से अर्थात संन्यास के कारण संसार से और आत्मसाक्षात्कार न होने स्वर्गादि लोकों से वञ्चित होकर कहीं बादलों की तरह से नष्ट तो नहीं हो जाता ?
तात्पर्यार्थ— ज्ञानमार्ग से मोहित अर्थात अव्यक्तनिर्विशेष ब्रह्म की उपासना में आसक्त होने के कारण उसने स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति के लिए सकाम कर्म किया नहीं अतः वे लोक भी उसे मिलने नहीं और ज्ञान मार्ग के फलस्वरूप ब्रह्म में भी भलीभांति स्थिर न हो पाने के कारण कहीं वह दोनो यानी कर्म मार्ग और ज्ञानमार्ग के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धि स्वर्ग लोक या आत्मप्रतिष्ठा में से किसी को भी न पाकर नष्ट तो नहीं हो जाता है ।
यहाँ बादलों का उदाहरण इस लिए दिया गया है, बादलों से अलग हुआ एक टुकड़ा वायु प्रवाह के वेग के कारण अपने अगले और पिछले किसी समूह में बिना मिले बीच में ही छिन्न भिन्न हो कर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार का यहां उभय भ्रष्ट समझना चाहिए ॥३८॥
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्ततुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥६/३९॥
शब्दार्थ— हे कृष्ण ! मेरे इन संशयों का अशेष रूप से नाश करो, क्योंकि आपके अतिरिक्त और कोई भी इस संशय का नाश करने में समर्थ नहीं है ।
तात्पर्यार्थ— श्रीकृष्ण साक्षात् परमात्मा हैं । परामात्मा से ही सर्वज्ञान होता है अतः सर्वज्ञान के श्रोत परत्मात्मा के अतिरिक्त और कौन संशय का निवारण कर सकता है ? इसलिए अर्जुन कहता है कि संशय का लेश भी न बचे ऐसा अशेष संशय का नाश करने वाला आपके अतिरिक्त मुझे और कोई नहीं दिखता, अतः आप ही मेरे संशय का निवारण करें ।
अथवा संपूर्ण ज्ञान तो स्वयं परमेश्वर हैं अतः उनकी अचिन्यशक्ति के फलस्वरूप ही अन्य भी आत्मा-अनात्मा के संशय का निवारण करते हैं और वे ही परमेश्वर स्वयं कृष्ण रूप में सामने उपस्थित हैं तो और किसी के द्वारा संशय का निवारण हो भी नहीं सकता है अतः आप ही निवारण करें ॥३९॥
संबंध— श्रीभगवान अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर यहाँ से लेकर अध्याय समाप्ति पर्यंत देते हैं……
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥६/४०॥
शब्दार्थ— श्रीभगवान बोले― हे पार्थ ! उसका न ही इस लोक में और न ही उस लोक में विनाश होता है, क्योंकि हे तात ! कल्याण कर्म करने वाले का कभी नाश नहीं होता ।
तात्पर्यार्थ— अर्जुन ने ३७वें ३८वें श्लोक में आशंका की थी कि संसार का अतिक्रमण करके अन्त में ब्रह्मसाक्षात्कार न करके विचलित मन वाले योगभ्रष्ट योगी की क्या गति होती है ? इसका उत्तर देते हुए श्रीभगवान कहते हैं कि उसका इस लोक और परलोक कहीं भी नाश नहीं होता क्योंकि हे तात ! तात कहते हैं पिता या गुरु की संतति या परंपरा को बढ़ाने वाले को ये व्याख्याकारों की व्याख्या है, मेरी दृष्टि में तो अत्यन्त प्रिय को तात कहते हैं, जिसने शास्त्रीय कर्म किया है वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता ।
