ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय १७
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥ अथ सप्तदशोऽध्यायः संबंध– पूर्व अध्याय में भगवान ने बताया कि जो शास्त्र विधि का त्याग करने वाले के लिए न सुख आत्मसिद्धि (चित्तशुद्धि) मिलती है, न सुख मिलता है और न ही परमगति मिलती है । अतः शास्त्र प्रमाण के द्वारा निश्चित की गई विधि द्वारा ही कार्य करना चाहिए । यह बात सुनकर अर्जुन के मन जिज्ञासा होती है कि सभी को शास्त्र का ज्ञान होता नहीं तो फिर अन्य लोग जो बड़ी श्रद्धा से कार्य करते हैं उनकी श्रद्धा का क्या होगा ? जबकि आपने पहले ही बताया कि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं ९/२६, यत्करोषि यदश्नासि” ९/२७ अर्थात जिस वैदिक विधि द्वारा देवताओं की आराधना की जाती है, वह आपने और देवाताओं में भेद दृष्टि के कारण अविधि और जो आप सर्वात्मा की ही आराधना करना वही विधि है । फिर उसमें आपने बहुत सामान्य बात बताया कि हमारी उपासना की विधि का भी कोई नियम नहीं है, आपके पास पत्र हो, पुष्प हो अथवा जो कुछ भी खाना पीना रूप क्रिया भी करते हो वह सब मुझे अर्प...