ब्रह्मात्मैक्य विचार अध्याय २
॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ ॥श्रीमद्भगवद्गीता॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः प्रथम अध्याय से दूसरे अध्याय की संगति— प्रथम अध्याय के 'दृष्ट्वेमं स्वजनम्' से लेकर 'क्षेमतरं भवेत्' तक १८½ श्लोकों में विभिन्न तर्कों के माध्यम से मोह की चरम सीमा का वर्णन करते हुए सामान्य जीव की स्थिति का वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि किस प्रकार मनुष्य मोहाविष्ट होकर कर्तव्य-अकर्तव्य अर्थात सत् असत् के विवेक से शून्य होकर अपने उपस्थित कर्तव्य कर्म से पलायन कर जाता है...' कर्तव्य-अकर्तव्य से विमूढ़ मनुष्य को ही जड़ता से चैतन्य की ओर ले जाने के निमित्त से ही दूसरे अध्याय का प्रारंभ किया जाता है । 🙏निवेदन— जैसे कि मैं पहले बता चुका हूं कि गीता जो जिस स्थान पर खड़ा है उसी स्थान पर उसके मार्ग को प्रशस्त करती है, क्योंकि मैं एक यति हूं और निवृत्तिमार्ग ही मेरे श्रेय का हेतु ...