अथवा कल्याणकारी कर्म जगत में आने के बाद एक ही होता है और वह है आत्मस्वरूप में स्थित होकर जन्म-मृत्यु रूप बंधन को काट देना । यहाँ पर विनाश का अर्थ भाष्यकार आचार्य शंकर ने नीच जाति में उत्पन्न होना ही किया है तथापि आचार्य जी से मैं अंशतः ही सहमत हूँ पूर्णतः नहीं, क्योंकि आचार्य जी स्वयं भी सदन कसाई सहित अन्य महाभारत में वर्णित ब्रह्म को प्राप्त होने वाले निम्न जातियों का वर्णन आता है जो जानते भी होंगे । कबीर की जहाँ जाति पर ही ग्रहण लग जाता है वहीं सूरदास के विषय में सुना है कि वे मुसलमान थे जो वेदबाह्य थे और भी बहुत हैं, विस्तार भय से संक्षिप्त ही इन पूर्व के योग भ्रष्टों के जन्म को भी समझ लेना चाहिए । ये सभी आप्त कामी थे, थोड़ा प्रकाश श्लोक ४२ में भी डालूंगा । यहाँ पर मेरा मानना है कि विनाश मानवेतर योनियों पड़कर पुनः चौरासी लाख योनियों का भ्रमण करना ही विनाश है । यह ज्ञानमार्ग में मोहित हुए के लिए नहीं होता । क्योंकि खेती आदि अन्य कर्म तो बड़ी बाधाओं वाले हैं कुछ भी करो किन्तु फसल का घर में आने तक संशय बना रहता है किन्तु इस आत्मयोगी के लिए ऐसा नहीं है ॥४०॥
संबंध— दुर्गति को प्राप्त नहीं होता तो क्या गति होती है……
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥६/४१॥
शब्दार्थ— योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करने वालों के लोकों को प्राप्त करके शाश्वत वर्षों तक वहां के भोग भोगकर पुनः पवित्रकुल में जन्म लेता है ।
तात्पर्यार्थ— योगभ्रष्ट भले निष्काम रहा तथापि शास्त्रीय कर्मों का फल तो होता ही है । अतः वह अश्वमेध, राजसूय आदि शास्त्रीय कर्म करने वाले के लोकों को शाश्वत वर्षों तक— यहाँ शाश्वत वर्षों से कुछ लोगों ने विष्णु के तीन दिन लिये हैं, जबकि ब्रह्मा की सौ वर्ष की आयु विष्णु का एक दिन होता है । शास्त्रीय ज्ञान न होने से यह बात समझ में नहीं आयी कि किस गणना से शाश्वत वर्ष से विष्णु के तीन वर्ष होते हैं और ऐसा योगी विष्णु लोक को ही प्राप्त होता है । श्रुतियों में योगी अर्थात ब्रह्म विद्या के उपासक जिनको परोक्ष ज्ञान हो गया है वे ब्रह्मा के साथ ही मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं, उनके जन्म का कोई औचित्य ही नहीं तथापि विचलित मन वाले योग भ्रष्ट ब्रह्मलोक, स्वर्ग लोक को प्राप्त होकर पुनर्जन्म की बात आती है । यह बात तो समझ में आती है । कुछ विद्वानों ने शाश्वत वर्ष का अर्थ अनन्त वर्ष किया है, तो जिन वर्षों का अन्त ही न हो तो जन्म कब लेगा ? अतः मेरी दृष्टिकोण में शाश्वत वर्ष का अर्थ अनिश्चत काल हो सकता है, क्योंकि किसने कितनी कठोर साधना की और फिर विचलित हुआ, और कितनी कम साधना में ही विचलित हुआ इसका प्राप्त पुण्य जन्म के समय में भेद कर सकता है । अतः मुझे यही अर्थ उचित लगा, बाकी शास्त्र और अनुभव सिद्ध महापुरुष जानें, मैं इन्हीं दोनों की शरण लेता हूँ ।
अथवा ‘शाश्वतीः समाः’ का अर्थ है बहुत अधिक दीर्घकाल तक, यहां पर पवित्र कुल और और लौकिक ऐश्वर्य अर्थात धन-धान्य सम्पन्न, समाज में प्रतिष्ठित कुल में योगभ्रष्ट का जन्म माना गया है । शास्त्रों में पवित्र कुल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही माने गये और शूद्रों को तो पापों का परिणाम माना गया है । अतः इन तीन कुलों में वैश्य लोभी रजोगुण प्रधान प्रकृति का होता है अतः धन होने पर भी ब्राह्मण और क्षत्रिय (राजा) के कुल, ऐश्वर्य और धन के सामने बिल्कुल नहीं टिकता । क्षत्रिय भी सत्त्व मिश्रित रजोगुण प्रधान है अतः यह भी कुल और ऐश्वर्य दृष्टि से ब्राह्मण के सामने नहीं टिकता । इस आधार पर जो स्वभाव से ही पवित्र और लौकिक एवं पारलौकिक ऐश्वर्य से संपन्न एवं कुल दृष्टि से भी यहाँ पर ब्राह्मण होने के ही अवसर अधिक हैं ।
इस प्रकार अनिश्चत काल के पश्चात किसी पवित्र दैवी संपत्ति से युक्त महापुरुष के घर में जन्म लेता है ॥४१॥
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥६/४२॥
शब्दार्थ— अथवा किसी ज्ञानवान के कुल में उत्पन्न होता है । ऐसा जन्म संसार में अत्यन्तं दुर्लभ है ।
तात्पर्यार्थ— ‘अथवा’ शब्द पूर्व में कहे गये योग भ्रष्ट योगी के जन्म संबंधित कथन से भिन्नता दिखाने के लिए है । भिन्नता यह है कि पूर्व में “शुचीनां श्रीमतां गेहे” कहा था जिसके अनुसार कुल भी पवित्र हो, लौकिक वैदिक अर्थात पारमार्थिक संपत्ति ज्ञानविज्ञान से भी युक्त हो, जबकि यहाँ पर कहा “योगिनां कुले धीमताम्” अर्थात वह लौकिक धन से रहित अर्थात दरिद्र किन्तु ज्ञानविज्ञान से युक्त है, जो आत्माराम है, आत्मा में ही रमण करने वाला है । ऐसा करोड़ों में कोई एकाध गृहस्थ होते हैं, उनके यहां वह योगी जन्म लेता है, क्योंकि लौकिक संपत्ति वाले श्रीमान के घर में जन्म लेने से लौकिक संपत्ति विघ्नकारी हो सकती है, जबकि दरिद्र कुल को कोई बाधा नहीं और जन्म लेते ही वैदिक संपत्ति ज्ञानविज्ञान पर अधिकार हो जायेगा । ऐसे जन्म को दुर्लतर बताया गया है, क्योंकि बड़े बड़े वितरागी जिस ज्ञानविज्ञान से मोहित हो जाते हैं उससे किसी गृहस्थ का युक्त होना दुर्लभतर ही है । ऐसे पवित्र कुल में जन्म लेने वाले योगी को इसीलिये दुर्लभतर बताया है ।
अथवा यहां पर किसी पवित्र कुल की भी बात नहीं की और किसी ऐश्वर्य की भी बात नहीं की । यहां पर यह भी नहीं कहा कि पुण्य करने वालों के लोक में जायेगा । इससे यह सिद्ध होता है कि पूर्व श्लोक में योगभ्रष्ट पहले बहुत ही सकाम कर्मों को करके अन्त में निष्काम भाव को प्राप्त हुआ किन्तु वे पूर्व के उसके पुण्य नष्ट नहीं हुए और आत्मभाव को भी प्राप्त नहीं हुआ और अन्त समय में प्रयत्न की शिथिलता के कारण पुनः उन कृत कर्मों का स्मरण हो आया और इसी समय शरीर छूट गया फलस्वरूप उन स्वर्गादि लोकों को प्राप्त करके पुण्य क्षीण होने पर शेष पुण्य का भोग भोगने उपरोक्त कुल में उत्पन्न होकर पुनः साधना करके निष्काम हुआ सभी कर्म और उसके फल को ज्ञानाग्नि में दग्ध करता हुआ परमतत्त्व को प्राप्त कर लेता है ।
अवथा कहकर उपरोक्त कथन से पूर्णतः विलक्षणता का वर्णन करते हैं कि जिसके सभी पुण्य जो स्वर्ग लोक को प्राप्त कराने वाले थे वे नष्ट हो गये अतः स्वर्ग तो मिलना नहीं, किन्तु आप्त कामी है, अतः पतन रूप मानवेतर अन्य योनियों में भी जाना नहीं है इसलिये जबकि उसकी संसार की आसक्ति समाप्त हो चुकी है तथापि आत्मा में भलीभांति प्रतिष्ठित नहीं हो पाया इस बीच में शेर, सांप, रोग आदि के कारण शरीर छूट गया तो वह कुल और ऐश्वर्य की अपेक्षा से भी रहित मात्र आत्मयोगी हो वह किसी भी कुल या जाति, वर्ण का हो अथवा निर्धन ही क्यों न हो उसके यहां जन्म लेता है । इस प्रकार का जो यह संसार में जन्म होता है वह दुर्लभ ही नहीं अत्यंत ही दुर्लभ है । ऐसे जन्म के लिए ही कृष्ण ने ‘मनुष्याणां सहस्रेषु’ ७/३ कहते हुए ‘वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः’ ७/१९ कहा है ॥४२॥
संबंध— इस प्रकार जन्म लेने वाला पुनः ज्ञान के लिए प्रयत्न करता है, इसका कथन……
तत्र तं बुद्धि संयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥६/४३॥
शब्दार्थ— हे कुरुनन्दन ! वहां पर उसको पूर्व शरीर के ज्ञान का संयोग प्राप्त हो जाता है, फिर पुनः प्रयत्न करके संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।
तात्पर्यार्थ— चूंकि पहले के जन्म के संस्कार उसमें हैं ही अतः योगी के कुल में जन्म लेने के कारण सहज ही उसके पूर्व जन्म के संस्कार और योगी के कुल संस्कार दोनो मिलकर बद्धि को ज्ञान योग की सिद्धि के लिए विवेक को जाग्रत कर देते हैं हैं यही बुद्धि का संयोग प्राप्त करना है । अथवा कोई पारिवारिक या सामाजिक ऐसी घटना घटे जायेगी जो मन को झकझोर कर रख देगी, फलस्वरूप वैराग्य हो जायेगा और वह पुनः अपनी अधूरी साधना की पूर्ति के लिए प्राणपर्यंत जितनी सामर्थ्य होगी उतना प्रयत्न पूर्वक सिद्धि अर्थात शान्तिस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करेगा ॥४३॥
संबंध— अब पवित्र कुल ऐश्वर्वान्-धनवान के घर में जन्म लेने वाले योगी के विषय में बता रहे हैं……
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥६/४४॥
शब्दार्थ— वह योगभ्रष्ट योगी पूर्वाभ्यास के कारण उसी योग की ओर ही परवश खींच लिया जाता है, जिज्ञासु अर्थात मोक्षार्थी होने के कारण सभी वैदिक सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है ।
तात्पर्यार्थ— यहाँ अवशः एवं ह्रियते अर्थात परवश और खींच लिया जाना, ये दोनो शब्द बता रहे हैं कि पूर्वश्लोक में कथित योगभ्रष्ट योगी जन्म से ही ज्ञानविज्ञान में तत्पर हो जाता है, किन्तु किसी पवित्र एवं धन संपत्ति वाले कुल में जन्म लिया हुआ पूर्व शरीर में भोगेच्छा को लेकर हुआ था । अतः वह धनवान कुल में जन्म लेकर भोगों मे लिप्त हो जाता है, तथापि शुभकर्म समय आने पर अपना काम करते ही हैं । अतः किसी योग संयोग के माध्यम से पूर्व शरीर में की गई योग साधना का उदय होता है और वह विवश करके, बलात्कार पूर्वक विवश करके उस योग— ज्ञानयोग की ओर खींच लिया जाता है । ऐसा होने पर वह मोक्ष का जिज्ञासु बनता है फिर योग अर्थात् ज्ञानयोग के द्वारा सभी सकाम शास्त्रीय कर्मों का भी उल्लंघन कर जाता है । अर्थात् सकाम कर्मों में नहीं फंसता ।
अथवा परवश का तात्पर्य यह है कि अधिक पुण्य हुआ तो स्वर्गादि जायेगा और अधिक पुण्य न हुआ तो तुरन्त जन्म लेकर उन पूर्व के संस्कारों का उदय होते ही अव्यक्त ब्रह्म की उपासना के लिए खींच लिया जाता है अर्थात स्वाभाविक प्रवृत्ति हो जाती है । दूसरी बात यदि पाप अधिक हुआ तो अजामिल आदि की तरह पहले तो पाप कर्म में प्रवृत्त होगा और पापों के क्षय होने पर वह फिर अव्यक्त की ओर स्वतः किसी घटना आदि के माध्यम से परवश खींच लिया जायेगा । यहां जिज्ञासु का अर्थात मुमुक्षु अर्थात सर्वकर्मसंन्यासी कहा गया है । चूंकि योग अर्थात निर्दोष निर्विशेष ब्रह्म प्राप्ति के निमित्त उसमें ब्रह्म जिज्ञासा के कारण-― यहाँ शब्द ब्रह्म कहिए― ‘यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः’ २/४२ में कहे गये सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है । इस प्रकार ये चार विकल्प योगभ्रष्ट योगी के पुनः योग में प्रतिष्ठित होने के बताए गये हैं ॥४४॥
संबंध— परवश योग की ओर खींच लिये जाने पर……
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥६/४५॥
शब्दार्थ— पुनः योगी प्रयत्न पूर्वक जिसके पुण्य-पाप रूप सारे किल्बिष नष्ट हो गये हैं अनेक जन्मों प्रयत्न से भलीभाँति ज्ञानयोग को प्राप्त करके फिर परम गति को प्राप्त करता है ।
तात्पर्यार्थ— ‘तु’ शब्द पूर्व के साथ संबंध स्थापित करता है, कि जब वह भ्रष्ट योगी पुनर्जन्म के पश्चात किसी विशिष्ट कारण से हृदय को ठेस पहुंचाकर संसार के प्रति मन में वैराग्य भरकर बलात्कार पूर्वक जब उस ज्ञानयोग की ओर खींच लिया जाता है और वह सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर मोक्ष का जिज्ञासु हो जाता है तब वह समत्वभाव में स्थित होना का इच्छुक अर्थात ज्ञानयोगी अनेक जन्मों में किये गये प्रयत्नों से किल्विषों अर्थात् पुण्य-पाप नामक विकारों से भलीभाँति शुद्ध होकर पहले से भी अधिक प्रयत्न करके— यहाँ प्रयत्नात्, यतमानः अर्थात प्रयत्न पूर्वक प्रयत्न करते हुए, यहाँ द्विरुक्ति जैसी प्रतीति होती है तथापि पूर्व जन्म में किये प्रयत्नों से भी अधिक प्रयत्न करने से द्विरुक्ति दोष नहीं आता, क्योंकि वह जानता है कि संसार बस ऐसा ही है, कोई सार नहीं, अतः आलस्य प्रमाद नहीं करता आत्यन्तिक परिश्रम पूर्वक यत्न करता हुआ भलीभाँति समत्वभाव को प्राप्त करके परा गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता है ।
अथवा प्रयत्नात् और यतमानः इन दो शब्दों का यद्यपि अर्थ एक जैसा दिख रहा है तो भी जो पहले अयतिः ६/३७ अर्थात प्रयत्न की शिथिलता कहा था उसी के लिए यहां यह कहना चाहते हैं कि इस जन्म में उसका प्रयत्न शिथिल नहीं होता वरन् जितनी उसमें सामर्थ्य है वह सब की सब योग साधना में ही लगा देता है अर्थात इस बार जितेन्द्रिय होकर लक्ष्य प्राप्त कर ही लेता है । आगे जो बहूनां जन्मनामन्ते ७/१९ कहेंगे वहीं यहां अनेक जन्म कहा है । संसिद्धि जो यहाँ पर कहा है वही ‘वासुदेवः सर्वम्’ ७/१९ कहेंगे । तात्पर्य यह है कि अनेक जन्मों के निरंतर अभ्यास से संपूर्ण पाप और उसके सहित पुण्यों का नाश हो जाने के पश्चात इस अन्तिम जन्म में योगी समत्वयोग नामक ज्ञान की सिद्धि प्राप्त करके स्व-स्वरूप नामक निर्विकार आत्मपद रूपी पद में प्रतिष्ठित होकर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का अनुभव करता हुआ परमपद को प्राप्त करता है । यही बात अध्याय ७/१९ में भी अन्तिम जन्म में वासुदेवः सर्वम् के माध्मय से कहेंगे ॥४५॥
संबंध— अब ज्ञानयोग की प्रशंसा करते हैं……
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥६/४६॥
शब्दार्थ— हे अर्जुन ! योगी कृच्छ्र चान्द्रायण आदि तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है, सकाम शास्त्रीय कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है, अतः तू योगी बन ।
तात्पर्यार्थ— कृच्छ्र चान्द्रायण, नाना प्रकार से सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि सहन करने मात्र से रिद्धि-सिद्धि या प्रायश्चित कर्म के लिए व्यक्तिगत हैं । अतः इसकी अपेक्षा ज्ञान अर्थात लोक कल्याण के लिए सकाम कर्मकांड संबंधित शास्त्रीय ज्ञान श्रेष्ठ है, क्योंकि वह व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों का कल्याण कर सकता है । ऐसे शास्त्र ज्ञानी की अपेक्षा सकाम अग्निहोत्र, अग्निष्टोमादि स्वर्गादि के निमित्त सकाम कर्म करने वाला श्रेष्ठ है । इन सभी कर्मों का अतिक्रमण करके समत्वयोग में स्थित ज्ञानयोगी ही श्रेष्ठ है, क्योंकि संपूर्ण यज्ञ, दान, तप आदि कर्मों का फल परमात्म प्राप्ति ही है । अतः हे अर्जुन ! तू योगी बन अर्थात समत्व रूप ब्रह्म में स्थित हो जा । ऐसा मेरा अर्थात् श्रीभगवान का विचार है ।
अथवा तपस्वी से सकाम चान्द्रायण, कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तप, ज्ञानी से मात्र शास्त्र ज्ञानी― वह चाहे जितनी सूक्ष्म व्याख्या करने वाला हो, एवं कर्मयोगी इन सभी से ज्ञानयोगी श्रेष्ठ है ऐसा भगवान का मत है । यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि तप का निषेध किया, शास्त्रीय ज्ञान का निषेध किया, कर्म का भी निषेध किया और योगी बनने के लिए कहते हैं ।
इससे यहाँ स्पष्ट अव्यक्त उपासक ज्ञानयोगी सर्वकर्मसंन्यासी का ही वर्णन किया गया है । योग की परिभाषा ‘समत्वं योग उच्यते’ २/४८ अर्थात योग का अर्थ समत्व किया है और समत्व का अर्थ ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ ५/१९ अर्थात निर्विकार ब्रह्म किया है । यहाँ योगी होने के लिए कहने का अर्थ है ‘तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः’ ५/१९ अर्थात यहाँ स्पष्ट ब्रह्म में स्थित यानी अभिन्न होकर स्थित होने के लिए अर्थात अहं ब्रह्मास्मि के अर्थभूत सत्ता पद में स्थित होने का आदेश दिया गया है ॥४६॥
संबंध— योगियों में भी जो अभिन्नभावापन्न श्रद्धावान् योगी है, उसकी प्रशंसा……
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥६/४७॥
शब्दार्थ— उन सभी योगियों में भी जिसका चित्त मुझमें लगा हुआ है, ऐसा श्रद्धावान मुझको भजने वाला युक्ततम है ऐसा मेरा मत है ।
तात्पर्यार्थ— श्रीभगवान ने कहा था— जिसको जानकर तू पुनः मोह को प्राप्त नहीं होगा एवं जिसके द्वारा संपूर्ण प्राणियों को पहले अपने में फिर मुझमें देखेगा ४/३५ जो सर्वत्र एवं सभी को आत्मरूप से मुझमें देखता है, चूंकि वह आत्मरूप हो जाता है इसलिए वह मुझसे और मैं उससे अदृश्य नहीं होता ६/३० क्योंकि ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम् ७/१८ अपना आत्मा कभी अपने से अदृश्य नहीं होता ।
अब यहाँ पर तीन बातें कहते हैं— पहली बात मद्गतेनान्तरात्मना अर्थात जिसका मन मुझमे चला गया है, ठीक वैसे ही जैसे पानी की बूंद समुद्र में चली जाये अर्थात अभिन्न हो जाये, वैसे ही जिसका अन्तःकरण चतुष्टय मुझसे से अभिन्नता को साधन चतुष्टय के द्वारा प्राप्त हो गया है । दूसरी बात— श्रद्धावान् अर्थात् जिसके अन्दर किसी भी प्रकार का संशय विपर्यय नहीं है । ऐसा परमात्मा में एक निष्ठ है । युक्ततम है अर्थात संशय-विपर्यय रहित होकर परमात्मा के साथ अन्तःकरण चतुष्टय को अभिन्न करके मुझसे युक्त अर्थात अभिन्न होकर मेरा भजन करता है अर्थात जानकर स्थित होता है । ऐसा वह योगी सर्वत्र समभावस्थ होकर मुझ सर्वाधार के रूप में सबको देखता है । अर्थात जैसे नदी के समुद्र से मिलने पर नदीत्व भाव समाप्त होकर स्वयं भी स्वयं को सभी नदियों का स्वामी समुद्र मानती है । त्वम् पदार्थ लक्ष्य आत्मा का तत् पदार्थ लक्ष्यार्थ ब्रह्म के साथ विलय हो जाने पर “वासुदेवः सर्वम् सर्वं वासुदेवः” के रूप में स्वयं को देखता है । ऐसा जो अभिन्न भावापन्न योगी है वही युक्ततम अर्थात सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा मेरा मत अर्थात निर्णय है ।
अथवा विशेष रूप से यह भी ध्यान रखना होगा कि इसके पहले योगी बनने को भी कहा है किन्तु वह आत्म स्थित अहंकार उत्पन्न करके परिच्छिन्न आत्म भाव में ही भ्रमित न हो जाये इसके लिए यहाँ मूल में आत्मा कहा गया है उस त्वम् पदार्थ को मत् आत्मप्रत्यय के साथ एक करके माम् यानी तत्पदार्थ के साथ एकत्व का लक्ष्य यहाँ निर्दिष्ट है । इस समझ को भी पक्षपात रहित होकर समझना आवश्यक है । यही समझ ज्ञान है और उसमें स्थित विज्ञान है जिसका वर्णन अब आगे अध्याय ७ से प्रारंभ होगा ।
वस्तुतः यहाँ पर कुछ विद्वानों द्वारा साकार विग्रह का निरूपण किया गया उसकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि अध्याय ११/५४ में भी अव्यक्त की उपासना की बात कहकर ११/५५ में सगुणोपासना की बात कहते हैं । इसी बात को लेकर अर्जुन द्वारा वहाँ अव्यक्त यानी निर्गुण निराकार एवं सगुण साकार के उपासकों में अधिक श्रेष्ठ कौन है पूछा गया है । वहाँ पर अर्जुन के प्रश्न और श्रीकृष्ण का साकार उपासक को श्रेष्ठ कहना एवं ‘क्लेषोऽधिकतरस्तेषां’ १२/५ से जिस अव्यक्त की प्राप्ति की दुर्लभता कहेंगे वह सभी प्रसंग यहाँ श्लोक ३३ से लेकर अध्याय समाप्ति पर्यंत उपस्थित हैं ।
अतः इसका अर्थ इस प्रकार भी कर लेना चाहिए उन समत्वदर्शी तत्त्ववेत्ताओं में भी जिसका मन मुझ साकार परमेश्वर से अभिन्न होकर आत्मरूप से श्रद्धापूर्वक एकनिष्ठ मेरा भजन करता है वह मेरे मत में श्रेष्ठ है ।
विशेष— ३/३५ एवं ६/३० में त्वम् पदार्थ का तत् पदार्थ के साथ विलय करके तत् पदार्थ के रूप में देखने को कहा था । उसी का यहाँ कथन करके उपसंहार करते हुए “अहं ब्रह्मास्मि” “अयमात्मा ब्रह्म” के भाव में ही प्रतिष्ठित को ही हजारों प्रकार के भेदोपासक योगियो की अपेक्षा इस समत्वभावापन्न योगी को ही युक्ततम कहा है । अर्थात इससे बढ़कर और कोई श्रेष्ठ नहीं है क्योंकि वह परमात्मा का आत्मा है ‘ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्’ ७/१८ ऐसा तात्पर्य है ॥६/४७॥
समीक्षा― प्रश्न यह है कि संसार विषम है, उसमें समत्व कैसे देखा जा सकता है ? क्योंकि कोई ब्राह्मण तो कोई चाण्डाल, कोई पशु तो कोई सर्प, पक्षी, कोई स्वर्ण तो कोई पत्थर या मिट्टी । अतः क्या कोई ऐसी उपमा है जो इन सभी के साथ समता रखने वाली हो ? इस पर भगवान ने कहा बिल्कुल है― हमारा शरीर ही उपमा है । हम पैर से कुछ और व्यवहार करते हैं तो हाथ से कुछ और, मुख का व्यवहार कुछ और तो घ्राण नाक कान, गुदा, लिंग आदि का व्यवहार और, तथापि उन सबमें एक मात्र शरीर भाव रहता है । यह हाथ शरीर नहीं हो सकता, यह पैर शरीर नहीं हो सकता ऐसा कभी मन में भी नहीं आता क्योंकि ये सभी तो सप्तधातु के परिणामस्वरूप इन्द्रियों के सहित ही तो शरीर है और सभी जगह मैंपने की उपस्थिति रहती है, इसी प्रकार हमें सर्वत्र व्यापक एक परमतत्त्व को अलग अलग व्यवहार करते हुए भी देखना चाहिए । यह सुनकर अर्जुन को शंका होती है कि मन प्रमथनशील स्वभाव वाला है, इसको रोकना वायु से भी अधिक कठिन है कैसे रुक सकता है ? इसके उत्तर में कहा कि ये बात ठीक है कि जिसने मन को वश में नहीं किया है उसका मन पर नियंत्रण नहीं हो सकता है तथापि निरंतर गुरु एवं शास्त्रों के निर्देश के अनुसार अभ्यास करने से इस मन को रोकना संभव है ।
अर्जुन पुनः शंका करता है कि जो अपने सकाम कर्म का त्याग कर दे और इस समत्व रूप योग को भी प्राप्त न कर पाये तो उसकी गति क्या होगी ? क्या उसका सर्वथा नाश हो जायेगा ? इस पर श्रीभगवान ने बताया कि यह योग जिसका पुरुषार्थ शिथिलता के कारण या अजितेन्द्रियता के कारण सिद्ध नहीं हुआ है उसका भी कभी विनाश नहीं होता है । वह पुण्यकर्मा के स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होकर पुनः मृत्युलोक में किसी ब्रह्मज्ञानी ऐश्वर्य संपन्न ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेकर अथवा बिना स्वर्गादि गये सीधे ही किसी योगी के घर में जन्म लेकर पुनः पहले से अधिक पुरुषार्थ पूर्वक चौदहों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके पूर्वजन्म के संस्कारों या किसी संयोग से सकाम कर्मों का उल्लंघन करके अनेक जन्मों के पश्चात संसार में ऐसे दुर्लभ अन्तिम जन्मवाला सभी शुभ और अशुभ विकारों से भलीभाँति शुद्ध यानी मुक्त होकर परम गति अर्थात स्व-स्वरूप से अभिन्न मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है ।
अन्त में दो श्लोकों में पहले इस आत्म प्रतिष्ठित ज्ञानयोगी की प्रशंसा करते हुए उसी ज्ञानयोग में अर्जुन को स्थित होने का आदेश देते हैं और अगले ही श्लोक में अपने साकार विग्रह से मन को परमेश्वर में अभिन्न करके फिर श्रद्धापूर्वक परमेश्वर का भजन करने वाले को श्रेष्ठ कहते हुए त्वम् पदार्थ का तत् पदार्थ में एकीभाव वाले योगी को श्रेष्ठ कहते हैं । इसका भी कारण यह है कि यद्यपि त्वम् पदार्थ का लक्ष्यार्थ आत्मा और तत् पदार्थ का लक्ष्यार्थ ब्रह्म दोनो अभिन्न हैं तथापि त्वम् पदार्थ लक्ष्यार्थ आत्मा की उपासना में परिच्छिन्न अहं के उदय होने और ईश्वरीय सत्ता को नकार कर सांसारिक मर्यादा के हनन और पतन के अधिक अवसर हैं अतः तत् पदार्थ लक्ष्यार्थ ब्रह्म में त्वम् पदार्थ लक्ष्यार्थ आत्मा का उसी प्रकार विलय कर दे जिस प्रकार नदी अपना विलय समुद्र में कर देती है यह एक उत्कृष्ट विज्ञान बताया गया है । यहां पर त्वम् पदार्थ का तत्पदार्थ में लय करने की विधि क्या है ? यहां न बताकर अगला सातवां अध्याय अलग से प्रारंभ करते हैं ॥३३-४७॥
॥ॐतत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
॥इस प्रकार गीतोपनिषद ब्रह्मविद्या में ब्रह्मात्मैक्य विचार नामक छठा प्रकरण पूर्ण हुआ॥
हरि ॐ तत्सत् ! हरिः ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ तत्सत् !!!
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
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